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‘मेरे पूर्वज हिन्दू राजपूत, कोई मेरे सिर पर पिस्टल लगा देगा तो भी धर्म नहीं बदलूँगा’: मंत्री जमां खान के पूर्वजों ने कबूला था इस्लाम

बिहार सरकार के अल्‍पसंख्‍यक कल्‍याण मंत्री मोहम्मद जमां खान ने धर्म परिवर्तन को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि उनके पूर्वज हिंदू राजपूत थे। लेकिन बाद में उन्‍होंने इस्‍लाम धर्म कबूल कर लिया था। उनके मुताबिक, आज भी उनके पूर्वज के कई राजपूत वंशज हैं जिनसे उनका पारिवारिक रिश्‍ता है।

बता दें कि अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमां खान का यह बयान पत्रकारों से बात करते हुए आया। उनसे देश भर में हो रहे धर्मांतरण के बवाल को लेकर सवाल किया गया था। जमां खान ने अपनी बात कहते हुए खानदान के इतिहास के बारे में बताया।

उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज दो भाई थे जिनका नाम जयराम सिंह और भगवान सिंह था। एक लड़ाई जीतकर वह दोनों कैमूर के इलाके में बस गए। बाद में भगवान सिंह मुसलमान बन गए। मंत्री जमा खां ने बताया कि वे भगवान सिंह के खानदान से आते हैं। जबकि जयराम सिंह के वंश के लोग अब भी हिन्दू हैं। दोनों परिवारों में आज भी आना-जाना है और पारिवारिक रिश्ते बरकरार हैं।

खान आज की स्थिति पर जवाब देते हुए कहते हैं, “किसी का भी जबरदस्ती धर्म परिवर्तन नहीं कराया जा सकता। कोई मेरे सिर पर पिस्टल लगा देगा तो भी मैं अपना धर्म नहीं बदलूँगा। इसी तरह से कोई दूसरा आदमी भी अपना धर्म जबरदस्ती नहीं बदलेगा।” जमा खां ने कहा कि अगर कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है तो ठीक है। लेकिन जबरदस्ती ऐसा नहीं होगा। राज्य सरकार ऐसा नहीं होने देगी।

वह कहते हैं,

“धर्म का मामला मोहब्‍बत से होता है। कोई जबरदस्‍ती नहीं कर सकता। धर्म परिवर्तन भाईचारा और प्रेम से होता है। मेरे पूर्वज हिंदू थे लेकिन लाख कोई पिस्‍टल थमा दे तो क्‍या हम धर्म परिवर्तन कर लेंगे। बिल्‍कुल नहीं करेंगे। जो जबरन ऐसा कर रहे हैं वे बचेंगे नहीं। बिहार में जो सरकार है, वह ऐसे लोगों को छोड़ेगी नहीं। कोई अपने मन से कर रहा है तो कोई बात नहीं लेकिन जो जबरन ऐसा करते पकड़े जाएँगे उन्‍हें सजा मिलेगी। जो पकड़े जा रहे हैं उन्‍हें सजा जरूर होगी।” 

उल्लेखनीय है कि बिहार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमां खान कैमूर जिले के चैनपुर से बसपा की टिकट से चुनाव जीते थे। लेकिन जीत के बाद वो जेडीयू में शामिल हो गए। बाद में नीतीश सरकार ने उन्हें मंत्री बना दिया। वह कैमूर के ही नौघड़ा ग्राम निवासी हैं जहाँ उनके पिता एक बड़े किसान हैं।

Twitter के MD मनीष माहेश्वरी खेल रहे हैं लुका-छिपी का खेल: कर्नाटक HC में यूपी पुलिस

उत्तर प्रदेश पुलिस ने शुक्रवार (9 जुलाई, 2201) को कर्नाटक हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि ट्विटर इंडिया के एमडी मनीष माहेश्वरी जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। यूपी पुलिस की ओर से कोर्ट में कहा गया कि माहेश्वरी को नोटिस जारी किया गया, जिसके बाद उनको पुलिस के सामने पेश होकर सवालों के जवाब देने चाहिए लेकिन वो ऐसा नहीं करके लुका-छिपी खेल रहे हैं।

यूपी पुलिस के वकील ने अदालत से कहा कि मनीष माहेश्वरी ट्विटर इंडिया के प्रमुख हैं, उन्हें सहयोग करते हुए हमारे सामने पेश होना चाहिए। इस पर माहेश्वरी के वकील ने अदालत में कहा कि 18 जून से वो लगातार कह रहे हैं कि उनका मुवक्किल सिर्फ ट्विटर का एक कर्मचारी है, वो एमडी नहीं हैं। इस पर यूपी पुलिस के वकील ने कहा कि अगर ऐसा है तो मनीष माहेश्वरी को उनके सामने पेश होना चाहिए और बताना चाहिए कि वह ट्विटर इंडिया के एमडी नहीं हैं। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले को 13 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दिया है। 13 जुलाई को ही अदालत अपना आदेश सुनाएगी।

