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भारत ने पाकिस्तान के 9 आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक किया, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जानकारी अमेरिका समेत कई देशों को दी, कहा- पाकिस्तान टारगेट नहीं, आतंकवादियों पर हमला

भारत ने पहलगाम हमले का बदला लेते हुए पाकिस्तान में स्थित 9 आतंकी ठिकाने को तबाह कर दिया है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत भारतीय सेना ने पीओके के अलावा बहावलपुर, कोटली और मुजफ्फराबाद में ठिकानों को निशाना बनाया है। इसमें लश्कर ए तैय्यबा के ज्यादातर ठिकाने हैं। भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से पाकिस्तान थर्रा उठा है।

आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर को लेकर सेना, रक्षा मंत्रालय और भारत सरकार तीनों ने आधिकारिक बयान जारी कर दुनिया को जानकारी दी है। इसमें कहा गया है कि भारतीय एक्शन आतंकवाद के खिलाफ है। इसमें पाकिस्तान की सैन्य सुविधाओं को टारगेट नहीं किया गया है। पड़ोसी मुल्क के साथ संघर्ष को बढ़ाना इसका मकसद नहीं है।

आतंकियों के ठिकानों पर भारत के एक्शन के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा- ‘भारत माता की जय’।

हालाँकि पाकिस्तान एलओसी पर लगातार गोलाबारी कर रहा है। पाकिस्तान ने एयर स्ट्राइक की बात कबूली है। डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा है कि कश्मीर में आतंकवादी हमले के मद्देनजर दोनों देशों के बीच तनाव को देखते हुए भारत ने कोटली, बहावलपुर और मुजफ्फराबाद में मिसाइल से हमले किए।

पाकिस्तान ने इस्लामाबाद और लाहौर हवाई अड्डों पर आने-जानेवाली सभी उड़ानें अगले आदेश तक रद्द कर दी हैं।

भारतीय एयर स्ट्राइक के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बातचीत की। वॉशिंगटन डीसी स्थित भारतीय दूतावास द्वारा जारी बयान में कहा गया कि अजीत डोभाल ने उन्हें पाकिस्तान में की गई कार्रवाई की पूरी जानकारी दी।

भारतीय हमलों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होने कहा, ” हमने इसके बारे में अभी-अभी सुना, जब हम ओवल ऑफिस में दाखिल हो रहे थे। लगता है कुछ लोगों को पहले से अंदेशा था कि कुछ होने वाला है, शायद अतीत की घटनाओं के आधार पर भारत और पाकिस्तान लंबे समय से लड़ते आ रहे हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि यह तनाव जल्द से जल्द समाप्त हो जाएगा।”

भारत ने पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा: ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के तहत 9 ठिकानों पर मार गिराए कई आतंकी, Pak ने घोषित किया आपातकाल

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल, 2025 को आतंकियों द्वारा 26 लाशें गिराए जाने के बाद भारत ने घर में घुसकर जवाब दिया है। पूरे पाकिस्तान में अफरातफरी का माहौल है। भारतीय सेना ने ख़ुद ही घोषित किया है कि उसने ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के जरिए पाकिस्तान के भीतर 9 ठिकानों को निशाना बनाया है। सैन्य नहीं, आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। ब्रह्मोस और राफेल विमानों का इस्तेमाल किया गया है। भारतीय सीमा में घुसे पाकिस्तान के एक एयरक्राफ्ट को भी मार गिराया गया है।

बताया जाता है कि भारत ने जिस लड़ाकू विमान को मार गिराया वो F16 था। पाकिस्तान ने भी माना है कि उसके ठिकानों को निशाना बनाया गया है और उसने इसे युद्ध की कार्रवाई करार दिया है। पाकिस्तान में मिसाइल हमलों के वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें लोगों को सड़कों पर बाइक छोड़कर भागते हुए देखा गया है। पाकिस्तान ने अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। लगभग 200 आतंकियों को भारत ने अपनी कार्रवाई से मौत की नींद सुलाकर बदला लिया है।

न केवल पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में भी आतंकियों के बड़े ठिकानों को निशाने पर लिया गया है। बौखलाए पाकिस्तान ने पुँछ-राजौरी इलाके में सीजफायर का उल्लंघन करते हुए गोलीबारी की है। भारतीय सेना इसका मुँहतोड़ जवाब दे रही है। कुपवाड़ा में भी गोलीबारी का जवाब दिया जा रहा है। अमेरिका ने कहा है कि हम स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि ये जल्द ख़त्म होगा।

उधर कॉन्ग्रेस पार्टी ने देश की सुरक्षा से जुड़े मामले में भी राजनीति शुरू कर दी है। उन्होंने कहा है कि सुरक्षा बलों को इसकी जानकारी नहीं दी गई। पाकिस्तान के राष्ट्रपति शाहबाज़ शरीफ ने देश के सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है। वहाँ के अस्पतालों में बिस्तर नहीं नसीब हो रहे हैं। बहावलपुर में जैश-ए-मुहम्मद के मुख्यालय को भी निशाना बनाया गया है। हिज़्बुल और लश्कर के ठिकाने भी निशाना बनाए गए हैं।

अंतर ये आया है कि सर्जिकल और ऐस स्ट्राइक के वक्त पाकिस्तान छिपाता था और सबूत माँगता था, लेकिन इस बार पाकिस्तान के पीएम शाहबाज़ शरीफ ने ही साफ़ कर दिया है कि हमला हुआ है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत तमाम मंत्रियों ने ‘भारत माता की जय’ सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। किसी भी प्रकार के उकसाऊ कार्रवाई का जवाब देने के लिए सीमा पर एयर डिफेंस को एक्टिवेट कर दिया गया है। वहीं संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताते हुए कहा है कि दुनिया भारत-पाकिस्तान युद्ध सहने की स्थिति में नहीं है।

1971 के बाद पहली बार पूरे देश में गूँजेगी ‘रेड सायरन’, पाकिस्तान बॉर्डर पर लड़ाकू विमान भरेंगे उड़ान: ब्लैकआउट-मॉक ड्रिल से लेकर मोदी सरकार के NOTAM तक जानिए सब कुछ

पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकियों ने 26 पर्यटकों को उनका धर्म पूछ-पूछकर मार डाला, हत्या से पहले उनके पैंट उतरवा कर चेक किए गए कि खतना हुआ है या नहीं। इस नरसंहार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैन्य अधिकारियों और मंत्रियों के साथ कई दौर की बैठकें की हैं। इसी क्रम में बुधवार (7 मई, 2025) को देशभर में मॉक ड्रिल का ऐलान किया गया। भारत पहले ही सिंधु जल समझौता को निलंबित कर पाकिस्तान का पानी रोक चुका है, पाकिस्तानियों के लिए वीजा बंद कर चुका है और पाकिस्तान से आयात-निर्णय पर प्रतिबंध लगा चुका है।

क्या होता है मॉक ड्रिल

अब लोगों के मन में ये सवाल आ सकता है कि ये मॉक ड्रिल आखिर है क्या? देश में इस स्तर का नागरिक सुरक्षा अभ्यास पहली बार हो रहा है। इससे पहले 1971 में पूरे देश में मॉक ड्रिल हुई थी। सिविल डिफेन्स DG विवेक श्रीवास्तव ने कहा कि इस मॉक ड्रिल से लोगों को घबराना नहीं चाहिए, ये इसीलिए हो रहा है ताकि नागरिक सुरक्षा के जो SOPs (मानक संचालन प्रक्रिया) हैं, उन्हें जाँच-परख कर ठीक रखा जाए। ज़रूरी नहीं है कि केवल युद्ध के समय ही ये मॉक ड्रिल होता है।

मॉक ड्रिल के जरिए ये जाँचा जाता है कि क्या भूकंप, बाढ़, केमिकल लीक, आतंकी हमले और परमाणु बमबारी की स्थिति में हम बचाव के लिए कितने तैयार हैं इसे जाँचा जाए। कोई कमी है तो दुरुस्त किया जाए। शीत युद्ध के दिनों में कई देश बार-बार इसे आजमाते थे। परमाणु हमला, हवाई हमला या फिर की स्थिति में ब्लैकआउट (महत्वपूर्ण स्थलों को बचाने के लिए वहाँ बिजली काटकर अँधेरा करना) और राहत व बचाव कार्य का अभ्यास किया जाता है।

इससे पहले 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले मॉक ड्रिल हुई थी। इस दौरान गुप्त सैन्य अभियान चलाया गया था पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को आज़ाद कराने के लिए बनी ‘मुक्ति वाहिनी’ के साथ समन्वय का अभ्यास किया गया था। ‘मुक्ति वाहिनी’ की फ़ौज को उस दौरान गुरिल्ला युद्ध तकनीक से प्रशिक्षित किया गया, पाकिस्तान में घुसकर वहाँ के निशानों को ध्वस्त करने जैसे अभ्यास भी किए गए थे। मंढोल और चाचरो में घुसकर भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फ़ौज को नेस्तनाबूत किया।

