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केजरीवाल ने जनता की गाढ़ी कमाई से छवि चमकाने के लिए देश भर में दिया फुल पेज विज्ञापन: कोविड कुप्रबंधन ढँकने का प्रयास

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा कोरोना की दूसरी लहर के दौरान व्यवस्था के कुप्रबंधन के कारण भारी आलोचना का सामना करना पड़ा। ऐसे में मुख्यमंत्री केजरीवाल की छवि चमकाने के लिए दिल्ली सरकार करदाताओं (Taxpayers) के पैसे से भव्य PR कैंपेन चला रही है और इस पर भारी धनराशि खर्च कर रही है।

राष्ट्रीय राजधानी में कोविड-19 के प्रबंधन में अपनी विफलता को ढँकने के प्रयास में दिल्ली सरकार ने एक बार फिर अरविंद केजरीवाल की सार्वजनिक छवि को चमकाने के लिए विज्ञापनों पर बहुत सारा पैसा खर्च करने का फैसला किया है।

शुक्रवार (9 जुलाई 2021) को दिल्ली सरकार ने न केवल कई राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में बल्कि बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात आदि के क्षेत्रीय समाचार पत्रों में भी पूरे पेज का विज्ञापन जारी किया गया। इसमें एक नई स्कीम ‘मुख्यमंत्री कोविड-19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ के शुभारंभ के बारे में बताया गया है।

इस योजना के तहत, AAP के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने कोविड-19 से मरने वाले लोगों के परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का दावा किया है। दिल्ली सरकार मृतक के परिजन को 50,000 रुपए का एकमुश्त मुआवजा देने की बात कही है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि उन परिवारों को दिल्ली सरकार 2,500 रुपए मासिक देगी, जिन्होंने अपने घर में कमाने वाले सदस्यों को खो दिया है।

इसके अलावा, दिल्ली सरकार ने दावा किया है कि जिन बच्चों ने अपने माता-पिता को कोविड-19 में खो दिया है, उन्हें 25 साल की उम्र तक 2,500 रुपए का मासिक भत्ता प्रदान किया जाएगा। शुरू हुई यह नई योजना केवल दिल्ली के निवासियों तक ही सीमित है। किसी अन्य राज्य के निवासी इस लाभ के लिए पात्र नहीं हैं।

इसके बावजूद, अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली सरकार ने कई अन्य राज्यों में PR कैंपेन चलाने पर करदाताओं का भारी पैसा खर्च किया है, जहाँ के निवासियों की ‘मुख्यमंत्री कोविड -19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ में कोई हिस्सेदारी नहीं है।

नीचे टाइम्स ऑफ इंडिया टुडे का पहला पेज है, जिसमें अरविंद केजरीवाल की तस्वीर के साथ पूरे पेज का विज्ञापन है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में ही नहीं, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने अमर उजाला, दैनिक भास्कर, आदि जैसे हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में भी विज्ञापन प्रकाशित करके पेड प्रोपेगेंडा पर काफी खर्च किया है।

हिंदी दैनिक अमर उजाला के पेज चार पर AAP का एक विज्ञापन प्रकाशित किया गया है:

अमर उजाला में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

अरविंद केजरीवाल का फुल पेड PR सिर्फ दिल्ली और इसके पड़ोसी इलाकों तक ही सीमित नहीं है। आम आदमी पार्टी की अगुआई वाली सरकार ने गुजरात में केजरीवाल की छवि को बढ़ावा देने के लिए काफी सार्वजनिक संसाधन खर्च किए हैं।

दिल्ली सरकार गुजरात में विज्ञापन दिया

हैरानी की बात यह है कि दिल्ली सरकार की न तो गुजरात में कोई हिस्सेदारी है और न ही इस योजना को गुजरात के लोगों के लिए खोला गया है। इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने सिर्फ एक अखबार में नहीं बल्कि दो अन्य अखबारों में अरविंद केजरीवाल का महिमामंडन करने वाले विज्ञापन चलाए हैं।

ये है आप के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार का गुजराती दैनिक संदेश में विज्ञापन

संदेश में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

इसी तरह, दिल्ली सरकार ने एक अन्य दैनिक गुजरात समाचार में गुजराती में एक पूरे पेज का विज्ञापन प्रकाशित किया है।

गुजरात समाचार में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

नीचे दिव्य भास्कर द्वारा शुक्रवार को प्रकाशित एक गुजराती-विज्ञापन है जिसमें दिल्ली के ‘मुख्यमंत्री कोविड -19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ के बारे में गुजराती लोगों को ‘सूचित’ किया गया है।

दिव्य भास्कर में अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

महाराष्ट्र:

दिल्ली के नागरिकों के लिए कल्याणकारी योजना के बारे में दिल्ली सरकार के विज्ञापन लोकमत जैसे मराठी-पत्रिकाओं में भी छपे हैं। नीचे लोकमत द्वारा संचालित एक मराठी विज्ञापन है, जिसका पूरा भुगतान दिल्ली सरकार द्वारा किया गया।

मराठी दैनिक लोकमत में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

मराठी दैनिकों के अलावा, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस ने अपने शुक्रवार के प्रिंट संस्करणों में भी दिल्ली सरकार के विज्ञापन प्रकाशित किए हैं।

पंजाब:

दिल्ली के करदाताओं द्वारा भुगतान किए गए विज्ञापनों को पंजाबी अखबारों में भी प्रकाशित किया गया। आम आदमी पार्टी ने अपनी वित्तीय और राजनीतिक पूँजी पंजाब में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनने के लिए खर्च की है।

पंजाबी दैनिक में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

कई सोशल मीडिया यूजर्स के अनुसार, दिल्ली सरकार ने बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, गोवा, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों में ‘मुख्यमंत्री कोविड -19 परिवार आर्थिक सहायता योजना’ से संबंधित विज्ञापन प्रकाशित किए हैं।

