Home Blog Page 3869

काशी की 400 साल पुरानी परंपरा: बाबा मसाननाथ मंदिर में मोक्ष की आकांक्षा में धधकती चिताओं के बीच नृत्य करती हैं नगरवधुएँ

बनारस के बारे में जब भी बात होती है तो शुरुआत इस सारभूत उक्ति से होती है कि यह बना हुआ रस है। एक ऐसा रस जिसके रसास्वादन के लिए काशी के उन तमाम रहस्यों और परम्पराओं से गुजरना होगा जो अपने आप में अनूठी होने के साथ ही सैकड़ों, हजारों से लेकर युगों का इतिहास अपने आँचल में समेटे हुई है। काशी की महाशिवरात्रि, रंगभरी एकादशी, चिता भस्म की होली के बारे में आपने अब तक ठीक-ठाक सुन रखा है। अब एक और बात, एक और ऐसी परंपरा जो अपने आप में अनूठी है वह है मणिकर्णिका घाट महाश्मशान में बाबा मसाननाथ के दर पर नगरवधुओं का नृत्य।

अपने इस जीवन के नारकीय दंश से जन्मों-जन्मों की मुक्ति स्वरुप मोक्ष की कामना लिए देश भर से हर वर्ष चैत्र नवरात्रि की सप्तमी के दिन यहाँ नगरवधुएँ चारो-तरफ धधकती चिताओं के बीच बाबा मसान नाथ के दरबार में नृत्य और संगीत की सुर-लहरियाँ बहाती हैं। जिससे तरंगित हो उठती हैं स्वयं शिव प्रिया माँ गंगा। काशी में महादेव शिव बाबा मसाननाथ के रूप में भी विराजमान हैं, जिन्हें महाश्मशान का देवता कहा जाता है।

मणिकर्णिका घाट पर नगरवधुओं का नृत्य (फाइल फोटो)

प्राचीन काल में कब यह परंपरा शुरू हुई? कैसे महादेव से मोक्ष की कामना के साथ इसे जोड़ा गया उस पर बहुत कम ही पढ़ने-जानने को मिला है? मैं जब तक बनारस में था तो कई बार इस आयोजन में गया लेकिन तब इस पर और जानने का भाव नहीं था पर अब खुद पिछले दो सालों से सोच रहा हूँ कि बनारस जाकर इस आयोजन में शामिल होऊं, शायद वहाँ इत्तेफाकन कोई मिल जाए जो इस आयोजन के पीछे की रहस्य कथा के बारे में विस्तार से बताए लेकिन कोरोना की वजह से इस वर्ष भी अयोजन सांकेतिक होने पर टालना पड़ा।

फिलहाल, जो एक कथा ऐतिहासिक रूप से इस आयोजन से जुड़ती है वह है राजा मानसिंह की, वही अकबर के समकालीन 16वीं शताब्दी में आमेर के राजा मानसिंह, जिन्होंने अपनी बहन जोधा बाई का विवाह अकबर के साथ करके स्वयं उनकी दासता स्वीकार कर दरबारी बन गए थे।

ऐतिहासिक रूप से कहा जाता है 16वीं सदी में, जब काशी प्रवास के दौरान राजा मानसिंह ने बाबा मसाननाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तो वहाँ की परंपरा के अनुसार पूर्णाहुति के रूप में उनकी इच्छा भजन-कीर्तन, नृत्य-संगीत के कार्यक्रम रखने की हुई। एक तो महाश्मशान और दूसरा मानसिंह के साथ यह अपयश भी जुड़ा था कि उन्होंने मुगलों से डरकर अपनी बहन जोधा बाई को एक यवन अकबर को सौंप दिया था। काशी वासियों के साथ ही उस समय का जो भी कुलीन वर्ग था वह इसे उचित नहीं मानता था।

फिर वही हुआ जब कोई नामचीन कलाकार महाश्मशान मणिकर्णिका पर स्वर लहरियाँ बिखेरने को तैयार न हुआ तो यह जिम्मेदारी संभाली काशी की गणिकाओं ने, वही नगरवधुएँ; यह सब सभ्य नाम है जो आम प्रचलित नाम है वह है ‘वेश्या’- देह, नृत्य और संगीत को आधार बनाकर अपनी आजीविका चलाने वालीं। जब उन्होंने वहाँ आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया तब कहीं जाकर राजा मानसिंह के बचे-खुचे मान सम्मान की लाज बच पाई थी।

कहते हैं कि तय समय पर राजा मानसिंह के आमंत्रण पर तब नगर बधुएँ नाव से बैठकर गंगा की गोद में अठखेलियाँ करते हुए श्मशान घाट पहुँची थी और पहली बार महिलाओं ने मसाननाथ मंदिर में स्वरांजलि के साथ अपनी मुक्ति के लिए पूजा-अर्चना की थी।

मणिकर्णिका घाट पर नगरवधुओं का नृत्य (फाइल फोटो)

कालांतर में यह परंपरा बन गई जो अब लगभग 400 साल से भी अधिक पुरानी है। जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी नगरवधुएँ आज भी निभाती आ रही हैं। कहा जाता है, देश भर में जिस भी गणिका ने खुद को इस दलदल में झोंक दिया है वह साल भर इंतजार करती है इस कामना के साथ की बाबा दरबार में नृत्यांजलि अर्पित कर वह इस जीवन में जो भी विकार, संस्कार या नारकीय भोग लिखा था वह उसे या किसी अन्य स्त्री को कभी दोबारा न भोगना पड़े।

कहा जाता है तभी से मणिकर्णिका पर नगरवधुओं के नृत्य की परम्परा शुरू हुई। शिव को समर्पित गणिकाओं की यह भाव पूर्ण नृत्यांजली मोक्ष की कामना से युक्त होती है। जहाँ उन्हें यह एहसास होता है कि देह से परे भी उनका कोई अस्तित्व है जो बेहद भावपूर्ण है। जहाँ न कोई ग्राहक होगा न खरीदार, बस चारो तरफ चिताओं से उठती प्रचंड अग्नि होगी और देह मुक्त हुई वह राख जो जीवन की नश्वरता का पाठ पढ़ा रहा होगा। पहली बार काया से परे उनके अपने अस्तित्व से उनका साक्षात्कार करा रहा होगा।

