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कॉन्ग्रेस के भूपेश बघेल सरकार द्वारा संचालित शेल्टर होम की 3 महिलाओं ने लगाया रेप का आरोप, संचालक गिरफ्तार

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में भूपेश बघेल सरकार द्वारा संचालित एक शेल्टर होम में 3 महिलाओं के साथ यौन शोषण का मामला सामने आया है। पुलिस ने एक उज्‍जवला आश्रय स्थल के प्रबंधक को वहाँ की एक महिला से दुष्कर्म करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई तब हुई है, जब एक महिला ने आरोप लगाया कि आश्रय स्थल के कर्मचारियों ने उनको शारीरिक प्रताड़ना दी और रेप किया है।

बिलासपुर सिटी एसपी निमिषा पांडेय ने बताया कि तीन महिलाओं के बयान को एक मजिस्ट्रेट के समाने दर्ज करवाया गया। इनमें से एक महिला ने आश्रय स्थल के प्रबंधक जितेंद्र मौर्य पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। जिसके आधार पर मौर्य को गिरफ्तार कर लिया गया और इस मामले में आगे जाँच की जा रही है।

इस बीच गुरुवार को समिति की एक पूर्व कर्मचारी ने भी एसपी को एक पत्र लिख मौर्य पर गंभीर आरोप लगाया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संस्था में 2012 में काम करने वाली महिला ने बताया, “जितेंद्र मौर्य महिलाओं को अनुचित तरीके से छूता और उनके निजी अंगों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करता था। उसने मुझे भी परेशान करने की कोशिश की। संस्था का मुख्य उद्देश्य प्रत्यावर्तन होने के बावजूद वह महिलाओं को उनके परिवारवालो के साथ नहीं जाने देता था।”

एसपी को लिखे अपने पत्र में पूर्व कर्मचारी ने बताया, “पुरुषों को महिलाओं के कमरे में नहीं जाने दिया जाता था, लेकिन वह (मौर्य) और कभी-कभी अपने दोस्तों के साथ नशे की हालात में उनके कमरे में चले जाते थे। वह कर्मचारियों को उनकी तनख्वाह भी नहीं देता था और इसलिए हमने संस्था छोड़ दिया। उस समय, किसी ने शिकायत नहीं की, लेकिन मीडिया में खबरों को देखने के बाद मैंने शिकायत करने का फैसला किया।”

वहीं पत्र को लेकर बिलासपुर के एसपी प्रशांत अग्रवाल का कहना है कि उन्हें अभी पत्र नहीं मिला है। बता दें कि उज्ज्वला गृह बिलासपुर का संचालन एनजीओ श्री शिवमंगल शिक्षण समिति काफी सालों से कर रही है। 17 जनवरी की रात में संस्था की 3 लड़कियों ने सेक्स रैकेट का आरोप लगाते हुए उज्जवला गृह सेन्टर के संचालक समेत कर्मचारी और अन्य लोगों को मामले में आरोपित बताया था।

किसी तरह आजाद हुई तीन लड़कियों ने जानकारी दी कि उन पर अनावश्यक रूप से दबाव डालकर सेक्स करने के लिए मजबूर किया जाता था। ऐसा नहीं करने पर उनके साथ मारपीट, गाली-गलौज और हिंसक व्यवहार किया जाता था। जिसके बाद 20 जनवरी को जिला अदालत में एक सिविल जज के सामने पीड़ितों का बयान दर्ज कर पुलिस ने महिलाओं को मेडिकल परीक्षण के लिए भेज दिया।

उज्जवला होम से भागी एक 18 वर्षीय लड़की ने बताया, “मुझे पुलिस वहाँ ले गई क्योंकि मेरे माता-पिता मुझे नहीं रखना चाहते थे। फिर, मुझे चौथे दिन एक कमरे में बंद कर दिया गया और मेरा बलात्कार किया गया। मैंने यह बात जज को बताई।”

बता दें 18 वर्षीय रेप पीड़ित लगभग 1 महीने से उज्ज्वला शेल्टर होम में रह रही थी। उसके साथ 19 और 20 साल की दो और लड़कियाँ किसी प्रकार भागने में सफल हुई थी।

पीड़िता ने आगे बताया, “संस्था की महिला स्टाफ ने मुझे मारा और मुझे एक कमरे में बंद कर दिया, जहाँ मौर्या ने मेरे साथ जोर जबरदस्ती की। वह हर बार मुझे ऐसा करने की धमकी देता था जब भी मैं वहाँ से भागने या किसी को सचेत करने की कोशिश करती। वे मुझे मेरे परिवार के साथ बात भी नहीं करने देते थे।”

आश्रय गृह से भागी 19 वर्षीय महिला ने कहा, “हमें ठीक से खाना नहीं दिया जाता था, लेकिन वे हमें पीने के समान में कुछ दवाइयाँ मिला कर पिलाते थे, जिससे हमें नींद आ जाती थी।”

वहीं 20 वर्षीय लड़की ने बताया कि हमें थाने जाने से भी डर लगता है। क्योंकि पिछली बार हमें चुप रहने की धमकी दी गई थी। बता दें पीड़ितों ने इस पूरी घटना में पुलिस पर भी मामले में मिली भगत का आरोप लगाया है। हालाँकि, बयान दर्ज होने के बाद लड़कियों को वापस सरकंडा थाने ले जाया गया है।

महिलाओं द्वारा संस्था संचालक एवं संस्था के कर्मचारियों के विरुद्ध की गई शिकायत गंभीर प्रवृत्ति की होने के कारण उच्चाधिकारियों ने संस्था में निवासरत शेष 7 महिलाओं को उनके परिजन एवं अन्य संस्था में स्थानांतरित किया है। इसके साथ ही वर्तमान में संस्था में किसी भी महिला के रहने पर रोक लगा दी गई है।

जब एयरपोर्ट, उद्योग, व्यापार आदि सरकार के हाथ में नहीं, तो फिर मंदिरों पर नियंत्रण कैसे: सद्गुरु

मंदिरों पर सरकार का स्वामित्व या नियंत्रण देश में एक प्रमुख विषय रहा है। इस पर अब सद्गुरु जग्गी वासुदेव का एक वीडियो ट्विटर पर खूब शेयर किया जा रहा है। समाचार चैनल सीएनएन के रिपोर्टर आनंद नरसिम्हन के साथ इस बातचीत को सद्गुरु ने अपने ट्विटर अकाउंट से एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “हम ऐसे समय में रहते हैं जहाँ हम समझते हैं कि सरकार को एयरलाइंस, हवाई अड्डों, उद्योग, खनन, व्यापार का प्रबंधन नहीं करना चाहिए, लेकिन फिर यह कैसे है कि सरकार द्वारा पवित्र मंदिरों का प्रबंधन किया जा सकता है। ये किस तरह से सरकारी प्रबंधन योग्य हो गए?”