उचित देसाई नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने कहा है कि केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार ने उनकी छवि को बढ़ावा देने के प्रयास में देश भर के कम से कम 12 राज्यों में महँगे विज्ञापनों के लिए भुगतान किया है।

एक अन्य सोशल मीडिया ने ट्विटर पर कहा कि दिल्ली सरकार का विज्ञापन छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के अखबारों में भी छपा है।

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने रायपुर संस्करण में अरविंद केजरीवाल के विज्ञापनों की तस्वीर पोस्ट की।

इसी तरह का एक विज्ञापन शुक्रवार को दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में भी छपा, जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाया कि दिल्ली सरकार ने मध्य प्रदेश में अपनी छवि को बढ़ावा देने के लिए इतनी बड़ी राशि खर्च की है, जो राज्य के लिए प्रासंगिक भी नहीं है।

दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन

बिहार में हिंदी दैनिक हिंदुस्तान ने भी दिल्ली के नागरिकों के लिए कोविड-19 राहत योजना शुरू करने के लिए अरविंद केजरीवाल की प्रशंसा करते हुए इसी तरह का विज्ञापन प्रकाशित किया है।

हिंदुस्तान में प्रकाशित अरविंद केजरीवाल का विज्ञापन (साभार:  SatyaArya)

PR प्रोपेगेंडा के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी दिल्ली सरकार का आकर्षण कोई नई घटना नहीं है। जब से अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, AAP के नेतृत्व वाली सरकार अरविंद केजरीवाल की छवि को बढ़ाने के लिए मीडिया, विशेष रूप से मुख्यधारा की मीडिया में पेड विज्ञापनों पर बहुत सारा पैसा खर्च कर रही है।

यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार ने जनवरी 2021 से मार्च 2021 के बीच केवल तीन महीनों में 150 करोड़ रुपए खर्च किए थे। दिल्ली सरकार ने इन पैसों से राजधानी में कोविड-19 स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे की स्थापना पर खर्च करने के बजाय विज्ञापन और प्रचार पर खर्च किए गए थे। केजरीवाल सरकार ने पिछले दो वर्षों में विज्ञापन पर 800 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए हैं।

‘2022 में फिर CM होंगे योगी आदित्यनाथ’: यूपी के 52% लोगों को यकीन, जनसंख्या नियंत्रण के लिए 11 जुलाई को आएगी नई नीति

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य के विकास के लिए लगातार प्रयत्न करते रहते हैं। भले ही इसके लिए उन्हें कोई कठिन निर्णय लेना पड़े लेकिन राज्य की जनता के कल्याण के लिए योगी सरकार सदैव तत्पर रही है। इसी क्रम में अब योगी सरकार 2021-30 के लिए जनसंख्या नियंत्रण नीति लेकर आने वाली है, जो 11 जुलाई को सबके सामने आएगी। उनके इन्हीं प्रयासों के कारण यूपी में आज सीएम योगी से बड़ा चेहरा कोई नहीं है और यही कारण है कि हाल ही में किए गए एक सर्वे में यह सामने आया है कि 52% लोगों ने यह माना है कि 2022 में योगी आदित्यनाथ एक बार फिर यूपी की कमान संभालने वाले हैं।

परिवार नियोजन और स्वास्थ्य पर प्रमुख ध्यान:

11 जुलाई 2021 को विश्व जनसंख्या दिवस पर योगी सरकार भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य के लिए जनसंख्या नियंत्रण नीति का अनावरण करेगी। यह 2021-30 के लिए राज्य में समुदाय आधारित दृष्टिकोण पर आधारित होगी जिसके तहत जनसंख्या नियंत्रण के साथ स्वास्थ्य पर भी नीतिगत निर्णय लिए जाएँगे जिससे राज्य बेहतर तरीके से विकास कर सके। सरकारी प्रवक्ता ने बताया कि राज्य में जन्म दर 2.7 है जबकि इसे आदर्श रूप से 2.1 से कम होना चाहिए और कई राज्यों ने यह लक्ष्य हासिल भी कर लिया है, सिवाय यूपी और बिहार के।

सरकारी प्रवक्ता ने यह भी बताया कि आगामी जनसंख्या नियंत्रण नीति 5 स्तंभों पर आधारित होगी। इसमें परिवार नियोजन के लिए बेहतर उपायों की उपलब्धता पर जोर दिया जाएगा। साथ ही नपुंसकता और बाँझपन के लिए समाधान प्रदान करके और शिशु एवं मातृ मृत्यु दर को भी कम से कम करने के लिए भी प्रयास किया जाएगा। सरकारी प्रवक्ता के अनुसार इस नीति की विशेषता है कि इसमें न केवल जनसंख्या नियंत्रण पर जोर दिया जाएगा बल्कि साथ ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और लोगों में जागरुकता के प्रसार के लिए उपाय किए जाएँगे। दरअसल सीएम आदित्यनाथ का मानना है कि गरीबी और अशिक्षा ही ऐसे प्रमुख कारण हैं जिनसे जनसंख्या नियंत्रण के कार्य में रुकावट आ सकती है इसलिए इस नीति में इन दोनों कारकों पर प्रमुख रूप से ध्यान दिया जाएगा।

2022 में योगी फिर संभालेंगे UP की कमान:

सीएम योगी आदित्यनाथ के इन्हीं उपायों और जनकल्याणकारी कार्यों के चलते वर्तमान समय में यूपी में वही प्रमुख चेहरा हैं, न केवल भाजपा का बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश की राजनीति का। हाल ही में IANS-CVoter के द्वारा किए गए सर्वे में यह सामने आया है कि यूपी के 52% लोग यह मानते हैं कि सीएम योगी 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद दोबारा मुख्यमंत्री के रूप में लौटेंगे। इस सर्वे में भाग लेने वाले 37% लोगों ने ऐसा होने से इनकार किया है। इस सर्वे में सभी वर्गों के 1200 लोगों ने भाग लिया था।