इस वर्ष चैत्र सप्तमी को कल हुए आयोजन की बात करें तो वह कोरोना की वजह से पिछले साल की तरह प्रतीकात्मक ही था। कार्यक्रम के बारे में मसाननाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने ऑपइंडिया को बताया कि चैत्र नवरात्र के सप्तमी तिथि को बाबा के वार्षिक शृंगार समारोह की आखरी निशा होती है। इस दिन बाबा को तांत्रिक रूप में सजाया जाता है और इसी दिन सैंकड़ों वर्षों की परम्परा का निर्वहन करने नगर वधुएँ बाबा मसाननाथ के दरबार में स्वरांजलि लगाने पहुँचती हैं।

मणिकर्णिका घाट पर नगरवधुओं का नृत्य (फाइल फोटो)

सोमवार को भी नगर वधुएँ यहाँ हाज़री लगाने आईं पर इस वर्ष यह आयोजन कोविड गाइडलाइंस के अनुरूप सांकेतिक रूप से ही संपन्न हुआ। नगर वधुओं ने मंदिर में ही नृत्यांजलि पेश की जिसमें किसी बाहरी व्यक्ति को प्रवेश नहीं दिया गया। बहुत ही सीमित संख्या में मंदिर व्यवस्था से जुड़े और आस-पास के लोग ही वहाँ मौजूद रहे।

आपको बता दें कि यहाँ आने वाली कोई भी नगर वधु कभी पैसा नहीं लेती बल्कि स्वयं अपनी मन्नत का चढ़ावा अर्पित करके जाती है। कलकत्ता, बिहार, मऊ, दिल्ली, मुंबई समेत भारत के कई स्थानों से मुक्ति की आकांक्षी, किसी दैवीय प्रेरणा से आभूत होकर वह बरबस यहाँ खींची चली आती हैं।

यह सब लिख देना जितना आसान है, उसे वहाँ जाकर आप अनुभूत करेंगे तो पढ़ पाएँगे उन बेबस सुनी आँखों में घुंघरूओं का वह शोर भी जिसे वह बाबा को अर्पित कर सदा के लिए इस देह दंश से मुक्त हो जाना चाहती हैं। उनसे बातें कर आप देह से ऊपर उठकर उस शाश्वत अस्तित्व से मुलाकात कर पाएँगे जो इस नश्वर शरीर से परे है।

फिलहाल, इस वर्ष तो बीत गया बस यह तिथि याद रहे चैत्र नवरात्र की सप्तमी, इस दिन चुपचाप पहुँच जाइए बनारस के महाश्मशान मणिकर्णिका जहाँ महादेव की कृपा से आपको देहबोध से मुक्ति का एहसास होगा। इससे परे जो है, जो दिन भर कहता है मेरा यह, मेरा वह, पर कभी खुद के बारे में बात नहीं करता, शायद उससे भी आपकी मुलाकात हो जाए!

सुबह का ‘प्रोपेगेंडाबाज’ शाम को ‘पलटी मारे’ तो उसे शेखर गुप्ता कहते हैं: कोरोना वैक्सीन में ‘दाल-भात मूसलचंद’ का क्या काम

अगर कोई व्यक्ति अपनी पूरी मशीनरी के साथ किसी चीज के खिलाफप्रोपेगेंडा फैलाने में लगा हो और कुछ ही दिनों बाद फिर से उसके पक्ष में बातें करने लगे तो ज़रूर दाल में कुछ काला है। शेखर गुप्ता का ‘द प्रिंट’ कोरोना के स्वदेशी टीकों के खिलाफ अफवाहें फैलाने में सबसे अगली पंक्ति में था। अब यही गुप्ता सभी के टीकाकरण का स्वागत कर रहे हैं। साथ ही वो केंद्र सरकार द्वारा ‘भूल सुधारने’ की बातें भी कर रहे हैं।

दरअसल, ये सब कुछ भारत सरकार के एक फैसले के बाद शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (अप्रैल 19, 2021) को कई मैराथन बैठकें की, जिसके बाद शाम को खबर आई कि मई 1 से 18 वर्ष की उम्र के लोग कोरोना वैक्सीन ले सकेंगे। इसके बाद इसका क्रेडिट लेने की होड़ मच गई। कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि ‘दूरदर्शी’ राहुल गाँधी के कहने पर ऐसा हुआ। TMC नेता कहने लगे कि देश की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री की सलाह केंद्र ने सुनी।

ऐसे में मीडिया के गिरोह विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाले शेखर गुप्ता कैसे पीछे रहते। उन्होंने एक कहावत शेयर की, “सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो वो भूला नहीं कहलाता।” उन्होंने दावा किया कि पहले ही काफी समय जाया हो चुका है, कई लोग मर चुके हैं और कामकाज के कितने ही दिन बर्बाद हो गए हैं। साथ ही उन्होंने भारत सरकार के आदेश वाली प्रेस रिलीज शेयर की।

असल में भारत सरकार ने पहले ही टीकाकरण को कई चरणों में कराने का फैसला लिया था और इसके तहत सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना वॉरियर्स को प्राथमिकता दी गई। ये वो समय था, जब भाजपा विरोधी पूरा तंत्र वैक्सीन को लेकर इतनी अफवाहें फ़ैलाने में व्यस्त था कि कई लोग डर से भी इसे नहीं ले रहे थे। स्वाथ्यकर्मियों के बाद बुजुर्गों और फिर 45 वर्ष की उम्र के ऊपर के लोगो को वैक्सीन दी गई।

ध्यान देने वाली बात ये है कि अब तक इन सभी को स्वदेशी वैक्सीन ही दी गई है। अब अंतिम चरण में तो 18 वर्ष के ऊपर के ही व्यस्क बच जाते हैं न? तो फिर वैक्सीन उन्हें मिलनी ही थी। इसमें ‘भूल’ कहाँ हुई? क्या कोरोना वॉरियर्स को पहले वैक्सीन देना भूल थी? क्या वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता देना भूल थी? ऐसा तो है नहीं कि गुप्ता जी जैसों को लगता हो कि वैक्सीन की खेप PMO में रखी हुई थी और उसे बस रिलीज करना था।

इसके लिए सरकार को वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को पैसे देने होते हैं। अब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोवैक्सीन और कोविशील्ड बनाने वाली कंपनियों को 4500 करोड़ से भी अधिक रुपए 100% एडवांस पेमेंट के रूप में जारी किए हैं, तब जाकर टीकाकरण के लिए 18 वर्ष के सभी योग्य लोगों के लिए सुलभ हो सकेगा। सरकार टीकाकरण का पूरा खर्च उठा रही है। अब तक जनता से एक पाई भी नहीं लिया गया है।