बता दें कि राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में मुस्लिम बुजुर्ग से मारपीट और दाढ़ी काटने की घटना के वीडियो से जुड़े मामले में पुलिस ट्विटर इंडिया समेत कई लोगों पर मामला दर्ज किया है। इसी मामले में मनीष माहेश्वरी को पुलिस ने समन जारी किया है। ट्विटर इंडिया एमडी मनीष माहेश्वरी ने कर्नाटक हाईकोर्ट में गाजियाबाद पुलिस की ओर से सेक्शन 41ए के तहत मिले नोटिस को चुनौती दी है।

गाजियाबाद में एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें कुछ युवक बुजुर्ग के साथ मारपीट और उनकी दाढ़ी काटते दिखे थे। इस वीडियो को शेयर किए जाने से जुड़े मामले में ही ट्विटर समेत कई लोगों पर पुलिस ने मामला बनाया है। इसी मामले में गाजियाबाद पुलिस ने ट्विटर इंडिया के एमडी को नोटिस भेज पूछताछ के लिए बुलाया है।

गौरतलब है कि मनीष माहेश्वरी ने गुरुवार (8 जुलाई, 2021) को कर्नाटक हाई कोर्ट से उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से जारी नोटिस को रद्द करने का अनुरोध किया था। न्यायमूर्ति जी नरेंद्र की एकल पीठ के समक्ष माहेश्वरी की ओर से पेश हुए वकील सीवी नागेश ने दलील दी कि सीआरपीसी की धारा 41-ए के तहत नोटिस बिना अधिकार और बिना कानूनी मंजूरी के जारी किया गया। 

उन्होंने दावा किया कि पहला नोटिस सीआरपीसी की धारा 160 के तहत 17 जून को जारी किया गया था। वकील ने दलील दी कि सीआरपीसी की धारा 160 के तहत कानूनी दायित्व उस व्यक्ति पर आधारित है जो उस स्थान पर रहता है जो उस थाना क्षेत्र के अधिकार क्षेत्र में आता है जहाँ अपराध दर्ज किया गया है। नागेश ने कहा कि धारा 160 के तहत नोटिस जारी होने के बाद माहेश्वरी ने जाँचकर्ताओं को बताया कि उन्हें इस मामले के बारे में कुछ भी नहीं पता है। उन्होंने कहा कि अगर माहेश्वरी उनके सामने व्यक्तिगत रूप से पेश हो भी जाते हैं तो भी उनका जवाब वही रहेगा। 

उल्लेखनीय है कि यूपी पुलिस ने ट्विटर इंडिया के MD महेश महेश्वरी को 24 जून 2021 को 10:30 बजे तक गाजियाबाद के लोनी थाना में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया था। 24 जून को, उच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश में, गाजियाबाद पुलिस को महेश महेश्वरी के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने से रोक दिया।

आमिर खान के सौतेले भाई हैदर अली ने भी दिया था तलाक: घरेलू हिंसा के बीच 10 साल तक ईशा ग्रोवर ने की शादी बचाने की कोशिश

टीवी का पॉपुलर शो ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ फेम ईवा ग्रोवर के टीवी और फिल्मी करियर को हर कोई जानता है, लेकिन उनकी पर्सनल लाइफ के बारे में शायद ही कुछ मालूम हो। ईवा ग्रोवर ने हैदर अली खान से शादी की थी। हैदर अली खान दिग्गज फिल्म मेकर ताहिर हुसैन के बेटे और बॉलीवुड सुपरस्टार आमिर खान के सौतेले भाई हैं।

ईवा ग्रोवर और हैदर अली खान ने काफी निजी तरीके से शादी और शादी कुछ सालों में एक बेबी गर्ल निष्ठा खान के पैरेंट्स बने। बेबी के कुछ सालों बाद दोनों के बीच काफी मतभेद और लड़ाइयाँ होने लगी थी जिसकी वजह से दोनों ने तलाक ले लिया। 

अप्रैल 2008 में हुआ तलाक

ईवा ने इंडिया फोरम को दिए इंटरव्यू में अपनी एब्यूजिव मैरिज का खुलासा किया। उन्होंने कहा, “मैंने अप्रैल 2008 में तलाक लिया। किसी भी शख्स के जीवन में ऐसा होना अच्छी बात नहीं है। हालाँकि, यह असहनीय था इसलिए मैं बस उस स्थिति से छुटकारा पानी चाहती थी। लेकिन मैं खुश नहीं हूँ क्योंकि कोई भी खुश नहीं हो सकता। मेरी माँ मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं और उन्होंने इस स्थिति से उबरने में मेरी बहुत मदद की है।”

घरेलू हिंसा की शिकार

ईवा ग्रोवर ने चौंकाने वाला खुलासा किया था कि उन्हें अपने पूर्व पति हैदर अली खान के साथ शादी में घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा था। इस खुलासे ने उस वक्त पूरी टीवी और फिल्म इंडस्ट्री हिला दिया था। उन्होंने कहा था, “स्थिति सँभालने लायक नहीं थी। यह घरेलू हिंसा का मामला था। तो तलाक लेना जरूरी हो गया था। मैं इसके बारे में पहले ही बोल चुकी हूँ और मैं इसके बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहती।”