ज्ञात हो कि 14 मार्च 2022 को योगी सरकार का पहला कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है। इसके पहले फरवरी 2022 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव आयोजित कराए जाएँगे। 2017 में 403 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटों पर जीत हासिल करते हुए अकेले दम पर बहुमत हासिल किया था। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को 39.67% मत प्राप्त हुए थे। यूपी में इस प्रचंड बहुमत के बाद योगी आदित्यनाथ राज्य के मुख्यमंत्री चुने गए थे।

यूनिफॉर्म सिविल कोड का दिल्ली हाईकोर्ट ने किया समर्थन, केंद्र सरकार को दिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code या UCC) की आवश्यकता पर बल देते हुए केंद्र सरकार से इसके विषय में आवश्यक कदम उठाने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा कि UCC के कारण समाज में झगड़ों और विरोधाभासों में कमी आएगी, जो अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण उत्पन्न होते हैं। यह आदेश जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने 7 जुलाई 2021 को हिन्दू मैरिज ऐक्ट 1955 से जुड़ी एक याचिका पर विचार करते हुए दिया।

UCC के संबंध कोर्ट के प्रेक्षण:

मीणा समुदाय के दो पक्षों के बीच उत्पन्न विवाद पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सिंह ने कहा कि अदालतों को कई बार पर्सनल लॉ से उत्पन्न हुए संघर्षों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समुदाय, जाति अथवा धर्म के जो लोग वैवाहिक संबंध स्थापित करते हैं उन्हें इन पर्सनल लॉ के कारण विवादों से गुजरना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के युवाओं को बार-बार (खासकर शादी और तलाक के मुद्दे पर) असमानता से जुड़े इन मुद्दों से जूझने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

जस्टिस सिंह ने UCC के मामले में संविधान का हवाला देते हुए कहा कि भारत में UCC संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत परिभाषित किया गया है। जस्टिस सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा भी समय-समय पर इसे दोहराया जाता रहा है और वर्तमान में एक ऐसे सिविल कोड आवश्यकता है जो सभी के लिए एक जैसा हो। यह हर समाज के शादी, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में समान सिद्धांत लागू करे।

मुस्लिमों को छोड़ बाकी समुदायों के कानून संहिताबद्ध:

वर्तमान में हिन्दू धर्म और विभिन्न अन्य समुदायों में शादी, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार और विरासत आदि मामलों की वैधानिक स्वीकार्यता के लिए अलग-अलग कानून संहिताबद्ध हैं। इन कानूनों में हिन्दू मैरिज ऐक्ट, हिन्दू उत्तराधिकार कानून, इंडियन क्रिश्चियन मैरिज ऐक्ट, इंडियन डिवोर्स ऐक्ट, पारसी मैरिज ऐक्ट और डिवोर्स ऐक्ट अस्तित्व में हैं। इन संबंधित धर्मों और संप्रदायों में संहिताबद्ध कानूनों के तहत ही कार्रवाई की जाती है, लेकिन मुस्लिमों में ऐसा नहीं है।

उनके पर्सनल लॉ, शरीयत और उनके धार्मिक ग्रंथों के हिसाब से संहिताबद्ध किए गए हैं। हालाँकि, तीन तलाक के मुद्दे पर सत्तारूढ़ वर्तमान मोदी सरकार ने कानून बनाकर मुस्लिमों और अन्य संप्रदायों के बीच के अंतर को पाटने का प्रयास अवश्य किया है, लेकिन इस कानून के कारण अक्सर मोदी सरकार इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर रहती है।

UCC की संवैधानिक स्थिति:

संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक राज्य के नीति निदेशक तत्वों का वर्णन किया गया है। ये निदेशक तत्व, मूल अधिकारों की मूल आत्मा कहे जाते हैं। इन्हीं नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के अंतर्गत समान नागरिक संहिता (UCC) का उल्लेख किया गया है। इसके विषय में सबसे रोचक बात यह है कि भले ही नीति निदेशक तत्व प्रकृति में गैर-न्यायिक होते हैं, लेकिन ये किसी कानून की संविधानिकता का निर्धारण कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह व्यवस्था दी है कि यदि कोई कानून सीधे तौर पर राज्य के नीति निदेशक तत्वों को प्रभावी करना चाहता है तो सुप्रीम कोर्ट ऐसे कानून को अनुच्छेद 14 अथवा अनुच्छेद 19 के संबंध में तर्कसंगत मानते हुए असंवैधानिक कहे जाने से बचा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि UCC का यह कहकर विरोध नहीं किया जा सकता है कि इसके द्वारा किसी मूल अधिकार का हनन हो रहा है।

देश में लग रहे 1500 PSA ऑक्सीजन प्लांट, होंगे जल्द शुरू: PM मोदी ने हाई लेवल मीटिंग में दिए कई निर्देश

कोरोना महामारी की तीसरी लहर को लेकर लग रहे कयासों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (जुलाई 9, 2021) को देश में ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक की। इस बैठक में पीएम ने केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को पीएम केयर्स फंड की मदद से ‘प्रेशर स्विंग एड्जॉर्प्शन’(PSA) मेडिकल ऑक्सीजन प्लांट देश भर में लगाने के निर्देश दिए। इसके अलावा पीएम ने इन प्लांट्स के जल्द से जल्द क्रियान्वयन सुनिश्चित करने और इसके लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने का भी निर्देश दिया।

