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शाहजहाँ को 75% हिन्दू बताने वाले जावेद अख्तर, वाराणसी में 76 मंदिर किसने गिरवाए थे? ओरछा का मंदिर किसने तोड़ा?

वो पहले फिल्मों की कहानियाँ व पटकथा लिखते थे, जिसमें ब्राह्मणों को मजाकिया ढंग से दिखाया जाता था और मौलवियों के लिए इज्जत बढ़ाने वाले किरदार गढ़े जाते थे। फिर वो गीतकार बन बैठे। अकबर की तारीफ़ में ‘अजीमो-शाह-शहंशाह’ जैसे गाने लिखे। अब वो ट्विटर ट्रोल हो गए हैं। नाम है – जावेद अख्तर। खुद को नास्तिक कहते हैं, नास्तिकों वाला अवॉर्ड लेते हैं। लेकिन, इस्लामी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए शाहजहाँ और बराक ओबामा की तुलना करते हैं।

जावेद अख्तर ने एक ट्वीट किया। इसमें उन्होंने लिखा, “अमेरिकी राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा केन्या से ताल्लुक रखते थे। उनकी चाचियाँ अब भी केन्या में रहती हैं। लेकिन, चूँकि ओबामा का जन्म अमेरिका में हुआ था, इसीलिए उन्हें वहाँ का राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का अधिकार मिला। वहीं शाहजहाँ भारत में मुगलों की पाँचवीं पीढ़ी का था। उसकी माँ और दादी राजपूत समुदाय से थीं। लेकिन, वो शाहजहाँ को विदेशी कहते हैं।”

सबसे पहले बात बराक ओबामा के बारे में करते हैं, जो अमेरिका के पहले ‘अश्वेत’ राष्ट्रपति थे। हाँ, उनके पिता केन्या से थे। उनके पिता बराक ओबामा सीनियर केन्या के एक सफल अर्थशास्त्री थे। उनकी माँ एन्न डनहम अमेरिका की एक मानव-विज्ञानी (Anthologist) थीं। 2008 में राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार के दौरान बराक ओबामा ने कहा था कि वो एक केन्याई ‘अश्वेत पिता’ और अमेरिकी ‘श्वेत माँ’ की संतान हैं।

क्या शाहजहाँ ने कहीं भी खुद को ‘हिन्दू’ बताया है या खुद के हिन्दू होने पर गर्व किया है? नहीं। जावेद अख्तर ने अपनी ट्वीट में लिखा है कि माँ और दादी के हिन्दू होने के कारण शाहजहाँ का खून 75% हिन्दू था। अगर शाहजहाँ 75% हिन्दू था तो फिर जावेद अख्तर उसे हिन्दू ही क्यों नहीं कहते? क्या 25% मुस्लिम भी मुस्लिम होता है? बराक ओबामा की तरह कभी शाहजहाँ ने कहा या लिखा है कि उसे अपनी माँ के हिन्दू होने पर गर्व है?

सबसे पहले तो बराक ओबामा को शरणार्थी, घुसपैठिया और आक्रांता के बीच का अंतर समझना चाहिए। हम उनकी मदद कर देते हैं। जैसे, पाकिस्तान से प्रताड़ित हिन्दू यहाँ अपनी जान बचाने के लिए आते हैं तो वो शरणार्थी हुए, क्योंकि अधिकारियों को इसकी जानकारी होती है और वो चोरी-छिपे नहीं आते। म्यांमार और बांग्लादेश से जो रोहिंग्या मुस्लिम यहाँ आकर फर्जी आईकार्ड लेकर बस जाते हैं और अपराध करते हैं, वो घुपैठिए हैं।

अब आ जाइए आक्रांता पर। एक आक्रांता वही है, जो किसी दूसरे प्रदेश में जाकर वहाँ का सत्ताधीश बन बैठता है। जो किसी दूसरे प्रदेश पर कब्जे के इरादे से हमला करता है। हिंसा करता है। भारत के इस्लामी आक्रांताओं का इतिहास देखें तो वो धर्मांतरण करवाते थे, तलवार के दम पर। हिन्दुओं का नरसंहार करते थे। मंदिरों को ध्वस्त करते थे। देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को विखंडित करते थे।

क्या शाहजहाँ की तुलना बराक ओबामा से हो सकती है? पहले जानते हैं कि शाहजहाँ ने क्या किया था। ओरछा एक जगह है। ये मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित है। एकमात्र ऐसा मंदिर है यहाँ, जहाँ श्रीराम की पूजा राजा के रूप में होती है। सन् 1627 में महाराजा बीर सिंह देव के निधन के बाद उनके बेटे जुझार सिंह गद्दी पर बैठे। उधर शाहजहाँ गद्दी पर बैठे। नए मुग़ल बादशाह पर उन्हें संदेह था, इसीलिए अपने पिता के विपरीत मुगलों से दूरी बना ली।

शाहजहाँ के शासन काल का ये शुरुआती दौर था, ऐसे में उसने इस विद्रोह से सख्ती से निपटने का फैसला करते हुए फ़ौज की तीन बड़ी टुकड़ियों को ओरछा भेजा। खुद आगरा से ग्वालियर में बैठ कर वो युद्ध का निरीक्षण करने लगा। ओरछा के सिंहासन पर बिठाने के लिए एक दूसरा दावेदार ले आया। जुझार सिंह को बातचीत की मेज पर आना पड़ा। कुछ दिनों बाद फिर विद्रोह हुआ। अबकी शाहजहाँ ने बेटे औरंगजेब को वहाँ स्थिति सुलझाने के लिए भेजा।

जुझार सिंह को जंगलों में शरण लेनी पड़ी, जहाँ गोंड एवं भील विरोधियों ने उसे मार डाला। मुग़ल सैनिकों ने जुझार सिंह का सिर काट कर और उसके खजाने से 1 करोड़ रुपए शाहजहाँ को उपहार के रूप में भेजे। इसके बाद उसने इसका ‘दंड’ हिन्दुओं को देने का निश्चय किया। ओरछा में राजा राम के प्रमुख मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया। लोगों पर अत्याचार हुए। जुझार सिंह के पोते को जबरन इस्लाम कबूलवाने को मजबूर किया गया।