शादी को 10 साल तक की बचाने की कोशिश

ईवा ने ये भी कहा था कि उन्हें लगा था कि बेटी के होने के बाद हैदर अली सुधर जाएँगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने 10 साल तक अपनी शादी बचाने की कोशिश लेकिन हार गईं और तलाक के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। हैदर अली खान ने साल 2009 में फिल्म ‘दिल तो दीवाना है’ से डेब्यू किया और कई फिल्मों में काम किया।

बता दें कि हाल ही में बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने अपनी दूसरी पत्नी किरण राव से तलाक लेने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था, “हम साथ में खुश रहे, हँसे। हमारा रिश्ता विश्वास, प्यार और सम्मान के मामले में लगातार बढ़ता ही रहा। अब हमने निर्णय लिया है कि अब हम जीवन के नए अध्याय की शुरुआत करेंगे, लेकिन पति-पत्नी के रूप में नहीं।” बकौल आमिर खान और किरण राव, उनका ये नया जीवन उनके बेटे आजाद के अभिभावक के रूप में होगा, एक परिवार के रूप में होगा।

‘बिग टेक प्रभावित कर रहे लोकतांत्रिक प्रक्रिया, फेकबुक नहीं झाड़ सकता पल्ला’: जानिए SC की टिप्पणी क्यों है बेहद खास

“फेसबुक यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता कि वह केवल एक मंच है जो अपने यूजर के कंटेंट पोस्ट करता है और इन कंटेंट या सूचना को नियंत्रित करने में या उसे रोकने में उसकी कोई भूमिका नहीं है।”

यह टिप्पणी उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय उस बेंच की है जिसके सामने फेसबुक ने दिल्ली विधानसभा की शांति और सामंजस्य कमेटी (Peace and Harmony Committee) से मिले एक समन को रद्द करने की सिफारिश की थी।

कमेटी ने फेसबुक को यह समन 2020 में हुए दिल्ली दंगों के परिप्रेक्ष्य में उसकी भूमिका को लेकर भेजा था। समन में कमेटी ने फेसबुक के प्रबंध निदेशक को उसके समक्ष उपस्थित होकर इस आरोप पर अपना पक्ष रखने के लिए कहा था कि; फेसबुक दंगों के दौरान हिंसा को भड़काने वाली पोस्ट को नियंत्रित करने में विफल रहा।

न्यायाधीशों ने समन को रद्द करने से इनकार करते हुए आगे अपनी टिप्पणी में कहा, “अपने यूजर द्वारा पोस्ट किए संदेश या सूचना को लेकर फेसबुक की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। उसकी भूमिका इतनी भी सरल नहीं है कि वो अपने मंच पर पोस्ट किए जाने वाली सूचनाओं से खुद को दूर रख सके।”

बेंच ने अपनी टिप्पणी में आगे कहा, “देश की राजधानी ऐसे दंगे फिर देखना नहीं चाहती और इसलिए फेसबुक की भूमिका पर विचार होना ही चाहिए।” न्यायालय ने इस विषय पर विधानसभा की कमेटी द्वारा व्यक्त की गई चिंता को जायज़ ठहराते हुए कहा, “कमेटी की चिंता को केवल इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि विधानसभा स्थानीय प्रशासन और विधि निर्माण के लिए है।”

न्यायालय की एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी के अनुसार, “फेसबुक का यह तर्क मान लेना अब किसी के लिए भी संभव नहीं है कि वह प्रोग्रामिंग और एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके यूजर को उसके व्यक्तिगत पसंद के हिसाब से कंटेंट नहीं दिखाता।” न्यायालय ने अन्य देशों में फेसबुक की भूमिका पर भी बात की और उसे याद दिलाया कि म्यांमार और श्रीलंका जैसे देशों में सामाजिक और कानून व्यवस्था को बिगाड़ने में सोशल मीडिया मंचों की क्या भूमिका रही है और इसके लिए उन्हें वहाँ किन समस्याओं का सामना करना पड़ा है।

इसके अलावा न्यायालय ने लोकतंत्र में चुनाव और उससे सम्बंधित प्रक्रियाओं को प्रभावित करने में सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक की भूमिका पर बात करते हुए कहा, “आज लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव की प्रक्रिया अर्थात मतदान को सोशल मीडिया द्वारा किए जा रहे हस्तक्षेप के कारण बहुत बड़ा खतरा है और इसकी वजह से फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों की भूमिका और उनकी बढ़ती ताकत पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक है। न्यायालय ने फेसबुक को यह भी याद दिलाया कि उसके जैसे सोशल मीडिया मंचों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है पर इन मंचों को भी अपनी भूमिका का ख्याल रखना पड़ेगा।”

उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई ये टिप्पणियाँ मेरे विचार से सही समय पर आई हैं। केवल भारत ही नहीं, विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों में चुनावी प्रक्रिया तथा अन्य विषयों पर सोशल मीडिया मंचों, खासकर फेसबुक, ट्विटर और गूगल की भूमिका को लेकर न केवल बहस होती रही है बल्कि इन लोकतांत्रिक देशों में कई बार सरकार या अन्य संस्थाओं द्वारा बनाई गई कमेटियों के सामने इन कंपनियों के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों से विस्तृत रूप से सवाल किए गए हैं। साथ ही पिछले तीन-चार वर्षों में तमाम देशों ने अपने हितों की रक्षा के लिए कानून पर विचार भी किए और उनका क्रियान्वन भी किया है। फ्रांस के साथ ही अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस विषय पर हाल के दिनों में मुखर रहे हैं।