PMO द्वारा जारी बयान के मुताबिक, बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को PSA मेडिकल ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना संबंधी प्रगति से अवगत करवाया गया। उन्हें बताया गया कि देश भर में 1500 से अधिक पीएसए ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना की जा रही है। इनमें पीएम केयर्स से आवंटित संयंत्रों के अलावा विभिन्न मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की ओर से आवंटित संयंत्र भी शामिल हैं।

इस दौरान प्रधानमंत्री को जानकारी दी गई कि जैसे ही ये सभी प्लांट शुरू हो जाएँगे, वैसे ही इससे 4 लाख से अधिक ऑक्सीजन वाले बिस्तरों को ऑक्सीजन आपूर्ति की जा सकेगी। बैठक में पीएम मोदी ने अधिकारियों को ऑक्सीजन प्लांट के संचालन व रखरखाव के लिए अस्पताल के कर्मचारियों की उचित ट्रेनिंग सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि सभी जिलों में प्रशिक्षित कर्मी उपलब्ध होने चाहिए।

उल्लेखनीय है कि आज की इस बैठक में प्रधानमंत्री के प्रमुख सलाहकार, कैबिनेट सचिव, स्वास्थ्य सचिव सहित कई अन्य अधिकारी मौजूद थे। इस बैठक में बताया गया कि विशेषज्ञों की ओर से प्रशिक्षण संबंधी एक खाका तैयार किया गया है और उनके जरिए देशभर में 8,000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।

याद दिला दें कि कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी के कारण कई लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी थी। उसी परिस्थिति के मद्देनजर और तीसरी लहर की संभावना देखते हुए पीएम मोदी अपनी बैठके कर रहे हैं और आने वाले समय में कोई कमी न इसके लिए कदम उठा रहे हैं।

सोशल मीडिया हेरफेर से चुनाव व मतदान प्रक्रिया को खतरा: SC ने फेसबुक को दी जवाबदेह होने की नसीहत

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (जुलाई 8, 2021) को फेसबुक बनाम दिल्ली विधानसभा मामले में सुनवाई करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उन लोगों के प्रति जवाबदेह होने की नसीहत दी, जिन्होंने उसे ताकत प्रदान की है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि सोशल मीडिया के हेरफेर के कारण चुनाव और मतदान प्रक्रिया को खतरा हो सकता है। 

जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा, “विशाल शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए। फेसबुक जैसी संस्थाओं को उन लोगों के प्रति जवाबदेह रहना होगा जो उन्हें ऐसी शक्ति सौंपते हैं।” पीठ के मुताबिक, भले ही फेसबुक ने बेजुबानों को आवाज देकर और राज्य की सेंसरशिप से बचने का एक साधन देकर बोलने की स्वतंत्रता को सक्षम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इस तथ्य को नहीं भुलाया जा सकता कि इन सबके साथ ही फेसबुक विघनकारी संदेशों और विचारधाराओं के लिए एक मंच बन गया है।

अपनी बात को समझाने के लिए पीठ ने 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हुए विवाद की ओर इशारा किया, जिसमें रूस द्वारा कथित तौर पर फेसबुक जैसे मंचों के माध्यम से हस्तक्षेप के बारे में बताया गया है। पीठ में शामिल जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति हृषिकेश ने माना कि फेसबुक भारत में सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, जिसके लगभग 270 मिलियन (27 करोड़) रजिस्टर्ड यूजर्स हैं।

कोर्ट ने डिजिटल युग में सूचना विस्फोट से पैदा हुई नई चुनौतियों पर ध्यान दिलाया, “उदार लोकतंत्र का सफल संचालन तभी सुनिश्चित हो सकता है जब नागरिक सूचित निर्णय लेने में सक्षम हों। ऐसे निर्णय दृष्टिकोणों और विचारों की बहुलता को ध्यान में रखते हुए लिए जाने चाहिए। डिजिटल युग में सूचना विस्फोट नई चुनौतियों को पैदा करने में सक्षम है, जो उन मुद्दों पर बहस को कपटपूर्ण तरीके से संशोधित कर रहे हैं जहाँ राय को व्यापक रूप से विभाजित किया जा सकता है।”

कोर्ट ने मामले की सुनवाई में उक्त अवलोकन के साथ यह भी कहा कि सोशल मीडिया के कारण जहाँ आम नागरिकों और नीति बनाने वालों के बीच समान और खुले संवाद को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं ये हित समूहों के हाथों का एक उपकरण बन गया है। इसलिए जिनके पास (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) इतनी विशाल शक्तियाँ हैं उन्हें जिम्मेदारी के साथ आना ही चाहिए और लोगों के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चरमपंथी विचारों को मुख्यधारा में शामिल किया जा रहा है, जिससे गलत सूचना फैलती है। स्थापित लोकतंत्र में इस तरह की लहरों के प्रभाव देखकर पीठ ने चिंता जताई। साथ ही बताया कि चुनाव और मतदान प्रक्रियाएँ, जो एक लोकतांत्रिक सरकार की नींव हैं, वे सोशल मीडिया के हेरफेर से खतरे में हैं। इसने फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म में शक्ति की बढ़ती एकाग्रता के बारे में महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है और इसलिए कहा जाता है कि वे व्यवसाय मॉडल को इस तरह नियोजित करते हैं जो निजता-घुसपैठ और ध्यानाकर्षण माँगते हैं।

अदालत ने यह भी कहा कि ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे देशों ने फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म को प्रभावी तरीके से विनियमित करने के प्रयास किए हैं। लेकिन उनकी कोशिश अभी भी एक प्रारंभिक चरण में हैं क्योंकि मंच की गतिशीलता और इसकी हानिकारक क्षमता को समझने के लिए अब भी अध्ययन किए जा रहे हैं। हालिया उदाहरण ऑस्ट्रेलिया का है, जो एक ऐसा कानून तैयार करने के लिए प्रयासरत है, जिसके मुताबिक पब्लिशर्स को उनकी समाचार कहानियाँ उपयोग के लिए भुगतान करने की जरूरत होगी।

