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जब हिमांशी नरवाल के बयान से मिली नैरेटिव को धार, तो वामपंथी मीडिया ने बनाया हीरो: अब अब्बू-बेटे की जोड़ी ने बनाई अश्लील AI वीडियो तो सिले होठ

22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में एक आतंकी हमला हुआ। इस हमले की पहचान बनी वो तस्वीर, जिसमे एक महिला अपने मृत पति के पास बैठी है। यह फोटो लेफ्टिनेंट विनय नरवाल और उनकी नवविवाहिता पत्नी हिमांशी नरवाल की थी। फोटो में विनय जमीन पर पड़े थे और हिमांशी वहाँ बैठी थीं। इस फोटो ने पूरे देश में शोक और रोष भर दिया। हिमांशी की पीड़ा, इस फोटो के चलते पूरे देश की पीड़ा बन गई।

हमले के बाद स्वाभाविक तौर पर लोगों ने कश्मीरी आतंकियों और पाकिस्तान के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया आतंकियों के स्थानीय मददगारों पर भी लोगों का गुस्सा फूटा। इसके कुछ दिनों बाद हिमांशी ने मीडिया को एक बयान दिया।

उन्होंने कहा, “मुस्लिम और कश्मीरी लोगों का विरोध नहीं होना चाहिए।” उनका ये बयान कुछ लोगों को बहुत भाया। बयान को वामपंथी और कथित उदारवादी मीडिया ने खूब सराहा। ट्विटर से लेकर टीवी डिबेट तक इस बात की खूब सराहना भी की गई।

इस बयान को ‘अमन की आशा’ और पाकिस्तान से दोस्ती के राग गाने वाला गैंग भी खूब प्रचारित करता रहा। जिन मीडिया चैनल ने उस समय पर पाकिस्तान की सच्चाई विश्व के सामने दिखाना जारी रखा उन्हें ‘कट्टर’ और ‘हेट स्प्रेडर’ का टैग दे दिया गया। कुछ दक्षिणपंथी सोशल मीडिया अकाउंट्स ने हिमांशी का JNU से कनेक्शन भी निकाला।

इस पूरे विवाद के लगभग डेढ़ महीने बाद हिमांशी नरवाल से जुड़ी एक और खबर सामने आई। हाल ही में हिमांशी नरवाल का एक कथित अश्लील वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में हिमांशी का चेहरा इस्तेमाल कर उनकी इज्जत तार-तार करने का प्रयास किया गया।

जब पुलिस ने जाँच की तो पता लगा कि यह अश्लील वीडियो AI का इस्तेमाल करके बनाया गया था। पुलिस को यह भी पता चला कि इसे बनाने के पीछे बिहार के दो मुस्लिम थे। यह दोनों बाप-बेटे हैं। उनको पुलिस ने बिहार के गोपालगंज से गिरफ्तार कर लिया गया। इनका नाम मोहिबुल हक़ और गुलाब जिलानी है।

लेकिन पिछले मामले के उलट इस बार मीडिया ने इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। ना तो हिमांशी नरवाल की खबर पर कोई डिबेट हुई ना इस पर किसी पत्रकार को ट्वीट करने की सूझी। उन खबरी समूहों ने तो और भी दूरी बरती, जो खुद को लिबरल बताते हैं।

सवाल उठता है कि जो हिमांशी नरवाल पहले वामपंथी मीडिया की ‘आज़ादी की आवाज़’ थी, उनके लिए अब कोई आवाज़ क्यों नहीं उठा रहा? न कोई बड़ी बहस हो रही है, न कोई हेडलाइन, न कोई लंबा चौड़ा ट्वीट। वामपंथी पत्रकारों और एक्टिविस्ट की टाइमलाइन इस मुद्दे पर बिल्कुल खामोश हो गई है। इससे पहले हिमांशी को लोकतंत्र का चेहरा घोषित करने वाले राजदीप सरदेसाई भी शांत रहे।

दरअसल बात यह यह है कि वर्तमान खबर भले ही हिमांशी नरवाल से जुड़ी हो, उनके सम्मान से जुड़ी हो, लेकिन यह वामपंथी मीडिया के एजेंडे के खिलाफ है। कल तक हिमांशी को आजादी का उदाहरण बताने वाली वामपंथी मीडिया यह खबर इसलिए दबा कर बैठ गई, क्योंकि इस बार आरोपित मुस्लिम हैं।

अगर वामपंथी मीडिया यह खबर चलाता तो उसे मुस्लिमों का नाम लिखना पड़ता, उसे बताना पड़ता कि मोहिबुल और उसके बेटे गुलाब ने एक बलिदानी की विधवा का अपमान किया है। ना सिर्फ उसने अपमान किया है बल्कि अश्लील वीडियो बनाई है, जो निकृष्टतम अपराध है।

वामपंथी मीडिया को यह हिम्मत ही नहीं है कि वह ऐसी खबरें चलाए। ऐसे मामले में वह समुदाय विशेष, मैन या कोई और जानकारी लिख लेता है और मुस्लिमों के अपराध बताने से कन्नी काटता है। याद रखिए कि इसी वामपंथी मीडिया ने हाल ही में नैनीताल में 70 वर्ष के मुस्लिम के 12 वर्षीय बच्ची के साथ रेप करने को ‘लव अफेयर’ बताया था।

असल में वामपंथी मीडिया को प्रेम ना तो हिमांशी नरवाल से है और ना उसे उनकी कोई चिंता है। उसे बस अपने नैरेटिव की चिंता है। पुरानी खबर नैरेटिव के हिसाब से थी, इसलिए उसको तवज्जो दी और अब मामला अपने हिसाब से नहीं दिखा तो किनारे हो लिए।

कर्मचारियों और यात्रियों के टैक्स के पैसे तक खा गए विजय माल्या, अब पॉडकास्ट में खेल रहे ‘विक्टिम कार्ड’: अभी भी बैंकों का ₹7000 करोड़ बकाया

विजय माल्या – ये एक ऐसा नाम है जो कभी भोग-विलासिता वाली समृद्ध जीवनशैली का एक पर्यायवाची हुआ करता था। कभी उन्हें ‘किंगफ़िशर’ के कैलेंडर लॉन्च के कार्यक्रमों में बिकनी मॉडल्स के साथ देखा जाता था, तो कभी उन्हें शिल्पा शेट्टी और कैटरीना कैफ जैसी अभिनेत्रियों के साथ देखा जाता था। कभी वो आकर्षक शहर सॉसलिटो में मैनशन ख़रीदने के लिए चर्चा में रहे, तो कभी वो IPL टीम ‘रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु’ (RCB) को ख़रीदने के कारण चर्चा में रहे। लेकिन, दो-दो बार निर्दलीय राज्यसभा सांसद बनने वाले विजय माल्या का साम्राज्य ऐसा ध्वस्त हुआ कि उन्हें भारत से भागना पड़ा।

अपने पिता के निधन के बाद 1983 में 28 वर्ष की उम्र में ‘यूनाइटेड ब्रुअरीज’ के चेयरमैन बने विजय माल्या देश छोड़कर भागने के 9 वर्ष बाद एक बार फिर से चर्चा में हैं। कारण – राज शमानी के साथ उनका पॉडकास्ट। 4 घंटे 18 मिनट से भी अधिक के इस पॉडकास्ट के बाद कुछ लोगों में उनके प्रति सहानुभूति जाग रही है। शायद इस पॉडकास्ट का लक्ष्य भी यही रहा हो। डाक्यूमेंट्स लेकर इस पॉडकास्ट में पहुँचे विजय माल्या ने ख़ुद को पीड़ित साबित करने की पूरी कोशिश की है और कहा है कि उन्होंने कोई धोखाधड़ी नहीं की, वो तो लोन वापस लौटाना चाहते थे।

राज शामानी का पॉडकास्ट, विजय माल्या का ‘विक्टिम कार्ड’

जिस तरह से विजय माल्या ने इस पॉडकास्ट में अरुण जेटली का नाम घसीटा है, उसके बाद एक ख़ास समूह को मोदी सरकार पर भी हमलावर होने का मौका मिल गया है। विजय माल्या का कहना है कि दिल्ली से देश छोड़कर भागने से पहले उन्होंने अरुण जेटली को बता दिया था। माल्या बताते हैं कि वो अरुण जेटली के दफ़्तर नहीं गए थे, या फिर उनके साथ कोई बैठक नहीं की थी – बल्कि चलते-चलते बता दिया था कि वो जा रहे हैं। तब भारत के वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली अब इन आरोपों का जवाब देने के लिए इस देश में नहीं हैं।

इससे पहले सितंबर 2018 में भी विजय माल्या ने अरुण जेटली का नाम घसीटा था। तब भी विजय माल्या लंदन कोर्ट के इकट्ठा पत्रकारों से कहा था कि वो सेटलमेंट ऑफर लेकर अरुण जेटली से मिले थे। हालाँकि, अरुण जेटली ने इसे नकारते हुए कहा था कि ये सिर्फ़ कुछ ही मिनटों की मुलाक़ात थी जिसमें विजय माल्या ने कहा कि वो एक सेटलमेंट ऑफर तैयार कर रहे हैं। दोनों ही उस समय राज्यसभा सदस्य थे, ऐसे में सदन के गलियारों में एक सांसद द्वारा दूसरे से कुछ फुसफुसाने को ‘बैठक’ तो कम से कम नहीं ही कह सकते हैं।

अरुण जेटली ने तभी साफ़-साफ़ कह दिया था कि उन्होंने मुलाक़ात के लिए 2014 के बाद विजय माल्या को कभी अपॉइंटमेंट दिया ही नहीं। उन्होंने राज्यसभा सांसद होने का फ़ायदा उठाया और टहलते हुए उनके पास आकर ऑफर वाली बात कही। बकौल अरुण जेटली, वो विजय माल्या के झाँसा वाले ऑफर्स से बखूबी परिचित थे और उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि उनसे इसपर बात करने काकोई तुक नहीं है, वो ये ऑफर लेकर बैंकों के पास जाएँ। यानी, इस एक वक्त के आदान-प्रदान को विजय माल्या ने अबतक कहकर पेश किया। जबकि अरुण जेटली ने उन्हें आगे बातचीत का मौका तक नहीं दिया था।