हमारे देश में भी केंद्र सरकार ने नए आई टी नियम बनाकर इन कंपनियों की भूमिका की निगरानी और उन्हें जिम्मेदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है पर अभी तक इन कंपनियों की ओर से इन नियमों के पालन की बात पर बार-बार केवल बहाने बनाए गए हैं। ट्विटर एक तरह से सरकार के सामने खड़ा हो गया है, कभी इस बहाने कि; उस पर केवल अमेरिकी कानून और कंपनी की नीतियाँ ही लागू हो सकती हैं तो कभी यह कहते हुए कि वह सरकार के साथ बात कर रहा है।

इस विषय में दिल्ली उच्च न्यायलय की ताज़ी टिप्पणी सबसे महत्वपूर्ण है जिसमें न्यायालय ने ट्विटर को किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा देने से मना करते हुए यह कहा कि उसे भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा और अभी तक वह अपनी इन जिम्मेदारियों से कन्नी काटता रहा है। ऐसे में सरकार अपनी तरफ से कार्रवाई कर सकती है।

उच्चतम न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से आई टिप्पणियाँ यह साफ़ करती हैं कि न्यायालय भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में इन तकनीकी कंपनियों की भूमिका को लेकर न केवल चिंतित है बल्कि सतर्क भी है। साथ ही दुनिया के अन्य देशों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सोशल मीडिया की भूमिका को लेकर देश, प्रशासन और नागरिकों में जागरूकता भी बढ़ रही है।

यह इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पिछले दो-तीन वर्षों में भारतीय लोकतंत्र को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने की बाहरी शक्तियों की मंशा की चर्चा सार्वजनिक तौर पर होती रही है। साथ ही अगले वर्ष कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने वाले हैं जिनका परिणाम अगले लोकसभा चुनावों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। सरकार, प्रशासन और न्यायलय की अभी तक की भूमिका संतोषप्रद रही है और आशा है कि आनेवाले समय में ये संस्थाएंँ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह और प्रभावशाली ढंग से करेंगी।

मिलिए ‘जिला शामली’ वाली माइनिंग ऑफिसर डॉ. रंजना से, जानिए उनके करप्शन के किस्से: योगी सरकार ने कर दिया है सस्पेंड

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में प्रदेश के 4 जिलों में खनन अधिकारियों को सस्पेंड करके हाल में बड़ी कार्रवाई की। निलंबित होने वाले खनन अधिकारियों में सहारनपुर से आशीष कुमार, बांदा से सुभाष सिंह, शाहजहाँपुर से डॉ अभय सिंह और शामली से डॉ रंजना सिंह का नाम है। इन चारों अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का इल्जाम लगने के बाद इनके ख़िलाफ़ भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग की निदेशक डा. रोशन जैकब ने संस्तुति की।

चारों अधिकारियों में सबसे जाना माना नाम डॉ रंजना सिंह का है। भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित होने से पहले डॉ रंजना ने इस साल नए साल पर ‘जिला शामली’ नाम के गाने को लॉन्च किया था। जिला शामली गाना गाने के बाद उन्हें कई जगह सराहना मिली थी। उनका कहना था कि उन्होंने जिला शामली की संस्कृति से प्रभावित होकर और डीएम की प्रेरणा से शामली पर गीत बनाने की योजना बॉलीवुड गायक गोविंद कौशिक के साथ की। उनके गाने में इतिहास एवं ऐतिहासिक स्थलों को दर्शाया गया था।

मगर, अब डॉ रंजना पर ठेकेदारों और खनन माफिया से मोटी रकम उगाही करने के आरोप हैं। कहा जा रहा है कि वह खनन का ठेका जारी होने के बाद भी ठेकेदाराें से वसूली करती थीं, साथ ही पैसे लेकर निर्धारित स्थान के अलावा भी खनन की इजाजत दे देती थीं। उनके खिलाफ ये शिकायत दो ठेकेदारों ने ही की थी। उन पर एक ठेकेदार के साथ हिस्सेदारी का भी आरोप था। हालाँकि लंबी जाँच के बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया।

शिकायतकर्ता ठेकेदार ने उन्हें लेकर कहा था कि पद में हो रहे अवैध खनन में खनन अधिकारी रंजना चौधरी की मिलीभगत है। यही नहीं अवैध खनन के आरोपित मंजीत मंगलौरा (हरियाणा) के साथ उनकी हिस्सेदारी है। ठेकेदार ने अपनी शिकायत 2 जून को एसपी को पत्र लिखकर की थी। उसका कहना था कि मंजीत मंगलौरा और जिले की खनन अधिकारी उनको परेशान कर रहे हैं।

