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‘सरकार मेरी सैंडल दिलावे, ये मोदी और पुलिस की साजिश’ – महिला किसान नेता की सैंडल गायब, वीडियो वायरल

दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के दौरान एक अजीबोगरीब वाकया सामने आया है। एक महिला आंदोलनकारी की सैंडल ही चोरी हो गई, जिसके लिए उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहरा दिया। ग्रेटर नोएडा में चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान जब महिला प्रदर्शनकारी नेता की सैंडल गायब हो गई तो उसने कहा कि ये सरकार और पुलिस की साजिश है।

महिला आंदोलनकारी ने अपने परिचय ‘किसान एकता संघ’ नामक संगठन के महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर गीता भाटी के रूप में दिया है। उन्होंने बताया कि पुलिस-प्रशासन और सरकार की ‘साजिश’ के तहत उनके पाँवों की सैंडल छीन ली गई है, ताकि वो आगे की लड़ाई न लड़ सकें। महिला ‘किसान नेता’ ने कहा कि वो नंगे पाँव भी किसानों की लड़ाई लड़ेंगी और सैंडल गायब होने के सम्बन्ध में FIR भी दर्ज करवाएँगी।

महिला प्रदर्शनकारी प्रदर्शनकारी नेता ने कहा, “मैं इन लोगों के खिलाफ लड़ाई लड़ूँगी। किसानों के पास तो आज खाने के लिए भी नहीं हैं। हमने जैसे-तैसे रुपए जमा कर के किसी तरह एक सैंडल खरीदी थी। अब ये सैंडल छीन ली गई है। अब ये सैंडल मुझे कौन देगा? ये सरकार मेरी सैंडल दिलावे।” वहाँ उपस्थित लोगों ने ‘बहुत बढ़िया’ कह कर उनका उत्साहवर्धन किया और ‘गेता भाटी जिंदाबाद’ के नारे लगाए।

कई लोगों ने उनके इस बयान पर चुटकी भी ली। जहाँ दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से हस्तक्षेप की माँग की, वहीं ‘द स्किन डॉक्टर’ नामक ट्विटर यूजर ने लिखा कि पीएम मोदी इसे ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित कर के संसद सत्र बुला कर सैंडल की व्यवस्था करने की सोच रहे होंगे। वहीं एक व्यक्ति ने तो पीएम मोदी और उनके मंत्रियों से इस्तीफा तक माँग दिया।

उधर राजनेता और पेशेवर प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव पंजाब के किसानों के विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं। रविवार (दिसंबर 6, 2020) को एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, योगेंद्र यादव ने कहा कि बंद के दौरान आवश्यक वस्तुओं के वितरण की भी अनुमति नहीं होगी। उन्होंने कहा कि दोपहर 3 बजे तक चक्का जाम रहेगा। किसान संगठनों ने 8 दिसंबर को भारत बंद का आह्वान कर रखा है।

ग्लैमर को इस्लाम विरोधी कह कर भागी सना खान, सोशल मीडिया पर दे रहीं हनीमून की पल-पल की जानकारी

‘बिग बॉस-6’ फेम अभिनेत्री सना खान अपने शौहर मौलाना मुफ़्ती अनस सैयद के साथ हनीमून के लिए जम्मू कश्मीर पहुँची हुई हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी इस यात्रा को लेकर फैंस को जानकारी दे रही हैं। उन्होंने कई तस्वीरें भी अपलोड की हैं, जिनमें वो अपने शौहर के साथ दिखाई दे रही हैं। सूरत में हुई उनकी शादी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसके बाद लोगों को इसकी खबर लगी थी।

इससे पहले ‘आयतुल कुर्सी’ के माध्यम से दोनों मियाँ-बीवी ने एक-दूसरे की नजर भी उतारी। इंस्टाग्राम पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में वो एक-दूसरे के साथ इस रस्म को निभाते हुए दिख रहे हैं। सना खान ने कहा कि इसे घर से निकलने के पहले और नमाज के बाद दोहराना चाहिए, क्योंकि ये बुरी नजरों से बचाता है। उन्होंने लिखा कि अपने पति/पत्नी के साथ इस सुरा को तब जरूर दोहराएँ, जब वो काम के लिए बाहर निकल रहे हों।

सना खान अपने इंस्टाग्राम हैंडल के माध्यम से स्टोरीज शेयर कर के खुद के बारे में जानकारी देती रहती हैं और अपने शौहर के साथ जम्मू कश्मीर की हनीमून यात्रा के दौरान भी वो अपने फैंस का विशेष ख्याल रख रही हैं। नीचे हम उनमें से कुछ तस्वीरों को संलग्न कर रहे है, जिन्हें सना खान ने अपने इस्टाग्राम हैंडल के माध्यम से शेयर किया है। सना हिंदी, तमिल, तेलुगु और मलयालम फिल्म में भी काम कर चुकी हैं।

