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बांग्लादेश भागने वाला था ‘जिहाद का इंजीनियर’ हुमायूँ कबीर, अम्मी-अब्बू को चाकुओं से गोदा, फिर मदरसे में किया अटैक: बंगाल पुलिस से बचाना चाहती थी इस्लामी भीड़

बंगाल में अपने अम्मी-अब्बू की चाकू से बेहरमी से हत्या करने वाले हूमायूँ कबीर को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। अपनी जिहादी सोच की वजह से उसने न सिर्फ अम्मी-अब्बू का मर्डर किया बल्कि मदरसा के 4 आलिमों को मारने की कोशिश की।

वह बांग्लादेश भागना चाहता था लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को शक है कि वो कई विदेशी कट्टरपंथी संगठनों के संपर्क में था।

जाधवपुर यूनिवर्सिटी से इंजीनियर की डिग्री लेने वाला हुमायूँ कबीर ने बुधवार (28 मई 2025) को अपने अब्बू मुसफतिजुर रहमान और अम्मी मुमताज परवीन की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी, क्योंकि वे उसे जिहादी मानसिकता से अलग होने और सामान्य जीवन जीने के लिए समझाया करते थे। घटना वाले दिन भी अम्मी-अब्बू ने उसे समझाने की कोशिश की थी।

जिहादी सोच की वजह से बीवी ने छोड़ा साथ

कबीर का पिछले साल तलाक हुआ था। पड़ोसियों के मुताबिक कबीर की जिहादी सोच की वजह से ही बीवी ने उसे तलाक दे दिया। बीवी पढ़ी-लिखी थी और उसे जिहादी सोच से बाहर निकलने के लिए कहती थी। बीवी के अम्मी-अब्बू दुबई में रहते हैं। जब कबीर ने जिहादी मानसिकता नहीं छोड़ा तो बीवी उसे छोड़कर दुबई चली गई। इसके बाद वह और भी जिद्दी और गुस्सैल हो गया।

कबीर नोएडा में काम करता था, लेकिन 5 महीने पहले उसकी नौकरी चली गई और वह वापस कोलकाता चला गया। वह अक्सर लैपटॉप और मोबाइल पर जेहादी कंटेंट देखता था। 2012 में यूनिवर्सिटी से पास आउट हुमायूँ पर जिहादी साहित्य का काफी असर पड़ा।

अम्मी-अब्बू ने की थी समझाने की कोशिश

मेमारी में घर पर अम्मी-अब्बू की हत्या से पहले भी उसकी बहस उनसे हुई थी। बहस के बाद अम्मी-अब्बू ने हावड़ा में स्कूल टीचर बेटी तमन्ना रहमान से बात की और भाई को समझाने को कहा था।
यहाँ तक कि अम्मी-अब्बू ने पड़ोसियों को भी बेटे को समझाने के लिए कहा था, लेकिन किसी की नहीं चली।

सवाल नहीं देने पर की आलिमों पर हमला

पुलिस के मुताबिक उसने मदरसे के आलिमों पर ‘जवाब नहीं देने पर’ हमला किया था। आलिमों ने इस्लाम और जिहाद से संबंधित उसके सवालों का जवाब देने से मना कर दिया था। हुमायूँ बांग्लादेश भागना चाहता था इसलिए सीमा से सटे क्षेत्र बनगाँव के मदरसे में पहुँचा था। पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुँची तो मुस्लिम भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। भीड़ हुमायूँ को छुड़वाना चाहती थी।

11वीं शताब्दी का है वह शिव मंदिर, जिसको लेकर 63 साल से थाईलैंड और कंबोडिया में चल रहा विवाद: जानिए क्या हैं कारण, 1 सैनिक की मौत से फिर चर्चा में UNESCO का धरोहर

थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा के क्षेत्रों को लेकर हाल ही में एक विवाद खड़ा हो गया है। इस एक क्षेत्र पर दोनों देश अपना दावा करते हैं। सांस्कृतिक रूप से दोनों ही देशों के लिए ये जगह काफी अहम है। यहां 900 साल पुराना एक प्राचीन हिंदू मंदिर स्थित है, जिसमें एक शिवलिंग स्थापित हैं। यह मंदिर प्रीह विहियर प्रांत में स्थित है।

दोनों देशों के बीच लंबे समय से बढ़ते तनाव के बीच 28 मई 2025 की सुबह कंबोडियाई और थाईलैंड के सैनिकों के बीच गोलीबारी हुई। मोराकोट कम्यून के चोम क्सान जिले में स्थित टेक्चो मोराकोट गाँव में हुई इस झड़प में एक कंबोडियाई सैनिक की मौत हो गई।

कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि ये उकसाने वाला हमला नहीं था। मंत्रालय के अनुसार, थाईलैंड के सैनिकों ने उस जगह पर हमला किया, जहाँ पर कंबोडियाई सेना का अधिग्रहण लंबे समय से था। वहीं, रॉयल थाई आर्मी ने अपने बयान में कहा कि गोलीबारी की शुरुआत कंबोडियाई सैनिकों ने की थी और उन्होंने जवाबी कार्रवाई की।

थाईलैंड के रक्षा मंत्री फुमथाम वेचयाचाई ने कहा, “मुझे बताया गया है कि जवाबी गोलीबारी हमारी आत्मरक्षा और थाईलैंड की संप्रभुता की रक्षा के लिए जरूरी थी। मैंने सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। हालाँकि युद्धविराम (सीजफायर) लागू है, फिर भी दोनों पक्ष अब भी आमने-सामने हैं।”

थाईलैंड ने इस पर दावा किया कि उनकी सेना पर तब हमला किया गया जब वे कंबोडियाई सैनिकों को विवादित क्षेत्र में पोस्ट न बनाने को लेकर समझा रहे थे। थाई सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल विंथाई सुवारी ने कहा, “कंबोडियाई सेना ने स्थिति को गलत समझा और हथियार चलाने लगे। इसके बाद थाई सेना ने जवाबी कार्रवाई की।”

कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा, “कंबोडिया इस तरह का संघर्ष नहीं चाहता है। हम थाई रक्षा मंत्रालय के साथ बातचीत जारी रखेंगे ताकि एक आपसी समाधान निकाला जा सके ताकि स्थिति जल्द से जल्द सामान्य हो और इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।”

कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेट ने 29 मई 2025 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि वह कंबोडियाई और थाई सेना के बीच युद्ध नहीं चाहते। उन्होंने एक लिखित बयान में कहा कि लोगों को “किसी भी अप्रमाणित सूचना से घबराना नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा, “इसी कारण, मुझे उम्मीद है कि कंबोडियाई और थाई सेना के कमांडरों के बीच आगामी बैठक सकारात्मक परिणाम लाएगी ताकि स्थिरता बनी रहे और दोनों देशों के बीच सैन्य बातचीत पहले की तरह ही बेहतर हो।”