अब भी विजय माल्या के पास बैंकों का भारी बकाया

विजय माल्या एक और दावा ये कर रहे हैं कि जो लोन उन्होंने लिया था वो तो उन्होंने चुका दिया है। ये ऐसा ही है जैसे कोई चोर कहे कि उसने 10 साल पूर्व किसी के घर को खाली किया था तो अब उसके ख़िलाफ़ सिर्फ़ इसीलिए कोई मामला नहीं बनता क्योंकि उसने लूटे हुए सामान लौटा दिए हैं। एक सच ये भी है कि विजय माल्या के पास अभी भी बैंकों के 7000 करोड़ रुपए बकाया हैं। बैंकों ने बताया है कि कुल बकाया 17,781 करोड़ रुपए का था, जिसमें से 10,815 करोड़ रुपए वसूले जा चुके हैं। यानी, 6997 करोड़ रुपए अब भी वसूले जाने बाकी हैं। उधर विजय माल्या का दावा है कि उनका लोन केवल 6200 करोड़ रुपए का ही था, जिसके बदले वो 14,000 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुके हैं।

ये तो एक आम आदमी भी जानता है कि कोई भी ऋण ब्याज के साथ आता है। इससे आगे जानने वाली बात ये है कि इस ब्याज के ऊपर से भी एक ब्याज लगता है, जिसे पीनल इंटरेस्ट कहते हैं। विजय माल्या जैसे लोग जो समय पर लोन नहीं चुकाते और बैंकों के साथ सहयोग नहीं करते, उन्हें पीनल इंटरेस्ट भी देना होता है। इसीलिए, बैंक द्वारा दिए गए आँकड़ों और विजय माल्या के दावों में फ़र्क़ है। PMLA कोर्ट के आदेश के बाद जाँच एजेंसियाँ गोवा स्थित किंगफ़िशर बंगला समेत विजय माल्या की कई जब्त संपत्तियों को नीलाम कर चुकी है, क्योंकि ऋण वापस वसूलने का कोई और तरीका नहीं बचा था। विजय माल्या के खिलाफ ‘ऋण वसूली अपीलीय न्याधिकरण’ (DBT) में भी मामला चल रहा है। SBI, PNB, IDBI और Uco बैंक समेत 17 ऐसे बैंक हैं जिनका पैसा लेकर विजय माल्या भागे थे। उनपर केवल लोन न चुकाने का ही नहीं, बल्कि फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले भी चल रहे हैं।

बात ये है कि अब ये मामला सिर्फ़ विजय माल्या से जुड़ा हुआ नहीं है। IDBI बैंक के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रहे योगेश अग्रवाल को विजय माल्या से जुड़े मामले में ही CBI ने गिरफ़्तार किया था। बैंक के पूर्व एग्जीक्यूटिव BK बत्रा भी गिरफ्तार हुआ था। जनवरी 2017 में इनके अलावा 7 अन्य भी गिरफ़्तार किए गए थे। इनमें किंगफिशर चीफ फाइनेंसियल ऑफिसर A रघुनाथन के अलावा 3 अन्य अधिकारी भी शामिल थे। आरोप है कि इन दोनों ने विजय माल्या को लेकर पक्षपात किया। यानी, उन्हें अनुचित तरीके से फ़ायदा पहुँचाया। किंगफिशर एयरलाइन्स के कमजोर वित्तीय रिकॉर्ड्स होने के बावजूद उसे 1000 करोड़ रुपए का लोन दिया गया। IDBI बैंक के जनरल मैनेजर रहे बुद्धदेव दासगुप्ता का नाम भी CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में था।

कर्मचारियों में हाहाकार, अय्याश में डूबे माल्या

CBI इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की चार्जशीट भी दायर कर चुकी है। ये मामला सिर्फ़ लोन लेकर न चुकाने का नहीं है। अब ये मनी लॉन्ड्रिंग का भी है। ये ‘Wilfull Default’ का है, अर्थात जानबूझकर लोन न चुकाना। बैंक और कंपनी के अधिकारियों के गिरफ़्तार होने का कारण ये है कि इन सबने मिलकर साजिश रची। विजय माल्या ‘Wilfull Defaulter’ इसीलिए हैं, क्योंकि जब किंगफ़िशर एयरलाइन्स डूब रही थी उस समय उन्हें न लोन चुकाने की पड़ी थी और न कर्मचारियों को वेतन देने की। आज अपनी छवि चमकाने में लगे विजय माल्या का बचाव किसी वेब सीरीज के लिए तो ठीक आईडिया है, लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न है।

2008 और 2015-16 में जब किंगफिंगशेर एयरलाइन्स के कर्मचारियों में वेतन को लेकर हाहाकार मचा था तब विजय माल्या विदेशों में संपत्तियाँ ख़रीदने में व्यस्त थे। इन 2 वर्षों में इंग्लैंड और फ्रांस में उन्होंने 330 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ ख़रीदीं। विजय माल्या ने ‘फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन लिमिटेड टीम’ (F1F1) टीम भी बनाई थी। जाँच में पता चला कि किंगफ़िशर एयरलाइन्स के बैंक खातों से इस टीम के बैंक खातों में 241 करोड़ रुपए भेजे गए। जिस खाते में पैसा भेजा गया वो लंदन के HSBC बैंक का था। लंदन के जिस लेडीवॉक प्रॉपर्टी में विजय माल्या रहते हैं, उसे भी 80 करोड़ रुपए में ख़रीदा गया था।

आइए, अब जो विजय माल्या कह रहे हैं कि वो फ्रॉड नहीं हैं उनकी कुछ और करतूतों के बारे में खुलासा किया जाए, क्योंकि शब्दों की चासनी में कई बार तथ्य छिप जाते हैं क्योंकि वो जटिल होते हैं। 2016 में विजय माल्या को डियागो PLC से $40 मिलियन मिले, जो अभी की तारीख़ में 342 करोड़ रुपए से भी अधिक होती है। विजय माल्या ने अपनी कंपनियों के जरिए जो लोन लिए थे, उनमें पर्सनल गारंटी एग्रीमेंट ये कहती थी कि इस धनराशि को वो अलिएनेट नहीं कर सकते थे। इसके बावजूद विजय माल्या ने इन रुपयों को अपने बेटे और परिजनों के खाते में भेज दिए। ये सीधा-सीधा बैंकों के साथ दिसंबर 2010 में हुए करार का उल्लंघन था, क्योंकि डियागो द्वारा दी गई ये धनराशि ‘एसेट’ की श्रेणी में आती थी।

ऐसा व्यक्ति जब कहे कि वो फ्रॉड नहीं है तो आश्चर्य होता है। 2017 में स्विस बैंकों के दस्तावेजों की मानें तो विजय माल्या की संपत्ति $1 बिलयन डॉलर (अभी की तारीख में 8500 करोड़ रुपए) थी। सिद्धार्थ माल्या के एक खाते में भी $13.33 मिलियन डॉलर भेजे गए थे। विजय माल्या ने किंगफ़िशर एयरलाइन्स के जरिए $60 मिलियन का एक एयरक्राफ्ट ख़रीदा था। इस एयरक्राफ्ट ने को एक डूबती हुई कंपनी के राजस्व में वृद्धि के लिए ख़रीदा गया था, ऐसा समझने की भूल मत कीजिए। ये एयरक्राफ्ट विजय माल्या की लग्जरियस लाइफस्टाइल के एक उपकरण के रूप में ख़रीदा गया था। इसका इस्तेमाल उन्होंने अपने और दोस्तों के व्यक्तिगत दौरों के लिए किया। इस एयरक्राफ्ट के संचालन में 100 करोड़ रुपए का ख़र्च आया। ये पैसा लोन का था।

केवल बैंक लोन का नहीं है मामला, मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर आपराधिक षड्यंत्र तक

सीधी भाषा में समझें तो अगर आप अगर आप जानबूझकर क़ानून तोड़ते हैं तो आप अपराधी हैं, क्योंकि इंटेंट मायने रखता है। अगर उन्हें ख़ुद के निर्दोष होने का इतना ही यकीन होता तो वो बतौर राज्यसभा सांसद डिप्लोमेटिक पासपोर्ट का दुरुपयोग करके देश से भागते नहीं, बल्कि यहीं रहकर केस लड़ते और ये दस्तावेज अदालतों व जाँच एजेंसियों को दिखाते – किसी पॉडकास्टर को नहीं। अपनी कंपनी UB में भी विजय माल्या ने कम हेराफेरी नहीं की है। उन्होंने UB के 8.41% शेयर बिना बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और स्टॉक एक्सचेंज को सूचित किए ही बेच डाले। 5% से अधिक के शेयर्स ख़रीदने की स्थिति में ख़रीददार को भी स्टॉक एक्सचेंज को सूचित करना होता है।

UB का इस्तेमाल किंगफ़िशर एयरलाइन्स के लोन की गारंटी के रूप में किया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि इस कंपनी का वैल्यूएशन उस लोन से कम है। अगस्त 2012 के बाद से ही किंगफ़िशर एयरलाइन्स के कर्मचारियों को सैलरी दिया जाना बंद कर दिया गया था। इसके बावजूद फरवरी 2014 में विजय माल्या ने 28.70 करोड़ रुपए IPL के खिलाड़ियों को ख़रीदने में व्यय किए। उनकी RCB ने युवराज सिंह को 14 करोड़ रुपए में ख़रीदा था। उस सीजन RCB ने 58 करोड़ रुपए से अधिक खिलाड़ियों को ख़रीदने और रिटेन करने में व्यय किए थे। जबकि उस समय तक कर्मचारियों के वेतन का 350 करोड़ रूपए बकाया था।

