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8 महीने से चल रही थी अनबन, शिखर धवन नहीं चाहते थे टूटे शादी; अभी भी आयशा मुखर्जी को मनाने का कर रहे प्रयास: रिपोर्ट

आयशा मुखर्जी ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए भारत के स्टार क्रिकेटर शिखर धवन से तलाक लेने के बारे में बताया था। करीब नौ साल बाद दोनों की राहें जुदा होने की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं है। पूरे मामले पर धवन की प्रतिक्रिया भी अब तक सामने नहीं आई है। इस बीच एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों के संबंध बीते आठ महीने से बिगड़े हुए थे। लेकिन धवन नहीं चाहते थे कि शादी टूटे।

दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट में दावा किया है कि शिखर के एक करीबी ने उन्हें नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया है कि दोनों के बीच बीते दिसंबर तक सब कुछ ठीक चल रहा था। लॉकडाउन की शुरुआत में शिखर ने आयशा के साथ फोटो और वीडियो शेयर कर भी लोगों को घर में रहने की सलाह दी थी। करीबी के अनुसार बीते सात-आठ महीने से दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। हालाँकि इसकी वजह स्पष्ट नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तलाक की पहल आयशा की ओर से की गई। इससे पहले शिखर ने शादी बचाने के प्रयास किए। बाद में वे भी तलाक के लिए राजी हो गए।

यह भी दावा किया जा रहा है कि तलाक के बावजूद शिखर धवन की कोशिश सब कुछ ठीक करने की है। यही कारण है कि अब तक उन्होंने इस मामले पर चुप्पी साध रखी है। आयशा के तलाक वाले पोस्ट के बाद शिखर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट किया था जिसमें वह आईपीएल की जर्सी पहने नजर आ रहे हैं। पर इसमें तलाक को लेकर कुछ नहीं कहा था। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा था, “किसी भी मुकाम को पाने के लिए पूरा जान, समझ, दिल लगता है। प्यार अपने काम के प्रति होनी चाहिए तभी बरकत आती है और खुशी भी मिलती है। अपने सपनों को हकीकत बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते ​रहिए।”

इससे पहले आयशा ने एक लंबे और भावुक पोस्ट में लिखा था, “मैं समझती थी कि तलाक एक गंदा शब्द है, जब तक कि मैं 2 बार तलाकशुदा नहीं हो गई।” साथ ही उन्होंने अपने पहले तलाक के वक्त के अनुभवों को भी साझा किया था। उन्होंने लिखा, “पहली बार जब मैं तलाक से गुज़री तो मैं बहुत डर गई थी और मुझे लगा जैसे मैं असफल हो गई थी और उस दौरान कुछ गलत कर रही थी। मुझे लगा जैसे मैंने सभी को नीचा दिखाया है और यहाँ तक ​​कि खुद को स्वार्थी भी महसूस किया है। मुझे लगा कि मैं अपने माता-पिता को निराश कर रही हूँ। मुझे यह भी लगा कि मैं अपने बच्चों को निराश कर रही हूँ। उस दौरान मुझे ऐसा लगता था कि मैंने भगवान का अपमान कर दिया है।”

गौरतलब है कि मेलबर्न में रहने वाली आयशा से शिखर की मुलाकात हरभजन सिंह ने करवाई थी। सोशल मीडिया से दोनों करीब आए और 2012 में शादी कर ली। यह आयशा की दूसरी शादी थी। पहली शादी से उनकी दो बेटी है। वहीं शिखर के साथ उनका सात साल का एक बेटा है।

मंदिरों के पास मांस की दुकानें, महिलाओं से छेड़खानी… राजस्थान के 200 हिंदू परिवार ‘पलायन’ को मजबूर, चिपकाए पोस्टर

राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा कस्बे में एक बार फिर हिंदू परिवार अपने मकान और दुकान बेचकर दूर जाने लगे हैं। मुस्लिम बहुल इलाके में रहने वाले हिंदुओं ने घरों के बाहर ‘पलायन’ का पोस्टर लगा कर अपना जीवन खतरे में बताया है। सामने आई तस्वीरों में देख सकते हैं कि हिंदुओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मामले में हस्तक्षेप की माँग की है। 

इस बाबत पीएम मोदी और सीएम गहलोत को पत्र भी लिखे गए हैं जिसमें बताया गया है कि असुरक्षा के कारण मजबूरी में इलाके के हिंदुओं को पलायन करना पड़ रहा है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार (सितंबर 7, 2021) को इन परिवारों के करीब 100 लोगों ने कस्बे में रैली निकालकर उपखंड अधिकारी को ज्ञापन दिया।

ज्ञापन में बताया गया कि इलाके में कैसे हिंदुओं के साथ मारपीट और महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार किया जाता है। इसके अलावा यह भी कहा गया कि 1992 के बाद मुस्लिम बस्ती के पास रहने वाले हिंदू समाज का असुरक्षा और डर के कारण धीरे-धीरे पलायन होता जा रहा है। लोग अपने मकान खाली कर दूसरों को बेच रहे हैं। कथिततौर पर मालपुरा में 600 से 800 हिंदुओं के मकान मुस्लिम समाज के लोगों ने खरीद लिए हैं। लोगों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से सुरक्षा की माँग करते हुए न्याय की गुहार लगाई है।

6 सितंबर को रैली करके एसडीएम के पास पहुँचे हिंदू (साभार: टीवी9 भारतवर्ष)