भारत इस मामले में डायनेमिक मैपिंग मॉडल पर कार्य कर रहा है, जिसके तहत जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है उन्हें पहले वैक्सीन दी गई। इसका पहला फेज जनवरी 16, 2021 को ही शुरू कर दिया गया था। पीएम मोदी ने कल की बैठक में भी कहा कि सरकार देश में सभी पात्र लोगों के टीकाकरण के लिए एक वृहद योजना लेकर चल रही है।

क्या आपको पता है कि जब वैक्सीन को लेकर जागरूकता फैलाने की बारी थी, तब शेखर गुप्ता का ‘द प्रिंट’ क्या कर रहा था? फरवरी 3, 2021 को आई एक खबर में बताया गया था कि कैसे भारत बायोटेक और सीरम (SII) विवादों में घिरा हुआ है। उससे पहले जनवरी में दोनों वैक्सीन को वैज्ञानिक रूप से संदेहास्पद बताया गया। मार्च 13 की खबर में बताया गया कि सरकार को कोवैक्सीन पर विश्वास नहीं है और इसकी वजह हैं 43 कोरोना केसेज।

इतना ही नहीं, शेखर गुप्ता के पोर्टल की और भी कारस्तानियाँ सुनिए। जनवरी 2021 की ही एक अन्य खबर में दावा किया कि भारत बायोटेक ने एक ही दिन में एक्सपर्ट पैनल के दिमाग को बदल दिया। जनवरी 22 को कहा गया कि कोवैक्सीन WHO के मानकों पर खड़ा नहीं उतरता है। जनवरी की शुरुआत में कहा गया कि वैक्सीन का फेज 3 ट्रायल अपूर्ण है। जनवरी 16 को कहा गया कि कोवैक्सीन को लेकर लोगों में सकुचाहट है।

जनवरी 8 को एक खबर में दावा कर दिया गया कि भारतीय नियामकों में इतने छेद हैं कि दोनों वैक्सीन को मँजूरी मिल गई। DCGI ने जब वैक्सीन को अप्रूव किया तो इसे राजनीतिक जुमला बताया गया। कॉन्ग्रेस ने भी वैक्सीन को लेकर गड़बड़ दावे किए थे, जिन्हें शेखर गुप्ता ने आगे बढ़ाया। अब आप बताइए, वैक्सीन को लेकर लोगों को डराने वाले आज क्यों पूछ रहे हैं कि सभी को वैक्सीन क्यों नहीं दिया?

वैक्सीन पर अफवाह फैलाने वाली कॉन्ग्रेस भी ऐसी ही बातें करती रही है। इसलिए, इनके लिए ‘सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को’ वाली कहावत फिट बैठती है। सरकार ने 1 मई से टीकाकरण को लेकर जिस तरह पूरे प्लान के साथ आदेश जारी किया है, स्पष्ट है कि वो अचानक से नहीं हुआ। शेखर गुप्ता को अपने पुराने ट्वीट्स और खबरें देखनी चाहिए, जिसमें उन्होंने इन्हीं स्वदेशी टीकाओं को लेकर डर का माहौल बनाया था।

एक 15 साल का-दूसरा 21 काः घर से उठाकर जंगल ले गए नक्सली, हत्या कर कहा- पुलिस के मुखबिर थे

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने रविवार (अप्रैल 18, 2021) को 2 युवकों की जंगल में ले जाकर हत्या कर दी। मृतकों में एक की उम्र 21 साल थी और दूसरा 15 साल का नाबालिग था। नक्सलियों ने दोनों को मुखबिरी के आरोप में रविवार को जगरमुंडा थाना क्षेत्र में मिलमपल्ली इलाके में मारा।

सुकमा के एसपी के एल ध्रुव ने हत्या की पुष्टि करते हुए बताया कि नक्सलियों द्वारा मिलमपल्ली गाँव में मारे गए दोनों युवकों के शवों को बरामद कर लिया गया है। बॉडी के पास पड़े नोट में नक्सलियों ने आरोप लगाया कि दोनों लड़के पुलिस के मुखबिर थे।

जानकारी के अनुसार, नक्सली इस इलाके के लोगों को नौकरी छोड़ने की धमकी देते थे। रविवार को नक्सलियों ने जिन दो युवकों को मारा इनमें 21 वर्षीय युवक का भाई बस्तर बटालियन का जवान है, जबकि 15 वर्षीय स्कूली छात्र के पिता सहायक आरक्षक थे, जिन्होंने नक्सलियों की धमकी के बाद पुलिस की नौकरी छोड़ दी थी।

दोनों युवकों का शव मिलने के बाद इलाके में दहशत का माहौल है। पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। मृतकों के परिजनों का कहना है कि नक्सली दोनों युवकों को रात में घर से उठाकर जंगल की ओर ले गए थे और उसके बाद उनका शव मिला।

मालूम हो कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि जब नक्सलियों ने किसी बच्चे की हत्या की। यहाँ अमूमन नक्सली छात्रों का, बच्चों का उपयोग अपने लाभ के लिए करते हैं। कथित तौर पर पहले यहाँ बच्चों का ब्रेन वाश कर उन्हें अपने संगठन में भर्ती करते हैं, फिर उनसे सूचनाएँ, सामान लेने-देने का काम कराते हैं। 

पुलिस सूत्रों का कहना है कि लगातार फोर्स नक्सलियों पर दबाव बना रही है। गाँवों में उनके सूचना तंत्र को तोड़ रही है। इसलिए नक्सली बौखलाए हैं और लगातार ग्रामीणों को मार रहे हैं। इसके पीछे उनकी मंशा गाँवों में दहशत फैलाना है, जिससे कोई उनके खिलाफ आवाज ना उठाए।

बता दें कि इससे पहले शनिवार को भी सुकमा के दोरनापाल-जगरगुंडा इलाके में ही नक्सलियों ने एक शख्स की हत्या कर दी थी। मृतक इस इलाके में सड़क निर्माण के काम में लगा कर्मचारी था। उस दौरान नक्सलियों ने दो गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया था। इसी तरह जिले के ही भेज्जी थाने से सिर्फ आधा किलोमीटर दूर पर पुलिस के दो जवानों की हत्या कर दी गई थी। वहीं 3 अप्रैल को नक्सलियों ने बीजापुर जिले में सुरक्षाबलों पर हमला किया था। इसमें सुरक्षाबल के 23 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होएः दिल्ली में CM केजरीवाल के ‘मैं हूॅं ना’ पर मजदूरों की बेबस भीड़ क्यों भारी