कहीं विरोध प्रदर्शन किए जा रहे थे कर्मचारियों द्वारा तो कहीं कई लोग अनिश्चितकाल के लिए अनशन पर थे, लेकिन विजय माल्या गोवा में पार्टियों में मशगूल थे। तेल कंपनियों से लेकर एयरक्राफ्ट पट्टेदाताओं (Lessors) तक, सबका बकाया था – केवल बैंकों और कर्मचारियों का ही नहीं। कर्मचारियों से PF और टैक्स के पैसे भी लिए, लेकिन सरकार को नहीं दिए। बड़ी बात ये कि तब सरकार भी कॉन्ग्रेस की थी, सबकुछ कॉन्ग्रेस की सरकारों में हो रहा था। विजय माल्या ने अरुण जेटली ही नहीं, प्रणब मुखर्जी का नाम लेकर भी कहा है कि 2008 की वैश्विक मंदी में जब वो तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के पास गए थे तब उन्होंने किंगफ़िशर एयरलाइन्स में कटौती न करने को कहा था। आज प्रणब मुखर्जी भी इन आरोपों का जवाब देने के लिए जीवित नहीं हैं।

लोन चुकाने के बावजूद विजय माल्या IPC की धारा-406, 409 और 420 के तहत आरोपित रहेंगे क्योंकि उनपर फ़र्ज़ी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के भी आरोप हैं। लोन लेने के लिए पेश किए गए एक दस्तावेज में तो उन्होंने किंगफ़िशर एयरलाइन्स की वैल्यूएशन को बढ़ा-चढ़ाकर $500 मिलियन तक बता दिया था। जुलाई 2022 में विजय माल्या पर अदालत की अवमानना के मामले में 4 महीने की जेल की सज़ा सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाई जा चुकी है। सरकार पर उन्हें भरोसा नहीं है मान लिया, लेकिन न्यायपालिका?

लगभग 2000 कर्मचारियों का घर किंगफ़िशर एयरलाइन्स के तबाह होने के कारण बर्बाद हुए। उनके कारण 2018 में मोदी सरकार को फ्यूगुटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर एक्ट बनाना पड़ा। 2020 में UK की अदालत भी उनके प्रत्यर्पण का आदेश दे चुकी है, लेकिन इसके बाद विजय माल्या ने अन्य क़ानूनी तिकड़म आजमाकर इसे रोके रखा है। मामला अब सिर्फ़ रिकवरी का नहीं है – आपराधिक षडयंत्र, फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग का भी है। ED उनपर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला चल रहा है। जाँच एजेंसी ने पाया कि उन्होंने लोन के पैसों में से 3500 करोड़ रुपए कहीं और डायवर्ट किया। यानी, पैसा लिया गया किसी और नाम पर लेकिन ख़र्च किया गया कहीं और।

व्यवस्था में भी थी कमज़ोरी, जिसका विजय माल्या ने उठाया फ़ायदा

इसके अलावा उनपर 100 करोड़ रुपए के सर्विस टैक्स की चोरी का मामला भी चल रहा है। 2012-15 में उनके ख़िलाफ़ हुई शिकायत में पाया गया था कि यात्रियों से वसूलने के बावजूद उन्होंने ये पैसे सरकार को नहीं दिए। मुंबई की एक अदालत ने उनके ख़िलाफ़ इसे लेकर ग़ैर-जमानती वॉरंट भी जारी किया था। SFIO (सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टीगेशन ऑफिस) भी 2016 में 17 शिकायतों के आधार पर नोटिस जारी कर चुका है। आरोप है कि 17 कंपनियों के जरिए लोन लेकर किंगफ़िशर एयरलाइन्स को फाइनेंस किया गया।

हाँ, ये सही है कि अपराधी कई बार इतने शातिर होते हैं कि वो व्यवस्था की कमजोरी व इसमें जो छिद्र हैं उसका फ़ायदा उठाते हैं। अगर बैंक के कई अधिकारी भी इसमें शामिल हैं तो विजय माल्या ने यही किया। बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरी ज़रूर जाहिर हुई। तभी 2018 में FEO एक्ट लाया गया था। इसके तहत किसी भगोड़े पर आरोप सही साबित होने से पहले देश-विदेशी स्थित संपत्ति जब्त की जा सकती है। RBI और वित्त मंत्रालय ने कई सुधार किए। लेकिन, व्यवस्था में दोष होने का ये अर्थ नहीं होता कि उसका फ़ायदा उठाने वाला व्यक्ति विक्टिम कार्ड खेले और वो निर्दोष हो।

रोज धमाके-रेड कॉरिडोर और पत्थरबाजी, ये थी UPA शासन की पहचान: 11 सालों में साफ हुए नक्सली-आतंक का हुआ खात्मा, आंतरिक सुरक्षा पर मोदी सरकार के एक्शन से बदले हालात

आंतरिक सुरक्षा किसी भी देश स्थिरता की रीढ़ होती है। खासकर भारत जैसे देश के लिए जहाँ इतनी बड़ी आबादी में लोग रहते हैं, वहाँ आंतरिक सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने का मतलब नागरिक असुरक्षा की स्थिति पैदा करना है।

देश की अंदरूनी सुरक्षा केवल आतंकवाद और हिंसा से निपटने तक सीमित नहीं होती बल्कि यह उस राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को भी प्रभावित करती है। लेकिन 2014 से पहले तक भारत आंतरिक सुरक्षा के संकट से लगातार जूझता रहा है।

कॉन्ग्रेस के निष्क्रिय रवैये से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को मिला बल

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में वर्ष 2004-2013 के बीच भारत एक के बाद एक आतंकवादी और नक्सली हमलों की चपेट में रहा। राजनीतिक कमजोरी और नीतिगत अभाव के कारण देश की आंतरिक सुरक्षा पंगु हो चुकी थी।

इस बीच माओवादी हिंसा अपने चरण पर थी। कॉन्ग्रेस राज में 2,213 से अधिक वामपंथी उग्रवाद की घटनाएँ कॉन्ग्रेस के शासनकाल में सामने आई हैं। उस वक्त सरकार की राजनीतिक ढील और काम करने के तौर तरीके ने हालात को और खराब कर दिया।

कॉन्ग्रेस सरकार में इस्लामी कट्टरपंथियों ने उठाया सिर

देश में 2004 से 2013 के बीच देश में पाकिस्तान समर्थित संगठनों को काफी मजबूती मिली। PFI(पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया) और SIMI(स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया) जैसे संगठनों ने राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर खुलकर काम करना शुरू कर दिया।

NDA सरकार के द्वारा 2001 में SIMI पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिए जाने के बाद भी UPA शासन के दौरान प्रतिबंध प्रभावी ढंग से रूप लागू नहीं हुआ और अप्रभावी ही रहा। इसका नतीजा हुआ कि इन संगठनों ने नेपथ्य रूप से अपने जिहादी कामों को जारी रखा।

SIMI के थे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से थे संबंध

यह भी सामने आया था कि SIMI का हमास और पाकिस्तान के हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी जैसे जिहादी संगठनों के साथ संबंध है। भारत में इस संगठन द्वारा चलाए गए देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाने वाले धन का एक स्रोत हमास भी था।

यह सभी पैसे अक्सर कतर, सऊदी अरब और संयुक्त राज्य अमेरिका के माध्यम से भेजा जाता था। SIMI ने केरल, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों में अपनी पैठ जमा ली थी। कॉन्ग्रेस इससे मिलने वाले फायदे को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। नतीजतन कॉन्ग्रेस ने वह सब होने दिया जो देश की सुरक्षा के विरुद्ध था।

लगातार घाव झेलता रहा देश

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में एक के बाद एक भीषण आतंकी वारदातों का गवाह रहे देश पर अब तक उन यातनाओं के घाव मौजूद हैं। 2004-2013 के बीच भारत के कई शहरों में क्रूर आतंकी हमले किए गए। इन हमलों में सैकड़ो लोगों की जान गई और हजारों लोग घायल हुए।

इसके अलावा देश के कई राज्यों में नक्सली हमले भी बढ़ते जा रहे थे। 2010 में घटित दंतेवाड़ा नरसंहार में माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के 76 CRPF जवानों को मार डाला था। यह भारत के सबसे घातक उग्रवादी हमले में से एक था जिसमें 13 आम नागरिकों की भी जान गई थी।

साल 2013 में दरभा घाटी में भी माओवादियों ने एक राजनीतिक काफिले पर हमला कर दिया जिसमें कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ला समेत 29 लोग मारे गए। 2004 से 2013 के बीच भारत में बम धमाकों और आतंकी हमले की एक बाढ़ सी आ गई थी।

इनमें मुंबई लोकल ट्रेन धमाका(2006), जयपुर ब्लास्ट(2008), पुणे की जर्मन बेकरी ब्लास्ट (2010), हैदराबाद ब्लास्ट(2013), उत्तर प्रदेश के जौनपुर में 28 जुलाई 2005 को श्रमजीवी एक्सप्रेस में हुआ बम विस्फोट और 2005 में हुए दिल्ली बम विस्फोट शामिल हैं।

इन हमलों में सेकड़ो लोग मारे गए और इनमें आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से लेकर ISIS तक का हाथ था। देश में रेलवे स्टेशन, शॉपिंग मॉल, होटल और पार्कों समेत ऐसा कोई सार्वजनिक स्थान नहीं था जहां आतंकी हमले की आशंका ना जताई जा सके।

सुरक्षा एजेंसियों के बीच भी आपसी तालमेल का था अभाव

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में NIA और RAW जैसी महत्वपूर्ण एजेंसियां अस्तित्व में तो थी लेकिन कॉन्ग्रेस की लचर नीति और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ ने सब मटियामेट कर दिया। सभी सुरक्षा एजेंसियां एकीकृत ना होकर अलग-अलग काम करती थी।