इससे पहले एक और ज्ञापन सोमवार (6 सितंबर) को सौंपा गया था। इलाके के हिंदुओं का कहना है कि मुस्लिमों की आबादी लगातार बढ़ रही है, जिसके कारण हिंदुओं का रहना मुश्किल हो रहा है। क्षेत्र में जैन और गुर्जरों के मंदिर हैं, लेकिन मुस्लिमों की बढ़ती आबादी के कारण असुरक्षा है और इस कारण उन्हें बंद करना पड़ रहा है। मंदिरों के पास अवैध तरीके से मांस की दुकानें चलाई जा रही हैं जिस वजह से मंदिर की प्रतिमाओं को दूसरी जगह भेजा जा रहा है।

बता दें कि हिंदुओं द्वारा की गई इस रैली के बाद उपखंड प्रशासन ने कार्रवाई करने की बजाय इसे साम्प्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाली करतूत बताया। उन्होंने हिंदू समुदाय के लोगों को अपने अपने घरों से इस तरह के पोस्टर हटाए की चेतावनी दी। इसके बाद पुलिसकर्मी पोस्टरों को हटाने के लिए कई बार घर पहुँचे, लेकिन लोगों के विरोध को देखते हुए वह ऐसा नहीं कर सके। एक स्थानीय नागरिक राधानकिशन ने बताया कि करीब 200 परिवार काफी समय से प्रशासन से सुरक्षा की माँग कर रहे हैं।

यहाँ ज्ञात रहे कि मालपुरा को साम्प्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील इलाका माना जाता है। कई बार वहाँ इसी वजह से तनाव की स्थिति पैदा हुई है जिसमें 50 लोगों की जान भी गई। बताया जाता है कि सबसे बड़ा साम्प्रदायिक झगड़ा 1992 में हुआ था। दोनों पक्षों के 25 लोगों की मौत हुई थी, उसके बाद साल 2000 भी 13 लोग इन्हीं सबके चलते मरे थे।

‘बंगाल में हिंसा थमने के संकेत नहीं’: बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह के घर फोड़े गए तीन देसी बम, हिरासत में लिए गए 2 लोग

पश्चिम बंगाल के बैरकपुर से बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह के घर पर अज्ञात लोगों द्वारा बम से हमला करने का मामला सामना आया है। उत्तर 24 परगना जिले में 7 सितंबर 2021 को अज्ञात बदमाशों ने अर्जुन सिंह के घर के बाहर तीन देसी बमों में धावा बोला। उल्लेखनीय है कि जिस दौरान तीन बमों को फोड़ा गया उस दौरान परिसर के बाहर सुरक्षाकर्मी मौजूद थे।

कोलकाता से करीब 100 किलोमीटर दूर जगदल में भाजपा सांसद के घर पर हमला करने वाले बाइक पर सवार होकर आए थे। घटना सुबह करीब 6.30 बजे की है। इस मामले में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने आरोप लगाया है कि हमलावर संभवत: तृणमूल कॉन्ग्रेस के हैं।

जिस दौरान इस वारदात को अंजाम दिया गया उस वक्त बीजेपी सांसद अपने घर पर नहीं, बल्कि दिल्ली में थे। हालाँकि, घर में उनका परिवार मौजूद था। घटना के बाद पुलिस मौके पर पहुँच गई है और बदमाशों की पहचान के लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल हमले के पीछे के मकसद का पता नहीं चल पाया है। बैरकपुर कमिश्नरी से अतिरिक्त पुलिस बल को उनके आवास के बाहर तैनात किया गया है।

घटना को लेकर बैरकपुर पुलिस के उपायुक्त श्रीहरि पांडे ने जानकारी दी, “पूछताछ करने पर हमने पाया कि 6-7 लोग मजदूर भवन से बाहर आए, एक लड़के की पिटाई की और फिर से इमारत में घुस गए। इसके बाद लड़का कुछ लोगों के साथ आया और भवन के गेट पर बम फेंके। 2 व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया है और उनसे पूछताछ की जा रही है।”

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने हमले पर दुख जताया है। उन्होंने एक ट्वीट में कहा, “पश्चिम बंगाल में हिंसा थमने का कोई संकेत नहीं है। सांसद अर्जुन सिंह के आवास के बाहर आज सुबह बम विस्फोट कानून-व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। पश्चिम बंगाल पुलिस से शीघ्र कार्रवाई की अपेक्षा है। जहाँ तक ​​उनकी सुरक्षा का सवाल है, इस मुद्दे को पहले भी उठाया जा चुका है।”

राज्य बीजेपी का भाजपा दावा है कि हमले के पीछे सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस का हाथ है। दूसरी ओर, टीएमसी ने दावों का खंडन करते हुए इसे बीजेपी का आंतरिक झगड़ा करार दिया है।

इससे पहले अर्जुन सिंह पर इसी साल अप्रैल में उत्तरी कोलकाता के बेलगछिया में भीड़ ने हमला किया था। उन्होंने इसे सुनियोजित घटना बताया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब उनके सुरक्षाकर्मियों ने भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश की तो किसी ने गोलियाँ चला दीं।

तालिबान की ‘मोस्ट वांटेड’ सरकार, भारत के बुद्धिजीवी देख रहे प्रेस कॉन्फ्रेंस… उधर गिर गई बाइडन की रेटिंग