इस वीडियो में सद्गुरु ईस्ट इण्डिया द्वारा लाए गए ‘मद्रास रेगुलेशन 1817’ का जिक्र करते हुए बताते हैं कि किस तरह मंदिरों पर अधिकार ज़माने के लिए मद्रास रेगुलेशन-111, 1817 लाया गया, लेकिन ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1840 में यह रेगुलेशन वापस ले लिया था। इसके बाद, 1863 में रिलिजियस एंडोवमेंट एक्ट लाया गया, जिसके अनुसार मंदिर ब्रिटिश ट्रस्टी को सौंप दिए गए।

ये ट्रस्टी ही मंदिर चलाते थे, लेकिन सरकार की दखलअंदाज़ी इसमें न्यूनतम होती थी। मंदिर का पैसा ज़्यादातर मंदिर के कार्यों के लिए ही प्रयोग किया जाता था। सैकड़ों मंदिर इस एक्ट के अनुसार चलते थे। जग्गी वासुदेव बताते हैं कि फिर ब्रिटिश सरकार ‘द मद्रास रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडावमैंट एक्ट-1925’ ले आई, जिससे अब हिन्दुओं के अलावा मुस्लिम और ईसाई संस्थाएँ भी इस कानून के दायरे में आ गईं। ईसाइयों और मुस्लिमों ने इसका कड़ा विरोध किया, तो सरकार को ये कानून दोबारा लाना पड़ा था।

विरोध के चलते ईसाई और मुस्लिमों को इस दायरे से बाहर करना पड़ा और नया कानून बनाया गया जिसका नाम था – ‘मद्रास हिन्दू रिलिजियस एंड एंडोवमेंट एक्ट-1927’। 1935 में इस एक्ट में बड़े बदलाव किए गए। आज़ादी के बाद तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 1951 में एक कानून पारित किया- ‘हिन्दू रिलिजियस एंड एंडोवमेंट एक्ट’।

इस कानून को मठों ओर मंदिरों ने मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार को बहुत सी धाराएँ हटानी पड़ीं और 1959 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस राज्य सरकार ने हिन्दू रिलिजियस एंड चेरिटेबल एक्ट पास किया और बोर्ड भंग कर दिए गए। अब सरकारी ‘हिन्दू रिलिजियस एंड चेरिटेबल एंडावमेंट विभाग’ होता था, जिसका प्रमुख कमिश्नर होता है। तबसे मंदिरों में दान और चढ़ावे की 65 से 70% राशि प्रशासकीय कार्यों पर खर्च होती है।

सद्गुरु जग्गी कहते हैं, “अब 37,000 मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। सिर्फ एक समुदाय के मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। आप ऐसा किसी भी अन्य देश में नहीं सुनेंगे। हिन्दू मंदिरों की बात करते हुए अक्सर लोग कहते हैं कि चर्च, गुरुद्वारों और मस्जिदों का भी नियंत्रण किया जाना चाहिए। जबकि मैं कहता हूँ सेक्योलर देश में सरकार को मंदिरों या धार्मिक स्थलों में हस्तक्षेप से दूर रहना चाहिए चाहे वो किसी भी धर्म का हो।”

“यह समाधान नहीं है, जरुरी चीज यह है कि इतने सारे लोग जहाँ अपनी आस्था लेकर जाते हैं उन्हें आजाद होना चाहिए। उनके मानवाधिकारों के लिए यह होना चाहिए। अब विवाद और तर्क कुछ लोग यह देते हैं कि ये राजा के नियंत्रण में थे, तब वो सरकार थे इसलिए अब भी ये सरकार के ही पास होने चाहिए। यह सच्चाई नहीं है। राजा श्रद्दालू होते थे। वो कुछ मामलों में इतने बड़े श्रद्दालू हुआ करते थे कि कुछ साम्राज्यों में देवताओं को ही राजा मान लिया जाता था। राजा देवता के दीवान के रूप में काम करते थे। यानी हमारे मंत्री, और इस तरह सिर्फ देवता के नाम पर देवता के प्रतिनिधि की तरह वह राज करते थे। इस कारण वो लोग हमेशा दूसरी तरह के लोग रहे हैं।”

सरकारी नियंत्रण में मंदिरों की हो रही फजीहत का जिक्र करते हुए सद्गुरु कहते हैं, “यह खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में है। खासकर तमिलनाडु के मंदिरों का निर्माण बेहद खूबसूरती से हुआ है। उनकी इंजिनयरिंग और उनका आर्किटेक्चर.. अगर आप देखेंगे कि उन्होंने हजार-बारह सौ साल पहले किस तरह का निर्माण किया है, यह सब मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। लेकिन बाद में यह सब चुरा लिया गया। सब कुछ बर्बाद होता रहा क्योंकि लोगों की भावनाएँ मंदिरों के प्रति उतनी प्रबल नहीं रहीं।”

“मेरी दिलचस्पी इन सब बातों में नहीं है। मेरी दिलचस्पी इस बात में है कि मौलिक रूप से अगर आप इस देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो आपको सभी लोगों को साथ लेकर चलना होगा। आप लोगों के साथ भेदभाव नहीं कर सकते। सबके पास समान अधिकार होने चाहिए। तमिलनाडु के मंदिरों को स्वतंत्र करना ही होगा।”

बातचीत में ईशा फाउंडेशन के संस्थापक जग्गी वासुदेव (सद्गुरु) कहते हैं कि तमिलनाडु राज्य में यह मंदिर और आस्था पूरे नियंत्रण में है और अगर आप एक नया मंदिर बनाना चाहते हैं जो कि यदि प्रसिद्ध हो जाता है, तो फ़ौरन सरकार की ओर से इसे टेक ओवर करने का नोटिस आ जाएगा। वह सवाल करते हैं कि आखिर एक सेक्युलर देश में यह कैसे हो सकता है?

सद्गुरु आगे कहते हैं, “आप एक नई आस्था का निर्माण करिए अगर इतना जरुरी है, लेकिन चली आ रही आस्था के साथ बहुसंख्यक आबादी की आबादी की आस्था का संचालन सरकार के नियंत्रण में है। तमिलनाडु के कई मंदिरों में जो प्राचीन पत्थर थे, जिन पर खूबसूरत कला थी, उन पर सिल्वर पेंट लगा दिया गया।”

“मंदिर निर्माण के विज्ञान को हाशिए पर रख दिया गया है। सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। मेरा सवाल ये है कि मौलिक अधिकारों का दमन क्यों किया जा रहा है? यह वो चीजें हैं जो दोबारा वापस नहीं आने वालीं। अब समय आ गया है इन्हें स्वतंत्र किया जाना चाहिए। लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो जाएगा। मैं इसे अपमानजनक मानता हूँ। क्या उन्हें लगता है कि बहुसंख्यक आबादी अपनी आस्था का प्रबंधन नहीं कर सकती? हम ऐसे समय में हैं, जब हमें लगता है कि सरकार को एयरलाइन, पोर्ट्स, बिजनेस, माइनिंग आदि को समाज के हाथों में देना चाहिए, तब मंदिरों को सरकार के नियंत्रण में देने की बात कैसे कर सकते हैं?”

