उत्तर प्रदेश में वर्ष 2017 हुए विधानसभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने प्रदेश में शानदार जीत हासिल की थी। इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पद सँभालते ही उन्होंने राज्य को अपराध मुक्त बनाने के अपने इरादे जाहिर किए। उसके बाद से वे लगातार इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2017 में योगी आदित्यनाथ की सरकार के बनने के बाद से उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ मुठभेड़ में कुल 139 अपराधी मारे गए हैं और 3196 घायल हुए हैं। इस दौरान 13 पुलिसकर्मियों ने भी अपनी जान गँवाई, जबकि 1112 घायल हुए।
अपराध और अपराधियों को लेकर सीएम योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस नीति के बारे में बताते हुए गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी ने कहा, “राज्य सरकार के निर्देश पर कुख्यात अपराधियों, उनके सहयोगियों और माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है। 20 मार्च 2017 से इस साल 20 जून तक पुलिस एनकाउंटर में 139 अपराधियों का खात्मा किया गया और इस दौरान 3196 घायल हुए। इन कार्रवाइयों के दौरान 13 पुलिसकर्मियों ने अपना बलिदान दिया, जबकि 1122 घायल हुए थे।”
अवस्थी ने आगे कहा, “राज्य सरकार की अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति है और अब संगठित अपराध को समाप्त कर दिया गया है।” उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर एक्ट के तहत अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए 1574 करोड़ रुपए से अधिक की अवैध संपत्तियों को जब्त किया गया है। इसमें से 1322 करोड़ रुपए कीमत की अवैध संपत्ति को पिछले साल जनवरी से अब तक या तो जब्त किया गया है या फिर उसे धवस्त किया गया है।
गृह विभाग के अतिरित सचिव ने बताया है कि सीएम योगी आदित्यनाथ के पिछले चार साल के कार्यकाल में गैंगस्टर एक्ट के तहत 13700 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जिसमें 43000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक जब्ती वाराणसी क्षेत्र में की गई, जहाँ सर्वाधिक 420 मामले दर्ज किए गए और 200 करोड़ रुपए की कीमत की संपत्तियों को जब्त किया गया। गोरखपुर मंडल में 208 मामलों केस दर्ज हुए थे, जिसमें 264 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की गई।
अवस्थी के मुताबिक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को ‘थाना/समाधान दिवस’ आयोजित करने का आदेश दिया है। महीने के इन दिनों में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे लोगों की शिकायतों को सुनने और उनका निवारण करने के लिए उपलब्ध रहें। इसके अलावा इन कार्यक्रमों के दौरान सभी को सख्त कोविड प्रोटोकॉल का पालन करने का निर्देश भी दिया गया है।
योगी सरकार को उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों मायावती, मुलायम सिंह औऱ अखिलेश यादव से अपराध औऱ अपराधियों से भरा राज्य विरासत में मिला था। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के लिए इस मील के पत्थर को हासिल करना आसान नहीं था। गोरखपुर से पाँच बार के सांसद रहे योगी आदित्यनाथ को ये बात अच्छे से पता थी कि प्रदेश में समृद्धि, विकास औऱ उद्यमियों का विश्वास हासिल करने के लिए कानून-व्यवस्था को पहले दुरुस्त करना होगा। इसे उन्होंने बेहद गंभीरता से लिया। 1.5 लाख पुलिसकर्मियों की भर्ती कर हर जिले में हिस्ट्रीशीटरों को पकड़ने का काम किया। इससे जमीन हड़पने वालों और जबरन वसूली करने वालों से व्यवसाइयों को राहत मिली।
योगी सरकार के अपराधियों के प्रति सख्त रुख से उद्योगपतियों को उत्तर प्रदेश वापस आकर बिजनेस का विस्तार करने का भरोसा मिला। गौरतलब है कि सख्त कानून-व्यवस्था के दम पर उत्तर प्रदेश ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के मामले में बीते 4 वर्षों में तमिलनाडु, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे औद्योगिक राज्यों को पछाड़ते हुए दूसरे स्थान पर पहुँच गया है।
दिल्ली दंगों के मामले में पहला फैसला सुनाते हुए दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार (20 जुलाई, 2021) को सुरेश नाम के एक व्यक्ति को उसके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया। 9 मार्च, 2021 को सुरेश उर्फ भटूरा पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 143 (गैरकानूनी सभा), 147 (दंगा करने) और 395 (डकैती) के तहत आरोप तय किए थे।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने सभी गवाहों के बयानों में विरोधाभास के आधार पर सुरेश को बरी कर दिया है। न्यायाधीश रावत ने कहा, “आरोपित को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है। यह स्पष्ट रूप से बरी होने वाला मामला है।” सुरेश की ओर से वकील राजीव प्रताप सिंह के साथ-साथ अन्य वकील अक्षय सागर, हिमांशु कुमार, हितेश पांडे और आशीष प्रजापति पेश हुए।
आसिफ की शिकायत पर सुरेश के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में कहा गया था कि 25 फरवरी, 2020 को शाम करीब 4 बजे आरोपित सुरेश ने लोहे की रॉड और लाठियों से लैस दंगाइयों की भारी भीड़ के साथ दिल्ली के बाबरपुर रोड पर स्थित उनकी दुकान का ताला तोड़कर उसमें लूटपाट की थी। दुकान भगत सिंह की थी और आसिफ को किराए पर दी गई थी, जो इस मामले में शिकायतकर्ता है।
जाँच के दौरान सिंह ने पुलिस को बताया कि “दंगाई आक्रामक थे और उस दुकान को लूटना चाहते थे, क्योंकि यह एक मुस्लिम की थी। सिंह ने यह भी दावा किया कि उन्होंने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सका।” दुकान के मालिक ने 7 अप्रैल 2020 को सुरेश की आरोपित के रूप में पहचान की थी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने 21 अप्रैल 2021 को यह फैसला सुरक्षित रख लिया था। तब से सात बार इस फैसले को टाला जा चुका है। उस दौरान अदालत ने यह माना था कि आरोपित भीड़ का हिस्सा था, जिसने अपराध किया था। लेकिन आज दिल्ली दंगे मामले में अदालत ने अपना पहला फैसला सुनाते हुए पाया कि गवाहों के बयानों में विरोधाभास है। इसके चलते उन्होंने सुरेश को बरी कर दिया।
जहाँ एक तरफ हिन्दू गाय को पवित्र मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश के रोहिंग्या मुस्लिम बकरीद के मौके पर गायों की ‘कुर्बानी’ की तैयारी में लगे हैं। बकरीद पर बांग्लादेश के ‘भाषण चार’ क्षेत्र में ही 200 गायों की हत्या की जानी है। ये वही इलाका है, जहाँ रोहिंग्या मुस्लिमों को बसाया गया है। वहाँ की सरकार ने इन रोहिंग्या मुस्लिमों को कमाई के लिए सिलाई मशीन से लेकर अन्य साधन दिए हैं।
