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कारगिल के 22 साल: 16 की उम्र में सेना में हुए शामिल, 20 की उम्र में देश पर मर मिटे

आज से ठीक 20 साल पहले 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत कश्मीर के कारगिल जिले में अपने शौर्य का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को देश से खदेड़ा था। इस दौरान हमारे जवानों ने देशप्रेम की वो गौरवगाथा लिखी थी, जिसे सदियों तक भूल पाना नामुमकिन है। 18 हजार की फीट पर जवानों द्वारा लड़ा गया ये वो युद्ध था जिसमें भारत के जॉंबाजों ने पाकिस्तान के 3000 सैनिकों को मार गिराया था। इस ऑपरेशन के दौरान हमारे 1363 जवान घायल हुए थे, साथ ही 527 जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

देश पर मर मिटने वालों में एक नाम सुनील जंग का भी है। दो बहनों के इकलौते भाई और घर के चिराग सुनील, कारगिल में शहीद होने वाले सबसे कम उम्र के शहीद हैं। देशप्रेम ने उन्हें 16 की उम्र में ही भारतीय सेना से जोड़ दिया था। वे 11 गोरखा राइफल्स रेजीमेंट के जवान थे और कारगिल युद्ध में लखनऊ से होने वाले पहले शहीद।

8 साल की उम्र में खुद को देश का सिपाही मान लेने वाले सुनील ने एक फैंसी कॉम्पीटीशन के दौरान ही अपनी देशभक्ति का परिचय दे दिया था। उन्होंने बचपन में ही मंच से ऐलान कर दिया था कि देश की रक्षा के लिए वह अपने खून का एक-एक कतरा बहा देंगे, जो उन्होंने समय आने पर किया भी।

कॉम्पीटीशन में एक ओर जहाँ अन्य बच्चे फैंसी वेश-भूषा में थे तो सुनील सेना की वर्दी में। अपने लिए यह ड्रेस उन्होंने पिता की पुरानी वर्दी काटकर बनवाई थी। माँ से बंदूक दिलवाने की भी जिद की थी। तब उन्हें प्लॉस्टिक की बंदूक थमाकर शांत कराया गया था। लेकिन देश के लिए मर-मिटने वाला जुनून कहाँ थमने वाला था…

सैनिक बनने की इच्छा इस वीर में इतनी प्रबल थी कि 16 साल की उम्र में ही घरवालों को बिना बताए सेना में भर्ती हो गए। घर लौटकर माँ को बताया “माँ मैंं भी पापा और दादा की तरह सेना में भर्ती हो गया हूँ, मुझे भी उनकी तरह 11 गोरखा राइफल्स में तैनाती मिली है। अब मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया।” 

मीडिया प्लेटफार्म पर मौजूद जानकारी के अनुसार सुनील की माँ बीमा महत बताती हैं कि कारगिल में जाने से पहले सुनील घर आए थे। वे कुछ दिन घर रुके, लेकिन फिर यूनिट से उन्हें बुलावा आ गया। सुनील ने माँ को समझाया कि वे अगली बार लंबी छुट्टियों में घर आएँगे। लेकिन! नियत ने कुछ और ही तय किया हुआ था।

10 मई 1999 को उन्हें कारगिल सेक्टर पहुँचने का आदेश मिला। वे अपनी टुकड़ी के साथ सिर्फ़ इस जानकारी के साथ आगे बढ़े थे कि भारतीय सीमा में 400-500 की तादाद में घुसपैठिए घुस आए हैं।  

अपनी टुकड़ी के साथ वहाँ पहुँचकर राइफलमैन सुनील जंग तीन दिनों तक दुश्मनों का सामना करते रहे, किंतु 15 मई को भारी गोलीबारी में कुछ गोलियाँ उनके सीने में लगीं। लेकिन देश के लिए लहू का कतरा-कतरा बहा देने का आह्वान बचपन में ही करने वाले 20 साल के ये शूरवीर मैदान-ए-जंग में हार कहाँ मानने वाले थे। सुनील ने छलनी सीने के बावजूद युद्धभूमि में अपने हाथ से बंदूक नहीं गिरने दी और लगातार दुश्मनों पर वार करते रहे। तभी ऊँचाई पर बैठे दुश्मन की एक गोली उनके चेहरे पर लगी और वे वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए।

सुनील जंग द्वारा वीरगति प्राप्त किए जाने के बाद दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा जैसे बड़े-बड़े नेता उनके घर आए। इस दौरान उनके माता-पिता को सुनील के नाम पर कैंट में एक स्टेडियम बनाने, उनकी प्रतिमा लगवाने और बहनों को नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया गया। लेकिन अफसोस! 20 साल की उम्र में खुद को देश के लिए सौंप देने वाले शूरवीर सुनील के परिवार को कारगिल युद्ध के 20 साल बाद भी कुछ नहीं मिला। उनके पास बची है तो सिर्फ़ अपने बेटे की गौरवगाथा और देश के प्रति अथाह प्रेम।