भारत की कोविड वैक्सीन के लिए दुनिया के करीब 92 देश बेताब: भेजी गई म्यांमार, सेशेल्स और मारीशस की डोज

वैक्सीन मैनुफैक्चरिंग के बाद अब भारत बड़े वैक्सीन सप्लायर के रूप में भी आगे बढ़ रहा है। भारत के विभिन्न राज्यों में वैक्सीनेशन प्रोग्राम तेजी से चल रहा है। वैक्सीनेशन प्रोग्राम शुरू होने के बाद से भारत में इसके बहुत ही कम साइड इफ़ेक्ट देखे गए है। वहीं दुनिया के करीब 92 देशों ने भारत की कोवैक्सीन और कोविशील्ड मेड इन इंडिया कोरोना वैक्सीन की माँग की है।

कौन सी कंपनी कर रही है वैक्सीन का उत्पादन

भारत की स्वदेशी वैक्सीन आक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका के कोविशील्ड टीके का सीरम इंस्टीट्यूट उत्पादन कर रहा है जबकि कोवैक्सीन का उत्पादन भारत बायोटेक कर रहा है। हाल ही में रिपोर्ट आई हैं कि चीन की वैक्‍सीन ज्यादा प्रभावशाली नहीं, ऐसे में भारत की बनी वैक्‍सीन की डिमांड बढ़ना लाजमी है।

कौन-कौन सा देश कर रहा है वैक्सीन की माँग

गौरतलब है कि कुछ देशों ने भारत सरकार से इसकी माँग की है तो कुछ सीधे वैक्सीन डेवलपर कंपनियों को इसके ऑर्डर भेज रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत की वैक्सीन को लेकर डोमिनिकन रिपब्लिक अपनी काफी दिलचस्पी दिखा रहा है। वहाँ के प्रधानमंत्री रूजवेल्ट स्केरिट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा हैं। इस पत्र में उन्होंने विशेषरुप से वैक्सीन के खेप को उनके देश भेजने का अनुरोध किया है।

महामारी के घातक परिणामों से त्रस्त पीएम ने अपने पत्र में मोदी से कहा है कि पूरी विनम्रता के साथ मैं आपसे वैक्सीन भेजने का अनुरोध करता हूँ, ताकि हम अपने लोगों को महामारी से सुरक्षित कर सकें।

डोमिनिकन रिपब्लिक से पहले वैक्सीन को लेकर ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख चुके है। अनुरोध पत्र भेजने के बाद ब्राजील का विमान भी कोरोना वैक्सीन लेने के लिए भारत पहुँच चुका है। इसके अलावा बोलीविया की सरकार ने 50 लाख डोज कोरोना वैक्सीन के लिए सीरम इंस्टीट्यूट के साथ कॉन्ट्रैक्ट किया है।

इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, जापान, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, वियतनाम और थाईलैंड भी भारत की वैक्सीन के लिए बेताब हैं।

पड़ोसी देशों को पहले मिलेगी भारत की वैक्सीन की खेप

भारत सरकार अपने पड़ोसी नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार समेत कई पड़ोसी देशों को पहले वैक्सीन की खेप भेजेगी। इसी के तहत कई देशों को वैक्सीन की आपूर्ति भी की जा चुकी है तो वहीं कुछ देशों को आने वाले कुछ ही दिनों में की जाएगी। इसको लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट कर कहा था, नेपाल ने भारतीय वैक्सीन सबसे पहले पाई। हम पड़ोसियों की मदद सबसे पहले कर रहे हैं।

इसके साथ ही उन्होंने ट्वीट में बांग्लादेश के साथ वैक्सीन मैत्री को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। वैक्सीन को मंजूरी मिलने के बाद भारत ने घोषणा की थी कि वह अपने पड़ोसी देशों भूटान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार और सेशेल्स को बहुत जल्द वैक्सीन की आपूर्ति करेगा।

जबकि श्रीलंका, अफगानिस्तान और मॉरीशस में वैक्सीन की आपूर्ति तब की जाएगी जब वहाँ की नियामक संस्थाएँ भारतीय वैक्सीन को स्वीकृति प्रदान कर देंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर पाकिस्तान भी भारत से वैक्सीन की डिमांड करता है तो भारत को उसे देने में कोई दिक्कत नहीं है।

बता दें, कई देशों से आ रहे माँगों के बीच भारत से बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और मालदीव देशों को कोविड टीके की खेप भेजी जा चुकी है। भारत कुछ ही दिनों में म्यांमार, सेशेल्स को भी covid-19 के टीके की आपूर्ति करेगा। भारत ने सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया द्वारा उत्पादित कोविशील्ड टीके की 1,50,000 खुराक भूटान को जबकि 1,00,000 खुराक मालदीव को भेजी थी। इसके अलावा म्यांमार के लिए शुक्रवार को कोविशील्ड की 15 लाख खुराक भेजने की बात कही गई थी। जिसे आज सेसेल्स और मारीशस को भेजे जाने वाले डोज के साथ रवाना कर दिया जाएगा।

भाजपा दाढ़ी, टोपी, बुर्का बैन कर देगी: ‘सांप्रदायिक BJP’ को हराने के लिए कॉन्ग्रेस-लेफ्ट से हाथ मिलाने वाली AIDUF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल का जहरीला भाषण

असम की सत्ता से ‘साम्प्रदायिक’ भाजपा को हटाने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाले ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) समेत वाम दलों, जैसे- भाकपा, माकपा, भाकपा (माले) और आँचलिक गण मोर्चा के साथ गठबंधन करने के एक दिन बाद ही अजमल ने अपना धर्मनिरपेक्षता का मुखौटा हटाते हुए धुबरी में बेहद भड़काऊ और सांप्रदायिक भाषण दिया।

बुधवार (जनवरी 20, 2021) को, असम में धुबरी जिले के गौरीपुर इलाके में एक रैली को संबोधित करते हुए, AIUDF प्रमुख ने कुछ बेहद भड़काऊ बयान देकर भाजपा के खिलाफ मुस्लिमो में डर पैदा करने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि अगर भाजपा राज्य में दोबारा सत्ता में आती है, तो वह मस्जिदों को नष्ट कर देगी, और राज्य के मुस्लिमों पर कई प्रतिबंध लगा दिए जाएँगे। उन्होंने कहा, “भाजपा दुश्मन है, देश की दुश्मन, भारत की दुश्मन, महिलाओं की दुश्मन, मस्जिदों की दुश्मन, दाढ़ी की दुश्मन, तलाक की दुश्मन, बाबरी मस्जिद की दुश्मन।”

बदरुद्दीन अजमल ने कहा, “क्या आप इस तरह एक पार्टी को वोट देंगे? अब आपको अधिक सावधान रहने की जरूरत है। अगर आप सावधान नहीं हैं, और अगर भाजपा असम में फिर से सरकार बनाती है तो आपको बुर्का पहनकर आने की इजाजत नहीं होगी, आप चेहरे पर दाढ़ी के साथ घर से बाहर नहीं निकल पाएँगे, आपको ये स्कलकैप (जालिदार टोपी) पहनने की इजाजत नहीं होगी, आपको मस्जिदों में अज़ान जपने की इजाजत नहीं होगी। हम इस तरह एक जगह पर रह पाएँगे?”