अपनी पुस्तक ‘A Short History of the Mughal Empire‘ में माइकल फिशर (Michael Fisher) ने इस घटना का जिक्र किया है। ओरछा के चतुर्भुज मंदिर का खजाना भी लूट लिया गया। इतना ही नहीं, ‘बादशाहनामा’ में इसका जिक्र है कि शाहजहाँ ने काशी में निर्माणाधीन या बन कर तैयार हो चुके 76 मंदिरों को ध्वस्त करवा दिया था। उसके राज में मंदिर के निर्माण पर पूरी तरह पाबंदी लगी हुई थी।

अब जावेद अख्तर जवाब दें कि क्या कभी बराक ओबामा ने अमेरिका में किसी चर्च को ध्वस्त किया? क्या बराक ओबामा ने कभी ईसाई धर्म को भला-बुरा कहा? इन सबका जवाब है – नहीं। बराक ओबामा तो खुद ही एक प्रैक्टिसिंग ईसाई हैं। वो कह चुके हैं कि जीसस के उपदेशों के कारण उनका झुकाव ईसाई धर्म की तरफ हुआ। उनका पालन-पोषण ईसाई माहौल में हुआ। ओबामा ही नहीं, अमेरिका में आज तक जितने भी राष्ट्रपति हुए हैं, सब ईसाई ही रहे हैं।

क्या किसी देश में जन्म लेने भर से किसी आक्रांता का वंशज वहाँ का हो जाता है, भले ही वो वहाँ की कला, संस्कृति, परंपराओं और धर्म को नष्ट करने में लगा हुआ हो? जिसे हिन्दू राजाओं का सिर कलम करवाने में मजा आता हो? बराक ओबामा से शाहजहाँ की तुलना बस एक छलावा है। वैसे भी शाहजहाँ की छवि इन मुगलपरस्तों ने ‘एक रोमांटिक राजा’ की बनाई हुई है, सिर्फ इसीलिए क्योंकि मुमताज से उसने शादी की थी।

बराक ओबामा को अमेरिका की संस्कृति से प्रेम है, लेकिन शाहजहाँ को मंदिरों से नफरत थी। बराक ओबामा ईसाई हैं और अमेरिका में 70% ईसाई रहते हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा ईसाई अमेरिका में ही रहते हैं। बराक ओबामा को ‘यूनाइटेड चर्च ऑफ क्राइस्ट (UCC)’ में बाप्टाइज किया गया था, जबकि शाहजहाँ मंदिरों को ध्वस्त करता था। जावेद अख्तर ने एक इस्लामी कट्टरपंथी आक्रांता से एक राष्ट्राध्यक्ष से तुलना कर दी, जो जनता का वोट पाकर राष्ट्रपति बना था।

शाहजहाँ के हरम में 8000 रखैलें थीं जो उसे उसके अब्बू जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने अब्बू की ‘संपत्ति’ को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छँटनी की तथा बुजुर्ग महिलाओं को भगा कर अन्य हिन्दू परिवारों से जबरन महिलाएँ लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा। कहते हैं कि उन्हीं भगाई गई महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जीबी रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। वो हिन्दू महिलाओं का मीनाबाजार लगाया करता था।

12 साल के भाई के सामने 15 साल की लड़की से गैंगरेप: घर में घुस गए थे राहिब, साहिब, आरिफ और मारूफ

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में 15 साल की नाबालिग लड़की से उसके 12 साल के छोटे भाई के सामने ही 4 दरिंदों ने गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया। आरोपितों ने गन प्वाइंट पर लेकर लड़की को हवस का शिकार बनाया औऱ उसका वीडियो भी बना लिया। फिर जान से मारने की धमकी दे फरार हो गए।

मामला फुगाना थाना क्षेत्र के जोगियाखेड़ा गाँव का है। जहाँ पीड़िता के माँ-बाप रिश्तेदारी में गए थे। इसी का फायदा उठाकर एक आरोपित छत के रास्ते घर के अंदर घुसा औऱ सो रही पीड़िता और उसके भाई को गन प्वाइंट पर ले लिया। इसके बाद उसने घर के मुख्य दरवाजे को खुलवाया।

पीड़िता ने जैसे ही दरवाजा खोला तो बाहर पहले से मौजूद तीन अन्य आरोपित गन के साथ अंदर आ गए। इसके बाद चारों ने छोटे भाई के सामने ही उससे गैंगरेप किया। उसका वीडियो भी बना लिया औऱ किसी को बताने पर उसे वायरल करने की धमकी भी दी। चारों आरोपितों की पहचान राहिब, साहिब, आरिफ औऱ मारूफ के तौर पर हुई है। सभी पीड़िता के गाँव के रहने वाले हैं।

जब आरोपित चले गए और पीड़िता के माँ-बाप घर लौटे तो उसने उन्हें इसके बारे में बताया। इसके बाद पीड़िता के पिता ने फुगाना थाने में एफआईआर दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़िता के पिता ने आऱोपित पक्ष की ओर से बार-बार जान से मारने की धमकी दिए जाने का आरोप लगाया है। पीड़िता के पिता ने कहा, “हम दोनों औरंगाबाद गए थे। राहिब की छत मेरे घर की छत से लगी हुई है। वह मेरे घर में कूद आया औऱ पहले मेरे लड़के को तमंचा सटाकर गोली मारने की धमकी दी। इसके बाद दरवाजा खुलवाया औऱ तीन लोग अंदर आए सभी ने मेरी लड़की के साथ दुष्कर्म किया। सभी मेरे ही गाँव के हैं।”

मुजफ्फरनगर देहात के अपर पुलिस अधीक्षक ने कहा, “अरमान नाम के एक व्यक्ति ने सूचना दी थी कि पीड़िता के साथ गाँव के 4 लोगों ने दुष्कर्म किया है। सभी एक-दूसरे को अच्छी तरह से जानते थे। तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। पीड़िता का मेडिकल कराया गया है औऱ आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए जिला स्तर पर 5 टीमों का गठन किया गया है औऱ गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है। मामले में ठोस कार्रवाई की जाएगी।”

‘तिरंगा फहरा कर आऊँगा या तिरंगे में लिपट कर आऊँगा’: कारगिल का ‘शेरशाह’, पर्दे पर छाने को तैयार