उन्होंने यह भी कहा, “हालाँकि मैं जापान में हूं, फिर भी सैनिकों की तैनाती जैसे प्रमुख सैन्य अभियानों की पूरी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के तौर पर मेरे पास है।”

यह संघर्ष लगभग 10 मिनट तक चला, जब तक स्थानीय कमांडरों ने एक-दूसरे से बातचीत कर सीजफायर का आदेश नहीं दिया। इसके बाद, दक्षिण-पूर्व एशियाई पड़ोसी देशों ने क्षेत्र से सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला लिया।

अगले दो सप्ताह में एक संयुक्त सीमा समिति (ज्वाइंट बाउंड्री कमेटी) का गठन किया जाएगा ताकि “सीमा विवाद की समस्या का हल निकाला जा सके।” रॉयल कंबोडियन आर्मी के अनुसार, कमांडरों ने ‘विवाद को हल करने के लिए मौजूदा तंत्र का इस्तेमाल करने’ पर सहमति व्यक्त की, हालाँकि कंबोडिया ने अपने सैनिकों को संघर्ष क्षेत्र से वापस नहीं लेने की बात भी जोड़ी है।

थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद

थाईलैंड और कंबोडिया के बीच 800 किलोमीटर यानी लगभग 500 मील से अधिक की लंबी सीमा है। इसे मुख्य रूप से फ्रांसीसी उपनिवेशवाद के दौरान बनाया गया था। यह सीमा लंबे समय से विवादों में रही है और दोनों देशों की सेनाओं के बीच कई सशस्त्र संघर्ष हुए हैं।

2008 में इस ऐतिहासिक मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता मिलने के बाद भी सीमा पर संघर्ष हुआ था। 2011 में एक बार फिर सीमा पर संघर्ष हुआ था, जिसमें मंदिर के पास कई लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हो गए। वर्षों से जारी हिंसा के कारण अब तक कम से कम 28 लोगों की मौत हो चुकी है।

हाल में हुआ तनाव फरवरी में शुरू हुआ जब कंबोडियाई सैनिकों और उनके परिवारों ने अपने देश का राष्ट्रगान प्रसात ता मोआन थॉम मंदिर के अंदर गाना शुरू कर दिया। वहाँ तैनात थाई सैनिकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।

पूरी घटना का वीडियो एक थाई नागरिक ने रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर डाल दिया। कुछ ही समय में यह वीडियो वायरल हो गई।

वैसे तो कंबोडिया की प्राथमिकता शांतिपूर्ण तरीके से हल निकालना है फिर भी प्रधानमंत्री हुन मानेट ने मार्च में चेतावनी दी थी कि अगर थाई सैनिक कंबोडियाई संप्रभुता का उल्लंघन करते हैं तो देश अपने सैन्य बल का उपयोग करने के लिए तैयार रहेगा।

मई में हुई एक बैठक के बाद थाईलैंड और कंबोडिया के सैन्य प्रतिनिधियों ने ये फैसला लिया कि वे अपने सैनिकों को मौजूदा स्थानों पर ही रखेंगे और भविष्य के संघर्षों को कम करने के लिए मंदिर स्थल के आसपास दोनों देशों से पाँच-पाँच सैनिक ही तैनात रहेंगे।

11वीं सदी का प्राचीन मंदिर

कंबोडिया में स्थित प्रीह विहयर आधुनिक दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से कहीं आगे हैं। इस मंदिर के अधिकांश संरक्षित भाग ख्मेर साम्राज्य के स्वर्ण युग, 11वीं और 12वीं शताब्दी के समय के हैं। आधुनिक कंबोडियाई खुद को ख्मेर कहते हैं, वे सीधे ख्मेर लोगों के वंशज हैं। ख्मेर साम्राज्य ने 9वीं से 15वीं शताब्दी तक दक्षिण-पूर्व एशिया पर शासन किया था, जिसमें वर्तमान थाईलैंड भी शामिल था। इस थाईलैंड को पहले सियाम कहा जाता था। इसी साम्राज्य ने प्रसिद्ध अंकोर वाट परिसर का भी निर्माण किया था।

ख्मेर मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए मशहूर हैं। ख्मेर राजाओं का प्रमुख धर्म हिंदू धर्म था। इसका प्रभाव इन मंदिरों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके अलावा, इन मंदिरों में बौद्ध धर्म के तत्व भी शामिल हैं, जो बाद में यहाँ पर लोकप्रिय हुए।

प्रीह विहियर ख्मेर विरासत का हिस्सा होने के बावजूद हमेशा से कंबोडिया के शासन में नहीं रहा। सियामी साम्राज्यों और आधुनिक थाई राज्यों ने समय समय पर उस जगह पर अपना आधिपत्य जमाया जहाँ पर वर्तमान में ये स्थित है।

‘प्रसात ता मोआन थॉम’ या ‘ता मोआन’ भी थाईलैंड के सुरिन प्रांत और कंबोडिया के ओडर मीन्चे प्रांत को बाँटने वाली सीमा पर स्थित है। इस पर भी विवाद चल रहा है। डांगरेक पर्वत श्रृंखला में स्थित होने के कारण दोनों देशों के बीच अक्सर तनाव देखने को मिलता रहता है।

यह मंदिर एक हिंदू तीर्थस्थल के रूप में बनाया गया था और भगवान शिव को समर्पित है। इसके आसपास बने अन्य दो मंदिरों, प्रसात ता मुएन और प्रसात ता मुएन टोट से ये काफी पुराना है। इसकी धार्मिक महत्ता इस बात से ही सिद्ध हो जाती है कि इसके गर्भ गृह में एक प्राकृतिक शिवलिंग मिला था।

यह हिंदू मंदिर अपने आसपास स्थित तीन मंदिरों में सबसे बड़ा है। यह डांगरेक पर्वत श्रृंखला के एक मार्ग पर स्थित है, जो कंबोडियाई मैदानों को थाईलैंड के खोराट पठार से अलग करता है। आयताकार में बने इस मंदिर में मुख्य रूप से लेटराइट (एक कठोर लाल मिट्टी) का उपयोग किया गया है। इसके कुछ हिस्से बलुआ पत्थर के भी हैं।

एक दिलचस्प बात ये है कि अधिकांश ख्मेर मंदिरों का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर होता है, लेकिन इस मंदिर का प्रवेश द्वार दक्षिण दिशा में है। यह मंदिर ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहाँ थाईलैंड और कंबोडिया की सीमा अब तक स्पष्ट नहीं है। इसके कारण दोनों देश इस पर अपना दावा करते है। इसीलिए यहाँ अक्सर सेनाओं के बीच छिटपुट हिंसा देखी जाती रही है।

