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कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए दुबई जा रहे भारत के कई रईस, ₹55 लाख तक कर रहे हैं खर्च: भारत में है FREE

भारत में अब तक 12.71 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाई जा चुकी है। खास बात ये है कि इसके लिए जनता को एक रुपया भी नहीं देना पड़ा है और इसका पूरा खर्च मोदी सरकार ही वहन कर रही है। लेकिन, क्या आपको पता है कि भारत के कुछ ऐसे रईस भी हैं जो कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए दुबई जा रहे हैं और इसके लिए 55 लाख रुपए तक खर्च कर रहे हैं। इसके लिए वो चार्टर्ड फ्लाइट्स तक बुक करा रहे हैं।

UAE में एस्ट्राजेनेका, साइनोफार्म और फाइजर जैसे वैक्सीन उपलब्ध हैं, लेकिन लोग फाइजर को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। UAE में 40 वर्ष की उम्र से ज्यादा के लोगों को मुफ्त में वैक्सीन लगाई जा रही है, जबकि भारत में 1 मई से 18 वर्ष से ऊपर के सभी लोग भी इसके लिए योग्य होंगे। भारत के कुछ अमीर लोगों के पास दुबई का रेजिडेंट वीजा है और वो इसका फायदा उठा रहे हैं। अप्रैल में ये सिलसिला काफी बढ़ा।

इसका कारण ये है कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर आई और स्थिति काफी बिगड़ने लगी। मार्च में दुबई में रेजिडेंट वीजाधारकों को वैक्सीन लगाने की अनुमति दी गई, जिसके बाद से ही लोगों का वहाँ जाना शुरू हो गया। दुबई में वैक्सीन लगा चुके कुछ लोगों और चार्टर ऑपरेटर्स का कहना है कि कुछ लोग वैक्सीन की दो डोज लगाने के लिए दुबई में ही रह रहे हैं जबकि कुछ लोग वहाँ के दो चक्कर लगा रहे हैं।

दोनों ही स्थितियों में काफी रुपए खर्च हो रहे हैं। फाइजर की वैक्सीन के दो डोज़ों के लिए 3 सप्ताह का अंतराल रखा गया है। ऑपरेटर की प्राइस, सिटी ऑफ ओरिजिन, दुबई में रहने की अवधि और नंबर ऑफ पैसेंजर्स पर निर्भर दुबई आने-जाने का खर्च 55 लाख या इससे ऊपर भी हो सकता है। जिन भारतीयों ने दुबई में कारोबार रजिस्टर करा रखा है, उन्हें वहाँ रेजिडेंट वीजा मिला है। ET की खबर के अनुसार, एक कारोबारी अपनी पत्नी सहित 20 दिन के लिए दुबई में रहे, ताकि वैक्सीन लगवा सकें।

दिल्ली-महाराष्ट्र में लॉकडाउन: राहुल गाँधी ने एक बार फिर राज्यों की नाकामी के लिए मोदी सरकार को ठहराया जिम्मेदार

देश भर में कोविड-19 के मामले एक बार फिर तेजी से बढ़ रहे हैं। कोरोनो वायरस प्रकोप की दूसरी लहर से सबसे अधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र और दिल्ली हैं। कोरोना की बेकाबू रफ्तार पर काबू पाने के लिए महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की है।

यहाँ अचानक लॉकडाउन लगने से अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया है। इसकी वजह से प्रवासी मजदूर परेशान हो रहे हैं। उनकी भीड़ रेलवे और बस स्टैंड पर देखी जा सकती है। यही स्थिति पिछले साल भी देखने को मिली जब यहाँ एकाएक लॉकडाउन की घोषणा की गई थी। उस दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने पलायन किया था, जिससे काफी लोग कोरोना संक्रमित हुए थे।

दिल्ली से प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी है, इसके बावजूद केजरीवाल सरकार इस मुद्दे पर अडिग है। इसी तरह, महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी सरकार ने इन प्रवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

जहाँ एक ओर दिल्ली में केजरीवाल और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार ने बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में आकर लॉकडाउन की घोषणा कर प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वहीं दूसरी ओर ठाकरे के सहयोगी और कॉन्ग्रेस सुप्रीमो राहुल गाँधी ने मोदी सरकार से प्रवासी मजदूरों के बैंक खातों में रुपए डालने को कहा है।

प्रवासी मजदूरों के पलायन पर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा, “प्रवासी एक बार फिर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि उनके बैंक खातों में रुपए डाले। लेकिन कोरोना फैलाने के लिए जनता को दोष देने वाली सरकार क्या ऐसा जन सहायक कदम उठाएगी?”

दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार द्वारा अचानक लॉकडाउन लगाने के फैसले के बाद गाँधी के इस ट्वीट ने प्रवासी श्रमिकों को बेहद निराश किया है, इसके चलते वे और इन राज्यों को छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

हालाँकि, यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने यहाँ काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की जरूरतों का ध्यान रखें। इससे पहले भी राहुल गाँधी ने 2020 में महामारी की पहली लहर के दौरान प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे इनकी मदद करने को कहा था। उन्होंने मोदी सरकार पर बिना सोचे समझे लॉकडाउन लगाने का आरोप लगाया था।