कारगिल विजय दिवस की 22 वीं वर्षगाँठ पर आज पूरा देश उन वीर सपूतों को याद कर रहा है जिन्होंने 26 जुलाई 1999 को अपने शौर्य का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ डाला था। इसी क्रम में कल ही अमेज़न प्राइम पर ‘शेरशाह’ का ट्रेलर भी रिलीज हुआ है। ये फिल्म कारगिल के ही जाँबाज़ विक्रम बत्रा की कहानी है। वही विक्रम बत्रा जिन्होंने युद्ध के समय पेप्सी बेचने के लिए इस्तेमाल हुई टैगलाइन ‘दिल माँगे मोर’ को भारतीय सेना का नारा बना दिया था।

आज कोई संयोग नहीं है कि ट्विटर पर ‘विक्रम बत्रा’ ट्रेंड हो रहा है और लोग उनके कोट शेयर कर रहे हैं। हर साल 26 जुलाई आने के साथ सोशल मीडिया पर ऐसा नजारा देखने को मिलता है और इस बार जब पूरी एक फिल्म उन्हीं की कहानी पर आधारित हो तो चर्चा और भी प्रासंगिक हो जाती है।

बॉलीवुड एक्टर अक्षय कुमार ने अपने ट्वीट में लिखा है, “एक पर्दे का हीरो असली हीरो को क्या ट्रिब्यूट दे सकता है। सिवाय इसके कि आपके बलिदान ने हमें जीवन जीने के लिए प्रेरित किया, परम वीर चक्र पुरस्कार विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा! मेरा जन्मदिन आपके साथ आता है, मैं इसके लिए सम्मानित हूँ। शेरशाह का ट्रेलर साझा कर रहा हूँ। एक वीर बलिदान की कहानी।” 

वहीं तमाम सोशल मीडिया यूजर्स हैं जो ‘शेरशाह’ के ट्रेलर की सराहना कर रहे हैं। साथ में बत्रा के उन शब्दों को याद कर रहे हैं, जब उन्होंने कहा था, “या तो तिरंगा फहरा कर आऊँगा वरना तिरंगे में लिपट कर आऊँगा।” उनके उस इंटरव्यू की क्लिप भी इंटरनेट पर शेयर हो रही है जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे भारतीय सेना के जवान ‘दिल माँगे मोर’ की तर्ज पर पाकिस्तानियों को शिकस्त देने में लगे थे।

विक्रम बत्रा का जीवन

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के छोटे से शहर पालमपुर में जीएल बत्रा के घर 9 सितंबर 1974 को जन्मे दो बेटों में से एक विक्रम बत्रा थे। विक्रम का बचपन सामान्य था लेकिन समय के साथ उन्हें देख उनके पिता को पता चला कि उनके बेटे के सपने सामान्य नहीं है।

विक्रम ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पालमपुर से करने के बाद चंडीगढ़ का रुख किया। वहाँ कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई और उनका सिलेक्शन भी मर्चेंट नेवी और इंडियन आर्मी में हो गया। शायद उस समय सबको लगा हो कि विक्रम नेवी की नौकरी चुनेंगे, लेकिन हैरानी सबको तब हुई जब उन्होंने देश सेवा के लिए भारतीय सेना में जाना चुना। भारतीय सेना का विकल्प चुनते हुए कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपनी माँ से कहा था, “माँ पैसा ही सब कुछ नहीं होता, मुझे देश के लिए कुछ करना है।”

इसके बाद विक्रम बत्रा बतौर लेफ्टिनेंट 13 जम्मू-कश्मीर राइफ़ल्स का हिस्सा बने और उनकी पोस्टिंग द्रास सेक्टर के कारगिल में हुई। भारत हमेशा से ही शांति का दूत रहा है तो, 1999 में भी भारत शांति ही चाहता था। उस समय जब शांति का संदेश लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर की बस यात्रा की थी। तब पाकिस्तान ने चुपचाप जम्मू-कश्मीर के कारगिल में द्रास सेक्टर की पहाड़ियों में अपना क़ब्ज़ा जमा लिया था। वहाँ अपने बंकर्स बनाकर वह भारत पर हमला करने की योजना बना रहा था, लेकिन भारतीय सेना ने उसे विफल कर दिया।

चूँकि, उस समय विक्रम बत्रा कारगिल पर ही थे, तो उन्हें और उनके साथियों को श्रीनगर लेह हाईवे के करीब प्वाइंट 5410 को हर हाल में दुश्मन से वापस छीनना था। इसी लड़ाई में विक्रम बत्रा ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया और 20 जून 1999 की सुबह 3:30 बजे विक्रम बत्रा और उनके साथियों ने इस महत्वपूर्ण चोटी पर फिर से तिरंगा लहरा दिया। इस जीत के बाद विक्रम बत्रा ने कहा था, “यह दिल माँगे मोर।” और उसी वक़्त से यह नारा बन गया हिंदुस्तानी फ़ौज का मंत्र। विक्रम बत्रा के जज़्बे को देखते हुए यूनिट ने उनको नया नाम दिया ‘शेरशाह’ यानी ‘शेरशाह ऑफ़ कारगिल’। पाकिस्तानी फ़ौज में विक्रम बत्रा का इतना डर था कि उन्हें मारने के लिए उन्होंने जो योजना बनाई उसका नाम ‘ऑपरेशन शेरशाह’ रखा।

एक जीत के बाद कैप्टन बत्रा आगे अपने साथियों के साथ प्वाइंट 4875 को दुश्मन के क़ब्ज़े से छुड़ाने निकल गए। यह वो जगह थी जहाँ से श्रीनगर लेह राजमार्ग पर दुश्मन अपना दबदबा बनाए रख सकता था। इसे खाली कराना बहुत जरूरी था। लेकिन, वहाँ पहुँचना बेहद जोख़िम भरा था। 17,000 फीट की ऊँची पहाड़ी और सीधी चढ़ाई कोई आसान काम नहीं था। लेकिन आसान काम विक्रम बत्रा को पसंद भी कहाँ था। गोलियाँ चल रही थीं, गोले बरस रहे थे। मगर, विक्रम बत्रा और उनके साथियों के पाँव एक क्षण के लिए भी नहीं डगमगाए। यह लड़ाई क़रीब 36 घंटे तक चली। 7 जुलाई 1999 को लड़ी गई इस लड़ाई में अपने जूनियर लेफ्टिनेंट नवीन को बचाते हुए विक्रम बत्रा वीरगति को प्राप्त हो गए। युद्ध के दौरान दिखे उनके जज्बे और बलिदान के मद्देनजर 26 जनवरी 2000 को उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

क्या कहते हैं माता-पिता?

