Home Blog Page 3867

यूपी में दूसरी बार बिना मास्क धरे गए तो ₹10,000 जुर्माने के साथ फोटो भी होगी सार्वजनिक, थूकने पर 500 का फटका

कोरोना वायरस का संक्रमण यूपी में बेतहाशा तरीके से बढ़ रहा है। ऐसे में यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सभी से मास्क का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करने और उल्लंघन करने वाले लोगों पर जुर्माना लगाने का आदेश दिया है। अब योगी सरकार ने एक और कड़ा कदम उठाया है। प्रदेश में पब्लिक प्लेस पर थूकने वालों के खिलाफ सख्ती करने का आदेश जारी किया गया है। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति पब्लिक प्लेस में थूकते हुए पकड़ा गया तो उस पर 500 रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।

उत्तर प्रदेश सरकार ने कोरोना महामारी अधिनियम 2020 में आठवाँ संशोधन किया है। संशोधन के मुताबिक घर से बाहर बिना मास्क या गमछा के निकलने पर पहली बार पकड़े जाने पर एक हज़ार रुपए और दोबारा पकड़े जाने पर दस हज़ार रुपए जुर्माना का प्रावधान किया गया है। मंगलवार (अप्रैल 20, 2021) को जारी नए आदेश में अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अमित मोहन प्रसाद ने यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति के सार्वजनिक स्थलों पर अथवा घर से बाहर थूकने पर उसे 500 रुपए के जुर्माना से दंडित किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अभी हाल में मास्क न पहनने पर पहली बार पकड़े जाने पर एक हज़ार रुपए और दोबारा पकड़े जाने पर दस गुना ज़्यादा जुर्माना लगाने का निर्देश दिया था।

अब योगी सरकार ने मास्क न लगाने वालों पर और कड़ाई करते हुए दूसरी बार पकड़े जाने पर फोटो भी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। यानी 10 हजार रुपए जुर्माना भरने वालों के फोटो भी सार्वजनिक कर दिए जाएँगे। संक्रमण फैलने से रोकने के लिये मास्क बेहद जरूरी है। लगातार लोगों को इसको लेकर जागरूक किया जा रहा है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने कंटेनमेंट जोन के प्रावधानों को भी सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है।

पुलिस ने लगातार इस पर एक्शन भी शुरू कर दिया है। देवरिया में ऐसे ही एक शख्स द्वारा दो दिन में मास्क न पहने के नियम का दूसरी बार उल्लघन करने पर 10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया।

इसके अलावा प्रदेश में कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण की वजह से योगी सरकार ने बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में शिक्षकों, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को घर से काम (Work from home) की मंजूरी प्रदान की है।

बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव प्रताप सिंह बघेल ने इस संबंध में जारी आदेश में कहा कि जिला प्रशासन या सक्षम अधिकारी की ओर से शिक्षकों, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को दिए गए प्रशासकीय कार्य और जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उपस्थित होना होगा।

प्रदेश के बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री डॉ सतीश चन्द्र द्विवेदी ने कहा कोरोना की वजह से शिक्षण कार्य पहले ही बंद कर दिया गया था लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों, शिक्षामित्रों तथा अनुदेशकों को भी वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दी जाएगी। लेकिन पंचायत चुनाव और अन्य आवश्यक कार्यों में दिए जाने वाले कामों को करना होगा।

गौरतलब है कि इलाहाबाद कोर्ट ने 19 अप्रैल को यूपी के पाँच शहरों- प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर नगर, और गोरखपुर में 26 अप्रैल तक कड़े प्रतिबंधों के साथ लॉकडाउन लगाने की निर्देश दिए थे। हालाँकि योगी सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और शीर्ष अदालत ने इस आदेश पर रोक लगा दी। इस बीच यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य में संपूर्ण लॉकाडाउन न लगाने की वजह बताई है।

योगी आदित्यनाथ ने कहा, “प्रत्येक प्रदेशवासी के जीवन और जीविका की सुरक्षा के लिए हम प्रतिबद्ध हैं। लॉकडाउन के कारण किसी के भी सामने आजीविका का संकट उत्पन्न न हो इसीलिए वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर हमने ‘कोरोना कर्फ्यू’ को पूरी सख्ती से लागू करने का निर्णय लिया है। आप सभी का सहयोग अपेक्षित है।”

उन्होंने कहा, ”कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण हेतु यूपी सरकार लगातार प्रभावी कदम उठा रही है। सभी जिलों में कोविड डेडिकेटेड अस्पतालों में बढ़ोत्तरी, आइसोलेशन व ICU बेड, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर सहित सभी चिकित्सकीय जरूरतों की उपलब्धता के साथ ही अतिरिक्त चिकित्सकों/पैरा मेडिकल स्टाफ की भी तैनाती की जा रही है।”

जिग्नेश मेवाणी ने हॉस्पिटल के बेड पर बैठकर गुजरात की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठाया सवाल, लोगों ने किया जमकर ट्रोल

