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भारतीय मूल की सिरिशा बांदला… वायुसेना पायलट नहीं बन सकीं, अब जा रहीं अंतरिक्ष में, होंगी तीसरी ‘इंडियन’ महिला

सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला के बाद अब भारत की एक और बेटी सिरिशा बांदला अंतरिक्ष की सैर करने वाली हैं। भारतीय मूल की सिरिशा मशहूर उद्योगपति रिचर्ड ब्रैनसन की स्पेस कंपनी वर्जिन गैलेक्टिक के अंतरिक्ष यान वर्जिन ऑर्बिट में बैठकर रविवार (11 जुलाई 2021) को अंतरिक्ष यात्रा पर रवाना होंगी। अंतरिक्ष यात्रा पर जा रही ब्रैनसन की टीम में बांदला के अलावा एक दूसरी महिला बेश मोसिस भी शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के गुंटूंर जिले में जन्मी सिरिशा वर्जिन गैलेक्टिक कंपनी में गवर्नमेंट अफेयर्स एंड रिसर्च ऑपरेशंस की वॉयस प्रेसीडेंट हैं। वह अमेरिका में टेक्सास के ह्यूस्टन में पली-बढ़ी हैं। भारत में सिरिशा केवल 5 साल तक ही रही हैं। 34 वर्षीय सिरिशा पर्ड्यू यूनिवर्सिटी से एयरोनॉटिकल/एस्ट्रोनॉटिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएट हैं और जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से MBA की डिग्री हासिल की हैं।

सिरिशा बांदला ने महज 6 सालों की नौकरी में ही यह पद हासिल कर लिया है। वह भारतीय मूल की तीसरी ऐसी महिला हैं, जो अंतरिक्ष के सफर पर रवाना होने वाली हैं। इससे पहले सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला अंतरिक्ष में गई थीं। बताया जा रहा है कि ब्रैनसन की टीम में सिरिशा के अलावा चार और लोग भी शामिल हैं।

उन्होंने हाल ही में ट्वीट किया, “मैं यूनिटी22 के बेहतरीन क्रू का हिस्सा बनकर और एक ऐसी कंपनी का साथ पाकर बेहद सम्मानित महसूस कर रही हूँ, जिसका मिशन सभी के लिए अंतरिक्ष को सुगम बनाना है।” सिरिशा के अंतरिक्ष में जाने की खबर सोशल मीडिया पर वायरल होते ही हर भारतीय खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है और उन्हें ट्विटर पर बधाई दे रहे हैं।

गौरतलब है कि सिरिशा बचपन से ही अंतरिक्ष यात्री बनना चाहती थीं। हालाँकि, कमजोर दृष्टि होने के कारण वह वायुसेना में पायलट नहीं बन सकीं। लेकिन अब वह अपनी अंतरिक्ष यात्रा के दौरान अंतरिक्षयात्रियों पर होने वाले असर का अध्ययन भी करेंगी।

सिरिशा के पिता डॉक्टर मुरलीधर एक वैज्ञानिक हैं और अमेरिकी सरकार में वरिष्ठ कार्यकारी सेवा के सदस्य हैं। वहीं, उनके दादा बांदला रगहिया एक कृषि विज्ञानी हैं। वह अपनी पोती की इस उपलब्धि से बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, “हमेशा उसमें कुछ बड़ा हासिल करने का उत्साह देखता था। आखिरकार वह अपना सपना पूरा करने जा रही है। मुझे विश्वास है कि वह इस मिशन में सफलता हासिल करेगी और पूरे देश को गर्व महसूस कराएगी।”

पुलिस वाले सस्पेंड, निर्दलीय समर्थक गिरफ्तार; तब जाकर सपा कार्यकर्ता की ‘साड़ी’ पर जागे राहुल गॉंधी

पार्ट टाइम पॉलिटिशियन के तौर पर अपनी पहचान बना चुके कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधा है। उन्होंने लखीमपुर खीरी में एक सपा कार्यकर्ता को परेशान की जाने की खबर का स्क्रीनशॉट पोस्ट करते ट्वीट किया कि प्रदेश में ‘हिंसा’ का नाम बदल कर उसे ‘मास्टर स्ट्रोक’ कर दिया गया है। दरअसल, सपा कार्यकर्ता को परेशान करने के आरोप में एक व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने और लखीमपुर खीरी पुलिस स्टेशन के सभी पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किये जाने के बाद राहुल गाँधी का ध्यान इस तरफ गया है।

अपनी नासमझी के कारण राहुल गाँधी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी नामसझी और ‘एक भाषण के बाद एक छुट्टी’ वाले तरीके के कारण ही 2019 लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस 52 सीटों पर सिमट गई थी। दिलचस्प बात यह है कि राहुल गाँधी हमेशा की तरह ही इस राजनीतिक द्वंद्व में भी थोड़ी देर से आए हैं।

बता दें कि जिस तरीके से पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई राजनीतिक हिंसा की घटनाएँ बेरोक-टोक जारी हैं, उसके ठीक विपरीत उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, नामाँकन दाखिल करने के दौरान समाजवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता की प्रस्तावक रही महिला कार्यकर्ता को परेशान किए जाने और महिला के कपड़े उतारने की घटना के अगले ही दिन सीएम योगी आदित्यनाथ ने लखीमपुर पुलिस स्टेशन के सभी पुलिसकर्मियों को निलंबित करने का आदेश दे दिया। इस घटना में थाना प्रभारी और सीओ तक को नहीं बख्शा गया और उन्हें भी निलंबित कर दिया गया।

समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी रितु सिंह की शिकायत के आधार पर आरोपित यश वर्मा और अन्य अज्ञात बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 171एफ, 354, 392 और 427 के तहत मामला दर्ज किया गया है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने यश वर्मा को गिरफ्तार भी कर लिया है। एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपित यश निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थक है। वहीं, इंडिया टुडे के अनुसार, मामले में दूसरे आरोपित को भी दबोच लिया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि उत्पीड़न की घटना पर कड़ी कार्रवाई करने के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता सीएम योगी आदित्यनाथ पर निशाना साध रहे हैं। जबकि, पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों की बड़े पैमाने पर हत्या, बलात्कार और यातना के बारे में उन्होंने बात तक नहीं की है। जबकि, हाल ही में NHRC की कमेटी की रिपोर्ट को देखने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय ने टीएमसी के चुनाव जीतने और ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में हुई राजनीतिक हिंसा के खिलाफ तीखी टिप्पणी की थी।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा था, “याचिकाकर्ताओं द्वारा लिया गया स्टैंड से पता चलता है कि चुनाव के बाद हिंसा हुई थी और राज्य गलत रास्ते पर था। राज्य सरकार इन घटनाओं की पूरी तरह अनदेखी कर रही थी।” कोर्ट ने जाँच में पाया कि राज्य में चुनाव बाद हुई हिंसा में कई लोग मारे गए, कई महिलाओं का यौन शोषण किया गया, लोगों को गंभीर चोटें आईं। यहाँ तक कि नाबालिग लड़कियों तक को नहीं छोड़ा गया। हिंसा के पीड़ितों में से कईयों का आशियाना उजड़ गया और उन्हें पड़ोसी राज्यों में पलायन करना पड़ा।”

उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था, “आज तक राज्य सरकार ऐसा माहौल नहीं बना सकी है कि पीड़ितों में वो विश्वास जाग सके कि वो अपने घर वापस लौट सकें या अपना व्यवसाय कर सकें।” अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस ने पीड़ितों की शिकायतें दर्ज करने की बजाय शिकायत करने वाले लोगों के खिलाफ ही केस दर्ज किया।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, ”पश्चिम बंगाल की हिंसा के दौरान रजिस्टर्ड हुए केसों की जाँच में इतनी लापरवाही बरती है कि मामलों में शायद ही कभी कोई गिरफ्तारी हो। कुछ केस दर्ज ही नहीं हुए। ज्यादातर मामलों में आरोपित जमानत पर बाहर आ चुके हैं।” कोर्ट ने यह भी कहा कि जघन्य अपराधों के केस में पुलिस ने तभी केस दर्ज किया जब उस मामले में खुद हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया।

हाई कोर्ट द्वारा इस तरह की तीखी टिप्पड़ियों के बाद भी राहुल गाँधी के कानों जूँ तक नहीं रेंगी। वह चुप ही रहे।

लखीमपुर खीरी में क्या हुआ

गुरुवार (08 जुलाई 2021) को ब्लॉक पंचायत की कैंडिडेट के साथ नामांकन दाखिल करने आई एक महिला नेता पर दो लोगों ने हमला कर दिया था। सपा नेता की प्रस्तावक रही महिला कार्यकर्ता के साथ नामांकन केंद्र पर कुछ लोगों ने मारपीट की और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपित निर्दलीय प्रत्याशी का समर्थक था।

इस वारदात का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और इसको लेकर लोग अपना गुस्सा जता रहे थे। वीडियो में देखा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी (सपा) की एक महिला कार्यकर्ता को उत्तर प्रदेश में स्थानीय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करते समय दो लोग हमला कर देते हैं। आरोपितों को उसके साथ छेड़छाड़ उसकी साड़ी उतारने की कोशिश करते देखा जा सकता है।

एक-दूसरे को ही पीट रहे रहे कॉन्ग्रेसी: कर्नाटक में अध्यक्ष शिवकुमार ने मारा थप्पड़, राजस्थान में भी हाथापाई

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष डीके शिवकुमार का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है। इसमें वह अपनी ही पार्टी के एक कार्यकर्ता को थप्पड़ मारते दिख रहे हैं। शिवकुमार का कहना है कि Covid-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन होने पर उन्हें गुस्सा आया था। लेकिन सोशल मीडिया पर लोग इसे कॉन्ग्रेसी नेता का अहंकार बता रहे हैं।

घटना मांड्या की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मादेगौड़ा के स्वास्थ्य की जानकारी लेने के लिए शिवकुमार मांड्या गए हुए थे। वायरल वीडियो में एक व्यक्ति उनके साथ चलता और उनके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश करता दिख रहा है। इससे नाराज होकर शिवकुमार उस व्यक्ति को थप्पड़ मार देते हैं।

वीडियो वायरल होने पर शिवकुमार ने सफाई देते हुए कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न होने के कारण उन्हें गुस्सा आ गया था। जब शिवकुमार को यह पता चला कि उनका वीडियो मीडिया के पास है तो उन्होंने वीडियो डिलीट करने की माँग भी की।

हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शिवकुमार ने अपना आपा खोया हो। इसके पहले भी वो अपने समर्थकों को ही सेल्फी लेने के लिए थप्पड़ मार चुके हैं। 2018 में कॉन्ग्रेस के चुनाव प्रचार के दौरान बेल्लारी में उन्होंने एक आदमी को थप्पड़ मार दिया था, क्योंकि वह उनके साथ सेल्फी लेना चाहता था।

राजस्थान में भी कॉन्ग्रेसियों के आपस में उलझने और हाथापाई का मामला सामने आया है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार राजसमंद में केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदेश स्तरीय विरोध प्रदर्शन को लेकर बैठक बुलाई गई थी। इसी दौरान युवा कॉन्ग्रेस जिला उपाध्यक्ष दिलीप जोशी ने पार्टी पर कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप लगाया। इसके कारण विवाद इतना बढ़ गया कि हाथापाई की नौबत आ गई। राजसमंद के पार्टी प्रभारी पुष्पेंद्र भारद्वाज ने दिलीप जोशी को बाहर निकालने के आदेश दिए और उनके साथ धक्का-मुक्की की गई।

संजय गाँधी की ‘सितम’ वाली नसबंदी Vs CM योगी की ‘इनाम’ वाली नसबंदी: तब जबर्दस्ती थी, अब प्रोत्साहन पर जोर

उत्तर प्रदेश सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण बिल का ड्राफ्ट वेबसाइट पर अपलोड कर दी है और इस तरह से भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक को काबू में करने के लिए देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य ने पहल शुरू कर दी है। राज्य विधि आयोग ने यूपी जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण व कल्याण) विधेयक-2021 (UP Population Bill-2021) का जो ड्राफ्ट डाला है, उसमें नसबंदी के लिए भी प्रोत्साहन की बात कही गई है।

उत्तर प्रदेश का नया जनसंख्या नियंत्रण कानून: नसबंदी कराने पर कई सुविधाएँ

इसमें प्रस्ताव दिया गया है कि दो से अधिक बच्चे होने पर सरकारी नौकरी से वंचित करने के साथ-साथ चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाई जा सकती है। विधि आयोग ने इस ड्राफ्ट पर जनता की राय भी माँगी है, जिसे 19 जुलाई तक भेजा जा सकता है। 11 जुलाई को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार नई जनसंख्या नीति भी जारी करने जा रही है। एक साल के भीतर जनप्रतिनिधियों को शपथ-पत्र देना होगा कि वो कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे।

इतना ही नहीं, अगर शपथ-पत्र देने के बाद कोई जनप्रतिनिधि तीसरा संतान पैदा करता है तो उसका निर्वाचन रद्द किया जा सकता है। इसमें जो सबसे खास बात है, वो है नसबंदी को लेकर प्रोत्साहन। अगर परिवार का अभिभावक सरकारी नौकरी में कार्यरत है और नसबंदी करवाता है तो उसे अतिरिक्त इंक्रीमेंट, प्रमोशन, सरकारी आवासीय योजनाओं में छूट, पीएफ में एम्प्लॉयर कंट्रीब्यूशन बढ़ाने जैसी कई सुविधाएँ देने की सिफारिश की गई है।

दो बच्चों वाले दंपत्ति अगर सरकारी नौकरी में नहीं हैं तो उन्हें पानी, बिजली, हाउस टैक्स, होम लोन में छूट व अन्य सुविधाएँ देने का प्रस्ताव लाया गया है। वहीं जो अभिभावक एक संतान होने पर पर खुद से नसबंदी कराते हैं, उन अभिभावकों को संतान के 20 साल तक मुफ्त इलाज, शिक्षा, बीमा शिक्षण संस्था व सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की सिफारिश भी की गई है। हालाँकि, इसका उल्लंघन करने पर नौकरी से बरख़ास्त का प्रावधान लाया जा सकता है।

नई नीति के अनुसार, दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन और प्रमोशन का मौका नहीं मिलेगा। 77 सरकारी योजनाओं और अनुदान से भी वंचित रखने का प्रावधान है। ऐक्ट लागू होते समय प्रेगेनेंसी है या दूसरी प्रेगनेंसी के समय जुड़वा बच्चे होते हैं तो ऐसे केस कानून के दायरे में नहीं आएँगे। अगर किसी का पहला, दूसरा या दोनों बच्चे विकलांग हैं तो उसे भी तीसरी संतान पर सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाएगा। तीसरे बच्चे को गोद लेने पर भी रोक नहीं रहेगी।