सुनील के शहादत की खबर सुनकर परिवार की हालत

7 साल पहले टीएनबी मीडिया द्वारा सुनील के घरवालों का लिया गया साक्षात्कार यूट्यूब पर मौजूद है। जिसमें वे उस क्षण को बताने का प्रयास कर रहे हैं जब उन्हें सुनील की शहादत का पता चला। वे बताते हैं कि जब सुनील को वीरगति मिली तो उनके घर बड़े-बड़े अधिकारी आए लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे लोग वहाँ से बगैर कुछ कहे चले गए। बाद में उन्हें बताया गया कि उनके बेटे ने कारगिल में बलिदान दिया है। सुनील के पिता बताते हैं कि उन्हें समझ नहीं आया कि वे क्या बोलें… उन्होंने बड़ी मुश्किल से इस बारे में अपने अपनी पत्नी और बच्चों को बताया।

देवी की प्रतिमाओं पर सीमेन, साड़ियाँ उतार जला दी: तमिलनाडु के मंदिर का ताला तोड़ कर कुकृत्य

तमिलनाडु स्थित रानीपेट के एक मंदिर में हिन्दू घृणा का मामला सामने आया है। इससे पहले भी राज्य में मंदिरों पर हमले के कई मामले सामने आ चुके हैं। ताज़ा घटना में मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ अपमानजनक अवस्था में रखी हुई मिलीं। देवी अम्मान और माँ दुर्गा की प्रतिमाओं को अस्त-व्यस्त किया गया। प्रतिमाओं पर हस्तमैथुन किया गया। पवित्र प्रतिमाओं पर सीमेन बिखरा पड़ा था। कपड़े जला दिए गए थे। श्रद्धालुओं में इस घटना को लेकर खासा आक्रोश है।

स्थानीय लोगों ने पुलिस पर निष्क्रियता के आरोप लगाए हैं। हिन्दू कार्यकर्ताओं का कहना है कि हाल ही में राज्य में इस तरह की ये तीसरी घटना है। दरअसल, ये घटना पिछले महीने हुई है। कावेरीपक्कम के नजदीक कोंडापुरम गाँव में पंच लिंगेश्वर मंदिर स्थित है। ये भगवान शिव का मंदिर है, जिसकी देखभाल और प्रबंधन का अधिकार ‘हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (HCRE)’ विभाग के पास है।

ये तमिलनाडु की राज्य सरकार का ही एक विभाग है। खबरों के अनुसार, जब मंदिर का केयरटेकर 20 जून, 2021 को सुबह में कपाट खोलने के लिए आया, तो उसने देखा कि कामाक्षी अम्मान और दुर्गा सन्निधि के ताले टूटे हुए थे। जब वो अंदर गया तो ये देख कर डर गया कि प्रतिमाओं के कपड़े उतार दिए गए थे। देवी की मूर्तियों की साड़ियाँ उतार कर उन्हें जमीन पर रख कर जला दिया गया था।

इस घटना के सामने आते ही श्रद्धालुओं और हिन्दू मुन्नानी संगठन के लोगों ने थाने में जाकर पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। साथ ही इस मामले के दोषियों की गिरफ़्तारी के लिए विरोध प्रदर्शन भी किया। इस मंदिर में दूर-दूर से लोग आते रहे हैं। आसपास के इलाकों में कुछ धर्मांतरित लोगों पर इस कुकृत्य का शक जताया जा रहा है। हिन्दू मुन्नानी और विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने मंदिर पर कई बार हमला होने के बावजूद पुलिस पर कार्रवाई न करने के आरोप लगाया है।

साथ ही HCRE विभाग से भी लोग आक्रोशित हैं। विभाग के पदाधिकारियों को सूचित किए जाने के बावजूद इस घटना को लेकर जानकारी लेने कोई मंदिर नहीं आया। लोगों के अनुसार, पदाधिकारियों का कहना था कि उनके पास और भी ज़रूरी काम हैं जिसमें वो व्यस्त हैं। VHP के राज्य संयोजक सवरना कार्तिक ने कहा कि DMK के सत्ता में आने के साथ ही हिन्दुओं व हिन्दू मंदिरों के खिलाफ अपराध बढ़ जाते हैं, ये इतिहास रहा है।

शिल्पकार के नाम से प्रसिद्ध दुनिया का ‘इकलौता’ मंदिर, पानी में तैरने वाले पत्थरों से निर्माण: तेलंगाना का रामप्पा मंदिर

हाल ही में UNESCO द्वारा तेलंगाना राज्य के वारंगल में स्थित काकतीय रुद्रेश्वर या रामप्पा मंदिर को विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया है। 12वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर कुछ विशेष कारणों से पूरे विश्व में अद्वितीय है। पहला कारण यह है कि यह (संभवतः) इकलौता ऐसा मंदिर है जिसका नाम उसके शिल्पकार के नाम पर रखा गया और इस मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक विशेषता है कि इसका निर्माण ऐसे पत्थरों से हुआ है जो पानी में तैरते हैं। ऐसे पत्थर आज कहीं नहीं पाए जाते हैं। ऐसे में यह आज भी रहस्य है कि इस मंदिर के निर्माण के लिए ये पत्थर आए कहाँ से?