देश के लगभग सभी राज्यों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर फैल रही है। हर राज्य अपनी आवश्यकता के अनुसार धारा 144, रात का कर्फ़्यू, लॉकडाउन या सीमित लॉकडाउन की घोषणा कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने सबसे पहले इस तरह की घोषणा की और उसके बाद मध्य प्रदेश और दिल्ली ने भी सीमित कर्फ़्यू की घोषणा की। संक्रमण के फैलने की तेज़ी को देखते हुए नागरिक भी सचेत हो रहे हैं और संक्रमण से बचने के उपाय कर रहे हैं। यह अलग बात है कि बिना मास्क के बाहर निकलने वाले लोग अब भी दिखाई दे रहे हैं।

दिल्ली में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लोग भारी मात्रा में बाहर आए और शराब की दुकानों पर भीड़ लग गई। ऐसी भीड़ के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। त्रासदी यह है कि इस कठिन समय में शराब की दुकानों पर होने वाली भीड़ और वहाँ बोली जाने वाली बातें ही नागरिकों के लिए थोड़ी देर के लिए ही सही, दुःख भूलने का कारण बन रही है। शराब ख़रीदने वालों में से कई लोग अपनी गंभीर बातों से लोगों को हँसा देते हैं।

दिल्ली की जनता इस मुश्किल समय से जूझने की कोशिश कर ही रही थी और जब लोगों को लग रहा था कि पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष मज़दूरों का पलायन शायद देखने को न मिले तब तक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो जारी कर दिया, जिसमें उन्होंने मज़दूरों से अपील करते हुए ‘मैं हूँ ना’ के शाहरुख़ खान स्टाइल में कहा: सरकार आपका पूरा ख़याल रखेगी। मैं हूँ ना। मुझ पर भरोसा रखिए।

लगा उनकी इस अपील से जैसे जादू हो गया। शाम होते-होते लोगों ने आनंद बिहार बस अड्डे के फ़ोटो और वीडियो शेयर करने शुरू कर दिए जिसमें बस अड्डे पर दिल्ली से बाहर जाने की कोशिश करने वालों की भारी भीड़ दिखाई दे रही थी। समझ में नहीं आया कि जब सरकार द्वारा लगाया गया लॉकडाउन बहुत कम समय के लिए एक सामान्य कदम था तो यह वीडियो जारी करने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल को दिल्ली की जनता पर भरोसा नहीं है कि उन्हें सरकार द्वारा उठाया गया सामान्य कदम समझ में नहीं आएगा? या फिर पिछले साल उनके और उनकी सरकार द्वारा जो कुछ किया गया उसे जनता भुला नहीं पाई है?

हम यदि पिछले दस दिनों में मुख्यमंत्री केजरीवाल के बयान देखें तो उनकी वजह से कई विषय पर केवल भ्रम ही फैला है। उन्होंने बार-बार कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में बेड की कमी नहीं है। उनकी यह बात उस ऐप के आँकड़ों पर आधारित है जो दिल्ली सरकार ने जारी किया है। पर यहाँ सच्चाई ऐप द्वारा दिखाए जा रहे आँकड़ों से भिन्न है। लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बेड वैसे ही नहीं हैं पर फ़ोन करने पर प्राइवेट अस्पताल भी बेड ख़ाली न होने का दावा कर रहे हैं। फिर केजरीवाल जी ने दिल्ली में ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर तीन दिन के अंदर ही दो बार भ्रामक बातें की। उन्होंने पहले कहा कि दिल्ली में ऑक्सीजन का पूरा स्टॉक है और किसी तरह की दिक्कत होने नहीं दी जाएगी। फिर उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन की कमी है।

भ्रामक बयान देना अरविंद केजरीवाल के लिए नई बात नहीं है। प्रवासी मज़दूरों में भ्रम की स्थिति पैदा करके उन्हें बसों में भरकर उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर छोड़ने वाली बात को अभी मात्र एक वर्ष ही हुए हैं। उन्हीं दिनों मज़दूरों के लिए भोजन उपलब्ध कराने के दिल्ली सरकार के दावों पर कई हलकों में बहस भी हुई थी और उन्हें झूठा भी बताया गया था। सबको याद है कि कैसे सरकार के परिवहन विभाग ने कथित तौर पर मैसेज वायरल करवा मज़दूरों को भागने के लिए विवश कर दिया था

मुख्यमंत्री केजरीवाल के भ्रामक बयानों से बनने वाली अनिश्चित भविष्य की तस्वीर और सरकार द्वारा मज़दूरों के हितों की रक्षा के लिए ईमानदार कोशिश न करने की आशंका से प्रवासी मज़दूरों का पलायन पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी होने का ख़तरा बना हुआ है। समस्या यह है कि एक राज्य से शुरू होने वाले ऐसे पलायन का असर अन्य राज्यों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों पर भी हो सकता है। ऐसे में आवश्यकता है उस विश्वसनीय बयान की जो मज़दूरों में विश्वास जगाए रखे और उन्हें पलायन से रोके।

‘भारत में कोरोना के डबल म्यूटेशन ने दुनिया को चिंता में डाला’: मीडिया द्वारा बनाए जा रहे ‘डर के माहौल’ का FactCheck

मीडिया के एक वर्ग में कहा जा रहा है कि भारत में कोरोना वायरस के डबल म्यूटेशन ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है। ‘टाइम्स नाउ’ की खबर में हॉवर्ड मेडिकल स्कूल के पूर्व प्रोफेसर विलियम ए हसलटीन के हवाले से दावा किया गया कि कोरोना वायरस का B.1.617 वैरिएंट काफी खतरनाक है। ‘ब्लूमबर्ग’ की रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत के इस डबल म्यूटेशन ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है।

कोरोना के डबल म्यूटेंट वायरस को लेकर भ्रामक हेडलाइन

रिपोर्ट के अनुसार, इस वैरिएंट के अध्ययन को लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने रुचि दिखाई है। साथ ही इसके कारण ही भारत अब ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा कोरोना प्रभावित देश बन गया है। WHO की कोरोना टेक्निकल लीड मरिया वेन कोरखोवै ने कहा कि कोरोना वायरस के इस वैरिएंट में डबल म्यूटेशन का होना चिंता का सबब है। इससे वैक्सीन की क्षमता भी कम हो रही है।