परिवार नियोजन के लिए पहले से चलता रहा है अभियान

ऐसा नहीं है कि नसबंदी पर प्रोत्साहन कोई नई बात है, बल्कि देश भर में केंद्र व राज्य सरकारें अक्सर नसबंदी के लिए प्रोत्साहन का अभियान चलाते रहती है। उत्तर प्रदेश में भी स्थानीय प्रशासन अपने हिसाब से सुविधाएँ देता है। अंतर इतना है कि नए कानून में उन सुविधाओं का दौरा बढ़ाया गया है। नसबंदी कराने पर लोगों को 3000 रुपए तक की धनराशि दी जाती है। नसबंदी कराने वालों को ई-भुगतान किया जाता है।

कई राज्यों में आशा व ANM (सहायक नर्स मिडवाइफ) कर्मचारियों को परिवार नियोजन के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए लगाया जाता है। जिनका परिवार पूरा हो गया है, उन्हें जानकारी दी जाती है कि वो परिवार नियोजन की स्थायी सेवा कैसे लें। ‘जनसंख्या स्थिरता पखवारा’ मनाया जाता है। इस दौरान महिलाओं एवं पुरुषों को परिवार नियोजन के महत्व और फायदे समझाए जाते हैं। साथ ही मिलने वाली सुविधाओं के बारे में बताया जाता है।

इसीलिए, ये कह देना कि एकदम से जनसंख्या नियंत्रण कानून लाकर कोई जोर-जबरदस्ती की जा रही है, ये गलत है। विपक्षी नेताओं ने ये कहना शुरू कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण के लिए बनाया जा रहा कानून मुस्लिमों को डराने के लिए है। संभल से सपा विधायक इक़बाल महमूद ने इसे मुस्लिमों के खिलाफ साजिश बताया था। जबकि सच्चाई ये है कि इस कानून में कहीं किसी धर्म-मजहब का उल्लेख ही नहीं है।

सपा विधायक का कहना है कि भारत में जनसंख्या बढ़ने के लिए मुस्लिम नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति (SC/ST) समुदाय के लोग जिम्मेदार हैं। उन्होंने इसे असम में NRC की तरह बताया और संसद में इसी तरह का कानून लाने की चुनौती दी। ऐसे नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि क्या सुविधाएँ धर्म/मजहब देख कर मिलेंगी? क्या करवाई यही देख कर होगी? ड्राफ्ट में ऐसा कुछ तो कहीं नहीं लिखा है।

जोर-जबरदस्ती क्या होती है, ये इन विपक्षी दलों को अपने ही गिरोह के कॉन्ग्रेस से पूछना चाहिए, जिसने आपातकाल लगा कर लोगों की जबरन नसबंदी कराई थी। आपातकाल के दौरान किस तरह संजय गाँधी के आदेश पर नसबंदी का क्रूर खेल खेला गया था, ये यादें अभी भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं। 1975 में आपातकाल लगाने के बाद नागरिकों के अधिकार ही निलंबित थे, ऐसे में भला वो जाएँ भी तो कहाँ।

संजय गाँधी का ‘नसबंदी अभियान’: जब हिटलर भी पीछे छूटा

संजय गाँधी की इस आक्रामकता के शिकार सबसे ज्यादा गरीब ही हुए थे। ख़बरें ऐसी भी आई थीं कि किसी गाँव को पुलिस ने घेर लिया और पुरुषों को घर से निकाल-निकाल कर जबरन उनकी नसबंदी करा दी गई। वरिष्ठ विज्ञान पत्रकार मारा विस्टेंडाल की मानें तो आश्चर्यजनक रूप से एक वर्ष के अंदर ही लगभग 62 लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई थी। ये आँकड़े नाजियों द्वारा की गई नसबंदी से 15 गुना अधिक थे

न नर्सों को प्रशिक्षित किया गया था और न ही डॉक्टर गण इसके लिए तैयार थे। यही कारण रहा कि गलत सर्जरी होने के कारण 2 हजार लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। कुछ ऐसा खौफ था! 70 के दशक से ही भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया गया, लेकिन आपातकाल वाली ये क्रूरता दुनिया में कहीं और नहीं देखी गई। आज जब नसबंदी वैकल्पिक है और इसे कराने पर सुविधाएँ मिल रही हैं, तो कुछ नेता वोट बैंक के लिए इसे मुस्लिमों से जोड़ रहे।

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर को तो संजय गाँधी की इस नसबंदी क्रूरता का बड़ा दंश झेलना पड़ा था। कहा जाता है कि 18 अक्टूबर, 1976 को इस जबरन नसबंदी का विरोध करने पर 25 लोगों को मार डाला गया था, जिनमें अधिकतर मुस्लिम ही थे। यूपी के सशस्त्र बलों की फायरिंग में ये मारे गए थे। 32 वर्षीय मोहम्मद सिद्दीकी उन मृतकों में से एक थे। उनकी बीवी का कहना है कि जबरन नसबंदी के खिलाफ खासकर मुस्लिमों में बेहद गुस्सा था, इसीलिए मना करने के बावजूद वो बाहर विरोध के लिए निकले थे।

तब वहाँ के डीएम रहे विजेंद्र यादव ने संजय गाँधी के आदेश का पालन करवाने के लिए ये क्रूरता अपनाई थी। नतीजा ये हुआ कि खालापार में 25 लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। शामली के कैराना में भी इसी तरह की फायरिंग हुई थी। ये भी मुस्लिम बहुल इलाका है, जहाँ से हाल ही में कई आतंकी भी पकड़े गए हैं। ‘द हिन्दू’ ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि खालापार में आखिर हुआ क्या था।

दरअसल, पुलिस ने गाँव को घेर कर नसबंदी के लिए पुरुषों को निकलने को कहा। बदले में मस्जिद से भी घोषणा हुई कि मुस्लिम कभी इस सरकारी फरमान के आगे नहीं झुकेंगे। आलम ऐसा था कि पुलिस वालों को घूस दे-दे कर लोग बचना चाह रहे थे। एक 19 साल के लड़के ने जब भागने की कोशिश की तो पुलिस ने गोली मार दी। स्थिति ये थी कि कॉन्ग्रेस से जुड़ाव के कारण किसी नेता ने उनके लिए आवाज़ तक नहीं उठाई।

संजय गाँधी मुख्यमंत्रियों को टारगेट देते थे और उस टारगेट को वो पूरा भी करते थे, संजय गाँधी को खुश करने के लिए। उत्तर प्रदेश और बिहार इसमें सबसे आगे रहा था। जिन छात्रों के अभिभावकों ने नसबंदी नहीं कराई थी, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। उत्तर प्रदेश में 240 ऐसे मामले सामने आए थे, जब जबरन नसबंदी के लिए हिंसा का इस्तेमाल किया गया। नसबंदी कर के लोगों को छोड़ दिया जाता था, खराब हाइजीन के कारण उन्हें बीमारी हो जाती थी या फिर उनकी मौत हो जाती थी।

‘मैं 13 साल की थी जब शुरू हुआ मेरा यौन शोषण’: 7 महिला एथलीट ने तमिलनाडु के कोच नागराजन पर लगाए आरोप