ठेकेदार दीपक पानू ने करोड़ों रुपए लेकर ठेका देने और निरस्त करने के आरोप लगाते हुए, कमिश्नर से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायत की थी। वही कुछ दिन पहले जनपद के रहने वाले दीपक बंसल ने भी मुख्यमंत्री के यहाँ जाकर लिखित में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप लगाया था कि खनन अधिकारी से लेकर उच्च अधिकारियों तक कैसे कोरोना कॉल में खाने के पैकिट में घोटाला किया गया। इसके बाद उसने अपनी जान को खतरा बताया था।

उल्लेखनीय है कि डॉ रंजना सिंह शामली में लगभग एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुकी हैं। इस दौरान वह बस विवादों में घिरी रहीं। उनका हाल ही में एक ऑडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह व्यापारी दीपक बंसल को खनन का काम दिलाने की बात कह रही थी। इससे पहले ठेकेदार दीपक पन्नू ने खनन अधिकारी पर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। ठेकेदार का कहना था कि उस पर हाइवे पर मिट्टी डालने के ठेका था। लेकिन एक अन्य ठेकेदार से मिलकर खनन अधिकारी ने उसका उत्पीड़न किया। उसे मिट्टी खनन की अनुमति नहीं दी और उसके ट्रक पकड़ लिए गए। इसके चलते उसे ठेका छोड़ना पड़ा।

‘अपना तैनाती से लाठी डंडा लाए हो, ले लो; नहीं तो वहाँ पड़ा है’: सपा के पूर्व MLA का हिंसा के लिए भड़काते वीडियो वायरल

उत्तर प्रदेश में होने वाले ब्लॉक प्रमुख के चुनावों पर समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी अभी से आमने सामने हैं। ऐसे में प्रदेश के कई जिलों से दोनों पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प की खबरे सामने आ रही थी और अब गोंडा जिले के पूर्व सपा विधायक का एक वीडियो वायरल हुआ है। वीडियो में वह तमाम सपा कार्यकर्ताओं को हिंसा भड़काने के लिए उकसाते सुनाई पड़ रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक, वीडियो में नजर आ रहे नेता सपा के पूर्व विधायक बैजनाथ दूबे हैं। अपने कार्यकर्ताओं से वह कहते हैं, “अपना तैनाती से लाठी डंडा लाए हो तो लाठी डंडे ले लो और नहीं लाए हो तो वहाँ पर पड़ा हैं।” सपा नेता की यह वीडियो वायरल होने के बाद अब लोग उनके विरुद्ध कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

शहजाद जय हिंद लिखते हैं, “समाजवादी चाल चरित्र चेहरा? सपा के पूर्व विधायक हिंसा भड़काते हुए! क्या अख़िलेश यादव जो क़ानून व्यवस्था पर क़सीदे पढ़ रहे थे अब कार्रवाई करेंगे इसके ख़िलाफ़?”

इसी प्रकार ट्विटर यूजर अलोक कुमार तिवारी कहते हैं, “सपा के पूर्व विधायक बैजनाथ दूबे कल दिनांक 8/07/2021 को अपनी जनसभा में अपने कार्यकर्ताओं  को उपद्रव मार काट और हिंसा करने को उकसाते हुए। ब्लाक प्रमुख नामांकन के समय इनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की कृपा करें।”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले कटरा बाजार ब्लॉक प्रमुख चुनाव में पर्चा खरीदने को लेकर भाजपा व सपा समर्थकों के बीच बवाल हो गया था। दोनों पक्षों से ईंट पत्थर चले थे। इसी बीच फायरिंग में भगदड़ भी हुई। बीच में दूबे का वाहन क्षतिग्रस्त हो गया। कुछ लोगों ने कहा कि उन पर हमला हुआ है। हालात बिगड़ता देख पुलिस ने बल का प्रयोग किया और दोनों पक्षों को मशक्कत के बाद खदेड़ डाला। फिर प्रशासनिक अधिकारियों को इसकी सूचना दी गई और इलाके में पुलिस बल तैनात किया गया।

पशुपति पारस के पास गई लोजपा: चिराग पासवान को दिल्ली HC ने दिया झटका, ‘चाचा’ के खिलाफ याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने पशुपति पारस को लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का नेता मानने के खिलाफ चिराग पासवान की याचिका खारिज कर दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद LJP सांसद पासवान ने बुधवार (7 जुलाई, 2021) को चाचा पशुपति कुमार पारस के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हालाँकि, अदालत ने शुक्रवार (9 जुलाई, 2021) को उनकी यह याचिका खारिज कर दी। पारस ने बुधवार को कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ ली थी। चिराग ने इसका भी विरोध किया था। 

पासवान की इस याचिका को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने कहा, “मुझे इस याचिका में कोई दम नजर नहीं आ रहा।” पशुपति पारस की तरफ से पेश वकील ने कहा कि जो लेटर पारस ने लोकसभा अध्यक्ष को दिया था उस समय पशुपति पारस पार्टी के चीफ व्हिप थे और बाद में पार्टी के लीडर चुने गए थे। कोर्ट ने कहा कि आपको चुनाव आयोग जाना चाहिए। यहाँ नहीं आना चाहिए था। उल्लेखनीय है कि अदालत इस मामले में चिराग पासवान पर जुर्माना भी लगाना चाहती थी लेकिन उनके वकील के अनुरोध करने के बाद उसने ऐसा नहीं किया।