विक्रम बत्रा की माँ का कहना है कि देश के युवाओं को आर्मी ज्वॉइन करनी चाहिए और जब भी देश के लिए बलिदान होने का मौक़ा मिले तो उसे गँवाना नहीं चाहिए। वही उनके पिता समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहते हैं, “केंद्र सरकार ने (कारगिल) युद्ध के दौरान की गई सभी प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है। हमें पड़ोसी मुल्क से अवगत होना चाहिए और भविष्य में देश के लिए बलिदान देने के लिए तैयार रहना चाहिए। मैंने माध्यमिक विद्यालय पाठ्यक्रम में परमवीर चक्र पुरस्कार विजेता सैनिकों की जीवनी सिखाई है ताकि हमारी युवा पीढ़ी को भी प्रेरणा मिले। साथ ही, मैं केंद्र से अनुरोध करता हूँ कि शहीदों के परिवार के सदस्यों / रिश्तेदारों को नियमित रूप से सामाजिक कार्य गतिविधियों को अंजाम देने में सहयोग करें।”

कृषि कानूनों के विरोध में ‘प्राइवेट कंपनी’ की ट्रैक्टर चला संसद पहुँचे राहुल गाँधी, लोगों ने कहा – ड्राइविंग लाइसेंस चेक करो

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ट्रैक्टर से संसद सत्र में भाग लेने पहुँचे हैं। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष हैं, अच्छी मीडिया फुटेज मिली है। हरियाणा में भी उन्होंने ‘किसान आंदोलन’ के दौरान ऐसा किया था, तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग के साथ। अब भी उन्होंने इन्हीं तीनों कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन स्वरूप ऐसा किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इनके लागू होने पर रोक लगा रखी है। फिर भी नेता मान ही नहीं रहे।

वहीं राहुल गए गाँधी मीडिया में आने के लिए कुछ करें और लोग उनके मजे न लें, ऐसा कैसे हो सकता है? देखिए कैसे ‘JK Modified’ नाम के ट्विटर हैंडल ने उनकी तुलना लेजेंड्री कॉमिक किरदार मिस्टर बीन से कर डाली:

राहुल गाँधी ने दावा किया कि वो किसानों का संदेश लेकर संसद में आए हैं। साथ ही केंद्र सरकार पर किसानों की आवाज़ दबाने के साथ-साथ संसद में उनकी आवाज़ न उठाने देने का भी आरोप लगाया। साथ ही कहा कि केंद्र सरकार को ये तीनों कृषि कानून वापस लेने ही होंगे। वो ये दावा भी कर बैठे कि ये कानून देश के 2-3 बड़े कारोबारियों के लिए बनाए गए हैं। एक ट्विटर यूजर ने ये चेक करने को कहा कि उनके पास ट्रैक्टर चलाने का लाइसेंस भी है या नहीं।

वहीं एक ट्विटर यूजर ने मेजर जेनरल जीडी बख्शी के डायलॉग के जरिए उन पर निशाना साधा, जिसमें उन्होंने कहा था, “तुम्हें शर्म है कुछ? कुछ शर्म-हया है?”

एक अन्य यूजर ने उन्हें सलाह दी कि ट्रैक्टर चलाना और देश चलाना, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। वहीं कुछ लोगों ने उन्हें बैलगाड़ी से संसद आने की सलाह दी, ताकि तेल के बढ़े हुए दामों के खिलाफ भी ‘किसान आंदोलन’ के साथ ही विरोध प्रदर्शन हो जाए। कुछ लोगों ने उन पर फाइन लगाने की भी वकालत की, अगर उनके पास ट्रैक्टर चलाने का ड्राइविंग लाइसेंस न हो तो। एक अन्य यूजर ने पूछा कि एक प्राइवेट कंपनी के ट्रैक्टर का इस्तेमाल कर के प्राइवेटाइजेशन का विरोध करने का ये कौन सा तरीका है?

राहुल गाँधी ट्रैक्टर पर पहुँचे संसद तो लोगों ने सोशल मीडिया पर लिए मजे

फरवरी 2021 में भी राहुल गाँधी ने राजस्थान के अजमेर में एक ट्रैक्टर रैली में जनसभा को सम्बोधित किया था। इस दौरान वो राजस्थानी पगड़ी और वेशभूषा में दिखे थे। उससे पहले हरियाणा में इसी तरह का प्रदर्शन हुआ था। ये अलग बात है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा कॉन्ग्रेस की महिला कार्यकर्ताओं से ट्रैक्टर खिंचवाते हुए दिखे थे।

Tokyo Olympics: मीराबाई चानू और उनके कोच ने मोदी सरकार का किया धन्यवाद, लेफ्ट-लिबरल गैंग को लगी मिर्ची

टोक्यो ओलंपिक 2021 में भारत को पहला पदक दिलाने वाली वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और उनके कोच विजय शर्मा ने केंद्र सरकार को धन्यवाद दिया है। दरअसल पिछले 5 सालों के दौरान केंद्र सरकार ने लगातार उनकी सहायता की जिसके कारण चानू वेटलिफ्टिंग में भारत को सिल्वर मेडल दिला सकीं। हालाँकि जैसे ही भारतीय वेटलिफ्टिंग फेडरेशन (IWF) के अध्यक्ष वीरेंद्र प्रसाद वैश्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया, लेफ्ट-लिबरल गैंग और प्रोपेगेंडाबाज अपनी पुरानी आदत के अनुसार मीराबाई की उपलब्धि को धूमिल करने पहुँच गए।