इतिहास

तेलंगाना में तत्कालीन काकतीय वंश के महाराजा गणपति देवा ने सन् 1213 के दौरान एक भव्य एवं विशाल शिव मंदिर के निर्माण का निर्णय लिया। गणपति चाहते थे कि इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया जाए कि आने वाले कई वर्षों तक इसका गुणगान होता रहे। मंदिर निर्माण का कार्य उन्होंने अपने शिल्पकार रामप्पा को दिया। रामप्पा ने भी अपने महाराजा द्वारा दिए गए आदेश का अक्षरशः पालन किया और एक भव्य एवं सुंदर मंदिर का निर्माण किया। मंदिर की सुंदरता को देखकर महाराजा गणपति इतने प्रसन्न हुए कि मंदिर का नामकरण रामप्पा के नाम से ही कर दिया। तभी भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर रामप्पा मंदिर कहा जाने लगा।

वेंकटपुर मण्डल के मुलुग तालुक में स्थित रामप्पा मंदिर को 13 वीं शताब्दी में भारत आए इटली के मशहूर खोजकर्ता मार्को पोलो ने ‘मंदिरों की आकाशगंगा का सबसे चमकीला तारा’ कहा था। 40 साल में बनकर तैयार हुआ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है जिन्हें रामलिंगेश्वर भी कहा जाता है। मुख्य मंदिर परिसर 6 फुट ऊँचे एक प्लेटफॉर्म पर बना हुआ है। शिखर और प्रदक्षिणा पथ मंदिर की संरचना के प्रमुख अवयव हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही, नंदी मंडपम है जहाँ नंदी की एक विशाल प्रतिमा है।

विशेष बातें

अक्सर हमने देखा है कि भारत के प्राचीन मंदिरों के नाम उन्हें बनवाने वाले राजा अथवा मंदिर में विराजमान देवताओं के पौराणिक नामों से संबंधित होते हैं। लेकिन तेलंगाना पर्यटन विभाग के अनुसार रामप्पा मंदिर संभवतः देश का इकलौता ऐसा मंदिर है, जिसका नामकरण उसे बनने वाले मुख्य शिल्पकार के नाम पर हुआ। यह महान काकतीय राजाओं के उस सम्मान को प्रदर्शित करता है जो उन्होंने एक महान कलाकार के प्रति दिखाया।

इसके अलावा मंदिर अपनी उस विशेषता के लिए भी प्रसिद्ध है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। मंदिर लगभग 800 सालों तक बिना किसी नुकसान के खड़ा रहा। ऐसे में लोगों के मन में यह प्रश्न आया कि इसके बाद बने मंदिर (इस्लामिक आक्रान्ताओं से बचे हुए) अपने पत्थरों के भार से खुद ही क्षतिग्रस्त हो गए, लेकिन यह मंदिर उसई अवस्था में आज भी कैसे है। इस रहस्य का पता लगाने के लिए पुरातत्व विभाग मंदिर पहुँचा। विभाग द्वारा जाँच के उद्देश्य से मंदिर से एक पत्थर के टुकड़े को काटा गया और उसकी जाँच की गई। यह पत्थर भार में अत्यंत हल्का था। इस पत्थर की सबसे बड़ी विशेषता थी कि आर्कमिडीज के सिद्धांत के विपरीत यह पानी में तैरता है।

यही करण था कि जहाँ एक ओर बाकी मंदिर अपने पत्थरों के भार के करण ही क्षतिग्रस्त हो गए, वहीं यह मंदिर हल्के पत्थरों के कारण उसी अवस्था में रहा जैसा बनाया गया था। लेकिन यह रहस्य सुलझा नहीं था बल्कि और भी गहरा हो गया था क्योंकि राम सेतु के अलावा ऐसे पत्थर पूरी दुनिया में कहीं नहीं हैं जो पानी में तैरते हों और यह एक बड़ा प्रश्न बन गया कि आज से 800 साल पहले आखिरकार पानी में तैरने वाले पत्थर इतनी बड़ी संख्या में कहाँ से आए? एक प्रश्न भी अब विशेषज्ञों के मन में घर कर गया कि क्या रामप्पा ने खुद इन पत्थरों का निर्माण किया था?

कैसे पहुँचे

वारंगल में ही हवाई अड्डा मौजूद है जो रामप्पा मंदिर से लगभग 70 किमी की दूरी पर है। यहाँ से देश के सभी बड़े शहरों के लिए उड़ानें उपलब्ध हैं। रेलमार्ग से भी वारंगल देश के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। यहाँ दो रेलवे स्टेशन हैं, एक वारंगल में और दूसरा काजीपेट में। रामप्पा मंदिर से वारंगल स्टेशन की दूरी लगभग 65 किमी है, जबकि काजीपेट जंक्शन मंदिर से लगभग 72 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा वारंगल राष्ट्रीय राजमार्ग 163 और 563 पर स्थित है। साथ ही यहाँ से होकर राज्यमार्ग 3 भी गुजरता है। वारंगल पहुँचने के बाद रामप्पा मंदिर तक पहुँचने के लिए बड़ी संख्या में परिवहन के साधन उपलब्ध हैं। UNESCO की विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल होने के बाद अब यहाँ सुविधाओं का और भी अधिक विस्तार किया जाना निश्चित है।

कारगिल के 22 साल: ‘फर्ज पूरा होने से पहले मौत आई तो प्रण लेता हूँ मैं मौत को मार डालूँगा’

वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान की घुसपैठिया सेना को हरा कर कारगिल विजय हासिल की थी। कारगिल, द्रास, मशकोह, बटालिक जैसी अति दुर्गम घाटियों में पाकिस्तान की सेना से लड़ते हुए भारतीय सेना (वायुसेना समेत) के 527 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन्हीं में से एक नाम है इस विजय की नींव रखने वाले कैप्टन मनोज पांडे का, जिनकी कारगिल युद्ध में दिखाई गई बहादुरी के किस्से हर किसी के रोंगटे खड़े कर देते हैं।

एनडीए के इंटरव्यू में ही परमवीर चक्र पाने का सपना देखकर भारतीय सेना में शामिल होने वाले जाँबाज मनोज पांडे ने ना केवल यह सम्मान हासिल किया, बल्कि देश की एक बड़ी विजय के सूत्रधार भी बने। हालाँकि जब परमवीर चक्र मिला तो उसे लेने के लिए वे स्वयं मौजूद नहीं थे। उनके पिता श्री गोपी चंद पांडे ने 26 जनवरी, 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से सम्मान ग्रहण किया। मनोज को भगवद् गीता पढ़ना और बाँसुरी बजाना भी बहुत पसंद था। उनके बक्से में बाँसुरी हमेशा रहती थी।

“मेरा बलिदान सार्थक होने से पहले अगर मौत दस्तक देगी तो संकल्प लेता हूँ कि मैं मौत को मार डालूँगा।”

ये शब्द उस योद्धा कैप्टन मनोज कुमार पांडे के थे जिसने मात्र 24 साल की उम्र में ही कारगिल युद्ध में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। वीरगति को प्राप्त होने से पहले ही वो कारगिल जंग की जीत की बुनियाद रख चुके थे।

घर जाना था पर कारगिल से आया बुलावा

गोरखा रेजीमेंट के कैप्टन मनोज कुमार पांडे सियाचिन में तैनाती के बाद छुट्टियों पर घर जाने की तैयारी में थे। अचानक 2-3 जुलाई की रात उन्हें बड़े ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई। खालुबार टॉप सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इलाका था। यह जगह पाकिस्तानी सैनिकों के लिए एक तरह का कम्यूनिकेशन हब भी था। भारतीय सेना का मानना था कि अगर वहाँ से पाकिस्तानी सैनिक खदेड़ दिए जाएं तो उनके अन्य ठिकाने भी मुश्किल में पड़ जाएँगे। इससे उन्हें वापस भागने में भी समस्या होगी।

खालुबार पोस्ट सबसे मुश्किल लक्ष्य

कैप्टन मनोज कुमार पांडे को खालुबार पोस्ट फतह करने की जिम्मेदारी मिली। रात के अंधेरे में मनोज कुमार पांडे अपने साथियों के साथ दुश्मन पर हमले के लिए कूच कर गए। दुश्मन ऊँचाई पर छिपा बैठा था और नीचे के हर मूवमेंट पर नजर रखे हुए था। वहाँ से वे रॉकेट लाँचर और ग्रेनेड लाँचर का इस्तेमाल कर रहे थे।

भारतीय सैनिकों के ऊपर लगभग 60-70 मशीनगन लगातार फायरिंग कर रहीं थीं। साथ ही गोले भी बरस रहे थे। जिस कारण यह बिल्कुल भी आसान लक्ष्य नहीं था। एक बेहद मुश्किल जंग के लिए मनोज कुमार अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे। इस दौरान कैप्टन मनोज पांडे के साथ रहे सैनिक बताते हैं कि ठण्ड में राइफ़ल के ब्रीचब्लॉक को जाम होने से बचाने के लिए वे उसे अपने ऊनी मौजे से ढक कर आगे बढ़ रहे थे ताकि वो गरम रहे।

खालुबार टॉप

सिर्फ 4 बंकर का था अंदाजा, लेकिन...

पाकिस्तानी सेना को मनोज पांडे के मूवमेंट का जैसे ही पता चला उसने ऊँचाई से फायरिंग शुरू कर दी। लेकिन फायरिंग की परवाह किए बिना कैप्टन मनोज काउंटर अटैक करते और हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए आगे बढ़ते गए। सबसे पहले उन्होंने खालुबार की पहली पोजीशन से दुश्मन का सफाया करने का प्लान बनाया। सेना वहाँ पर मात्र चार बंकर होने का अंदाजा लगाकर चल रही थी, लेकिन मनोज ने ऊपर जा देखा तो 6 बंकर थे। हर बंकर से दो-दो मशीनगन भारतीय सेना के ऊपर फायरिंग कर रही थी। थोड़ी दूरी पर स्थित दो बंकरों को उड़ाने के लिए मनोज ने हवलदार दीवान को भेजा। दीवान ने उन बंकरों को तबाह कर दिया। लेकिन इस बीच गोली लगने से वे वीरगति को प्राप्त हो गए।

बंकर को उड़ाने का मात्र एक ही तरीका होता है कि उसके लूप होल में ग्रेनेड डालकर उसमें बैठे लोगों को ख़त्म किया जाए। बाकी के 4 बंकरों को ठिकाने लगाने के लिए मनोज पांडे और उनके साथी ज़मीन पर रेंगते हुए बंकरों के पास पहुँच गए। इसके बाद कैप्टन मनोज ने एक-एक कर 3 बंकर ध्वस्त किए, लेकिन चौथे बंकर में ग्रेनेड फेंकते वक़्त उनके शरीर के बाँए हिस्से में कुछ गोलियाँ लगीं, जिससे वो लहूलुहान हो गए।