AIUDF अध्यक्ष ने और अधिक भड़काऊ टिप्पणी करते हुए कहा कि भाजपा ने असम में कई मस्जिदों को अपना निशाना बनाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने देश भर में 3,500 मस्जिदों को सूचीबद्ध किया है, और यदि केंद्र में भाजपा फिर से सत्ता में आती है, तो सरकार इन मस्जिदों को ध्वस्त कर देगी। अजमल ने अपने भाषण में कहा, “मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक की प्रक्रिया को समाप्त कर दिया। बाबरी मस्जिद गिराकर मंदिर का निर्माण किया।”

गौरतलब है कि इस साल कुछ महीने बाद देश में 05 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं जिनमें से एक असम भी है। हाल ही में, गुवाहाटी में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कॉन्ग्रेस, एआईयूडीएफ, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (माले) और आँचलिक गण मोर्चा, यानी 06 पार्टियों ने साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

शाहजहाँ: जिसने अपनी हवस के लिए बेटी का नहीं होने दिया निकाह, वामपंथियों ने बना दिया ‘महान’

आतंकी संगठन आईएसआईएसआई के बारे में जब हम पढ़ते हैं कि वह अल्पसंख्यक यजीदी महिलाओं को यौन गुलाम बना रहा है तो हमें आश्चर्य होता है, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल बादशाहों ने भी बहुसंख्यक हिंदू महिलाओं को बड़े पैमाने पर यौन दासी यानी सेक्स स्लेव्स बनाया था।

इसमें मुगल बादशाह शाहजहाँ का हरम सबसे अधिक बदनाम रहा, जिसके कारण दिल्ली का रेड लाइट एरिया जीबी रोड बसा। शाहजहाँ के हरम में 8000 रखैलें थीं जो उसे उसके अब्बू जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने अब्बू की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छँटनी की तथा बुजुर्ग महिलाओं को भगा कर अन्य हिन्दू परिवारों से जबरन महिलाएँ लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।

कहते हैं कि उन्हीं भगाई गई महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जीबी रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था। यह शख्स यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी। 

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने अपनी किताब travels in the mughal empire में इस विषय में टिप्पणी की थी कि महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार, जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था, राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था और नपुसंक बनाए गए सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिति, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी।

शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए, आठ हजार औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा। आप यह जानकर हैरान हो जाएँगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं, बल्कि उसका असली नाम ‘अर्जुमंद-बानो-बेगम’ था और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हाँकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी ।

मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी। इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3 शादियाँ और की, यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा था, जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था। अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की?

शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी, जो कि उसकी पहली बीबी थी। शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुँवारी लड़की नहीं थी बल्कि वो भी शादीशुदा थी और उसका शौहर शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम ‘शेर अफगान खान’ था। शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।

गौर करने लायक बात यह भी है कि 38 वर्षीय मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला था। शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ सम्भोग करने का दोषी तक कहा है।

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को भोगना शुरू कर दिया था। जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया। बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में चर्चा शुरू हुई, तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गई और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा – “माली को अपने द्वारा लगाए पेड़ का फल खाने का हक है।”

इतना ही नहीं, जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था। कहा जाता है कि एक बार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ ने तंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।

दरअसल, अकबर ने यह नियम बना दिया था कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी। इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था कि मुगल खानदान की लड़कियाँ अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी, नौकर के साथ-साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी। कहा जाता है कि जहाँआरा अपने बाप के लिए लड़कियाँ भी फँसाकर लाती थी।

जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था। शाहजहाँ के राज ज्योतिषी की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा देकर बाप के हवाले कर दिया था, जिससे शाहजहाँ ने अपनी उम्र के 58वें वर्ष में उस 13 वर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राह्मण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

The legacy of muslim rule in India के अनुसार शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि वह तिमूर (तैमूरलंग) का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तैमूर से और उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से वह इतना प्रभावित था कि उसने अपना नाम तैमूर द्वितीय रख लिया था।

बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के विरुद्ध युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी। अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था, “शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार कर लिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था।” शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय दिया। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया और अनेकों उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।

1632 में कश्मीर से लौटते समय शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनाई गई महिलाएँ ‘घर वापसी’ करते हुए फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया। उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका, तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। 

जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सिर काट दिया गया। हजारों महिलाओं को जबरन मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।

हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था। 

शाहजहाँ के राज में इस्लाम का ही कानून था। या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उतर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4,000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा था। जवान लड़कियाँ इसके हरम भेज दी जाती थीं। शाहजहाँ के आते-आते मुगल शासन पुराने मुसलमानी ढर्रे पर चल पड़ा था।

इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी के ’बादशाहनामे’ के अनुसार शाहजहाँ के ध्यान में यह बात लाई गई कि पिछले शासन में बहुत से मूर्ति मंदिरों का निर्माण प्रारंभ किया गया था किन्तु कुफ्र के गढ़ बनारस में बहुत से मंदिरों का निर्माण पूरा नहीं हुआ था। काफिर उनको पूरा करना चाहते थे। मजहब के रक्षक बादशाह सलामत ने आदेश दिया कि बनारस और उसके पूरे साम्राज्य में तमाम नए मंदिर ध्वस्त कर दिए जाएँ। इलाहाबाद के सूबे से सूचना आई कि बनारस में 76 मंदिर गिरा दिए गए हैं। यह घटना 1633 की है। हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करने की प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।

1634 में शाहजहाँ के सैनिकों ने बुन्देलखंड के राजा जुझारदेव की (जो जहाँगीर के कृपा पात्रों में था) रानियों, दो पुत्रों, एक पौत्र और एक भाई को पकड़कर शाहजहाँ के पास भेजा। शाहजहाँ ने दुर्गाभान और दुर्जनसाल नामक अवयस्क एक पुत्र और पौत्र को जबरन मुसलमान बनवाया। एक वयस्क पुत्र उदयभान और भाई श्यामदेव का, इस्लाम स्वीकार न करने के कारण वध करवा दिया। रानियों को हरम में भेज दिया गया। 

गुलामी के लिए अथवा व्यभिचार के लिए इस मुस्लिम व्यवहार के विपरीत दुर्गादास राठौर ने औरंगजेब की पौत्री सफीयुतुन्निसा और पौत्र बुलन्द अख्तर को, जिन्हें औरंगजेब का पुत्र और शाहजहाँ का पौत्र शाहजादा अकबर उसके संरक्षण में छोड़ गया था, नियमानुसार इस्लाम की शिक्षा दिलाकर, सम्मानपूर्वक औरंगजेब को 13 वर्ष के बाद, जब वह जवान हो गए थे, वापस कर दिया। यह इस्लाम और हिन्दू धर्म की शिक्षा के कारण हुआ। यह दो ऐतिहासिक उदाहरण हिन्दू और मुसलमान मानसिकता के अंतर पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त हैं।