AAP का राशन ड्रामा: जिनकी आलीशान कोठी-महँगी गाड़ियाँ उनको घूम-घूमकर दे रहे फ्री का राशन, देखें Video

आम आदमी पार्टी (AAP) का ड्रामा आए दिन जारी रहता है। दिल्ली सरकार नए स्कूल, अस्पताल, ऑक्सीजन प्लांट आदि बनाने जैसे अपने हर वादे में विफल रही है, इसके बावजूद यह अन्य क्षेत्रों में अपनी सफलता दिखा रही है। AAP नेता स्पीड ब्रेकर का उद्घाटन कर रहे हैं, वैक्सीन आदि खरीदने के बदले करोड़ों रुपए के विज्ञापन जारी कर रहे हैं।

इसी तरह का एक नाटक गोवा में देखने को मिला। AAP के एक नेता को उन परिवारों को भी राशन बाँटते देखा गया, जिन्हें किसी मदद की जरूरत नहीं है। गोवा में AAP की उपाध्यक्ष एडवोकेट प्रतिमा बेट्सी कॉटिन्हो राज्य में घूम-घूम कर लोगों को राशन बाँट रही हैं। इस दौरान वह जरूरतमंद लोगों को राशन बाँटने के साथ ही उन लोगों को भी राशन बाँट रही हैं, जिन्हें इनकी जरूरत नहीं है। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में प्रतिमा को नावेलिम निर्वाचन क्षेत्र के एक बड़े बंगले में रहने वाले एक धनी परिवार को सामानों से भरा बैग देते हुए देखा जा सकता है।

गोवा न्यूज हब द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो में प्रतिमा बैग के साथ स्कूटर की सवारी करती नजर आ रही हैं, जो एक बड़े बंगले की ओर जाकर लोहे के एक बड़े गेट के सामने रुकती है। गेट खोलकर एक महिला पैकेट लेने के लिए बाहर आती है। बंगले के परिसर में एक सेडान कार और शायद एक सुजुकी सियाज खड़ी दिखाई देती है। इसके साथ ही वहाँ पर एक पालतू कुत्ते के भौंकने की आवाज भी सुनाई देती है। वीडियो से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह एक संपन्न परिवार का घर है और इसे AAP द्वारा वितरित राशन की आवश्यकता नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि प्रतिमा बेट्सी कॉटिन्हो ने वीडियो के साथ गोवा न्यूज हब द्वारा पोस्ट किए गए ट्वीट को खुद रीट्वीट किया था। AAP नेता द्वारा महिला को सौंपे गए बैग पर ‘आम आदमी पार्टी’ लिखा हुआ था, जिसमें प्रतिमा ने कहा था कि ‘आम आदमी लोगों की मदद के लिए ऐसा कर रही है।’

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब AAP नेता ने बड़े बंगले में रहने वाले अमीर लोगों को राशन वितरित किया है। खुद AAP नेता और अन्य लोगों द्वारा पोस्ट की गई कई तस्वीरों से साफ है कि वह उन परिवारों को राशन बाँट रही हैं, जिन्हें किसी भी पहलू से इसकी जरूरत नहीं है।

दुनिया के बेहतरीन 11000 खिलाड़ी होंगे, पर देखने वाला कोई नहीं होगा: टोक्यो में इमरजेंसी, बिना दर्शकों के होगा ओलंपिक

जापान की राजधानी टोक्यो में 23 जुलाई 2021 से शुरू हो रहे ओलंपिक में दर्शकों के जाने पर पाबंदी लगाई गई है। जापान में कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते मामलों के कारण प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने आपातकाल की घोषणा कर दी है, जिसके कारण यह निर्णय लिया गया है। दर्शकों पर प्रतिबंध की घोषणा के बाद अब ओलंपिक गेम्स का प्रसारण टीवी तक ही सीमित रहेगा।

दरअसल जापान की राजधानी टोक्यो में पिछले कुछ दिनों से Covid-19 संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। इस दौरान कोरोना वायरस के डेल्टा वैरिएन्ट ने प्रशासन की चिंताएँ बढ़ा दी हैं। हालाँकि टोक्यो में पहले ही विदेशी दर्शकों को प्रतिबंधित किया जा चुका है लेकिन डेल्टा वैरिएन्ट का खतरा बढ़ने के कारण अब निर्णय लिया गया है कि स्थानीय दर्शकों को भी ओलंपिक गेम्स के दौरान प्रतिबंधित किया जाएगा।

मीडिया से चर्चा के दौरान जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने बताया कि आगामी सोमवार (12 जुलाई 2021) से लागू होने वाला आपातकाल 22 अगस्त 2021 तक प्रभावी रहेगा। इस दौरान टोक्यो में कड़े प्रतिबंध लागू रहेंगे। आपातकाल लगाए जाने के बाद अब 23 जुलाई से 8 अगस्त तक चलने वाले ओलंपिक गेम्स पूरी तरह से आपातकाल के नियमों के मुताबिक संचालित होंगे। 23 जुलाई से शुरू होने वाले ओलंपिक गेम्स में भाग लेने के लिए पूरी दुनिया भर से लगभग 11,000 खिलाड़ी टोक्यो पहुँचेंगे, साथ ही इन खिलाड़ियों के साथ हजारों की संख्या में सहायक स्टाफ के सदस्य भी होंगे।