गोली लगने के बाद जब मनोज पांडे को उनके साथियों ने वहीं रुकने को कहा तो उन्होंने जवाब दिया ‘उन्हें अपने अधिकारियों को आखिरी बंकर को ध्वस्त करने के बाद विजयी निशान दिखाना है’। लहूलुहान होने के बावजूद उन्होंने बंकर में ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की। पाकिस्तानी सैनिकों ने उन्हें देख लिया और फायरिंग शुरू कर दी। मनोज पांडे के सिर में 4 गोलियाँ लगी जिससे उनके सर का एक हिस्सा गायब हो गया। लेकिन इसी दौरान अन्य भारतीय सैनिक उस बंकर को तबाह करने में सफल रहे।

मनोज पांडे एक बंकर से दूसरे बंकर अटैक करते हुए आगे बढ़ रहे थे। शरीर से ज्यादा खून बह जाने की वजह से वे अंतिम बंकर पर पस्त पड़ गए। उनके आँखें बंद करने से पहले खालुबार पोस्ट पर तिरंगा लहरा रहा था। जब मनोज पांडे को गोलियाँ लगीं, तब उनकी उम्र मात्र 24 साल और 7 दिन थी।

यकीनन वो अपनी कही हुई बात के साथ ही विदा हुए। हमेशा के लिए आँखें बंद करने से पहले ही वो अपने फर्ज को पूरा कर चुके थे, उन्होंने लहूलुहान शरीर से ही आखिरी बंकर को उड़ाने का हौसला दिखाया।

मरने से पहले उनके अंतिम शब्द थे- ‘ना छोड़नू’। इस नेपाली भाषा का हिंदी में अर्थ होता है- “उन्हें मत छोड़ना।” जब कैप्टन मनोज ने आखिरी साँस ली, तब उनके पास उनकी खुखरी, काले रंग की डिजिटल घड़ी और एक बटुआ था। उस बटुए में 156 रुपए थे।

इस पूरे मिशन का नेतृत्व कर रहे कर्नल ललित राय के पैरों में भी गोली लगी थी। कर्नल रॉय ने जब खालुबार पर भारतीय झंडा फहराया, तो उस समय उनके पास मात्र 8 जवान ही शेष थे, बाकी लोग या तो बलिदान हो चुके थे, या फिर घायल थे। जब-जब भारतीय सेना के वीरों का जिक्र होगा, ‘बटालिक के हीरो’ (Hero of Batalik) मनोज कुमार पांडे याद आएँगे।

‘चलाने की पूरी कोशिश की लेकिन..’: पूर्व पोर्न स्टार मिया खलीफा ने किया तलाक का ऐलान, कहा – बधाई दो, सॉरी मत कहो

पूर्व पोर्न स्टार मिया खलीफा ने अपने पति रॉबर्ट सैंडबर्ग के साथ तलाक की घोषणा की है। हाल ही में उन्होंने इंस्टाग्राम के माध्यम से अपने पति के साथ तलाक का ऐलान किया। बता दें कि मिया खलीफा और रॉबर्ट सैंडबर्ग की सगाई 2019 में हुई थी, जिसके बाद वो 2 सालों से साथ रह रहे थे। जून 2020 में इन दोनों की शादी होने वाली थी, लेकिन कोरोना आपदा आ जाने के कारण ऐसा नहीं हो सका।

मिया खलीफा ने तलाक की घोषणा करते हुए लिखा, “हम पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि हमने हमने अपनी शादी को चलाने के लिए अपना सब कुछ दिया, लेकिन पिछले 1 साल से चल रही थेरेपी और मेहनत के बावजूद हम अपना रास्ता अलग कर रहे हैं। हम जानते हैं कि जीवन भर हम एक-दूसरे के दोस्त रहेंगे और हमने साथ रहने का पूरा प्रयास किया। हम हमेशा एक-दूसरे से प्यार और सम्मान करेंगे, क्योंकि हमें पता है कि किसी एक घटना के कारण ऐसा नहीं हो रहा है।”

मिया खलीफा ने पति रॉबर्ट सैंडबर्ग के साथ तलाक की वजह बताते हुए कहा कि दोनों के बीच कुछ ऐसे मतभेद आ गए थे, जिनका समाधान संभव नहीं था और वो चरम पर पहुँच गए थे। उन्होंने कहा कि दोनों अपने जीवन का अलग-अलग अध्याय शुरू कर रहे हैं, लेकिन परिवार के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे। साथ ही कहा कि उन्हें इसका कोई मलाल नहीं। मिया खलीफा ने कहा कि परिवार के अलावा कुत्तों से प्यार और दोस्त वो माध्यम हैं, जो उन्हें जोड़े रखेंगे।

बकौल मिया खलीफा, दोनों अलग होने के बाद भी ये आराम से कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी-अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि वो साथ रहें। इसके बाद उन्होंने एक ट्वीट कर के कहा कि हमें तलाक के बाद बधाई देने को एक सामान्य प्रक्रिया बनानी चाहिए, न कि ‘आई एम सॉरी’ कहने की। बता दें कि रॉबर्ट सैंडबर्ग स्वीडन के रहने वाले हैं। वो पेशे से शेफ हैं। 26 वर्षीय सैंडबर्ग नॉर्वे के एक रेस्टॉरेंट में काम करते थे, जिसके बाद वो लॉस एंजेल्स में शिफ्ट हुए।