मॉक ड्रिल में क्या-क्या किया जाएगा

7 मई से सभी जिलों के डीएम भी सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स की सूची में नाम व संपर्क सूत्र जैसे विवरण दुरुस्त करेंगे। नागरिकों को प्रशिक्षित किया जाएगा। जिन जिलों में हमलों का ज़्यादा ख़तरा है, वहाँ विशेष ध्यान दिया जाएगा। आपात स्थित में डीएम तुरंत स्वयंसेवकों को जुटाकर राहत व बचाव में लगा सकें, इसकी तैयारी की जाएगी। आइए, अब जानते हैं कि मॉक ड्रिल में क्या-क्या होगा और किन-किन चीजों की तैयारी पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

सबसे पहले तो हवाई हमले की चेतावनी जारी की जाएगी, सायरन बजाकर। ‘रेड सायरन’ 1971 के बाद पहली बार बजेगा। किसी भी हवाई हमले की स्थिति में नागरिक तैयार रहें, इसीलिए ये सायरन बजाए जाएँगे। जो फ्रंटलाइन क्षेत्र हैं, वहाँ नागरिकों को बचाव के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें संरक्षित क्षेत्र में कैसे जल्द से जल्द घुसना है, ये बताया जाएगा। जैसे, जम्मू कश्मीर के उरी में पहले से ही बंकर बनाकर रखे गए हैं। जम्मू कश्मीर के ही अरनिया में छात्रों को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है कि कैसे आपात स्थिति में उन्हें लोगों के साथ सुरक्षित जगहों पर पहुँचना है।

ब्लैकआउट, यानि अँधेरा करना – ये भी इस अभ्यास का एक अहम हिस्सा है। जब ब्लैकआउट का सायरन बजता है, तब सभी तय SOP का अनुसरण किया जाना चाहिए। सायरन कैसे काम कर रहा है और लोग प्रतिक्रियास्वरूप क्या कर रहे हैं, ये जाँचा जाएगा। लोगों को समझाया जाएगा कि कैसे और क्या करना है, घबराना नहीं है। रक्षा, सशस्त्र बलों, सैन्य और मेडिकल ठिकानों के अलावा अन्य रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। संस्थाओं के साथ आपात स्थिति में निकासी की प्रक्रिया पर चर्चा की जाएगी।

प्राकृतिक आपदा के हिसाब से संवेदनशील क्षेत्रों में भारत में मॉक ड्रिल होता रहा है। सुरक्षा कारणों से पिछला मॉक ड्रिल 2008 में 26/11 मुंबई हमलों के बाद हुआ था। 2001 में संसद भवन पर हमले के बाद दिल्ली समेत कुछ इलाक़ों में मॉक ड्रिल हुई थी। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान सीमावर्ती क्षेत्रों में मॉक ड्रिल की गई थी। मार्च 2025 में ताइवान, नवंबर 2023 में जापान, और कुछ ही दिनों पहले फ़िनलैंड मॉक ड्रिल आयोजित कर चुका है। ताइवान ने सुनामी और जापान ने मिसाइल हमले की स्थिति से निपटने के लिए मॉक ड्रिल किया।

मॉक ड्रिल के साथ-साथ युद्धाभ्यास भी

भारत के मॉक ड्रिल की बात करें तो 33 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 259 स्थलों पर मॉक ड्रिल आयोजित किया जाएगा। NDRF और SDRF जैसे राष्ट्रीय आपदा बल भी इस अभ्यास का हिस्सा बनेंगे। अस्पताल घायलों के इलाज के लिए कितने तैयार हैं, ये देखा जाएगा। मिसाइल अटैक की स्थिति में नागरिकों को बेसमेंट या सबवे में छिपने को कहा जाएगा। जम्मू कश्मीर में ये ड्रिल्स पहले से शुरू हैं, स्कूलों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। लखनऊ में भी छोटी-मोटी ड्रिल हो चुकी है।

पुलिस ने पर्यटन स्थलों व भीड़-भाड़ वाले बाजारों में गश्ती बढ़ा दी है। होमगार्ड्स को भी सक्रिय कर दिया गया है। अस्पताल ही नहीं, अग्निशमन विभाग की तैयारी भी जाँची जाएगी क्योंकि हमलों से आग लगने की स्थिति में भारतीय वायुसेना के साथ कम्युनिकेशन रेडियो जाँचा जाएगा। आपात स्थिति में प्रशासनिक इकाइयों तक सन्देश तुरंत पहुँचने चाहिए। ये ड्रिल नहीं है बल्कि वास्तविकता का रिहर्सल है, ऐसा वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है। आम लोगों को फर्स्ट एड की ट्रेनिंग भी दी जाएगी

पाकिस्तान की सीमा के पास भारत युद्धाभ्यास भी करेगा। इसके लिए भारत सरकार ने NOTAM, यानी नोटिस टू एयरमैन भी जारी किया है। ये वो अधिसूचना है, जो भारतीय वायुसेना को किसी भी प्रकार के ख़तरे या आपात स्थिति को लेकर सूचित करती है। इस युद्धाभ्यास से भारत की सैन्य तत्परता को प्रदर्शित किया जाएगा। राजस्थान में भारतीय सीमा पर भी IAF युद्धाभ्यास करेगी। यह युद्धाभ्यास 7 मई को रात 9:30 बजे शुरू होगा और 8 मई को सुबह 3:00 बजे तक जारी रहेगा। पिनाका जैसी मिसाइलें भी दागी जाएँगी। 

‘अब भारत का पानी भारत के हित में बहेगा, भारत में रुकेगा और भारत के काम आएगा’: PM मोदी का ऐलान, दिया ‘नागरिक देवो भव’ का मंत्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (6 मई, 2025) को ‘ABP नेटवर्क’ के कार्यक्रम इंडिया@2047 समिट में कहा कि पहले कोई भी निर्णय लेने से पहले वोट बैंक को लेकर सोचा जाता था, लेकिन देश तब आगे बढ़ता है जब फ़ैसलों की एकमात्र कसौटी ‘राष्ट्र प्रथम’ हो। उन्होंने कहा कि बीते एक दशक में इस नीति के परिणाम हम देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक के बाद एक ऐसे फ़ैसले लिए गए जो दशकों से लटके, अटके और भटके हुए थे – जो राजनीतिक इच्छाशक्ति के आभाव में डिब्बों में बन हो गए।

उदाहरण के लिए उन्होंने बताया कि कैसे 2014 से पहले हमारे बैंक बर्बाद होने के कगार पर थे लेकिन आज भारत का बैंकिंग सेक्टर रिकॉर्ड प्रॉफिट में है और डिपॉजिटर्स को इसके फ़ायदे मिल रहे हैं – देशहित में छोटे बैंकों को मिलाने और उनका सामर्थ्य बढ़ाने से ये संभव हुआ। उन्होंने कभी डूब रही ‘एयर इंडिया’ का जिक्र करते हुए कहा कि हमने फ़ैसला लिया और देश को लगातार हो रहे हजारों करोड़ रुपए के नुकसान से बचाया क्योंकि हमारे लिए देश सर्वोपरि है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि 1 रुपए में से 15 पैसे ही ग़रीब को मिलता है।

बकौल पीएम मोदी, सरकारें बदलती रहीं लेकिन इस दिशा में प्रयास नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि सरकारी फाइलों में 10 करोड़ ऐसे फर्जी लाभार्थी थे जिनका कभी जन्म भी नहीं हुआ था और उन्हें पूरे ठाठ से सुविधाएँ मिल रही थीं – पहले वाले यही व्यवस्था बनाकर गए थे। पीएम मोदी ने बताया कि इन नामों को उनकी सरकार में सिस्टम से बताया गया और DBT के माध्यम से अब पूरा का पूरा पैसा ग़रीबों के बैंक खातों में जाता है जिससे साढ़े 3 लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा ग़लत हाथों में जाने से बचा है। उन्होंने कहा, “पैसा आपका बचा, गाली मोदी ने खाई।”

पीएम मोदी ने ‘वन रैंक, वन पेंशन’ का जिक्र करते हुए कहा कि सरकारी खजाने पर बोझ पड़ने का बहाना बनाकर इसे अटकाया जाता है लेकिन आज OROP से देश के लिए जीवन खपाने वालों का फ़ायदा हो रहा है। अबतक सवा लाख करोड़ रुपए से अधिक इसके तहत पूर्व सैनिकों को मिल चुके हैं। पीएम मोदी ने ग़रीब परिवारों को आरक्षण के संबंध में कहा कि पहले केवल बातें हुईं लेकिन उनकी सरकार ने इसे लागू किया। इसी तरह उन्होंने लोकसभा एवं विधानसभाओं में 33% आरक्षण महिलाओं के लिए सुनिश्चित किए जाने को भी अपनी उपलब्धि के रूप में गिनाया और कहा कि हमने नारी-शक्ति को सशक्त किया।