बेहद हैरानी तो तब हुई जब दिल्ली सरकार द्वारा मनमाने तरीके से लगाए गए लॉकडाउन को लेकर गाँधी ने इस तरह की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी। इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है कि महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी सरकार, जिसका वह एक अभिन्न हिस्सा हैं, उस पर भी वे कुछ नहीं बोले।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में कोरोना की दूसरी लहर से पैदा हुए संकट का फायदा उठाकर कमाई करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों ने महाराष्ट्र पुलिस पर वसूली का आरोप लगाया है। राज्य में 15 दिनों का कर्फ्यू लगाए जाने के कारण मजदूर अपने घरों को लौटने के लिए मजबूर हैं।

एक टैक्सी ड्राइवर ने बताया, “कर्फ्यू लगने के बाद आजीविका की समस्या उत्पन्न हो गई है। हम अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। पिछले साल भी हम लॉकडाउन के दौरान अपने घरों को लौट गए थे। लेकिन स्थिति सुधरने के बाद हम फिर से वापस आ गए। पिछले साल की तरह इस साल भी पुलिस हमसे जबरन वसूली कर रही है।”  

इसी तरह महाराष्ट्र से वापस लौट रहे एक प्रवासी मजदूर सनाउल्लाह खान ने बताया,  “हम पुणे से आ रहे हैं। एक बस ने हमसे 2500-3000 रुपए लिए। महाराष्ट्र बॉर्डर पर हमें बस से उतारकर दो गाड़ियों में बैठने को कहा गया। बॉर्डर चेक प्वाइंट पर पुलिस और परिवहन विभाग के लोगों ने भी हमें अनदेखा कर दिया।”

वहीं, आम आदमी पार्टी (AAP) की पोल आम लोगों की नजर में सोमवार (19 अप्रैल 2021) की शाम होते-होते खुल गई। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन का ऐलान करते हुए कहा था कि वे हाथ जोड़कर प्रवासी मजदूरों से विनती करते हैं कि ये एक छोटा सा लॉकडाउन है, जो मात्र 6 दिन ही चलेगा, इसलिए वे दिल्ली को छोड़ कर कहीं और न जाएँ।

लेकिन उनके इस ऐलान के साथ ही पहले दिल्ली के ठेकों पर भीड़ उमड़ी और फिर उसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से घर लौटने की मजदूरों के बीच होड़ शुरू हो गई। ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला था।

‘मजदूरों की 2020 जैसी न हो दुर्दशा’: हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को चेताया, CM केजरीवाल की पत्नी को कोरोना

दिल्ली हाई कोर्ट ने माना है कि 2020 के लॉकडाउन के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार प्रवासी और दिहाड़ी मजदूरों की मदद करने में नाकाम रही थी। इस बार लॉकडाउन में इनकी पिछले साल जैसी दुर्दशा न हो यह सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिल्ली सरकार को दिया है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पत्नी सुनीता के कोरोना संक्रमित होने के बाद खुद को क्वारंटाइन कर लिया है।

सुनीता केजरीवाल ने कोरोना के लक्षण दिखने के बाद जाँच कराई थी। रिपोर्ट में वह पॉजिटिव पाई गईं हैं। इसके बाद उन्होंने खुद को होम आइसोलेट कर लिया है। दिल्ली में बढ़ते संक्रमण को देखते हुए केजरीवाल ने 19 अप्रैल की रात से 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन की घोषणा की थी। इसके बाद प्रवासी मजदूरों के बीच अपने घर लौटने की पिछले साल की तरह ही होड़ देखने को मिली।

दिल्ली से प्रवासी श्रमिकों के बड़े पैमाने पर जारी पलायन को लेकर हाई कोर्ट ने भी केजरीवाल सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। उच्च न्यायालय ने रकार से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि प्रवासी श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों को उन परेशानियों का सामना न करना पड़े, जिससे वह 2020 में लॉकडाउन के दौरान गुजरे थे। 

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली हाई कोर्ट ने राकेश मल्होत्रा बनाम GNCTD और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियाँ की। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 2020 के लॉकडाउन के दौरान प्रवासियों और दिहाड़ी मजदूरों की दुर्दशा की याद दिलाते हुए कहा कि इस साल पिछले साल की तहत प्रवासियों और दिहाड़ी मजदूरों की दुर्दशा न हो इसके लिए राज्य सरकार को पर्याप्त कदम उठाना चाहिए।

जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की खंडपीठ ने कहा, “साल 2020 में लगाए गए लॉकडाउन से एक बात किसी को भी नहीं भूलनी चाहिए कि सबसे ज्यादा दुर्दशा जीएनसीटीडी में निवास करने वाले और काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों का हुआ था। हम समाचार देख रहे हैं। समाचार रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली क्षेत्र में बढ़ते COVID-19 के मामलों के कारण प्रवासी श्रमिक पहले ही अपने घर जाना शुरू कर चुके हैं। राज्य सरकार ने 26.04.2021 तक कर्फ्यू लगाने का आदेश दिया है। इससे दिहाड़ी मजदूर जो रोज की कमाई से अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं उनकी जिंदगी फिर से तबाह होती नजर आ रही है। एक बार फिर भोजन, कपड़े और दवाई जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।”

पीठ ने कहा कि पिछले साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान लोगों की मदद के लिए सिविल सोसायटी आगे आई थी और उनके द्वारा जरूरतमंद लोगों को भोजन और अन्य आवश्यकता की चीजें उपलब्ध कराया गया था। दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए एडवोकेट राहुल मेहरा ने कहा कि राज्य ने इस संबंध में पर्याप्त कदम उठाए हैं। इस पर पीठ ने कहा कि हम अपने अनुभव से यह कह सकते हैं कि राज्य पर्याप्त कदम उठाने में विफल रहा है। 