अब आपको बताते हैं कि सच्चाई क्या है। असल में कोरोना का डबल म्यूटेशन वायरस वैरिएंट ‘भारतीय’ नहीं है, बल्कि दुनिया भर के कई देशों में ये फ़ैल रहा है। इसलिए, इस खबर को प्रस्तुत करने का तरीका ही गलत है। कई देशों में डबल म्यूटेशन वायरस पाया गया है। डबल म्यूटेशन (2 म्यूटेशंस) एक अन्य वैरिएंट है जो ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, जर्मनी, आयरलैंड, नामीबिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, यूनाइटेड किंगडम, यूएसए जैसे कई देशों में पाया गया है।

NDTV ने भी बनाया ‘डर का माहौल’

इस वैरिएंट के ज्यादा फैलने की क्षमता अभी तक स्थापित नहीं हुई है। इन म्यूटेशंस के सामने आने से प्रबंधन की रणनीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जो जाँच, पता लगाने, नजर रखने और उपचार पर केन्द्रित बनी हुई है। कोविड-19 के प्रसार पर रोक के लिए मास्क का इस्तेमाल सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बना हुआ है। साथ ही RTPCR टेस्ट से ये पकड़ में आ जाते हैं और इस टेस्ट की विश्वसनीयता बरकरार है।

INSACOG (Indian SARS-CoV-2 Genomics Consortium) के दिशा-निर्देश एक बार फिर से राज्यों के साथ साझा किए गए और राज्यों को पॉजिटिव लोगों के क्लीनिकल डाटा उपलब्ध कराकर जीनोम अनुक्रमण के लिए नमूने भेजने की सलाह दी गई थी। इससे विभिन्न स्थानों पर वैरिएंट्स में बढ़ोतरी से जुड़ी महामारी संबंधित व्यापक जानकारियाँ मिलेंगी। साथ ही INSACOG जनता में मौजूद अन्य खतरनाक वैरिएंट्स को खोजने में सक्षम हो जाएगा।

इस तरह से भारत सरकार भी इस दिशा में लगातार लगी हुई है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा समय-समय पर संवाददाता सम्मेलनों के माध्यम से खतरनाक वैरिएंट्स और नए म्यूटेंट्स की वर्तमान स्थिति से जुड़ी जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप बढ़ाने और सख्ती पर भी जोर दिया जाता है। कोविड 19 वायरस अपना रूप बदल रहा है और भारत के साथ ही कई देश इससे परेशान हैं।

केरल: हिंदू युवक से शादी करने वाली मुस्लिम महिला पर बहन और जीजा ने धारदार हथियार से किया हमला

केरल में हिंदू युवक से शादी करने वाली एक मुस्लिम महिला के परिजनों ने उसकी जान लेने की कोशिश की। घटना राज्य के पथानमथिट्टा जिले के कलंजूर में तब हुई जब महिला अपने माता-पिता से मिलने मायके पहुँची। महिला पर उसकी बहन और जीजा ने हमला किया। दोनों कथित तौर पर उसके अंतरधार्मिक विवाह से नाराज थे। 

घटना में महिला के बाजुओं में चोट आई, जिसके बाद उसे रन्नी अस्पताल में भर्ती किया गया। पुलिस ने मामले में पीड़िता के बयान के आधार पर उसकी बहन और जीजा के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। पुलिस पता लगा रही है कि ये हमला जायदाद के लिए किया गया या फिर ऑनर किलिंग का प्रयास था।

पुलिस के अनुसार, पीड़िता ने हिंदू व्यक्ति से 8 माह पहले शादी की थी और अपने मायके से कुछ दूरी पर उसके साथ रह रही थी। घटना वाले दिन जब महिला अपने माता-पिता के घर आई, तब वहाँ उसकी बहन और जीजा भी मौजूद थे। यहीं उन दोनों की पीड़िता से किसी प्रॉपर्टी को लेकर झड़प हुई और उन्होंने पीड़िता पर हमला बोल दिया।

कथित तौर पर पीड़िता की बहन अपनी पैतृक संपत्ति उसके (पीड़िता) साथ साझा करने पर नाराज थी। इसलिए उसने अपनी बहन के साथ लड़ाई की और गुस्से में एक धारदार हथियार से उस पर हमला कर दिया। घटना में वह बुरी तरह घायल हो गई। पुलिस का कहना है कि महिला की शादी को लेकर खासी आपत्तियाँ नहीं थी, लेकिन फिर भी घटना में इसकी जाँच जरूरी है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ऐसे अंतरजातीय विवाह का मामला उत्तर प्रदेश के नोएडा से सामने आया था। यहाँ एक मुस्लिम महिला ने हिंदू प्रेमी से शादी करने के बाद पुलिस के सामने गुहार लगाई थी कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है न कि अपने माता-पिता के साथ।

इस केस में पुलिस ने बताया था कि 22 फरवरी को महिला के घरवालों ने उसके पति पर अपहरण का आरोप लगाते हुए शंका जताई थी कि उनकी बेटी की जान खतरे में है, लेकिन घटना के 2 माह बाद थाने पहुँच कर स्वयं महिला ने साफ किया कि वह अपने हिंदू प्रेमी से शादी कर चुकी है और अब उसे अपने घर वापस नहीं जाना। 

‘सरकार पर विश्वास नहीं’: मजदूरों ने केजरीवाल की नहीं सुनी, 5 लाख ने पकड़ी ट्रेन-बस टर्मिनल पर 50000; दिल्ली से घर लौटने की मारामारी

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल की आम लोगों के नजर में साख की पोल सोमवार (19 अप्रैल 2020) की शाम होते-होते खुल गई। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन का ऐलान करते हुए कहा था कि वे हाथ जोड़ कर प्रवासी मजदूरों से विनती करते हैं कि ये एक छोटा सा लॉकडाउन है जो मात्र 6 दिन ही चलेगा, इसलिए वे दिल्ली को छोड़ कर कहीं और न जाएँ।

लेकिन उनके इस ऐलान के साथ ही पहले दिल्ली के ठेकों पर भीड़ उमड़ी और फिर उसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से घर लौटने की मजदूरों के बीच होड़ शुरू हो गई। ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला था।

आनंद विहार बस टर्मिनल पर मजदूरों की भारी भीड़ जुटी हुई है। वहाँ हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही इकट्ठा होने शुरू हो गए थे। इनमें से अधिकतर यूपी, बिहार और झारखंड के हैं। सभी अपने घर वापस लौटना चाहते हैं।

प्रवासी मजदूरों ने कहा कि दिल्ली की AAP सरकार को कर्फ्यू की घोषणा से पहले उन्हें समय देना चाहिए था, ताकि वो अपने घर लौट सकें। मजदूरों ने कहा कि वो दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग हैं, ऐसे में अब उनके जीवन-यापन पर संकट आ खड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि जहाँ बस से वापस जाने के लिए मात्र 200 रुपए लगते थे, वहाँ अब 3000-4000 रुपए लग रहे हैं। प्रवासियों ने पूछा कि अब वो वापस कैसे जाएँगे?