मीराबाई ने खुद भारतीय खेल प्राधिकरण और ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना’ को धन्यवाद दिया। उन्होंने बताया कि देश और विदेश में उनकी ट्रेनिंग के लिए जिस प्रकार लगातार सहयोग प्रदान किया, उसी के कारण आज उनका पदक जीत पाना संभव हो सका है। मीराबाई को ट्रेनिंग के लिए अमेरिका भेजने का फैसला कुछ घंटों के अंदर ही लिया गया जब यह तय हो चुका था कि अमेरिका भारतीय यात्रियों पर प्रतिबंध लगाने जा रहा है। इसके बाद मीराबाई 1 मई 2021 को अमेरिका रवाना हुईं और दूसरे ही दिन अमेरिका का प्रतिबंध शुरू हो गया था। अमेरिका में मीराबाई की ट्रेनिंग का खर्च भी लगभग 70 लाख रुपए था।

सरकार द्वारा की गई सहायता और खिलाड़ियों की मेहनत पर आभार प्रकट करते हुए IWF के अध्यक्ष वीरेंद्र प्रसाद वैश्य ने एनडीटीवी से कहा कि मीराबाई चानू ने इस पदक के लिए 21 साल इंतजार किया है। उन्होंने कहा कि वह प्रधानमंत्री के आभारी हैं और उन खिलाड़ियों के भी जिन्होंने अपनी मेहनत से ओलंपिक में हिस्सा लिया है। हालाँकि वैश्य ने जैसे ही पीएम मोदी का आभार प्रकट किया, पूरा लेफ्ट-लिबरल और प्रोपेगेंडाबाज गैंग टूट पड़ा और पूछने लगा कि मीराबाई के पदक जीतने में पीएम मोदी का कैसा योगदान?

पत्रकार रोहिणी सिंह ने ट्वीट करके पूछा कि प्रधानमंत्री का आभार किसलिए? क्या वो उसके (मीराबाई चानू) बदले वजन उठाने गए थे?

पत्रकार रोहिणी सिंह के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

एक्टिविस्ट रेजिमोन कुट्टप्पन भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने भी व्यंग्यात्मक तौर पर कहा कि मोदी जी ओलंपिक खिलाड़ियों को कोचिंग दे रहे हैं।

कुट्टप्पन के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

कार्टूनिस्ट मंजुल तो इन सब से कई कदम आगे निकले। उन्होंने 13 जुलाई 2021 को ही कार्टून प्रकाशित कर दिया था जिसमें दिखाया गया था कि खिलाड़ी ओलंपिक पोडियम में पदक लेते हुए खड़ा है उसके हाथ में ‘थैंक यू मोदी जी’ का एक प्लेकार्ड है।

कार्टूनिस्ट मंजुल द्वारा बनाया गया कार्टून

कॉन्ग्रेस की लावण्या बल्लाल ने भी ट्वीट करके लिखा कि मीराबाई चानू को कोचिंग देने के लिए नरेंद्र मोदी का धन्यवाद।

कॉन्ग्रेस की लावण्या बल्लाल के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

हालाँकि भले ही यह लेफ्ट-लिबरल और प्रोपेगेंडाबाज गैंग खिलाड़ियों के बेहतर प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार द्वारा की जा रही सहायता को नजरंदाज करता रहे, लेकिन सच तो यह है कि खिलाड़ियों की मेहनत और समर्पण के साथ पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा समय-समय पर किए गए प्रयासों का परिणाम है कि भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन में सुधार आया है और कई अवसरों पर खिलाड़ी पदक जीतने में भी सफल रहे हैं।

खेलों को बढ़ावा देने सरकार के प्रयास

क्रिकेट के अलावा भारत में विभिन्न खेलों द्वारा कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसी के चलते सितंबर 2014 में केंद्र सरकार ने टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) का शुभारंभ किया। इस योजना के अंतर्गत युवा मामलों एवं खेल मंत्रालय की देखरेख में खिलाड़ियों को वित्तीय सहायता से लेकर ट्रेनिंग इत्यादि से जुड़ी सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। मीराबाई चानू की ट्रेनिंग भी इसी योजना के अंतर्गत सम्पन्न हुई। इसके अलावा ओलंपिक 2016 में भारत की ओर से पीवी सिंधु और साक्षी मलिक भी मेडल जीतने में सफल रहीं। साथ ही पैरालम्पिक और कॉमनवेल्थ खेलों में भी भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन शानदार रहा।

इसके अलावा भारत सरकार द्वारा खेलो इंडिया कार्यक्रम और फिट इंडिया मूवमेंट जैसी पहल भी की गईं। इनके अंतर्गत भारत सरकार द्वारा न केवल भारत के कोने-कोने से योग्य खिलाड़ियों का चयन किया गया, बल्कि सबसे निचले स्तर तक खेलों को बढ़ावा देने का काम भी किया गया। भारत में खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई इन योजनाओं का एक उद्देश्य यह भी था कि भारत में 10 साल से लेकर 18 साल तक के खिलाड़ियों को खेल का वातावरण उपलब्ध कराना और इसके लिए ट्रेनिंग एवं वित्तीय सहायता की व्यवस्था करना। शिक्षा के साथ-साथ वर्तमान केंद्र सरकार राज्यों के साथ सामंजस्य स्थापित करके यदि खेलों को बढ़ावा देने का काम कर रही है और इसका परिणाम वैश्विक मंचों पर देखने को मिलता है तो सरकार का आभार प्रकट करना कोई अपराध नहीं है।

‘मुझे मारकर CM बन सकते हैं तो उन्हें बनाइए’: कॉन्ग्रेस का शासन, कॉन्ग्रेस MLA के काफिले पर हमला, कॉन्ग्रेस के मंत्री पर सवाल

राजस्थान की तरह ही छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस में भी भीतरी लड़ाई चल रही है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनकी कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव की बीच पर्दे के पीछे खींचतान चल रही है। ऐसे में कॉन्ग्रेस विधायक बृहस्पति सिंह ने सिंहदेव पर आरोप लगाकर सियासत गरमा दी है।