ऐतिहासिक विवाद

थाईलैंड ने जापान के साथ सैन्य गठबंधन के तहत 1941 में प्रीह विहियर और आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। 1953 में फ्रांसीसी औपनिवेशिक सेना की हार के बाद यह क्षेत्र फिर से फ्रांस को लौटा दिया गया। 1954 में, जब कंबोडिया स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ, तो फ्रांसीसी सैनिकों ने वापसी की और थाई सेना ने इस क्षेत्र ने दोबारा इस पर अपना आधिपत्य दर्ज कराया। 5 साल बाद, कंबोडिया ने इस पर आपत्ति जताई और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में इस पर मामला दर्ज कराया।

प्राह विहियर मंदिर थाईलैंड-कंबोडिया के सीमा विवाद के बीचोबीच में स्थित है।

थाईलैंड ने लगभग 50 वर्षों तक फ्रांसीसी सीमा निर्धारण को स्वीकार किया था। इस निष्कर्ष के आधार पर 1962 में ICJ ने 9-3 के फैसले के तहत कंबोडिया के पक्ष में निर्णय दिया।

प्रीह विहियर मंदिर के 1963 में देश को सौंपे जाने के बाद भी कई वर्षों तक बंद रहा, क्योंकि वहाँ बारूदी सुरंगें बिछाई गई थीं और ख्मेर रूज गुरिल्लाओं समेत अलग अलग समूहों के बीच इसके आधिपत्य को लेकर लगातार संघर्ष जारी था।

1990 के दशक के अंत में ख्मेर रूज संगठन के विघटन हुआ । इसके बाद यह स्थल पर्यटकों के लिए खोला गया। पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की सुगमता और सुविधाओं के लिए थाईलैंड और कंबोडिया की सरकारों ने मिलकर इस जगह को बेहतर करने की योजना बनाई।

हालाँकि, जब 2008 में कंबोडिया ने प्रीह विहियर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में पंजीकृत करने का प्रयास किया, तो एक बार फिर स्वामितव को लेकर पुराना विवाद सामने आ गया। थाई सरकार ने यह तर्क देकर आपत्ति जताई कि प्रस्ताव में मंदिर के आसपास के थाई-अधिकृत क्षेत्र का उल्लेख किया गया था।

इसके बाद संशोधित कंबोडियाई आवेदन को प्रधानमंत्री समक सुंदरावेज की सरकार ने स्वीकार कर एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए। हालाँकि, अंदरूनी आलोचना के कारण समक सरकार को अपना समर्थन वापस लेना पड़ा। यूनेस्को ने जैसे-जैसे आवेदन की समीक्षा की, स्थिति और भी बिगड़ती चली गई।

थाईलैंड के विदेश मंत्री नोपाडोन पट्टामा के खिलाफ विपक्षी सदस्यों ने मुकदमा दायर किया। दावा किया गया कि उन्होंने कंबोडिया के साथ जो समझौता किया था, वह अवैध था। थाई संवैधानिक न्यायालय ने इस आरोप को सही ठहराया, पर अगले ही दिन यूनेस्को ने कंबोडिया के आवेदन को मंजूरी दे दी।

इसके बाद तनाव चरम पर पहुंच गया। नोपाडोन के इस्तीफे के बाद कंबोडियाई जनता ने जश्न मनाया, जबकि थाईलैंड में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। इसके चलते कंबोडिया ने प्रीह विहियर की सीमा को बंद कर दिया। सैकड़ों थाई और कंबोडियाई सैनिक मंदिर के पास एक बार फिर विवादित क्षेत्र में तैनात कर दिए गए।

इसी तरह 2011 में, इस विवाद के कारण थाई और कंबोडियाई सेनाओं के बीच कई दिनों तक संघर्ष हुआ। इसमें 12 से अधिक लोग मारे गए, कई घायल हुए और लगभग 1,00,000 ग्रामीणों को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। एक बार फिर दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए।

कंबोडिया ने दावा किया कि थाई सैनिकों ने कंबोडिया अधिकृत क्षेत्र में जबरन प्रवेश किया और हथियारों तथा रॉकेट्स से हमला किया। इसके बाद उन्होंने जवाबी कार्रवाई की। थाईलैंड ने कहा कि उनके सैनिक नियमित गश्त पर थे और कंबोडिया के सैनिकों ने पहले हमला किया।

अप्रैल 2011 में कंबोडिया ने ICJ से अनुरोध किया कि कोर्ट 1962 के फैसले की व्याख्या करे ताकि ये स्पष्ट हो सके कि थाईलैंड मंदिर पर कंबोडिया की संप्रभुता को स्वीकार करता है, लेकिन मंदिर के आसपास के क्षेत्र पर नहीं। 2013 में, कोर्ट ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया कि थाईलैंड को प्रीह विहियर क्षेत्र से अपनी सेना हटानी होगी, क्योंकि कंबोडिया को पूरे क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त है।

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी पुष्टि की कि यह मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से स्थानीय जनता के लिए महत्वपूर्ण है। थाईलैंड और कंबोडिया, दोनों ही विश्व धरोहर संधि के पक्षधर हैं। उन्हें एक विश्व धरोहर स्थल के रूप में इस स्मारक को संरक्षित करने पर मिलकर काम करना होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हर देश को ऐसे स्थलों को जानबूझकर नुकसान पहुँचाने वाले कदम उठाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस विरासत को नुकसान पहुँच सकता है।

इस खबर को मूल रूप से रुकमा राठौर ने अंग्रेजी में लिखा है और अनुवाद किया है रामांशी मिश्रा ने

बीजेपी ने ‘घर-घर सिंदूर’ पहुँचाने की न्यूज को बताया फेक, दैनिक भास्कर-ममता बनर्जी को घेरा: कहा- ट्रोल की तरह आधारहीन खबर पर राजनीति कर रहीं बंगाल की CM

भाजपा ने दैनिक भास्कर में छपी उस खबर को फर्जी करार दिया है, जिसमें दावा किया गया था कि पार्टी ‘मोदी 3.0’ के तहत ऑपरेशन सिंदूर चलाएगी और घर-घर जाकर महिलाओं को सिंदूर बाँटेगी। इस खबर में कहा गया था कि 9 जून से अभियान शुरू होगा, जिसमें 11 साल बाद ऑपरेशन सिंदूर के 9 बड़े बिंदुओं पर काम होगा। लेकिन भाजपा नेता अमित मालवीय ने इसे पूरी तरह से झूठा बताया।

अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि कई लोग इस फर्जी खबर के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं, लेकिन असली हैरानी तब हुई जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्रोल की तरह इस आधारहीन खबर को लेकर राजनीति शुरू कर दी। मालवीय ने ममता बनर्जी पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें अपने राज्य की बिगड़ती स्थिति पर ध्यान देना चाहिए, जहाँ सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा है, महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं और बेरोजगारी चरम पर है।