प्रवासी मजदूरों का कहना है कि अब वो किसी भी सरकार पर भरोसा नहीं कर सकते। आनंद विहार बस टर्मिनल पर तो भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस भी नाकाम रही है। प्रवासी मजदूर अपने परिवारों के साथ वहाँ पहुँचे हुए हैं। कोरोना के दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। एक 7 साल के बच्चे ने बताया कि लॉकडाउन में उसके पिता की नौकरी चली गई, जिसके बाद वह अवसाद में उसकी माँ को पीटा करता था।

मजदूरों का कहना है कि लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जा सकता है, ऐसे में उनकी ज़िंदगी फिर से नरक हो जाएगी। उनका कहना है कि पिछले साल वो कई दिनों तक भूखे रहने को मजबूर हुए थे। कंस्ट्रक्शन कार्य में लहे मजदूरों को तो उनके मालिकों ने ही वापस जाने को कह दिया है। मजदूरों का कहना है कि दिल्ली छोड़ना ही अब एकमात्र उचित विकल्प है। ये वो मजदूर हैं, जिनकी आय कुछ दिनों पहले दोबारा शुरू ही हुई थी।

इस बार ट्रेनें भी चल रही हैं, ऐसे में कई प्रवासी मजदूर रेलगाड़ी से घर लौट रहे हैं। अधिकतर के पास कन्फर्म टिकट नहीं है। बसों में बैठने के लिए होड़ सी मची हुई है और लोग किसी तरह जगह लेकर जाने के लिए भी तैयार हैं। कौशांबी में भी भारी भीड़ है। पिछली बार जो पैदल लौटे थे, वो भी इस बार बस से जा रहे हैं। रविवार को दिल्ली से लगभग 5 लाख लोगों ने ट्रेन पकड़ी। आनंद विहार टर्मिनल पर जुटे लोगों की संख्या करीब 50,000 बताई गई है।

रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि गेहूँ की कटाई और शादी-ब्याह के इस सीजन में लोग वैसे भी लौटते हैं, ऐसे में सिर्फ लॉकडाउन इसका कारण नहीं है। बस की छत पर बैठ कर भी लोग लौट रहे हैं। भीड़ में कुछ लोगों के मोबाइल फोन्स भी खो गए। सराय काले खाँ और कश्मीरी गेट पर भी यही स्थिति है।

पिछले 1 दिन की बात करें तो दिल्ली में कोरोना के 23,686 नए मामले सामने आए हैं, जिससे वहाँ सक्रिय संक्रमितों की संख्या बढ़ कर 76,887 हो गई है। 21,500 लोग ठीक भी हुए। वहीं पिछले 1 दिन में 240 लोगों को कोरोना के कारण अपनी जान गँवानी पड़ी। इसके साथ ही प्रदेश में मृतकों की संख्या अब 12,361 पर पहुँच गई है। पूरे भारत में कोरोना के 2,56,828 नए मामले सामने आए हैं।

केजरीवाल ने लॉकडाउन की घोषणा के साथ भरोसा दिलाया था कि सरकार प्रवासियों का ख्याल रखेगी। लेकिन, जिस तरह घर वापसी की होड़ लगी है वह देखकर तो लगता है कि मजदूर पिछले साल के अनुभवों को नहीं भूले हैं, जब आप पर ही अफवाह फैलाकर उन्हें घर से निकलने को मजबूर करने के आरोप लगे थे।

कोरोना से लड़ाई में मजबूत कदम बढ़ाती मोदी सरकार: फर्जी प्रश्नों के सहारे फिर बेपटरी करने निकली गिद्धों की पाँत

आम आदमी की तरह दिखने वाले जो लोग बात-बात पर चिंतित हो जाते हैं, अक्सर उन्हें बुद्धिजीवी या विशेषज्ञ मान लिया जाता है। देश, समाज और काल में किसी क्रिया या समस्या से भविष्य में होने वाले असर के प्रति अक्सर फ़र्ज़ी चिंता के प्रदर्शन का और उसे समझाने का महत्वपूर्ण काम ये बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ अपने काँधे पर ले लेते हैं। इस तथाकथित ज़िम्मेदारी का एहसास ही उन्हें आम आदमी से अलग करता है।

अब कोरोना की ही बात ले लीजिए। जब एक वर्ष पहले यह भारत में घुसा तो चिंतित होने का सबसे महत्वपूर्ण काम ऐसे लोगों ने किया जो ख़ुद को भारतवर्ष के सामने विशेषज्ञ घोषित कर चुके थे। इन विशेषज्ञों ने अपने मन में चलने वाली अंक गणित का हिसाब लगाया और घोषणा की कि बस महीना दो महीना में करोड़ों पीड़ित होंगे और लाखों की संख्या में लोग मारे जाएँगे। इन तथाकथित विशेषज्ञों की भविष्यवाणी को मीडिया ने खूब जगह दी। जो बातें ढाई मिनट के वीडियो में बताई जा सकती थीं उन्हीं बातों को बताने के लिए साढ़े बारह मिनट के वीडियो बनाए गए। जो बातें ढाई सौ शब्दों में लिखी जा सकती थीं उन्हें लिखने के लिए पंद्रह सौ शब्दों का सहारा लिया गया ताकि भविष्यवाणियों पर लोगों का विश्वास पुख़्ता किया जा सके।