बलरामपुर जिले के रामनुजगंज से विधायक बृहस्पति सिंह ने अपने काफिले पर हमले के लिए सिंहदेव को जिम्मेदार ठहराया है। कॉन्ग्रेस विधायक ने अपनी जान को खतरा बताते हुए आरोप लगाया कि ‘महाराज’ उनकी हत्या करवा सकते हैं। उन्होंने कहा, “अगर मुझे मारकर सिंहदेव मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो उन्हें इस पद से नवाजा जाना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि टीएस सिंह सिंहदेव कॉन्ग्रेस के दूसरे विधायकों का अपमान करते ही रहते हैं। वे इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के सामने उठाएँगे औऱ विधायक दल की बैठक में भी इस बात को रखेंगे। कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा, “छत्तीसगढ़ क़ॉन्ग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया, विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष से शिकायत कर मामले में कार्रवाई की माँग करूँगा।”

रिपोर्ट के मुताबिक, शनिवार (24 जुलाई 2021) को सरगुजा में विधायक के काफिले को निशाना बनाया गया था। उनकी गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए थे और उनके सुरक्षाकर्मियों के साथ भी मारपीट की गई। पुलिस ने घटना के सिलसिले में तीन को गिरफ्तार भी किया है। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बताया, “हमने कुछ लोगों के खिलाफ अत्याचार अधिनियम और अन्य संबंधित धाराओं से संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। हम मामले की जाँच कर रहे हैं।”

काफिले पर हमले के बाद 18 से अधिक विधायक सिंह के रायपुर स्थित आवास पर उनका हालचाल जानने भी पहुँचे थे। इस बीच सिंहदेव ने इसे पार्टी का मसला बताते हुए इसे बातचीत से सुलझाने की बात कही है। उन्होंने कहा, “हम एक साथ काम कर रहे हैं। अगर कोई मुद्दा है तो हम बातचीत के जरिए उसका समाधान करेंगे।” सिंहदेव ने कहा कि मैंने इस मामले में एसपी से कड़ा एक्शन लेने को कहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक विधायक ने कहा, “मैंने मुख्यमंत्री के पक्ष में बयान दिया था इसी कारण यह सब हुआ है। सिंहदेव से जुड़े लोगों ने मेरे आदमियों पर हमला किया। अगर मैं कार में होता तो मुझ पर भी हमला होता। मेरी जान को खतरा है।” अंबिकापुर के सर्किट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए कॉन्ग्रेस नेता ने सीएम भूपेश बघेल की सराहना की औऱ दावा किया कि वो अगले 25 साल तक राज्य के सीएम रहेंगे।

पेगासस पर भड़के उदित राज, नंगी तस्वीरें वायरल होने की चिंता: लोगों ने पूछा – ‘फोन में ये सब रखते ही क्यों हैं?’

हाल ही में वामपंथी मीडिया ने विपक्ष के साथ मिल कर केंद्र सरकार पर पत्रकारों, नेताओं और सुप्रीम कोर्ट के जजों की जासूसी का आरोप लगाया। कहा गया कि इसके लिए इजरायली कंपनी NSO ग्रुप्स के स्पाईवेयर पेगासस का इस्तेमाल किया जा रहा है। कंपनी ने इसे नकार दिया। एमनेस्टी ने भी यू-टर्न ले लिया। फिर कहा कि वो इस पर कायम है। फिर कहा गया ये संभावित लोगों की सूची है, जिनकी जासूसी होने की आशंका है। लेकिन, कॉन्ग्रेस नेता उदित राज को कुछ और ही चिंता सता रही है।

पूर्व सांसद और खुद को ‘सबसे बड़ा दलित नेता’ बताने वाले उदित राज ने ट्वीट कर के दावा किया कि पेगासस फ़ोन के सभी फंक्शन को चालित करके डेटा भेजता रहता है। उदित राज ने आशंका जताई कि पेगासस ने कितनों की नंगी तस्वीर भेजी होगी या निजता का उल्लंघन किया होगा। साथ ही आरोप लगाया कि पेगासस ने मोदी सरकार के कई काम किए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई का नाम लेते हुए कहा कि वो 4 बगावत करने वाले जजों में एक थे।

उदित राज ने उनके बारे में लिखा, “जिस महिला ने पूर्व CJI रंजन गोगोई पर उत्पीड़न का आरोप लगाया , उसके और रिश्तेदारों सहित 11 लोगों के फोन पर जासूसी हुई। वही तथ्य रख दिया होगा और गोगई ब्लैकमेल हो गए।” उदित राज ने अपनी इन ट्वीट्स में कॉन्ग्रेस पार्टी को भी टैग किया, लेकिन उनकी पार्टी ने अब तक उनकी ट्वीट्स को रीट्वीट नहीं किया है। उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा पर 200 करोड़ रुपए खर्च करने के भी आरोप लगाए।

उदित राज ने पेगासस को लेकर किए ट्वीट्स

सोशल मीडिया ने भी उदित राज की इस चिंता के मजे लिए। एक यूजर ने उन्हें सलाह दी कि अगर आपने गलती कर ही दी है तो तस्वीरें वायरल होने” से पहले ही माफ़ी माँग लें और अपने वरिष्ठों को भी अवगत करा दें, इससे किरकिरी होने से बच जाएगी।

वहीं एक अन्य यूजर ने उनसे पूछा कि क्या वो अपने फोन में अपनी नंगी तस्वीरें रखते हैं? साथ ही सलाह दी कि अगर मुद्दा सही उठा रहे हैं तो ढंग से उठाएँ।

एक अन्य यूजर ने उन्हें चिंता न करने की सलाह देते हुए पूछा कि भला आपकी नंगी तस्वीरें कौन देखना चाहेगा? लोगों ने उनसे ये भी पूछा कि राहुल के फोन में ऐसा क्या था, जिससे कॉन्ग्रेस डरी हुई है। एक यूजर ने उदित राज को सलाह दी कि उन्हें ‘ऐसी-वैसी’ तस्वीरें क्लिक नहीं करवानी चाहिए और न ही अपने फोन में रखनी चाहिए। लोगों ने उनसे इस मामले में खुल कर बात करने की सलाह दी, ताकि और जानकारी सामने आए।

हत्या कर लिव इन पाटर्नर को ‘गायब’ बता रहा था इंस्पेक्टर, लाश ठिकाने लगाने में मददगार कॉन्ग्रेस नेता भी गिरफ्तार