पीएम मोदी ने ‘तीन तलाक’ का जिक्र करते हुए कहा कि इससे अनगिनत मुस्लिम बहनों का जीवन बर्बाद हुआ लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को फ़र्क़ नहीं पड़ता था, लेकिन उनकी सरकार ने क़ानून बनाया। इसी तरह वोट बैंक को ख़ुश करने के लिए वक़्फ़ क़ानून में सुधार नहीं किए गए, अब जाकर वो संशोधन हुए हैं जो सही मायने में मुस्लिम माताओं-बहनों व ग़रीब पसमांदा मुस्लिमों के काम आएगा। पीएम मोदी ने नदियों को जोड़ने वाले कार्यों का भी जिक्र किया और कहा कि दशकों तक हमारे नदियों के पानी को तनाव व झगड़े का विषय बना रहे केन-बेतवा लिंक परियोजना व पार्वती-चम्बल योजना से फायदा होगा। नदियों को जोड़ने का महा अभियान चलाया गया।

उन्होंने कहा कि आजकल पानी की बहुत चर्चा है, लोगों द्वारा ताली बजाने पर बोले कि आपलोग बहुत जल्दी समझ गए। पीएम मोदी ने कहा कि पहले भारत का पानी बाहर जा रहा था, लेकिन अब भारत का पानी भारत के हित में बहेगा, भारत में रुकेगा और भारत के काम आएगा। बता दें कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है। पीएम मोदी ने डॉ बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के नाम पर नेशनल मेमोरियल बनाए जान का भी जिक्र किया, जिसके निर्माण का कार्य एक दशक तक लटका रहा था। इस तरह पीएम मोदी ने बताया कि कैसे बाबासाहब से जुड़े देश-विदेश के स्थलों को ‘पंचतीर्थ’ के रूप में विकसित किया।

पीएम मोदी ने ‘Democracy Can Deliver’ का नारा देते हुए कहा कि पिछले एक दशक में भारत में 25 करोड़ लोग ग़रीबी से बाहर आए हैं। उन्होंने कहा कि मुद्रा के लाभार्थी भी यही सन्देश देते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि दर्जनों जिले पिछड़े का ठप्पा पाकर अपने हाल पर छोड़ दिए गए थे, आज वो Aspirational बनकर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हमारे देश में कई अति-पिछड़ी जनजातियों तक विकास का लाभ नहीं पहुँचा था, अब पीएम जन-मन योजना से उनतक सरकारी सुविधाएँ पहुँची हैं।

पीएम मोदी ने देश के आखिरी व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की बात करते हुए का कि आज एक ऐसे भारत का निर्माण हो रहा है जिसके विकास की गति तेज़ हो जो संकल्प, सोच और संवेदना से समृद्ध हो – मानव केंद्रित वैश्वीकरण का रास्ता हमें चुना है जहाँ विकास सिर्फ़ बाजार नहीं बल्कि लोगों को गरिमा का जीवन मिलने और उनके सपने पूरे होने को विकास का पैमाना माना जाता है। यानी, GDP नहीं GEP केंद्रित (ग्रॉस एम्पावरमेंट ऑफ पीपल) के तहत आगे बढ़ रहे हैं। जैसे, ग़रीबों को अच्छा घर मिलने से वो सशक्त होते हैं, जब उन्हें शौचालय मिलता है तो वो खुले में शौच के अपमान से मुक्त होते हैं, ‘आयुष्मान भारत’ से मुफ्त इलाज पाने से उनके जीवन की चिंता कम होती है।

पीएम नरेंद्र मोदी ने ‘नागरिक देवो भव’ को अपनी सरकार का मूल विचार बताते हुए कहा कि हम जनता में जनार्दन देखते हैं लेकिन पहले माई-बाप कल्चर लागू था। उन्होंने युवाओं से कहा कि पहले हर फॉर्म ऑनलाइन भरे जाते हैं, पहले अपनी ही कागजों को अटेस्ट कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे लेकन अब खुद ही सेल्फ-अटेस्ट करते हैं। बुजुर्गों को पहले ख़ुद के जीवित होने का प्रमाण देने के लिए अपने ख़ुद के पुराने ऑफिस या बैंक जाना पड़ता था, लेकिन अब वरिष्ठ नागरिक कहीं से भी डिजिटली अपना जीवन प्रमाण-पत्र दे सकते हैं – बिजली, पानी, गैस सबमें पहले बार-बार कहना पड़ता था और लोग इन कामों के लिए छुट्टी लेते थे पर अब ये सारे काम ऑनलाइन हो जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि टैक्स रिफंड से लेकर पासपोर्ट तक का काम सिंपल और तेज़ हो, अच्छी तरह हो – इसपर जोर है। 2047 तक विकसित भारत की बात करते हुए पीएम मोदी ने ‘विकास भी, विरासत भी’ का नारा करते हुए ट्रेडिशन और टेक्नोलॉजी के समन्वय का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि योग-आयुर्वेद को हम दुनिया में ले जा रहे हैं, डिजिटल लेनदेन में भी हम टॉप पर हैं। चोरी की गई कलाकृतियाँ वापस आ रही हैं, रिकॉर्ड विदेशी निवेश भी आ रहा है। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फोन निर्माता है, मिलेटस सुपरफूड के उत्पादन में हम सबसे आगे हैं। 100 गीगावॉट की कैपेसिटी हमने सोलर एनर्जी में हासिल कर ली है, हम सूर्य मंदिर वाले देश हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “सरकार जो निर्णय आज ले रही है उसका कई गुना असर कितना बड़ा और दूरगामी होगा – कई लोग ये समझ नहीं पाते। 10 साल पहले जब मैं ‘डिजिटल इंडिया’ की बात करता था तो कई लोग काफी आशंकाएँ व्यक्त करते थे लेकिन सस्ते डेटा और सस्ते ‘मेड इन इंडिया’ स्मार्टफोन के कारण एक नई क्रांति का जन्म हुआ है। इससे Ease Of Living बढ़ी, कंटेंट व क्रिएटिविटी का नया संसार बना। आज गाँव में अच्छा भोजन बनाने वाली महिला मिलियन सब्सक्राइबर वाली सूची में शामिल है। मुंबई में WAVES समिट में पता चला कि अकेले यूट्यूब ने पिछले 3 साल में भारत के कंटेंट क्रिएटर्स को 21,000 करोड़ रुपए का पेमेंट किया है। आज हमारा फोन कम्यूनिकेश नहीं बल्कि क्रिएटिविटी और कमाई भी बहुत बड़ा टूल बन गया है।”

पीएम मोदी ने आत्मनिर्भरता को भारत की आर्थिक DNA का हिस्सा बताते हुए कहा कि पहले हमें मेकर नहीं मार्केट बताया जाता था पर ये ठप्पा अब हट रहा है – अब हमारे रक्षा उत्पाद 100+ देशों में एक्सपोर्ट हो रहे हैं। पीएम मोदी ने INS विक्रांत की बात करते हुए कहा कि कई युद्धपोत हमने स्वदेश में बनाया। उन्होंने जानकारी दी कि इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर में भारत बड़ा एक्सपोर्टर बनकर उभरा है, हमारे लोकल प्रोडक्ट्स ग्लोबल हो रहे हैं। भारत का एक्सपोर्ट बीते वर्ष 825 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है, एक दशक में दोगुना। पीएम मोदी ने बताया कि इसे और गति देने के लिए मिशन मैन्युफैक्चरिंग का ऐलान किया गया।

पीएम मोदी ने कहा कि ये देश का नया भाग्य लिखने का कालखंड है।

‘सेवा ही परमात्मा है’: दूसरी बार डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित हुईं ‘अडानी फाउंडेशन’ की अध्यक्ष प्रीति अडानी, उधर अडानी को निशाना बनाते-बनाते ख़ुद तबाह हो गया हिंडेनबर्ग

‘अडानी फाउंडेशन’ की अध्यक्ष प्रीति अडानी को दूसरी बार डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया है। उन्हें मंगलवार (6 मई, 2025) को महाराष्ट्र के वर्धा स्थित दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च (डीम्ड यूनिवर्सिटी) की तरफ से डॉक्टर ऑफ साइंस (D.Sc.) ऑनोरिस कॉसा की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।

बताते चलें कि यह फाउंडेशन अडानी समूह की सामाजिक कल्याण और विकास शाखा है। अडानी समूह भारत का सबसे तेज़ी से बढ़ता व्यापार समूह है। यह सम्मान उन्हें DMIHER के माननीय चांसलर दत्ता मेघे द्वारा संस्थान के 16वें दीक्षांत समारोह में दिया गया। इस अवसर पर डॉ अडानी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं।

सम्मान स्वीकार करते हुए डॉ प्रीति अडानी ने कहा, “मैं डॉक्टरेट की उपाधि को पाकर गौरवान्वित महसूस कर रही हूँ। यह मेरे उस विश्वास को मजबूत करता है कि ‘सेवा साधना है, सेवा प्रार्थना है और सेवा ही परमात्मा है।’ मैं ऐसे समाधानों और प्रणालियों के विकास के लिए समर्पित हूँ, जो समाज में स्थायी बदलाव लाएँ, जरूरतमंदों को सशक्त बनाएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ बढ़ाएँ और समुदायों को आगे लाएँ।”