इतना ही नहीं, बांग्लादेश की सरकार ने ‘भाषण चार’ द्वीप पर 200 गायों को भेजा है, ताकि ये लोग बकरीद मना सकें। शुक्रवार (16 जुलाई, 2021) को इन गायों को एक जहाज से द्वीप पर लाया गया। इन्हें बोगुरा इलाके से हटिया होकर लाया गया। कई रोहिंग्या मुस्लिमों ने इसके बाद मुल्क की प्रधानमंत्री शेख हसीना के पोस्टर लेकर ख़ुशी मनाते हुए एक रैली भी निकाली, जिसमें सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया।
वीडियो में देखा जा सकता है कि सैकड़ों रोहिंग्या मुस्लिम गायों को माला पहना कर और उनके ऊपर गुब्बारे लगा कर रैली निकाल रहे हैं, जिनमें कई बुर्कानशीं महिलाएँ व बच्चे भी शामिल हैं। इन्होंने हाथ में गुलदस्ते भी ले रखे थे। 200 में से 135 गायों की व्यवस्था स्थानीय अधिकारियों व सरकार ने ‘Islamic Relief’ नामक NGO के माध्यम से की है। बकरीद के दिन इनकी हत्या के बाद बीफ बना कर लोगों में बाँटा जाएगा।
Over 200 cows have been provided for the #Eid celebration of the #Rohingyas staying there. Both the government and aid agencies of foreign and domestic origin have given the cows as gifts. Watch the ceremonial preparation in Bhasan Char in Star Newsbytes.https://t.co/niN0cY7jEQ
यहाँ के कुल 35 परिवारों में इन गायों के बीफ बाँटे जाएँगे। अनुमान है कि प्रत्येक परिवार को 2 किलो बीफ मिलेगा। जब इन गायों को लाया गया और जहाज से उतारा जा रहा था, तब कुछ वरिष्ठ अधिकारी मौके पर इसकी निगरानी के लिए मौजूद थे। इसके अलावा यही NGO ‘कॉक्स बाजार’ के रोहिंग्या मुस्लिमों को भी 375 गायें दे रहा है। साथ ही रोहिंग्या कैम्पस के आसपास रहने वाले मूलनिवासियों को भी 150 गायों की बीफ दी जाएगी। इस तरह कुल 725 गायें रोहिंग्या व इनके मेजबानों को दी गई हैं।
बता दें कि कॉक्स बाजार में ही अधिकतर रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं, जिनमें से 18,521 को 8 चरणों में भाषण चार द्वीप पर लाया जा चुका है। बाकी के बचे 80,000 को भी इस वर्ष सितंबर तक द्वीप पर लाकर बसाने की योजना है। बांग्लादेश एक मुस्लिम मुल्क है और वहाँ से बकरीद के दौरान खून से नहीं सड़कों की तस्वीरें अक्सर वायरल होती हैं। हालाँकि, पेटा जैसे कथित पशु-अधिकार संगठन इस पर नहीं बोलते।
पोर्न कंटेंट बनाने और उसे बेचने के आरोप में 19 जुलाई 2021 को गिरफ्तार हुए कारोबारी राज कुंद्रा को 23 जुलाई 2021 तक पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है। इस बीच उनसे जुड़े कुछ नए खुलासे हुए हैं। सागरिका शोना सुमन नामक एक एक्ट्रेस ने आरोप लगाया है कि कुंद्रा ने उनको वीडियो कॉल पर न्यूड ऑडिशन देने को कहा था।
सागरिका बताती हैं कि वह मॉडल हैं और 3-4 साल से इंडस्ट्री में काम कर रही हैं। उन्होंने ज्यादा काम नहीं किया लेकिन लॉकडाउन में उनके साथ कुछ ऐसा हुआ जिसमें वह शेयर करना चाहती हैं। वह कहती हैं, “अगस्त 2020 में मुझे उमेश कामत ने फोन करके वेब सीरिज ऑफर की जिसे राज कुंद्रा प्रोड्यूस करने जा रहे थे। मैंने राज कुंद्रा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि शिल्पा शेट्टी के पति हैं।”
वह कहती हैं,
“उन्होंने कहा कि मैंने वेब सीरिज की तो मुझे काम मिलेगा और मैं ऊँचाइयों पर जाऊँगी। ऐसी बात सुन मैं मान गई। फिर उन्होंने मुझे ऑडिशन के लिए कहा। मैंने उनसे कहा कि कोरोना में ऑडिशन कैसे दूँगी। उन्होंने कहा कि आप इसे वीडियो-कॉल के जरिए कर सकती हैं। जब मैं वीडियो कॉल में शामिल हुई तो उन्होंने मुझसे न्यूड ऑडिशन देने की माँग की। मैं चौंक गई और मैंने मना कर दिया। वीडियो कॉल में तीन लोग थे- जिनमें से एक ने अपना चेहरा ढका हुआ था और मुझे ऐसा लगता है कि उनमें एक राज कुंद्रा ही थे। मैं चाहती हूँ कि अगर वह ऐसी चीजों में शामिल है तो उसे गिरफ्तार किया जाए और इस तरह के रैकेट का पर्दाफाश किया जाए।”
यहाँ उल्लेखनीय है कि जिस उमेश कामत का जिक्र सागरिका ने किया है वह कुंद्रा की कंपनी में कर्मचारी था और मुंबई पुलिस ने उसे 9 फरवरी को पोर्न रैकेट मामले में गिरफ्तार किया था। उस पर ऑफिस मशीनरी का इस्तेमाल करके 8 पोर्न वीडियो अपलोड करने का आरोप था।
इससे पहले पूनम पांडे और शर्लिन चोपड़ा ने भी राज कुंद्रा पर ऐसे आरोप लगाए हैं। पूनम पांडे का कहना है कि उनका राज कुंद्रा की Armsprime Media फर्म के साथ कॉन्ट्रैक्ट था, लेकिन जब ये कॉन्ट्रैक्ट खत्म हुआ तो उनसे जुड़े कंटेंट का गलत इस्तेमाल हुआ। इसी तरह शर्लिन चोपड़ा ने भी बताया कि एडल्ट इंडस्ट्री में उन्हें कुंद्रा लेकर आए। उन्होंने 30 लाख रुपए में कुंद्रा के 15-20 प्रोजेक्ट किए हैं।
बता दें कि राज कुंद्रा को पोर्न फ़िल्में बनाने और फिर उन्हें कुछ एप्स के जरिए बेचने के आरोप में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 19 जुलाई 2021 गिरफ्तार किया। राज कुंद्रा के खिलाफ IPC और IT एक्ट के अलावा ‘स्त्री अशिष्ट रूपण प्रतिषेध अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। अब तक पूरे केस में 11 गिरफ्तारी हुई हैं। कुंद्रा के साथ रियान थार्प को 23 जुलाई तक पुलिस कस्टडी में भेजा गया है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील और पशु अधिकार कार्यकर्ता शिराज कुरैशी ने मुस्लिमों के सबसे बड़े त्यौहार बकरीद से एक दिन पहले कहा, ”इस्लाम में जानवरों के साथ क्रूरता करना ‘हराम’ है।” न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार बकरीद के जश्न में लाखों बेजुबान जानवरों की कुर्बानी को लेकर कुरैशी ने कहा कि जानवरों के प्रति क्रूरता, उन्हें प्रजनन के लिए बाधित करना, उनका वध करना, परिवहन और अपने फायदे के लिए उनको बंधक बनाना व उनका मांस खाना इस्लाम में हराम है।
वहीं, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया के अनुसार, बकरीद से पहले पूरे मुंबई शहर में अनगिनत अस्थायी और अवैध बकरी बाजार खुल गए हैं। ऐसे भीड़-भाड़ वाले बाजार न केवल महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी किए गए सर्कुलर का उल्लंघन कर रहे हैं, बल्कि कोरोना संकटकाल में ऐसे माहौल में स्थिति बेहद भयावह हो सकती है।
PETA India investigation reveals numerous illegal goat markets mushrooming up all over Mumbai in time for Eid.