टोक्यो में लगाए गए इस आपातकाल के दौरान शराब परोसने वाले बार, रेस्टोरेंट और ऐसे ही अन्य स्थानों को या तो बंद किया गया है या उनके संचालन के समय को सीमित किया गया है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि ये कुछ ऐसे स्थान हैं, जहाँ से भीड़ के इकट्ठा होने की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है। इसी कारण लोगों को इकट्ठा होने से रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया है।

हालाँकि, ओलंपिक गेम्स में दर्शकों को प्रतिबंधित करने से आयोजकों को कितना नुकसान होगा, इसकी जानकारी फिलहाल अभी उपलब्ध नहीं है। हालाँकि, टोक्यो ओलंपिक के सीईओ तोशिरो मुतो ने जानकारी दी कि आयोजक दर्शकों की कमी से होने वाले नुकसान की भरपाई करने के लिए स्टाफ की छँटनी भी की जा सकती है। ओलंपिक गेम्स के संचालन के विषय में हुई बैठक में हुई चर्चा के बाद दो हफ्ते पहले ही यह निर्णय लिया गया था कि 50% दर्शक क्षमता के साथ गेम्स का आयोजन किया जा सकता है और यह संख्या 10,000 से अधिक न हो। हालाँकि, आपातकाल की घोषणा के बाद यह गुंजाइश भी खत्म हो चुकी है।

ज्ञात हो कि गुरुवार (08 जुलाई 2021) को टोक्यो में कोरोना वायरस संक्रमण के 896 नए मामले सामने आए। बुधवार को भी संक्रमण के 920 मामले सामने आए थे। इसके साथ ही अब जापान में संक्रमितों की कुल संख्या 8,11,000 हो चुकी है और संक्रमण के चलते 14,800 मौतें भी हो चुकी हैं। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि टोक्यो में जुलाई के अंत तक रोजाना मिलने वाले मरीजों की संख्या बढ़कर 1,000 और अगस्त तक 2,000 हो सकती है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जापान में टीकाकरण की रफ्तार भी धीमी है।

अमिताभ को राजनीति में नहीं लाना, माधवराव को मंत्री नहीं बनाना: इंदिरा ने बेटे राजीव से कहा था, माखनलाल का हवाला-किताब में दावा

ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कैबिनेट में जगह देते हुए नागरिक उड्डयन मंत्रालय की जिम्मेदारी दी है। इसके बाद से ज्योतिरादित्य के दिवंगत पिता माधवराव सिंधिया भी चर्चा में हैं। चर्चा इस बात की है कि कैसे 30 साल पहले नरसिम्हा राव की कैबिनेट में माधवराव को भी उड्डयन मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली थी। कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार से उनके रिश्तों को लेकर भी बात हो रही है, क्योंकि कभी ज्योतिरादित्य भी राहुल गाँधी के करीबी बताए जाते थे, लेकिन बाद में उन्हें कॉन्ग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसी कड़ी में मीडिया रिपोर्टों में पत्रकार राशिद किदवई की किताब के हवाले से एक नया दावा किया जा रहा है। इसके अनुसार अपनी हत्या से कुछ दिन पहले इंदिरा गाँधी ने बेटे राजीव और अरुण नेहरू को मिलने बुलाया था। अरुण नेहरू ​की राजीव के जमाने में कॉन्ग्रेस में तूती बोलती थी। बाद में वे उनके पतन की भी वजह बने। दावा किया जा रहा है कि इस मुलाकात में इंदिरा ने राजीव से कहा कि दो काम बिल्कुल मत करना। पहला, अमिताभ बच्चन को लेकर कभी चुनावी राजनीति में मत आना। दूसरा, माधवराव सिंधिया को मंत्री मत बनाना।

रिपोर्टों के अनुसार किदवई ने यह बात माखनलाल फोतेदार के हवाले से किताब में कही है। फोतेदार ने अपनी आत्मकथा में यह लिखा है। इसके अनुसार इंदिरा ने राजीव से कहा था, “तेजी के बेटे अमिताभ को चुनावी राजनीति में मत लाना ओर यदि कभी तुम प्रधानमंत्री बने तो माधवराव को अपनी कैबिनेट में मत रखना।” वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी फोतेदार भी गाँधी परिवार के करीबियों में रहे हैं। 2017 में उनका निधन हुआ था।

वैसे दिलचस्प यह है कि इंदिरा गाँधी की मौत के बाद राजीव ने इनमें से कोई बात नहीं मानी। उन्होंने अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़वाया, जिन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज को हराया भी। माधवराव सिंधिया को भी अपनी कैबिनेट में भी रखा, वह भी रेल जैसे महकमे की जिम्मेदारी के साथ। हालाँकि सिंधिया के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की वजह भी राजीव ही बताए जाते हैं। यह भी संयोग है कि 2018 में मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद जब मुख्यमंत्री चुनने की बारी आई तो राहुल गाँधी ने भी ज्योतिरादित्य को किनारे कर कमलनाथ पर भरोसा जताया।

इस दावे के ज्यादातर किरदार अब इस दुनिया में नहीं हैं। लिहाजा, यह बताना मुश्किल है इनमें कितना दम है। लेकिन यह जगजाहिर है कि गाँधी परिवार के साथ सिंधिया और बच्चन के रिश्ते ‘कभी खुशी, कभी गम’ टाइप ही रहे हैं। अभी हाल ही में एक और पत्रकार संतोष भारतीय की किताब के हवाले से भी मीडिया रिपोर्टों में इस रिश्ते पर रोशनी डाली गई थी। भारतीय ने अपनी किताब ‘वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गाँधी और मैं’ में दावा किया है कि राहुल गाँधी की पढ़ाई के लिए सोनिया ने अमिताभ बच्चन से पैसे का इंतजाम करने को कहा था। उन्होंने इसमें आनाकानी की जो संबंधों में खटास की वजह बनी।