LJP के नेता चिराग पासवान ने सीधे PM नरेंद्र मोदी को चुनौती दी थी। चिराग ने पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था, “LJP कोटे से निष्कासित सांसद पशुपति पारस को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, तो मैं कोर्ट जाऊँगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष मैं हूँ, पार्टी भी मेरी है। समर्थन भी मेरे पास है। मेरी अनुमति के बिना, पार्टी के कोटे से किसी भी सांसद को मंत्री बनाना गलत है।”

बता दें कि LJP में 13 जून की शाम से कलह शुरू हुई थी। 14 जून को चिराग पासवान को छोड़ बाकी पाँचों सांसदों ने संसदीय बोर्ड की बैठक बुलाई थी। इसमें हाजीपुर सांसद पशुपति कुमार पारस को संसदीय बोर्ड का नया अध्यक्ष चुन लिया गया। इसकी सूचना लोकसभा स्पीकर को भी दे दी गई। 14 जून की शाम तक लोकसभा सचिवालय से उन्हें मान्यता भी मिल गई थी। इधर चिराग पासवान ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर पाँचों बागी सांसदों को LJP से हटाने की अनुशंसा कर दी। फिर 17 जून को पटना में पारस गुट की बैठक में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया।

सपा महिला नेता के साथ बदसलूकी: CM योगी ने लखीमपुर थाने के सभी पुलिसकर्मियों को किया निलंबित

उत्तर प्रदेश में ब्लॉक प्रमुख चुनावों के लिए अपना नामांकन फाइल करने पहुँची समाजवादी पार्टी की महिला नेता और उनकी समर्थक के साथ बदसलूकी होने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़ा फैसला लेते हुए लखीमपुर थाने के सभी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है।

रिपोर्ट्स के मताबिक, योगी सरकार ने सभी पुलिसकर्मियों के निलंबन का यह फैसला सपा महिला नेता और उनकी समर्थक के साथ हुई बदसलूकी के मद्देनजर लिया। सस्पेंड हुए अधिकारियों में सर्कल ऑफिसर और स्टेशन हाउस ऑफिसर भी शामिल हैं।

बता दें गुरुवार (जुलाई 8, 2021) को सपा की महिला नेता ब्लॉक पंचायत कैंडिडेट के तौर पर अपना नॉमिनेशन भरने आई थीं। लेकिन नॉमिनेशन सेंटर पर कुछ लोगों ने उनके व उनकी महिला समर्थक के साथ बदसलूकी की और उनकी साड़ी भी खींची। कथिततौर पर हरकत को अंजाम देने वाला मुख्य आरोपित निर्दलीय प्रत्याशी है।

महिलाओं के साथ खींचतान की वीडियो अब सोशल मीडिया पर शेयर हो रही है। वीडियो में दिख रहा है कि सपा महिला नेता पर हमला किया गया, उनका शोषण किया गया और खुलेआम उनके कंधे से उनकी साड़ी खींच ली गई। ये हरकत दोनों अन्य पुरुषों ने चुनाव में निर्विरोध जीतने के इरादे से की।

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इसके अलाव सपा नेता ऋतु सिंह ने ऐसी बदसलूकी पर कहा, “मैं अपना नामांकन दाखिल करने गई थी, लेकिन उन्होंने मेरा नामांकन पत्र फाड़ दिया। वे मेरा पर्स लेकर भाग गए और मेरे कपड़े फाड़ दिए। पुलिस मौके पर थी और कुछ नहीं किया। वे रेखा शर्मा के ही गुंडे थे।”

बता दें कि पुलिस ने दोनों आरोपितों में से एक को गिरफ्तार कर लिया है। इसकी पहचान यश वर्मा के रूप में हुई हैं। वहीं अन्य लोग भी हिरासत में लिए गए हैं। महिला नेता ऋतु सिंह ने स्थानीय भाजपा नेताओं पर उनकी समर्थक अनीता के साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का आरोप लगाया, जो उनके नामांकन का समर्थन करने के लिए वहाँ मौजूद थीं।

उल्लेखनीय है कि ऋतु सिंह प्रखंड अध्यक्ष पद के लिए लखीमपुर खीरी के पासगावां प्रखंड से चुनाव लड़ रही हैं। वह भाजपा उम्मीदवार शिखा सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं, जो कथित तौर पर भाजपा नेता रेखा शर्मा की करीबी हैं।

बताया जा रहा है कि नामांकन दाखिल करने के स्थान पर, भाजपा और सपा के उम्मीदवारों और समर्थकों के बीच कथित तौर पर झड़पें हुईं। फिर कुछ स्थानीय बीजेपी समर्थकों ने सपा उम्मीदवार ऋतु सिंह के समर्थक के साथ दुर्व्यवहार और उनको परेशान किया।

जब घटना की सूचना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को मिली तो उन्होंने आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश दिए। साथ ही महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देने पर पुलिसकर्मियों को निलंबित भी कर दिया। बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि शांति भंग करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीएम ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को शांति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त बल तैनात करने का निर्देश दिया है। इस बीच, उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारियों ने कहा है कि वे घटना की जाँच कर रहे हैं और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

केरल के आधिकारिक कोविड मौतों के आँकड़े में 6,000 से अधिक केस का अंतर, RTI में खुलासा: रिपोर्ट्स