महाराष्ट्र सरकार द्वारा कोविड-19 महामारी के मद्देनजर जारी किए गए सर्कुलर के अनुसार, जानवरों की खरीद की अनुमति केवल ऑनलाइन और टेलीफोन के जरिए ही की जा सकती है। ईद के दौरान सभी मौजूदा पशु बाजारों को बंद रखने की अनुमति दी गई है।
पेटा इंडिया ने कहा कि उन्होंने मुंबई के अंधेरी, भायखला, गोवंडी, जोगेश्वरी, कुर्ला और मानखुर्द सहित विभिन्न क्षेत्रों में 23 अवैध पशु बाजारों की जाँच की। उन्होंने पाया कि एक लाख से अधिक बकरों को बिक्री के लिए असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात सहित कई राज्यों से यहाँ लाया गया है। पेटा ने सीएमओ को दी शिकायत में आरोप लगाया कि ऐसे बाजार और विभिन्न राज्यों से जानवरों का परिवहन कोविड प्रोटोकॉल और द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स (पीसीए) एक्ट 1960, ट्रांसपोर्ट ऑफ एनिमल्स रूल्स, 1978 का उल्लंघन है।
पेटा इंडिया एडवोकेसी एसोसिएट प्रदीप रंजन डोले बर्मन ने कहा, “कोई भी धर्म किसी भी जीव की हत्या करना नहीं सिखाता। साल भर पशु संरक्षण कानूनों का पालन किया जाना चाहिए। खासतौर पर ईद के दौरान। पेटा इंडिया ईद के जश्न को पैसे, कपड़े, मिठाई, फल बाँटकर या अन्य तरीकों से मनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। इससे जानवरों को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है।”
जाँच के दौरान पेटा ने पाया कि कई जानवरों को छोटे स्थानों पर कैद करके रखा गया था, जहाँ वे ठीक से खड़े नहीं हो पा रहे थे, बैठ भी नहीं पा रहे थे। उनमें से कुछ आपस में लड़ रहे थे। इन बाजारों में कोई पशु चिकित्सक भी नहीं था, जिससे इन बाजारों में ऐसे पशुओं को साँस लेने में तकलीफ होती है। पेटा ने आरोप लगाया कि इन जानवरों को भोजन और पानी से भी वंचित रखा गया था।”
जाँच टीम ने जब खरीदारों और विक्रेताओं से बकरियों के परिवहन के लिए पशुओं के फिटनेस प्रमाण पत्र माँगे तो वे इसे नहीं दिखा पाए। यह जानवरों के परिवहन नियम, 1978 का उल्लंघन है। इस दौरान अधिकांश विक्रेता न तो मास्क नहीं पहने हुए थे और ना ही कोरोना गाइडलाइन का पालन कर रहे थे।
मध्य प्रदेश के इंदौर से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। वेल्डिंग करने वाले अफजल ने ‘गोलू’ नाम से इंस्टाग्राम पर फर्जी आईडी बनाई। फिर एक नाबालिग हिंदू लड़की को प्रेम जाल में फँसाया। 13 जुलाई 2021 को अफजल (24) लड़की को भगा भी ले गया। इसके बाद जब लड़की के माता-पिता पुलिस के पास पहुँचे तो पूरे मामले का खुलासा हुआ। बताया जा रहा है कि खुद को फ्रीज-कूलर का कारोबारी बता अफजल ने लड़की से दोस्ती की थी।
मामला राजेंद्र नगर थाना क्षेत्र के चंदन नगर का है। यहीं की रहने वाली 15 वर्षीय लड़की की इंस्टाग्राम के जरिए 6 महीने पहले गोलू (अफजल) से दोस्ती हुई। दोनों के बीच करीबियाँ बढ़ीं। इसी दौरान गोलू बने अफजल ने लड़की को खुद के कारोबारी होने के बारे में विश्वास दिलाया, जबकि हकीकत में वो वेल्डिंग का काम करता है।
लड़की के गायब होने के बाद उसके माता-पिता ने राजेंद्र नगर थाने में गायब होने की शिकायत की। थाना प्रभारी का कहना है कि शिकायत दर्ज होने के बाद लड़की 17 जुलाई को चोरी-छिपे अपने कागजात लेने के लिए घर आई थी। इसी माता-पिता ने उससे बातचीत की तो उसने बताया कि 6 महीने पहले उसकी दोस्ती गोलू नाम के युवक से हुई थी। लड़की ने बताया है कि वो गोलू (अफजल) के घर भी जाती थी। उसने लड़की के साथ शारीरिक संबंध भी बनाए हैं। नाबालिग लड़की ने माता-पिता को बताया कि कुछ ही दिन पहले उसे पता चला कि वो मुस्लिम है। हालाँकि वो नशा नहीं करता है इसलिए वो उसके साथ शादी करना चाहती है।
बहरहाल, पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है। उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट, रेप औऱ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 के तहत केस दर्ज किया गया है। नई दुनिया की रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित लड़की का धर्मान्तरण करवाना चाहता था। इसके अलावा लड़की ने पुलिस को बताया है कि उसकी कई सहेलियाँ इसी तरह से लव जिहाद के चंगुल में फँसी हुई हैं। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच कर रही है।
पश्चिम बंगाल में एक और भाजपा कार्यकर्ता की हत्या हुई है, जिसका आरोप राज्य की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) पर लगा है। राज्य में 2 मई को चुनाव परिणाम आने के साथ ही भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ जो हिंसा का दौर शुरू हुआ था, वो अब भी थमता नहीं दिख रहा। दक्षिणी रायगंज (विष्णुपुर) में भाजपा के एक सक्रिय सदस्य देबेश बर्मन का शव पेड़ से लटकता हुआ मिला। सूचना मिलते ही वहाँ भारी भीड़ जुट गई।
भाजपा की पश्चिम बंगाल यूनिट ने कहा है कि वो घृणा की राजनीति का शिकार बन गए। पार्टी ने इसे TMC के गुंडों द्वारा की गई हत्या करार देते हुए कहा कि ममता बनर्जी की निगरानी में भाजपा कार्यकर्ताओं का क्रूर नरसंहार चल रहा है। भाजपा के आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने भी कहा कि पश्चिम बंगाल में रोजाना ऐसी घटनाएँ हो रही हैं। उन्होंने ‘सत्ताधारी पार्टी के संरक्षण’ में होने वाली हत्याएँ तुरंत रोकने की माँग की।
In last 6 months, 162 BJP workers have been murdered. Tomorrow, under BJP Bengal President Dilip Ghosh, all parliament members will stage dharna. NHRC report is the tip of an iceberg. In several places, BJP workers were forced to hold TMC flags: BJP leader Samik Bhattacharya pic.twitter.com/dA1pqmmvcI
वहीं भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं की हत्या के आँकड़े जारी किए हैं। पार्टी ने कहा कि पिछले 6 महीने में 162 भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुई हैं। भाजपा नेता समीक भट्टाचार्य ने ये आँकड़े देते हुए कहा कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के नेतृत्व में भाजपा नेता पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के खिलाफ धरना देंगे। उन्होंने कहा कि ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)’ की रिपोर्ट तो सिर्फ एक झाँकी है।
It is just another day in Mamata Banerjee’s Bengal.
TMC goons brutally murder BJP member Debesh Barman, an active member of Raiganj South (Bisnupur), gag him with TMC flag and hang.
These political killings under the political patronage of the ruling party in Bengal must stop. pic.twitter.com/cCYirTVZ6J
उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि कई इलाकों में भाजपा कार्यकर्ताओं को जबरन TMC का झंडा थामने के लिए मजबूर किया गया। बुधवार (20 जुलाई, 2021) को महात्मा गाँधी की समाधि राजघाट पर ये धरना प्रदर्शन होगा। पार्टी ने कहा कि 2 मई के बाद से 38 भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है। वहीं 21 जुलाई को तृणमूल हर साल ‘शहीद दिवस’ मनाती है। इस दिन यूथ कॉन्ग्रेस के 13 कार्यकर्ता 1993 में हुई एक पुलिस फायरिंग में मारे गए थे।
भाजपा ने ये भी कहा है कि उसके 20,000 कार्यकर्ताओं को TMC के सत्ता में आने के बाद से बेघर होना पड़ा है। भाजपा नेता आज अपने मृतक कार्यकर्ताओं को श्रद्धांजलि भी देंगे। वहीं पश्चिम बंगाल में इलाकों में स्थानीय भाजपा पदाधिकारी विरोध प्रदर्शन करेंगे। वहीं तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भाजपा पर ममता बनर्जी की सरकार को बदनाम करने का आरोप लगाया। NHRC ने कलकत्ता हाईकोर्ट को दी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राज्य में ‘कानून का राज’ की जगह ‘राज करने वालों का कानून’ चल रहा है।
NHRC की 7 सदस्यीय टीम ने 20 दिन में 311 से अधिक जगहों का मुआयना करने के बाद राज्य में चुनाव के बाद हुई हिंसा पर अपनी रिपोर्ट सौंपी है। जाँच के दौरान टीम को राज्य के 23 जिलों से 1979 शिकायतें मिलीं। इनमें ढेर सारे मामले गंभीर अपराध से संबंधित थे। इनमें से अधिकांश शिकायतें कूच बिहार, बीरभूम, बर्धमान, उत्तरी 24 परगना और कोलकाता की हैं। इनमें से अधिकांश मामले दुष्कर्म, छेड़खानी व आगजनी की हैं और ये शिकायतें टीम के दौरा के वक्त लोगों ने बताई हैं।