शाहजहाँ की धार्मिक नीतियाँ लगातार विवाद में रहीं। हिंदू माता की कोख से जन्मी ये संतान इस्लाम को लेकर ज्यादा ही आग्रही था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भारी कर लगाए। साथ ही कई ऐसे आदेश दिए, जो हिंदुओं को परेशान करने वाले थे।

1634 ई. में उन्होंने ही ये बात शुरू की कि अगर कोई हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़का शादी करें तो ये शादी तब तक जायज नहीं होगी, जब तक कि अगला पक्ष इस्लाम न स्वीकार कर ले। ये भी कहा जाता है कि हिंदुओं को मुसलमान बनाने के लिए इस मुगल बादशाह के राज में एक अलग विभाग बना हुआ था, जो केवल यही बात सुनिश्चित करता था। इस बात का जिक्र कई जगहों पर मिलता है।

अकबर ने उन किसानों के परिवारों को गुलाम बनाने और बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया था, जो सरकारी लगान समय से नहीं दे पाए थे। शाहजहाँ ने इस प्रथा को फिर से चालू कर दिया। किसानों को लगान देने के लिए अपनी स्त्रियों और बच्चों को बेचने पर मजबूर किया जाने लगा। किसानों को जबरन पकड़ कर (गुलामी में) बेचने के लिए मंडियों और मेलों में ले जाया जाता था। उनकी अभागी स्त्रियाँ अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिये रुदन करती चली जातीं थीं। शाहजहाँ के आदेश थे कि इन हिन्दू गुलामों को हिन्दुओं के हाथ न बेचा जाए। मुसलमान मालिकों के पास गुलामों का अन्ततः मुसलमान हो जाना निश्चित था।

शाहजहाँ ने जितने भी युद्ध किए। उनमें कहीं भी उसने हिंदुओं के प्रति उदारता का प्रदर्शन नहीं किया, वह सदा उनके प्रति क्रूर बना रहा। जिससे देश की बहुसंख्यक प्रजा उससे आतंकित रही। हिंदू इतने घृणित अनाचार को सहन नहीं कर सकता था। इसलिए उसे विद्रोही होना था और विद्रोही बनकर अपनी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करना था।

यही कारण था कि हिंदुओं ने इस अनाचारी बादशाह को और प्रेम के कथित पुजारी व्यभिचारी शासक से मुक्ति पाने हेतु उसे दर्जनों बार चुनौती दी और उसे सर्वथा एक असफल शासक बनाकर रख दिया। इतना असफल कि उसका अपनी संतान पर भी नियंत्रण नहीं रहा और एक दिन उसके अपने पुत्र औरंगजेब ने ही उसे जेल में डाल दिया।

1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी बेटी जहाँआरा के साथ आगरा के किले में बंद कर दिया, परन्तु औरंगजेब ने अपने बाप की अय्याशी का पूरा इंतजाम रखा। अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने साथ 40 रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी और दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को किले से बाहर निकाल दिया। 

उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था। शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही 22 जनवरी 1666 में 74 साल में हुई। बताया जाता है कि अत्यधिक कामोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण उसकी मौत हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था। अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी बता कर महान बताया जाता है?

अगर शाहजहाँ को अपनी बीबी के प्रति थोड़ा भी प्यार होता तो मुमताज के साथ शादी करने के बाद वो इतनी रखैलें ना रखता, और ना ही उनकी मौत के बाद उसकी बहन से शादी करता और ना ही पिता-बेटी के पवित्र रिश्ते को कलंकित करता। क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर सकता है? क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमें खाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं? 

शाहजहाँ को प्यार नहीं हैवानियत की हवस थी। उसने अपने अहंकार और शरीर में जलती हवस की ज्वाला को शांत करने के लिए मुमताज से विवाह किया था, ना कि उसकी सुंदरता से। जिसने कभी औरतों की इज्जत ना की हो, वो प्यार की ईबादत को क्या समझेगा। इसलिए ताजमहल को मुमताज की याद का मकबरा कहना गलत होगा।

दरअसल, ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गई है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपाई जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान शिव का मंदिर तेजो महालय है। इतिहासकार पीएन ओक ने पुरातात्विक साक्ष्यों के जरिए बकायदा इसे साबित किया है और इस पर पुस्तकें भी लिखी हैं। असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।

कर्नाटक: शिवमोगा में विस्फोटक ले जा रही लॉरी में धमाका, 8 लोगों की मौत

कर्नाटक के शिवमोगा जिला स्थित हुनासोडु गाँव में बृहस्पतिवार (जनवरी 21, 2021) रात एक रेलवे क्रशर साइट पर हुए डायनामाइट विस्फोट में कम से कम आठ लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई है।

जिला कलेक्टर केबी शिवकुमार के अनुसार, रात करीब 10.30 बजे बजरी क्रशर के पास भीषण विस्फोट हुआ, जिससे न केवल शिवमोगा, बल्कि पड़ोसी चिकमगलूरु और दावणगेरे जिलों में भी भूकंप जैसे झटके महसूस हुए।

धमाके के बाद लोग दहशत में अपने घरों से बाहर निकल आए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने लिखा, “शिवमोगा में जान-माल के नुकसान से आहत हूँ। शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना। घायलों के जल्द ठीक होने की प्राथना करता हूँ। राज्य सरकार प्रभावितों को हर संभव सहायता प्रदान कर रही है।”

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि विस्फोट इतना तेज था कि घरों की खिड़की के शीशे टूट गए और सड़कों पर भी दरार पैदा हो गईं। धमाके से ऐसा लगा जैसे भूकंप आ गया हो। कुछ माह पहले भी बेंगलुरू में इस तरह की संदिग्ध ध्वनि सुनाई दी थी, जिसने सभी लोगों को हैरान कर दिया था। हालाँकि, तब किसी भी तरह के किसी जान-माल का नुकसान नहीं हुआ था।

बाद में, यह सामने आया कि डायनामाइट ले जाने वाली एक लॉरी में यह धमाका हुआ। ये विस्फोटक खनन के लिए ले जाए जा रहे थे लेकिन कई लोगों की जान लेने के सेहत ही ये लॉरी भी क्षतिग्रस्त हो गई। जिले के अधिकारियों के अनुसार, मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है। यह विस्फोट शिवमोगा जिले (ग्रामीण) के बाहरी इलाके हुँसुर में हुआ।

विस्फोट के तुरंत बाद, शिवमोगा एसपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौके पर जायजा लेने के लिए पहुँचे। मौके से मिले शुरुआती दृश्यों में पता चला कि विस्फोट में कम से कम 5 लोगों की मौत हो गई।