बीजेपी आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने यह भी कहा कि ममता बनर्जी को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बेतुके बयान देने से बचना चाहिए। मालवीय ने कॉन्ग्रेस प्रवक्ताओं पर भी निशाना साधा और उन्हें हल्का बताते हुए कहा कि उनसे बेहतर की उम्मीद करना बेकार है।

इस खबर के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने भाजपा पर सवाल उठाए, तो कुछ ने ममता बनर्जी के बयानों की आलोचना की। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर चर्चा हो रही है, जिसमें भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर तो हमला किया ही, पाकिस्तानी पलटवार को नेस्तनाबूद करते हुए उसके एयर डिफेंस सिस्टम के साथ ही एयरफोर्स के कई ठिकानों को भी उड़ा दिया था।

देश से प्रतिभाओं का पलायन, आरक्षण की जड़ें और मेरिट का सवाल: राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौती

आज जब हमारे वायुसेना प्रमुख एयर चीफ माशर्ल अमर प्रीत सिंह जैसे शीषर्स्थ सैन्य अधिकारी सार्वजनिक मंच से इस बात को लेकर चिंता जताते हैं कि देश की प्रतिभाएँ बड़ी संख्या में विदेश पलायन कर रही हैं, तो यह केवल एक सैन्य अधिकारी की नाराज़गी नहीं होती, यह भारत की सामूहिक विफलता का उद्घोष होता है, और यह चिंता, यह चेतावनी तब और अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब देश की सीमाएँ लगातार खतरे में हों, और हमारे देश की आंतिरक व्यवस्थाएँ भ्रष्टाचार, आरक्षण और वोट बैंक पॉलिटिक्स के दबाव में।

प्रतिभा का पलायन: भारत का अनदेखा रक्तस्राव

हमारे देश में आरक्षण की वजह से हर वर्ष लाखों होनहार और प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएँ उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका, कनाडा, यूके, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों का रुख करते हैं। वे वहीं शिक्षा अर्जित करते है और फिर वहीं बस जाते हैं, वहीं शोध करते हैं, वहीं के रक्षा और टेक्नोलॉजी सिस्टम को मज़बूत करते हैं। ये हमारे भारतीय वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर्स, तकनीकी विशेषज्ञ होते हैं, जिन्हें भारत की प्रगति की धुरी होना था, लेकिन वे आज Silicon Valley, MIT, NASA और अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री के मज़बूत स्तंभ बने हुए हैं।

इस समय दुनिया भर में लगभग 15,000 भारतीय मूल के लोग ऐसे हैं जो विदेशों में अपनी कंपनियाँ चला रहे हैं और विशेषज्ञों की माने तो लगभग 60% सेंटी-मिलियनर्स और अरबपति भारतीय, अपनी कंपनियाँ ख़ुद शुरू करते हैं।

यह आँकड़े संकेत हैं कि भारत की योग्यता, प्रतिभा और पूंजी सम्मान, उद्यमशीलता और समान अवसर की तलाश में विदेश की ओर पलायन कर रही है, जो कि देश के लिए एक गंभीर चुनौती है। क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की कि आखिर क्यों कोई युवा, जिसने यहीं जन्म लिया, यहीं से शिक्षा ली, जिसे यहीं की मिट्टी ने आकार दिया, वह अपना पूरा सामर्थ्य किसी अन्य राष्ट्र को क्यों समर्पित करता है?

इस प्रश्न का उत्तर है: प्रणालीगत असमानता और आरक्षण का अनियंत्रित विस्तार

जब योग्यता (Merit) की जगह जाति, वर्ग और वोटबैंक प्राथमिकता बन जाए, तो प्रतिभाशाली छात्रों का हताश होना स्वाभाविक है। एक सामान्य वर्ग का छात्र, जो कठिन मेहनत कर किसी IIT या मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेना चाहता है, उसे एक ही परीक्षा में ‘कई गुना’ अधिक अंक लाने होते हैं सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वो ‘सवर्ण’ है। या इसे यूँ कह लीजिए, कि ‘कई गुना’ अंक लाने के बाद भी उसे वो जगह नहीं मिलती जिसका वो सही मायने में हकदार होता है।

क्या ये उस छात्र के शिक्षा के अधिकार का हनन नहीं है? आज तक भारत की किसी सरकार ने यह क्यूँ नहीं सोचा, कि सिर्फ़ सामान्य वर्ग से आने की वजह से हर वर्ष लाखों-करोड़ों सामान्य वर्ग के छात्रों से उनका शिक्षा का अधिकार छीना जा रहा है? बचपन से ही उन्हें यह एहसास करा दिया जाता है कि यह देश उनकी प्रतिभा से ज़्यादा उनके “जन्म” को महत्व देता है।

जब रक्षा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहता…..

अब ज़रा सोचिए, हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब भारत हर तरफ़ से सुरक्षा चुनौतियों से घिरा है:

  • पश्चिमी सीमा पर आतंकववाद के रूप में पाकिस्तान की छद्म युद्धनीत
  • पूर्वी सीमा पर चीन का आक्रामक विस्तारवाद
  • बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की अवैध घुसपैठ
  • आंतरिक सुरक्षा पर उग्रवाद और कट्टरपंथी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव

ऐसी चिंताजनक और चुनौतिपूर्ण स्थिति में क्या हम अपने रक्षा संस्थानों, DRDO, HAL, ISRO या सेनाबलों केवल औसत दर्जे की क्षमताओं के आधार पर चयन कर सकते हैं? कठिन परिस्थितियों एवं युद्ध के समय में हम अपनी सीमाओं की रक्षा ‘आरक्षण कोटा’ से करेंगे या ‘कौशल’ से?

एयर चीफ़ का यह बयान, कि HAL जैसी संस्थाएँ डिलीवरी समय पर नहीं दे पा रही हैं और तेजस जैसी परियोजनाएँ सालों से अधर में लटकी हैं, एक साफ़ इशारा है कि हम प्रणालियों में योग्यता की बजाय औपचारिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण संस्थानों में ऐसी औपचारिकताओं को तभी बढ़ावा मिलता है जब कई योग्य प्रतिभाएँ पीछे छूट जाती हैं।

हम विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश हैं, और बढ़ती जनसंख्या का सीधा अर्थ होता है – घटती गुणवत्ता। मैं मानता हूँ कि सीमित संसाधनों और अवसरों को सभी में बाँटना एक चुनौती की स्थिति पैदा है, लेकिन यदि देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग व मेडिकल संस्थानों में चल रही आरक्षण प्रणाली और कई दूसरे अन्य क्षेत्रों में लागू वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को ले कर कार्य नहीं किया गया, तो ये कुल मिलाकर भविष्य में देश की गुणवत्ता ही गिराएगी।