इससे आपसी तालमेल बिठाने में बेहद कठिनाई हुई। 2013 में गृह मामलों की संसदीय स्थाई समिति की रिपोर्ट के अनुसार 26/11 के हमले के बाद स्थापित मल्टी एजेंसी सेंटर में सूचना का प्रवाह काफी खराब था। इंटेलिजेंस और सुरक्षा बल अलग-अलग अपना कार्य कर रहे थे।

इससे देश की सुरक्षा जानकारी साझा करने में अनियमितता देखने को मिली। नतीजा यह हुआ की सीमा पार से घुसपैठ आम बात हो गई। इतना ही नहीं PFI(पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया) जैसे कट्टरपंथी समूह के लोगों को पकड़े जाने के बावजूद वह दंडमुक्त होकर काम कर रहे थे। पकड़े जाने के बाद भी सजा में देरी से आतंकवादी संगठनों का हौसला और मजबूत बना रहा। कॉन्ग्रेस ने अपने सत्ता-स्वार्थ के लिए देश की आंतरिक सुरक्षा को आंतरिक अलगाववाद की भेंट चढ़ा दी।

आतंक फंडिंग भी थी चुनौती

कॉन्ग्रेस की सरकार में आतंकवादियों को विदेश से खूब पैसा आता था। FATF(Financial Action Task Force) 2010 की मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार आतंकवादियों को फंडिंग करने में कई वित्तीय संस्थान शामिल थे।

हालत ऐसी थी कि साल 2013 में 42 करोड़ से अधिक नकली नोट जब्त किए गए जो मुख्य रूप से पाकिस्तान के माध्यम से भेजे गए थे। यह सारा पैसा देश में अराजकता फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। कट्टरपंथी संगठन इन पैसों का इस्तेमाल करके देश की सुरक्षा को खासा नुकसान पहुँचा रहे थे।

2014 के बाद आंतरिक सुरक्षा में आया निर्णायक बदलाव

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद आंतरिक सुरक्षा को विशेष बल मिला। NIA(राष्ट्रीय जाँच ऐजेंसी) को 2019 में मिले संशोधित अधिकारों के बाद देश विरोधी ताकतों को निष्क्रिय करने की कवायद शुरू हो गई। NIA को यह अधिकार दिया गया कि उसे राज्य सरकार के बिना अनुमति के कार्यवाही करने का अधिकार है।

दरअसल राज्य सरकारों के साथ परस्पर तालमेल की कमी ने इन एजेंसियों को व्यावहारिक रूप से कम उपयोगी बना दिया था। लेकिन 2019 के बाद अधिकारों में किए गए बदलाव के बाद उनकी शक्तियाँ बढ़ा दी गईं। इससे आतंकवाद, मानव तस्करी और साइबर आतंकवाद पर रोक लगाना आसान हो गया।

UAPA के तहत देश विरोधी ताकतों पर आसानी से कार्रवाई करते हुए आतंकवादी घोषित करने की क्षमता आ गई। इस कानून के माध्यम से कट्टरपंथियों की संपत्ति को आसानी से जप्त करना संभव हो गया। इतना ही नहीं विदेशों से आने वाला पैसा भी आतंकी अकाओं तक नहीं पहुंचने से पहले ही जांच एजेंसियों की नजर में आ जाता था।

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद घुसपैठ में आई कमी

मोदी सरकार द्वारा 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाकर वहाँ पनप रहे अलगाववादी मानसिकता पर नकेल कसी गई। कश्मीर घाटी से पाकिस्तान के संपर्क को भी पूरी तरह खत्म कर दिया गया।

कश्मीर में स्थानीय भर्ती के माध्यम से युवाओं को पत्थरबाजी और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने से रोका गया। धारा 370 के लागू होने के बाद पहले की तुलना में आतंकवादी घटनाओं में भी कमी दर्ज की गई। इसके साथ ही राज्य में बुनियादी विकास का ढांचा तैयार किया गया। इसके अलावा‌ कश्मीर में बलिदान होने वाले हमारे सैनिकों की संख्या में भी लगभग 48% की कमी आई।

नक्सलों पर भी हुआ प्रहार

सरकार ने 2014 से लेकर अब तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों को मुक्त कराया। इससे नक्सलवादी इलाकों में दोगुना कमी आई जहां एक साल में 1000 से अधिक माओवादी घटनाएं होतीं थी वहां केवल कुछ सौ रह गई।

सरकार द्वारा अबूझमाड़ के जंगलों और कर्रगुट्टा जैसे क्षेत्रों को नक्सल मुक्त किया गया। 2024 में करीब 400 से अधिक नक्सलियों को निष्क्रिय किया गया और बड़ी मात्रा में हथियार और ड्रोन जप्त किए गए।

डिजिटल पुलिसिंग को दिया गया बढ़ावा

मोदी सरकार के द्वारा लगभग 99% पुलिस स्टेशनों को CCTNS(Crime and criminal tracking network system) से जोड़ दिया गया। इसके अलावा पुलिस, अदालत, जेल और फोरेंसिक लैब को भी आपस में जोड़ा गया।

सीमाओं पर निगरानी बढ़ा दी गई। पंजाब में ड्रोन द्वारा नशे और हथियार की तस्करी को रोकने के लिए एंटी ड्रोन तकनीक लगाई गई। नतीजतन साल 2024 में अकेले पंजाब में 250+ अधिक ड्रोन पकड़े गए।

मोदी के नेतृत्व में भारत में स्थापित किया नया कीर्तिमान

साफ जाहिर होता है कि 2014 से पूर्व की स्थिति और वर्तमान भारत की अंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में काफी अंतर है। मोदी सरकार ने इसे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से जोड़ दिया। हमारे देश की खुफिया एजेंसी का लोहा पूरी दुनिया मानने लगी।

आतंकवाद, नक्सलवाद और कट्टरपंथ जैसे खतरों से निपटने के लिए हम किसी पर आश्रित नहीं रहे। इसी का परिणाम है कि आज भारत लोकतांत्रिक मर्यादाओं में रहते हुए भी कठोर आतंकवाद विरोधी उपाय से निपटने में केवल सक्षम नहीं बल्कि अग्रणी भूमिका में है।

अमेरिका, यूरोप, भारत… घुसपैठियों को बाहर निकालना क्यों है इतना कठिन: कैसे एक्टिविस्ट-NGO बनाते हैं सुरक्षा की दीवाल, क्या है रास्ता?

भारत में वर्तमान में ऑपरेशन पुशबैक चल रहा है। इसके तहत बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का प्रयास हो रहा है। यह कार्रवाई अभी कुछ हजार लोगों तक ही सीमित है। इसी तरह अमेरिका में भी वर्तमान में घुसपैठियों को वापस भेजने की कार्रवाई चल रही है, इसको लेकर लॉस एंजिल्स शहर में दंगे हो रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति यूरोप के कई देशों में है, जहाँ से घुसपैठियों को वापस भेजे जाने की माँग हो है। 

असल में एक बार जब अवैध प्रवासी किसी देश में प्रवेश कर जाते हैं तो चाहे वह भारत हो, अमेरिका फिर या यूरोप के देश, तो उन्हें वापस भेजना कानूनी अड़चन, राजनीतिक विरोध और एक्टिविज्म का एक चक्रव्यूह बन जाता है। कायदा तो यह होना चाहिए कि किसी देश मेंअवैध रूप से रहने वालों को उठा कर सीधे वापस भेज दिया जाना चाहिए। हालाँकि, यह लंबी अदालती लड़ाइयों, एक्टिविज्म और कानूनी दाँवपेंच में बदल गया है। 

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ भारत जैसे देशों में घुसपैठियों को बाहर निकालना मुश्किल का काम है, वहीं पाकिस्तान धड़ाधड़ अफगानिस्तान के लोगों को निर्वासित कर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2025 तक, पाकिस्तान ने 800,000 से ज़्यादा अफ़गानों को बिना किसी बवाल के डिपोर्ट कर दिया है।

भारत में कोर्ट और एक्टिविस्ट लगाते हैं अड़ंगा

जनसंख्या के मामले में चीन की तुलना में भारत एक बहुत बड़ा देश नहीं है। भारत में जनसंख्या बहुत ज़्यादा है लेकिन यहाँ सांस लेने के लिए जगह हर दिन कम होती जा रही है। हमारे देश में संसाधन कम होते जा रहे हैं। चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में ज़मीन, भोजन, और रोजगार बड़ी समस्या है। 

ऐसे देश में यह बात हैरान कर देती है कि बांग्लादेश और म्यांमार (खासकर रोहिंग्या) से आए घुसपैठिए लगातार कानूनका फ़ायदा उठाते हैं। हिरासत में लिए जाने के बाद बड़ी संख्या में NGO एक्टिविस्ट, प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल जैसे तथाकथित वरिष्ठ वकील खड़े हो जाते हैं। ये लोग इन्हें बचाने को सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाते हैं। हिरासत में लिए गए कई घुसपैठिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाएँ दायर करते हैं, जिसमें उनके जीवन या स्वतंत्रता को ख़तरा बताया जाता है।

दुखद बात ये है कि हमारी न्यायपालिका इन्हें बाहर फेंके जाने से अक्सर रोक देती है। इसके चलते केंद्र और राज्य सरकारों को अवैध अप्रवासियों को बाहर नहीं निकाल पातीं। भले ही सुप्रीम कोर्ट अवैध अप्रवासियों को डिपोर्ट करने के पक्ष में हो, लेकिन घुसपैठिए अनुभवी वकीलों की मदद से दायर रिट से अंतरिम राहत पा जाते हैं।  इससे डिपोर्ट होने पर रोक लग जाती है और अदालती मामला सालों तक चलता रहता है। 