राष्ट्रीय स्तर की 19 वर्षीय एथलीट ने करीब दो महीने पहले तमिलनाडु के अपने कोच पी नागराजन पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। इस घटना के दो महीने बाद 7 अन्य महिला एथलीटों ने अपने पूर्व कोच नागराजन पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आरोप लगाने वाली सातों एथलीट ने 59 वर्षीय नागराजन से प्रशिक्षण लिया था। इनमें कुछ तो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं। इन खिलाड़ियों का कहना है कि नागराजन द्वारा किए गए यौन शोषण का मामला कोई नया नहीं है, बल्कि यह वर्षों से चल रहा है।

यौन शोषण के मामले में पहला आरोप दो महीने पहले 26 मई 2021 को नेशनल लेवल की 19 वर्षीय एथलीट ने लगाया था। इसको लेकर राजनीतिक विश्लेषक और खेल कमेंटेटर टीएन रघु ने एक ट्वीट किया था। इसमें रघु ने राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को भी टैग किया था।

19 वर्षीय एथलीट द्वारा यौन शोषण के मामले की शिकायत किए जाने के बाद कोच नागराजन ने कथित तौर पर नींद की गोलियाँ खाकर खुदकुशी करने की कोशिश की थी। हालाँकि, वो बच गए और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की है।

2005 से यौन शोषण

इस मामले में डिप्टी पुलिस कमिश्नर एस महेश्वरन ने बताया है कि यौन शोषण का मामला 2005 से चल रहा है। इस मामले में दर्ज की गई पहली शिकायत के मुताबिक, वर्ष 2013 से 2020 के बीच आरोपित कोच ने एथलीट का यौन शोषण किया था। उसके अलावा, उन्हें नागराजन के खिलाफ इसी तरह की सात और शिकायतें मिली हैं। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की जाँच करने वाली विशेष शाखा की डीसीपी एच जयलक्ष्मी ने कहा, “हर शिकायत से आरोपित की हिंसक प्रवृत्ति का खुलासा हो रहा है।”

पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने कहा, “शिकायत करने वाली एथलीट समेत कई अन्य लड़कियाँ साल 2013 से नागराजन के पास ट्रेनिंग ले रही थीं। कई मौकों पर आरोपित (नागराजन) दिन की ट्रेनिंग के बाद बाकी लड़कियों को घर भेज देता था और पीड़िता को एक छोटे कमरे में ले जाकर फिजियोथेरेपी के बहाने से गलत तरीके से छूता था। पीड़िता के विरोध और विनती के बाद आरोपित ने उस धमकाया था कि वह उसे एथलेटिक्स में सफल होने में तभी मदद करेगा, जब वह उसके साथ सहयोग करेगी। दूसरी लड़कियों के साथ भी यही हुआ।”

बयान में यह भी कहा गया है कि आरोपित कोच नागराजन ने एथलीट को धमकाया था कि वह उसकी ट्रेनिंग रोक देगा और उसका करियर तबाह हो जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पुलिस ने बयान में कहा कि पीड़िता मानसिक तनाव से गुजर रही थी, इसीलिए उसने किसी से भी यौन उत्पीड़न की वारदात का जिक्र तक नहीं किया।

तमिलनाडु के कोच पी नागराजन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वालों में शामिल एक अन्य एथलीट ने दावा किया है कि कोच ने 13 साल की उम्र से उसका यौन शोषण करना शुरू कर दिया था और यह सब करीब 7 साल तक चला।

अब 30 साल की हो चुकी पूर्व एथलीट ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “जब मैं 8वीं कक्षा में थी तब नागराजन ने मुझसे मेरी लंबी कूद की तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए कहा था। उन्होंने मुझे दूसरे लोगों से एक घंटा पहले आने को कहा था। इसलिए अगर सभी शाम 4 बजे आते थे तो मैं 3 बजे ही वहाँ पहुँच जाती थी। वह करीब 4 बजे मुझे कहते कि ऐसा दिखाओ जैसे वह मिलने आई हो। ठीक ऐसा जैसे मुझे कोई विशेष ट्रेनिंग मिल रही हो, लेकिन वह नहीं चाहते थे कि इसके बारे में कोई जाने, क्योंकि वे परेशान हो सकते थे। हलाँकि, मैं अभी भी टीम का हिस्सा थी और मैं अपने दोस्तों को खोना नहीं चाहती थी।”

एथलीट ने कहा कि नागराजन से एनओसी मिलने के बाद उसने दूसरे ट्रैक और फील्ड को ज्वाइन करने का फैसला किया। नागराजन ने उसके साथ जिस तरह का बर्ताव किया था उसके लिए उन्होंने सामना होने पर माफी भी माँगी थी। एथलीट ने बताया कि जब वो दूसरे क्लब में चली गईं तो उनकी मुलाकात अन्य एथलीटों से भी हुई, जिनके साथ भी इसी तरह दुर्व्यवहार हुआ था।

पूर्व एथिलीट ने कहा, “मैं सोच रही थी कि केवल मैं ही ऐसी हूँ, जिसके साथ हुआ… मुझे लगा था कि मेरे साथ ये सब रुक जाएगा। इस घटना ने मुझे तोड़कर रख दिया है। गाँवों से आने वाली लड़कियों की अपेक्षा मुझमें थोड़ी जागरुकता थी, लेकिन मुझे बहुत शर्म आती है कि मैं इतना साहसी नहीं थी।”

जिस तरीके से कई पूर्व खिलाड़ी अपने साथ हुए बर्ताव को साझा करने के लिए आगे आए हैं उससे अब इस खिलाड़ी को उम्मीद है कि ये सब बंद हो जाएगा। उसने कहा, “आखिरकार हमने उसे पकड़ लिया। मैं नहीं जानती हूँ कि उसका क्या होगा, लेकिन इतना जरूर है कि उसके चेहरे से नकाब उतर गया है। अब मुझे उम्मीद है कि वो फिर किसी लड़की को इस तरह से नहीं छुएगा।”

‘असली वंडरवुमन यहाँ है’: हरलीन देओल ने 13 साल में घर छोड़ा, अब दुनिया फैन; सचिन बोले- कैच ऑफ द ईयर

इंग्लैंड के साथ पहले टी-20 क्रिकेट मैच में भारत की महिला टीम की हरलीन देओल (Harleen Deol) ने बाउंड्री पर गजब का कैच पकड़ा। हरलीन के इस कैच का वीडियो सोशल मीडिया पर देखकर लोग उनके दीवाने हुए जा रहे हैं और उन्हें ‘सुपरवुमन’ कहा जा रहा है। 

हरलीन देओल (Harleen Deol) लॉन्ग ऑफ पर फील्डिंग कर रही थीं। इंग्लैंड की विकेटकीपर एमी जोंस स्ट्राइक पर थीं। शिखा पांडे ने उन्हें गेंद फेंकी। जोंस ने उसे डीप में खेला। जोंस समेत सभी ने सोचा कि उनका यह शॉट सीधा बाउंड्री के पार जाकर गिरेगा। होता भी यही, लेकिन हरलीन देओल ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्होंने कैच पकड़ने के लिए हवा में छलाँग लगा दी।

हरलीन और बाउंड्री रोप के बीच सिर्फ कुछ सेंटीमीटर का ही फासला था। हरलीन यह बात तुरंत भाँप गईं। हरलीन ने सोचा यदि गेंद नहीं छोड़ी तो छक्का हो जाएगा। बस फिर क्या था। हरलीन ने गेंद को हवा में बाउंड्री के अंदर की ओर उछाल दिया और खुद बाउंड्री के बाहर कूद गईं, लेकिन पल भर में ही फिर से बाउंड्री के अंदर हवा में गोता लगाते हुए बिल्कुल सुपरवुमन की तरह उड़ते हुए शानदार कैच पकड़ लिया।