गुजरात के वडगाम से निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को सोमवार (19 अप्रैल, 2021) को अस्पताल के बेड पर जानबूझकर कब्जा करने और कोरोना संक्रमित मरीजों की अनदेखी करने पर नेटिजन्स ने सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल किया है। दलित नेता मेवाणी ने शुक्रवार को बताया कि उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इसी बीच सोमवार को ट्वीट कर मेवाणी ने गुजरात की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए थे।

उन्होंने ट्वीट किया, “मेरे निर्वाचन क्षेत्र वडगाम के लोगों के लिए राहत प्रयासों में सहयोग करना, जो गुजरात की दयनीय स्वास्थ्य सेवाओं से जूझ रहे हैं। संपूर्ण राज्य शवों के ढेर के नीचे दब रहा है। सच कहूँ तो मैं असहाय महसूस करता हूँ। मैं अपने डिस्चार्ज होने का इंतजार नहीं कर सकता, इसलिए मैं वडगाम में अपने लोगों के साथ रह सकता हूँ।”

जिग्नेश मेवाणी के ट्वीट का स्क्रीनशाॅट।

उनका ये ट्वीट नेटिजन्स को पसंद नहीं आया। उन्होंने मेवाणी को गुजरात की स्वास्थ्य व्यवस्था की आलोचना करने और उनकी दोहरी मानसिकता पर निशाना साधा। उन्होंने सबको बताया कि दोगली बातें करने वाले का इलाज एक शानदार निजी अस्पताल में चल रहा है।

ट्विटर पर एक यूजर (@ bharatendu2206) ने लिखा, “एक अस्पताल में आराम से बैठकर ‘हेल्थकेयर सिस्टम की खिल्ली उड़ा रहा है और मोबाइल फोन से अपने निर्वाचन क्षेत्र को चला रहा, वाह क्या बात है।”

एक अन्य यूजर भावेश लोढ़ा ने ट्वीट किया, “खुद वीआईपी बेड रोक के बैठा है और दूसरों को ज्ञान दे रहा है।”

एक और यूजर (@ugwande2) ने लिखा कि जिग्नेश मेवाणी जैसे लोगों की वजह से जरूरतमंद लोगों को बेड नहीं मिलता है।

एक अभि पटेल नाम के यूजर ने जिग्नेश मेवाणी पर तंज कसते हुए कहा, “आप ठीक तो लग रहे हैं, लेकिन फिर भी अस्पताल के बेड पर कब्जा कर लिया। अच्छा फोटो सेशन है, आप बिल्कुल ठीक लग रहे हैं..क्यों न अपना बेड जरूरतमंद को दें दें?”

मेवाणी ने इससे पहले एक ट्वीट को रीट्वीट करते हुए गुजरात के सरकारी अस्पतालों में कोरोना मरीजों की क्या दशा है ये बताने की कोशिश की थी।

हालाँकि, इससे पहले उन्होंने गुजरात के लोगों की हरसंभव मदद करने की कसम खाई थी। 16 अप्रैल के एक ट्वीट में, उन्होंने लिखा, “कोरोना वायरस से जैसे ही उबरता हूँ, मैं गुजरात में लोगों को जरूरत की हर चीज मुहैया कराने का प्रयास करूँगा। कृपया किसी भी चीज की आवश्यकता होने पर मुझे टैग करें। मैं पूरी कोशिश करूँगा कि जो भी उपलब्ध हो, वह आप तक पहुँचा सकूँ।”

जबकि कई नेटिज़न्स ने कहा है कि जिग्नेश मेवाणी का गुजरात के अहमदाबाद के केडी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में इलाज चल रहा है। लेकिन ऑपइंडिया इन दावों की पुष्टि नहीं करता है।

वैक्सीनेशन नीति में बदलाव के तहत ₹4,567 करोड़ का एडवांस: SII के CEO अदार पूनावाला ने PM मोदी का किया शुक्रिया

कोरोना वैक्सीन के उत्पादन की गति में रफ्तार देने के मोदी सरकार के प्रयासों की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) के सीईओ ने जमकर तारीफ की है। SII के सीईओ अदार पूनावाला ने मंगलवार (अप्रैल 20, 2021) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का धन्यवाद किया। उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, “भारत में कोविड वैक्सीन के प्रोडक्शन के लिए ‘निर्णायक नीतिगत परिवर्तन’ और ‘तीव्र वित्तीय सहायता’ के लिए मैं वैक्सीन इंडस्ट्री की ओर से पीएम नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का शुक्रिया करता हूँ।”

पूनावाला का ये ट्वीट वित्त मंत्रालय की उस घोषणा के बाद आया जिसमें केंद्र द्वारा सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और हैदराबाद की भारत बायोटेक को वैक्सीन प्रोडक्शन के लिए ₹4,567 करोड़ देने की मंजूरी दी गई है। यह राशि दोनों कंपनियों को एडवांस में दिया गया है।

Covishield और Covaxin दोनों ही भारत के टीकाकरण अभियान के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। बता दें कि सरकार ने वैक्सीन के लिए ये फंड ऐसे समय में दिया है जब एक मई से 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोगों को कोरोना की वैक्सीन लगाए जाने की घोषणा कर दी गई है। अब तक पहले चरण के तहत फ्रंटलाइन वर्कर्स और 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन देने की इजाजत दी गई थी। उसके बाद दूसरे चरण में 45 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाई जा रही है।