कानूनी व्यवस्था से इस तरह के प्रतिरोध के साथ, राज्य सरकारें अब इसे पूरी तरह से दरकिनार करके मामलों को तेज़ी से निपटाने की कोशिश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में विदेशी ट्रिब्यूनल को दरकिनार करने और घुसपैठियों को बांग्लादेश और म्यांमार में वापस भेजने के लिए 1950 के कानून का हवाला दिया है।  इस कदम की भी यह एक्टिविस्ट आलोचना कर रहे हैं। 

अमेरिका में नेताओं ने दी हुई शरण

अमेरिका में भी घुसपैठ का हाल कमोबेश ऐसा ही है। यह जब एक बार घुसपैठिया अंदर आ जाता है तो उसको डिपोर्ट करना भीइसी तरह एक लंबा और विवादास्पद मामला बन जाता है। अमेरिका में लॉस एंजिल्स, न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को जैसे कुछ ऐसे शहर हैं, जहाँ अधिकारियों को इन घुसपैठियों से पूछताछ करने या उन्हें हिरासत में लेने की अनुमति नहीं है। ये शहर डिपोर्ट करने के आदेशों या पुलिस के साथ सहयोग करने से साफ इनकार करते हैं, उन्हें कानून प्रवर्तन के राजनीतिक हथियार के रूप में देखते हैं।

जून 2025 की शुरुआत से लॉस एंजिल्स में इसी से जुड़ा एक नाटक चल रहा है। यहाँ घुसपैठियों पर जब एक्शन चालू हुआ तो इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और रबर की गोलियाँ चलाई। यहाँ इसके बाद यूनियन नेता डेविड ह्यूर्टा को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे आक्रोश फैल गया। इसके बाद ऑपरेशन के दौरान 118 प्रवासियों को हिरासत में लिया गया।

ट्रम्प सरकार ने इसके बाद टाइटल 10 कानून के तहत 4,000 नेशनल गार्ड सैनिकों और 700 मरीन को तैनात करके जवाब दिया। इसके बाद तो बवाल और बढ़ा। कई कारों को जला दिया गया, सड़कों को अवरुद्ध कर दिया गया, कई पत्रकारों को घायल कर दिया गया। 

इस पूरे बवाल से ट्रंप सरकार की घुसपैठियों को लेकर नीति और किसी शहर को उनके लिए स्वर्ग बनाने की राजनीति माना जा सकता है। इन सब चक्करों में डिपोर्टेशन और भी कठिन हो जाता है। 

भले ही अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सख्त सीमा प्रवर्तन और भूमि से अवैध अप्रवासियों को हटाने के लिए जोर दे रहे हैं, लेकिन कानूनी प्रणाली और कुछ विशिष्ट शहर इससे कड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। डिपोर्ट किए जाने वाले लोगों में कई सैकड़ों भारतीय भी थे जो अवैध रूप से अमेरिका में घुस आए थे।

यूरोप में कानून सबसे बड़ी अड़चन

यूरोपियन यूनियन के देशों में  घुसपैठियों को निकलने जाने में सबसे मजबूत अड़चन यहाँ के कानून हैं। मानवाधिकारों पर यूरोपीय सम्मेलन (ECHR) उन व्यक्तियों को डिपोर्ट करने पर रोक लगाता है, जिनको यातना या अमानवीय व्यवहार का जोखिम हो। 

इसके तहत यूरोपियन यूनियन के देशों को डिपोर्ट करते टाइम तमाम मानदंड पूरे पड़ते हैं, जिससे प्रक्रिया लगभग असंभव हो जाती है। हालाँकि, ये नियम स्थानीय लोगों के जीवन को नरक बना रहे हैं। यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर अपराध, स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार और डेमोग्राफी बदलाव आम हो गए हैं। 

हाल के दिनों में, इन नीतियों के खिलाफ़ विरोध हुआ है। बढ़ते दबाव के बीच, कुछ सरकारें (इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क) खुले तौर पर ECHR में सुधार करने या यहाँ तक कि इससे बाहर निकलने पर विचार कर रही हैं, इसे प्रवासन पर ‘संप्रभु नियंत्रण में बाधा’ के रूप में देख रही हैं।

क्या सहिष्णु होना बन रहा है बाधा?

जो लोकतांत्रिक देश अपने यहाँ अधिकारों, सही न्यायिक प्रक्रिया और समानता के अधिकार जैसे ढिंढोरे पीटते हैं, वहीं यह घुसपैठियों को निकालने की कार्रवाई और कठिन हो जाती है। 

यहाँ जब भी किसी घुसपैठिए को निकाला जाना होता है तो उसके समर्थक कोर्ट पहुँच याचिका ठोक देते हैं। यह संवैधानिक, अंतरराष्ट्रीय या मानवीय आधार पर लगाई जाती हैं। दुखद बात यह है कि अधिकतर फ़ैसले घुसपैठियों पक्ष में होते हैं, देश के नागरिकों के पक्ष में नहीं। 

जमीनी स्तर के NGO से लेकर नागरिक संगठनों तक के कार्यकर्ता इसके लिए जन समर्थन जुटाते हैं, कानूनी चुनौतियाँ देते हैं, विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं और मीडिया में सनसनी फैलाते हैं।

इसके बाद वामपंथी-उदारवादी मीडिया घुसपैठियों की दुख भरी कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। इस कार्रवाई से लोगों के मन में ग्लानि उत्पन्न करने का प्रयास होता है। इसके अलावा नेता भी इसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं और खुद का वोटबैंक बनाते हैं। इससे डिपोर्ट करना और भी कठिन काम हो जाता है। 

पाकिस्तान ने दिखाया- कानूनी अड़चन ना होता होता है मददगार

जब अमेरिका और NATO सेना ने अफ़गानिस्तान छोड़ा और तालिबान ने सत्ता संभाली, तो लाखों अफ़गान अवैध रूप से पाकिस्तान और दुनिया के अन्य हिस्सों में चले गए। पाकिस्तान ने जल्द ही अफ़गानों को वापस खदेड़ना शुरू कर दिया। 

2023-25 ​​के बीच, अफ़गानों को निशाना बनाकर डिपोर्ट किया गया। संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तानी स्रोतों के अनुमानों के अनुसार जनवरी 2025 तक निर्वासित लोगों की संख्या 813,300 से अधिक और जून 2025 तक लगभग दस लाख हो जाएगी। पाकिस्तान को इस काम में ना किसी कानूनी अड़चन का सामना करना पड़ा और ना ही कोई एक्टिविज्म करने आया। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान में मानवाधिकार का ना कोई मोल है और ना ही वहाँ इस पर काम करने वाले कथित एक्टिविस्ट हैं। 

सहनशील होने की अपनी कीमत

असल में, अधिकारों का आवश्यकता से अधिक सम्मान करने वाले समाज अपने ही हाथ बाँध लेते हैं। कानूनी ढांचे, कार्यकर्ता प्रतिरोध और जन भावनाएँ अवैध घुसपैठियों के इर्द-गिर्द अदृश्य दीवारें खड़ी कर देती हैं। न्याय और स्वतंत्रता के नैतिक गुण प्रशासनिक कार्रवाई को धीमा कर देते हैं। 

जहाँ एक और अधिकारों को ज्यादा देखने पर यूरोप जैसे हाल होने का खतरा है तो वहीं पाकिस्तान जैसी अमानवीय कार्रवाई भारत नहीं कर सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि घुसपैठियों को लेकर क्या किया जाना चाहिए। 

अब सवाल यह है कि कौन सा मॉडल बेहतर है? अधिकार-उन्मुख लोकतंत्र धीमे, गड़बड़ और कानूनी रूप से संघर्षशील हो सकते हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षित करते हैं। जो देश उन सुरक्षा उपायों को त्याग देते हैं, वे डिपोर्ट करने का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन कहीं ना कहीं तो हमें रेखा खींचनी होगी।

जिन महाराजा सुहेलदेव ने आक्रांता सालार मसूद को पहुँचाया ‘जहन्नुम’, उनकी 40 फीट की मूर्ति का CM योगी ने किया अनावरण: शौर्य मेले में भी लिया हिस्सा, बहराइच को दी ₹1200 करोड़+ की योजनाएँ

सीएम योगी आदित्यानाथ ने यूपी को 1243 करोड़ की 384 परियोजनाओं की सौगात दी है। 10 जून 2025 को बहराइच में आयोजित भव्य समारोह में उन्होने कई परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया।

इस मौके पर उन्होंने कहा कि भारत के मठों और मंदिरों को लूटने वाले और भारतीय संस्कृति को नेस्तनाबूद करने का मंसूबा लेकर आने वाले सैयद सालार मसूद गाजी को महाराजा सुहेलदेव ने अपनी कूटनीति और युद्धनीति का करिश्मा दिखाया और जहन्नुम में पहुँचा दिया।

बीएसपी, एसपी और कॉन्ग्रेस पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म, संस्कृति , राष्ट्र की रक्षा करने वाले महाराजा सुहेलदेव के पराक्रम को भुला कर विदेशी आक्रांताओं का महिलामंडन किया गया

उन्होंने कहा, “बहराइच का मुख्य आयोजन महाराजा सुहेलदेव जी के नाम पर होगा। बालार्क ऋषि या आदिशक्ति माँ पाटेश्वरी देवी के नाम पर होगा। महाराजा सुहेलदेव के पराक्रम को भुलाकर विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन कर हर वर्ष उनका विवाह कराते थे। ये सब मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति की वजह से हो रहा था। पीएम मोदी के नेतृत्व में जब एनडीए की सरकार बनी तो देशी रियासतों को मिलानेवाले सरदार पटेल का सम्मान किया गया। अयोध्या में राम दरबार भी सज गया और काशी, अयोध्या के बाद मथुरा में कॉरिडोर का काम शुरू हो रहा है।”