आउटलुक की रिपोर्ट में कहा गया है, “वैश्विक स्तर के निगरानी तंत्र से पर्दा उठ गया है।” द वायर का हेडलाइन कहता है, “लीक डेटा बताता है कि एल्गार परिषद मामले में निगरानी सीमा को पार कर गई है।” द वायर के अन्य शीर्षक में कहा गया है, “जासूसी वाली सूची में 40 भारतीय पत्रकार हैं, फोरेंसिक जाँच से पेगासस स्पाइवेयर की उपस्थिति की पुष्टि होती है।” इधर भारतीय मीडिया भी चिल्ला रहा था, उधर द गार्जियन, जिसने मूल रूप से लोगों के खिलाफ कथित तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे पेगासस सॉफ्टवेयर की स्टोरी प्रकाशित की थी, के पहले पन्ने पर प्रधानमंत्री मोदी की एक बड़ी तस्वीर थी। इसका साफ मतलब है कि जो लोग उनसे सहमत नहीं है, प्रधानमंत्री मोदी उनकी जासूसी करवा रहे हैं।
द गार्जियन की तस्वीर
दुनिया भर के खोजी पत्रकारों एवं मीडिया घरानों का संघ ‘फॉरबिडेन स्टोरीज’ अपनी वेबसाइट पर कहता है, “इजरायल की कंपनी एनएसओ ग्रुप के ग्राहकों द्वारा निगरानी के लिए चुने गए 50,000 से अधिक फोन नंबरों का एक अप्रत्याशित खुलासा यह दिखाता है कि वर्षों से कैसे इस तकनीक का व्यवस्थित रूप से दुरुपयोग किया गया है। एनएसओ के ग्राहकों द्वारा चुने गए 50 से अधिक देशों के फोन नंबरों के रिकॉर्ड तक फॉरबिडेन स्टोरीज और एमनेस्टी इंटरनेशनल की साल 2016 से पहुँच थी।”
फॉरबिडन स्टोरीज (एफएस) के मुख्यत: 16 मीडिया पार्टनर हैं। एफएस और एमनेस्टी ने इस कथित “लीक किए गए नंबरों” की सूची हासिल की और इसे अपने मीडिया साझेदारों को सौंप दिया। उनके 16 मीडिया पार्टनर ने डेटा का विश्लेषण किया और अपना खुद का निष्कर्ष निकाला। उसके बाद, उन फोन नंबरों के बहुत ही छोटे प्रतिशत का एमनेस्टी ने विश्लेषण और ‘फोरेंसिक टेस्ट’ किया। उसके बाद उसने निष्कर्ष निकाला कि इजरायली स्पाइवेयर पेगासस का इस्तेमाल भारत सहित दुनिया भर की सरकारों द्वारा “सत्ता का घोर दुरुपयोग” करते हुए अपने विरोधियों, असंतुष्ट गुटों और कई अन्य लोगों की जासूसी करने के लिए किया जा रहा था।
अब हम उस पूरी कहानी को शुरू करते हैं, जिसे अब पेगासस कांड के रूप में पेश किया जा रहा है। इससे पहले यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जहाँ तक भारत का संबंध है, इस ‘नई जानकारी’ का उद्देश्य सत्तारूढ़ सरकार, विशेष रूप से प्रधानमंत्री मोदी को टॉरगेट करना है।
इस पूरी कहानी में ये बताने के लिए कोई सबूत नहीं है कि भारत सरकार ने किसी की जासूसी करवाई है। हालाँकि, कहानी कंसोर्टियम के साथ शुरू होती है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि 50,000 नंबरों के साथ खिलवाड़ किया गया है और कुछ नंबर हैं उनके पास जिनकी जासूसी हो भी सकती है या नहीं भी।
यह पूरी कहानी नशे में धूत साक्षात्कार के लिए बैठे एक छात्र की लगती है, जो सवालों के उत्तर देने में उलझ गया है। सबसे पहले गार्जियन द्वारा और बाद में द वायर द्वारा भारत में प्रकाशित इस खबर में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि मोदी सरकार कितनी अत्याचारी है।
भारत में पेगासस सॉफ्टवेयर के उपयोग के बारे में द गार्जियन का दावा
द गार्जियन द्वारा प्रकाशित इस मामले पर पहली रिपोर्ट का शीर्षक था, “खुलासा: साइबर-सर्विलांस हथियार का वैश्विक दुरुपयोग हुआ उजागर”। इस शीर्षक के बाद पहली पंक्ति में लिखा है – “आँकड़ें बताते हैं कि एक्टिविस्ट, राजनेताओं और पत्रकारों को लक्षित करने वाले अधिनायकवादी शासन को स्पाइवेयर बेचा गया।”
पेगासस एक मालवेयर है जो आईफोन और एंड्रॉइड डिवाइस को प्रभावित कर इसके ऑपरेटर को संबंधित फोन से मैसेज, फोटो और ईमेल निकालने, कॉल को रिकॉर्ड और माइक्रोफ़ोन को गुप्त रूप से सक्रिय करने में सक्षम बनाता है।
यहाँ पर गार्जियन ने पहले ही कुछ चीजें स्वत: स्थापित कर ली हैं। पहला, मोदी सरकार एक “अधिनायकवादी शासन” है और दूसरा, पीएम मोदी ने सभी संदेहों से परे वास्तव में असंतुष्टों की जासूसी की। इस वाक्य का प्रभाव समाप्त न हो जाए इसे सुनिश्चित करने के लिए मोदी की फोटो को फीचर इमेज के रूप में इस्तेमाल किया गया है।
द गार्जियन का इलुस्ट्रेशन
गार्जियन ने अपनी स्टोरी में दावा किया है कि स्पाइवेयर केवल अपराधियों और आतंकवादियों पर किए जाने के लिए बना है, लेकिन एनएसओ के अनुसार दुनिया भर की सरकारें इसका इस्तेमाल एक्टिविस्ट, वकीलों, सरकारी अधिकारियों और पत्रकारों की जासूसी करने के लिए कर रही हैं। इसके बाद यह बताता है कि सामने आए 50,000 नंबरों की एक सूची तक फॉरबिडन स्टोरीज और एमनेस्टी की पहुँच थी और उसने इसे छापने के लिए अपने 16 मीडिया साझेदारों को सौंप दिया।
लेकिन यहीं गड़बड़झाला है। रिपोर्ट में ही कहा गया है कि डेटा में एक फोन नंबर की मौजूदगी से यह पता नहीं चलता है कि कोई डिवाइस स्पाइवेयर से संक्रमित था या नहीं। तो क्या इंगित करता है? यह उनका विश्वास है कि डेटा एनएसओ के ग्राहकों के संभावित लक्ष्यों की ओर संकेत करता है। बस इस एक वाक्य के ये शब्द (संभावित लक्ष्य) चौंकाते हैं। इतना ही नहीं, उनकी कहानी में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो विश्वास के साथ कहता हो कि भारत सरकार द्वारा किसी भी ऐक्टिविस्ट को लक्ष्य बनाया गया। वे केवल अपने पाठकों के भोलेपन पर भरोसा कर रहे हैं कि वे इन कमजोर कड़ियों को खुद जोड़ लें।
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वे आगे लिखते हैं, “लीक हुई सूची में बेहद कम संख्या में दिए गए फोन नंबरों की फोरेंसिक विश्लेषण में यह बात सामने आई कि इनमें से आधे-से-अधिक पर पेगासस स्पाइवेयर के निशान थे। गार्जियन और उसके मीडिया पार्टनर आने वाले दिनों में उन लोगों की पहचान के नाम का खुलासा करेंगे, जिनका नंबर इस सूची में आया है। इनमें कैबिनेट मंत्री, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित सैकड़ों व्यावसायिक अधिकारी, धार्मिक हस्तियाँ, शिक्षाविद, एनजीओ कर्मचारी, केंद्रीय अधिकारी और सरकारी कर्मचारियों के नाम शामिल हैं। इस सूची में एक देश के शासक के करीबी परिवार के सदस्यों के नंबर भी शामिल हैं। शायद शासक ने अपनी खुफिया एजेंसियों को अपने स्वयं के रिश्तेदारों की निगरानी की संभावना तलाशने का निर्देश दिया होगा।” उन्होंने इस रविवार (18 जुलाई 2021) को 180 पत्रकारों के नाम प्रकाशित कर अपने खुलासे के साथ शुरुआत की है।
लेकिन वे पिछले पैराग्राफ में बता चुके हैं कि उनके पास कोई सबूत नहीं है। उनके पास सिर्फ इस बात कि संभावना है कि “बहुत कम फोन” में से कुछ प्रतिशत फोन में निशान मिले हैं, जिसका वे विश्लेषण करने में कामयाब रहे। फिर भी, उन्होंने रविवार को 180 नामों का खुलासा किया और अन्य नामों को धीरे-धीरे सामने रखने की योजना बनाई है।
उन्होंने कहा कि पेगासस का उपयोग “अधिनायकवादी शासन” द्वारा “जासूसी” के लिए किया जाता है, लेकिन उन्होंने अपनी बात को प्रमाणित नहीं किया है। क्या यह संभव है कि दुनिया भर की कुछ सरकारें अवैध रूप से इसका इस्तेमाल करती हैं? बेशक। इस पर विश्वास करना कठिन नहीं है कि कुछ सरकारें कानून के दायरे से बाहर जाकर जासूसी करना चाहती हों, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि गार्जियन ने जिन सरकारों का उल्लेख किया है वे ही ऐसा कर रही हैं? उनके खुद के अनुसार, इस सिद्धांत के समर्थन में उनके पास कोई सबूत नहीं है।
अब भारत की बात करते हैं, गार्जियन में छपी पहली स्टोरी दो खुलासा करती है:
1. भारत ने पेगासस के इस्तेमाल से इनकार किया
2. उमर खालिद की जासूसी की गई
लेख के बीच में गार्जियन स्पष्ट रूप से कहता है कि भारत ने पेगासस सॉफ्टवेयर के उपयोग से इनकार है। ऑपइंडिया द्वारा खास तौर दी गई प्रतिक्रिया भी यही कहती है।
इसके अलावा एनएसओ ने हाल ही में भारतीय समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में बताया है कि इस खबर में जिन देशों के नाम खुलासा का हुआ है वे सटीक नहीं हैं। एनएसओ का कहना है कि सूची में उल्लेखित कई देश एनएसओ के ग्राहक भी नहीं हैं। हालाँकि, उसने अपनी क्लाइंट सूची को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि कुछ देश उसके ग्राहक नहीं हैं।
अगर भारत सरकार और एनएसओ के, दोनों के दावे को एक साथ रखें तो ऐसा लगता है कि भारतीय पत्रकारों और अन्य लोगों के नाम इस सूची में डाले गए (शुरू में वे कह रहे थे कि इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी जासूसी की गई थी), जबकि ऐसा नहीं था भारत सरकार ने उनकी जासूसी की (यदि बिल्कुल भी)।
तो भारतीय नामों के बारे में गार्जियन ने क्या कहा?