उधर बीस साला मेहनत के बाद अमेरिका डेमोक्रेसी और सभ्यता की स्थापना करके अफगानिस्तान से निकला तो इधर आई एस आई कैबिनेट स्थापना करने घुस गई। वैसे तो अशरफ गनी भी अफगानिस्तान से ही निकले पर वे क्या स्थापित करके निकले यह शोध का विषय है। मुझे विश्वास है कि शोध का यह काम तालिबान लड़ाके… सॉरी, तालिबान सरकार करके ही चैन लेगी। वैसे भी तालिबान का अर्थ विद्यार्थी होता है। ऐसे महत्वपूर्ण शोध के लिए विद्यार्थियों से अच्छा और कौन होगा? आशा है भविष्य में होने वाले इस शोध का परिणाम तालिबान प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताएँगे। 

लड़ने-भिड़ने से बोर होने के बाद एक ही काम बचा था और वह था सरकार बनाने का। सरकार बन गई। सरकार बनने की प्रक्रिया बड़ी पारदर्शी है। सबकुछ खुल्लम खुल्ला। न तो EVM हैक किए जाने का खतरा, न चुनाव आयोग के सामने धरना और न ही चुनाव प्रचार का झंझट। ब्राह्मण, राजपूत, दलित, महादलित, यादव, कुर्मी, ओबीसी, बीबीसी, सीवीसी वगैरह का भी लफड़ा नहीं। लड़ाकों की संख्या के आधार पर ताक़त और ताक़त के आधार पर सत्ता। सरकार बनी तो प्रधानमंत्री भी बनेगा ही। प्रधानमंत्री बने तो गृहमंत्री और रक्षामंत्री भी बनेंगे। 

हमारे समय के दार्शनिक और विचारक रवीश कुमार से शब्द उधार लें तो कह सकते हैं; बड़ी विडंबना है कि सरकार चलेगी शरीयत के अनुसार लेकिन स्ट्रक्चर रहेगा डेमोक्रेटिक।  

तालिबान ने बताया (प्रेस कॉन्फ्रेंस करके?) कि यह परमानेंट सरकार नहीं है। सरकार परमानेंट नहीं है तो प्रधानमंत्री भी ‘टेम्परवारी’ ही होगा। दुनिया भर के मन में सवाल उठ सकता है कि जब चुनाव वगैरह का लफड़ा नहीं है तो परमानेंट सरकार क्यों नहीं? इसका उत्तर विशेषज्ञ अपने अपने अनुमान से देंगे पर मुझे लगता है यह सोची-समझी नीति के तहत किया गया है। आई एस आई ने सोचा होगा कि कल को चीन से डॉलर लेते-लेते बोर हो गए और अमेरिका और ब्रिटेन से डॉलर पाउंड खेंचने की इच्छा हुई तो ज़म्हूरियत की स्थापना के लिए बाकी सूबों की तरह अपने पांचवें सूबे में भी इलेक्शन करवा के साबित कर दिया जाएगा कि पूरे पकिस्तान में डेमोक्रेसी है। 

उधर तालिबान सरकार बनी और इधर बाइडन की रेटिंग गिर गई। वैसे भी देखा जाय तो गिरने के लिए यही एक अमेरिकी चीज बची थी। गिर गई। यदि सैम पित्रोदा से शब्द उधार लें तो कहेंगे; गिरी तो गिरी। इतनी चिंता किसलिए? ये अमेरिकी सकल ब्रह्मांड में दो ही चीजों की तलाश में हलकान हुए फिरते हैं; डेमोक्रेसी और रेटिंग। इन्हें बाकी चीजों की चिंता बाद में होगी पर डेमोक्रेसी और रेटिंग की पहले। मुझे विश्वास है कि जंगल से गुजर रहे किसी अमरीकी के सामने अचानक शेर आ जाए तो वो उससे भी पूछा लेगा; अच्छा तुम्हारे जंगल में डेमोक्रेसी है या राजशाही। और अगर शेर ने जवाब में कहा कि; राजशाही है और मैं यहाँ का राजा हूँ तो अमेरिकी अगला सवाल पूछेगा; तुम्हारी रेटिंग क्या है? लास्ट क्वार्टर में ऊपर गई या नीचे आई? 

तालिबान सरकार बनी। तालिबान ने एफ बी आई के मोस्ट वांटेड सिराजुद्दीन हक्कानी को गृहमंत्री बना दिया। इसपर बाइडन सरकार ने चिंता व्यक्त कर दी है। क्या करे? व्यक्त करने के लिए बहुत कुछ है भी नहीं। वैसे भी किसी भी सरकार के मुखिया के लिए चिंता व्यक्त करना हर समस्या का हल है। कुछ नहीं कर सकते तो चिंता व्यक्त कर दो। मुझे तो लगता है कि बाइडन और उनके मुख्य सलाहकार के बीच काफी दिनों तक कुछ ऐसा वार्तालाप चलेगा।

बाइडन- हाँ, तो बताओ आज किस बात पर चिंता व्यक्त करनी है?

सलाहकार- चीन के विदेश मंत्री काबुल जा रहे हैं। ऐसे में एक बार आप अफगानिस्तान में चीन के रोल को लेकर चिंता व्यक्त कर देते तो आपकी रेटिंग में सुधार आ सकता है। साथ ही वो पंजशीर में आईएसआई के रोल पर भी चिंता व्यक्त कर दें तो इंडियन लॉबी में आपको थोड़ी क्रेडिबिलिटी मिल जाती। 

बाइडन- चीन के रोल पर चिंता व्यक्त करने के लिए मुझे थोड़ा टाइम दो। हंटर से कंसल्ट करना होगा। आई एस आई के रोल पर आज शाम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चिंता व्यक्त कर दूँगा। अभी हाल ही में दस मिलियन डॉलर दिया है पाकिस्तान में वीमेन एम्पावरमेंट के लिए। चिंता व्यक्त करना तो बनता है। कल किस बात पर चिंतित होना है?