पिछले हफ्ते, पूनावाला ने एक ट्वीट के माध्यम से, संयुक्त राज्य अमेरिका से कोविड-19 से लड़ने के लिए टीकों के उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल से निर्यात प्रतिबंध हटाने का अनुरोध किया था

वित्त मंत्री सीतारमण ने SII और BBL को 4567 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की

टीकाकरण के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्रालय ने सोमवार (अप्रैल 19, 2021) को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) और भारत बायोटेक (BBL) को 4,567.50 करोड़ रुपए की मंजूरी दी। SII को 3,000 करोड़ रुपए प्रदान किए गए हैं, जबकि BBL को भारत में टीकाकरण उत्पादन को बढ़ाने के लिए 1567.50 रुपए की मंजूरी दी गई है।

18 साल से ऊपर के सभी के लिए टीकाकरण

19 अप्रैल को, भारत सरकार ने कोविड-19 टीकाकरण की चरण 3 रणनीति की घोषणा की जिसमें 18 वर्ष से अधिक आयु का भारत का प्रत्येक नागरिक टीका के लिए पात्र होगा। सरकार ने कहा कि टीकाकरण कार्यक्रम के चरण-3 में, राष्ट्रीय वैक्सीन रणनीति का उद्देश्य उदारीकृत वैक्सीन मूल्य निर्धारण और वैक्सीन कवरेज को बढ़ाना है। देश भर में इसे बढ़ाने के लिए टीके के उत्पादन और इसकी उपलब्धता की आवश्यकता होगी।

बांग्लादेश में PM मोदी के दौरे के विरोध में हिंसा भड़काने वाले कट्टरपंथी समूह का नेता मदरसे से गिरफ्तार

बांग्लादेश की ढाका पुलिस ने कट्टरपंथी समूह हिफाजत-ए इस्लाम के नेता ममुनुल हक को गिरफ्तार किया है। हक पर पिछले साल दंगे भड़काने, हत्या की कोशिश और तोड़फोड़ जैसे मामलों में केस दर्ज हुआ था। रविवार (अप्रैल 18, 2021) को ढाका पुलिस ने उसे शहर के मोहम्मदपुर इलाके में बने एक मदरसे से पकड़ा।

ममुनुल हक, हिफाजत-ए-इस्लाम का ज्वाइंट सेक्रेट्री है। इसी संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे पर देश में दंगे भड़काने और जगह-जगह हिंसा करने का काम किया था। पड़ताल में पता चला था कि घटना में कई हिफाजत-ए-इस्लाम के नेता शामिल थे। सबने मिल कर पुलिस पर सुनियोजित ढंग से हमले किए, जिसके कारण बाद में 300 से ज्यादा लोग हिंसा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार हुए।

ममुनुल हक को फिलहाल कोर्ट में पेश करने के बाद 7 दिन की रिमांड में भेजा गया है। वहीं समूह के सरगना जुनैद बाबूनगरी ने वीडियो मैसेज जारी कर सभी नेताओं की रिहाई की माँग उठाई है। इनमें ममुनुल हक के साथ पार्टी के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेट्री अजीजुल हक इस्लामाबादी को रिहा करने की माँग भी है।

बता दें कि बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना के आमंत्रण पर 26 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी 2 दिन के दौरे पर बांग्लादेश गए थे।  उनके वहाँ जाते ही कट्टरपंथियों ने हर जगह हंगामा मचा दिया। पुलिस के साथ झड़प में और पुलिसकर्मियों पर हमले में इस समूह के 17 लोग मारे गए। 

हिफाजत-ए-इस्लाम

उल्लेखनीय है कि साल 2010 में इस कट्टरपंथी इस्लामी संगठन को बनाया गया था। इसे बनाने में बांग्लादेश के मदरसों के उलेमा और छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस संगठन पर आरोप लगते रहे हैं कि इनका संबंध जमात-ए-इस्लामी और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों से हैं। हालाँकि, हिफाजत इन आरोपों को खारिज करता रहा है।

इसी समूह का ज्वाइंट सेक्रेट्री ममुनुल हक अपने भड़काऊ भाषणों के कारण चर्चा में रहता है। कट्टरपंथियों के बीच वह काफी लोकप्रिय है। हक और उसके साथियों ने ही हाल में बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ने वाले शेख मुजीबुर रहमान की मूर्ति बनाए जाने का विरोध करते हुए इसे गैर इस्लामिक करार दिया था।

एक युवक ने जब ममुनुल हक की आलोचना करते हुए वीडियो अपलोड किया था तो हिफाजत-ए-इस्लामी ने सुनामगंज में 80 हिंदुओं के घरों को आग में झोंक दिया था। इसके कारण कई हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर जाने पर मजबूर होना पड़ा था।

‘ऐसे गवारों से उम्मीद नहीं’: कोरोना से रिकवर होते ही रणबीर-आलिया ने भरी मालदीव के लिए उड़ान, लोगों ने किया जमकर ट्रोल