यह देखते ही कि हरलीन ने न सिर्फ छक्का रोका, बल्कि एमी जोंस को पवेलियन की राह भी दिखा दी है, उन्हें बधाई देने के लिए पूरी टीम उनकी ओर दौड़ पड़ी। यहाँ तक कि इंग्लैंड का खेमा भी शॉक्ड था। हरलीन के प्रयासों के लिए डेनियल वॉट को भी उनकी सराहना करते हुए देखा गया।

हरलीन देओल ने शानदार कैच लपककर क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) को भी अपना मुरीद बना लिया है। सचिन ने अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल पर हरलीन के कैच वाले वीडियो को ट्वीट करते हुए लिखा, “यह एक शानदार कैच था हरलीन देओल। मेरे लिए यकीनन यह कैच ऑफ द ईयर है!”

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व बल्लेबाज वीवीएस लक्ष्मण ने भी हरलीन के कैच को सराहा है।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी इस कैच की तारीफ की है।

नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कैच वाला वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “यह अब तक के सर्वश्रेष्ठ फील्डिंग मोमेंट्स में से एक है! वाकई अविश्वसनीय #हरलीन देओल !!”

महिंद्रा ग्रुप के चैयरमैन आनंद महिंद्रा ने भी हरलीन के इस कैच पर ट्वीट किया, “नहीं। संभव नहीं। नहीं हो सकता था। कुछ स्पेशल इफेक्ट ट्रिक होनी चाहिए। क्या यह असली था? ठीक है, गैल गैडोट को हटाओ, असली वंडरवुमन यहाँ है…।”

इंग्लैंड के खिलाफ बारिश से प्रभावित पहले टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में भारतीय महिला क्रिकेट टीम को भले ही 18 रन से हार झेलनी पड़ी हो, लेकिन हरलीन देओल की फील्डिंग ने सभी का मन मोह लिया। 

डकवर्थ लुइस नियम के कारण इंग्लैंड की जीत

इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 7 विकेट के नुकसान पर 177 रन बनाए। लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम 8.4 ओवर में 3 विकेट के नुकसान पर 54 रन बना चुकी थी, लेकिन बारिश ने मैच में खलल डाल दिया। लगातार बारिश के कारण खेल आगे नहीं बढ़ पाया और इंग्लैंड को डकवर्थ लुइस नियम के तहत 18 रन से विजेता घोषित कर दिया।

भारत की तरफ से ओपनिंग करने आई शेफाली वर्मा इस मुकाबले में कोई कमाल नहीं दिखा पाई और बिना खाता खोले ही पवेलियन लौट गईं। कैथरीन ब्रंट ने उन्हें शिकार बनाया। स्मृति मंधाना 29 रन बनाकर आउट हो गईं। इसके बाद कप्तान हरमनप्रीत कौर ने भी निराश किया और वह महज 1 रन बनाकर आउट हो गईं।

13 साल में छोड़ दिया था घर

हरलीन देओल का क्रिकेट का सफर बहुत आसान नहीं रहा है। इस खिलाड़ी ने करियर बनाने के लिए महज 13 साल की उम्र में अपने परिवार और घर को छोड़ दिया था। क्रिकेट की दुनिया में नाम कमाने के लिए हरलीन चंडीगढ़ छोड़ हिमाचल प्रदेश में आ बसीं।

2019 में पहली बार भारतीय क्रिकेट टीम में चुने जाने पर हरलीन ने कहा था कि उन्होंने यहाँ तक पहुँचने के लिए वास्तव में कड़ी मेहनत की है। राष्ट्रीय टीम के लिए खेलना उनका लक्ष्य रहा है जब से उन्होंने क्रिकेट को गंभीरता से लेने के लिए पंजाब में अपना घर छोड़ दिया और हिमाचल प्रदेश में बस गईं।

13 साल की उम्र में अपने माता-पिता को पीछे छोड़कर एक नए शहर में शिफ्ट होना हरलीन देओल के लिए आसान नहीं था, लेकिन हरलीन ने चुनौती स्वीकार की और हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन की अंडर-19 आवासीय अकादमी में अपना नाम दर्ज करा लिया।

हरलीन पढ़ाई में भी अव्‍वल रही है। 10वीं और 12वीं में उनके 80 फीसदी अंक थे। इसके अलावा हरलीन एक अच्‍छी एक्‍टर भी हैं। हरलीन के बड़े भाई डेंटिस्‍ट हैं। 22 साल की यह स्‍टार खिलाड़ी क्रिकेट के अलावा हॉकी, फुटबॉल, बास्‍केटबॉल भी खेलती थी। स्‍कूल समय में बेस्‍ट एथलीट भी रही हैं। हरलीन ने हिमाचल के लिए स्टेट और नेशनल लेवल पर 85 मेडल जीते हैं। उनकी माँ ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जब हरलीन लड़कों के साथ खेलती थी तो आस-पास के लोग ताने मारा करते थे। लोग उसे खेल में भेजने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन वही लोग आज उन्हें बधाई देते हैं। हरलीन ने 3 साल की उम्र से ही खेलना शुरू कर दिया था।

निकाह के लिए चेंबर इस्तेमाल के बाद अब एक और वकील की जालसाजी, आर्थिक मदद के लिए दाखिल की फर्जी Covid-19 रिपोर्ट

दिल्ली बार काउंसिल ने शुक्रवार (9 जुलाई 2021) को एक वकील का लाइसेंस अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया। वकील पर आरोप है कि उसने बार काउंसिल से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए फर्जी कोविड-19 जाँच रिपोर्ट जमा की थी। इस संबंध में आरोपित वकील को काउंसिल ने एक नोटिस जारी किया है। काउंसिल का कहना है कि यह मामला न केवल कदाचार, बल्कि जालसाजी और धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है। इसको लेकर वकील से 7 दिनों के भीतर जवाब माँगा गया है।

लाइव लॉ के मुताबिक, दिल्ली बार काउंसिल के प्रस्ताव में कहा गया है, “यह स्पष्ट है कि आपके द्वारा जमा की गई ​कोविड-19 रिपोर्ट फर्जी है। ऐसे में फर्जी रिपोर्ट के आधार पर वित्तीय मदद हासिल करने का प्रयास करना न केवल कदाचार है, बल्कि यह जालसाजी और धोखाधड़ी भी है।” काउंसिल ने कहा है कि वकील सोनू यादव की ओर से जमा की गई कोविड-19 जाँच रिपोर्ट वैरिफिकेशन के लिए लैब में भेजी गई थी। यहाँ पुष्टि की गई है कि सोनू के नाम पर ऐसी कोई रिपोर्ट जारी नहीं की गई थी।

दिल्ली बार काउंसिल के अध्यक्ष रमेश गुप्ता ने संस्था की गरिमा और विश्वसनीयता को बचाने के लिए इस मामले की तत्काल जाँच करने का आदेश दिया है। इसके लिए तीन सदस्यों वाली एक विशेष अनुशासनात्मक समिति का गठन भी किया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, काउंसिल ने आरोपित को 19 जुलाई को अनुशासनात्मक समिति के समक्ष पेश होने को कहा है। ऐसा नहीं करने पर वकील के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई की जाएगी।