सलाहकार- वो तालिबान कैबिनेट में एक भी महिला नहीं है। जेंडर इक्वलिटी पर चिंता व्यक्त करने का सही समय है। आपने चिंता व्यक्त कर दी तो डेमोक्रेट्स के एथिक्स को रिवाइव किया जा सकेगा। 

बाइडन- बेवकूफ है क्या? मेरी रेटिंग और गिर जाएगी। 

सलाहकार- तो फिर कमला मैडम से चिंता व्यक्त करवा दीजिए। उन्होंने बहुत दिनों से किसी बात पर चिंता व्यक्त नहीं की है। वे महिला भी हैं तो उनकी चिंता को दुनियाँ सीरियसली लेगी। वैसे भी अमेरिका सबसे पुरानी डेमोक्रेसी है। डेमोक्रेसी का सिद्धांत ही है कि सबको मिल बाँट कर चिंता व्यक्त करनी चाहिए। 

बाइडन- नहीं-नहीं, वह ये करेगी तो इससे उसकी रेटिंग बढ़ जाएगी। एक काम करो। स्टेट डिपार्टमेंट को बोलो कि वो इसबात पर चिंता व्यक्त करे कि तालिबान कैबिनेट में किसी महिला मंत्री का न रहना चिंता का विषय है। 

सलाहकार- वो एक बात और कहनी थी। 

बाइडन- हाँ हाँ, बोलो। 

सलाहकार- वो इल्हान ओमर चाहती है कि आप एक बार भारत में माइनॉरिटी के राइट्स को लेकर चिंता व्यक्त कर देते!

बाइडन- अरे, प्रेसिडेंट हूँ मैं, एनजीओ या न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट का कॉलम लिखने वाला नहीं। वैसे भी अभी फ्रीडम हाउस से…            

अफगानिस्तान जलेगा। अमेरिका चिंतित रहेगा। रूस कन्फ्यूज्ड दिखेगा। यूरोप अपने लिए भूमिका खोजेगा। पाकिस्तान राज करेगा। चीन माइनिंग करेगा। भारत के बुद्धिजीवी तालिबान के प्रेस कॉन्फ्रेंस देखेंगे। दुनिया व्यस्त हो जाएगी। 

क्या अजीत डोभाल के पास है तालिबान का तोड़: MI6, सीआईए चीफ और रूस के NSA क्यों लगा रहे भारत का चक्कर

अफगानिस्तान में तालिबान ने अंतरिम सरकार का ऐलान कर दिया है। साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि उसकी सरकार शरिया के हिसाब से चलेगी। तालिबान की वापसी के बाद से ही लगातार जिस तरह की खबरें सामने आ रही है उससे कट्टरपंथ के हावी होने की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी। ऐसे में अब भारत तालिबान के खिलाफ वैश्विक रणनीति का केंद्र बनता नजर आ रहा है। खासकर, तब जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन के खिलाफ घर में ही विरोध के स्वर लगातार तेज होते जा रहे हैं।

रूस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के चीफ और ब्रिटिश एजेंसी एमआईए-6 के मुखिया के भारत दौरे को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। रूसी एनएसए निकोले पेत्रुशेव दो दिन के भारत दौरे पर हैं। उन्होंने अपने भारतीय समकक्ष अजीत डोभाल के साथ चर्चा की है। इससे पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के चीफ बिल बर्न्स की डोभाल के साथ बैठक हुई थी। रिपोर्टों की माने तो बर्न्स और डोभाल के बीच बातचीत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और अफगानिस्तान के हालात पर केंद्रित थी। बर्न्स की यात्रा क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भों में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद भारत और अमेरिका के लिए बढ़ती सुरक्षा चिंताओं को उजागर करती है।

पंजशीर पर फतह के तालिबानी दावे के बाद ही काबुल, मजार-ए-शरीफ और जरांज में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। पाकिस्तान का भी अफगानी नागरिक विरोध कर रहे हैं। माना जाता है कि पंजशीर में भी पाकिस्तानी सेना ने तालिबान की मदद की थी। साथ ही तालिबानी सरकार के गठन में भी उसकी भूमिका बताई जाती है। अंतरिम सरकार के ऐलान से पहले पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के मुखिया फैज हमीद ने काबुल का दौरा भी किया था।

रक्षा विश्लेषक नितिन गोखले ने सुरक्षा एजेंसियों के प्रमुखों के दौरे को लेकर ट्वीट कर कहा है कि सीआईए प्रमुख और रूस के ताकतवर सुरक्षा प्रमुख का एक ही समय में दौरा करना इस क्षेत्र में भारत की भूमिका को लेकर काफी कुछ कहता है। इन दोनों के दौरे से पहले एमआई-6 के मुखिया रिचर्ड मूर भारत आए थे। गोखले ने लिखा है कि पिछले सप्ताह हुए इस दौरे पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन कोई भी अनुमान लगा सकता है कि बदले हालात में वे भारत से क्या चाहते होंगे।

यह आशंका जताई जा रही है कि तालिबान की वापसी के बाद पाकिस्तान भारत में आतंकी गतिविधियों के लिए अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर सकता है। यही कारण है कि रूसी एनएसए के भारत दौरे से पहले 24 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ फोन पर बात की थी।

ब्रिक्स वर्चुअल सम्मेलन से पहले भी अफगानिस्तान पर चर्चा होने की उम्मीद जताई जा रही है। अगले सप्ताह होने वाला एससीओ शिखर सम्मेलन भी इसी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो सकता है। जिस तरह तालिबान की अंतरिम सरकार में वैश्विक आतंकी सिराजुद्दीन हक्कानी को गृह​मंत्री बनाया गया है, उसने पूरी दुनिया की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। हक्कानी अमेरिका की हिट लिस्ट में भी शामिल है।