तलाक को लेकर मिया खलीफा का इंस्टाग्राम पोस्ट

मिया खलीफा हाल ही में कई कारणों से विवादों में रही हैं। कुछ दिनों पहले क्यूबा ने आरोप लगाया था कि पूर्व पोर्न स्टार मिया खलीफा अमेरिका के साथ मिल कर वहाँ दंगे भड़काने में लगी हुई हैं। क्यूबा ने राष्ट्रपति मिगेल डियाज़ कनेल बेरमुडेज़ ने आरोप लगाया था कि अमेरिका के साथ मिल कर मिया खलीफा क्यूबा की वामपंथी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को हवा देने में लगी हुई हैं। भारत में ‘किसान आंदोलन’ का समर्थन कर के भी वो विवादों में आई थीं।

मेट्रो स्टेशन पर युवती ने की आत्महत्या करने की कोशिश, पुलिस ने कुछ ऐसे बचाई जान: देखें वीडियो

दिल्ली से सटे फरीदाबाद के सेक्टर-28 मेट्रो स्टेशन पर पुलिस की सूझबूझ के कारण बड़ा हादसा होने से टल गया। बताया जा रहा है कि एक लड़की परेशान होकर शनिवार (24 जुलाई) को मेट्रो स्टेशन से कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश कर रही थी। उसी समय पुलिस ने अपनी जान जोखिम में डालकर लड़की को खुदकुशी करने से बचा लिया। इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि किस तरह एक लड़की मेट्रो स्टेशन की दीवार से कूदने की कोशिश कर रही है। उसी वक्त एक पुलिसकर्मी वहाँ पर पहुँचता है और बेहद सतर्कता, सूझबूझ और होशियारी के साथ उसे कूदने से रोक लेता है।

फोटो : nd9.in

पुलिस ने लड़की को बचाने के बाद मेट्रो पुलिस स्टेशन को सौंप दिया। उन्होंने लड़की के ​परिवार वालों को इसकी सूचना दी और उन्हें थाने बुलाया। लड़की दिल्ली की रहने वाली है और फरीदाबाद की एक निजी एक्सपोर्ट कंपनी में काम करती है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि लड़की अपने प्रेमी से नाराज होकर यह खौफनाक कदम उठा रही थी। वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट में कह रही हैं कि लड़की अपने काम को लेकर परेशान थी और बेहद तनाव में थी, इसी वजह से वह मेट्रो स्टेशन से छलांग लगाकर आत्महत्या करना चाहती थी।

बता दें कि यह घटना 24 जुलाई को शाम करीब 6:30 बजे हुई थी। इस घटना का वीडियो फरीदाबाद पुलिस टीम ने अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किया था। उन्होंने ट्वीट में लिखा, ”ऐसा फिल्मों में भी नहीं होता। जान देने पर आमादा लड़की को जान हथेली पर रखकर बचाया। जाँबाज पुलिसकर्मी को बधाई।” रेस्क्यू मिशन का वीडियो न केवल वायरल हो गया है, बल्कि नेटिजन्स का दिल भी जीत रहा है। लोगों ने पुलिस टीम को उनके प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया है।

कोरोना के कारण काँवड़ यात्रा प्रतिबंधित, नियम तोड़ने वाले 14 काँवड़ियों के खिलाफ उत्तराखंड में मामला दर्ज

कोरोना महामारी के चलते इस साल उत्तराखंड सरकार ने काँवड़ यात्रा को प्रतिबंधित कर दिया है। इसी बीच कुछ लोगों द्वारा नियम तोड़ने की खबर सामने आई है। समाचार न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) के मुताबिक, अभय प्रताप सिंह, सीओ सिटी हरिद्वार ने बताया कि काँवड़ यात्रा को कोविड-19 के चलते प्रतिबंधित किया गया है। इसके बावजूद रविवार (25 जुलाई) को हर की पौड़ी पर कुछ लोगों द्वारा नियम तोड़ने का प्रयास किया गया।

उन्होंने बताया कि नियम तोड़ने वाले 14 लोगों को पकड़कर आपदा अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही इन सबको क्वारंटाइन भी किया गया है।

गौरतलब ​है कि बीते दिनों उत्तराखंड के डीजीपी अशोक कुमार ने प्रदेश के पड़ोसी राज्यों से आने वाले काँवड़ियों से अनुरोध किया है कि वह कांवड़ लेकर उत्तराखंड के किसी भी शहर में प्रवेश न करें। उन्होंने कहा कि हरिद्वार में कांवड़ियों की एंट्री पर प्रतिबंध लगाया गया है। सावन महीने में यूपी-उत्तराखंड बॉर्डर सील कर दिया जाएगा।

यूपी के बेस्ट सीएम उम्मीदवार हैं योगी आदित्यनाथ, प्रियंका गाँधी सबसे फिसड्डी, 62% ने कहा ब्राह्मण भाजपा के साथ: सर्वे