महाराजा सुहेलदेव पर शोध करने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने की योजना शुरू की गई है। मुख्यमंत्री ने महाराजा सुहेलदेव विजयोत्सव में दशकों से अपनी भूमिका निभाने वाले दिवंगत पंडित हनुमान शर्मा, पंडित गुलाब चंद शुक्ल,विहिप के पूर्व अध्यक्ष संतराम सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की।

सीएम योगी ने चित्तौरा झील के तट पर निर्मित महाराजा सुहेलदेव स्मारक का लोकार्पण किया। करीब ₹39.49 करोड़ की लागत से इसका निर्माण कराया गया है। महाराजा सुहेलदेव की 40 फीट ऊँची प्रतिमा है जिसके हाथ में भाला और कंधे पर धनुष है और वह घोड़े पर सवार हैं।

इस मौके पर 5 बच्चों का अन्नप्राशन भी कराया गया। ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा ने इस मौके पर शौर्य मेले का आयोजन किया। राजभर ने ही कार्यक्रम को आयोजित करने का ऐलान किया था।

G-7 से पहले साइप्रस जाएँगे PM मोदी, तुर्की से है 36 का आँकड़ा: ‘उम्माह’ के नाम पर पाकिस्तान को दिए थे वो ड्रोन, जो भारत पर दागे गए

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगामी दिनों में साइप्रस और क्रोएशिया के दौरे पर जाएँगे। यह दौरा उनकी कनाडा में होने वाले G7 शिखर सम्मेलन यात्रा से पहले होगा। वह कनाडा के रास्ते में ही इन दोनों देशों का दौरा करेंगे। प्रधानमंत्री का यह साइप्रस दौरा भारत का तुर्की को जवाब माना जा रहा है।

साइप्रस अगले साल (2026) यूरोपीय संघ परिषद का अध्यक्ष भी बनने वाला है, जिससे यह दौरा और भी खास हो जाता है। पीएम मोदी का यह साइप्रस दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्की ने बीते दिनों पाकिस्तान को खुला समर्थन दिया है। प्रधानमंत्री मोदी से पहले अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गाँधी ही साइप्रस का दौरा करने गए हैं।

क्यों साइप्रस जा रहे प्रधानमंत्री मोदी?

पीएम मोदी के साइप्रस दौरे के कई कारण हैं। भारत यूरोप में अपनी पहचान और रिश्ते बढ़ाना चाहता है। साइप्रस यूरोपियन यूनियन का सदस्य है। ऐसे में उसके साथ रिश्ते भारत के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा भारत तुर्की को साफ़ सन्देश देना चाहता है। तुर्की की साइप्रस से बिलकुल नहीं बनती।

इसके अलावा साइप्रस ने हमेशा कश्मीर और पाकिस्तान से होने वाले सीमा-पार आतंकवाद पर भारत का समर्थन किया है। साइप्रस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट, न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) की सदस्यता और 1998 के परमाणु परीक्षणों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी भारत का साथ दिया है।

साइप्रस ने हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा की थी और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान से होने वाले सीमा-पार आतंकवाद का मुद्दा उठाने का संकेत दिया था। साइप्रस को एक महत्वपूर्ण निवेशक के तौर पर भी देखा जा रहा है।

साइप्रस से तुर्की की है लड़ाई

तुर्की और साइप्रस के बीच कई दशकों से गहरा विवाद है। यह विवाद 1974 में और बढ़ गया, जब तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर हमला कर दिया और उस पर कब्ज़ा कर लिया। तुर्की इस हिस्से को ‘टर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस’ के रूप में मान्यता देता है। हालाँकि, इसे और किसी देश ने नहीं माना है।

इसके अलावा, पूर्वी भूमध्य सागर में गैस की खोज के अधिकारों को लेकर भी दोनों देशों में लगातार तनाव बना रहता है। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार साइप्रस समस्या के समाधान का समर्थन किया है। उसने पाकिस्तान को ड्रोन समेत तमाम हथियार दिए थे, जो भारत पर दागे गए।

तुर्की के लिए साइप्रस एक दुखती रग की तरह है, ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री का साइप्रस दौरा उसे एकदम अच्छा नहीं लगेगा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया था, और खुद तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोआन ने भी इस समर्थन को सार्वजनिक किया था।

2024-25 में मारे गए 500+ नक्सली, माओवादी पार्टी की टूटी कमर… पोलित ब्यूरो-सेंट्रल कमिटी में नहीं बचे लोग: CRPF के IG बोले- सरेंडर करो या फिर मौत ऑप्शन

कभी छत्तीसगढ़ के जंगलों से लेकर झारखंड के अलग-अलग इलाकों में नक्सली खुले तौर पर घूमा करते थे। हजारों नक्सली छत्तीसगढ़ के जंगलों में डेरा डाले रहते थे। लेकिन सुरक्षाबलों की लगातर कार्रवाई के चलते अब नक्सलियों की संख्या सिमटने लगी है।

नक्सलियों का संगठन तार-तार हो चुका है। भारत में नक्सलियों का सबसे बड़ा समूह कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) अब अंतिम दिन गिन रहा है। इसका संगठन भी टूट चुका है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि मात्र 300 नक्सली ही इस संगठन में बचे हैं।

समस्या सिर्फ लड़ने वाले नक्सलियों की ही नहीं है बल्कि नेतृत्व का क्राइसिस भी इस संगठन में है। रिपोर्ट बताती है कि अब नक्सलियों के पास नेता भी नहीं बचे हैं। जहाँ उसकी शीर्ष संस्था पोलित ब्यूरो में मात्र 4 लोग बचे हैं तो वहीं सेंट्रल कमेटी में मात्र 14 लोग ही बचे हैं।

नक्सलियों के पास नहीं बचा नेतृत्व

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2005 से अब तक (2025) पोलित ब्यूरो (PB) के 14 नक्सली या तो पकड़े गए हैं या मार दिए गए हैं। इसके चलते अब पोलित ब्यूरो में सिर्फ 4 एक्टिव मेंबर बचे हैं। पोलित ब्यूरो में अब मुप्पल्ला लक्ष्मण राव उर्फ ​​​​गणपति, मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ ​​​​अभय, थिप्पिरी तिरुपति उर्फ ​​​​देवजी और मिसिर बेसरा बचे हैं।

आशंका है कि गणपति की भी मौत हो चुकी है। हालाँकि, यह भी स्पष्ट नहीं है। वहीं, सेंट्रल कमेटी (CC) के मेंबर भी तेजी से कम हुए हैं। 2007 से अब तक 26 सेंट्रल कमिटी सदस्य गिरफ्तार किए जा चुके हैं या मार दिए गए हैं। कुछ ने आत्मसमर्पण किया है। अब CC में सिर्फ 14 एक्टिव मेंबर बचे हैं, जिसमें चार PB नेता भी शामिल हैं।

बस्तर के CRPF IG पी सुंदरराज ने बताया है कि नक्सलियों का कमांड ढाँचा अब पूरी तरह से बिखर चुका है। लगातार खुफिया जानकारी और आत्मसमर्पण से संगठन पूरी तरह से टूट गया है। IG ने कहा, “कुल 300 हथियारबंद लोग दंडकारण्य और कुछ दूसरे इलाकों में छिप कर बैठे हैं, उनके पास अब सिर्फ 2 रास्ते हैं या तो आत्मसमर्पण करें या मारे जाएँ।”

एक-एक कर मारे जा रहे नक्सली कमांडर

नक्सलियों के संगठन को कमजोर करने के लिए सुरक्षाबलों ने कई बड़े ऑपरेशन चलाए हैं। इन ऑपरेशनों में उनके कई बड़े नेता मारे गए हैं। हाल ही में बीजापुर जिले में सुरक्षाबलों ने एक बड़े ऑपरेशन में टॉप नक्सली कमांडर भास्कर को मार गिराया। भास्कर पर ₹45 लाख का इनाम था और वह इस इलाके में बचे कुछ बड़े नक्सली नेताओं में से एक था।

इससे पहले मई 2025 में नक्सलियों के सबसे बड़े नेता नंबाला केशव राव उर्फ ​​बसवराजू को सुरक्षाबलों ने मार गिराया था। 30 साल से भी ज़्यादा समय में यह पहली बार हुआ है जब नक्सलियों का इतना बड़ा नेता मारा गया है। यह ऑपरेशन छत्तीसगढ़ पुलिस की स्पेशल यूनिट DRG ने किया था।

इसके अलावा, 6 जून 2025 को इसी जिले में एक और सीनियर नक्सली नेता नरसिम्हा चालम उर्फ सुधाकर को भी मार गिराया। सुधाकर पर 40 लाख का इनाम था और वह बसवराजू के बाद आंदोलन का एक अहम नेता माना जाता था। वह पहले आयुर्वेद का छात्र था और बाद में नक्सलियों में शामिल हो गया था।

2024-25 में टूटी कमर

नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई में वर्ष 2024 के बाद तेजी आई है। लगातार CRPF, पुलिस और DRG बड़े ऑपरेशन कर नक्सलियों का सफाया कर रही है। कई ऑपरेशन में 30 से अधिक नक्सली मारे गए हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया था। इस दौरान 1,090 को गिरफ्तार किया गया था। वहीं 881 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया था। यह कार्रवाई 2025 में दोगुनी तेजी पकड़ चुकी है।

वर्ष 2025 में 226 नक्सली मार गिराए जा चुके हैं। इसके अलावा 418 को गिरफ्तार भी किया गया है। मारे जाने के डर से 896 ने आत्मसमर्पण कर दिया है। कर्रेगुट्टा पहाड़ जैसे नक्सलियों के गढ़ भी अब खाली करवा लिए गए हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया है कि भारत को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त किया जाएगा। उन्होंने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त करने की डेडलाइन रखी है। नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने का मौका भी दिया जा रहा है, लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें सुरक्षाबलों की गोली का सामना करना पड़ेगा।