कोर्ट ने कहा कि गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्‍ली (जीएनसीटीडी) हजारों करोड़ रुपए का उपयोग करने में विफल रहा है जो वे भवन एवं अन्य संनिर्माण श्रमिक (रोजगार एवं सेवा शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1996 के तहत गठित बोर्ड के पास उपलब्ध है। इसे निर्माण श्रमिकों के लिए भवन सेस के रूप में इकट्ठा किया गया है।

कोर्ट ने आदेश दिया, “हम गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली (जीएनसीटीडी) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं कि उक्त बोर्ड अपने संबंधित कार्य स्थलों पर जरूरतमंद निर्माण श्रमिकों को भोजन, दवाइयाँ और अन्य आवश्यकता की चीजें उपलब्ध कराएँ। कॉन्ट्रैक्टर के माध्यम से सरकारी और एमसीडी स्कूलों में स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराना चाहिए। दिल्ली के मुख्य सचिव को बिना किसी देरी के इस आदेश को लागू करना होगा। इसके साथ ही जीएनसीटीडी को एक हलफनामा दायर करना होगा, जिसमें यह बताना होगा कि दिए गए आदेश को किस तरह से क्रियान्वित किया जा रहा है।”

कोर्ट ने यह आदेश राकेश मल्होत्रा बनाम गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्‍ली (जीएनसीटीडी) और अन्य मामले में पारित किया है। कोर्ट के समक्ष जनवरी में एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में COVID-19 महामारी को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने की माँग की गई थी। हालाँकि COVID-19 की दूसरी लहर पर ध्यान देते हुए पीठ ने मामले पर वापस ध्यान दिया।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लॉकडाउन का ऐलान के साथ ही पहले दिल्ली के ठेकों पर भीड़ उमड़ी और फिर उसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से घर लौटने की मजदूरों के बीच होड़ शुरू हो गई। ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला था।

कोरोना संक्रमित हुए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी, कुछ ही देर पहले लगाया था वैक्सीन को लेकर भेदभाव का आरोप

कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए हैं। 50 वर्षीय कॉन्ग्रेस नेता ने खुद ट्वीट कर के ये जानकारी दी। उन्होंने लिखा, “हल्का लक्षण आने के बाद मैंने टेस्ट कराया, जिसमें पता चला कि मैं कोरोना पॉजिटिव हूँ। हाल के दिनों में जो भी लोग मेरे संपर्क में थे, उन सभी से मेरा आग्रह है कि वो सतर्कता के नियमों का पालन करें और सुरक्षित रहें।” कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने उनके जल्द ठीक होने की प्रार्थना की।

राहुल गाँधी से पहले पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी कोरोना पॉजिटिव हुए थे, जिनकी सलामती के लिए पीएम नरेंद्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं ने प्रार्थना की है। इससे पहले राहुल गाँधी ने आरोप लगाया था कि 18-45 आयु वर्ग के लोगों को सरकार मुफ्त में वैक्सीन नहीं देगी और सारे वैक्सीन दलालों ने खरीद लिए हैं। उन्होंने भारत सरकार पर कोरोना के टीके को लेकर भेदभाव का आरोप लगाया था।

कोविड फैसिलिटी, भोजन, दान: देशभर में कोरोना की दूसरी लहर के बीच एक बार फिर मदद को आगे आए मंदिर

देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर के साथ संघर्ष कर रहा है। इस बीच देश भर के कई मंदिर इस लड़ाई को लड़ने में सहयोग करने के लिए आगे आए हैं। गुजरात में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच वडोदरा के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर ने यग्नपुरुष सभागुरु को कोविड-19 फैसिलिटी में बदल दिया। 

कोविड-19 केयर सेंटर में 500 बेड, ऑक्सीजन सुविधाओं जैसे तरल ऑक्सीजन टैंक और पाइप्ड ऑक्सीजन लाइन, आईसीयू बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध है। यह सुविधा 13 अप्रैल से शुरू हुई है और अब तक इसमें 45 कोविड-19 मरीजों को आगे के इलाज के लिए भर्ती कराया गया है।

BAPS वडोदरा में कोविद -19 फैसिलिटी (साभार: Desh Gujarat on Twitter)

श्री स्वामीनारायण मंदिर के ज्ञान वत्सल स्वामी ने बताया, “हम रोगियों के लिए सभी गैर-चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान कर रहे हैं। हमने ऑक्सीजन और वेंटिलेटर की व्यवस्था की है जिसमें ICU कमरों के अलावा पंखे और एयर-कूलर भी शामिल हैं। वर्तमान में, 300 बेड चालू हैं और 200 जल्द ही जोड़े जाएँगे।”

TV9 गुजराती की नवनिर्मित कोविड केयर फैसिलिटी का कवरेज

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर

पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने अपने नीलाचल भक्त निवास को कोविड -19 केयर सेंटर में परिवर्तित करने का निर्णय लिया है। 120 बिस्तरों वाली यह सुविधा कोरोना वायरस से संक्रमित मंदिर से जुड़े अधिकारियों के लिए एक समर्पित केंद्र के रूप में भी काम करेगी।

इसके अलावा, इस लड़ाई में सरकार की सहायता के लिए मंदिर ने मुख्यमंत्री राहत कोष में 1.51 करोड़ रुपए का दान दिया था। मंदिर के पंजीकरण के पत्र में कहा गया, “श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी की प्रबंध समिति के निर्णय के अनुसार, मंदिर प्रशासन की ओर से COVID-19 के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹15,51.00.000 / – (एक करोड़ इक्यावन लाख) की राशि का योगदान दिया है।” जगन्नाथ मंदिर के अलावा उड़ीसा के 62 अन्य छोटे मंदिरों ने मुख्यमंत्री राहत कोष में योगदान दिया है।