1 महीने पहले कोरोना पॉजिटिव पाई गई बॉलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट कल अपने ब्वॉयफ्रेंड रणबीर कपूर के साथ मालदीव की यात्रा पर निकलीं। सोमवार सुबह दोनों कलाकारों को मुंबई एयरपोर्ट पर स्पॉट किया गया

कोरोना से रिकवर होने के बाद रणबीर और आलिया की ये पहली फोटो साथ में है। कोरोनाकाल में इस फोटो को देखने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स के अलग-अलग रिएक्शन हैं। कुछ यूजर्स इन्हें दुत्कार रहे हैं तो कुछ इनके हीरो हिरोइन होने पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

एक यूजर ने दोनों की तस्वीर देखते हुए कहा, “भारत में कोरोना संक्रमण बढ़ रहा है, जिसके लिए आलिया भट्ट और रणबीर कपूर जैसे लोग आम आदमी को संक्रमण बढ़ाने का जिम्मेदार ठहराएँगे। ये मालदीव जा रहे हैं और दूसरों को सलाह देंगे कि घर में रहो।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “गरीबों की मदद करने या जागरुकता फैलाने के बजाय आप लोग छुट्टियों पर जा रहे हो। घूमने जाना भी जरूरी सेवाओं में आता है क्या।”

एक यूजर ने तो इन दोनों कलाकारों को लेकर कहा, “हम महामारी झेल रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसे गवारों से कोई मदद की उम्मीद नहीं है।”

अलका अरोड़ा नाराजगी जाहिर करते हुए कहती हैं कि पहले तो अब मालदीव में लॉकडाउन लगना चाहिए और इंडिया के बॉर्डर सील होने चाहिए वरना ऐसे लोगों की वजह से आमजन को परेशानी झेलनी होगी।

एक यूजर पूछता है कि क्या लॉकडाउन सिर्फ़ हम जैसे नॉर्मल लोगों के लिए है। ये लोग तो अभी कोरोना से रिकवर हुए हैं और अब मालदीव जा रहे हैं। इन्हें शर्म आनी चाहिए। यहाँ लोग कोरोना से मर रहे हैं और इन्हें मस्ती करने की पड़ी है। शर्मनाक। 

चंद्रिमा चटर्जी कहती हैं कि मालदीव इनके लिए मामा का घर बन गया है। लोग यहाँ संसाधनों की कमी से मर रहे हैं और इन्हें अपने मजे की पड़ी है। ये आम जन के कारण ही इन्हें इतनी सुविधाएँ मिलती हैं, लेकिन ये दिखावे के लिए भी संवेदना नहीं दिखा पाते।

बता दें कि आलिया भट्ट और रणबीर कपूर काफी समय से एक दूसरे को डेट कर रहे हैं। अयान मुखर्जी द्वारा निर्देशित ब्रह्मास्त्र में दोनों एक साथ नजर आएँगे। इनके अलावा फिल्म में अमिताभ बच्चन, नागार्जुन, मौनी रॉय और अन्य भी होंगे। ब्रह्मास्त्र के अलावा आलिया संजय लीला भंसारी की फिल्म गंगूबाई काठवाड़ी में दिखेंगी जबकि रणबीर शमशेर में नजर आएँगे।

हाँ, हम मंदिर के लिए लड़े… क्योंकि वहाँ लाउडस्पीकर से ऐलान कर भीड़ नहीं बुलाई जाती, पेट्रोल बम नहीं बाँधे जाते

बीते दिनों इस देश के कुख्यात हिंदू-विरोधी शहरी नक्सलों ने अचानक से एक गाना शुरू किया, ‘तुम अस्पतालों के लिए लड़े ही कब, मंदिरों के लिए लड़े। अस्पताल के लिए लड़ते, तो ये दिन ना आते।’ कोरोना की दूसरी लहर मौत बनकर आई है। ऐसे समय भी बुद्धिपशाच गिद्ध अपनी खून की प्यास दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं। दरअसल, वामपंथ एक ऐसा मवाद है, जो अराजकता रूपी घाव से ही रिसता है। लुटियंस दिल्ली के इनके प्रतिनिधि हों या बिहार के दरभंगा जिले के कलुआही थाने का कोई सेनानी, आम जन की व्यथा-विपदा को किस तरह भुनाकर ये उसे अराजकता में बदलेंगे, यही इनके सोच का एकमात्र ध्येय है, पाथेय है।

जनता को सकारात्मक सोच की तरफ वह मोड़ता है, जिसका खुद का दर्शन वैसा हो। जिनका दर्शन ही बंदूक और खून हो, जिन्होंने करोड़ों की हत्या की हो, उन वामपंथियों के किसी भी प्रारूप (वर्जन) से आप उम्मीद ही क्या करेंगे? पिछले साल भी उन्होंने यही किया था, इस साल भी यही कर रहे हैं। आप दिल्ली में उनके सर्वोच्च अराजक प्रतिनिधि श्री केजरीवाल को झूठी अपील करते हुए बहक भले जाएँ, लेकिन यह भी याद रखिए कि पिछले साल यही केजरीवाल थे, जिन्होंने लाइट कटवाकर और दिल्ली की बस्तियों में झूठी खबर फैलाकर आनंद विहार की सीमा पर मजदूरों-प्रवासियों की भारी भीड़ को इकट्ठा करवाया था।