मदरसे से निकले, अब ‘दीन’ बचाने के नाम पर ‘हैदरी दल’ के गुंडे मुस्लिम लड़कियों को कर रहे परेशान: जानिए कौन था वो हैदर, जिसके नाम पर चल रहा ये ‘तालिबान’ स्टाइल गिरोह

यूपी के बरेली में हैदरी दल एक ऐसा ग्रुप है जो गैर मुस्लिम लड़कों और मुस्लिम लड़कियों के ‘रिश्ते’ पर गिद्ध नजर रखता है। हाल के वर्षों में मुस्लिम युवकों द्वारा मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिम पुरुषों को एक साथ देखकर परेशान करने की घटनाएँ बढ़ी हैं।

हैदरी दल नाम का ये ग्रुप अगर बुर्काधारी महिलाओं को गैर-मुस्लिम लड़कों के साथ देखते हैं, तो उन्हें धमकाया जाता है। इस्लाम की रक्षा और ‘बुर्का’ की पवित्रता के नाम पर ऐसे जोड़ों को हर तरह से परेशान किया जाता है।

हैदरी दल से जुड़े मुस्लिम लड़के हिंदू या गैर-मुस्लिम लड़कों के साथ घूमनेवाली मुस्लिम लड़कियों को परेशान करने के लिए वीडियो बनाते हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर भी डालते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ मुस्लिम युवक आते हैं और बुर्का पहनी लड़कियों से सवाल करते हैं। लड़कियों का नाम, पता, माता-पिता का नाम और अन्य पहचान भी उजागर कर दिया जाता है।

ऐसा ही एक वीडियो में हैदरी दल के कुछ लोग कह रहे हैं कि घर पर कोई नहीं है तो अय्याशी करोगी, मेरी बहन बात सुनो कहते हुए लड़की के साथ बदसलूकी कर रहा है। बरेली के गाँधी उद्यान का एक दूसरा वीडियो सामने आया है जिसमें एक मुस्लिम युवक कहता है कि ” बहन सुनो, तुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ रहती हो? तुम्हारे पिता और भाई का नाम क्या है? क्या तुम्हारे घर पर कोई नहीं है? इतना ही नहीं वो व्यक्ति महिला के साथ मौजूद लड़के की भी सारी जानकारी लेता है।

हिन्दू संगठनों ने इस मुद्दे पर अपना विरोध जताया है। संगठन के नेता हिमांशु पटेल ने सोशल मीडिया एक्स पर शिकायत की थी। इस मुद्दे पर कोतवाली इंस्पेक्टर नितिन राणा ने हैदरी दल के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इसमें कई लोगों की पहचान की गई है। इसमें से अधिकतर युवक कस्बों और गाँवों के रहनेवाले हैं। उनमें से ज्यादातर मदरसों में शिक्षा ली है और शहर की मस्जिदों में मौलाना के रूप में रहते हैं

भगवा लव ट्रैप की विवादित और मनगढंत थ्योरी

‘भगवा लव ट्रैप’ हिंदू संगठनों पर लगाया गया एक निराधार थ्योरी है। इसमें कथित तौर पर हिंदू युवाओं को मुस्लिम महिलाओं को लुभाने, फँसाने और उन्हें गैर-मुस्लिम बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। सज्जाद नोमानी नाम के एक मौलवी ने 2021 से इसका दावा किया था।

‘भगवा लव ट्रैप’ सोशल मीडिया हैशटैग का रूप ले लिया है। इसका इस्तेमाल हिजाब पहने मुस्लिम महिलाओं और उनके पुरुष हिंदू मित्रों के वीडियो शेयर करने के लिए कट्टरपंथियों द्वारा किया जा रहा है। पोस्ट अक्सर भावनात्मक संदेशों के साथ होते हैं और जोड़ों की पहचान करने में जनता की मदद माँगते हैं। सोशल मीडिया पर हिंदू-मुस्लिम जोड़ों पर जानलेवा हमला करने वाले इस्लामी भीड़ के वीडियो की भरमार हो गई।

हिंदू लड़कों पर हमला और यहां तक ​​कि मुस्लिम महिलाओं से छेड़छाड़ भी होती है। ऐसे जोड़ों को सड़कों, रेस्तरां, खाने-पीने की जगहों और यहां तक ​​कि होटलों में भी निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब मुस्लिम हैदर ग्रुप ने हिन्दू लड़कों और मुस्लिम लड़कियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। इस्लामिक कट्टरपंथियों ने मुस्लिम महिलाओं के हिजाब या नकाब जबरन उतार दिए और पीड़ितों का वीडियो बनाया।

उनके वीडियो को इस्लामी धार्मिक संगीत और हैशटैग #BhagwaLoveTrap के साथ प्रसारित किया, यह सब ‘दीन’ (इस्लाम) को बचाने के नाम पर किया गया। वे मुस्लिम महिलाओं की निजी जानकारी सोशल मीडिया पर साझा करते हैं और कहते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को उनके क्षेत्रों में हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम पुरुषों से बातचीत करने से रोकें।

दिलचस्प बात यह है कि जो लोग अक्सर ‘लव जिहाद’ को नकारते हैं, जिसमें मुस्लिम पुरुष हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम महिलाओं को अपने प्रेम जाल में फँसाते हैं, उनका यौन शोषण करते हैं और उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करते हैं। वे ही लोग हैं जो किसी मुस्लिम लड़की को हिंदू या किसी गैर-मुस्लिम युवक के साथ देखते ही ‘भगवा प्रेम जाल’ का नारा लगाते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में, ऑपइंडिया ने अनगिनत मामलों की रिपोर्ट की है जिसमें मुस्लिम युवक या तो व्यक्तिगत रूप से या ग्रूमिंग गिरोह के हिस्से के रूप में हिंदू लड़कियों को यौन शोषण करने और उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए मजबूर करने के लिए निशाना बना रहे हैं। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जबकि भारतीय इस्लामवादी और उनके वामपंथी-उदारवादी चीयरलीडर्स लव जिहाद/ग्रूमिंग जिहाद को ‘धोखा’, ‘हिंदुत्व षड्यंत्र सिद्धांत’ और न जाने क्या-क्या कहकर आसानी से खारिज कर देते हैं।

सोशल मीडिया पर हैदरी दल के ‘सदस्यों’ ने ऐसे कई वीडियो अपलोड किए हैं, जिनमें वे हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों की शादी मुस्लिम युवकों से करवा रहे हैं। वहीं मुस्लिम लड़कियों द्वारा हिंदू पुरुषों के साथ डेट करने या उनके साथ घूमने-फिरने पर ‘भगवा लव ट्रैप’ का आरोप लगाते हैं। इस्लामवादियों के लिए महिलाएँ अपने धार्मिक वर्चस्व को स्थापित करने का एक वस्तु मात्र हैं।

उनके लिए हिंदू महिलाओं को फँसाना और उन्हें इस्लाम में परिवर्तित करना काफिरों पर ‘धार्मिक जीत’ की तौर पर देखा जाता है। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम महिलाओं का हिंदू पुरुषों से शादी करना या उनके साथ डेटिंग करना इस्लाम का अपमान है और किसी हार से कम नहीं है।

यह विकृत मानसिकता इस्लामवादियों को गैर-मुस्लिम महिलाओं को फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रेरित करती है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि मुस्लिम लड़कियाँ हिंदू पुरुषों से बातचीत भी न करें, डेटिंग या उनसे शादी करना तो दूर की बात है।

जिहादी मानसिकता और षड्यंत्र के सिद्धांतों से प्रेरित उनकी अवैध हरकतें व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरे में डालती हैं और मुस्लिम महिलाओं और उनके हिंदू दोस्तों या भागीदारों की सुरक्षा को खतरे में डालती हैं और साथ ही सांप्रदायिक सद्भाव के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करती हैं।

हैदरी दल का नेतृत्व कौन करता है? ये सामने नहीं आया है। लेकिन अब उत्तर भारत के कई शहरों में इसने अपना जाल बिछा दिया है। हालाँकि बरेली पुलिस ने हैदरी दल (बरेली) की गतिविधियों की जाँच शुरू कर दी है। इससे कुछ राज खुलने के आसार हैं।

हैदरी दल बुर्का पहने मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिम पुरुषों को परेशान करने वाला एक समूह है जो देश के कई शहरों में काम कर रहा है। ये दल मुस्लिम पुरुषों का एक अनौपचारिक इस्लामी निगरानी समूह है। ये मुस्लिम महिलाओं और गैर-मुस्लिम पुरुषों से जुड़े अंतर-धार्मिक जोड़ों के खिलाफ हिंसा पर आमादा है।

हैदरी दल के कई शहरवार पेज भी मिले, जिनमें ‘हैदरी दल पीलीभीत’ भी शामिल है। ये पेज इस्लामवादी प्रचार करते हैं और हिंदू पुरुषों को बदनाम करने और मुस्लिम लड़कियों को निशाना बनाने के लिए भगवा लव ट्रैप के झूठ को परोसते हैं। इसी तरह की नफरत भरी सामग्री ‘हैदरी दल मुंबई’ नाम के इंस्टाग्राम पेज पर भी मिली।

हालाँकि ये तय नहीं है कि ये पेज मिले हुए हैं या नहीं। इसके प्रशासक मूलतः हैदरी दल के सदस्य हैं, लेकिन इनके पोस्ट मुख्यतः हिंदू विरोधी विषयों पर केंद्रित हैं तथा इनमें भगवा प्रेम जाल षड्यंत्र सिद्धांत को बढ़ावा देने वाली सामग्री भरी पड़ी है।
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हैदरी दल के कई ‘फैन पेज’ हैं, जो लगातार बुर्का पहनी मुस्लिम महिलाओं और उनके हिंदू दोस्तों या बॉयफ्रेंड के वीडियो पोस्ट करते रहते हैं। हैदरी दल के नाम से बने ऐसे कई पेज कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बेखौफ सक्रिय हैं और ऐसे जोड़ों का जीवन खतरे में डाल रहे हैं।

कौन चला रहा है हैदरी दल और किसने नाम पर पड़ा इसका नाम?