पवन धाम अपनी 4 मंजिला इमारत को कोविड सेंटर में बदला

मुंबई के कांदिवली के पवन धाम मंदिर ने एक बार फिर अपनी चार मंजिला इमारत को 100 बेड से सुसज्जित कोविड -19 क्वारंटाइन सेंटर में बदल दिया है। 100 में से, 50 बेड एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर यूनिट, ऑक्सीमीटर, पल्स मीटर, पोर्टेबल बीपी उपकरण, मॉनिटर मशीन से लैस हैं। इसके अतिरिक्त, 10 डॉक्टरों सहित 50 से अधिक चिकित्सा कर्मचारी सुविधा में तैनात हैं।

पवन धाम में निर्मित कोविद -19 फैसिलिटी का इंडिया टीवी का कवरेज

मंदिर के एक प्रबंध समिति के सदस्य संतोष सिंह कहते हैं, “हमने अब तक 50 बिस्तर तैयार किए हैं, हमने डॉक्टरों, चिकित्सा कर्मचारियों की तरह स्वास्थ्य सेवा के लिए एपेक्स अस्पताल के साथ करार किया है। हम ऑक्सीजन के सप्लाई की प्रतीक्षा करते हैं, उससे पहले हम शुरू नहीं कर सकते हैं। कुछ सप्लायर ने आश्वासन दिया गया है, लेकिन देखते हैं कि क्या होता है।” मंदिर को पिछले साल भी एक कोविड सेंटर में परिवर्तित किया गया था, जिसमें 2000 से अधिक मरीजों का इलाज किया गया था।

अन्य मंदिर

हिंदुओं के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर में कोविड-10 मरीजों को खाना खिलाया गया था।

गुजरात के बोटाद जिले में प्रसिद्ध सारंगपुर हनुमान मंदिर ने पिछले साल कोरोना वायरस मरीजों के लिए अपनी धर्मशाला को 100 बिस्तरों वाले अस्पताल में बदल दिया था।

पिछले साल भी, जब महामारी की पहली लहर ने देश को हिला दिया था, कई हिंदू मंदिरों ने दान में करोड़ों रुपए खर्च किए थे, जरूरतमंदों के लिए भोजन और आश्रय प्रदान किया था और संकट के समय राष्ट्र का समर्थन करने के लिए खड़े हुए थे।

खलीफा बनने की चाल में फँस गए इमरान खान, TLP के सामने घुटने टेके: फ्रांस के राजदूत को निकालने पर संसद में होगी वोटिंग

पाकिस्तान में तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) के उदय के साथ ही स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है। अब वहाँ की सरकार मंगलवार (अप्रैल 20, 2021) को संसद में वोट करा कर इस बात का निर्णय लेगी कि मुल्क से फ्रांस के राजदूत को निकाला जाए या नहीं। फ्रांस के एम्बेसडर को निकाल बाहर करने के लिए कई दिनों से इस्लामी कट्टरवादियों का प्रदर्शन जारी है। ये TLP की 4 माँगों में से एक है।

पाकिस्तान की सरकार ने इस समूह के साथ सोमवार से बातचीत भी शुरू कर दी है। वहाँ के इंटीरियर मिनिस्टर शेख रशीद अहमद ने कहा कि लंबी बातचीत के बाद संसद में प्रस्ताव रखने पर सहमति बनी। इससे पहले इमरान खान को उम्मीद थी कि पैगम्बर मुहम्मद के कार्टून का मुद्दा उठा कर वो मुल्क में अपने विरोधियों को शांत कर देंगे और दुनिया भर में इस्लाम के पैरोकार कहलाएँगे, लेकिन दाँव उलटा पड़ गया।

पिछले एक सप्ताह से पाकिस्तान में दंगे हो रहे हैं। पुलिस अधिकारियों की हत्या हो रही है। उन्हें बंधक बनाया जा रहा है। फ्रांस ने अपने नागरिकों से पाकिस्तान तत्काल छोड़ देने और वहाँ की यात्रा न करने को कहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने शार्ली हेब्दो के कार्टून का बचाव किया था, जिसका जवाब देकर पाक पीएम ने मसीहा बनने की कोशिश की थी। अब वो खुद के मुल्क में कानून-व्यवस्था संभालने में नाकामयाब रहे हैं।

इमरान खान ने पश्चिमी जगत की आलोचना करते हुए UN के अपने सम्बोधन में पैगंबर मुहम्मद के कार्टून का मुद्दा उठाया था। लेकिन, TLP इस मामले में कूद पड़ा और पैगम्बर मुहम्मद की सेवा करने का दावा करने वाली इस कट्टरवादी इस्लामी संस्था ने फ्रांस से सारे रिश्ते तोड़ने की माँग रख दी। सुरक्षा विशेषज्ञ अमीर राना ने कहा कि इन कट्टरवादी ताकतों को बढ़ावा देने का मतलब है कि उनकी माँगें नियंत्रण से बाहर होती चली जाएँगी शायद इमरान को अब ये समझ आ गया होगा।

अभी तक वो संतुलन बिठाने में असफल रहे हैं। पाकिस्तान का कोई भी नेता, तानाशाह या फिर सैन्य अधिकारी इस्लाम या पैगम्बर मुहम्मद के मुद्दे पर विरोध में कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकता, कम से कम खुले में। इमरान खान ने पाकिस्तानी समाज की ही कट्टरवादी विचारधारा को आगे बढ़ाया था। लेकिन, फ्रांस के बॉयकॉट ने हिंसा का रूप ले लिया। आपको याद होगा जब सितंबर 2020 में एक पाकिस्तानी ने शार्ली हेब्दो के पेरिस स्थित पूर्व दफ्तर के सामने दो लोगों की हत्या कर दी थी।