जिन्हें रिश्तेदार कहते थे पोर्न स्टार… वो जावेद अख्तर की पोती: उर्फी जावेद पर शबाना आजमी ने क्यों किया ट्वीट – Fact Check

उर्फी जावेद, जावेद अख्तर। दोनों नाम में क्या कॉमन है? सिंपल सवाल का सिंपल सा जवाब – जावेद। बस लोगों ने रिश्ता निकाल लिया। दोनों को रिश्तेदार बना दिया। जावेद अख्तर दादा और उर्फी जावेद उनकी पोती।

यह खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। वायरल होने के पीछे बिग बॉस सबसे बड़ी वजह रही। और दूसरी वजह रही 2-4 दिन पहले ही मुंबई एयरपोर्ट पर ‘ब्रा-उघाड़’ कपड़ों में घूमना, जिसके लिए उर्फी जावेद को ट्रोल भी किया गया।

लेकिन क्या ये दोनों वजह जावेद अख्तर को दादा और उर्फी जावेद को उनकी पोती बना देने के लिए काफी हैं? क्या सच में इन दोनों के बीच कोई रिश्ता है या खबर सिर्फ सोशल मीडिया पर ही है, सच्चाई से कोसों दूर?

जावेद अख्तर के कितने बेटे-बेटी और उनके कितने?

जावेद अख्तर की पहली बीवी का नाम है हनी ईरानी (जन्म से पारसी)। दोनों में तलाक हो गया है। इन दोनों के 2 बच्चे हैं। जोया अख्तर 1972 में पैदा हुईं और फरहान अख्तर 1974 में।

जोया अख्तर बड़ी जरूर हैं लेकिन अभी तक शादी नहीं की हैं। फरहान अख्तर ने 2000 में ही अधुना भबानी (जन्म से हिंदू) से शादी कर ली। 2016 में तलाक भी दे दिया। इन दोनों के 2 बच्चे (बेटी) हैं – शाक्य और अकीरा। फिलहाल शिबानी दांडेकर (जन्म से हिंदू) के साथ देखे जाते हैं लेकिन शादी नहीं हुई है।

जावेद अख्तर की दूसरी बीवी का नाम है शबाना आजमी (यह जन्म से मुस्लिम ही)। इन दोनों का कोई बच्चा नहीं है।

कुल मिला कर जावेद अख्तर के परिवार (तलाक दी गई बीवियों और उनके बच्चे मिला कर) में उर्फी जावेद नाम का/की शख्स कोई नहीं है। सोशल मीडिया पर के लोग खबर के पीछे इतना रिसर्च नहीं करते। उन्हें कुछ वायरल जैसा माल मिलता है, फटाक से शेयर मारते हैं।

latestly पर इस झूठे खबर का फैक्ट चेक भी किया गया। फिर भी शबाना आजमी ने ट्वीट करते हुए अपनी ओर से भी इस झूठ को विराम दिया। डर बना रहता है, खास कर तब जबकि उर्फी जावेद से किस्सा जुड़ा हो।

उर्फी जावेद इससे पहले तब चर्चा में आई थीं जब वो ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर आई थीं। ‘बिग बॉस’ के घर से बाहर आने के बाद उर्फी जावेद ने अपनी निजी जिंदगी से जुड़े कई राज खोले। इंस्टाग्राम पर उर्फी ने बताया कि अडल्ट साइट पर उनकी तस्वीरें अपलोड होने के बाद उन्हें परिवार का कोई सपोर्ट नहीं मिला था। इसकी वजह से रिश्तेदार भी उन्हें पोर्न स्टार समझने लगे थे।

सीमेंट बनाने वाली लाफार्ज ने ISIS जैसे आतंकी समूह पर कर दी डॉलर की बरसात, ताकि सीरिया में उसकी फैक्ट्री पर न आए आँच

फ्रांस की शीर्ष अदालत में मंगलवार (सितंबर 7, 2021) को एक बड़ी सीमेंट कंपनी लाफार्ज (Lafarge ) पर आतंकवाद को वित्तपोषित करने का आरोप लगा। जानकारी के मुताबिक, इस कंपनी ने उत्तरी सीरिया में युद्ध के शुरुआती वर्षों में यानी कि 2011 के बाद अपने फायदे के लिए IS (इस्लामिक स्टेट) को लगभग 1.53 करोड़ डॉलर का भुगतान किया था।

अब फ्रांस में इसी मामले के कारण कंपनी जाँच के अधीन है। शीर्ष अदालत ने भी इस बाबत सुनवाई के दौरान निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया है जिसमें कंपनी पर लगे आरोपों को खारिज किया गया था। कंपनी पर मानवता के विरुद्ध किए गए अपराध के तहत आरोप तय हो सकते हैं।

ये कंपनी 2015 के बाद होलसीम का हिस्सा है। भारत में लाफार्ज होल्सिम, एसीसी और अंबुजा सीमेंट्स की होल्डिंग कंपनी है। इस कंपनी ने अपने ऊपर लगे आरोपों के बाद हुई इंटरनल इन्वेस्टिगेशन में माना था कि उसकी सीरियाई ईकाई ने युद्ध क्षेत्र के अंदर कर्मचारियों और सामानों की आवाजाही की अनुमति पाने को लेकर सशस्त्र समूहों के साथ बातचीत करने के लिए बिचौलियों को भुगतान किया। हालाँकि, कंपनी ने यह नहीं माना कि ऐसा करके वो मानवता के ख़िलाफ अपराध करने वाले आतंकवादी समूह को वित्तपोषित कर रहे थे।