खान मार्केट मीडिया ने सवा महीने इन भविष्यवाणियों का सस्वर पाठ किया। विदेशी मीडिया ने इन्हें उछाला। विदेशी मीडिया का कोई मंच बचा नहीं था जहाँ ख़ुशी ज़ाहिर न की गई। सूत्रों के सहारे हतप्रभ कर देने वाले फ़र्ज़ी टेबल बनाकर फ़र्ज़ी बातों और परिकल्पनाओं की जलेबी काढ़ी गई। यह सोचकर सब बहुत खुश थे कि जल्द ही भारतवर्ष लाशों से पट जाएगा। चारों ओर हाहाकार मचेगा। सब तरफ़ तबाही फैल जाएगी। जिस तरह के कॉलम लिखे गए उन्हें पढ़कर साफ़ दिखाई दिया कि कैसे गिद्धों की एक पूरी टोली लाशें देखने के लिए पाँत लगाए बैठी हुई है कि कब लाशें गिरें और ये गिद्ध डान्स शुरू करें।

पर हाय, नियति को यह मंज़ूर न था। भारत ने लॉकडाउन करके, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करके, मेडिकल उपकरण बनाकर और डॉक्टर और स्वास्थ्य योद्धाओं के लगातार प्रयास से ऐसा होने नहीं दिया। जब काफ़ी दिनों की प्रतीक्षा के बाद भी ऐसा न हुआ तो निराश हुए इन लोगों ने भारत से निकल रहे आँकड़ों पर शंका ज़ाहिर करना शुरू किया।

प्रोपेगेंडा का प्रथम चरण था। प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर आँकड़ों के प्रति आम भारतीय के मन में शंका पैदा करने की कोशिश शुरू हुई। फिर भारत में बन रही वैक्सीन को लेकर शंका पैदा करने की कोशिश की गई। वैक्सीन बनाने वाली कम्पनियों के प्रयास और ट्रायल के आँकड़ों को झुठलाने की कोशिश की गई। गैंग मेम्बर, छुटभैय्ये राजनेता, हारे हुए कॉन्ग्रेसी और बेरोज़गार संपादकों के ईकोसिस्टम ने हर वह प्रयास किया जिससे कोरोना के विरुद्ध देश की लड़ाई को कमजोर किया जा सके।

तरह-तरह की आवाज़ें सुनाई दीं। “ये भाजपा की वैक्सीन है” से लेकर “पहले प्रधानमंत्री खुद लगवाएँ” तक का सफ़र महीने भर में तय हो गया। भारत के जिस वैक्सीन मैत्री को दुनियाँ ने सराहा उसी की बुराई करने के प्रयास में इस ईकोसिस्टम ने नए-नए कीर्तिमान गढ़े। “ये वैक्सीन दूसरों को क्यों दी जा रही है” से लेकर “इक्स्पाइअर्ड वैक्सीन दे दिया” तक कोई प्रॉपगैंडा बचा नहीं जिसे न फैलाया गया। बाद में जिस वैक्सीन को बेकार बताया गया उसी की कमी का शोर उन्हीं लोगों ने मचाया जिन्होंने उसे बेकार बताया था।

विपक्षी नेता सार्वजनिक तौर पर वैक्सीन के ख़िलाफ़ बोलते रहे और व्यक्तिगत तौर पर उसी वैक्सीन की सुई घोंपवाते रहे। देश में बनने वाली वैक्सीन के ख़िलाफ़ प्रॉपगैंडा फैलाने का काम कालांतर में छुटभैय्ये नेताओं से मुख्यमंत्रियों तक के हाथ में आ गया। जब इस सबसे बात नहीं बनी और वैक्सीन प्रोग्राम सफल होता दिखा तब उसकी कमी की बात उठाई गई। साथ ही यह सवाल उठाया गया कि वैक्सीन सबको क्यों नहीं लगाई जा रही? हर बार प्रश्न पूछकर यही साबित करने की कोशिश की गई जैसे कोरोना के ख़िलाफ़ सरकार की लड़ाई बिना किसी प्लान या नीति के कर रही है और उसमें विशेषज्ञों का कोई हाथ नहीं है।

जब सब कुछ करके थक गए तो डॉक्टर मनमोहन सिंह को आगे रखकर पत्र लिखने की राजनीति पर उतर आए। मनमोहन सिंह पत्र लिखकर सरकार को पारदर्शिता की नसीहत दे रहे हैं। पारदर्शिता से डॉक्टर सिंह का रिश्ता टू जी और कोलगेट के समय से रहा है। वे कहीं से भी चलते हैं पारदर्शिता पर ज़रूर पहुँचते हैं। डॉक्टर हर्षवर्धन के जवाबी पत्र ने उनके सवालों और सुझावों की कलई उतार दी है। ऐसा पहली बार हुआ जब केंद्र सरकार ने जवाब देते हुए किसी तरह की कोई कोताही नहीं बरती।

अब जबकि पंद्रह दिनों ने कोरोना की दूसरी लहर चली है और आम भारतीय उससे पीड़ित हुआ है, ईकोसिस्टम और उसके सहायक विदेशी मीडिया में फिर उसी उल्लास की आँधी चल रही है जो एक वर्ष पूर्व चली थी। गिद्धों की पाँत फिर से वैसे ही बैठ गई है। फिर से हेडलाइन के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह के सहारे वक्तव्य दिए जा रहे हैं। फिर से श्मशान घाट की दो-ढाई वर्ष पुरानी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं। नेताओं द्वारा फ़र्ज़ी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। शायद फिर उसी आकाँक्षा के साथ कि भारत कोरोना के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई हार जाएगा।

‘कॉन्ग्रेसी’ साकेत गोखले ने पूर्व CM के खिलाफ दर्ज कराई शिकायत, शिवसेना नेता कहा- ‘फडणवीस के मुँह में डाल देता कोरोना’

महाराष्‍ट्र में कोराना संक्रमण का प्रकोप और सियासी पारा बढ़ता ही जा रहा है। इसी बीच, शिवसेना के विधायक संजय गायकवाड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्‍होंने कहा है कि अगर उन्हें कहीं कोरोना वायरस मिल जाता, तो वह उसे भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस के मुँह में डाल देते।

बताया जा रहा है कि रेमडेसिविर का उत्पादन करने वाली एक दवा कंपनी के शीर्ष अधिकारी से दवा की कथित जमाखोरी को लेकर मुंबई पुलिस ने पूछताछ की है। इसे लेकर ठाकरे सरकार राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साध रही है। वहीं कॉन्‍ग्रेस समर्थक और बेबाकी से फेक न्यूज फैलाने में माहिर साकेत गोखले ने आज राज्य के गृह मंत्री दिलीप वालसे पाटिल के साथ मिलकर देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ रेमडेसिविर स्टॉक की जमाखोरी को लेकर शिकायत दर्ज कराई है।