Inclusive बनने और दिखने के चक्कर में भारत मात्र Inclusive बन के ही रह गया है। भारत को अब Competitive भी बनना होगा। भारत का सर्वांगीण विकास तब तक अधूरा रहेगा जब तक उसमें सर्वश्रेष्ठ लोगों की सम्पूर्ण भागीदारी नहीं होगी।
राष्ट्र निर्माण में ‘मेरिट’ की केंद्रीय भूमिका ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया है। ये संकल्प सिर्फ़ प्रधानमंत्री मोदी का ही नहीं बल्कि सभी 145 करोड़ भारतीयों का संकल्प है। परंतु इसके लिए हमें रक्षा, विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन जैसे हर क्षेत्र में श्रेष्ठता चाहिए। इस श्रेष्ठता का मूल है- मेरिट। यदि हम अपनी प्रतिभाओं को सहेज नहीं सके, तो हम आत्मनिर्भर भारत, डिजिटल इंडिया या मेक इन इंडिया जैसे अभियानों को केवल नारे बनाकर छोड़ देंगे। मेरिट का मतलब यह नहीं कि समाज के वंचित वर्गों की अनदेखी की जाए। लेकिन, यह भी अति आवश्यक है कि समान अवसर सबको मिलें, न कि समान परिणाम।

एक निष्पक्ष प्रतियोगिता हो, जिसमें जो बेहतर हो, वही आगे बढ़े, जाति, धर्म, आर्थिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं, बल्कि कौशल, योग्यता और चरित्र के आधार पर हमारे रक्षा प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए०पी० सिंह की चिंता, एक राष्ट्रवादी और ज़िम्मेदार नागरिक की अंतरात्मा की आवाज़ है। अब वक्त आ गया है कि हम राष्ट्र की आवश्यकताओं को वोटबैंक की राजनीति से ऊपर रखें। हमें अब अपने युवाओं को यहीं अवसर देना होगा, उनकी प्रतिभा को यहीं सम्मान देना होगा। अगर हम ऐसा नहीं कर पाए, तो हम सिर्फ़ प्रतिभा नहीं खोएँगे – हम अपना भविष्य खो देंगे।

उच्च जातियों के विकास के लिए बिहार की NDA सरकार ने बनाया सवर्ण आयोग, BJP नेता महाचंद्र सिंह को बनाया अध्यक्ष: शैलेंद्र कुमार होंगे ST आयोग के अध्यक्ष

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा कदम उठाते हुए सवर्ण जातियों के लिए गठित आयोग के पदाधिकारियों की नियुक्ति की है। इस आयोग का अध्यक्ष बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व एमएलसी महाचंद्र प्रसाद सिंह को बनाया गया है। वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

आयोग में तीन अन्य सदस्यों – दरभंगा के दयानंद राय, पटना के जयकृष्ण झा और भागलपुर के राजकुमार सिंह को भी शामिल किया गया है। सामान्य प्रशासन विभाग ने शुक्रवार (30 मई 2025) को इसकी अधिसूचना जारी की। पहली बार इस आयोग का गठन साल 2011 में नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए सरकार ने ही किया था।

इसके साथ ही नीतीश सरकार ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) आयोग के लिए भी नियुक्तियाँ की हैं। पश्चिम चंपारण के शैलेंद्र कुमार को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि सुरेंद्र उराँव को उपाध्यक्ष और प्रेमशीला गुप्ता, तल्लु बासकी, राजकुमार को सदस्य नियुक्त किया गया है। इन सभी नियुक्तियों की वैधता तीन साल तक रहेगी।

एक दिन पहले ही सरकार ने जेडीयू नेता गुलाम रसूल बलियावी को बिहार अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था। बलियावी हाल ही में केंद्र सरकार के वक्फ संशोधन बिल का विरोध करने के लिए चर्चा में थे। ये सभी नियुक्तियाँ इस बात का संकेत हैं कि नीतीश सरकार आगामी विधानसभा चुनावों के लिए जातिगत समीकरण साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। बिहार में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और सरकार विभिन्न समुदायों को साधने के लिए आयोगों के गठन और नियुक्तियों पर जोर दे रही है।

सवर्ण आयोग के गठन को राजनीतिक हलकों में अहम माना जा रहा है, क्योंकि बिहार में सवर्ण मतदाता एक बड़ा वोट बैंक हैं। नीतीश कुमार और उनकी सहयोगी पार्टी बीजेपी इस कदम से सवर्ण समुदाय को यह संदेश देना चाहती हैं कि उनकी चिंताओं और विकास को प्राथमिकता दी जा रही है। दूसरी ओर अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक आयोगों की नियुक्तियाँ भी अन्य समुदायों को लुभाने की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।

बिहार की सियासत में जातिगत समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं। नीतीश सरकार का यह कदम न केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है, बल्कि सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक प्रयास माना जा रहा है। अब देखना यह है कि ये नियुक्तियाँ चुनावी मैदान में कितना असर दिखाती हैं।

पाकिस्तान में इस्लामी आतंकियों के मरने से गमजदा था कोलंबिया, शशि थरूर ने घर में घुसकर सुनाया: पनामा में बोले- गाँधी का ये देश अब ‘दूसरा गाल’ आगे नहीं करेगा

‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जरूरत को दुनिया को बताने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल इन दिनों दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मिल रहा है। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पनामा, गुयाना के दौरे के बाद कोलंबिया पहुँचा। आतंकवादियों की मौत पर कोलंबिया ने संवेदना जताई थी इस पर क्लास लगाते हुए उन्होंने कोलंबिया सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में आतंकियों की मौत पर दुख जताने की जरूरत नहीं थी। दरअसल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान में मारे गए आतंकियों के प्रति कोलंबिया ने पाकिस्तान में जान-माल के नुकसान पर संवेदना प्रकट की थी।

शशि थरूर ने कहा कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई कर खुद की रक्षा करने वाले और आतंकियों का बचाव करने वालों के बीच कोई समानता नहीं है। इसलिए भारत और पाकिस्तान के बीच समानता नहीं हो सकती। उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी हताहतों के लिए बोगोटा के शोक संदेश की आलोचना की। थरूर ने कहा, ” हम कोलंबिया सरकार की प्रतिक्रिया से निराश हैं। आतंकवाद पीड़ित भारतीयों के प्रति सहानुभूति दिखाने के बदले आपने पाकिस्तान में आतंकियों की मौत पर संवेदना जताई।”