साल 2019 में इसी मामले में पेरिस की एक अदालत ने कंपनी पर लगे सभी आरोपों को खारिज किया था। कोर्ट का तर्क था कि कंपनी द्वारा किए गए आर्थिक लेन-देन के पीछे ये उद्देश्य नहीं था कि वो इस्लामी स्टेट को फंड दें और बेगुनाहों को मारने या उन्हें प्रताड़ित करने के एजेंडे को बढ़ावा दें।

इस फैसले को बाद में लाफार्ज कंपनी के ही 11 पूर्व कर्मचारियों ने कुछ NGO की मदद से कोर्ट ऑफ कैसेशन में चुनौती दी। जिस पर सुनवाई करते हुए मंगलवार को निचली अदालत का फैसला पलट दिया गया। इसमें कहा गया कि मानवता के ख़िलाफ़ अपराध में कंपनी शामिल हो सकती है भले ही उनका अपराध से जुड़ने का कोई इरादा न हो।

कोर्ट ने पाया कि आरोप तय करने के लिए इतना काफी है कि कंपनी ने ये जानते हुए उस समूह को करोड़ो डॉलर दिए जिसका उद्देश्य आपराधिक था। भले ही ऐसा उसने अपनी व्यावसायिक गतिविधि को बढ़ाने के लिए ही क्यों न किया हो।

कोर्ट ने यह भी पाया कि अगर इस तरह के अपराधों में वह ढीला रवैया दिखाएँगे तो न जाने कितने ऐसे अपराधी बेगुनाह करार दे दिए जाएँगे। कोर्ट ने आगे इस मामले को जाँच मजिस्ट्रेट के पास भेजा है ताकि आरोपों की समीक्षा हो सके। इस दौरान कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को भी खारिज किया। कंपनी के साथ लाफार्ज के 8 एग्जीक्यूटिव, पूर्व सीईओ Bruno Laffont पर भी आतंकी समूह को फाइनेंस करने का आरोप लगा है।

बता दें कि लाफार्ज पर आईएसआईएस को 13 मिलियन यूरो से अधिक का भुगतान करने का आरोप है ताकि अन्य फ्रांसीसी कंपनियों के देश छोड़ने के बाद भी उसके जलाबिया संयंत्र को चालू रखा जा सके। हालाँकि लाफार्ज ने सीरिया को साल 2014 में छोड़ दिया था क्योंकि आतंकियों ने उनके प्लांट पर कब्जा कर लिया था।

शरिया वाली सरकार में बुद्ध प्रतिमा तुड़वाने वाला PM, गृह मंत्री है ग्लोबल टेररिस्ट: शिक्षा मंत्री ‘डिग्री’ को ही बता रहा बेकार

अफगानिस्तान में तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार का गठन कर लिया है। मंगलवार (7 सितंबर 2021) को इसकी घोषणा की गई। मुल्ला मुहम्मद हसन अखुंद को देश का नया प्रधानमंत्री घोषित किया गया है। जिन्होंने बुद्ध की प्रतिमा को नष्ट करवा दिया था। उपप्रधान मंत्री के तौर पर मुल्ला अब्दुल्ल गनी बरादर का नाम सामने आया है। लेकिन इस सरकार में अल्पसंख्यकों और महिलाओं को दरकिनार किया गया।

तालिबान की सरकार के शीर्ष नेतृत्व में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री समेत अनेक ऐसे नेता हैं जिनके नाम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकी सूची में हैं। सिराजुद्दीन हक़्क़ानी जैसे नेताओं के सिर पर अमेरिका ने तो लाखों डॉलर का ईनाम भी घोषित कर रखा है। तालिबान ने स्पष्ट किया है कि उसकी सरकार शरिया कानून के हिसाब से काम करेगी। आगे आप तालिबान सरकार के उन चेहरों के बारे में जान सकते हैं जो घोषित आतंकी हैं और उनपर पहले से ही ईनाम भी रखा गया है।

मुल्ला मुहम्मद हसन, प्रधानमंत्री

1990 के दशक में तालिबान के संस्थापक सदस्यों में से एक माना जाने वाला कट्टरपंथी मुल्ला मुहम्मद हसन अखुंद को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया है। वह अब तक तालिबान की शीर्ष निर्णयकारी संस्था ‘रहबरी शूरा’ के प्रमुख रहे हैं। वह 1990 के दशक में सत्ता संभालने वाली तालिबान की सरकार के दौरान पूर्व उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री थे। उसी ने पाकिस्तान के क्वेटा में तालिबान की नेतृत्व परिषद को समन्वयित करने और चलाने में मदद की।

मुल्ला अब्दुल गनी बरादर बना उप प्रधानमंत्री

अब्दुल गनी बरादर को देश का डिप्टी पीएम बनाया गया है। बरादर के साथ ही मुल्ला अबदस सलाम को भी हसन अखुंद के डिप्टी के तौर पर नियुक्त करने का फैसला लिया गया है। इंटरपोल के मुताबिक, मुल्ला अब्दुल गनी बरादर 1968 में उरुज़गन प्रांत में पैदा हुआ था। बरादर ने 1996 में शुरू हुई पहली तालिबान सरकार में वरिष्ठ पदों पर कार्य किया था। वह 2001 में उप रक्षामंत्री के तौर पर भी कार्यरत था। हालाँकि बाद में पाकिस्तान भाग गया।