याद दिलाते चलें कि इससे पहले फरवरी 2020 में उन्हें अहमदाबाद स्थित गुजरात लॉ सोसाइटी यूनिवर्सिटी द्वारा भी सामाजिक कार्यों में उनके योगदान के लिए मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया गया था। जनवरी 2019 में डॉ प्रीति अडानी को रोटरी क्लब ऑफ पालनपुर, गुजरात द्वारा बनास रत्न अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। फरवरी 2022 में उन्हें फेडरेशन ऑफ इंडियन चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) फिक्की लेडीज ऑर्गनाइजेशन (FLO) अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस फॉर सोशल इम्पैक्ट से भी नवाज़ा गया था।

जानकारी के लिए बता दें कि डॉ प्रीति अडानी एक क्वालिफाइड डेंटल सर्जन हैं, लेकिन उन्होंने निजी प्रैक्टिस की जगह जनसेवा का रास्ता चुना। कहा जाता है कि 1996 में स्थापित अडानी फाउंडेशन के माध्यम से उन्होंने भारत में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की परिभाषा ही बदल दी। उनके नेतृत्व में फाउंडेशन ने 5 मुख्य क्षेत्रों में स्थायी बदलाव लाने का कार्य किया है – शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण, सतत आजीविका, जलवायु संरक्षण और सामुदायिक विकास शामिल है।

अडानी समूह को तबाह करने के लिए ‘हिंडेनबर्ग रिसर्च’ नामक अमेरिका की एक संस्था ने जमकर प्रयास किया था और इसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट्स जारी कर-कर के शेयर बाजार से शॉर्ट सेलिंग कर कमाई की थी। हालाँकि, हिंडेनबर्ग ने जब दोबारा रिपोर्ट प्रकाशित किया तो इसका कोई असर नहीं हुआ। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के बाद ये संस्था ही बंद हो गई। ‘हिंडेनबर्ग’ के खिलाफ कई देशों में आपराधिक मामले भी चल रहे हैं।

बच्चे को हुई साँस की तकलीफ, प्रार्थना करवा-पानी पिला बना दिया ईसाई: छत्तीसगढ़ के 10 परिवारों ने की घर वापसी, कहा- झाँसे से बदलवाया धर्म, पर नहीं हुआ कोई फायदा

छत्तीसगढ़ के कोंडागाँव जिले में ईसाई मिशनरियों के बहकावे में आकर धर्मांतरण करने वाले जनजातीय (Schedule Tribes) परिवार अब अपने मूल सनातन धर्म में लौट रहे हैं। मंगलवार (6 मई 2025) को केशकाल विधानसभा के बडेराजपुर विकासखंड के ग्राम पिटीचुआ में 10 परिवारों ने ईसाई धर्म छोड़कर सनातन धर्म में ‘घर वापसी’ की। इनमें तीन बच्चे भी शामिल हैं। इन परिवारों ने खुलासा किया कि मिशनरियों ने बीमारी ठीक करने के नाम पर उन्हें झाँसे में लिया और कथित पवित्र पानी पिलाकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए मजबूर किया।

घर वापसी करने वाले एक परिवार के मुखिया गैंदलाल मरकाम ने बताया कि उनके छोटे बेटे को साँस की तकलीफ थी। कई डॉक्टरों के पास जाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। तब कुछ लोगों ने उन्हें ईसाई मिशनरियों से मिलने की सलाह दी, जिन्होंने दावा किया कि प्रार्थना और पवित्र पानी से हर बीमारी ठीक हो सकती है। गैंदलाल ने बताया, “हमें प्रार्थना कराई गई, पानी पिलाया गया और कुछ समय के लिए बच्चे को आराम मिला। लेकिन बाद में फिर वही परेशानी शुरू हो गई।”

इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि यह सब बहकावा था। मिशनरियों ने उन्हें बाइबिल थमाई और ईसाई नियमों का पालन करने को कहा, लेकिन इससे उनकी जिंदगी में कोई स्थायी बदलाव नहीं आया।

जनजातीय समाज के ब्लॉक अध्यक्ष शंकर मरकाम ने कहा, “ईसाई मिशनरी भोले-भाले जनजातीय लोगों को लालच देकर उनके विश्वास का फायदा उठाते हैं। वे बीमारी ठीक करने, आर्थिक मदद और समस्याओं के समाधान का झाँसा देते हैं। लेकिन यह सब धर्मांतरण का जाल है।” उन्होंने केंद्र सरकार की जातिगत जनगणना और छत्तीसगढ़ सरकार के प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून का स्वागत किया। उनका कहना है कि ऐसे कानून से मिशनरियों की मनमानी रुकेगी और जनजातीय लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे।

घर वापसी करने वाले एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। शादी-ब्याह जैसे रीति-रिवाजों में दिक्कतें आईं, जिससे उनके परिवार को मानसिक तनाव हुआ। करीब डेढ़ साल बाद उन्होंने सनातन धर्म में लौटने का फैसला किया। इस वापसी से उन्हें मानसिक शांति मिली और समाज ने उनका स्वागत किया।

जनजातीय समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी रंगीलाल मरकाम ने मिशनरियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा, “ये लोग जनजातीय लोगों की अशिक्षा और गरीबी का फायदा उठाते हैं। पवित्र पानी और प्रार्थना के नाम पर बेवकूफ बनाते हैं। लेकिन सच यह है कि उनकी प्रार्थना से न बीमारी ठीक होती है, न जिंदगी सुधरती है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय समाज अब जागरूक हो रहा है और अपने लोगों को मूल धर्म में वापस लाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

बता दें कि छत्तीसगढ़ में साय सरकार धर्मांतरण के खिलाफ सख्त रुख अपना रही है। सरकार जल्द ही कड़ा कानून लाने की तैयारी में है, जिससे अवैध धर्मांतरण पर रोक लग सके। जनजातीय समाज का कहना है कि यह कदम उनकी संस्कृति और पहचान को बचाने में मदद करेगा।

शरिया कोर्ट की कोई कानूनी औकात नहीं, आदेश मानने को बाध्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इतना भी ‘सरल-सहज’ नहीं, जानिए कब ‘काजी कोर्ट’ का फैसला होगा मान्य

सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2025 को अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि ‘शरिया कोर्ट’, ‘काज़ी की अदालत’ या ‘दारुल-क़ज़ा’ जैसे नामों से चलने वाली अदालतों की भारत के कानून में कोई मान्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट कहा कि इन अदालतों के फैसले कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं हैं।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला (शाहजहान) की याचिका पर सुनाया था। 2018 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के एक आदेश को सही ठहराया था। आदेश में मुस्लिम महिला शाहजहान को ही विवाद का कारण बताया और महिला को शौहर (गफ्फार खान) द्वारा मिलने वाले गुजारा भत्ता को मना कर दिया था। इस फैसले पर मुस्लिम महिला ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया और महिला को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि याचिका दाखिल करने की तारीख से हर महीने ₹4,000 गुजारा भत्ता महिला को दिया जाए। इसके अलावा, मुस्लिम महिला के शौहर को आदेश दिया गया है कि वह बच्चों के बालिग होने तक उनकी आर्थिक जरूरतों का ख्याल रखे।

भले ही यह मामला एक मुस्लिम समुदाय से जुड़ा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बड़े संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है। सिद्धांत यह है कि भारत का कानूनी सिस्टम इस्लामिक बयानों या शरिया अदालतों के जरिए किए गए फैसले से ऊपर है। हालाँकि, अगर दोनों पक्ष अपनी मर्जी से ऐसे फैसलों को मानना चाहें तो मान सकता है, लेकिन कानून उन पर कोई दवाब नहीं डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जब गुजारा भत्ता जैसे कानूनी अधिकारों की बात आती है, तो फैसला करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीय अदालतों के पास है।

जस्टिस सुधांशु धूलिया और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने कहा, “‘काज़ी की अदालत’, ‘(दारुल कज़ा) कजियत की अदालत’ या फिर ‘शरिया कोर्ट’… चाहे उन्हें किसी भी नाम से पुकारा जाए, कानून में उनकी कोई मान्यता नहीं है।”

दारुल कज़ा में समझौता और तलाक: एक धर्मनिरपेक्ष देश में शरिया अदालतों का विरोधाभास

इस मामले में गफ्फार खान नाम के मुस्लिम व्यक्ति ने गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए भोपाल के एक दारुल कजा (कजियत) में तलाकनामा दाखिल किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलटते हुए कहा कि ऐसे मंचों की न तो भारतीय कानून में कोई मान्यता है और न ही उनके फैसले कानूनी रुप से बाध्य किए जा सकते हैं।

गफ्फार खान और उनकी बीवी शाहजहान ने 2002 में दूसरी बार निकाह किया था। गफ्फार खान सीमा सुरक्षा बल (BSF) में काम करता है। गफ्फार और शाहजहान के 2 बच्चे हुए, लेकिन समय के साथ रिश्तों में कड़वाहट आ गई। इसी के चलते गफ्फार ने 2005 में भोपाल की ‘काज़ी की अदालत’ में तलाक की अर्जी डाली और 22 नवंबर 2005 को एक समझौते के साथ दोनों फिर से साथ में रहने के लिए मान गए।