हालाँकि, हैदरी दल की उत्पत्ति के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। लेकिन ऐसा कहा जाता है कि इस समूह का नाम ‘अली इब्न अबी तालिब’ के नाम पर रखा गया है। अली इब्र को ही इमाम अली और हैदर भी कहा जाता है, जो पैगंबर मुहम्मद के चचेरे भाई और दामाद थे। इमाम अली को 629 ई. में खैबर की लड़ाई में खैबर के यहूदी कबीलों के खिलाफ मुस्लिम सेना को जीत दिलाने में उनकी भूमिका के लिए याद किया जाता है।

इस्लामी ग्रंथों में महिमामंडित उल्लेखों के अलावा, इमाम अली को समर्पित कई लोकगीत और कविताएँ भी हैं जहाँ हैदर का जिक्र है। ऐसा ही एक लोकप्रिय गीत है ‘हैदर की तलवार’ जो काफ़िरों (गैर-मुसलमानों) को मारने के लिए इमाम अली का महिमामंडन करता है और जिसके बोल हैं ‘इलाका हिल रहा था वेहदत के नारों से, ज़रा सी देर में मैदान भरा था काफ़िर की लाशों से, जब चली हैदर की तलवार।’

इस्लामवादी निगरानी समूह का नाम हैदरी दल रखने से पता चलता है कि जिस तरह हैदर ने काफिरों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, उसी तरह ये इस्लामी कट्टरपंथी ‘भगवा प्रेम जाल’ के झूठ को फैला कर इस्लाम के नाम पर गैर-मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे।

बिहार के सरकारी स्कूल में 4 महीने से चल रहा था फर्जी थाना, 300 लोगों से बहाली के नाम पर नकली थानेदार ने ठग लिए ₹50 लाख: पोल खुलने पर हुआ फरार

बिहार के पूर्णिया में एक ठग ने खुद को थानेदार बताकर कई लोगों को ग्राम रक्षा दल और होमगार्ड में नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपए की ठगी की है। कस्बा थाना इलाके के मोहिनी पंचायत के बतौना गाँव में राहुल कुमार साह नाम के शख्स ने बाकायदा एक फर्जी कैंप खोल रखा था, जहाँ वह पुलिस की वर्दी पहनकर बैठता था और लोगों को झांसा देता था।

कैसे दिया झाँसा?

जानकारी के मुताबिक, फर्जी थानेदार राहुल NCC का कोर कैडर था और उसके गिरोह में ज्यादातर एनसीसी कैंडेट थे। राहुल साह ने लोगों को विश्वास दिलाने के लिए हर हथकंडा अपनाया। राहुल ने सरकारी स्कूल में ‘बिहार राज्य दलपति एवं ग्राम रक्षा दल महासंघ’ का फर्जी कार्यालय खोला।

लोगों को 10,000 से 15,000 रुपए तक लेकर नौकरी दिलाने का वादा किया, फर्जी नियुक्ति पत्र बांटे, वर्दी सिलवाई, आई-कार्ड भी बनवाए, और तो और कुछ लोगों से मेला और अन्य जगहों पर ड्यूटी भी करवाई।

लोगों को इस बात का जरा भी शक नहीं हुआ, क्योंकि राहुल पुलिस की वर्दी में रहता था और असली पुलिसवालों के साथ फेसबुक पर तस्वीरें भी डालता था। उसने मोहिनी पंचायत के मुखिया से अपने फर्जी कैंप का उद्घाटन भी करवा लिया था।

करीब 2 महीने तक नौकरी करने के बाद जब लोगों को वेतन नहीं मिला, तो उन्हें शक हुआ। सच्चाई सामने आने पर पता चला कि वे ठगी का शिकार हो गए हैं। इसके बाद भारी तादाद में पीड़ित राहुल साह के घर पहुँच गए और हंगामा करने लगे।

पुलिस की कार्रवाई

पीड़ितों ने कस्बा थाने में राहुल कुमार साह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। थाना प्रभारी ने बताया कि प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है, लेकिन आरोपित राहुल साह फिलहाल फरार है। पुलिस ने बताया कि राहुल ने 300 लोगों से 50 लाख की ठगी की है। राहुल युवाओं को पुलिस की वर्दी, लाठी और फर्जी पहचान पत्र देकर वाहन जाँच और शराब तस्करों से अवैध वसूली करवाई थी।

जानकारी के अनुसार राहुल ने युवाओं से 400 रुपये तक के चालान कटवाए, जिसमें से आधा कमीशन के रूप में दिया जाता था। राहुल शराब तस्करों से रिश्वत भी लेता था। फिलहाल पुलिस आरोपित की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी कर रही है और उसके परिजनों ने जल्द सरेंडर करवाने का आश्वासन दिया है।

चीन की जिस लैब से निकला कोरोना, वहीं की रिसर्चर अमेरिका लेकर पहुँची पैरासाइट… FBI ने किया गिरफ्तार: मिले राउंडवर्म से भरे पैकेट, पहले भी जहरीले बीज सहित पकड़े गए थे दो चाइनीज

अमेरिका में जैविक सामग्री की तस्करी में एक और चीनी नागरिक गिरफ्तार किया गया है। चेंगक्सुआन हान नाम का ये छात्र वुहान के HUST के पीएचडी कर रहा है। वुहान वो जगह है जहाँ की लैब से कोरोना वायरस के उत्पन्न होने और दुनियाभर में फैलने की आशंका जताई जाती है। हालाँकि चीन हमेशा से वुहान लैब से कोरोना वायरस के लीक होने की थ्योरी को नकारता रहा है। दावा तो यहाँ तक किया जाता है कि कोरोना वायरस न केवल चीन की लैब से लीक हुआ बल्कि शायद चीन ने जानबूझकर जैव हथियार की तरह इसका इस्तेमाल किया।

अब एक और चीनी नागरिक की गिरफ्तारी से इस आशंका को बल मिलता है। चीनी शोधकर्ता परजीवी राउडवॉम की चार पैकेट की तस्करी कर अमेरिका लेकर आया था। इससे पहले पिछले हफ्ते मिशिगन विश्वविद्यालय की ही शोधकर्ता युनकिंग जियान और उनके बॉयफ्रेंड ज़ुनयोंग लियू पर अमेरिका में एक खतरनाक फसल को नष्ट करने वाले फंगस की तस्करी करने का आरोप लगा था। इसको FBI ने “अमेरिका की खाद्य आपूर्ति पर हमला” बताया था।

शिकायत के अनुसार, हान चीन का नागरिक है जो वर्तमान में वुहान, पीआरसी में हुआजोंग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (HUST) में कॉलेज ऑफ लाइफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से पीएचडी कर रहा है। 2024 और 2025 में हान ने जैविक पदार्थों परजीवी राउंडवॉम वाले चार पैकेज चीन से संयुक्त राज्य अमेरिका को भेजे। ये पैकेज मिशिगन विश्वविद्यालय में एक प्रयोगशाला से जुड़े व्यक्तियों के नाम पर थे। 8 जून, 2025 को, हान जे1 वीजा पर डेट्रॉइट मेट्रोपॉलिटन एयरपोर्ट पहुंचा। सुरक्षा अधिकारियों ने हान से जब पूछा तो हान ने पैकेजों और जैविक सामग्रियों के बारे में गलत बयान दिए।

एफबीआई काश पटेल ने सोशल मीडिया एक्स पर चीनी नागरिक की गिरफ्तारी को शेयर करते हुए कहा है कि चीन लगातार अमेरिका के खिलाफ साजिश कर रहा है। उन्होने कहा, “चीनी पीएचडी स्टूडेंट चेंगक्सुआन हान को जैविक सामग्री की तस्करी के आरोप में डेट्रॉयट में गिरफ्तार किया गया है। उसे परजीवी राउंडवॉम से जुड़ी गलत जानकारी पुलिस को देने का आरोप है।”

वुहान में हुआजोंग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ता चेंगक्सुआन हान को 8 जून को डेट्रोइट मेट्रोपॉलिटन एयरपोर्ट पर पहुंचने पर FBI ने हिरासत में ले लिया। हान पर अमेरिका में जैविक सामग्री की तस्करी करने और झूठे बयान देने के आरोप हैं। अमेरिका में ये दोनों ही गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं।

हान चीन से जुड़ा तीसरा व्यक्ति है जिसपर हाल के दिनों में इसी तरह के आरोप लगे हैं। हान पर आरोप है कि उसने चीन से अमेरिका को चार पैकेज भेजे थे, जिनमें परजीवी राउंडवॉम से संबंधित जैविक पदार्थ थे। ये मिशिगन विश्वविद्यालय की एक प्रयोगशाला से संबोधित थे।

हान पर झूठ बोलने और प्रवेश से पहले डिवाइस मिटाने का आरोप

डेट्रॉयट में उतरने पर हान ने पैकेजों के बारे में जानकारी से इनकार कर दिया था यहाँ तक कि उसके अंदर क्या है? ये भी नहीं बताया था। एफबीआई ने यह भी खुलासा किया कि हान ने डेट्रॉयट आने से पहले अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से डेटा मिटा दिया था। हान के इस कदम को जाँच में बाधा पहुँचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

एफबीआई हेड काश पटेल के मुताबिक, “8 जून को हान ने डेट्रोइट मेट्रोपॉलिटन एयरपोर्ट पर अमेरिकी अधिकारियों को उन पैकेजों के बारे में गलत बयान दिए, जिन्हें उसने पहले मेल किया था और कुछ दिन पहले ही उसने अपना इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मिटा दिया था। FBI और ICE HSI एजेंटों का कहना है कि हान पैकेज भेजने और उनकी सामग्री के बारे में झूठ बोलने की बात स्वीकार की। एफबीआई के मुताबिक अमेरिका के शोध संस्थानों को कमजोर करने में चीन लगा हुआ है।”