अगले साल फरवरी-मार्च में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है। चुनाव से कुछ महीने पहले मतदाताओं का मिजाज जानने के लिए Matrise News Communication नामक की एक निजी कंपनी ने किया है। इस सर्वे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री बताया गया है, जबकि कॉन्ग्रेस की उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गाँधी सबसे निचले पायदान पर रहीं।

सर्वे के अनुसार, प्रदेश के 43% लोगों ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में दोबारा देखना चाहते हैं, जबकि 14% लोगों ने प्रियंका गांधी के पक्ष में अपना समर्थन जाहिर किया। वहीं, राज्य के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी (सपा) के सुप्रीमो अखिलेश यादव के पक्ष में क्रमशः 21% और 20% लोगों ने अपना वोट दिया।

सर्वे के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 46% लोगों ने राज्य का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वाला मुख्यमंत्री बताया है। वहीं, 28% वोटों के साथ बसपा की मायावती दूसरे और 22% वोटों के साथ अखिलेश यादव तीसरे स्थान हैं।

सर्वे में शामिल लोगों से कोविड-19 महामारी से संबंधित उनकी राय ली गई। इस दौरान 45% लोगों ने कहा कि कोविड-19 की दूसरी लहर से लड़ने में योगी आदित्यनाथ के प्रयास से वे ‘बहुत अधिक संतुष्ट’ हैं, जबकि 28% लोगों ने ‘कुछ हद तक संतुष्ट’ बताया। कुल मिलाकर 73% लोगों ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी कोविड-19 की दूसरी लहर को सँभालने में सफल रहे।

इसके अलावा, कई अन्य मानदंड भी थे, जिनके आधार पर सर्वे किया गया। इनमें से एक दलित वोट से जुड़े सवाल भी थे। सर्वे में शामिल लोगों से जब ‘दलित वोटरों का पार्टीवार मतदान रुझान’ के बारे में पूछा गया तो इसमें मायावती की बसपा को थोड़ी बढ़त मिली। वहीं, 43% लोगों ने महसूस किया कि दलित भाजपा को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं, जबकि 45% लोगों ने बसपा के पक्ष में मतदान किया।

इसके अलावा, जब लोगों से पूछा गया कि ‘क्या भाजपा से दलित नाखुश हैं’, इसके पक्ष में 42% लोगों ने उत्तर दिया।

इसी तरह, जब राज्य के ब्राह्मण वोटों को लेकर सवाल पूछे गए तब 64% लोगों ने माना कि आगामी विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण समुदाय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा का समर्थन करेगा। वहीं, 12% लोगों का मानना था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2022 से पहले कॉन्ग्रेस ब्राह्मण समुदाय को लुभा सकती है। वहीं, 62% लोगों ने अगले विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण वोटरों की भाजपा से नाराजगी को सिरे से नकार दिया।

उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के संबंध में पूछे जाने पर 52% यानि आधे से अधिक लोगों ने माना कि योगी आदित्यनाथ सरकार की सरकार में महिलाओं की सुरक्षा तुलनात्मक रूप से बेहतर रही। वहीं, 34% लोगों ने महसूस किया कि बसपा शासन में महिलाएँ अधिक सुरक्षित रहीं, जबकि 12% ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार के पक्ष में मतदान किया।

सर्वे में उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों को लेकर भी सवाल किया गया। सवाल पूछा गया कि ‘कोविड की दूसरी लहर के बाद जुलाई 2021 में अगर उत्तर प्रदेश में आज ही लोकसभा चुनाव हों तो आप किस पार्टी को अपना मत देंगे?, तो 48% लोगों ने भाजपा को वोट देने की बात कही। इस हिसाब से उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 62-65 सीटों पर भाजपा की जीत बताई गई।

दरअसल, 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद योगी आदित्यनाथ को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था। इस दौरान विधानसभा की कुल 403 सीटों में से भाजपा ने 319 सीटें जीती थीं। वहीं, दो मुख्य विपक्षी पार्टियाँ सपा और बसपा को क्रमश: 47 और 19 सीटें ही मिली थीं। इस बीच, कांग्रेस पार्टी ने बमुश्किल 7 सीटों पर जीत हासिल कर अपनी इज्जत बचा पाई थी।

असम को पसंद आया विकास का रास्ता, आंदोलन, आतंकवाद और हथियार को छोड़ आगे बढ़ा राज्य: गृहमंत्री अमित शाह

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पूर्वोत्तर के दो दिन के दौरे पर हैं। रविवार को शाह ने असम में कई प्रमुख योजनाओं का उद्घाटन किया। अपनी पूर्वोत्तर यात्रा के दूसरे दिन रविवार को असम की राजधानी गुवाहाटी में कोरोना से जान गवाने वाले व्यक्तियों के परिजनों को केंद्रीय गृहमंत्री ने एक-एक लाख रुपए के चेक प्रदान किए। असम राइफल्स के जवानों से मुलाकात की।

शाम को कार्यक्रमों को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि असम में दूसरी बार अपने बल पर भाजपा की सरकार बनी है। असम में दूसरी बार भाजपा की सरकार बनने का मतलब है कि असम ने आंदोलन, आतंकवाद और हथियार तीनों को हमेशा के लिए छोड़कर विकास के रास्ते पर जाना तय किया है।