चीनी माल जैसा चीन की कोरोना वैक्सीन का असर? मीडिया के सहारे साख बचाने का खतरनाक खेल

चीन अपनी कोरोना वैक्सीन को लेकर इतना भी आश्वस्त नहीं है कि उस पर सही जानकारी दे। ऐसे में यदि कोई उसकी आलोचना कर दे तो एक पूरा तंत्र उस व्यक्ति को झुठलाने पर लग जाता है। मगर न चीनी कंपनी और न वहाँ की मीडिया, अपने वैक्सीन की विश्वसनीयता साबित करने का कोई प्रयास करती है और न ही उसके प्रभावकारी डेटा के बारे में कोई जानकारी देती है। बस दूसरों की बुराई करके तथ्यों से बरगलाने की कोशिश चलती रहती है।

सीएनन की रिपोर्ट के अनुसार, हाल में चीन को अपनी वैक्सीन विकासशील देशों को मुहैया करवाने के लिए काफी तारीफ मिली थी। कहा गया था कि चीनी कंपनी सिनोवेक (Sinovac ) और सिनोफर्म (Sinopharm) द्वारा निर्मित वैक्सीन को अन्य पश्चिमी देशों की वैक्सीन की तरह कोल्ड स्टोरेज में रखने की आवश्यकता नहीं है, जबकि अन्य कंपनियों द्वारा निर्मित वैक्सीन सिर्फ़ ठंडे तापमान में ही रह सकती है।

ये सारी बातें ऐसी थीं जो हर हाल में चीनी वैक्सीन को ज्यादा बेहतर दिखा रहीं थी। लेकिन, धीरे धीरे इन दावों की पोल-पट्टी खुलनी शुरू हो गई है। एक समय तक चीन की दोनों कंपनियाँ अपनी वैक्सीन के 78% प्रभावी होने का दावा ठोक रही थीं, जो WHO के तय किए गए मानक (50%)  से काफी अधिक था। 

इसके अलावा यह प्रतिशत ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एस्ट्राजेनेका (AstraZeneca) वैक्सीन और अमेरिका में विकसित एमआरएनए-आधारित टीकों (mRNA-based vaccines) से भी अधिक प्रभावी था। मगर, अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले ताजा आँकड़े चीन के इस दावे को खारिज करते हैं।

वैक्सीन को लेकर अपर्याप्त डेटा और बेमेल रिपोर्ट्स

रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील ने सिनोवेक वैक्सीन के लास्ट स्टेज ट्रॉयल में पाया कि चीनी वैक्सीन का प्रभाव 50.38% है न कि 78%। यानी उनके हिसाब से वास्तविक प्रभावी क्षमता अब भी स्पष्ट नहीं है। इसी तरह तुर्की ने इसकी प्रभावी क्षमता को 91.25% रखा और इंडोनेशिया ने इसके प्रभावी दर को 65.3% रखा। इसके बाद ब्राजील ने अपने हालिया बयानों में कहा कि कुछ केसों में दूसरों की तुलना में इसकी प्रभावकारिता का स्तर अधिक है।

अब इस तरह भिन्न-भिन्न आँकड़े आने के बाद कुछ देशों ने चीन की इन वैक्सीन को समीक्षा में रखा है और कुछ ने इसे रोल आउट करने का निर्णय लेकर कंपनी से सही जानकारी देने का अनुरोध किया है।

ऐसे में ग्लोबल टाइम्स के संपादक हू-शिजिन (Hu Xijin ) ने अपने देश की साख बचाने के लिए अपने लेख में दावा किया है कि अमेरिका समेत कुछ पश्चिमी देश चीन द्वारा निर्मित वैक्सीन को लेकर नकारात्मक सूचना प्रकाशित कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “चीन की वैक्सीन की छवि धूमिल करने के लिए प्रेस बाहर आ गया है। उन्हें लग रहा है कि पूरा विश्व फाइजर और अन्य अमेरिकन व पश्चिमी देशों का इंतजार करेगा कि वो अतिरिक्त वैक्सीन तैयार करें और उनका टीकाकरण हो।”

ध्यान देने वाली बात है ग्लोबल टाइम्स यहाँ भी वैक्सीन के प्रभाव पर जानकारी नहीं दे रहा, बल्कि चीनी कंपनी की साख बचाने के लिए दूसरी कंपनियों पर तंज कस रहा है। अपने हालिया संपादकीय में ग्लोबल टाइम्स के संपादक पश्चिमी मीडिया को कोसते हैं। वह कहते हैं, “ऐसे प्रमुख पश्चिमी मीडिया चीनी टीकों के बारे में किसी भी उलटी जानकारी को तुरंत प्रचारित करेंगे और लोगों की मानसिकता को उससे प्रभावित करने का प्रयास करेंगे।”

चीन का प्रभाव और मीडिया का खेल

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स पिछले दिनों कोरोना वैक्सीन से होते दुष्प्रभावों के बारे में प्रकाशित की गई थी। लेकिन नैतिकता के आधार पर यदि देखें तो मीडिया चाहें कहीं की भी हो, महामारी से होती मौतों को हड़बड़ी में वैक्सीन से जोड़ना समझदारी नहीं है। जो रिपोर्ट्स वैक्सीन से हो रही एलर्जी की चर्चा कर रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि वैक्सीन से कुछ रिएक्शन हो सकते हैं, लेकिन बिना प्रमाण उन्हें मौतों से जोड़ना गलत है।

बरगलाने वाले शीर्षकों को देने से भी मीडिया को इस समय बचने की जरूरत है। पाठक कई बार हेडलाइन पढ़कर अंदर पूरी खबर नहीं पढ़ना चाहते और उनके मन में भ्रम उठ जाता है कि कोरोना वैक्सीन सुरक्षित नहीं है। भारतीय मीडिया का उदाहरण लें तो अभी तक ढाई लाख लोगों को टीका लगा है और बहुत कम केस एलर्जी या मृत्यु के आए हैं। लेकिन मीडिया हाउस सीधे वैक्सीन से हुई मृत्यु पर बात करने लगे, जबकि इस बात के कोई सबूत ही नहीं है कि मृत्यु का कारण टीका लेना था।

18 जनवरी को कई एजेंसियों ने दावा किया कि यूपी में वैक्सीन लेने के बाद 48 साल के वार्ड बॉय की मृत्यु हो गई जबकि सच्चाई ये थी कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट में साफ कहा था कि इसका टीके से कोई संबंध नहीं है। उसकी मृत्यु का कारण कोई और बीमारी थी।

कॉन्ग्रेस समर्थक साकेत गोखले ने भी ऐसे फर्जी दावे सनसनीखेज बनाकर पेश किए और कहा कि गर्भवती महिलाओं को ये वैक्सीन लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इसके बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं है। सोचिए, ये हाल तब है जब स्वास्थ्य मंत्री कह चुके हैं कि टीके से जुड़ी सारी जानकारी जमीनी स्तर पर उपलब्ध है और 15 जनवरी को शेयर ट्वीट में बता चुके हैं कि किसे वैक्सीन लेने से बचना है।