गुजरात की अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने पत्नी की हत्या कर उसके शव को जलाने के आरोप में रविवार (25 जुलाई 2021) को वडोदरा ग्रामीण स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के पुलिस इंस्पेक्टर अजय देसाई को गिरफ्तार किया। आरोपित पुलिस अधिकारी की सहायता करने के आरोप में कॉन्ग्रेस नेता किरीट सिंह जडेजा को भी गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार कॉन्ग्रेस नेता ने पिछले साल 2020 में कर्जन विधानसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस की टिकट पर उपचुनाव लड़ा था, लेकिन वो हार गए थे।

मामला करीब डेढ़ महीने पुराना है। वडोदरा के कर्जन में आरोपित पुलिस अधिकारी ने 4-5 जून की रात को अपनी लिव इन पाटर्नर स्वीटी पटेल के साथ झगड़े के बाद उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों के बीच झगड़ा देसाई की शादी को लेकर हुआ था। जिस वक्त आरोपित इंस्पेक्टर ने स्वीटी की गला दबाकर उसकी हत्या की उस दौरान बेड पर उन दोनों के अलावा उनका दो साल का बेटा भी था। हत्या के बाद उसके शव को आरोपित ने कंबल में लपेटा और सुबह होने की प्रतीक्षा करने लगा।

इसके बाद उसने अपनी कमांडो जीप बाहर निकाली और उसमें शव को डालकर अपने साले को फोनकर बताया कि झगड़े के बाद स्वीटी कहीं गायब हो गई है और वो आकर बच्चे को सँभाले। साले के आने के बाद वो अपनी जीप लेकर भरूच जिले के दहेज हाईवे पर स्थित अटाली गाँव गया। वहाँ उसने कॉन्ग्रेस नेता के निर्माणाधीन होटल में स्वीटी के शव को जला दिया।

इस मामले में करजन थाने में देसाई और जडेजा के खिलाफ हत्या औऱ सबूत मिटाने जैसी कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। दोनों के खिलाफ अहमदाबाद क्राइम ब्रांच जाँच कर रही है, जिसमें एटीएस उसकी मदद कर रही है। हालाँकि, पुलिस का कहना है कि जडेजा हत्या में साथ तो नहीं था, लेकिन उसे सब पता था औऱ उसने अपनी जमीन उपलब्ध कराई थी। इस बात की जानकारी क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर डीबी बराड ने दी है। एक सप्ताह पहले ही मामले की जाँच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई थी।

कथित तौर पर जडेजा ने स्वीटी की हत्या किए जाने के संबंध में जानकारी से इनकार किया है। अहमदाबाद के डीसीपी चैतन्य मांडलिक के मुताबिक देसाई के गुरुवार को नार्को टेस्ट कराने से इनकार कर दिया था। इसके बाद अधिकारियों ने उसे अपना जुर्म कबूलने की सलाह दी। मांडलिक ने कहा, “वह एक पुलिस अधिकारी है। वह जानता था कि इसका पता लगाया जाएगा। सारे सबूत उसकी ओर ही इशारा कर रहे थे। लेकिन उसे गिरफ्तार करने से पहले हम सुनिश्चित करना चाहते थे, ताकि कोई गलतफहमी न हो। हमने उसे बैठाया और समझाया कि जो हुआ है उसका सामना तो उसे करना ही पड़ेगा। उसने सहयोग किया और हमें ज्यादा पूछताछ नहीं करनी पड़ी।”

कारगिल के 22 साल: 16 की उम्र में सेना में हुए शामिल, 20 की उम्र में देश पर मर मिटे

आज से ठीक 20 साल पहले 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के तहत कश्मीर के कारगिल जिले में अपने शौर्य का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को देश से खदेड़ा था। इस दौरान हमारे जवानों ने देशप्रेम की वो गौरवगाथा लिखी थी, जिसे सदियों तक भूल पाना नामुमकिन है। 18 हजार की फीट पर जवानों द्वारा लड़ा गया ये वो युद्ध था जिसमें भारत के जॉंबाजों ने पाकिस्तान के 3000 सैनिकों को मार गिराया था। इस ऑपरेशन के दौरान हमारे 1363 जवान घायल हुए थे, साथ ही 527 जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

देश पर मर मिटने वालों में एक नाम सुनील जंग का भी है। दो बहनों के इकलौते भाई और घर के चिराग सुनील, कारगिल में शहीद होने वाले सबसे कम उम्र के शहीद हैं। देशप्रेम ने उन्हें 16 की उम्र में ही भारतीय सेना से जोड़ दिया था। वे 11 गोरखा राइफल्स रेजीमेंट के जवान थे और कारगिल युद्ध में लखनऊ से होने वाले पहले शहीद।

8 साल की उम्र में खुद को देश का सिपाही मान लेने वाले सुनील ने एक फैंसी कॉम्पीटीशन के दौरान ही अपनी देशभक्ति का परिचय दे दिया था। उन्होंने बचपन में ही मंच से ऐलान कर दिया था कि देश की रक्षा के लिए वह अपने खून का एक-एक कतरा बहा देंगे, जो उन्होंने समय आने पर किया भी।

कॉम्पीटीशन में एक ओर जहाँ अन्य बच्चे फैंसी वेश-भूषा में थे तो सुनील सेना की वर्दी में। अपने लिए यह ड्रेस उन्होंने पिता की पुरानी वर्दी काटकर बनवाई थी। माँ से बंदूक दिलवाने की भी जिद की थी। तब उन्हें प्लॉस्टिक की बंदूक थमाकर शांत कराया गया था। लेकिन देश के लिए मर-मिटने वाला जुनून कहाँ थमने वाला था…

सैनिक बनने की इच्छा इस वीर में इतनी प्रबल थी कि 16 साल की उम्र में ही घरवालों को बिना बताए सेना में भर्ती हो गए। घर लौटकर माँ को बताया “माँ मैंं भी पापा और दादा की तरह सेना में भर्ती हो गया हूँ, मुझे भी उनकी तरह 11 गोरखा राइफल्स में तैनाती मिली है। अब मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया।” 

मीडिया प्लेटफार्म पर मौजूद जानकारी के अनुसार सुनील की माँ बीमा महत बताती हैं कि कारगिल में जाने से पहले सुनील घर आए थे। वे कुछ दिन घर रुके, लेकिन फिर यूनिट से उन्हें बुलावा आ गया। सुनील ने माँ को समझाया कि वे अगली बार लंबी छुट्टियों में घर आएँगे। लेकिन! नियत ने कुछ और ही तय किया हुआ था।