इसके कुछ ही दिन पहले इमरान ने UN में इस्लामोफोबिया का मुद्दा उठाया था। बाद में पता चला कि वो आतंकी TLP के नेता खादिम रिजवी से प्रेरित है, जो मर चुका है। नवंबर 2020 में इस समूह ने राजधानी इस्लामाबाद की सड़कों पर जम कर हिंसा की। TLP के साद रिजवी ने सरकार पर वादे से मुकरने का आरोप लगा कर फिर से रैली बुलाई। जब उसकी गिरफ़्तारी हुई और TLP को आतंकी संगठन घोषित कर प्रतिबंधित किया गया, लोग उसके समर्थन में आ गए।

पैगम्बर मुहम्मद और इस्लाम की बातें करने वाले इमरान खान अब कह रहे हैं कि कानून-व्यवस्था से ऊपर कोई नहीं है। मुल्क की मजहबी संगठनों ने TLP को समर्थन दे दिया है। अब इस समूह के खिलाफ इमरान जितनी कार्रवाई करेंगे, उनका ‘इस्लाम का नया खलीफा’ बनने का सपना उतना ही टूटता जाएगा। पाकिस्तान के सम्बन्ध यूरोप सहित अन्य देशों से खराब हो ही रहे हैं, साथ ही देश में भी सिविल वार सा छिड़ गया है।

इमरान खान ने मुल्क की जनता को सम्बोधित करते हुए कहा है कि TLP और पाकिस्तान की सरकार का लक्ष्य एक है, लेकिन तरीके अलग हैं। उन्होंने कहा कि 100 सड़कें जाम करने के कारण कोरोना के मरीजों तक ऑक्सीजन सिलिंडर्स नहीं पहुँच सके, जिससे कइयों की मौत हुई। उन्होंने कहा कि 4 लाख ट्वीट्स में से 70% फेक निकले हैं, जो पाकिस्तान के ‘विदेशी दुश्मनों’ की साजिश है। अपने सैन्य अधिकारियों का नाम लेने से डरने वाले इमरान ने भारत पर दोष मढ़ दिया।

इससे पहले उनके मंत्री कह रहे थे कि TLP को मिटा दिया जाएगा और उसके साथ कोई बातचीत नहीं हो रही, लेकिन अब उसके दबाव में संसद में प्रस्ताव तक लाया जा रहा। सवाल ये है कि 2-3 साल पहले राजनीति में आई TLP इतनी प्रभावशाली कैसे हो गई कि उसने पूरे मुल्क में तबाही फैलाई और पुलिसकर्मियों का अपहरण कर लिए। क्या बरेलवी समुदाय के इस संगठन के उभार के पीछे रावलपिंडी है? लाहौर में 24 घंटों से जो स्थिति है, उससे लगता है कि पुलिस के बदले अब वहाँ पाक सरकार को पैरा-मिलिट्री लगानी पड़ेगी।

‘पूर्ण लॉकडाउन हल नहीं, जान के साथ आजीविका बचाने की भी जरुरत’: SC ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक

उत्तर प्रदेश के 5 जिलों में कोरोना के मद्देनजर लॉकडाउन लगाने वाले इलाहाबाद कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने आज (अप्रैल 20, 2021) रोक लगा दी। इस मामले में योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए अपनी अपील में कहा था कि हाईकोर्ट को ऐसे फैसले लेने का अधिकार नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से इस केस को सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस ए बोबड़े के समक्ष पेश किया। उन्होंने कहा कि हमने कोरोना कंट्रोल करने के लिए कई कदम उठाए हैं, अभी कुछ और कदम उठाने हैं, लेकिन लॉकडाउन इसका हल नहीं है। लोगों की जान बचाने के साथ गरीबों की आजीविका को भी बचाना है। इसलिए शहरों में पूर्ण लॉकडाउन नहीं हो।

इलाहाबाद कोर्ट ने दिए थे लॉकडाउन के निर्देश

बता दें कि इलाहाबाद कोर्ट ने 19 अप्रैल को यूपी के पाँच शहरों- प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर नगर, और गोरखपुर में 26 अप्रैल तक कड़े प्रतिबंधों के साथ लॉकडाउन लगाने की निर्देश दिए थे। 

इस दौरान हाई कोर्ट की जस्टिस अजीत कुमार और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ कोरोना के बढ़े मामलों से खुश नहीं थे। अदालत ने कहा था कि राज्य के मुख्यमंत्री आईसोलेशन में हैं और यह राज्य के लिए कठिन समय है।

अपने आदेश में [PDF], अदालत ने कहा, “हम सरकारी अस्पतालों के हाल देख रहे हैं कि वहाँ आईसीयू में मरीजों को वीआईपी लोगों की सिफारिश पर लिया जा रहा है। यहाँ तक ​​की जीवनरक्षक एंटीवायरल दवा रेमेडिसिविर भी वीआईपी की सिफारिश पर ही दी जाती है। राज्य के मुख्यमंत्री लखनऊ में आईसोलेशन में हैं। ”

अदालत ने आगे ये भी कहा कि चिकित्सा के बुनियादी ढाँचे में विकास की कमी स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं, और लोग सही दवा के इंतजार में मर रहे हैं। 