बाराबंकी मस्जिद बवाल में मोहम्मद इश्तियाक़ पर डीएम की NSA कार्रवाई को हाईकोर्ट की मंजूरी, किया था मुस्लिम भीड़ का नेतृत्व

उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट ने गुरुवार (8 जुलाई, 2021) को बाराबंकी अवैध संरचना विध्वंस मामले में आईएएस अधिकारी पर हमला करने के आरोपित के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत मुकदमा चलाने के लिए हरी झंडी दे दी

बता दें कि बाराबंकी प्रशासन द्वारा मस्जिद क्षेत्र में बने एक पुराने अवैध ढाँचे को गिराने के बाद विवाद खड़ा हो गया था। ढाँचा गिराए जाने के दौरान मोहम्मद इश्तियाक नाम के शख्स ने भीड़ के साथ ज्वाइंट मजिस्ट्रेट आईएएस दिव्यांशु पटेल के आवास पर हमला किया था। बाराबंकी के डीएम आदर्श सिंह ने तब हमलावरों के खिलाफ NSA के तहत मामला दर्ज कराया था, जिसे गुरुवार को हाईकोर्ट ने मंजूरी दे दी

इसके अतिरिक्त, एसडीएम ने लोगों को विध्वंस की जगह में प्रवेश करने से रोकने के लिए एक नोटिस जारी किया था। नोटिस के बाद जब कुछ बदमाशों को साइट में प्रवेश करने से रोका गया, तो उन्होंने पथराव किया जिसमें पाँच पुलिस अधिकारी घायल हो गए। इस मामले में 150 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।

‘मस्जिद’ तोड़ने पर उठा विवाद

रिपोर्टों के अनुसार, बाराबंकी प्रशासन को राम सनेही घाट क्षेत्र में ‘तहसील’ परिसर के अंदर बने दो से तीन कमरों वाली संरचना का पता चला। जब आईएएस पटेल ने संरचना के बारे में पूछताछ की और कमरे में रहने वालों से पहचान पत्र माँगा, तो वे सभी भाग गए।

जिसके बाद संरचना को ध्वस्त करने के लिए आदेश जारी किया गया था, हालाँकि, ऑल-इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और उत्तर प्रदेश में प्राथमिक विपक्षी दल समाजवादी पार्टी जैसे मुस्लिम संगठनों ने प्रलाप करना शुरू कर दिया।

आक्रोशित मुस्लिम संगठनों और विपक्ष ने दावा किया कि गिराया गया ढाँचा 100 साल पुरानी मस्जिद है। हालाँकि, अधिकारियों ने कहा कि अदालत के आदेश पर उन्होंने जिस ढाँचे को ध्वस्त किया वह वास्तव में एक अवैध आवासीय ढाँचा था जिसने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया था।

जिला मजिस्ट्रेट आदर्श सिंह ने भी पुष्टि की। प्रशासन की इस कार्रवाई पर डीएम डॉ आदर्श सिंह ने कहा कि तहसील परिसर में उपजिला मजिस्ट्रेट के आवास के सामने अवैध रूप से बने आवासीय परिसर के संबंध में कोर्ट ने संबंधित पक्षकारों को 15 मार्च 2021 को नोटिस भेजकर स्वामित्व के संबंध में सुनवाई का मौका दिया था। लेकिन नोटिस तामील होते ही परिसर में निवास कर रहे लोग परिसर छोड़कर फरार हो गए, जिसके बाद सुरक्षा की दृष्टि से 18 मार्च 2021 को तहसील प्रशासन द्वारा इस पर अपना कब्जा प्राप्त कर लिया गया।

फेक न्यूज चलाने के लिए ‘द वायर’ के खिलाफ FIR

मुस्लिम संगठनों और विपक्ष के अलावा, मीडिया पोर्टल ‘The Wire‘ ने भी इस दावे को आगे बढ़ाया कि ध्वस्त संरचना वास्तव में मस्जिद थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने बाराबंकी अवैध मस्जिद विध्वंस मामले के संबंध में एक वीडियो के माध्यम से गलत सूचना का प्रचार करके समाज में वैमनस्य फैलाने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल- द वायर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की

अपने डॉक्यूमेंट्री में, द वायर ने कहा था कि इलाके के मुस्लिमों ने मस्जिद के विध्वंस का विरोध किया था और कहा था कि पुलिस अधिकारियों ने लाठीचार्ज का सहारा लेकर इसे शांत कराया था। द वायर ने दावा किया था कि बाराबंकी पुलिस ने विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया और उनके धार्मिक ग्रंथों को नाले में फेंक दिया।

वामपंथी पोर्टल द्वारा लगाए गए ऐसे आरोपों का खंडन करते हुए बाराबंकी पुलिस ने स्पष्ट किया कि द वायर द्वारा किए गए दावे झूठे थे। इसमें आगे कहा गया कि द वायर अपनी वेबसाइट पर अवैध मस्जिद के विध्वंस के बारे में गलत सूचना का प्रचार करके सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहा था। द वायर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153, 153-ए, 505 (1) (बी), 120 बी (आपराधिक साजिश) और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया।

घर में एक अध्यक्ष नहीं खोज पा रही कॉन्ग्रेस, विदेश में पौने दर्जन अध्यक्ष एक साथ नियुक्त: इटली में भी सौपीं कमान

कॉन्ग्रेस पार्टी की अंतरराष्ट्रीय शाखा इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस (IOC) ने नौ यूरोपीय देशों के लिए अपने अध्यक्ष चुने हैं। आईओसी के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने इटली, स्विट्जरलैंड, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, हॉलैंड, पोलैंड, फिनलैंड और नॉर्वे के लिए अध्यक्षों के नाम और नियुक्ति की घोषणा करते हुए बताया कि ये अध्यक्ष इन देशों में आईओसी की नीतियों और योजनाओं के विस्तार के लिए काम करेंगे। वे अपने-अपने देशों में योग्य, समर्पित और चिन्तनशील लोगों की पहचान करेंगे ताकि आईओसी की नीतियों को आगे बढ़ाया जा सके।