उन्होंने कहा, “हमें लगता है कि शायद स्थिति को पूरी तरह नहीं समझा गया और कोलंबिया ने बयान जारी कर दिया और आतंकवादी ठिकानों पर हमलों के बाद पाकिस्तान में हुई मौत पर संवेदना जताई।” उन्होंने कहा कि अब हमने अपनी बात साफ कर दी है। भारत ऐसा देश है जो वास्तव में दुनिया के रचनात्मक विकास की ताकत रखता है। उन्हें उम्मीद है कि अब दूसरी सरकारें भी उन देशों की आलोचना करेंगी जो आतंकवाद को पनाह देता है।

इससे पहले पनामा में शशि थरूर ने आतंकवाद के पनाहगाह पाकिस्तान को चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि भारत किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार है और गाँधी का ये देश अब ‘दूसरा गाल’ भी आगे नहीं करेगा। उन्होंने कहा, “हमें हमेशा उन मूल्यों के पक्ष में खड़े होना चाहिए, जिन पर हम भरोसा करते हैं। साथ ही, बगैर डर के जीवन जीना हमारा अधिकार है। इसके लिए हमें उन दुष्टों के खिलाफ लड़ना ही होगा, जिसको दुनिया आतंकवादी कहती है। “

शशि थरूर ने पीएम मोदी की बात कहते हुए कहा, ” पीएम मोदी ने साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर जरूरी था, क्योंकि आतंकवादी आए और मासूम लोगों को मार डाला, 26 महिलाओं का सिंदूर मिटा दिया”

शशि थरूर ने कहा कि हमें हमेशा अपने अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। ये बात राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने देश को सिखाया था। पनामा में उन्होने राष्ट्रपति होसे रौल मलीनों को भारत के पक्ष की जानकारी दी।

TV पत्रकार बनकर बात करता था पाकिस्तानी अधिकारी, CRPF जवान से गुप्त जानकारी लेता था: मिलते थे ₹3500-12 हजार, हमले से 5 दिन पहले पहलगाम से हुआ था ट्रांसफर

पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए सीआरपीएफ के एएसआई मोतीराम जाट से पूछताछ में NIA को कई नई बातें पता चली हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि एक पाकिस्तानी अधिकारी ने चंडीगढ़ की एक न्यूज जर्नलिस्ट बनकर उससे भारत की कई अहम जानकारियाँ ली थी।

हनीट्रैप में फँसा CRPF जवान मोतीराम जाट बीते 2 सालों से भारत की कई खुफिया जानकारियाँ साझा कर रहा था। पहलगाम हमले से सिर्फ 5 दिन पहले ही उसका ट्रांसफर दिल्ली हुआ था।

TV जर्नलिस्ट बन जवान को फाँसा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जाँच में सामने आया कि एक महिला खुद को चंडीगढ़ का TV जर्नलिस्ट बताते हुए CRPF जवान के संपर्क में आई थी। उसने जवान से कुछ जानकारियाँ साझा करने की गुजारिश की। इसके बाद महिला लगातार जवान के संपर्क में बनी रही। नजदीकियाँ बढ़ाने के लिए मैसेज, कॉल्स और वीडियो कॉल्स तक किए।

मोती राम ने इसके बाद महिला से कई खुफिया जानकारियाँ साझा करनी शुरू कर दी थी। दो से तीन महीने तक बातचीत के बाद महिला ने एक अन्य व्यक्ति को उसी न्यूज चैनल का पत्रकार बताकर संपर्क करवाया। असल में वह एक पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का अधिकारी था।

CRPF जवान के फोन की भी जाँच की गई है। इसमें पता चला कि उसकी तरफ से कोई भी मैसेज डिलीट नहीं किया गया था। पर साथ में ये भी मिला कि मोती राम ने सुरक्षा एजेंसियों की आवाजाही की न्यूज की कुछ क्लिप्स भी साझा की थी। इस पर पत्रकार बने अधिकारी ने उससे उन जानकारियों को भेजने से मना कर दिया जो पहले से ही लोगों को पता हो।

पहलगाम हमले के बाद भी दी जानकारी

रिपोर्ट्स के अनुसार, मोतीराम ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद भी कई जानकारियाँ पाकिस्तानी जासूसों को दी थी। इसके एवज में पत्रकार बने अधिकारी ने उसे ₹3500 महीने और किसी एक्सक्लूसिव और अहम जानकारी के लिए ₹12000 अतिरिक्त दिए थे। ये पैसे उसने अपनाे और अपनी पत्नी के बैंक खाते में लिए थे।

जवान की ओर से साझा की गई जानकारियों में आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री अमित शाह का कश्मीर दौरा, सीआरपीएफ जवानों की आवाजाही की संख्या, आतंकियों के ठिकानों की जानकारी और 50 पर्यटन स्थलों के बंद होने की बात शामिल है।

CRPF में सहायक उपनिरीक्षक (ASI) मोती राम जाट ट्रांसफर से पहले पहलगाम में ही 116 बटालियन में तैनात था। NIA ने उन्हें सोमवार (26 मई 2025) को उसे दिल्ली से गिरफ्तार किया था। 2023 से वह पाकिस्तान के अधिकारियों (PIO) को भारत की खुफिया जानकारी शेयर कर रहे थे। जवान को 6 जून 2025 तक NIA की कस्टडी में भेजा गया है।

शिक्षा की ब्रेनवॉशिंग इंडस्ट्री, ब्रेनवॉश्ड बच्चे व अभिभावक… आपके ही घर की कहानी है ‘His Story Of इतिहास’, समझा देती है सरकार और ‘सिस्टम’ में अंतर

इन सवालों के हमने अपनी पाठ्यपुस्तकों में क्या जवाब पढ़ा है, ये हमें भी मालूम है और आपको भी। लेकिन, क्या वो जवाब सही हैं? या फिर सच्चाई कुछ और है, जिसे व्यवस्थागत ढंग से हमसे छिपाया गया? कई पीढ़ियों को भ्रम में रखा गया? हमारे बच्चों में अपने ही देश और उसकी संस्कृति के प्रति हीन भावना भर दी गई? ‘His Story Of इतिहास’ एक ऐसी फ़िल्म है जो इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती है।

आगे बढ़ने से पहले फ़िल्म के बारे में बता दें। फ़िल्म में सुबोध भावे मुख्य भूमिका में हैं, सारी कहानी इन्हीं के द्वारा निभाए गए फिजिक्स के शिक्षक के किरदार पर आधारित है। मराठी में सुबोध भावे लंबे समय से सक्रिय हैं, कई अवॉर्ड्स जीत चुके हैं। थिएटर बैकग्राउंड से आते हैं, ऐसे में उनके अभिनय को लेकर बहुत कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उनके अलावा वरिष्ठ अभिनेता योगेंद्र टीकू इस फिल्म में इतिहास के प्रोफेसर के किरदार में हैं। उन्हें कई फ़िल्मों में हम और आप देख चुके हैं। हम चाहेंगे कि आप थिएटर में जाकर ही इस फ़िल्म को देखें, इसीलिए इस समीक्षा व विश्लेषण में हम कहानी नहीं खोलेंगे। कम बजट की फ़िल्म है, काफ़ी संघर्ष और मेहनत करके बनाई गई है – हमारा कर्तव्य है इसका मान रखना। संघर्ष इसीलिए, क्योंकि इस फ़िल्म का विषय ऐसा है कि लगभग 60 एक्टर्स ने इसे रिजेक्ट कर दिया था। फ़िल्म के निर्देशक व निर्माता हैं मनप्रीत सिंह धामी, जिन्होंने ‘पंचकर्मा फिल्म्स’ के बैनर तले इसे बनाया है।