अपने आदेश में कोर्ट की तरफ से यूपी के मुख्य सचिव को खुद निगरानी करने के लिए निर्देश दिए थे, जिसे आज रात से लागू करना था। इस दौरान इन शहरों में जरूरी सेवाओं वाली दुकानों को छोड़कर कोई भी दुकान, होटल, ऑफिस और सार्वजनिक स्थल नहीं खुलने की बात कही गई थी। हालाँकि यूपी सरकार ने फैसले को मानने से मना कर दिया और सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

‘सुअर के बच्चे BJP, सुअर के बच्चे CISF’: TMC नेता फिरहाद हाकिम ने समर्थकों को हिंसा के लिए उकसाया, Video वायरल

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता फिरहाद हाकिम का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल है। इसमें वह बीजेपी (BJP) और केंद्रीय सुरक्षा बल CISF को ‘सुअर’ बता रहे हैं। यह वीडियो कब का है यह स्पष्ट नहीं है। हाकिम कोलकाता के पूर्व मेयर और ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री हैं। 

इस वीडियो को बीजेपी के प्रवक्ता तजिंदर सिंह बग्गा ने भी ट्विटर पर शेयर किया है। इसमें एक रोड शो को संबोधित करते हुए हाकिम को कहते हुए सुना जा सकता है, “भाजपा सुअर का बच्चा है।” आगे धमकी देते हुए कहते हैं, “यदि बीजेपी, सुअर का बच्चा आता है तो पहले उनको मारो। आगे कहते हैं, “कहाँ जाएँगे? उनको पीटो। सुअर के बच्चों को मारो।”

बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाने के बाद टीएमसी समर्थक हाकिम को बताते हैं कि जब भाजपा के लोग उनके इलाके में आए तो उन्होंने खदेड़ दिया। इसके बाद टीएमसी मंत्री को कहते हुए सुना जा सकता है, “वे सीआईएसएफ, रेल पुलिस को लेकर आए। एक बार चुनाव खत्म होने दो तब हमारी सीआईडी ‘सुअर के बच्चे’ सीआईएसएफ पर कार्रवाई करेगी।”

बता दें कि ये पहली बार नहीं है जब फिरहाद इस प्रकार के कारणों से चर्चा में आए हों। इससे पहले हाकिम ने कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाके को ‘मिनी पाकिस्तान’ कह दिया था और इस साल फरवरी में भी उन्हें मस्जिद में एक राजनीतिक भाषण देते सुना गया था, जबकि मॉडल ऑफ कंडक्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था, 

“वोट हासिल करने के लिए जाति या सांप्रदायिक भावनाओं के लिए कोई अपील नहीं होगी। मस्जिदों, चर्चों, मंदिरों या अन्य पूजा स्थलों को चुनाव प्रचार के लिए मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।”

इसके अलावा, हाकिम ने सीएए विरोध में भड़के दंगों के दौरान मुस्लिम दंगाइयों को ‘भाई’ कहकर संबोधित किया था। साथ ही ये भी दावा किया था कि इस प्रकार की हरकत भाजपा को राज्य में लेकर आ सकती है।

आपके शहर में कब और कितना कहर बरपाएगा कोरोना, कब दम तोड़ेगी संक्रमण की दूसरी लहर: जानें सब कुछ

IIT कानपुर के एक प्रोफेसर हैं मणिन्द्र अग्रवाल, जिन्हें भारत सरकार पद्मश्री से भी नवाज चुकी है। उन्होंने देश के अलग-अलग इलाकों में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के आँकड़ों का अध्ययन करते हुए ग्राफ के माध्यम से बताया है कि किस इलाके में कोरोना का पीक कब आएगा। यानी, संक्रमण की दूसरी लहर कब चरम पर होगी। इसके लिए उन्होंने ग्राफिक्स तकनीक और गणित का सहारा लिया है। लगभग एक दर्जन बड़े पुरस्कारों से सम्मानित अग्रवाल ने अपने अध्ययन के निष्कर्षों को अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया है।

सबसे पहले बात वाराणसी की। मणिन्द्र अग्रवाल के हिसाब से वाराणसी के कर्व अब मुड़ गया है। इस हिसाब से वहाँ कोरोना का पीक टाइम चल रहा है। इसी तरह प्रयागराज में भी कोरोना का पीक आ चुका है।

उत्तर प्रदेश के नोएडा का कर्व एक सप्ताह बाद नीचे आना चालू होगा। इसका अर्थ है कि वहाँ एक हफ्ते बाद कोरोना का उच्चतम स्तर आ सकता है। कानपुर की भी यही स्थिति है। वहाँ भी 1800 मामले के साथ ही कोरोना का पीक एक हफ्ते में बीत जाएगा।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की बात करें तो यहाँ कोरोना के लिए जो प्रोजेक्ट किया गया था, उससे पहले ही पीक आ सकता है। मणिन्द्र ने अपने अध्ययन में यहाँ अप्रैल महीने के अंत में कोरोना की सबसे बड़ी लहर आने का अनुमान लगाया था, लेकिन वहाँ उससे पहले ही पीक आ रहा है। चेन्नई में भी प्रतिदिन 4500 मामलों के साथ अप्रैल के अंत में कोरोना का उच्चतम स्तर आएगा।

झारखंड की राजधानी राँची में अप्रैल 22 तक कोरोना का पीक आने की आशंका है, जिसके बाद मामले घटने लगेंगे। यहाँ प्रतिदिन 1200 कोरोना केसेज के साथ संक्रमण का उच्चतम स्तर आएगा। छत्तीसगढ़ के कोरबा में अप्रैल के अंतिम हफ्ते में कोरोना का पीक आएगा।