गौरतलब है कि इससे पहले दिल्ली बार काउंसिल ने एक वकील इकबाल मलिक का लाइसेंस अस्थायी रूप से निलंबित करते हुए उसे कारण बताओ नोटिस भेजा था। वकील पर आरोप था कि वह कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में आवंटित अपने चेंबर का इस्तेमाल धर्मांतरण और निकाह आदि कराने जैसी गतिविधियों के लिए कर रहा था।

संविधान की जगह कुरान चुनने की बात कहने वाले एजाज खान ने ड्रग्स के धंधे के लिए बनवाए फर्जी प्रिस्क्रिप्शन: जमानत से इनकार

मुंबई की NDPS कोर्ट ने विवादास्पद अभिनेता एजाज खान की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा है कि यह व्यक्ति समाज के लिए खतरा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि अभिनेता ने युवा लड़कियों और लड़कों को कंट्राबेंड (प्रतिबंधित सामान) की आपूर्ति करने के लिए अपनी बीबी के नाम पर जाली प्रिस्क्रिप्शन (Forged Prescriptions) बनवाए।

कोर्ट ने संज्ञान लिया कि 16 जनवरी 2020 के प्रिस्क्रिप्शन में गोलियों की मात्रा मिलीग्राम में अंकित करने के स्थान पर सिर्फ खुराकों की संख्या लिखी गई थी। अभिनेता की पर्ची में 20 खुराक का जिक्र था, लेकिन दवा के वजन का कोई उल्लेख नहीं था, जो कि अनिवार्य रूप से हर चिकित्सा प्रिस्क्रिप्शन में होता है। अदालत ने कहा कि कोई भी डॉक्टर चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन में वजन [ग्राम (g), मिलीग्राम (mg) या माइक्रोग्राम (mcg)] का उल्लेख किए बिना कभी भी कोई दवा नहीं लिखेगा। 

अदालत ने कहा कि दोनों प्रिस्क्रिप्शन की लिखावट देख कर भी यह नहीं लगता कि यह किसी डॉक्टर ने लिखा था। कोर्ट ने पाया कि एजाज की बीबी का प्रिस्क्रिप्शन दिसंबर 2020 और जनवरी 2021 का था, जबकि मार्च और अप्रैल 2021 में उसके घर से 31 अल्प्राजोलम टैबलेट बरामद किए गए थे।

अदालत ने कहा, “मेरी राय में, प्रथम दृष्टया यह मानने के लिए भी किसी सबूत की आवश्यकता नहीं है कि ये प्रिस्क्रिप्शन जाली और मनगढ़ंत हैं।” यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि खान ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा था कि उनके घर पर केवल 4 नींद की गोलियाँ मिली थीं और गर्भपात के बाद उनकी बीबी डिप्रेशन से उबरने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही थी।

जमानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा: कोर्ट

छोटे बच्चों को ड्रग्स देकर उनका शोषण करने के लिए एजाज खान की आलोचना करते हुए अदालत ने कहा कि अभिनेता को जमानत देने से समाज में गलत मिसाल कायम होगी। अदालत ने कहा, “ऐसे व्यक्ति को जमानत देना अवैध कार्य और आरोपित के बुरे दृष्टिकोण को बढ़ावा देना होगा, जो कानून का पालन करने वाले समाज को एक बुरा संदेश देगा।”

अदालत ने अहमदाबाद के एक डॉक्टर के बयान पर भरोसा करते हुए कहा कि गवाह का बयान स्पष्ट रूप से बताता है कि खान कौन है और जीवन में उसकी स्थिति क्या है। बता दें कि इस डॉक्टर ने आरोपित अभिनेता के लिए फर्जी प्रिस्क्रिप्शन लिखने से इनकार कर दिया था। अभिनेता द्वारा दायर जमानत याचिका पर सुनवाई में कोई दया नहीं दिखाते हुए NDPS अदालत ने कहा कि कानून और इसकी प्रक्रिया केवल उन लोगों की मदद करती है जो सच्चे होते हैं, न कि उनकी जो अनुकूल आदेश प्राप्त करने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं।

NCB ने किया था गिरफ्तार 

बॉलीवुड ड्रग नेक्सस मामले की जाँच के सिलसिले में अभिनेता एजाज खान को एनसीबी ने 30 मार्च 2021 को गिरफ्तार किया था। इसके बाद एनसीबी ने अभिनेता से संबंधित विभिन्न स्थानों पर भी छापेमारी की थी। एजेंसी ने कहा था कि मुंबई के अंधेरी और लोखंडवाला इलाकों में तलाशी के दौरान उनके आवास से अल्प्राजोलम की गोलियाँ मिली थीं।

उस पर शादाब बटाटा गिरोह का सदस्य होने का आरोप है। एनसीबी ने कहा कि उसके घर की तलाशी के दौरान 4.5 ग्राम अल्प्राजोलम टैबलेट बरामद किया गया था, लेकिन उसे मुख्य रूप से बटाटा गैंग से जुड़े होने के कारण गिरफ्तार किया गया।

एनसीबी अधिकारियों ने यह भी तर्क दिया कि एजाज खान नशीले पदार्थों के तस्कर शादाब फारूक शेख उर्फ शादाब बटाटा के सिंडिकेट का हिस्सा है। शेख को एक सप्ताह पहले गिरफ्तार किया गया था और उसके पास से 2 किलोग्राम से अधिक प्रतिबंधित मेफेड्रोन दवा बरामद की गई थी। बटाटा द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर खान को गिरफ्तार किया गया था।

गौरतलब है कि एजाज खान को फेसबुक लाइव वीडियो में की गई सांप्रदायिक टिप्पणी के लिए अप्रैल 2020 में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। फेसबुक लाइव में एजाज खान ने कहा था, “अगर एक चींटी मर जाती है तो एक मुसलमान जिम्मेदार होता है, अगर एक हाथी मर जाता है तो एक मुसलमान जिम्मेदार होता है। अगर दिल्ली में भूकंप आता है तो एक मुसलमान जिम्मेदार होता है, यानी किसी भी घटना के लिए मुसलमान जिम्मेदार होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस साजिश के लिए कौन जिम्मेदार है?” उन्होंने यह कहते हुए विवाद को जन्म दिया था कि वह किसी भी समय भारतीय संविधान की जगह कुरान का चयन करेंगे। विवादास्पद अभिनेता को कॉन्ग्रेस नेता हार्दिक पटेल से भी समर्थन मिला था।

घोटालों में डूबे बैंक, सालों से राजनीतिक कब्जा: जानिए अमित शाह को सहकारिता की कमान से विपक्ष क्यों बेचैन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार से पहले नए सहकारिता (Cooperation) मंत्रालय के गठन का निर्णय लिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को देश के पहले सहकारिता मंत्री के रूप में बड़ी जिम्मेदारी दी गई। इससे विपक्ष बेचैन हो गया है। विपक्ष को डर है कि सहकारिता से विकास का मंत्र पूरे भारत में लागू होने पर गरीब किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त होंगे, जिससे भाजपा और मजबूत होगी।