अस्तु, बात मंदिरों की। सबसे पहले तो इन बुद्धिपिशाचों को यही पता होना चाहिए कि अभी हिंदू मंदिरों के लिए लड़ा कहाँ है। लड़ता तो वह 30 हजार मंदिरों के लिए लड़ता, जिन्हें रेगिस्तानी बर्बरों ने भूमिसात् किया, लूटा और लोगों को बलात् मजहब में लाए। हिंदू तो केवल एक मंदिर के लिए अब तक लड़ा है, जिसके लिए सेकुलर बुद्धिपिशाचों के अंग-विशेष में दर्द हो रहा है।

और, हिंदू लड़ता है, मंदिरों के लिए। मंदिर उसके लिए केवल पूजा स्थल नहीं रहे हैं। वह पूरे सामाजिक ताने-बाने का अनुपम उदाहरण रहे हैं। मंदिरों से ही गुरुकुल चलता रहा है। यानी, शिक्षा की व्यवस्था भी की जाती रही है। मंदिर के सामने के मंच या जगह पर ही सामाजिक सत्कार्य होते रहे हैं। वहीं अखाड़ा भी रहा है। वहीं औषधालय भी रहा है। अब भी कई जगहों पर मंदिर के ठीक नीचे आपको ये चलते मिल जाएँगे। क्या बुद्धिपिशाचों ने गौर किया है कि हमारे अधिकांश मंदिर जलाशयों के समीप क्यों होते थे, क्योंकि मंदिर एक पूरी सभ्यता थे, वह हमारी संस्कृति-हमारे आचार का एक हिस्सा थे।

हिंदू मंदिरों के लिए लड़ा क्योंकि उसे पता है कि आजतक किसी मंदिर की लाउडस्पीकर से बुलाकर भीड़ द्वारा किसी की हत्या नहीं करवाई गई और न ही करवायी जाएगी। वह मंदिरों के लिए लड़ता है, क्योंकि उसे पता है कि मंदिरों में हथियार नहीं छुपाए जाते, वहाँ जान बचाई जाती है। जान लेने के षडयंत्र नहीं किए जाते। पेट्रोल-बम नहीं बाँधे जाते। हिंदू मंदिरों के लिए लड़ा, क्योंकि उसे पता है कि सरकार कोई भी हो, वह हमारे समृद्ध मंदिरों की कमाई लेकर अपना काम चलाती है, क्योंकि उसे पता है कि तिरुपति देवस्थानम् हो या पटना का महावीर मंदिर, सैकड़ों बेड और अस्पताल का जिम्मा ये मंदिर ही उठा लेते हैं।

पटना का महावीर कैंसर संस्थान हो या तिरुपति के ट्रस्ट से चलनेवाले अस्पताल और शिक्षालय, हिंदुओं के कहीं किसी को सफाई देने की आवश्यकता नहीं है। दिक्कत बस एक है कि हिंदू मंदिरों के लिए लड़ा ही नहीं। अगर वह लड़ा होता, तो न तो भारत की सभ्यता इतनी रुग्ण हुई होती, न ही कीड़े-मकोड़ों की तरह बजबजाती भीड़ होती, बल्कि सुसंस्कृत, आचारनिष्ठ य़ुवाओं-युवतियों की आकर्षक छवियाँ होती।

वैसे, नराधम नरपिशाचों को शायद यह भी पता नहीं हो कि कुछ तीन-चार सौ साल पहले तक बाबा तुलसीदास भी अपने ‘रामचरितमानस’ में जब ‘मंदिर’ शब्द का प्रयोग करते हैं, तो उसका अर्थ ‘घर’ होता है- ‘मंदिर-मंदिर प्रति कर सोधा..’, आज के मंदिर के अर्थ में तो देवालय, देवस्थान आदि का प्रयोग होता था।

आज भी गुजरात के स्वामीनारायण मंदिर से लेकर दर्जनों मंदिरों ने दिखाया है कि किस तरह मंदिर बीमारों की देखभाल कर रहे हैं, कर सकते हैं और करेंगे। इन मंदिरों ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं, वहाँ टेंपररी हॉस्पिटल बना दिए हैं और संन्यासी ही मरीजों की सेवा कर रहे हैं।

हिंदुओं को तीन बातें याद रखनी चाहिए, फिलहाल और जो भी ये मंदिर-अस्पताल की घटिया बाइनरी दे, उसके मुँह पर मार फेंकनी चाहिए। पहली, हिंदुओं को किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है, लोग जाकर देखें कि हज हाउस, मदरसे, चर्च और इस तरह की इमारतों ने, जिनमें से बहुतेरी अवैध कब्जे से बनी हैं, वे क्या कर रहे हैं? दूसरे, हिंदुओं के मंदिर हमेशा से ही आपदा-विपदा में काम करते रहे हैं और हमें किसी से कुछ भी न जानने की जरूरत है, न समझने की। तीसरी और अंतिम बात, जो मूर्ख और झूठा इस तरह की बात कहता है, उसे जानना चाहिए कि भारत का पहला एम्स भी राजकुमारी अमृत कौर ने बनवाया था, किसी दुर्घटनावश हिंदू प्रधानमंत्री ने नहीं। दूसरा एम्स भी अटल बिहारी वाजपेयी के राजकाज में शुरू हुआ था। अभी जो सरकार है, उसके समय में भी कई एम्स की स्वीकृति हो चुकी है और वे विभिन्न चरणों में चल रहे हैं।