वहीं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लोग अभी कोरोना की उच्चतम लहर का सामना कर रहे हैं और इसके बाद उन्हें राहत मिलने की उम्मीद है। इसी तरह नागपुर का पीक भी बीत चुका है और वहाँ कोरोना के मामले घटने की संभावना है।

IIT कानपुर के प्रोफेसर के अध्ययन की मानें तो बिहार की राजधानी पटना में भी अप्रैल 23 तक कोरोना का पीक आने की आशंका है। वहाँ अभी भी कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ठाणे में अप्रैल 16 को कोरोना का पीक आने की आशंका थी, लेकिन इससे पहले ही वहाँ कोरोना के मामले घटने शुरू हो गए हैं।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में स्थिति भयावह है और कोरोना के मामले अभी बढ़ते रहेंगे। वहाँ आधा मई बीत जाने के बाद ही राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं कोरोना से बेहाल महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में अप्रैल 30 के बाद राहत मिलनी चालू हो जाएगी, क्योंकि केस घटने लगेंगे। मुंबई का कर्व फ़्लैट होना चालू हो गया है।

इस अध्ययन के हिसाब से पुणे में अप्रैल मध्य का महीना बीत जाने के साथ ही कोरोना का पीक आना था, जिसके बाद ग्राफ फ़्लैट होता। लेकिन, वहाँ ग्राफ पहले से ही अनिश्चित ऊपर-नीचे हो रहा है। इस तरह पूरे भारत की बात करें तो अप्रैल महीना ख़त्म होने से लेकर मई मध्य तक ग्राफ फ़्लैट होने लगेगा। साथ ही कोरोना का प्रकोप भी कम होने लगेगा। ध्यान रखिए, ये अध्ययन कम्प्यूटर आधारित मॉडल पर लगाया गया एक अनुमान है।

ये अध्ययन करने वाले प्रोफेसर मणिन्द्र अग्रवाल IIT कानपुर के कम्प्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग में कार्यरत हैं। उन्होंने वहीं से 1986 में बीटेक किया था, जिसके बाद उसी संस्थान से Ph.D की डिग्री ली। मणिन्द्र ने फरवरी में ही आशंका जताई थी कि अगले कुछ हफ़्तों में मामले 5 लाख हो सकते हैं, लेकिन साथ ही कहा था कि ये उतना घातक नहीं होगा। उन्होंने कहा था कि 60% जनसंख्या पहले ही किसी न किसी तरीके से इस वायरस के प्रभाव में आ चुकी है।

बता दें कि इस रिसर्च के बाद प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल ने कहा कि कुम्भ और चुनावी रैलियों से कोरोना के प्रसार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में जरूर बढ़ोतरी होगी, लेकिन कोई ऐसा असर नहीं दिखेगा जिससे देश की स्थिति बिगड़ जाए। साथ ही उन्होंने पूछा कि जो लोग बंगाल, केरल, तमिलनाडु में केस बढ़ने का कारण रैली और सभाओं को बता रहे हैं वो महाराष्ट्र और दिल्ली के लिए क्या कारण बताएँगे? 

प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल का अध्ययन कहता है कि उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन 10 हजार संक्रमित मरीजों के औसत से 20 से 25 अप्रैल तक कोरोना वायरस का संक्रमण अपने पीक पर रहने वाला है। इसके बाद से ग्राफ फिर से गिरना शुरू हो सकता है। वायरस का प्रसार सात दिनों तक सर्वाधिक रहेगा और फिर धीरे-धीरे केस की संख्या कम होनी शुरू हो सकती है। फ़िलहाल यूपी में 2,08,523 एक्टिव केस हैं।

प्रदेश में लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, गोरखपुर, झांसी, गाजियाबाद, मेरठ, लखीमपुर खीरी और जौनपुर में कोरोना संक्रमण के सर्वाधिक मामले हैं। पंजाब में कोरोना वायरस का खतरा चरम पर मँडराता रहा, लेकिन नियंत्रण करने के उपायों के चलते ग्राफ जल्दी गिरा है। चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में कोरोना संक्रमण अभी प्रारंभिक अवस्था में है और 1-5 मई के दौरान चरम पर पहुँचने की संभावना है।

क्या राजनीतिक हिंसा के दंश से बंगाल को मिलेगी मुक्ति, दशकों पुराना है विरोधियों की लाश गिराने का चलन

पश्चिम बंगाल में चुनाव समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं, पर चुनाव में होने वाली हिंसा का अंत निकट नहीं जान पड़ता। पिछले चुनावों से तुलना की जाए तो इस विधानसभा चुनावों में पाँचवें चरण तक चुनावी हिंसा में बहुत कमी आई है। लेकिन हिंसा पूरी तरह से रुकती हुई दिखाई नहीं दे रही। हिंसा रोकने के लिए विभिन्न चरणों के लिए मतदान की योजना और पर्याप्त केंद्रीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति का प्रभाव साफ़ दिखाई दे रहा है। पर राजनीतिक दलों की ओर से हिंसा रोकने के लिए किए गए प्रयास पर्याप्त नहीं हैं।