एक बड़ी समस्या को खँगालती है ‘His Story Of Itihaas’

फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है, लेखक व विश्लेषक नीरज अत्री की पुस्तक ‘ब्रेनवॉश्ड रिपब्लिक’ अगर आपने पढ़ी है, तो आपको पता है कि फ़िल्म में आप क्या देखने वाले हैं। नीरज अत्री लंबे समय से हमारे पाठ्यपुस्तकों में हुई मिलावट के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहे हैं। उन्होंने बच्चों को पढ़ाए जा रहे कई तथ्यों को लेकर NCERT से सवाल पूछा, जवाब में बोर्ड कोई भी सबूत या स्रोत पेश नहीं कर पाया। उन्होंने एक पूरी की पूरी किताब लिख डाली। YouTube पर अपने चैनल ‘पॉलिटिकली इनकरेक्ट’ के जरिए भी वो जागरूकता फैलाते रहते हैं।

चलिए, वापस लौटते हैं फ़िल्म पर। एक संवेदनशील विषय और वास्तविक घटनाओं पर आधारित होने के बावजूद ये कभी भी आपको बोर नहीं होने देती है। वामपंथी इतिहास प्रोफेसरों व लेखकों के जो किरदार हैं, वो आपको वास्तविक व देखे-सुने हुए लगेंगे। हाँ, कई लोगों को ये पहली बार पता चलेगा कि कैसे बच्चे और अभिभावक इनके जाल में फँसते चले जाते हैं। फ़िल्म में 2 परिवारों और उनके बच्चों की कहानी समानांतर चलती रहती है – एक समृद्ध परिवार है और एक अपेक्षाकृत ग़रीब। फ़िल्म ये दिखाने में सफल रही है कि जिस समस्या को उसने एक्स्प्लोर किया है, उससे प्रभावित होने वालों में क्लास या लिंग का कोई भेद नहीं है।

फ़िल्म व्यवस्था के ख़िलाफ़ संघर्ष है, ललकार है, व्यवस्था बदलने के बाद जो व्यवस्था बनती है – उस नई व्यवस्था की लाचारी है। ‘His Story Of Itihaas’ आपके घर की कहानी है। बच्चों को ‘Sit करो’ और ‘Eat करो’ कहने वाली ब्रेनवॉश्ड माँओं की कहानी है। बैंक से ऋण का बोझ अपने सिर पर लादकर बच्चों को मिशनरी स्कूल में पढ़ाने वाले उन ब्रेनवॉश्ड पिताओं की कहानी है, जो इस तनाव में अपने ऊपर BP और शुगर जैसी बीमारियों को हावी कर लेते हैं। स्वस्तिक को नाजी प्रतीक समझकर इससे घृणा करने वाली ब्रेनवॉश्ड बच्ची की कहानी है। कूल दिखने के चक्कर में पश्चिमी सभ्यता के आगोश में जाकर ईसाई धर्मांतरण की तरफ बढ़ रहे ब्रेनवॉश्ड किशोर की कहानी है। ये अपने ही देश व समाज को हीन भावना से देखने वाले एक ब्रेनवॉश्ड IAS अधिकारी की कहानी है।

ये एक ब्रेनवॉशिंग इंडस्ट्री की भी कहानी है। वो इंडस्ट्री, जिसमें बड़ी बिंदी वाले गैंग की महिला एक्टिविस्ट है जो अपने लिखे को ही अकाट्य सत्य मानती है और उसे कोई काट दे तो इसे ‘Rant’ कहती है। वो इंडस्ट्री, जिसमें मौलानाओं के नैरेटिव को बनाए रखने के लिए मंदिर की जगह को मस्जिद बताने वाला इतिहासकार होता है। वो इंडस्ट्री, जिसमें सही इतिहास पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर को उसकी भाषा को लेकर बेइज्जत किया जाता है। वो इंडस्ट्री, जिसमें तमाम बदलावों की बात करके सरकार में पहुँचने वाले नेता भी लाचार हो जाते हैं। वो इंडस्ट्री, जिसने सरकार पर दबाव बनाने के लिए सड़क से लेकर संसद और विश्वविद्यालयों तक तमाम तिकड़म ढूँढ रखे हैं।

अछूत माने जाने वाले विषयों पर अब बन रही हैं फ़िल्में

मैं कोई तकनीकी समीक्षा नहीं करने जा रहे, क्योंकि बहुत हद तक ये फ़िल्म इससे परे है। कहानी दिल्ली-नोएडा में सेट है, ऐसे में विज़ुअल्स के मामले में बहुत अधिक स्कोप बनता भी नहीं है। कहानी घरों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों के भीतर ही घूमती रहती है, यदा-कदा एक गुरुद्वारे में पहुँचती है। इसके पीछे भी एक सन्देश है।

पहले जिन विषयों को अछूत माना जाता था, आज उनपर फ़िल्में बन रही हैं – ये अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। 2019 में ‘द कश्मीर फाइल्स’ के साथ जो सिलसिला शुरू हुआ था, वो अब ‘छावा’ और ‘हिज स्टोरी ऑफ इतिहास’ तक पहुँच चुकी है। शायद अगर हमें इतिहास सही से पढ़ाया जाता, तो ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘छावा’ जैसी फ़िल्मों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। ये फिल्म उसी ‘ब्रेनवॉशिंग इंडस्ट्री’ की पोल खोलती है।

“सरकार उनकी है, पर सिस्टम आज भी हमारा है” – ‘The Kashmir Files’ का ये डायलॉग ‘His Story Of Itihaas’ देखने के बाद और प्रासंगिक लगने लगता है। ख़ासकर अकादमिक व क्रिएटिव जगत में आज भी उनका कब्ज़ा है, जो भारत से जुड़े हर सकारात्मक पक्ष को छिपाने या धूमिल करने की जुगत में लगे रहते हैं। इस विषय पर सिर्फ़ एक फ़िल्म से काम नहीं चलेगा, हमें कई फ़िल्में चाहिए। समस्या इतनी बड़ी है कि शायद एक प्रयास से काम न चले।