हिंदुओं को गर्वित माथे से बताने की जरूरत है कि हाँ, हम मंदिर के लिए लड़े और गलती ये है कि हम सभी मंदिरों के लिए नहीं लड़ रहे हैं।

कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए दुबई जा रहे भारत के कई रईस, ₹55 लाख तक कर रहे हैं खर्च: भारत में है FREE

भारत में अब तक 12.71 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाई जा चुकी है। खास बात ये है कि इसके लिए जनता को एक रुपया भी नहीं देना पड़ा है और इसका पूरा खर्च मोदी सरकार ही वहन कर रही है। लेकिन, क्या आपको पता है कि भारत के कुछ ऐसे रईस भी हैं जो कोरोना वैक्सीन लगवाने के लिए दुबई जा रहे हैं और इसके लिए 55 लाख रुपए तक खर्च कर रहे हैं। इसके लिए वो चार्टर्ड फ्लाइट्स तक बुक करा रहे हैं।

UAE में एस्ट्राजेनेका, साइनोफार्म और फाइजर जैसे वैक्सीन उपलब्ध हैं, लेकिन लोग फाइजर को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। UAE में 40 वर्ष की उम्र से ज्यादा के लोगों को मुफ्त में वैक्सीन लगाई जा रही है, जबकि भारत में 1 मई से 18 वर्ष से ऊपर के सभी लोग भी इसके लिए योग्य होंगे। भारत के कुछ अमीर लोगों के पास दुबई का रेजिडेंट वीजा है और वो इसका फायदा उठा रहे हैं। अप्रैल में ये सिलसिला काफी बढ़ा।

इसका कारण ये है कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर आई और स्थिति काफी बिगड़ने लगी। मार्च में दुबई में रेजिडेंट वीजाधारकों को वैक्सीन लगाने की अनुमति दी गई, जिसके बाद से ही लोगों का वहाँ जाना शुरू हो गया। दुबई में वैक्सीन लगा चुके कुछ लोगों और चार्टर ऑपरेटर्स का कहना है कि कुछ लोग वैक्सीन की दो डोज लगाने के लिए दुबई में ही रह रहे हैं जबकि कुछ लोग वहाँ के दो चक्कर लगा रहे हैं।

दोनों ही स्थितियों में काफी रुपए खर्च हो रहे हैं। फाइजर की वैक्सीन के दो डोज़ों के लिए 3 सप्ताह का अंतराल रखा गया है। ऑपरेटर की प्राइस, सिटी ऑफ ओरिजिन, दुबई में रहने की अवधि और नंबर ऑफ पैसेंजर्स पर निर्भर दुबई आने-जाने का खर्च 55 लाख या इससे ऊपर भी हो सकता है। जिन भारतीयों ने दुबई में कारोबार रजिस्टर करा रखा है, उन्हें वहाँ रेजिडेंट वीजा मिला है। ET की खबर के अनुसार, एक कारोबारी अपनी पत्नी सहित 20 दिन के लिए दुबई में रहे, ताकि वैक्सीन लगवा सकें।

दिल्ली-महाराष्ट्र में लॉकडाउन: राहुल गाँधी ने एक बार फिर राज्यों की नाकामी के लिए मोदी सरकार को ठहराया जिम्मेदार

देश भर में कोविड-19 के मामले एक बार फिर तेजी से बढ़ रहे हैं। कोरोनो वायरस प्रकोप की दूसरी लहर से सबसे अधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र और दिल्ली हैं। कोरोना की बेकाबू रफ्तार पर काबू पाने के लिए महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की है।

यहाँ अचानक लॉकडाउन लगने से अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया है। इसकी वजह से प्रवासी मजदूर परेशान हो रहे हैं। उनकी भीड़ रेलवे और बस स्टैंड पर देखी जा सकती है। यही स्थिति पिछले साल भी देखने को मिली जब यहाँ एकाएक लॉकडाउन की घोषणा की गई थी। उस दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने पलायन किया था, जिससे काफी लोग कोरोना संक्रमित हुए थे।

दिल्ली से प्रवासी मजदूरों का पलायन जारी है, इसके बावजूद केजरीवाल सरकार इस मुद्दे पर अडिग है। इसी तरह, महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी सरकार ने इन प्रवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

जहाँ एक ओर दिल्ली में केजरीवाल और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार ने बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में आकर लॉकडाउन की घोषणा कर प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वहीं दूसरी ओर ठाकरे के सहयोगी और कॉन्ग्रेस सुप्रीमो राहुल गाँधी ने मोदी सरकार से प्रवासी मजदूरों के बैंक खातों में रुपए डालने को कहा है।

प्रवासी मजदूरों के पलायन पर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा, “प्रवासी एक बार फिर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि उनके बैंक खातों में रुपए डाले। लेकिन कोरोना फैलाने के लिए जनता को दोष देने वाली सरकार क्या ऐसा जन सहायक कदम उठाएगी?”

दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार द्वारा अचानक लॉकडाउन लगाने के फैसले के बाद गाँधी के इस ट्वीट ने प्रवासी श्रमिकों को बेहद निराश किया है, इसके चलते वे और इन राज्यों को छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

हालाँकि, यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने यहाँ काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की जरूरतों का ध्यान रखें। इससे पहले भी राहुल गाँधी ने 2020 में महामारी की पहली लहर के दौरान प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे इनकी मदद करने को कहा था। उन्होंने मोदी सरकार पर बिना सोचे समझे लॉकडाउन लगाने का आरोप लगाया था।

बेहद हैरानी तो तब हुई जब दिल्ली सरकार द्वारा मनमाने तरीके से लगाए गए लॉकडाउन को लेकर गाँधी ने इस तरह की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी। इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है कि महाराष्ट्र में महाविकास आघाडी सरकार, जिसका वह एक अभिन्न हिस्सा हैं, उस पर भी वे कुछ नहीं बोले।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में कोरोना की दूसरी लहर से पैदा हुए संकट का फायदा उठाकर कमाई करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों ने महाराष्ट्र पुलिस पर वसूली का आरोप लगाया है। राज्य में 15 दिनों का कर्फ्यू लगाए जाने के कारण मजदूर अपने घरों को लौटने के लिए मजबूर हैं।

एक टैक्सी ड्राइवर ने बताया, “कर्फ्यू लगने के बाद आजीविका की समस्या उत्पन्न हो गई है। हम अपने घरों की ओर लौट रहे हैं। पिछले साल भी हम लॉकडाउन के दौरान अपने घरों को लौट गए थे। लेकिन स्थिति सुधरने के बाद हम फिर से वापस आ गए। पिछले साल की तरह इस साल भी पुलिस हमसे जबरन वसूली कर रही है।”  

इसी तरह महाराष्ट्र से वापस लौट रहे एक प्रवासी मजदूर सनाउल्लाह खान ने बताया,  “हम पुणे से आ रहे हैं। एक बस ने हमसे 2500-3000 रुपए लिए। महाराष्ट्र बॉर्डर पर हमें बस से उतारकर दो गाड़ियों में बैठने को कहा गया। बॉर्डर चेक प्वाइंट पर पुलिस और परिवहन विभाग के लोगों ने भी हमें अनदेखा कर दिया।”

वहीं, आम आदमी पार्टी (AAP) की पोल आम लोगों की नजर में सोमवार (19 अप्रैल 2021) की शाम होते-होते खुल गई। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन का ऐलान करते हुए कहा था कि वे हाथ जोड़कर प्रवासी मजदूरों से विनती करते हैं कि ये एक छोटा सा लॉकडाउन है, जो मात्र 6 दिन ही चलेगा, इसलिए वे दिल्ली को छोड़ कर कहीं और न जाएँ।

लेकिन उनके इस ऐलान के साथ ही पहले दिल्ली के ठेकों पर भीड़ उमड़ी और फिर उसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से घर लौटने की मजदूरों के बीच होड़ शुरू हो गई। ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला था।

‘मजदूरों की 2020 जैसी न हो दुर्दशा’: हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को चेताया, CM केजरीवाल की पत्नी को कोरोना

दिल्ली हाई कोर्ट ने माना है कि 2020 के लॉकडाउन के दौरान आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार प्रवासी और दिहाड़ी मजदूरों की मदद करने में नाकाम रही थी। इस बार लॉकडाउन में इनकी पिछले साल जैसी दुर्दशा न हो यह सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिल्ली सरकार को दिया है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पत्नी सुनीता के कोरोना संक्रमित होने के बाद खुद को क्वारंटाइन कर लिया है।

सुनीता केजरीवाल ने कोरोना के लक्षण दिखने के बाद जाँच कराई थी। रिपोर्ट में वह पॉजिटिव पाई गईं हैं। इसके बाद उन्होंने खुद को होम आइसोलेट कर लिया है। दिल्ली में बढ़ते संक्रमण को देखते हुए केजरीवाल ने 19 अप्रैल की रात से 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन की घोषणा की थी। इसके बाद प्रवासी मजदूरों के बीच अपने घर लौटने की पिछले साल की तरह ही होड़ देखने को मिली।

दिल्ली से प्रवासी श्रमिकों के बड़े पैमाने पर जारी पलायन को लेकर हाई कोर्ट ने भी केजरीवाल सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। उच्च न्यायालय ने रकार से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि प्रवासी श्रमिकों और दिहाड़ी मजदूरों को उन परेशानियों का सामना न करना पड़े, जिससे वह 2020 में लॉकडाउन के दौरान गुजरे थे। 