उमर खालिद को लेकर द गार्जियन
द गार्जियन की रिपोर्ट में कहा गया है कि उमर खालिद को उसके खिलाफ देशद्रोह के आरोप लगाए जाने से पहले निगरानी के लिए “चुना” किया गया था। आगे यह बताता है कि पुलिस ने बिना यह बताए कि उसे यह जानकारी कहाँ से मिली, उसके फोन से मिली जानकारी के आधार पर चार्जशीट दायर की थी।
इस खंड में दिए गए मूर्खतापूर्ण तथ्य किसी समझदार को स्पष्ट दिखाई देती हैं, लेकिन गोरे लोग सोचते हैं कि भारतीय बहुत समझदार नहीं हैं। सबसे पहले, उन्होंने इस बात का सबूत नहीं दिया कि उमर खालिद को भारत सरकार द्वारा जासूसी के लिए “चुना” गया था या उसका मोबाइल “हैक” किया गया था। इसके अलावा, वे इस बात से चकित हैं कि पुलिस को चार्जशीट में जोड़ने के लिए उसके फोन से जानकारी मिली। जाहिर है कि गिरफ्तारी के बाद पुलिस को उसके फोन, लैपटॉप आदि का एक्सेस मिल गया, लेकिन अगर तथ्य बताए गए तो अनुमान फेल हो जाएगा।
और यही वह सीमा है जो द गार्जियन इस “खुलासे” में भारत की “भागीदारी” के बारे में बताता है। कोई सबूत नहीं, सिर्फ अनुमान। वो भी बुरी तरह तैयार किए गए अनुमान।
द वायर पेगासस और ‘जासूसी’ वाले पत्रकारों के बारे में क्या कहता है?
द वायर द्वारा प्रकाशित पहली रिपोर्ट में से एक का शीर्षक था, “पेगासस प्रोजेक्ट: पत्रकारों, मंत्रियों, एक्टिविस्ट के फोन कैसे उनकी जासूसी के लिए इस्तेमाल होते थे”। इस लेख को लिखा है सिद्धार्थ वरदराजन ने, जो जासूसी कांड के “पीड़ितों” में से एक हैं और जो गाँधी परिवार के खिलाफ खबरों को दबाने और उनके द्वारा फिइनांस किए गए पोर्टल के माध्यम से फर्जी खबरें फैलाने के लिए कुख्यात हैं। (भारत में इस खबर को प्रकाशित करने वाला यह पोर्टल उस कंसोर्टियम का हिस्सा है।)
द गार्जियन के पिछली झूठ को ध्यान में रखते हुए इस खबर को पढ़ना चाहिए कि कैसे द वायर खुद को और समान विचार के अन्य पत्रकारों का भारत में जासूसी होने का दावा करता है, जो कि अप्रमाणित आरोप है। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत एनएसओ की ग्राहक सूची का एक हिस्सा है, यह भी सिद्ध नहीं है और भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से इससे इनकार किया है।
पेगासस को लेकर द वायर की खबर
द वायर का दावा है कि 37 फोन में “पेगासस स्पाइवेयर द्वारा टारगेट किए जाने के स्पष्ट संकेत” हैं, जिनमें से 10 भारतीय हैं। अब देखते हैं कि इस संदर्भ में द गार्जियन की रिपोर्ट क्या कहती है। उसने ना कोई सबूत दिया और ना ही जासूसी को वास्तविकता बताया, सिवाय सिर्फ संदेह करने के। उसने यह भी कहा कि डेटाबेस 50,000 फोन का थे। अब, उन 50,000 फोनों में से 37 पर सॉफ़्टवेयर के निशान होंगे। अगर आँकड़ों के आधार पर बात करें तो इस संख्या के आधार पर कोई व्यापक विवरण नहीं दिया जा सकता, लेकिन पत्रकारिता कभी-कभी तथ्यों जैसी छोटी-छोटी बातों से सरोकार रखती है।
गार्जियन की खबर कहती है कि भारत सरकार ने पेगासस का उपयोग करने से इनकार किया है, लेकिन द वायर भारत ने अपनी खबर में दावा किया है कि एनएसओ ने कहा है, “भारत या विदेश में कोई भी निजी संस्था उस संक्रमण के लिए जिम्मेदार नहीं है। इसकी द वायर और उसके सहयोगियों ने पुष्टि की है।”
हमें नहीं पता कि द वायर ने क्या सवाल पूछा था। हो सकता है कि उसने पूछ हो कि क्या एनएसओ को निजी एजेंसियों पर उनके स्पाइवेयर का उपयोग करने पर संदेह है और एनएसओ ने शायद इस बात से इनकार किया हो और कहा हो कि इसका केवल सरकार और उनके खुफिया विभाग ही इस्तेमाल करते हैंं। हालाँकि, उस बयान का इस्तेमाल तब द वायर ने यह बताने के लिए किया था कि:
1. भारतीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया 2. भारत में या भारत के बाहर किसी भी निजी संस्था ने ये नहीं किया 3. इसलिए, इससे यह पता चलता है कि ऐसा भारत सरकार ने किया
इसमें से कुछ भी साबित नहीं किया जा सकता है।
यहाँ बताया गया है कि कैसे द वायर ने यह दावा करने की कोशिश की कि इसमें भारत सरकार शामिल थी।
द वायर की करतूत
द वायर मूल रूप से इस बात पर जोर दे रहा है कि भारत उसी भौगोलिक क्षेत्र में जहाँ जासूसी हो सकती है, इसका मतलब यही होगा कि भारत भी इसमें शामिल था। इस बात को और पुख्ता करने के लिए द वायर ने सिटीजन लैब की 2019 की रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसे खारिज कर दिया गया था। सिर्फ खारिज ही नहीं किया गया, बल्कि अर्बन नक्सल ने खुद को फँसाने के लिए ईमेल को “सबूत को प्लांट करने” बताने के अपने दावों को अदालत में तभी ध्वस्त कर दिया जब खुद को बचाने के लिए इनमें से एक ईमेल को सबूत के रूप में उन्होंने उद्धृत किया। आरोपी द्वारा आरोपी को बेगुनाह साबित करने के लिए जो सबूत पेश किया जाता है, वह नकली नहीं हो सकता।
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि सिटीजन लैब कनाडा सरकार की एक परियोजना है। सिटीजन लैब मंक स्कूल में स्थित एक शोध प्रयोगशाला है, जो टोरंटो विश्वविद्यालय में स्थित है। चूँकि सिटीजन लैब टोरंटो विश्वविद्यालय में स्थित है, इसलिए यह किसी भी परिस्थिति में कनाडा की सरकार से खुद को अलग नहीं कर सकता है और यह कोई रहस्य नहीं है कि कनाडा सरकार भारत की संप्रभुता को कमजोर करने वाले खालिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन कर भारत में कैसे परेशानी पैदा कर रही। .
कनाडा सरकार के अलावा, सिटीजन लैब की गैर-सरकारी फंडिंग पर भी एक नजर डालते हैं, जो गहरी एवं भयावह सांठ-गांठ की खुलासा करती है।
ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (जॉर्ज सोरोस), इंटरनेशनल डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर (कनाडा सरकार ने इसमें भारी निवेश किया है और सिटीजन लैब में भी), एचआईवीओएस (यह संगठन जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से जुड़ा हुआ है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न सरकारों से धन प्राप्त करता है) और कई अन्य संगठन सिटीजन लैब से जुड़े हैं।
इसलिए भारत ने पत्रकारों की जासूसी की थी, इसे साबित करने के लिए द वायर ने अंतरराष्ट्रीय सरकारों और जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित एक ऐसे संगठन की रिपोर्ट का हवाला दिया, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शासन परिवर्तन के लिए कुख्यात है। सबसे बड़ी बात कि इस रिपोर्ट का उनके पास कोई सबूत भी नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा किए गए फोरेंसिक विश्लेषण के बाद उसी सिटीजन लैब का उपयोग यह “सत्यापित” करने के लिए किया गया है कि क्या विश्लेषण किए गए फोन वास्तव में हैक की गई थी या नहीं?