चीन इस महामारी के समय में भी भारतीय मीडिया को प्रभावित कर रहा है। पिछले सालों में उस पर आरोप रहे हैं कि वो विदेशी पत्रकार को उनके समर्थन में रिपोर्ट लिखने के लिए उकसाता है। वहीं मुख्यधारा का मीडिया इसी प्रोपगेंडे को आगे बढ़ाते हुए चीनी सरकार को अच्छा दिखाने में जुट जाता है और उसी समय भारत के फैसलों को नीचा दिखाता है। हाल में प्रकाशित तमाम वैक्सीन विरोधी लेख यह प्रश्न उठाते हैं कि चीन अपनी साख बचाने के लिए अन्य देश के मीडिया को प्रभावित कर रहा है और अपनी वैक्सीन पर सही तथ्यों को देने से बच रहा है।

मोदी सरकार का 1.5 साल वाला प्रस्ताव भी किसान संगठनों को मंजूर नहीं, कृषि कानूनों को रद्द करने पर अड़े

तीन नए कृषि कानूनों पर गतिरोध दूर करने के लिए बुधवार (जनवरी 20, 2021) को मोदी सरकार द्वारा थोड़ी नरमी दिखाते हुए कानूनों को डेढ़ वर्ष तक निलंबित रखे जाने के प्रस्‍ताव को आज किसान नेताओं ने ठुकरा दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह कहा जा रहा है कि सरकार से 10वें दौर की बातचीत में रखे गए प्रस्‍तावों पर चर्चा के लिए संयुक्त किसान मोर्चा की आज गुरुवार को कई घंटों आम सभा हुई, जिसमें किसान नेताओं ने यह निर्णय लिया।

किसान नेताओं ने अपने निर्णय में कहा है कि नए कृषि कानूनों के डेढ़ साल तक स्‍थगित करने के केंद्र सरकार के प्रस्‍ताव को किसान संगठनों ने खारिज कर दिया है। संयुक्‍त किसान मोर्चा ने बाकायदा बयान जारी कर बताया कि तीनों कृषि कानून पूरी तरह रद्द हों। साथ ही आंदोलन की मुख्य लंबित माँग 3 कृषि कानूनों को रद्द करने और एमएसपी पर कानून बनाने को दोहराया गया। किसान नेताओं ने 26 जनवरी को रिंग रोड पर ही ट्रैक्‍टर परेड करने की बात भी कही है।

बुधवार को 10वीं दौर के बातचीत में केंद्र सरकार ने किसानों को यह भी प्रस्ताव दिया था कि कृषि कानूनों को लेकर एक कमेटी बना देते हैं। आज किसान इसी प्रस्ताव पर बात करने के लिए इकट्ठा हुए थे जिसमें उन्होंने सरकार के प्रस्ताव को पूर्णतया ख़ारिज कर दिया।

गौरतलब है कि बुधवार को बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि आज हमारी कोशिश थी कि कोई निर्णय हो जाए। किसान यूनियन क़ानून वापसी की माँग पर अड़ी थी और सरकार खुले मन से क़ानून के प्रावधान के अनुसार विचार करने और संशोधन करने के लिए तैयार थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय के लिए कृषि सुधार क़ानूनों को स्थगित किया है। जिसे देखते हुए सरकार 1-1.5 साल तक भी क़ानून के क्रियान्वयन को स्थगित करने के लिए तैयार है। कहा जा रहा है कि इस दौरान किसान यूनियन और सरकार बात करें और समाधान ढूँढे।

बुधवार को मीटिंग के बाद किसान नेता दर्शन पाल ने बताया कि बैठक में तीन कृषि कानूनों और एमएसपी पर बात हुई थी। सरकार ने कहा हम तीन कानूनों का एफिडेविट बनाकर सुप्रीम कोर्ट को देंगे और हम 1-1.5 साल के लिए रोक लगा देंगे। एक कमेटी बनेगी जो 3 क़ानूनों और एमएसपी का भविष्य तय करेगी। हमने कहा हम इस पर विचार करेंगे।

कल यानि 22 जनवरी 2021 को सरकार एवं किसानों के बीच होने वाली 11वें दौर की वार्ता से पहले आज किसान नेताओं की तरफ से यह यह फैसला आना बेहद अहम माना जा रहा है। क्योंकि, किसान नेताओं ने बुधवार को सरकार के प्रस्‍तावों को तत्काल स्वीकार नहीं किया था और कहा था कि वे आपसी चर्चा के बाद सरकार के समक्ष अपनी राय रखेंगे। और आज किसान नेताओं के जवाब से यह गतिरोध बढ़ता ही नजर आ रहा है।

आज जिस तरह से किसान नेताओं का कहना है कि तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को पूरी तरह रद्द करने और सभी किसानों के लिए सभी फसलों पर लाभदायक एमएसपी के लिए एक कानून बनाने की बात पर वह कायम हैं। यह किसान आंदोलन की मुख्य माँगे हैं और वे इस पर अडिग हैं। उससे यह साफ़ नजर आ रहा है कि आगे संकट और गहराने वाला है।

तांडव: घृणा बेचो, माफी माँगो, सरकार के लिए सब चंगा सी!

इनकी हिन्दूफोबिया, लगातार हो रहे अपमानसूचक दृश्यों का प्रदर्शन, एक समुदाय विशेष के लोगों का केन्द्र में होना बताता है कि अब हिन्दुओं को वही करना चाहिए जो वो लोग करते हैं!

आर्टिस्टिक फ्रीडम के नाम पर बकवास बंद होना चाहिए। हमें इससे मतलब नहीं कि इस्लाम पर क्यों नहीं बनाते, हमें यह बताना है कि हम पर बनाओगे तो वही हाल होगा जो किसी मैसेंजर पर बनाने पर होता है। यह डर आवश्यक है, क्रिएटिव फ्रीडम कभी भी ऑफेंसिव नहीं होता, क्योंकि वो सस्ता तरीका है। अभी तक चल रहा था, तो क्या आजीवन चलने देते रहें?