समझौते के बाद भी रिश्ता बिगड़ा और शाहजहान ने गफ्फार पर मारपीट करने और 50,000 दहेज की माँग का आरोप लगाया। इसके अलावा शाहजहान का कहना था कि गफ्फार ने उसे और बच्चों को घर से निकाल दिया है। सितंबर 2008 में गफ्फार ने भोपाल की ‘कजियत की अदालत(दारुल कज़ा)’ में तलाक की अर्जी डाली थी।

इसके तुरंत बाद, शाहजहान ने फैमिली कोर्ट में 5 हजार गुजारा भत्ता के लिए अर्जी डाली। फैमिली कोर्ट ने कहा कि यह शाहजहान का दूसरा निकाह है, तो इसमें दहेज की माँग कोई मायने नहीं रखती और बात रही गुजारा भत्ता की तो, शाहजहान अपनी मर्जी से घर छोड़कर आई है, इसलिए केवल बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मंजूर किया जाएगा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा था।

हालाँकि अब 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया और गफ्फार को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। जब शाहजहान ने निचली अदालतों के फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, तो सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी इस्लामिक अदालत भारतीय न्यायपालिका के अनुरुप फैसले नहीं कर सकती। शाहजहान ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वह अनपढ़ है और उसकी कोई आय नहीं है। इसके अलावा उसे शौहर का घर गलत तरीके से छोड़ने के लिए दोषी भी ठहराया गया था। शाहजहान ने ‘समझौता पत्र’ और शरिया अदालत के तलाक के चलते निचली अदालत के भरोसे पर भी सवाल उठाया था।

इस्लामिक अदालतों की कानूनी स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार (फैसला)

वर्तमान मामले के विश्लेषण में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार कार्यवाही में ‘काज़ी की अदालत’, ‘(दारुल कज़ा) कजियत की अदालत’, और ‘शरिया कोर्ट’ जैसे निकायों का उल्लेख किया गया था। इसके जवाब में, अदालत ने अपने फैसले के ‘पोस्ट-स्क्रिप्ट’ अनुभाग में इस मामले को संबोधित किया।

मामले के तहत, अदालत ने दार-उल-कजा एक समानांतर अदालत है या नहीं और क्या ‘फतवा’ का कोई कानूनी दर्जा है या नहीं इसकी जाँच कराई थी। जिसका हवाला 2014 के विश्व लोचन मदान बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया था।

अदालत ने कहा था कि कानूनी तौर पर जो निर्णय लिए जाते है, उसका पालन करना जरुरी होता है, जब तक कि कानून द्वारा ही उसे रद्द न कर दिया जाए। हालाँकि, दार-उल-क़ज़ा के फैसले या फतवा इनमें से किसी भी आवश्यकता को “पूरा नहीं करते”, क्योंकि दार-उल-क़ज़ा “किसी भी सक्षम विधायिका द्वारा नहीं बनाया गया है और ना ही स्वीकारा गया है।”

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दार-उल-कजा जो भी राय या फतवा जारी करता है, वो मान्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि किसी भी काजी या मुफ्ती के पास अपनी राय को जबरदस्ती थोपने और फतवे जारी करने का न तो कोई अधिकार है और न ही कोई शक्ति। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुगल या ब्रिटिश शासन काल के दौरान जो फैसले लिए जाते रहे हो, उनकी जगह अब स्वतंत्र भारत के सवैंधानिक योजना के तहत नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “मामले से संबंधित व्यक्ति या निकाय इसे अनदेखा कर सकता है और किसी भी अदालत में इसे चुनौती देने की कोई आवश्यकता भी नहीं है। इसे बस अनदेखा किया जा सकता है।” 2014 में उसी फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि हमारी संवैधानिक योजना में जब फतवा या इस्लामी घोषणा की कोई कानूनी मान्यता नहीं है, फिर भी फतवे जारी किए गए हैं और किए जा रहे हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(AIMPLB) ने कहा कि पूरे देश में न्यायिक प्रणाली का एक नेटवर्क होना चाहिए, जिसमें मुस्लिम अपने विवादों का फैसला काज़ियों द्वारा करवा सकें।

हालाँकि, अदालत ने कहा था कि फतवा किसी विशेषज्ञ की एक राय हो सकती है न कि कोई डिक्री, और यह किसी भी अदालत, राज्य या व्यक्ति पर थोपी नहीं जा सकती। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फतवा जारी करने पर तब तक आपत्ति नहीं होनी चाहिए, जब तक कि यह कानून के तहत व्यक्तियों को दिए गए अधिकारों का उल्लंघन न करे।

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के विश्व लोचन मदान मामले का हवाला देते हुए कहा कि ‘काज़ी की अदालत’, ‘(दारुल कज़ा) कजियत की अदालत’, ‘शरिया कोर्ट’, चाहे उन्हें किसी भी नाम से पुकारा जाए, कानून में उनकी कोई मान्यता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और इलाहाबाद कोर्ट को भी फटकारा, क्योंकि इन्होंने ‘काजी अदालत’ जैसों के ‘समझौते पत्र’ पर भरोसा जताया था। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जोर देकर कहा कि इस्लामिक अदालतों जैसे गैर-न्यायिक निकायों की घोषणा पर भारतीय अदालतें भरोसा नहीं कर सकती।

हाल ही में पारित सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है, “जैसा कि विश्व लोचन मदान (ऊपर) में उल्लेख किया गया है, ऐसे इस्लामिक संस्था द्वारा अगर कोई भी फैसला लिया जाता है, वो किसी पर भी थोपा नहीं जा सकता है। ऐसे फैसले को कानून की नज़र में तभी सही ठहराया जा सकता है जब प्रभावित पक्ष फैसले को स्वीकार करता है और ऐसी कार्रवाई किसी अन्य कानून का उल्लंघन नहीं करती है।” सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे फैसले केवल उन पक्षों के बीच ही मान्य किया जा सकता है, जो इसे स्वीकारते हैं। इसके अलावा किसी तीसरे पक्ष पर लागू नहीं किया जा सकता।

शाहजहान और गफ्फार खान दोनों का ही ये दूसरा निकाह था, तो दहेज की माँग की कोई संभावना नहीं है। निचली अदालत की इस टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने’आधारहीन’ बताया और कहा कि ऐसी टिप्पणी “कानून के सिद्धांतों से अनजान” थी।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि फैमिली कोर्ट का यह मानना कि शाहजहान ने अपने शादीशुदा जीवन में कलह पैदा किया, केवल अटकलों पर आधारित था और इसमें कोई सबूत नहीं था।

अब सुप्रीम कोर्ट ने गफ्फार खान को हर महीने 4000 रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है। गुजारा भत्ता तब से लागू किया जाएगा, जब फैमिली कोर्ट में इसकी याचिका दाखिल करने की गई थी। इसके अलावा बच्चों को दिया जाने वाला गुजारा भत्ता भी फैमिली कोर्ट में गुजारा भत्ता याचिका दाखिल करने की तारीख से देना होगा।

क्या शरिया अदालतें भारतीय मुसलमानों के लिए ‘सर्वोच्च’ हैं?

बता दें कि बीते कुछ सालों में कई मुस्लिम मौलवियों और राजनेताओं ने संविधान से ऊपर शरिया को प्राथमिकता देने वाले बयान दिए हैं। कई ने यह दावा भी किया है कि भारतीय मुसलमान केवल शरिया का पालन करेंगे। इसका हालिया उदाहरण 14 अप्रैल 2025 को सामने आया, जब झारखंड सरकार के मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि उनके लिए शरिया संविधान से पहले है।

हसन ने उस अल-तक्किया का खुलासा किया, जिसका इस्तेमाल इस्लामवादी अक्सर ‘धर्मनिरपेक्षवादियों’ को मूर्ख बनाने के लिए करते हैं, जैसा कि उन्होंने कहा, “हम कुरान को अपने दिलों में और संविधान को अपने हाथों में रखते हैं।”

साल 2023 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने दावा किया था कि भारत में 100 से अधिक शरिया अदालतें हैं और भारत के सभी मुस्लिम बहुल जिलों में ऐसी इस्लामी अदालतें स्थापित करना उनका इरादा है। 2018 में भी मुस्लिम निकाय ने कहा था कि वह देश के सभी जिलों में दारुल-क़ज़ा (शरिया अदालतें) खोलने की योजना बना रहा है।

AIMPLB ने 2020 में मुस्लिमों से आग्रह किया था कि वे अपने विवादों को हल करने के लिए शरिया जैसी अदालतों को दरवाजा खटाखटाएँ, न कि भारतीय न्यायपालिका का। इसे पहले भी भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने देश के हर जिले में शरीयत अदालतें खोलने का दावा किया था और कहा था कि सभी समुदायों को अपने व्यक्तिगत कानून का पालने करने का अधिकार है।

जबकि AIMPLB, मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले राजनेता और इस्लामावादी लगातार मुस्लिमों को प्रेरित करते हैं कि वे अपने विवादों को हल करने के लिए शरिया या दारुल-कजा का सहारा ले, जिससे इस्लामी धार्मिक लाइनों पर काम करने वाली समानांतर न्यायपालिका को मजबूत किया जा सके।