सिराजुद्दीन हक्कानी, गृह मंत्री

48 के माने जाना जाने वाला सिराजुद्दीन हक्कानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा है। इसके अलावा वह तालिबान की सत्ता में वापसी में सबसे बड़े विजेताओं में से एक के रूप में उभरा है। हक्कानी कार्यवाहक आंतरिक मंत्री होंगे।

हक्कानी नेटवर्क पाकिस्तानी खुफिया सेवा के साथ घनिष्ठ संबंधों के लिए जाना जाता है और यू.एस. का सबसे कट्टर विरोधी है। खास बात यह है कि हक्कानी एफबीआई द्वारा मोस्ट वांटेड टेररिस्ट घोषित किया गया है। उस पर 5 मिलियन डॉलर (36,75,57,500 रुपए) का इनाम रखा गया है। सिराजुद्दीन हक्कानी एक ग्लोबल आतंकी है। वह भारतीय दूतावास पर हुए हमले में भी शामिल रहा है।

मावलवी मुहम्मद याकूब, रक्षा मंत्री

मावलवी मुहम्मद याक़ूब (30) को तालिबान सरकार का नया रक्षामंत्री बनाया गया है। वह तालिबान के सैन्य आयोग का प्रमुख है और उमर का सबसे बड़ा बेटा है। साल 2016 में तालिबान के नेतृत्व के उत्तराधिकार के दौरान सबसे पहले उसका नाम सामने आया था।

अमीर खान मुत्ताकी, विदेश मंत्री

अमीर खान मुत्ताकी विदेश मंत्री बनने से पहले तक तालिबान के मार्गदर्शन आयोग का प्रमुख था। उसने हाल के महीनों में अफगान सेना और पुलिस बलों के कई सदस्यों को आत्मसमर्पण करने के लिए राजी करवाया था। अब उसे विदेश मंत्री बनाया गया था। मुत्ताकी तालिबान की पहली सरकार में सूचना और संस्कृति मंत्री, तत्कालीन शिक्षा मंत्री रह चुका है।

अब्दुल हक वसीक, खुफिया प्रमुख

वासिक युद्ध के अंतिम अमेरिकी कैदी, सार्जेंट बोव बार्गदहल के बदले में रिहा किए गए पाँच ग्वाँतानामो बे कैदियों में से एक था। अपनी रिहाई के बाद, वह दोहा, कतर पहुँचा और अमेरिका के साथ तालिबान की वार्ता का एक प्रमुख सदस्य बन गया। वह गजनी प्रांत का रहने वाला है।

जबीहुल्लाह मुजाहिद, उप सूचना एवं संस्कृति मंत्री

तालिबान का स्पोक्सपर्सन 43 वर्षीय जबीउल्ला मुजाहिद पक्तिया प्रांत का मूल निवासी है। उसे नई सरकार ने उप सूचना और संस्कृति मंत्री का प्रभार दिया गया है।

खलील हक्कानी, शरणार्थी मंत्री

हक्कानी तालिबान के सर्वोच्च नेता का एक विशेष प्रतिनिधि है। वह लंबे समय से हक्कानी नेटवर्क के लिए धन वसूली करता था। उसे वैश्विक आतंकवादियों की यू.एस. और यू.एन. सूची में शामिल किया गया है। उसे नई सरकार में शरणार्थी मंत्री नियुक्त किया गया है।

मनसुख हिरेन को कैसे मारा, अंबानी के घर के बाहर विस्फोटक क्यों रखा: NIA ने सब कुछ बताया, खोल दी सचिन वाजे की प्लानिंग के हर तार

2021 की 25 फरवरी को एक विस्फोटक लदी कार उद्योगपति मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित घर एंटीलिया के बाहर मिली। पता चला कि यह कार मनसुख हिरेन के नाम है, जिसका शव 5 मार्च को मुंब्रा की खाड़ी से बरामद किया गया। अब इस मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने चार्जशीट दाखिल कर दी है। इससे पता चलता है कि मुंबई पुलिस के बर्खास्त सहायक पुलिस निरीक्षक सचिन वाजे ने क्यों और कैसे पूरी प्लानिंग रची थी।

चार्जशीट में जो लोग आरोपी बनाए गए हैं उनमें वाजे के अलावा एनकाउंटर स्पेशलिस्ट रहे प्रदीप शर्मा का भी नाम है। शर्मा मुंबई पुलिस का चर्चित अफसर रहा है। वाजे उसे अपना ‘गुरु’ मानता है। अपने 36 साल के करियर में शर्मा ने करीब 312 एनकाउंटर किए। उसने शिवसेना के टिकट पर पिछला विधानसभा चुनाव पालघर की नालासोपारा सीट से लड़ा था।

चार्जशीट के अनुसार वाजे को जब लगा कि हिरेन से पूछताछ में उसका सच सामने आ सकता है तो उसने शर्मा से संपर्क किया। उसे पैसे दिए। शर्मा ने यह पैसा संतोष आत्माराम शेलार को दिया। शेलार को हिरेन की हत्या की जिम्मेदारी दी गई थी। अन्य आरोपितों में नरेश रमणीकलाल गोर, विनायक बालासाहेब शिंदे, रियाज़ुद्दीन हिसामुद्दीन काज़ी, सुनील धर्म माने, आनंद पांडुरंग जाधव, सतीश तिरुपति मोथकुरी और मनीष वसंतभाई सोनी शामिल है।