अमित शाह ने कहा कि जिस प्रकार से पाँच वर्ष में सर्बानंद सोनोवाल और हिमंत बिस्वा सरमा की जोड़ी ने सरकार चलाई है। असम की जनता को विकास का रास्ता पसंद आया और उसी का परिणाम है कि हिमंता बिस्व सरमा आज फिर से सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। मैं असम की टीम को सरमा की दूसरी पारी के लिए बधाई देता हूँ।

केंद्रीय गृहमंत्री ने आगे कहा, “भाजपा असम की भाषा इसकी विरासत और इसकी जैविक संस्कृति की रक्षा और संरक्षण करना चाहती है। भाजपा का मानना है कि भाषाएँ, बोलियाँ, व्यंजन और ऐसे ही अन्य लक्षण भारत के रत्न हैं और हमें उन्हें संरक्षित करने की जरूरत है।”

हाल ही में केंद्र में हुए कैबिनेट विस्तार पर बोलते हुए शाह ने कहा कि यह अभूतपूर्व है कि सरकार की कैबिनेट में 5 मंत्री पूर्वोत्तर भारत से आते हैं। पीएम मोदी ने पूर्वोत्तर में नई विकास के रस्ते की शुरुआत की है। उन्होंने सात वर्षों में 35 बार इस क्षेत्र का दौरा किया है। किसी अन्य पीएम ने इतनी बार इस क्षेत्र की यात्रा नहीं की है।

शाह ने कहा, “आजादी के बाद से एक बार भी पूर्वोत्तर के 5 मंत्रियों को कैबिनेट में नहीं चुना गया है। ऐसा पहली बार पीएम मोदी के कैबिनेट में किया गया है। इससे पता चलता है कि बीजेपी और पीएम मोदी की प्राथमिकताओं में नॉर्थ ईस्ट कहाँ स्थान रखता है। हम विकास में पूर्वोत्तर का योगदान बढ़ाना चाहते हैं।”

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, “पीएम मोदी के नेतृत्व में बोडोलैंड समझौता हुआ था। हम समझौते की 90 फीसद शर्तें पहले ही दे चुके हैं। साथ ही कहा कि मोदी सरकार में हुए कई समझौतों के तहत पूर्वोत्तर के 2,100 से अधिक लोगों ने अपने हथियार छोड़े हैं। मोदी सरकार के कामकाज के तरीके ने असम के लिए नैरेटिव को बदल दिया है। उन्हें विकास के लिए विद्रोह की जरूरत नहीं है, उन्हें सिर्फ सहयोग प्रदान करने की जरूरत है।”

दिलशेर ने दिनेश बनकर 13 साल की किशोरी को प्रेमजाल में फँसाकर किया अपहरण, धर्मांतरण कराकर निकाह करने का था प्लान

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में लव जिहाद का नया मामला सामने आया है। किशनपुरा की रहने वाली एक नाबालिग को मुस्लिम युवक ने पहले नाम बदलकर अपने प्रेमजाल में फँसाया फिर कुछ दिन बाद उसका अपहरण कर लिया। हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने इस मामले को लेकर पुलिस थाने में रविवार (25 जुलाई) को कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए हंगामा किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, युवती का अपहरण तीन दिन पहले यानी शुक्रवार (23 जुलाई) को किया गया था। पुलिस ने हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं द्वारा हंगामा करने के बाद आरोपित दिलशेर पुत्र फैजान को अलीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, किशोरी को भी बरामद कर लिया है।

बताया जा रहा है कि 13 वर्षीय किशोरी इंदिरा मार्केट के रहने वाले दिलशेर पुत्र फैजान के संपर्क में आ गई थी। दिलशेर ने दिनेश बनकर पहले किशोरी को अपने प्रेमजाल में फँसा लिया। इसके बाद आरोपित ने उसे शुक्रवार रात को बर्गर खाने के बहाने अपने घर से बुलाया और फिर उसे एक कार में डालकर अपने साथ अलीगढ़ ले गया। आरोपित किशोरी का धर्मांतरण कर उससे निकाह करने की फिराक में था। लेकिन वह अपने मंसूबों में कामयाब न हो सका।

किशोरी ने पुलिस को बताया कि वह उसे जबरन अपने साथ ले गया था। दिलशेर ने उसे अपना नाम दिनेश बताया था। आज सुबह इस मामले को लेकर हिंदू जागरण मंच के महानगर अध्यक्ष प्रदीप ठाकुर, प्रांत संपर्क प्रमुख सूर्यकांत राणा, महामंत्री अश्वनी समेत दर्जनों लोग थाने पहुँचे और वहाँ हंगामा किया। शहर कोतवाली प्रभारी पंकज पंत ने मामला शांत कराते हुए बताया कि मुकदमा दर्ज कर लिया है और आरोपित को जेल भेजा जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित एक महिला नेता का भाई है। यह महिला नेता विधानसभा चुनाव भी लड़ चुकी है। उसने अपने भाई को छुड़ाने के लिए थाना पुलिस पर भी दबाव बनाया, लेकिन वह उसे छुड़ा नहीं पाई। एसपी सिटी राजेश कुमार ने बताया कि अपहरण का केस दर्ज कर लिया गया है। पुलिस ने आरोपित और किशोरी को बरामद कर लिया है।