जैसा की शाहजहाँ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल भारत के संविधान के तहत स्थापित वैधानिक अदालतें ही विवादों का फैसला कर सकती हैं। विवादों को निपटाने के लिए गैर-न्यायिक संस्थाओं का सहारा लेना देश के धर्मनिरपेक्ष कानूनी ढाँचे को कमजोर करता है।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि भारत की दूसरी अदालतें खुद इस्लामिक अदालतों को वैधता प्रदान करेगी या फिर कानूनी अधिकारों का सुलह करने के लिए गैर-न्यायिक इस्लामिक संस्था के फैसले पर भरोसा करेगी, तो भारत में न्यायिक प्रणाली के अस्तित्व का मतलब ही क्या?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने फिर से वैधानिक कानून की प्रधानता को स्थापित किया है। साथ ही कहा कि इस्लामिक अदालतें या कोई गैर-कानूनी संस्थाएँ, जो फैसले लेती है, वे कानूनी रुप से किसी पर थोपी नहीं जा सकती है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट श्रद्धा पांडे ने अंग्रेजी में लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं।

‘ट्रेन के डिब्बे जैसा हो गया है हाल, जो पहले घुस गया दूसरे को घुसने नहीं देना चाहता’: सुप्रीम कोर्ट, जानिए क्यों आरक्षण को बताया ‘रेल यात्रा’ की तरह

देश में आजकल आरक्षण को लेकर ख़ूब बहस चल रही है। कोई आकर सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिल रहे EWS आरक्षण को ‘कैंसर’ बताकर चला जाता है तो कोई चुनावों के दौरान डर दिखाता है कि भाजपा जीत गई तो आरक्षण ख़त्म कर देगी। राजद-सपा जैसे दल और इसके चट्टे-बट्टे 90% आरक्षण की बातें करते हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत ने आरक्षण पर दिलचस्प टिप्पणी करते हुए इसकी तुलना रेल यात्रा से की है। भारत में रेलवे यात्रा का सबसे सुगम माध्यम है और प्रतिदिन औसतन ढाई करोड़ लोग इससे यात्रा कर रहे होते हैं।

ट्रेनों में यात्रा करने के लिए टिकट कटाना होता है, अगर आप जनरल में सफर नहीं कर रहे हैं तो आपकी सीट पहले से तय होती है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आरक्षण उस रेल यात्रा की तरह हो गया है, जहाँ कम्पार्टमेंट में पहले से जमे लोग दूसरों को नहीं घुसने देना चाहते हैं। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय के चुनावों में OBC को आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान उन्होंने ये टिप्पणी की। इस पीठ में जस्टिस NK सिंह भी शामिल थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने याचिकाकर्ता की तरफ से जिरह करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा गठित बाँठिया आयोग ने स्थानीय निकाय के चुनावों में OBC के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश ये देखे बिना की थी कि वो राजनीतिक रूप से पिछड़े हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक पिछड़ापन सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ापन से अलग है, और OBC वर्ग को स्वतः ही राजनीतिक रूप से पिछड़ा नहीं माना जा सकता। इसी पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, कि बात ये है कि हमारे देश में आरक्षण का कारोबार रेलवे की तरह हो गया है, जहाँ पहले से बोगी में जमे लोग किसी और को नहीं घुसने देना चाहते।

उन्होंने कहा कि पूरा खेल यही है और याचिकाकर्ताओं का खेल भी यही है। इसपर टिप्पणी करते हुए गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि बोगियाँ पीछे से भी जोड़ी जा रही हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने आगे कहा, “जब आप समावेशिता का सिद्धांत अपनाते हैं, तो राज्यों को ज़्यादा वर्गों को पहचानना ही पड़ेगा – सामाजिक रूप से पिछड़े, राजनीतिक रूप से पिछड़े, और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग। तो फिर फायदे से उन्हें वंचित क्यों रखा जाए? फायदा सिर्फ़ एक ही ख़ास परिवार या कुछ गिने-चुने समूहों तक ही क्यों सीमित रहे?”

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में लंबे समय से अटके स्थानीय निकाय के चुनावों को अब आगे सिर्फ़ इसीलिए नहीं टाला जा सकता क्योंकि OBC आरक्षण पर पेंच फँसा हुआ है। अब पीठ ने इस विषय में राज्य सरकार की राय माँगी है और तबतक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी गई है। अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, तभी से चुनाव अटके पड़े हैं।

नए आदेश में चुनाव आयोग को 4 हफ्ते के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर अधिसूचना जारी करने व OBC के लिए आरक्षण की व्यवस्था जैसे 2022 से पहले थी फ़िलहाल वैसी ही रखने के लिए कहा गया है। साथ ही ये प्रयास करने के लिए कहा गया है कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया 4 महीने के भीतर पूर्ण हो जाए। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर वैसी कोई स्थिति बनती है तो इसे आगे बढ़ाने के लिए अनुमति ली जा सकती है।

‘मंदिरों के सामने थूका, पेशाब किया, मूर्तियाँ तोड़ीं’: मुर्शिदाबाद के हिन्दुओं ने बताया कैसे दंगाई मुस्लिम भीड़ ने मचाई तबाही, मिले हुए थे TMC के पार्षद-विधायक

मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में 11 अप्रैल 2025 को नए वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर हिंदू समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी और टारगेटेड हमले देखने को मिले।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट्स में विस्तार से बताया है कि कैसे हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, जिसमें उनके घर, दुकानें और मंदिर शामिल थे। यह तबाही 11 अप्रैल 2025 को जुम्मा नमाज के बाद वक्फ कानून के खिलाफ प्रदर्शन के नाम पर शुरू हुई और 12 अप्रैल 2025 तक चली।

हालात इतने खराब हो गए कि हजारों हिंदुओं को मुर्शिदाबाद के अपने घर छोड़कर नावों के जरिए पास के मालदा जिले में भागना पड़ा।

22 अप्रैल को इनसाइट के पत्रकारों की टीम ने हिंसा से प्रभावित मुर्शिदाबाद का दौरा किया और उन हिंदू परिवारों से मुलाकात की, जिन्होंने मुस्लिम भीड़ के कहर में सब कुछ खो दिया।

पीड़ितों ने हत्या, हिंदू मंदिरों और घरों पर हमलों और मस्जिदों से हिंसा के लिए मिल रहे डायरेक्शन की भयानक कहानियाँ सुनाईं।

पीड़ितों ने स्थानीय पुलिस की निष्क्रियता, टीएमसी पार्षदों की मिलीभगत और यह भी बताया कि उग्र मुस्लिम भीड़ के लिए पार्टी से जुड़ाव मायने नहीं रखता था।
सभी ने एक स्वर में कहा कि उनकी हिंदू पहचान ही इस चरमपंथी हमले की वजह थी, जैसा कि इनसाइट ने 1 मई 2025 को अपने यूट्यूब चैनल पर 30 मिनट के ग्राउंड रिपोर्ट में सबकुछ बताया।

मुर्शिदाबाद में हिंदू विरोधी दंगों की पीड़ित परुल दास ने बताया कैसे उनके पति और बेटे को मुस्लिम भीड़ ने मार डाला, पुलिस 4 घंटे बाद आई।

इनसाइट टीम ने हरगोबिंद दास के परिवार से मुलाकात की, जिन्हें उनके बेटे चंदन दास के साथ 11 अप्रैल 2025 को एक मुस्लिम भीड़ ने काटकर मार डाला था।

इस हत्या के सिलसिले में चार इस्लामी कट्टरपंथियों कालू नादर, दिलदार नादर, इंजमाम उल हक और जियाउल शेख को गिरफ्तार किया गया।

हरगोबिंद दास की विधवा पारुल दास ने बताया, “पहले उन्होंने उनकी उस दुकान को तोड़ा। सब कुछ लूट लिया और चले गए। बाद में वे वापस आए और हमारी रसोई तोड़ दी। फिर उन्होंने छत पर पत्थर, काँच और बोतलें फेंकी। दूसरी तरफ से बाड़ के पास से पत्थर और ईंटें फेंके। तीसरी बार जब वे आए, तो उनके पास फावड़े, कुदाल और अन्य नुकीले हथियार थे।”

पारुल दास ने बताया कि कैसे उनके पति और बेटे को मुस्लिम भीड़ ने मार डाला। उन्होंने कहा, “पिता और बेटा वहाँ खड़े थे। उन्होंने पिता-पुत्र को बाहर खींच लिया। पिता को नाले के पास काट दिया। मेरे बेटे को उस पेड़ के नीचे मार डाला।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें पुलिस से कोई मदद मिली, तो परुल दास ने कहा, “नहीं, कुछ भी नहीं। अगर पुलिस होती तो तीसरी बार हत्याएँ नहीं होतीं। वे (पुलिस) 4 घंटे बाद आए।”

इस असहाय महिला ने बताया कि उसने टीवी पर दिखाए गए वीडियो से अपराधियों की पहचान की। उन्होंने कहा कि हम डरे हुए हैं और यहाँ बीएसएफ की स्थाई तैनाती की माँग कर रहे हैं।