मौलवी बन मोहम्मद कासिम कर रहा था जासूसी, भारतीय सिम कार्ड के साथ ISI को खुफिया जानकारियाँ दी, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने राजस्थान से किया गिरफ्तार

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने राजस्थान के भरतपुर से 34 साल के एक पाकिस्तानी जासूस को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि यह जासूसी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के इशारे पर की जा रही थी। आरोपित की पहचान मोहम्मद कासिम के रूप में हुई है, जो एक मुस्लिम मौलवी है। अधिकारियों के मुताबिक, कासिम के संबंध जयपुर से भी हैं और वह एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और सोशल मीडिया के ज़रिए पाकिस्तान में अपने हैंडलर्स से जुड़ा हुआ था।

ISI को सिम कार्ड पहुँचाने का आरोप

जानकारी के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने कासिम को जासूसी की गतिविधियों के लिए भारतीय मोबाइल सिम कार्ड मुहैया कराकर ISI की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। कासिम दो बार पाकिस्तान गया था– पहली बार अगस्त 2024 में और फिर मार्च 2025 में। वह दोनों बार करीब 90 दिनों तक वहाँ रहा था।

जासूसी की ट्रेनिंग और फरार भाई

जाँच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, कासिम को ISI ने जासूसी की खास ट्रेनिंग दी थी। उसे सिखाया गया था कि कैसे खुफिया जानकारी इकट्ठा करनी है और उसे सुरक्षित तरीके से ISI के अधिकारियों तक पहुँचाना है। कासिम का एक भाई भी है, जो अभी फरार है और उस पर भी ISI के लिए काम करने का आरोप है।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बताया कि पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटिव (PIO) भारतीय मोबाइल सिम कार्ड का इस्तेमाल व्हाट्सएप के ज़रिए कर रहे थे। वे इन सिम का उपयोग करके भारतीयों से बातचीत कर रहे थे ताकि सेना और अन्य सरकारी कार्यालयों की खुफिया जानकारी निकाल सकें।

यह जानकारी जासूसी के इस बड़े नेटवर्क के बारे में और भी गंभीर सवाल खड़े करती है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कानून की उपयुक्त धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है। अब पुलिस PIO और उनके साथियों द्वारा रची गई जासूसी की पूरी साज़िश का पता लगाने के लिए आगे की जाँच कर रही है।

इस खुलासे से पता चलता है कि कैसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियाँ भारतीय सिम कार्ड का इस्तेमाल कर आसानी से भारतीय नागरिकों से जुड़कर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही थीं। सुरक्षा एजेंसियाँ अब इस पूरे नेटवर्क को तोड़ने और इसमें शामिल सभी लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।

900 अवैध घुसपैठियों की हो रही पहचान, किए जाएँगे डिपोर्ट: ऑपरेशन पुश-बैक के साथ देशभर में चल रहा अभियान, दिल्ली में रहते हैं सबसे अधिक बांग्लादेशी

अलग-अलग राज्यों की सीमाओं से अवैध तरीके से भारत में घुसे बांग्लादेशी घुसपैठियों की खैर अब मुश्किल है। दिल्ली में 900 अवैध घुसपैठियों की पहचान हो गई है। उनकी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर अवैध बांग्लादेशियों को डिपोर्ट किया जाएगा।

अवैध घुसपैठियों को पकड़ने और उनके मुल्क वापस भेजने के लिए सरकार ने ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ चलाया। इसके तहत दिल्ली में लगभग 700 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ कर डिपोर्ट किया जा चुका है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) के आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में सबसे अधिक अवैध घुसपैठिए रहते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली पुलिस के अपराध शाखा के विशेष पुलिस आयुक्त देवेश चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि दिल्ली में घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए क्राइम ब्रांच और स्पेशल सेल की यूनिट अपना काम तेजी से कर रही है।

देवेश ने पहचाने गए प्रवासियों की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी साझा की। उन्होंने कहा, “इस वर्ष अब तक लगभग 900 बांग्लादेशियों की पहचान की गई है। जिनके दस्तावेजों को वैध पाया गया, उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि अन्य की जाँच अब भी चल रही है। अवैध पाए गए लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इसमें हिरासत, निर्वासन और आपराधिक कार्यवाही शामिल हैं।”

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अवैध घुसपैठियों का सिंडिकेट है। इनसे जुड़े लोग घुसपैठियों को अवैध तरीके से भारत में एंट्री करवाने से लेकर उनके फर्जी दस्तावेज बनवाने, उन्हें दिल्ली तक पहुँचाने और यहाँ तक की नौकरी दिलवाने तक में भी मदद करते हैं। पुलिस जाँच के अनुसार, इन घुसपैठियों की नौकरियाँ प्राइवेट से लेकर एयरलाइन तक में लगी हुई पाई गई है। इसके साथ ही उनके बच्चे EWS कोटे के साथ बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं।

देवेश के अनुसार, “घुसपैठियों की पहचान के अभियान को नवंबर 2024 में शुरू किया गया था। अब तक के इसके परिणाम सराहनीय हैं। हम स्थानीय लोगों से भी अपील करते हैं कि कोई भी अपने आसपास किसी संदिग्ध व्यक्ति जानकारी 112 हेल्पलाइन के जरिए पुलिस को या अपने क्षेत्र के SHO, ACP या DCP को लिखित या फोन के माध्यम से दे सकता है। इसके बाद उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”

बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई कई राज्यों में तेज हो गई है। इसमें दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गोवा से बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी पकड़े गए हैं। उनकी पहचान प्रक्रिया पूरी करने के बाद डिपोर्टेशन के लिए एक्शन लिया जा रहा है।

दिल्ली में कहाँ-कहाँ मिले घुसपैठिए

रिपोर्ट के अनुसार, अवैध घुसपैठियों की पहचान करने के लिए दिल्ली के 15 जिलों के पुलिस अधिकारियों ने टीमें बनाकर अभियान चलाया था। इसके तहत पूरी दिल्ली से अवैध घुसपैठिए पकड़े गए थे। इनमें दक्षिणी दिल्ली से 67, दक्षिण-पश्चिम से 60, दक्षिण-पूर्वी जिले से 64, उत्तर-पूर्वी जिले से 9, दिल्ली के बाहरी क्षेत्र से 99, नई दिल्ली से 4, रोहिणी से 15, सेंट्रल दिल्ली से 58, उत्तरी से 68, पूर्वी से 7, पश्चिम से 27, शाहदरा से 6, द्वारका से 48, उत्तर-पश्चिम से 31 और उत्तर-बाहरी दिल्ली से 127 अवैध बांग्लादेशी डिपोर्ट किए जा चुके हैं।

इनके साथ-साथ दिल्ली में अब भी लगातार ये अभियान चल रहा है। इसके तहत घुसपैठियों की धर-पकड़ अब भी जारी है।