10 मई 1999 को उन्हें कारगिल सेक्टर पहुँचने का आदेश मिला। वे अपनी टुकड़ी के साथ सिर्फ़ इस जानकारी के साथ आगे बढ़े थे कि भारतीय सीमा में 400-500 की तादाद में घुसपैठिए घुस आए हैं।  

अपनी टुकड़ी के साथ वहाँ पहुँचकर राइफलमैन सुनील जंग तीन दिनों तक दुश्मनों का सामना करते रहे, किंतु 15 मई को भारी गोलीबारी में कुछ गोलियाँ उनके सीने में लगीं। लेकिन देश के लिए लहू का कतरा-कतरा बहा देने का आह्वान बचपन में ही करने वाले 20 साल के ये शूरवीर मैदान-ए-जंग में हार कहाँ मानने वाले थे। सुनील ने छलनी सीने के बावजूद युद्धभूमि में अपने हाथ से बंदूक नहीं गिरने दी और लगातार दुश्मनों पर वार करते रहे। तभी ऊँचाई पर बैठे दुश्मन की एक गोली उनके चेहरे पर लगी और वे वहीं वीरगति को प्राप्त हो गए।

सुनील जंग द्वारा वीरगति प्राप्त किए जाने के बाद दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा जैसे बड़े-बड़े नेता उनके घर आए। इस दौरान उनके माता-पिता को सुनील के नाम पर कैंट में एक स्टेडियम बनाने, उनकी प्रतिमा लगवाने और बहनों को नौकरी दिलाने का आश्वासन दिया गया। लेकिन अफसोस! 20 साल की उम्र में खुद को देश के लिए सौंप देने वाले शूरवीर सुनील के परिवार को कारगिल युद्ध के 20 साल बाद भी कुछ नहीं मिला। उनके पास बची है तो सिर्फ़ अपने बेटे की गौरवगाथा और देश के प्रति अथाह प्रेम।

सुनील के शहादत की खबर सुनकर परिवार की हालत

7 साल पहले टीएनबी मीडिया द्वारा सुनील के घरवालों का लिया गया साक्षात्कार यूट्यूब पर मौजूद है। जिसमें वे उस क्षण को बताने का प्रयास कर रहे हैं जब उन्हें सुनील की शहादत का पता चला। वे बताते हैं कि जब सुनील को वीरगति मिली तो उनके घर बड़े-बड़े अधिकारी आए लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे लोग वहाँ से बगैर कुछ कहे चले गए। बाद में उन्हें बताया गया कि उनके बेटे ने कारगिल में बलिदान दिया है। सुनील के पिता बताते हैं कि उन्हें समझ नहीं आया कि वे क्या बोलें… उन्होंने बड़ी मुश्किल से इस बारे में अपने अपनी पत्नी और बच्चों को बताया।

देवी की प्रतिमाओं पर सीमेन, साड़ियाँ उतार जला दी: तमिलनाडु के मंदिर का ताला तोड़ कर कुकृत्य

तमिलनाडु स्थित रानीपेट के एक मंदिर में हिन्दू घृणा का मामला सामने आया है। इससे पहले भी राज्य में मंदिरों पर हमले के कई मामले सामने आ चुके हैं। ताज़ा घटना में मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ अपमानजनक अवस्था में रखी हुई मिलीं। देवी अम्मान और माँ दुर्गा की प्रतिमाओं को अस्त-व्यस्त किया गया। प्रतिमाओं पर हस्तमैथुन किया गया। पवित्र प्रतिमाओं पर सीमेन बिखरा पड़ा था। कपड़े जला दिए गए थे। श्रद्धालुओं में इस घटना को लेकर खासा आक्रोश है।

स्थानीय लोगों ने पुलिस पर निष्क्रियता के आरोप लगाए हैं। हिन्दू कार्यकर्ताओं का कहना है कि हाल ही में राज्य में इस तरह की ये तीसरी घटना है। दरअसल, ये घटना पिछले महीने हुई है। कावेरीपक्कम के नजदीक कोंडापुरम गाँव में पंच लिंगेश्वर मंदिर स्थित है। ये भगवान शिव का मंदिर है, जिसकी देखभाल और प्रबंधन का अधिकार ‘हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (HCRE)’ विभाग के पास है।

ये तमिलनाडु की राज्य सरकार का ही एक विभाग है। खबरों के अनुसार, जब मंदिर का केयरटेकर 20 जून, 2021 को सुबह में कपाट खोलने के लिए आया, तो उसने देखा कि कामाक्षी अम्मान और दुर्गा सन्निधि के ताले टूटे हुए थे। जब वो अंदर गया तो ये देख कर डर गया कि प्रतिमाओं के कपड़े उतार दिए गए थे। देवी की मूर्तियों की साड़ियाँ उतार कर उन्हें जमीन पर रख कर जला दिया गया था।

इस घटना के सामने आते ही श्रद्धालुओं और हिन्दू मुन्नानी संगठन के लोगों ने थाने में जाकर पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई। साथ ही इस मामले के दोषियों की गिरफ़्तारी के लिए विरोध प्रदर्शन भी किया। इस मंदिर में दूर-दूर से लोग आते रहे हैं। आसपास के इलाकों में कुछ धर्मांतरित लोगों पर इस कुकृत्य का शक जताया जा रहा है। हिन्दू मुन्नानी और विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने मंदिर पर कई बार हमला होने के बावजूद पुलिस पर कार्रवाई न करने के आरोप लगाया है।

साथ ही HCRE विभाग से भी लोग आक्रोशित हैं। विभाग के पदाधिकारियों को सूचित किए जाने के बावजूद इस घटना को लेकर जानकारी लेने कोई मंदिर नहीं आया। लोगों के अनुसार, पदाधिकारियों का कहना था कि उनके पास और भी ज़रूरी काम हैं जिसमें वो व्यस्त हैं। VHP के राज्य संयोजक सवरना कार्तिक ने कहा कि DMK के सत्ता में आने के साथ ही हिन्दुओं व हिन्दू मंदिरों के खिलाफ अपराध बढ़ जाते हैं, ये इतिहास रहा है।