पारुल दास ने बताया कि वह अब अपने घर में नहीं रह सकतीं क्योंकि उसके दरवाजे नहीं हैं। जब उनसे पूछा गया कि उनके पति और बेटे को क्यों मारा गया, तो उन्होंने कहा, “मैं क्या कहूँ? हमारी किसी से दुश्मनी नहीं थी।”

बता दें कि पारुल दास और उनकी बहू पिंकी दास को तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे और पश्चिम बंगाल पुलिस परेशान कर रही है।

हिंदू पीड़ित ने दी TMC पार्षद की कारस्तानी की गवाही

एक हिंदू व्यक्ति दीपेन मंडल ने मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा में टीएमसी पार्षद की मिलीभगत को उजागर किया। दीपेन मंडल ने बताया, “पार्षद वहाँ (घटनास्थल पर) मौजूद था। अगर वह चाहता तो इस तबाही को रोक सकता था।”

उन्होंने आगे बताया, “अमीरूल (समशेरगंज से टीएमसी विधायक) आया था। उसे सब पता था। उसके आने के बाद इस तरफ से हमला हुआ। जो लोग उसके साथ थे, उन्होंने भी तोड़फोड़ और लूट में हिस्सा लिया।”

दीपेन मंडल ने कहा, “अगर पार्षद को पता नहीं था, तो गाँव वाले यहाँ कैसे आए और तबाही मचाई? वहाँ मकबूल आलम है। उसके गाँव के लोग हमारे गाँव पर हमला करने कैसे आ गए? अगर उसने उन्हें मना किया होता, तो वे नहीं आते।”

उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और उनके परिवार को अपना गाँव छोड़कर मालदा के पर लालपुर में 7-9 दिनों तक रहना पड़ा। उन्होंने पूछा, “यह आपके अपने लोगों के साथ पश्चिम बंगाल में हो रहा है, जो एक जगह से दूसरी जगह जाने को मजबूर हैं। दूसरे लोग आ सकते थे। लेकिन ममता को समय नहीं मिला?”

उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें मालदा से भगा दिया और वापस मुर्शिदाबाद भेज दिया। मंडल ने कहा, “उन्होंने (पुलिस) हमें जबरदस्ती वापस भेज दिया… पुलिस ने कहा कि वे केस दर्ज करेंगे। हमें जाने को कहा। हमें कहा कि हम तुम्हें यहाँ नहीं रख सकते। उन्होंने हमें हटाने के लिए कई बहाने बनाए।”

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे मुस्लिमों ने एक मंदिर में तोड़फोड़ की और पास की एक दुकान में घुसने की कोशिश की।

एक हिंदू महिला बनवासी मंडल ने दुख जताया, “अगर यहाँ बीएसएफ कैंप होता, तो हमारी जिंदगी आसान हो जाती। हमें नुकसान की भरपाई चाहिए। घर में कुछ भी नहीं है। न चावल, न दाल, न पहनने को कुछ। सब कुछ जलकर राख हो गया।”

मुस्लिमों ने मंदिर के सामने थूका और पेशाब किया, देवर को ‘अल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ बोलने के लिए किया मजबूर

एक हिंदू महिला झारना मंडल ने बताया कि कैसे मुस्लिमों ने उनके देवर पर हमला किया और शनिवार (12 अप्रैल) को एक मंदिर में तोड़फोड़ की। उन्होंने यह भी बताया कि भीड़ ने मंदिर के सामने थूका और पेशाब किया।

उन्होंने बताया, “उन्होंने (मुस्लिमों ने) मंदिर के सामने थूक दिया और पेशाब किया… कम से कम 2000 से 5000 लोग आए और इस मंदिर को तोड़ दिया… उन्होंने शनिवार को इस मंदिर को तोड़ा।” मंडल ने इनसाइट टीम को बताया कि उनके देवर को पीटा गया और ‘अल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ बोलने के लिए मजबूर किया गया।

झारना मंडल ने बताया, “6 लोगों ने मेरे देवर को पकड़ा और उस जगह पर बुरी तरह पीटा। उन्होंने उसे ‘अल्लाह’ और ‘बिस्मिल्लाह’ बोलने के लिए मजबूर किया। उन सबने मेरे देवर से कहा कि सब गाँव से भाग जाओ।”

मंडल ने कहा कि न तो पुलिस और न ही गाँव के प्रधान उनकी मदद के लिए आए। उन्होंने कहा, “कोई पुलिस नहीं थी। 5 जवान थे, जो डरकर भाग गए… उन्होंने (मुस्लिमों ने) पुलिस को कहा कि भाग जाओ वरना मार देंगे। किसी ने हमारी मदद नहीं की, न तो प्रधान ने, न ही पुलिस ने। मैं उनके पैरों पर गिर गई, उनसे हमारी रक्षा करने की भीख माँगी, लेकिन वे नहीं आए। हमारे पूरे गाँव ने उनके पैर पकड़े और विनती की।”

मंडल ने आगे बताया कि बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) ने उनकी जान बचाई, वरना गाँव वाले मर गए होते। उन्होंने कहा, “बीएसएफ ने हमें बचाया। अगर बीएसएफ नहीं आता, तो हम जिंदा नहीं होते। हम मर गए होते। हमें बीएसएफ कैंप चाहिए। हमें सुरक्षा चाहिए। हमें ममता की पुलिस नहीं चाहिए।”

पीड़ित समर दास ने बताया कैसे मस्जिदों ने मुस्लिम भीड़ को उकसाया, टीएमसी का सदस्य होने के बावजूद हिंदुओं को सताया गया

जफराबाद के एक हिंदू व्यक्ति समर दास ने भी इनसाइट टीम को बताया कि कैसे मुस्लिम भीड़ ने उनके घर को घेर लिया।

समर दास ने बताया, “भीड़ ने मेरे घर में घुसकर पत्थर और ईंटें फेंकी। मेरे सिर पर चोट लगने से मैं गिर गया। फिर उन्होंने मेरे घर में घुसकर अलमारी तोड़ दी और 2 भरी सोना और 20,000 रुपये नकद ले गए। मैंने अपनी आँख की सर्जरी के लिए बंधन बैंक से पैसे निकाले थे। उन्होंने मेरी पत्नी की गर्दन पर चाकू रखकर कीमती सामान और झुमके माँगे।”

दास ने कहा, “उन्होंने धमकी दी है कि मेरा घर जला देंगे। उन्होंने मेरे घर पर बम फेंके। मेरे दो भाई घायल हो गए। मेरी बेटी भी बम हमले में चोटिल हुई। अभी के लिए बीएसएफ की मौजूदगी की वजह से हम सुरक्षित हैं।” उन्होंने बताया कि बार-बार फोन करने के बावजूद पुलिस 4 घंटे तक नहीं आई। स्थानीय तृणमूल कॉन्ग्रेस का विधायक कहीं नहीं दिखा।

हिंदू व्यक्ति ने बताया कि पार्टी से जुड़ाव मायने नहीं रखता। उन्होंने कहा, “आप इन जले हुए घरों को देख सकते हैं। अगर टीएमसी नेताओं ने समय पर कार्रवाई की होती तो यह इस तरह नहीं जलता। मैं भी तृणमूल कॉन्ग्रेस से हूँ, फिर भी मेरा घर निशाना बना।”

उन्होंने कहा, “सिर्फ इसलिए कि हम हिंदू हैं। पास के मुस्लिम घरों को कुछ नहीं हुआ। वे सुरक्षित हैं। उन्होंने सिर्फ इन हमलों को अंजाम दिया। यह सब उन्होंने पहले से प्लानिंग बनाकर किया।”

समर दास ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया कि कैसे जफराबाद में हिंदू समुदाय पर हमला करने के लिए मुस्लिमों को एक मस्जिद से निर्देश दिए गए। उन्होंने बताया, “शनिवार रात को सारीतला मस्जिद के माइक से घोषणा की गई थी। कि (मुस्लिमों को) फज्र की नमाज के बाद हथियारों के साथ मैदान में उतरना है।”

हिंदू व्यक्ति ने बताया कि मुस्लिम बहुल इलाके में जिंदगी कितनी मुश्किल हो गई है। उसने कहा, “हम पश्चिम बंगाल में अपनी मातृभूमि पर हमले झेल रहे हैं, जैसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। हमें पूजा करने से रोका जा रहा है। हमारे मंदिरों को आग लगाई जा रही है। देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा और जलाया जा रहा है। हमारा गुनाह क्या है? यह सनातन धर्म पर हमला है।”

समर दास ने ममता बनर्जी, उनके पार्टी नेताओं फिरहाद हकीम और कुणाल घोष पर जफराबाद के हिंदू समुदाय की दुर्दशा को लेकर उदासीन होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “मुस्लिम यहाँ राज करना चाहते हैं। वे जफराबाद से हिंदुओं को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। यह उनका पक्का इरादा है। फिर भी हमारी राज्य की मुख्यमंत्री के कानों में कुछ नहीं जा रहा। यहाँ हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। अगर गुजरात में किसी मुस्लिम का कुत्ता मर जाए, तो हमारी ममता सरकार इसे बंगाल में मुद्दा बना देती है।”