द वायर उन चीजों को रेखांकित करने के लिए लिखता है, जिन्हें वह बिल्कुल साबित नहीं कर सकता। वह कहता है कि डेटाबेस सर्विलांस टारगेट के लिए संभावित चयन की ओर इंगित करता है, लेकिन वह फोरेंसिक परीक्षण (डेटाबेस के एक अंश पर फोरेंसिक परीक्षण किए गए थे) के बिना साबित नहीं कर सकता कि एक फोन हैक किया गया था। वह आगे एक न्यायाधीश के फोन को हैक किए जाने का संकेत देता है। हालाँकि, उनका कहना है कि द वायर यह पुष्टि करने में सक्षम नहीं है कि नंबर हैक किए गए थे या नहीं। संयोग से एक डेटाबेस में जोड़े जाने से पहले उस न्यायाधीश ने नंबर को छोड़ दिया था।
यह था द वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के दिमाग की खुराफात। द वायर का अगला लेख, जो दो अलग-अलग लोगों द्वारा लिखा गया है, उनका यहाँ उल्लेख करने का कोई विशेष महत्व नहीं है।
लेख का शीर्षक था, “स्नूप लिस्ट में 40 भारतीय पत्रकार, फोरेंसिक टेस्ट में कुछ पर पेगासस स्पाइवेयर की उपस्थिति की पुष्टि”। शुरुआत में लेख का सारांश कहता है, “संभावित टारगेट की लीक सूची में हिंदुस्तान टाइम्स, द हिंदू, द वायर, इंडियन एक्सप्रेस, न्यूज 18, इंडिया टुडे, पायनियर के अलावा फ्रीलांसर, स्तंभकार और क्षेत्रीय मीडिया के पत्रकार शामिल हैं।”
एक बार फिर संभावित शब्द पर ध्यान दें। जरूरी नहीं कि उन्हें हैक किया गया हो। जरूरी नहीं कि उनकी जासूसी की गई हो। वे संभावित टारगेट थे, क्योंकि उनके पास बिल्कुल भी सबूत नहीं है।
आगे बढ़ते हैं।
लेख में कहा गया है कि लीक हुए आंकड़ों में कुल 40 पत्रकारों के नाम हैं। इसमें आगे लिखा है, “10 भारतीय फोनों पर किए गए स्वतंत्र डिजिटल फोरेंसिक विश्लेषण, जिनके नंबर डेटा में मौजूद थे, ने या तो सफल पेगासस हैक या उसके प्रयास के संकेत दिखाए।”
जैसा कि हम आगे देखेंगे कि इस दावा के पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है। अगर हम इसे सच मान भी लेते हैं तो यह दावा करने के लिए परीक्षण का प्रतिशत दिलचस्प है। 40 में से 10 फोन 25% हैं। 50,000 में से 10 फोन 0.02% हैं। वाह।
इसके आगे लेख में कहा गया है, “कंपनी ने अपने ग्राहकों की सूची को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया, लेकिन भारत में पेगासस संक्रमण की उपस्थिति और टारगेट करने के लिए चुने गए व्यक्तियों की श्रेणी साफ संकेत देती है कि एजेंसी भारतीय नंबरों पर स्पाइवेयर संचालित कर रही है।”
यहां, द वायर स्वीकार करता है कि उसके पास वास्तव में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जो यह बताता हो कि भारत सरकार एनएसओ की क्लाइंट थी (भारत सरकार इससे इनकार करती है)। हालांकि, वे चाहते हैं कि आप पर विश्वास करें कि जिस प्रकार के लोगों को टारगेट किया गया, वह दर्शाता है कि असल में सरकार ‘जासूसी’ कर रही थी। कैसे? हम विश्वास के साथ नहीं कह सकते।
द वायर के लेख में अगला झूठ सरकार द्वारा वास्तव में कही गई बातों का सीधा विरोधाभास है और जिसे द गार्जियन कम-से-कम ठीक ढंग से समझने में कामयाब रहा।
द गार्जियन का साफ तौर पर कहना है कि मोदी सरकार ने पेगासस के इस्तेमाल से इनकार किया है, द वायर अपने लेख में इस तर्क को खींचने का प्रयास करता है ताकि भारतीय सरकार पर किसी तरह आक्षेप लगाया जा सके। वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे दावा किया कि नामों की यह सूची शायद पूरी नहीं है और वास्तविक व आधिकारिक सूची में कई अन्य नाम भी हैं।
द वायर के लेख में आगे कहा गया है कि इन पत्रकारों को सूची में जोड़ने का समय “समूह में विशेष रुचि” का संकेत देता है और फिर आगे यह कहता है कि अन्य लोगों को शायद उन खबरों के लिए जोड़ा गया था, जिन पर वे उस समय काम कर रहे थे। सबूत? फिर से, कोई नहीं। अटकलें, सिर्फ अनुमान (एक बार फिर)।
पत्रकारों की सूची और द वायर का डेटा क्या दिखाता है और क्या छुपाता है
द वायर अपने शब्द की भारी हेराफेरी के बाद आखिरकार यह सूची वाले बिंदु पर आया कि किन पत्रकारों की जासूसी का उद्देश्य था और विश्लेषण में क्या पता चला। यहाँ उन पत्रकारों की सूची दी गई है जिनका उल्लेख द वायर ने किया है।
तब वायर कहता है:
एमनेस्टी को इस बात के सबूत मिले कि सुशांत सिंह, ठाकुरता, आब्दी, वरदराजन और वेणु के फोन में पेगासस स्पाईवेयर से छेड़छाड़ की गई थी। स्मिता शर्मा के लिए, विश्लेषण में पाया गया कि ऐप्पल के आईमैसेज सिस्टम के माध्यम से हैकिंग के प्रयास किए गए, लेकिन उनके फोन में कुछ नहीं मिला और उनका फोन संक्रमित हो गया। विजेता सिंह के एंड्रॉइड फोन में भी हैक करने के प्रयास का सबूत मिला, लेकिन छेड़छाड़ का कोई सबूत नहीं मिला।
ध्यान रहे ये सभी लोग पीड़ित होने का स्वांग कर रहे हैं। स्वाति चतुर्वेदी, सुशांत सिंह, विजेता और ये सभी पत्रकार शहीद की भूमिका निभा रहे हैं। हालाँकि, द वायर की रिपोर्ट में ही कहा गया है कि ज्यादातर मामलों में वे यह साबित भी नहीं कर पाए कि फोन हैक हुआ था या नहीं।
वह आगे कहता है:
द वायर स्पष्ट रूप से कहता है कि उसे इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि “हमलावर” ने “पेगासस” के साथ क्या किया, लेकिन निष्कर्ष निकालकर कुछ पत्रकारों, विशेष रूप से द वायर से जुड़े लोगों का महिमामंडन किया गया है।
दूसरों के विपरीत इन पांच नामों में वह उल्लेख करता है कि “हमले” के लिए किस वेक्टर का उपयोग किया गया था, लेकिन इस बात का सबूत नहीं है कि फोन से छेड़छाड़ की गई थी अथवा नहीं और यदि की गई थी तो किसके द्वारा और किस हद तक।
फॉरबिडेन स्टोरीज का अमेरिकी सरकार से लिंक और मध्य-पूर्व में सरकार बदलने के लिए प्रोपेगंडा फैलाना काम
फॉरबिडेन स्टोरीज की वेबसाइट के अनुसार, “फॉरबिडन स्टोरीज यह सुनिश्चित करती है कि खतरे में पड़े पत्रकार अपनी जानकारी सुरक्षित कर सकें।” आगे लिखा है, “हम उन्हें अपनी संवेदनशील जानकारियों को हमारे सुरक्षित कम्युनिकेशन चैनलों में से एक में रखने की क्षमता प्रदान करते हैं। अगर उन्हें कुछ होता है तो हम उनकी कहानियों को सीमाओं से परे, सरकारों से परे, सेंसरशिप से परे सुनिश्चित करेंगे।”