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ट्रक ड्राइवर से माफिया बने बदन सिंह बद्दो की कोठी पर चला योगी सरकार का बुलडोजर, दो साल से है फरार

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार माफियाओं के लिए काल बन चुकी है। इसी कड़ी में इस बार यूपी के टॉप टेन माफियाओं में नंबर वन पर लिस्टेड बदन सिंह बद्दो के खिलाफ प्रशासन ने सख्त कदम उठाया है। मेरठ विकास प्राधिकरण ने बदन सिंह बद्दो की आलीशान कोठी ध्वस्त करने की कार्रवाई सुबह से ही शुरू कर दी है। STF और यूपी पुलिस के मोस्ट वांटेड अपराधी ढाई लाख के इनामी बदन सिंह बद्दो की अलीशान कोठी पर एमडीए ने बुलडोजर चलवा दिया। पुलिस ने बद्दो की संपत्ति कुर्क करने के बाद कोठी को जमींदोज करने की बड़ी कार्रवाई की है।

साभार: दैनिक जागरण

मनोज सिंह (डिप्टी कलेक्टर एमडीए) ने मीडिया को को बताया, “बदन सिंह बद्दो की कोठी का निर्माण बिना एमडीए की अनुमति से कराया गया था, जिसका एमडीए में कोई रिकार्ड नहीं है। ऐसे में कोठी अनाधिकृत थी, इसलिए बदन सिंह बद्दो की भाभी कुलदीप कौर को नोटिस देकर जवाब माँगा गया। कुलदीप कौर कोई जवाब नहीं दे पाई, ऐसे में पुलिस की सुरक्षा लेकर कोठी को जमींदोज करने की कार्रवाई की जा रही है।

साभार: दैनिक जागरण

रिपोर्ट के अनुसार, हालाँकि, आज गुरुवार (जनवरी 21, 2021) को टीपीनगर के पंजाबीपुरा स्थित कोठी का सिर्फ 60 फीसद हिस्सा ही टूट पाया है। इस दौरान छह थानों की पुलिस फोर्स और पीएसी के जवान टीपीनगर के पंजाबीपुरा पहुँच गए थे। एमडीए के अफसरों के अलावा एसएसपी से लेकर एसपी सिटी और दो एएसपी मौके पर मौजूद रहे।

साभार: दैनिक जागरण

गौरतलब है कि माफिया डॉन बद्दो 28 मार्च 2019 से फरार है। कहा जा रहा है कि उसके देश में या विदेश में होने की जानकारी किसी को नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में उसकी फरारी में एक जनहित याचिका भी दायर है। हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से इस बारे में जवाब भी माँगा हुआ है। इस तरह से देखा जाए तो बद्दो को पुलिस कस्टडी से भागे दो साल का समय पूरा होने जा रहा है। कहा जाता है कि, पुलिस कस्टडी से उसके फरार होने की कहानी भी बड़ी भी बहुत ही नाटकीय है। फिलहाल, पुलिस के पास अभी तक उसका कोई सुराग नहीं है। इसी वजह से 2.5 लाख का इनामी कुख्यात माफिया डॉन बदन सिंह बद्दो कहीं न कहीं पुलिस के सिए बड़ा सिर दर्द बन गया है।

गौरतलब है कि मेरठ विकास प्राधिकरण की अध्यक्ष और कमिश्नर अनीत सी. मेश्राम ने 18 जनवरी को कोठी धवस्त करने के आदेश जारी किए थे। साथ ही एमडीए की टीम ने बुधवार (जनवरी 20, 2021) को कुख्यात बदमाश बद्दो की आलीशान कोठी का मुआयना किया और फिर ध्वस्तीकरण के लिए रोड मैप तैयार किया था।

फरारी की कहानी बहुत फ़िल्मी है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2019 में एडवोकेट देवेंद्र गुर्जर हत्याकांड में सजायाफ्ता होने के बाद बद्दो को फर्रुखाबाद जेल शिफ्ट किया गया था। उस समय गाजियाबाद में उसकी पेशी होनी थी, जिसके लिए फर्रुखाबाद पुलिस उसे लेकर आ रही थी। 28 मार्च 2019 को बद्दो की पेशी हुई और लौटते समय वह सभी पुलिसवालों को लेकर मेरठ के एक होटल में रुका। होटल मुकुट महल में उसने अल्कोहल पार्टी के दौरान सभी पुलिसकर्मियों को बेहोश कर बड़े आराम से फरार हो गया था।

उस दौरान फर्रुखाबाद जिले के 6 पुलिसकर्मियों सहित कुल 21 लोगों को बद्दो की फरारी में आरोपित बनाया गया था। इनमें मेरठ के कई बड़े व्यापारी, होटल मुकुट महल के मालिक मुकेश गुप्ता, करण पब्लिक स्कूल के संचालक भानु प्रताप भी शामिल थे। बाद में जेल भेज दिया गया था। उसे फरार हुए 2 साल होने को आ गए लेकिन पुलिस को आज तक उसका सुराग नहीं मिला है।

ट्रक ड्राइवर से बना मोस्ट वांटेड माफिया

बद्दो के फरार होने की कहानी जितनी फिल्मी है, उतना ही उसके ट्रक ड्राइवर से माफिया बनने तक का सफर भी है। ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रक ड्राइवर की मामूली सी नौकरी करने वाला बदन सिंह कुछ ही सालों में माफियाओं की दुनिया का बेताज बादशाह बन गया था। बदन सिंह के अतीत को जानने के लिए हमें 25 साल पहले जाना होगा। मेरठ के टीपी नगर का रहने वाला बदन सिंह ढाई दशक पहले पिता के साथ ट्रक चलाता था। इसके बाद समय बीतता गया और मारपीट की छोटी-छोटी घटनाओं से वह सुर्खियों में आता गया। अपनी गुंडागर्दी के चलते उसने वेस्टर्न यूपी के सबसे बड़े दबंग सुशील मूंछ और भूपेंद्र बाफर से कॉन्टैक्ट बनाकर अपराध जगत में एंट्री की।

इसके बाद बदन सिंह बद्दो के अपराधों का सिलसिला शुरू हुआ। पैसे और जमीन के लिए बद्दो पर कई हत्याओं का भी आरोप है। शराब की तस्करी करने और भूमाफिया बनने के साथ उसने केबल कारोबार में भी वर्चस्व हासिल किया। केबल व्यवसायी पवित्र मैत्रेय के मर्डर में भी उसका नाम सामने आया और 2011 में हुई बीएसपी जिला पंचायत सदस्य संजय गुर्जर की हत्या के लिए भी बद्दो वॉन्टेड आरोपित है। इसके अलावा, एडवोकेट देवेंद्र गुर्जर की हत्या के मामले में भी उसे अपराधी घोषित कर आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है।

इसके अपराधों की लिस्ट बहुत लम्बी है। रंगदारी वसूलने के लिए जाना जाने वाले बद्दो ने दो करोड़ रुपए के लिए प्रतिष्ठित व्यवसायी राजेश दीवान को धमकी दी थी। इस मामले में बद्दो के खिलाफ परतापुर और लालकुर्ती थाने में केस दर्ज हैं और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। इसके अलावा, उस पर संपत्तियों पर कब्जा करने और रंगदारी वसूलने के कई अन्य मामलों में मुकदमे दर्ज हैं। इतना ही नहीं, ऐसा कहा जाता है कि अपराध की दुनिया का कोई कोना ऐसा नहीं है, जिसको बद्दो ने न छुआ हो। वह सुपारी किंग के नाम से भी कुख्यात है। बदन सिंह पर यह आरोप है कि वह सुपारी लेकर अब तक कई हत्याएँ करा चुका है।