इसके साथ ही अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी ने देशों में एक कोर कमेटी नियुक्ति भी की है जिसमें संरक्षक, उपाध्यक्ष और महासचिव हैं। इन नियुक्तियों में एक दिलचस्प बात यह है कि नियुक्त किए गए अधिकतर पदाधिकारी पंजाबी मूल के हैं। ऐसा शायद आगामी पंजाब चुनावों को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

भारतीय मूल की कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी अंतरराष्ट्रीय शाखा के जरिए यूरोपीय देशों में कौन सी नीतियाँ लागू करना चाहती है या कैसे विस्तार करना चाहती है, यह जानना दिलचस्प रहेगा, पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। दिसंबर 2019 में इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने तुर्की के इस्तांबुल शहर में आईओसी का एक कार्यालय तब खोला था, जब तुर्की और भारत के संबंध अच्छे नहीं थे और तमाम विशेषज्ञों के अनुसार तुर्की से किसी न किसी रूप में भारत विरोधी गतिविधियों को शह दिया जा रहा था। इसके अलावा तब तुर्की और पाकिस्तान की नज़दीकियाँ पूरी दुनिया के सामने थी। तुर्की में कार्यालय खोलने के पीछे कौन से तर्क या कारण हैं, उसे लेकर केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है पर यह प्रश्न बार-बार खड़ा होगा कि तुर्की जैसे देश में भारत की एक राष्ट्रीय पार्टी के लिए कार्यालय खोलना आवश्यक क्यों है?

यह विडंबना ही है कि कॉन्ग्रेस पार्टी देश में लम्बे समय तक शासन करने के बाद पिछले दो दशकों में अपनी नीतियों की वजह से सिकुड़ती रही है। ऐसे में भारत में अपनी खोई ताकत वापस पाने के लिए प्रयास न करके यदि उसका ध्यान दुनिया के अन्य देशों में किसी न किसी रूप में अपने विस्तार पर लगा हुआ है तो इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? आखिर इन देशों में कॉन्ग्रेस अपना विस्तार क्यों करना चाहती है?

इसका उत्तर तो शायद पार्टी चलाने वाले ही दे सकें। पर यह विमर्श अवश्य होना चाहिए कि इन देशों में अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति के पीछे पार्टी की राजनीतिक मंशा क्या है? चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कॉन्ग्रेस पार्टी के बीच वर्ष 2008 में किए गए एक समझौते की खबर गत वर्ष सामने आई थी जिसको लेकर पार्टी ने कभी कोई संतोषजनक उत्तर देने का प्रयास भी नहीं किया और उस मामले में भी अभी तक केवल अनुमान ही लगाए जाते रहे हैं। साथ ही यह आश्चर्य का ही विषय है कि अलोकतांत्रिक देश चीन में शासन करने वाली चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और कॉन्ग्रेस के बीच सहयोग के ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जिन पर दोनों दल न केवल मिलकर काम कर सकते हैं, बल्कि उन्हें एक लिखित समझौते में रख भी सकते हैं?

कॉन्ग्रेस पार्टी की राजनीति में विदेशी प्रभाव दशकों पुरानी संस्कृति का हिस्सा रहा है। वैसे तो पार्टी के संस्थापक भी एक विदेशी ही थे, पर इस बात से कोई इनकार नहीं किया जा सकता कि विदेशी संस्थापक द्वारा शुरू की गई पार्टी पिछले सवा सौ वर्षों से इस मामले में अपने मूल रास्ते पर दिखाई देती रही है। शायद पार्टी की इसी संस्कृति की महिमा का बखान करते हुए राहुल गाँधी ने प्रवासी भारतीयों के साथ अपनी एक मीटिंग में बताया था कि कॉन्ग्रेस हमेशा से एनआरआई की पार्टी रही है और गाँधी, नेहरू और अम्बेडकर, ये सभी एनआरआई थे। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने महात्मा गाँधी का उदाहरण देते हुए कहा था कि कैसे महात्मा गाँधी विदेश से आए थे ताकि कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ काम कर सकें। संयोग से राहुल गाँधी के साथ प्रवासी भारतीयों की इस मीटिंग के सूत्रधार पित्रोदा ही थे।

कारण चाहे जो हो पर एक राष्ट्रीय स्तर की सवा सौ वर्षो से भी अधिक पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि वह भारत में अपने लिए एक अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं कर पा रही पर यूरोप के नौ देशों में एक साथ अध्यक्ष नियुक्त कर ले रही है। देखा जाए तो राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति की बात अब सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा भी नहीं रही है और पार्टी भी इस विषय पर आधिकारिक बयान देने से कतराने लगी है।

इस विषय पर आए दिन केवल जनता द्वारा अनुमान ही लगाए जाते हैं। पार्टी की तरफ से ऐसा किस रणनीति या राजनीतिक दर्शन के तहत किया जा रहा है, इस पर पार्टी के भीतर प्रश्न उठना शायद मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव सा जान पड़ता है। इस विषय पर होने वाली चर्चा अक्सर पार्टी के बाहर ही होती रही है। अगले वर्ष होनेवाले विधानसभा चुनावों को लेकर जब राजनीतिक सरगर्मियाँ बढ़ेंगी तब शायद इस विषय में चर्चा एक बार फिर से सामने आए। फिलहाल तो यही प्रतीत होता है कि निकट भविष्य में पार्टी के भीतर राजनीतिक हलचलें इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस तक ही सीमित रहेंगी।