एफएस को रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) और फ्रीडम वॉयस नेटवर्क द्वारा लॉन्च किया गया था। अतीत में आरएसएफ ने उन मीडिया संगठनों की फंडिंग की थी, जो सीरिया और उसके राष्ट्रपति बशर अल-असद के खिलाफ शासन परिवर्तन के लिए प्रोपेगंडा फैलाते हैं। आरएसएफ को खुद अमेरिकी सरकार से फंडिंग मिलती है। इस प्रकार, एफएस के संस्थापकों में से कम-से-कम एक के झुकाव से स्पष्ट हो जाता है।
एफएस के फंडिंग करने वालों पर नजर डालने पर और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। हालाँकि, यह उल्लेख करने में सावधानी बरती जाती है कि दाता कवरेज को प्रभावित नहीं करते हैं, यह केवल एक अत्यंत आदर्शवादी दुनिया में ही सच होता है। चूँकि हम ऐसी दुनिया में नहीं रहते इसलिए हमारे लिए उनके शब्दों को स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है।
एफएस के दान दाताओं में एक लाइमलाइट फाउंडेशन (एलएफ) है। एलएफ कई संगठनों को फंड करता है। उनमें से एक प्रमुख है बेलिंगकैट। यह एक मीडिया संस्थान है, जो सीरिया के खिलाफ पश्चिम के अवैध युद्ध को वैध दिखाने के लिए प्रोपेगंडा फैलाती है।
जैसा कि द ग्रेजोन द्वारा रिपोर्ट किया गया है, बेलिंगकैट का ‘नाटो’ से व्यापक संबंध है और उसने ‘रूस को कमजोर’ करने के लिए यूनाइटेड किंगडम के प्रयासों में सहयोग किया था। इसके अलावा, यह अमेरिकी सरकार द्वारा वित्त पोषित परियोजना नैशनल एडोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी से ग्रांट प्राप्त करता है।
एफएस का एक अन्य दाता ल्यूमिनेट है, जिसे 2018 में ओमिडयार समूह ने स्थापित किया था। ल्यूमिनेट की 2018-2022 के लिए रणनीतिक योजना में उल्लेख किया गया है कि “अनुदारवादी लोकतंत्र उभर रहे हैं”, “नागरिकों के स्थान सिकुड़ रहे हैं और नागरिक समाज पर हमले हो रहे हैं”, “बढ़ता पोपुलिज्म ऐतिहासिक दलगत राजनीति में दरार पैदा कर रहा है।”, “राष्ट्रवादी दृष्टिकोण अधिक प्रतिध्वनित हो रहा है।” और “समुदाय अन्य चीजों के बीच अधिक ध्रुवीकृत हो रहे हैं।”
जबकि रणनीतिक योजना और राष्ट्रवाद के प्रति इसकी दुश्मनी इसकी वैचारिक उन्मुखता को स्पष्ट करती है, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ओमिडयार समूह दुनिया भर में मीडिया संगठनों के एक मेजबान को धन देता है, ज्यादातर स्क्रॉल.इन जैसे वैश्विक वामपंथी पोर्टल को।
द ग्रेजोन के अनुसार, ल्यूमिनेट ने ऐसी फिल्मों के निर्माण के लिए सनडांस इंस्टीट्यूट को दान दिया, जिनका “सार्वजनिक मुद्दों और आंदोलन-निर्माण अभियानों को दबाने के लिए रणनीतिक रूप से इस्तेमाल किया।” ग्रेजोन रिपोर्ट में कहा गया है, “ओमिडियार के ल्यूमिनेट द्वारा एक रणनीतिक सफलता के रूप में उद्धृत फिल्मों में द लास्ट मेन इन अलेप्पो था, जो सनडांस इंस्टीट्यूट द्वारा निर्मित और सीरियन व्हाइट हेल्मेट्स के लिए ऑस्कर-नामांकित प्रोपेगंडा माध्यम था।”
रिपोर्ट के अनुसार, “व्हाइट हेलमेट ‘नागरिक बचाव’ से जुड़ा एक सीरियाई विद्रोही-गठबंधन समूह है, जिसकी स्थापना एक ब्रिटिश पूर्व सैन्य खुफिया अधिकारी द्वारा तुर्की में की गई थी। अल कायदा-नियंत्रित इदलिब प्रांत सहित विद्रोहियों के कब्जे वाले क्षेत्र में विशेष रूप से संचालित, व्हाइट हेलमेट्स को यूएसएआईडी, यूके विदेश कार्यालय और कतर के राजशाही द्वारा वित्त पोषित किया गया है।
इस प्रकार, एफएस को धन देने वाला ल्यूमिनेट, सीरिया के खिलाफ पश्चिम के सरकार परिवर्तन युद्ध को सही ठहराने के लिए प्रोपेगंडा फिल्में बनाता है। इसके अलावा, द ग्रेज़ोन के अनुसार, ल्यूमिनेट को ओबामा प्रशासन के एक अधिकारी बेन स्कॉट द्वारा चलाया जाता था, जिन्होंने हिलेरी क्लिंटन के विदेश विभाग में भी काम किया है।
FS के अन्य दाताओं में जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन (OSF) शामिल हैं, जिनका भारत सरकार के प्रति दृष्टिकोण सबके सामने है। वहीं, वेलस्प्रिंग फिलैंथ्रोपिक फ़ंड अभी गोपनीयता के चादर में लिपटा हुआ है।
FS ने हाल ही में अपनी वेबसाइट पर मीडियापार्ट के हेड ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन फ़ैब्रिस अफ़री के अनुमोदन को भी गर्व के साथ प्रदर्शित किया था। मीडियापार्ट वही फ्रांसीसी वामपंथी संगठन है, जो राफेल सौदे पर दुष्प्रचार कर रहा है। एफएस ने अब अपनी वेबसाइट से “हमारी मदद करें” पेज को पूरी तरह से हटा दिया है।
द वायर और द गार्जियन की जुगलबंदी बताते हैं कि निम्नलिखित प्रश्नों के उनके पास उत्तर नहीं:
1. द वायर स्पष्ट रूप से उल्लेख करता है कि सूची में नाम होने का मतलब यह नहीं है कि फोन के साथ छेड़छाड़ हुई है। अगर यह सच है तो हर रोज नाम क्यों फेंके जा रहे हैं (उनका दावा है कि वे ऐसा करने जा रहे हैं)। यदि नाम होने का मतलब यह नहीं है कि उनकी निगरानी की गई थी और अधिकांश फोनों का परीक्षण नहीं किया गया है, तो इस खबर के जरिए क्या साबित करना है?
2. अगर भारत सरकार ने पेगासस का उपयोग करने से इनकार किया है और एनएसओ ने कहा है कि कथित सूची के कई नाम उनके ग्राहक नहीं हैं तो मोदी सरकार के खिलाफ ये अनुमान कैसे लगाए जा रहे हैं? यहाँ यह बताना जरूरी है कि एनएसओ समूह ने एक बयान में कहा कि वह द वायर पर मानहानि का मुकदमा करने पर विचार कर रहा है।
3. यह दावा कि भारतीय पत्रकारों की भारत द्वारा ही “जासूसी” की गई थी, इसका सबूत नहीं है। उदाहरण के लिए, सिद्धार्थ वरदराजन एक अमेरिकी नागरिक हैं। क्या यह संभव नहीं है कि कोई और देश अपने ‘एसेट्स’ की जासूसी कर रही हो? उदाहरण के लिए, द हिंदू नियमित रूप से चीन के पक्ष में लिखता है। यह जानने के बाद कि चीन अपनी ‘एसेट्स’ की निगरानी कैसे करता है, क्या यह संभव नहीं है कि चीन द हिंदू के पत्रकारों की जासूसी करने का प्रयास कर रहा हो? सबूतों के अभाव में ये सब अटकलें हैं और इनकार के बावजूद भारत सरकार के शामिल होने का दावा, कम-से-कम कहने के लिए एक प्रेरित कथा और एक दुर्भावनापूर्ण झूठ की तरह लगता है।
4. कंसोर्टियम के इन आरोपों को अमेरिकी प्रतिष्ठान से जोड़ा जा रहा है, जो शासन परिवर्तन को प्रभावित करता है। क्या यह संभव है कि यह एक बड़े पैमाने पर ऑपरेशन को अंजाम दिया जा रहा है, जिसमें सरकार को अस्थिर करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और भारत में द वायर जैसी वाम मीडिया शामिल हैं?