दास ने कहा, “10-11 दिन हो गए (हमले को)। बच्चों को ठीक से खाना नहीं मिला। वे सो नहीं पा रहे। वे डर में हैं कि उनके साथ कुछ हो जाएगा। स्कूल जाने वाले बच्चों की पढ़ाई रुक गई है।”

उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार से हिंदुओं के पुनर्वास और बसाने की माँग की, जो उग्र मुस्लिम भीड़ की हिंसा का शिकार हुए। समर दास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मदद माँगी।

जब 94 साल पहले हुई थी जाति जनगणना और सबसे अधिक निकले थे ब्राह्मण! 4000+ जातियों से लेकर मंडल-कमंडल तक, समझिए जातीय राजनीति का गणित

मोदी सरकार की केन्द्रीय कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की समिति ने हाल ही में जातिगत जनगणना को मंजूरी दी। देश भर में जातिवार आँकड़े नई जनगणना के साथ ही जुटाए जाएँगे। विपक्ष ने इसे जहाँ अपने दबाव का असर बताया तो वहीं मोदी सरकार ने स्पष्ट किया कि कॉन्ग्रेस और INDI गठबंधन लगातार इस मामले पर धोखा करते आए हैं। यह जातिवार आँकड़े कब सामने आएँगे, यह सभी स्पष्ट नहीं हुआ है। सरकार ने भी अगली जनगणना की समयसीमा को लेकर कोई समयसीमा तय नहीं की है।

जातिगत जनगणना बीते कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में चर्चित शब्द रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद और राष्ट्रीय स्तर पर कॉन्ग्रेस ने इसको लेकर खूब हल्ला किया है। जातिगत जनगणना का यह नया प्रयास कब होगा, यह स्पष्ट नहीं है लेकिन इसके साथ ही देश की पहली जातिगत जनगणना की चर्चा भी हो रही है। इसे 1931 में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत करवाया गया था। 1931 में हुई इस जनगणना में कई ऐसी जानकारियाँ सामने आई थीं, जिनकी लगभग 90 वर्षों बाद भी भारतीय राजनीति में प्रासंगिकता है।

क्यों करवाई थी अंग्रेजों ने जातिगत जनगणना?

मोदी सरकार ने बताया है कि उसने यह जनगणना का फैसला इसलिए लिया है ताकि समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत रहे और देश की प्रगति बिना किसी अवरोध के जारी रहे।वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भले ही यह जातिगत जनगणना इसलिए करवाई जा रही हो ताकि देश में समाजिक रूप से पिछड़े लोगों के विषय में जाना जा सके, लेकिन अंग्रेजों के यह जातिगत जनगणना करवाने के पीछे कुछ और कारण थे।

अंग्रेज भारत पर शासन बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते थे। जातिगत जनगणना भी इसी का एक हिस्सा था। जातिगत जनगणना से अंग्रेजों को जानना चाहते थे कि किस इलाके में कौन सा जातीय समूह मजबूत है और उनके लिए समस्या बन सकता है। इसके अलावा वह उस समय देश में चल रहे जातीय आंदोलनों को भी कमजोर करना चाहते थे, क्योंकि यह आंदोलन कभी-कभार जातीय आधार से उठकर अंग्रेजों से आजादी के विरोध का प्रतीक बन जाते थे।

जातिगत जनगणना के समय भारत के जनगणना आयुक्त रहे JH हट्टन ने 1931 की रिपोर्ट में भी इन प्रदर्शनों और आंदोलनों के विषय में लिखा है। अंग्रजों के जातिगत जनगणना करवाने का एक और कारण यह था कि तब ब्रिटिश आर्मी में भर्ती बड़े स्तर पर जाति आधारित होती थी। ब्रिटिश आर्मी में जाट रेजिमेंट, महार रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट समेत कई जाति आधारित रेजिमेंट थीं। कई जातियों को अंग्रेज ‘मार्शल रेस’ (लड़ाका कौमें) कहते थे।

ऐसे में देशव्यापी आँकड़े जान कर अंग्रेज अपनी सेना भी उसी हिसाब से मजबूत करना चाहते थे। जाति आधारित जनगणना से उन्हें स्पष्ट होता कि किन जातियों को बड़ी संख्या में भर्ती किया जा सकता है। इन सबके अलावा आँकड़ों का एक फायदा अंग्रेजों को अपना प्रशासनिक ढाँचा मजबूत करने में था। कई ऐसी जातियाँ थीं, जो ब्रिटिश शासन के दौरान बड़ी संख्या में सरकारी सेवा में थीं। इन सबके विषय में भी अंग्रेजों ने जानकारी जुटाई गई थी।

क्या निकले थे परिणाम?

अंग्रेजों द्वारा करवाई यह जातिगत जनगणना काफी मुश्किलों भरी थी। रिपोर्ट में हट्टन में बताया है कि कहीं लोग जाति गलत बताते हैं तो कहीं वह 10 वर्ष के भीतर अपनी जाति बदल लेते हैं। इसके अलावा रिपोर्ट में बताया गया है कि कई लोग अपने घर की गिनती भी नहीं करवाना चाहते थे।

इस जनगणना से सामने आया कि तब भारत (आज के स्वरुप जैसा) की आबादी लगभग 27 करोड़ थी। इसके भीतर अलग-अलग जातियों की संख्या बताई गई थी। रिपोर्ट से सामने आया था कि तब देश में एक जाति के तौर पर सबसे बड़ी संख्या ब्राह्मणों की है।

रिपोर्ट में बताया गया था कि 1931 के अनुसार, देश में 1.5 करोड़ से अधिक ब्राह्मण आबादी थी। रिपोर्ट बताती है कि तब बंगाल में 14 लाख से अधिक ब्राह्मण जबकि ओडिशा और बिहार में लगभग 9 लाख ब्राह्मण थे। इसके अलावा बॉम्बे राज्य में 11 लाख से अधिक ब्राह्मण थे। मद्रास में भी ब्राह्मण 14 लाख 73 हजार ब्राह्मण थे।

जाटवों को इस जातिगत जनगणना में दूसरा सबसे बड़ा समूह बताया गया था। उनकी संख्या 1.2 करोड़ जबकि राजपूतों को तीसरा सबसे बड़ा समूह बताते हुए उनकी जनसंख्या 81 लाख बताई गई थी। इसके अलावा अहीर, तेली, ग्वाला , कायस्थ और कुम्हार जैसी जातियों की संख्या भी बड़ी संख्या में थी इनकी आबादी 30 लाख से अधिक बताई थी।

इस जनगणना में सामने आया था कि देश में 4000+ जातियाँ हैं। हालाँकि, यह जातियाँ बाद में बढ़ती चली गईं। इसी रिपोर्ट में और भी कठिनाइयाँ सामने आई थीं। जाति को लेकर तब भी समाज में कई समस्याएँ थी, जो इस रिपोर्ट के लिए आँकड़े जुटाने वालों ने इकट्ठा की थी।

आजादी के बाद भी राजनीति को करती रही प्रभावित

1931 में हुई यह जातिगत जनगणना आने वाले दशकों तक भारतीय राजनीति को प्रभावित करती रही। इसमें बताया गया था कि देश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की आबादी 52% है। इसी के आधार पर आगे ‘पिछड़े पावें 100 में 60’ जैसी राजनीति चालू हुई। यही राजनीति आगे चल कर मंडल-कमंडल की राजनीति में भी बदली।

इसी के आधार पर मंडल आयोग का गठन किया गया था। मंडल आयोग के आधार पर ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने आरक्षण में उन जातियों को शामिल करने का फैसला लिया, जो पहले इनमें नहीं आती थी। इससे पहले केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण मिला करता था।

VP सिंह की सरकार ने इसमें OBC को आरक्षण दिया। मंडल आयोग का देश में कड़ा विरोध भी हुआ था। 1990 के बाद से जाति आधारित राजनीति में भी तेजी आई। इसके पीछे भी बड़ा कारण यही मंडल आयोग था और मंडल आयोग का आधार अंग्रेजों की बनाई यह रिपोर्ट थी।

इस घटना के 30 वर्ष बीतने के बाद एक बार फिर से जाति की राजनीति ने जोर पकड़ लिया है। विपक्षी पार्टियों के ने जाति जनगणना को लेकर सरकार को घेरा, लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले के बाद अब उनके हाथ से एक बड़ा मुद्दा भी निकल गया है।

नई जनगणना कब होगी, अभी यह स्पष्ट नहीं है लेकिन यह जरूर साफ़ है कि यह जाति की राजनीति तभी तक है जब तक इसका हौव्वा खड़ा किया गया है। चाहे कर्नाटक हो या बिहार, जाति आधारित सर्वे आने के बाद उस पर कोई बात नहीं होती।

क्योंकि 1990 के बाद से कुछ ही जातियों को आरक्षण का अधिक लाभ मिला है, अगर दोबारा से इसे वर्गीकृत किया गया तो उन्हें ही सबसे अधिक नुकसान होगा। ऐसे में INDI गठबंधन के दल इसे केवल मुद्दा बनाते हैं, आगे के एक्शन प्लान को लेकर कुछ नहीं बनाते।