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली हाई कोर्ट ने राकेश मल्होत्रा बनाम GNCTD और अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियाँ की। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 2020 के लॉकडाउन के दौरान प्रवासियों और दिहाड़ी मजदूरों की दुर्दशा की याद दिलाते हुए कहा कि इस साल पिछले साल की तहत प्रवासियों और दिहाड़ी मजदूरों की दुर्दशा न हो इसके लिए राज्य सरकार को पर्याप्त कदम उठाना चाहिए।

जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की खंडपीठ ने कहा, “साल 2020 में लगाए गए लॉकडाउन से एक बात किसी को भी नहीं भूलनी चाहिए कि सबसे ज्यादा दुर्दशा जीएनसीटीडी में निवास करने वाले और काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों और प्रवासी श्रमिकों का हुआ था। हम समाचार देख रहे हैं। समाचार रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली क्षेत्र में बढ़ते COVID-19 के मामलों के कारण प्रवासी श्रमिक पहले ही अपने घर जाना शुरू कर चुके हैं। राज्य सरकार ने 26.04.2021 तक कर्फ्यू लगाने का आदेश दिया है। इससे दिहाड़ी मजदूर जो रोज की कमाई से अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं उनकी जिंदगी फिर से तबाह होती नजर आ रही है। एक बार फिर भोजन, कपड़े और दवाई जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।”

पीठ ने कहा कि पिछले साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान लोगों की मदद के लिए सिविल सोसायटी आगे आई थी और उनके द्वारा जरूरतमंद लोगों को भोजन और अन्य आवश्यकता की चीजें उपलब्ध कराया गया था। दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए एडवोकेट राहुल मेहरा ने कहा कि राज्य ने इस संबंध में पर्याप्त कदम उठाए हैं। इस पर पीठ ने कहा कि हम अपने अनुभव से यह कह सकते हैं कि राज्य पर्याप्त कदम उठाने में विफल रहा है। 

कोर्ट ने कहा कि गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्‍ली (जीएनसीटीडी) हजारों करोड़ रुपए का उपयोग करने में विफल रहा है जो वे भवन एवं अन्य संनिर्माण श्रमिक (रोजगार एवं सेवा शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1996 के तहत गठित बोर्ड के पास उपलब्ध है। इसे निर्माण श्रमिकों के लिए भवन सेस के रूप में इकट्ठा किया गया है।

कोर्ट ने आदेश दिया, “हम गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली (जीएनसीटीडी) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं कि उक्त बोर्ड अपने संबंधित कार्य स्थलों पर जरूरतमंद निर्माण श्रमिकों को भोजन, दवाइयाँ और अन्य आवश्यकता की चीजें उपलब्ध कराएँ। कॉन्ट्रैक्टर के माध्यम से सरकारी और एमसीडी स्कूलों में स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराना चाहिए। दिल्ली के मुख्य सचिव को बिना किसी देरी के इस आदेश को लागू करना होगा। इसके साथ ही जीएनसीटीडी को एक हलफनामा दायर करना होगा, जिसमें यह बताना होगा कि दिए गए आदेश को किस तरह से क्रियान्वित किया जा रहा है।”

कोर्ट ने यह आदेश राकेश मल्होत्रा बनाम गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्‍ली (जीएनसीटीडी) और अन्य मामले में पारित किया है। कोर्ट के समक्ष जनवरी में एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में COVID-19 महामारी को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने की माँग की गई थी। हालाँकि COVID-19 की दूसरी लहर पर ध्यान देते हुए पीठ ने मामले पर वापस ध्यान दिया।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लॉकडाउन का ऐलान के साथ ही पहले दिल्ली के ठेकों पर भीड़ उमड़ी और फिर उसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से घर लौटने की मजदूरों के बीच होड़ शुरू हो गई। ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला था।

कोरोना संक्रमित हुए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी, कुछ ही देर पहले लगाया था वैक्सीन को लेकर भेदभाव का आरोप

कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए हैं। 50 वर्षीय कॉन्ग्रेस नेता ने खुद ट्वीट कर के ये जानकारी दी। उन्होंने लिखा, “हल्का लक्षण आने के बाद मैंने टेस्ट कराया, जिसमें पता चला कि मैं कोरोना पॉजिटिव हूँ। हाल के दिनों में जो भी लोग मेरे संपर्क में थे, उन सभी से मेरा आग्रह है कि वो सतर्कता के नियमों का पालन करें और सुरक्षित रहें।” कॉन्ग्रेस के कई नेताओं ने उनके जल्द ठीक होने की प्रार्थना की।

राहुल गाँधी से पहले पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह भी कोरोना पॉजिटिव हुए थे, जिनकी सलामती के लिए पीएम नरेंद्र मोदी सहित कई बड़े नेताओं ने प्रार्थना की है। इससे पहले राहुल गाँधी ने आरोप लगाया था कि 18-45 आयु वर्ग के लोगों को सरकार मुफ्त में वैक्सीन नहीं देगी और सारे वैक्सीन दलालों ने खरीद लिए हैं। उन्होंने भारत सरकार पर कोरोना के टीके को लेकर भेदभाव का आरोप लगाया था।