मोदी सरकार ने क्यों बनाया नया सहकारिता मंत्रालय

सबसे पहले तो ये जानिए कि भारत सरकार ने आखिर सहकारिता के रूप में एक नए मंत्रालय की ज़रूरत क्यों समझी। केंद्र ने मंगलवार (जुलाई 6, 2021) को इसके गठन की घोषणा की और शुक्रवार को पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को इसकी कमान दी गई। केंद्र सरकार का कहना है कि इससे ‘सहकार से समृद्धि’ के लक्ष्य को पाने में मदद मिलेगी। देश में सहकारिता आंदोलन को ये मंत्रालय मजबूत करेगा।

लेकिन, इसका मुख्य उद्देश्य ये है कि ये सहकारिता आंदोलन को एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढाँचा व वातावरण प्रदान करे। ये मंत्रालय सहकारी समितियों को जमीनी स्तर तक पहुँचने वाले एक सच्चे जन-भागीदारी आधारित आंदोलन को मजबूत बनाने में भी सहायता प्रदान करेगा। सहकारिता के बारे में बता दें कि ये ऐसा आर्थिक विकास मॉडल है, जहाँ इसके हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारी निभानी होती है और इससे उनका और देश का फायदा होता है।

केंद्र सरकार ने कहा, “यह मंत्रालय सहकारी समितियों के लिए ‘कारोबार में सुगमता’ के लिए प्रक्रियाओं को कारगर बनाने और बहु-राज्य सहकारी समितियों (MSCS) के विकास को सक्षम बनाने की दिशा में कार्य करेगा। समुदाय आधारित विकासात्मक भागीदारी के प्रति हमारी गहरी प्रतिबद्धता है।” बता दें कि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के दौरान ही इस सम्बन्ध में घोषणा की थी। अब इसे पूरा किया गया है।

बहुराज्यीय सहकारी समितियों को अब इस मंत्रालय से सीधे मदद मिलेगी। बैंकिंग, खेती, चीनी मिल संचालन और डेयरी फार्मिंग जैसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ लोग सहकारी संस्था बना कर साझा लक्ष्य के लिए अपना-अपना योगदान देते हैं। सहकारिता का प्रभाव इसी से समझ लीजिए कि देश में फ़िलहाल 1.94 लाख कोऑपरेटिव डेयरी सोसाइटी और 330 चीनी मिल एसोसिएशन हैं। गुजरात की सहकारी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे अमूल ब्रांड को इसकी सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण माना जा सकता है।

भारत में कृषि में मदद के लिए ग्रामीण स्तर पर किसानों द्वारा कई ‘प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटीज’ का गठन किया जाता है। किसानों को इससे सुगमता से कर्ज उपलब्ध हो जाता है। इसके लिए जिला एवं राज्य स्तर पर सहकारी बैंक होते हैं। 363 जिला सहकारी और 33 राज्य सहकारी बैंक इस काम में लगे हुए हैं। 2019-20 में देश में 1539 शहरी सहकारी बैंक थे। साथ ही 95,238 ऐसी सोसाइटियाँ थीं।

हालाँकि, सहकारिता के विकास में केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार की भी भूमिका होती है। राज्यों में सहकारी आयुक्त के साथ-साथ रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज भी होते हैं, जो इन सहकारी समितियों के संचालन का औपचारिक कार्य करते हैं। पूरे देश में सहकारिता का मॉडल अभी तक अच्छे से लागू नहीं हो पाया है और अमित शाह की बड़ी जिम्मेदारी यही होगी कि इससे जमीनी स्तर पर लोगों को जोड़ा जाए और उत्साहित किया जाए।

अमित शाह के केंद्रीय सहकारिता मंत्री बनने से विपक्ष बेचैन क्यों?

लेकिन, आखिर विपक्षी की बेचैनी का कारण क्या है कि वो केंद्र सरकार के इस नए पहल का स्वागत करने की बजाए इसका विरोध कर रहा है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र से लेकर बंगाल तक की सहकारी संस्थाओं में भाजपा का प्रभाव बढ़ाने के लिए ऐसा किया गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला ने की इस ‘चेतावनी’ के बाद कॉन्ग्रेस ने इस पर विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।

उसकी योजना है कि संसद के मॉनसून सत्र से पहले सब कुछ खँगाल कर इसमें से कुछ मामलों को उठाया जाए। केंद्र में नंबर-2 माने जाने और पीएम मोदी के करीबी कहे जाने वाले व्यक्ति को इसकी कमान मिलने से चिंतित कॉन्ग्रेस इस बारे में अन्य पार्टियों से भी चर्चा करेगी। अमित शाह का किसी मामले में घुसना ही उसे महत्वपूर्ण बना देता है। सहकारी संस्थाओं में सालों से जमे राजनीतिक आकाओं की पैठ अब ख़त्म होने की संभावना है, इसीलिए उन्हें ये डर है।

कॉन्ग्रेस के अलावा वामपंथी भी तिलमिलाए हुए हैं। CPI(M) के नेता और दो बार केरल के वित्त मंत्री रहे थॉमस इसाक भी चिंतित हैं। चार बार के विधायक ने कहा कि इसका कुछ गलत उद्देश्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमित शाह ने गुजरात के सहकारी बैंकों पर ‘कब्ज़ा’ किया और ‘श्वेत क्रांति’ के अग्रदूत जॉर्ज कुरियन को ‘गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ’ से बाहर कर दिया। उन्होंने वैद्यनाथन समिति की रिपोर्ट लागू करने का भी विरोध किया।

दरअसल, इस रिपोर्ट के लागू होने से सहकारी रजिस्ट्रार से शहरी बैंकों की बागडोर भारतीय रिजर्व बैंक को सौंपने के बाद प्राथमिक सहकारी बैंकों को भी इसके अंतर्गत लाया जा सकता है। उनका कहना है कि इससे सहकारी बैंक अपंग हो जाएँगे। उन्होंने ये भी कहा कि इसके खिलाफ जन-आंदोलन की ज़रूरत है क्योंकि इससे ये ढाँचे पर प्रहार होगा। उन्होंने कहा कि सहकारिता राज्यों का विषय है और केंद्र इस पर कब्ज़ा करना चाहता है।

अब हम आपको इन दलों की चिंता का कारण बताते हैं। असल में जिन दो राज्यों में सहकारिता पर सबसे ज्यादा राजनीतिक कब्ज़ा है, वो हैं महाराष्ट्र और केरल। जहाँ एक जगह शरद पवार की ‘राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP)’ ने चीनी मिलों से लेकर कई सहकारी संस्थाओं में पैठ बनाई हुई है, केरल में यही काम CPI(M) ने किया है। हजारों करोड़ रुपयों के इस क्षेत्र में सरकार का घुसना इन नेताओं को पसंद नहीं आ रहा है।

केरल में सहकारी आंदोलन, खासकर इसका बैंकिंग क्षेत्र वहाँ की सत्ताधारी वामपंथी दलों के नियंत्रण में ही है। केरल और महाराष्ट्र में ये सहकारी संस्थाएँ वित्तीय रूप से काफी मजबूत हैं और इनका एक बड़ा नेटवर्क है। केरल में तो कॉन्ग्रेस का भी ऐसी कुछ समितियों और बैंकों पर अच्छा प्रभाव है। कर्नाटक, बंगाल और तमिलनाडु में भी सहकारिता एक जन-आंदोलन बन कर सामने आया है और वहाँ भी कई वर्षों से कुछ ही खास दल कब्ज़ा जमाए बैठे हैं।

अब केंद्र सरकार इनके लिए नियम-कानून बनाएगी और जनता के लिए काम होगा, जिससे इन्हें प्राइवेट कंपनियों की तरह चला रहे इन राजनीतिक दलों और चंद नेताओं का प्रभाव कम होगा। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के अलावा केरल भी राजनीतिक रूप से चर्चा में रहने वाला राज्य है। जहाँ बंगाल में भाजपा ने तृणमूल का गढ़ हिलाने की कोशिश की है, केरल में उसे पाँव जमाना है। महाराष्ट्र में क्षेत्रीयता के नाम पर कुछ दल दादागिरी का झंडा उठाए बैठे हैं।

अमित शाह को क्यों ही दी गई सहकारिता मंत्रालय की कमान?

अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर इसकी कमान अमित शाह के हाथ में ही क्यों? इसका एक ही कारण है- लंबा अनुभव। प्रशासनिक रूप से सक्षम अमित शाह का गुजरात में सहकारिता को लेकर काम करने का अच्छा अनुभव है। एक समय उन्हें राज्य में सहकारिता आंदोलन का पितामह कहा जाने लगा था। गाँव, गरीब और किसानों के नेटवर्क से राज्य ने विकास की नई ऊँचाइयों को छुआ।

अमित शाह भाजपा की राष्ट्रीय सहकारिता प्रकोष्ठ के संयोजक के पद पर भी रह चुके हैं। मात्र 36 वर्ष की उम्र में उन्हें अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक (ADCB) का अध्यक्ष चुना गया था। उस समय बैंक 20.28 करोड़ रुपए के घाटे में चल रहा था। शाह ने मात्र एक साल में बैंक को संकट से उबारा और 6.60 करोड़ रुपए के लाभ में लाकर 10% के मुनाफे का वितरण किया। इस तरह इस क्षेत्र से उनका पुराना और गहरा नाता है।

कुछ ऐसी ही कहानी गुजरात के आणंद में स्थित अमूल डेयरी की भी है। दिसंबर 1946 में इसका जन्म एक सहकारी आंदोलन के रूप में ही हुआ था। इसी क्रांति की वजह से भारत विश्व में सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बना। खेड़ा जिले में पहले किसानों की स्थिति दयनीय थी, लेकिन उन्हीं किसानों ने एक सहकारी समिति बना कर कई दुग्ध उत्पादन केंद्र बनाए और आज सफलता की ऊँचाई को छू रहे हैं।

आज करीब 11,000 गाँवों से ये किसान प्रतिदिन 60 लाख लीटर दूध इकट्ठा करते हैं। इसके लिए तीन चरणों वाले मॉडल का उपयोग किया गया था। प्राइमरी प्रोड्यूसर, यानी गाँव की संस्थाओं से दूध लिया जाता था। दूसरा चरण, यानी दूध को सहयोगी भंडारों के पास भेजा जाता था जहाँ उन्हें संरक्षित रखा जाता था। फिर अंतिम चरण में इसे बेचा जाता है। इस तरह इसमें बिचौलियों की भूमिका ही ख़त्म हो गई।

गुजरात में सहकारिता से बड़ी संख्या में महिलाएँ भी जुडी हैं। अमित शाह को केंद्रीय सहकारिता मंत्री बनाए जाने का एक कारण ये भी है कि देश के कई सहकारिता बैंक और समितियाँ आज घोटाले से त्रस्त हैं और शाह को ऐसे मामलों में कड़ाई से काम लेने के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र में कोऑपरेटिव बैंक घोटाला सामने आया था, जिस मामले में ED (प्रवर्तन निदेशालय) कार्रवाई भी कर रही है।

केरल छोड़ने की खबरों के बीच किटेक्स के शेयर बम-बम, वामपंथी सरकार से त्रस्त है कपड़ा निर्माता कंपनी


किटेक्स गार्मेंट्स (Kitex Garments) के शेयरों में बीते 5 दिनों में 25 फीसदी का उछाल देखने को मिला है। यह उछाल कंपनी के केरल छोड़ने की खबरों के बीच आया है। पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली राज्य की वामपंथी सरकार की प्रताड़ना से तंग आकर कंपनी ने यह फैसला किया है।

केरल सरकार के साथ 3,500 करोड़ रुपए की परियोजना को लेकर विवाद के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कपड़ा निर्माता कंपनी के अधिकारियों ने तेलंगाना सरकार की ‘स्पेशल फ्लाइट’ से हैदराबाद की यात्रा की। कंपनी ने बताया है कि उसे गुजरात समेत 10 राज्यों से निवेश के लिए औपचारिक निमंत्रण मिला है। तमिलनाडु ने उसे निवेश करने पर सब्सिडी के साथ ही कई चीजें मुफ्त देने का भरोसा दिया है।

तेलंगाना सरकार के बुलावे पर निवेश के मुद्दे पर चर्चा के लिए किटेक्स के प्रतिनिधिमंडल ने हैदराबाद की यात्रा की। इसकी पुष्टि करते हुए कंपनी के एमडी साबू जैकब ने कहा था, “हम पहले ही तेलंगाना के उद्योग मंत्री केटी रामा राव के साथ एक दौर की चर्चा कर चुके हैं। उन्होंने 3,500 करोड़ रुपए की परियोजना के लिए सुविधाओं और समर्थन की पेशकश की है, जिसे हमने केरल में छोड़ दिया है। केरल में कपड़े की परियोजना को रद्द करने की हमारी घोषणा के बाद तेलंगाना ने हमें आमंत्रित किया है।”

इसके साथ ही जैकब ने ये भी कहा था कि केरल के एर्नाकुलम में कपड़े का कारखाना चलाना पहले से ही मुश्किल है। ऐसे में दूसरे इन्वेस्टमेंट के बारे में हम नहीं सोच सकते हैं। उन्होंने कहा कि पहले ही प्रस्तावित परियोजना पर 200 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इससे 600 छोटे उद्यमों को विकसित करने के साथ ही 30,000 लोगों को रोजगार मिलता। तेलंगाना सरकार के साथ कंपनी की मीटिंग हो गई है। राज्य के टेक्सटाइल्स मिनिस्टर केटी रामाराव ने घोषणा की कि केरल की किटेक्स कंपनी वारंगल स्थित काकतीय टेक्सटाइल्स पार्क में 1000 करोड़ रुपए का निवेश करेगी।

केरल से किटेक्स गार्मेंट्स की संभावित विदाई की खबर से कंपनी के शेयरधारकों की मौज आ गई है। कंपनी का शेयर अब तक के उच्च स्तर पर पहुँच गया है। शुक्रवार (09 जुलाई 2021) को तो कंपनी के शेयरों में 25 फीसदी तक की बढ़त दर्ज की गई। शुक्रवार (09 जुलाई 2021) को भी बंद होने के दौरान यह 52 हफ्तों के सर्वोच्च स्तर 140.85 पर था। इससे पहले गुरुवार (8 जुलाई 2021) को 117.40 पर बंद होने के बाद यह 117.75 पर खुला था।

किटेक्स गार्मेंट्स का स्टॉक प्राइस

शेयरों में यह बढ़त इसलिए आई है क्योंकि कंपनी ने केरल छोड़ने का फैसला कर अपने निवेशकों को संदेश दिया है कि वह दूसरे दक्षिण भारतीय राज्यों में भी निवेश करेगी।

हालाँकि केरल ने इन आरोपों से इनकार किया है। केरल के उद्योग मंत्री पी राजीव ने शुक्रवार को मीडिया से कहा कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है। निवेशकों के साथ चर्चा करके चीजों को आगे बढ़ा सकते हैं।