चार्जशीट के मुताबिक 16 साल बाद वाजे की मुंबई पुलिस में दोबारा बहाली हुई तो उसने ‘सुपर कॉप’ के तौर पर अपनी पुरानी प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए पूरी साजिश रची। इसके लिए उसने उगाही से इकट्ठा रकम का इस्तेमाल किया। जब उसे एहसास हुआ कि हिरेन की वजह से उसकी पूरी साजिश सामने आ सकती है तो उसकी हत्या करवा दी। एनआईए ने चार्जशीट में 20 संरक्षित गवाहों सहित 178 गवाहों के बयानों का हवाला दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार हिरेन की हत्या महज 11 मिनट के भीतर अंजाम दी गई थी। सुनील माने ने 4 मार्च को क्राइम ब्रॉन्च इंस्पेक्टर तावड़े बनकर हिरेन को कॉल किया और ठाणे के घोड़बंदर रोड स्थित सूरज वॉटर पार्क के पास मिलने के लिए बुलाया। यहाँ से माने उसे सफेद रंग की कार में लेकर सुरेखा होटल पहुँचा। फिर उसे लाल रंग की टवेरा में बिठाकर उसका मोबाइल फोन ले लिया गया। टवेरा कार में हिरेन को ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर योजना के तहत बीच में बैठाया गया। हिरेन के बैठते ही उसके एक तरफ संतोष शेलार और दूसरी ओर आनंद जाधव बैठ गया। इस सीट के पीछे पहले से ही सतीश बैठा हुआ था।

सतीश ने पीछे से हिरेन का सिर पूरी ताकत से जकड़ लिया और रूमाल से उसका मुँह और नाक दबा दिया। जब हिरेन ने बचाव में विरोध शुरू किया तो शेलार और जाधव ने उसके हाथ पकड़ लिए। हत्या के बाद उसका शव खाड़ी में फेंक दिया।

यह बात भी सामने आई है कि वाजे ने 2 मार्च को हिरेन को पुलिस हेडक्वार्टर में बुलाया था। तब प्रदीप शर्मा और संदीप माने भी मौजूद थे। ऐसा इसलिए किया गया ताकि शर्मा और माने भी हिरेन को पहचान लें। जिस दिन हिरेन की हत्या की गई उस दिन वाजे ने एक बार पर छापा मारा ताकि किसी को उस पर शक न हो। एंटीलिया के बाहर गाड़ी पार्क करने के बाद उसने अपने कपड़े जला दिए थे। अपना मोबाइल फोन भी नष्ट कर दिया था।

गौरतलब है कि इस मामले ने पूरी मुंबई पुलिस को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। पुलिस कमिश्नर पद से हटाए जाने के बाद परमबीर सिंह ने दावा किया था कि अनिल देशमुख ने गृह मंत्री रहते वाजे को वसूली का टारगेट दे रखा था। इसके बाद देशमुख को भी पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

इस्लामी सिद्धांतों का पालन करके तालिबान देंगे सुशासन, मानवाधिकारों का भी करेंगे सम्मान: फारूक अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री हैं फारूक अब्दुल्ला। बेटा भी मुख्यमंत्री थे। इनके अब्बा भी थे। खानदानी कह सकते हैं। देश के एक राज्य के मुख्यमंत्री (पूर्व ही सही) से मन नहीं भरा तो अब तालिबान को ले कर बोल रहे हैं। कह रहे हैं कि अफगानिस्तान में वे अच्छी सरकार चलाएँगे।

तालिबान को लेकर फारूक अब्दुल्ला ने जो कहा, उन्हीं के शब्दों में पढ़ते हैं।

“मुझे उम्मीद है कि वे (तालिबान) इस्लामी सिद्धांतों का पालन करते हुए उस देश (अफगानिस्तान) में सुशासन देंगे और मानवाधिकारों का सम्मान भी करेंगे। उन्हें हर देश के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने का प्रयास भी करना चाहिए।”

अफगानिस्तान पर शासन कर रहे तालिबान को पाकिस्तान और चीन पहले ही अपना समर्थन दे चुके हैं। अब जब सरकार की घोषणा भी कर दी गई है, तो इन दोनों देशों का समर्थन तो है ही। लेकिन बाकी देश अभी फूँक-फूक कर कदम रख रहे हैं। वहाँ की परिस्थितियों को आँक रहे हैं। भारत की सरकार भी कोई जल्दबाजी में नहीं है। लेकिन कुछ नेताओं को कौन समझाए?

फारूक अब्दुल्ला ऐसे ही नेता हैं। आतंक, इस्लाम, मुस्लिम… ये सारे शब्द सुन कर बेचैन हो जाते हैं। कभी कहते हैं कि अल्लाह करे कि चीन की ताकत से अनुच्छेद 370 वापस आ जाए। कभी कहते हैं कि कश्मीरी नहीं बने रहना चाहते भारतीय। कभी इन पर गंभीर आरोप पर भी लगता है कि आतंकी के बेटे का MBBS में एडमिशन भी करवाए थे।

खैर। तालिबान पर अपनी जुबान खोलने से पहले केंद्र सरकार की राय-रवैये को पढ़ लेते तो अच्छा रहता। लेकिन पढ़ लेंगे तो “…भारत के ताबूत में आखिरी कील” वाला स्टेटमेंट कैसे दे पाएँगे?

आपको बता दें कि अफगानिस्तान में तालिबान ने अंतरिम सरकार का गठन कर लिया है। वहाँ के प्रधानमंत्री मुल्ला हसन अखुंद होंगे। जबकि अब्दुल गनी बरादर को वहाँ का डिप्टी पीएम बनाया गया है। वैश्विक आतंकियों की लिस्ट में मोस्ट वॉन्टेड रहे सिराजुद्दीन हक्कानी को अफगानिस्तान का गृह मंत्री बनाया गया है।