केरल में कोविड से मरने वालों के आँकड़ों को लेकर हेरफेर का मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जो आँकड़े जारी किए गए हैं, उनमें 6000 से अधिक केस कम हैं। द टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा दायर किए गए आरटीआई (RTI) में इसका खुलासा हुआ। यह राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से की गई गंभीर विसंगतियों की तरफ इशारा करती है।

रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य ने 30 जून 2021 तक 13,235 कोविड मौतें दर्ज की गईं, जबकि मुख्य रजिस्ट्रार कार्यालय (जन्म और मृत्यु) के अनुसार स्थानीय निकायों द्वारा कोविड के कारण दर्ज मौतें 19,584 हैं। इस तरह 6,349 मौतों का अंतर दिख रहा है।

मुख्य रजिस्ट्रार (जन्म और मृत्यु) एम रामनकुट्टी ने कहा कि मृत्यु का कारण निर्धारित प्रारूप में संबंधित चिकित्सा अधिकारी से प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर कोविड -19 के रूप में दर्ज किया गया है। स्थानीय निकायों में मौतों का पंजीकरण दो भागों में किया जाता है; कानूनी और सांख्यिकीय। मौत का कारण अध्ययन और विश्लेषणात्मक उद्देश्यों के लिए रजिस्टर में दर्ज किया गया है और आरटीआई के माध्यम से कोविड मृत्यु पंजीकरण के आँकड़ों को इस भाग से संकलित किया गया है।

हालाँकि राज्य सरकार ने औपचारिक रूप से पंजीकृत और घोषित मौतों के बीच भारी असमानता की संभावना को स्वीकार किया है, लेकिन यह डेटा विसंगति को पूरी तरह से संबोधित करने के बजाय औपचारिक व्यक्तिगत शिकायतों की प्रतीक्षा कर रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक केरल राज्य सरकार ने जिलों द्वारा बताए गए नामों को जोड़कर COVID-19 मौतों की सूची को संशोधित करने का निर्णय लिया है। स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने कहा, “बहिष्करण के व्यक्तिगत मामलों के बारे में शिकायतें उठाई जा सकती हैं। अस्पतालों द्वारा प्रकाशित मेडिकल बुलेटिन और लैब रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों को मौत के कारण की पुष्टि करने की आवश्यकता होती है। भले ही यह डेटा अनुपलब्ध हो, मौतों को COVID से संबंधित माना जा सकता है।” 

केजरीवाल ने जनता की गाढ़ी कमाई से छवि चमकाने के लिए देश भर में दिया फुल पेज विज्ञापन: कोविड कुप्रबंधन ढँकने का प्रयास

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा कोरोना की दूसरी लहर के दौरान व्यवस्था के कुप्रबंधन के कारण भारी आलोचना का सामना करना पड़ा। ऐसे में मुख्यमंत्री केजरीवाल की छवि चमकाने के लिए दिल्ली सरकार करदाताओं (Taxpayers) के पैसे से भव्य PR कैंपेन चला रही है और इस पर भारी धनराशि खर्च कर रही है।

राष्ट्रीय राजधानी में कोविड-19 के प्रबंधन में अपनी विफलता को ढँकने के प्रयास में दिल्ली सरकार ने एक बार फिर अरविंद केजरीवाल की सार्वजनिक छवि को चमकाने के लिए विज्ञापनों पर बहुत सारा पैसा खर्च करने का फैसला किया है।

शुक्रवार (9 जुलाई 2021) को दिल्ली सरकार ने न केवल कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में बल्कि बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात आदि के क्षेत्रीय समाचार पत्रों में भी पूरे पेज का विज्ञापन जारी किया गया। इसमें एक नई स्कीम ‘मुख्यमंत्री कोविड-19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ के शुभारंभ के बारे में बताया गया है।

इस योजना के तहत, AAP के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने कोविड-19 से मरने वाले लोगों के परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का दावा किया है। दिल्ली सरकार मृतक के परिजन को 50,000 रुपए का एकमुश्त मुआवजा देने की बात कही है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि उन परिवारों को दिल्ली सरकार 2,500 रुपए मासिक देगी, जिन्होंने अपने घर में कमाने वाले सदस्यों को खो दिया है।

इसके अलावा, दिल्ली सरकार ने दावा किया है कि जिन बच्चों ने अपने माता-पिता को कोविड-19 में खो दिया है, उन्हें 25 साल की उम्र तक 2,500 रुपए का मासिक भत्ता प्रदान किया जाएगा। शुरू हुई यह नई योजना केवल दिल्ली के निवासियों तक ही सीमित है। किसी अन्य राज्य के निवासी इस लाभ के लिए पात्र नहीं हैं।

इसके बावजूद, अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली सरकार ने कई अन्य राज्यों में PR कैंपेन चलाने पर करदाताओं का भारी पैसा खर्च किया है, जहाँ के निवासियों की ‘मुख्यमंत्री कोविड -19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ में कोई हिस्सेदारी नहीं है।