5. क्या यह दिलचस्प बात नहीं है कि इस ऑपरेशन में शामिल ज्यादातर एजेंसियाँ विदेशी हैं? उदाहरण के लिए, फॉरबिडेन स्टोरीज अमेरिकी प्रतिष्ठान और जॉर्ज सोरोस से जुड़ी है, सिटीजन लैब को कनाडा सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, द वायर को अमेरिकी प्रतिष्ठान सहित संदिग्ध स्रोतों से धन प्राप्त होता है और भी बहुत कुछ।
6. क्या सबूत है?
7. क्या वामपंथी मीडिया कभी कोई खबर सही की है, जिसमें देश की उन्नति और विकास की बात करने के लिए कोई जगह हो, सिवाय देश को अराजकता की आग में झोंकने के?
पेगासस कहानी एक बुझा हुआ पटाखा हो सकती है, लेकिन इसमें “शासन परिवर्तन” की कहानी सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है। यह कोई रहस्य नहीं है कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा आदि देशों में सरकारें और प्रतिष्ठान भारत के आंतरिक मामलों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करते रहे हैं। संभवतः ऐसा करने का यह एक और प्रयास हो सकता है – मोदी सरकार पर बिना तथ्य के भी लांछन लगाओ, क्योंकि किसी देश को अराजकता की ओर धकेलने के लिए केवल एक सावधानी से गढ़ा गया झूठ ही काफी होता है।
नोट- Opindia की ग्रुप एडिटर Nupur J Sharma द्वारा मूल रूप से इंग्लिश में लिखे इस लेख का सुधीर गहलोत ने अनुवाद किया है।
भारत में पेगासस (Pegasus) के नाम पर हाय-तौबा मचने के बाद अब पाकिस्तान में भी इसका रोना शुरू हो गया है। पाकिस्तानी सूचना मंत्री फवाद चौधरी का कहना कि उनके प्रधानमंत्री इमरान खान की भी जासूसी भारतीय सरकार ने इजरायली सॉफ्टवेयर ‘पेगासस’ की मदद से करवाई।
पाकिस्तान ने सोमवार (जुलाई 19, 2021) को दावा किया कि एक नंबर, जो पीएम इमरान खान ने कभी इस्तेमाल किया था, वो भी रिपोर्टों के मुताबिक भारत की सूची में था। चौधरी का कहना है कि वह इस जासूसी के मुद्दे को आगे संबंधित मंचों पर जरूर उठाएँगे।
गौरतलब है कि कुछ प्रकाशनों द्वारा पब्लिश किए गए फोन टैपिंग के दावों का कोई सबूत नहीं मिल पाया है। चौधरी के पास भी इस टैपिंग को लेकर कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन फिर भी कॉन्ग्रेस की भाँति पाकिस्तान इस पर अपना हल्ला मचा रहा है।
Extremely concerned on news reports emerging from @guardiannews that Indian Govt used Israeli software to spy on Journalists,political opponents and politicians,unethical policies of #ModiGovt have dangerously polarised India and the region… more details are emerging
एक इंटरव्यू में चौधरी ने कहा कि वह इस हैकिंग से जुड़ी जानकारी एकत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं ट्विटर पर उन्होंने लिखा,
“गार्जियन न्यूज की खबरों पर बेहद चिंतित हूँ जिनमें कहा गया है कि भारतीय सरकार ने इजरायली सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर पत्रकारों, राजनीतिक प्रतिद्वंदियों और राजनेताओं की जासूसी करवाई। मोदी सरकार की अनैतिक नीतियों ने भारत का खतरनाक ढंग से ध्रुवीकरण कर दिया है। अधिक जानकारी सामने आ रही हैं।”
फवाद चौधरी ने भारत के ख़िलाफ़ बयानबाजी करने के लिए कॉन्ग्रेस के पूर्व प्रवक्ता संजय झा का ट्वीट भी रीट्वीट किया।
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि पाकिस्तान के सैंकड़ों नंबरों की जासूसी की गई और इसमें एक नंबर इमरान खान से भी जुड़ा है, जिसका उन्होंने कभी इस्तेमाल किया था, लेकिन अब वह उसे नहीं चलाते। पहली बात तो ये कि फवाद के पोस्ट में खुद ये बात स्पष्ट नहीं है कि आखिर खान के नंबर की जासूसी हो पाई या नहीं। इसके अलावा उन्होंने पेगासस पर रोना रोने में इतनी जल्दी की, कि वह भूल गए कि अगर ऐसा वाकई हुआ है तो ये उनकी पार्टी और उनके देश की खुफिया एजेंसी की विफलता है।
कॉन्ग्रेस ने मचाया पेगासस पर हल्ला
पाकिस्तान से पहले रविवार को यही हाल भारत में कॉन्ग्रेस का था। द वायर ने 40 पत्रकारों की लिस्ट निकाली थी और दावा किया था कि इन सबकी जासूसी पेगासस के जरिए करवाई गई थी। इसके बाद कई कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता निकल कर बाहर आए और इस मुद्दे पर प्रदर्शन किया। जो पुरुष प्रदर्शनकारी थे उन्होंने अपनी शर्ट उतारकर प्रदर्शन किया। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता श्रीनिवास बीवी ने तो ये तक आरोप लगाया कि राहुल गाँधी और उनके साथियों को लोकसभा 2019 चुनावों के मद्देनजर इसमें टारगेट किया गया।
भारत सरकार ने नकारे दावे
भारत सरकार ने बयान जारी करके ऐसे किसी भी जासूसी के आरोप को नकारा है। साथ ही मामले पर उठाए गए सवालों का जवाब दिया है। बयान में कहा गया है कि पूरी कहानी मनगढ़ंत हैं। इसमें न केवल तथ्यों की कमी है, बल्कि पहले से ही नतीजे बता दिए गए हैं। ऐसा लग रहा है कि ये लोग जाँचकर्ता के अलावा अधिवक्ता और पीठ का भी अभिनय कर रहे हैं। आरोपों का कोई आधार नहीं है और न ही ये सच से संबंधित हैं।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के सलाहकार और पूर्व नौकरशाह अजय मेहता (Ajoy Mehta) पर आयकर विभाग जल्द शिकंजा कस सकता है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, आयकर विभाग (IT) मेहता के नरीमन प्वाइंट वाले फ्लैट से जुड़ी डील पर बेनामी संपत्ति के तहत जाँच कर रहा है। मेहता को फरवरी 2021 में महारेरा (MahaRera) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
जाँच में खुलासा हुआ है कि मुख्यमंत्री ठाकरे के सलाहकार ने अनामित्रा प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड नाम की जिस कंपनी से यह फ्लैट खरीदा था, वह एक शेल कंपनी है। बताया जा रहा है कि इस कंपनी के दो शेयर होल्डर हैं। ये दोनों मुंबई की चॉल में रहते हैं।
मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि इस कंपनी को सिर्फ इस फ्लैट की डील के लिए बनाया गया था। कंपनी की बैलेंस शीट में कई गड़बड़ियाँ सामने आई हैं। साथ ही यह भी पता चला है कि दोनों शेयर होल्डर्स ने करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद रिटर्न भी दाखिल नहीं किया है। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि फ्लैट की डील में धोखाधड़ी की गई है।
दस्तावेजों से यह भी खुलासा हुआ है कि मेहता ने साल 2020 में 5.33 करोड़ रुपए में 1076 स्क्वायर फीट का फ्लैट खरीदा था। इससे पहले साल 2009 में यह प्रॉपर्टी अनामित्रा प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड ने 4 करोड़ रुपए में खरीदी थी। कंपनी के दो शेयर होल्डर्स में से एक कामेश नथुनी सिंह के इस कंपनी में 99 फीसदी शेयर हैं। इनका पता ओबरॉय मॉल के पास बताया गया है। इसके बावजूद उन्होंने अभी तक अपना आयकर रिटर्न नहीं भरा है। वहीं, दूसरे शेयर होल्डर का नाम दीपेश सिंह रावत है। उसने साल 2020-21 में केवल एक बार ही रिटर्न भरा था। इसमें उन्होंने अपनी आय 1 लाख 71 हजार 2 रुपए बताई थी।
रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इन दोनों शेयर होल्डर्स की आय बेहद कम है। ऐसे में स्पष्ट है कि ये करोड़ों की संपत्ति नहीं खरीद सकते हैं। डील विवाद पर सफाई देते हुए इंडिया टुडे को मेहता ने बताया, “प्रॉपर्टी के मालिक को जानने का मेरे पास कोई कारण नहीं है। वह एक कानूनी सौदा था, जिसे पूरी प्रक्रिया के साथ किया गया है। मैंने मॉर्केट वेल्यू के हिसाब से इसका भुगतान किया है। मैं एक करदाता हूँ और मुझे गड़बड़ियों के बारे में पता नहीं है।”