चुनावी हिंसा के इसी क्रम में भाजपा प्रत्याशी प्रिया साहा के प्रचार क़ाफ़िले पर 17 अप्रैल को हमला हुआ। उसके पहले मालदा में भाजपा प्रत्याशी गोपाल चंद्र साहा पर जानलेवा हमला हुआ था, जिसमें भाजपा के अनुसार तृणमूल कॉन्ग्रेस के लोगों ने साहा को गोली मारी थी। ऐसे में इस विधानसभा चुनाव के भी लगभग हर चरण में हिंसा हुई और भाजपा प्रत्याशियों पर हमले होते रहे।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना रहा है। 1970 के दशक में शुरू हुई राजनीतिक हिंसा में 1980 और 1990 के दशक की चुनावी हिंसा जुड़ती गई और राजनीतिक संस्कृति का लगभग अभिन्न अंग बन गई। पुराने अख़बारों के आर्काइव खँगाले जाएँ तो चुनाव के समय और उसके बाद हुई राजनीतिक हिंसा के कहानियों का एक पूरा भंडार मिलेगा। हिंसा के साथ-साथ मतदान सम्बंधित अनियमितता, बूथ जाम करने की संस्कृति और मतदान सूची से लोगों के नाम ग़ायब कर देने की बातें आम थीं।

ऐसा नहीं कि चुनावी राजनीति के ये तत्व केवल पश्चिम बंगाल में ही मिलते थे। पर एक प्रश्न अवश्य उठता है कि 1990 के दशक में शुरू हुए चुनाव सुधारों का व्यापक असर पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पर क्यों नहीं पड़ा? ऐसा क्यों हुआ कि चुनावी हिंसा रुकने के बजाए और बढ़ती गई और एक समय ऐसा आया जब लगातार बढ़ती इस हिंसा को राजनीति का एक स्थायी तत्व मान लिया गया? ऐसा क्यों हुआ कि चुनाव से महीनों पूर्व गाँवों तक में बमों का निर्माण होने लगा? क्यों हर चुनाव से पूर्व राजनीतिक दलों के बीच हिंसा बढ़ती गई?

बाक़ी के राज्यों से तुलना की जाए तो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक विमर्श में लगातार बढ़ती हिंसा को लेकर कभी बहस ही नहीं हुई। कभी इसे लेकर बुद्धिजीवियों ने आवाज़ नहीं उठाई। कारण शायद यह था कि विचारधारा से वामपंथी ये बुद्धिजीवी दशकों से सत्ता में टिके वाम दलों को किसी असमंजस की स्थिति में नहीं डालना चाहते थे। वैसे इस मुद्दे पर कभी मीडिया में भी बहस नहीं की गई और उसका कारण भी शायद यही था कि अधिकतर पत्रकारों, संपादकों और कॉलम्निस्ट का झुकाव वामपन्थ की ओर था और ये लोग भी विचारधारा पर नैतिकता सम्बंधित प्रश्न उठाए जाने के पक्षधर नहीं थे। ऐसी बातों का असर यह हुआ है कि अब लगभग दो दशकों से राष्ट्रीय मीडिया भी भीषण हिंसा को पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक अभिन्न अंग मानने लगा है।

जब वामदल सत्ता में थे तब पंचायत और म्यूनिसिपल चुनावों के दौरान हिंसा आम बात थी। वाम दलों की इस हिंसात्मक राजनीति को तृणमूल कॉन्ग्रेस के रूप में एक काबिल उत्तराधिकारी मिल गया। तृणमूल ने भी अपनी क़ाबिलियत दिखाई और हिंसा की इस राजनीति में कभी गिरावट नहीं आने दी। अधिक पीछे न जाकर यदि पिछले 10-15 वर्षों में देखें तो वामपंथी दलों के समय में 2008 के पंचायत चुनावों के दौरान बरहमपुर में भीषण हिंसा हुई थी, जिसमें डेढ़ दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे। वामपंथियों की इस संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए 2018 के पंचायत चुनावों में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी भीषण हिंसा का सहारा लिया जिस पर दल को हाईकोर्ट से भी फटकार मिली थी।

दरअसल, देखा जाए तो वर्तमान चुनावों में दल के विरुद्ध असंतोष का एक कारण 2018 के पंचायत चुनावों में की गई हिंसा भी है। पिछले तीन वर्षों में प्रदेश की राजनीति देखें तो भाजपा के लगभग डेढ़ सौ सदस्यों, समर्थकों और नेताओं की हत्या हो चुकी है। इस मामले में पश्चिम बंगाल का मुक़ाबला केवल केरल ही कर सकता है।

यदि वर्तमान विधानसभा चुनाव को देखें तो प्रत्याशियों पर समय-समय पर होनेवाले हमलों के अलावा नेताओं द्वारा दिए गए वक्तव्य पर भी चुनाव आयोग ने नज़र बनाए रखी। ममता बनर्जी द्वारा केंद्रीय सुरक्षा बलों के घेराव वाला बयान और अल्पसंख्यकों से वोट बँटने न देने की अपील इसी तरह के वक्तव्य थे, जिन पर चुनाव आयोग ने उनके प्रचार पर प्रतिबंध भी लगाया। इसी तरह भाजपा के कुछ प्रत्याशियों के वक्तव्य को लेकर भी चुनाव आयोग सख़्त रहा जो स्वागत योग्य कदम है।

इस बार के चुनाव के सभी चरण यदि बिना और हिंसा के हो जाते हैं तो चुनाव आयोग निश्चित तौर पर बधाई का पात्र होगा। साथ ही नागरिकों के मन में यह आशा भी जगेगी कि पश्चिम बंगाल में शायद आगे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत हो जिसमें हिंसा के लिए जगह न रहे। लगभग चार दशकों से राजनीतिक हिंसा का दंश झेल रहे पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए यह न केवल राहत की बात होगी, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता अपनी ऊर्जा सकारात्मक कामों पर खर्च कर सकेंगे।