नीचे टाइम्स ऑफ इंडिया टुडे का पहला पेज है, जिसमें अरविंद केजरीवाल की तस्वीर के साथ पूरे पेज का विज्ञापन है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में ही नहीं, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, आदि जैसे हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में भी विज्ञापन प्रकाशित करके पेड प्रोपेगेंडा पर काफी खर्च किया है।

हिंदी दैनिक अमर उजाला के पेज चार पर AAP का एक विज्ञापन प्रकाशित किया गया है:

अमर उजाला में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

अरविंद केजरीवाल का फुल पेड PR सिर्फ दिल्ली और इसके पड़ोसी इलाकों तक ही सीमित नहीं है। आम आदमी पार्टी की अगुआई वाली सरकार ने गुजरात में केजरीवाल की छवि को बढ़ावा देने के लिए काफी सार्वजनिक संसाधन खर्च किए हैं।

दिल्ली सरकार गुजरात में विज्ञापन दिया

हैरानी की बात यह है कि दिल्ली सरकार की न तो गुजरात में कोई हिस्सेदारी है और न ही इस योजना को गुजरात के लोगों के लिए खोला गया है। इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने सिर्फ एक अखबार में नहीं बल्कि दो अन्य अखबारों में अरविंद केजरीवाल का महिमामंडन करने वाले विज्ञापन चलाए हैं।

ये है आप के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार का गुजराती दैनिक संदेश में विज्ञापन

संदेश में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

इसी तरह, दिल्ली सरकार ने एक अन्य दैनिक गुजरात समाचार में गुजराती में एक पूरे पेज का विज्ञापन प्रकाशित किया है।

गुजरात समाचार में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

नीचे दिव्य भास्कर द्वारा शुक्रवार को प्रकाशित एक गुजराती-विज्ञापन है जिसमें दिल्ली के ‘मुख्यमंत्री कोविड -19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ के बारे में गुजराती लोगों को ‘सूचित’ किया गया है।

दिव्य भास्कर में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

महाराष्ट्र:

दिल्ली के नागरिकों के लिए कल्याणकारी योजना के बारे में दिल्ली सरकार के विज्ञापन लोकमत जैसे मराठी-पत्रिकाओं में भी छपे हैं। नीचे लोकमत द्वारा संचालित एक मराठी विज्ञापन है, जिसका पूरा भुगतान दिल्ली सरकार द्वारा किया गया।

मराठी दैनिक लोकमत में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

मराठी दैनिकों के अलावा, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने अपने शुक्रवार के प्रिंट संस्करणों में भी दिल्ली सरकार के विज्ञापन प्रकाशित किए हैं।

पंजाब:

दिल्ली के करदाताओं द्वारा भुगतान किए गए विज्ञापनों को पंजाबी अखबारों में भी प्रकाशित किया गया। आम आदमी पार्टी ने अपनी वित्तीय और राजनीतिक पूँजी पंजाब में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनने के लिए खर्च की है।

पंजाबी दैनिक में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

कई सोशल मीडिया यूजर्स के अनुसार, दिल्ली सरकार ने बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, गोवा, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों में ‘मुख्यमंत्री कोविड -19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ से संबंधित विज्ञापन प्रकाशित किए हैं।

उचित देसाई नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने कहा है कि केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार ने उनकी छवि को बढ़ावा देने के प्रयास में देश भर के कम से कम 12 राज्यों में महँगे विज्ञापनों के लिए भुगतान किया है।

एक अन्य सोशल मीडिया ने ट्विटर पर कहा कि दिल्ली सरकार का विज्ञापन छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के अखबारों में भी छपा है।

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने रायपुर संस्करण में अरविंद केजरीवाल के विज्ञापनों की तस्वीर पोस्ट की।

इसी तरह का एक विज्ञापन शुक्रवार को दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में भी छपा, जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि दिल्ली सरकार ने मध्य प्रदेश में अपनी छवि को बढ़ावा देने के लिए इतनी बड़ी राशि खर्च की है, जो राज्य के लिए प्रासंगिक भी नहीं है।

दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

बिहार में हिंदी दैनिक हिंदुस्तान ने भी दिल्ली के नागरिकों के लिए कोविड-19 राहत योजना शुरू करने के लिए अरविंद केजरीवाल की प्रशंसा करते हुए इसी तरह का विज्ञापन प्रकाशित किया है।

हिंदुस्तान में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन (साभार:  SatyaArya)

PR प्रोपेगेंडा के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी दिल्ली सरकार का आकर्षण कोई नई घटना नहीं है। जब से अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, AAP के नेतृत्व वाली सरकार अरविंद केजरीवाल की छवि को बढ़ाने के लिए मीडिया, विशेष रूप से मुख्यधारा की मीडिया में पेड विज्ञापनों पर बहुत सारा पैसा खर्च कर रही है।

यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार ने जनवरी 2021 से मार्च 2021 के बीच केवल तीन महीनों में 150 करोड़ रुपए खर्च किए थे। दिल्ली सरकार ने इन पैसों से राजधानी में कोविड-19 स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे की स्थापना पर खर्च करने के बजाय विज्ञापन और प्रचार पर खर्च किए गए थे। केजरीवाल सरकार ने पिछले दो वर्षों में विज्ञापन पर 800 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए हैं।