मीडिया से बातचीत में बुलडाना से विधायक गायकवाड से पूछा गया था कि कोराना महामारी के इस दौर में अगर फडणवीस मुख्यमंत्री होते तो वह क्या करते? इस पर गायकवाड भड़क गए और कहा , “राज्य के मंत्रियों का समर्थन करने के बजाय भाजपा नेता उनका मजाक बना रहे हैं। वे सोच रहे हैं कि किस तरह प्रदेश सरकार को विफल किया जा सकता है।” गायकवाड ने आगे कहा, “अगर मुझे कोरोना वायरस मिल जाता, तो मैं उसे देवेंद्र फडणवीस के मुँह में डाल देता।”

गायकवाड ने आरोप लगाया कि फडणवीस, भाजपा नेता प्रवीण दारेकर और चंद्रकांत पाटिल रेमडेसिविर इंजेक्शन के वितरण को लेकर तुच्छ राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र ने महाराष्ट्र की रेमडेसिविर निर्माता कंपनियों से कहा है कि वे राज्य में दवा की आपूर्ति नहीं करें। गायकवाड की टिप्पणी के विरोध में रविवार को बुलडाना में कई स्थानों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए और विधायक के पुतले जलाए।

बता दें कि साकेत गोखले ने बेबुनियाद ट्वीट्स की सीरीज में आरोप लगाया था कि भाजपा ने महाराष्ट्र में अपने पार्टी कार्यालय में 4.75 करोड़ रुपए की रेमडेसिविर (Remdesivir) की जमाखोरी की है। गोखले ने यह आरोप मुंबई पुलिस द्वारा शनिवार को दमन स्थित ब्रुक फार्मा कंपनी के रेमडेसिविर सप्लायर को हिरासत में लेने और सवाल पूछे जाने के बाद लगाया था। बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई ने कंपनी से रेमडेसिविर को महाराष्ट्र में लोगों को आपूर्ति करने का आदेश दिया था, लेकिन पुलिस ने कंपनी के डायरेक्टर को हिरासत में ले लिया था। हालाँकि, देवेंद्र फडणवीस द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद उसे रिहा कर दिया गया। 

गोखले ने सवाल किया था कि कैसे देवेंद्र फडणवीस जैसे ‘निजी व्यक्ति’ गुजरात से रेमडेसिविर का स्टॉक खरीद सकते हैं, जब बिक्री केवल सरकार को करने की अनुमति है? वहीं, देवेंद्र फडणवीस ने मीडिया से बात करते हुए कहा था, “चार दिन पहले, हमने ब्रुक फार्मा को महाराष्ट्र में रेमडेसिविर इंजेक्शन के स्टॉक की आपूर्ति करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि वे अनुमति नहीं दे सकते थे। मैंने केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया से बात की और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) से रेमडेसिविर सप्लाई के लिए अनुमति ली, जिसके बाद अप्रैल 17, 2021 लगभग नौ बजे, पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।”

क्या है मामला

रेमडेसिविर का उत्पादन करने वाली एक दवा कंपनी के शीर्ष अधिकारी से दवा की कथित जमाखोरी को लेकर मुंबई पुलिस द्वारा पूछताछ करने के मामले में महाराष्ट्र की ठाकरे सरकार पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साध रही है। प्रदेश की महाविकास अघाड़ी सरकार में मंत्री नवाब मलिक के उस बयान पर भी हंगामा बरपा हुआ है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि केंद्र की तरफ से कुछ रेमडेसिविर सप्लायर पर दवाब बनाया जा रहा है।

1 मई से अब 18 साल से अधिक उम्र वालों को भी लगेगी वैक्सीन: मोदी सरकार का तीसरे चरण में बड़ा फैसला

कोरोना वायरस के बिगड़ते हालात के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। देश में वैक्सीनेशन के तीसरे चरण के तहत सोमवार को सरकार ने 18 साल से अधिक आयु के सभी लोगों को टीकाकरण की इजाजत दे दी है। बता दें कि देश में 1 मई से वैक्सीनेशन के तीसरे चरण की शुरुआत हो रही है।

दरअसल, कोविड की सेकेंड वेव के कारण आश्चर्यजनक तरीके से संक्रमितों की संख्या में तेजी से उछाल आया है। इसके हालात को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज दवा कंपनियों और डॉक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चर्चा की थी। इसके बाद ही केंद्र सरकार ने यह आदेश जारी किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉक्टरों और कंपनियों के साथ चर्चा के दौरान कहा कि कोरोना महामारी तेजी से छोटे शहरों में भी अपने कदम फैला रही है। ऐसे में इन जगहों पर संसाधनों को उन्नत करने की कोशिश करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने लोगों को कोरोना पर फैलाई जा रही अफवाहों से भी बचने की सलाह दी है।

सरकार ने कहा है कि वैक्सीनेशन के पहले चरण में फ्रंट लाइन वर्कर्स और दूसरे चरण में 40 साल से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण हुआ था। अब तीसरे चरण में वैक्सीनेशन की पात्रता को और अधिक लचीला किया जा रहा है। केंद्र ने कहा है कि यह व्यवस्था ऐसे ही चलती रहेगी। बता दें कि भारत में विश्व का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है।

केंद्र ने कहा है कि कोरोना वैक्सीनेशन के तीसरे चरण में वैक्सीन निर्माता अपनी मासिक सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी की 50 फीसदी खुराक भारत सरकार को जारी करेंगे और शेष 50 फीसदी खुराक राज्य सरकार और खुले बाजार में बेच सकेंगे।

भारत सरकार अपने हिस्से से टीकों को बढ़ने पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को देगी। यह वैक्सीन सक्रिय मामलों की कोरोना के मामलों और प्रशासन के प्रदर्शन के आधार दी जाएगी। इसमें केंद्र सरकार वैक्सीन की बर्बादी को भी जोड़ेगा।

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि टीकाकरण के तीसरे चरण में भी भारत सरकार के टीकाकरण केंद्रों में पहले की तरह टीकाकरण जारी रहेगा, जो पहले से लोगों को नि: शुल्क दिया जाता रहा है।