फ्लाइट बोर्ड करने से पहले शौहर के साथ इंतजार करतीं सना खान
फ्लाइट में से इस सेल्फी को शेयर कर सना ने लिखा – ‘शौहर और बेगम चले’
अपने शौहर के ‘सरप्राइज लुक्स’ को सना खान ने कैमरे में किया कैद

इससे पहले ‘अल्लाह के कायदों’ पर चलने की बात कहते हुए बॉलीवुड छोड़ने वाली सना खान ने मौलाना अनस सैयद से निकाह कर लिया था। सना सलमान खान अभिनीत ‘जय हो’ जैसी फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं। बिग बॉस सीजन 8 का हिस्सा रह चुके एजाज खान ने सना का परिचय मुफ्ती अनस से करवाया था। एजाज खान सोशल मीडिया में सांप्रदायिक तौर पर भड़काऊ पोस्ट करने के लिए जाना जाता है। निकाह के बाद दोनो ने केक भी काटा था।

जब मुस्लिम भीड़ ने 30 मंदिरों को बुलडोजर से ढाह कर आग लगाया: वो भी दिसंबर 1992 ही था…

दिसंबर 6, 1992 की तारीख बार-बार याद दिलाते हुए कुछ लोग कहते हैं कि न भूलेंगे और न भूलने देंगे। वो अपने बच्चों को इस बारे में बताने की बातें करते हैं। लेकिन, दिसंबर 6, 1992 को याद करने वाले लोग इसके ठीक अगले दिन क्या हुआ था – ये क्यों नहीं अपने बच्चों को बताते? दिसंबर 7-8, 1992 को पाकिस्तान में एक साथ 30 मंदिरों पर न सिर्फ हमले हुए थे, बल्कि मुस्लिम भीड़ ने उन्हें आंशिक या पूर्ण रूप से ध्वस्त भी कर दिया था।

पूरे पाकिस्तान में इस दिन जब 30 मंदिरों पर हमले हो रहे थे, तब वहाँ की सरकार छुट्टियाँ मना रही थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के विरोध में पाकिस्तान में शोक दिवस मनाया जा रहा था और सारे दफ्तरों को बंद कर दिया गया था। सारे स्कूल-कॉलेज बंद पड़े हुए थे। अगर कोई बाहर था तो मुस्लिमों की भीड़, जो अलग-अलग क्षेत्रों में हिन्दू मंदिरों को निशाना बनाने के लिए निकली थी। तब पाकिस्तान में 5 लाख के करीब हिन्दू थे, कुल जनसंख्या का मात्र 2%।

लाहौर में स्थिति सबसे ज्यादा भयावह थी। वहाँ तो हजारों की संख्या में मुस्लिम भीड़ बुलडोजर लेकर निकली थी और उनका एक ही उद्देश्य था – जहाँ भी मंदिर दिखे, उसे ध्वस्त कर दो। एक हिन्दू मंदिर कई सालों से वीरान पड़ा हुआ था, अत्याचारियों ने उसे भी नहीं छोड़ा और ध्वस्त कर दिया। लाहौर में 6 अन्य मंदिरों को आगे के हवाले कर के उन्हें ख़ाक में मिला दिया गया। अफ़सोस ये कि आज इस पर बात ही नहीं होती, विरोध तो दूर की बात है।

लाहौर में स्थित ‘एयर इंडिया’ के दफ्तर पर हमला किया गया और कर्मचारियों की पिटाई की गई। पूरी भीड़ ‘भारत को कुचल दो’ और ‘हिंदुस्तान की मौत’ जैसे नारे लगा रही थी। वो घर-घर से मुस्लिमों को बाहर निकलने के लिए भड़का रहे थे, ताकि बाबरी विध्वंस का बदला लिया जाए। ये सब पाकिस्तान में पहले भी होता रहा था और अब भी हो रहा है, लेकिन एक घटना के बहाने ये सब खुलेआम पूरी ऊर्जा के साथ करने का उन्हें बहाना मिल गया था।

पाकिस्तान में उस दिन अगर कोई दफ्तर या दुकानें खुली हुई थीं, तो उन्हें भी बंद करा दिया गया। सबके मुँह पर बाबरी मस्जिद का नाम था, लेकिन किसी ने ये जानने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर बाबरी मस्जिद को अयोध्या में किस तरीके से बनाया गया था। क्या सदियों पुराने राम मंदिर को तोड़ने से पहले कइयों का खून नहीं बहाया गया था? 16वीं शताब्दी से पहले के इतिहास से किसी को कोई मतलब नहीं।

पाकिस्तान का स्टैंड स्पष्ट था। उसने भारत के राजदूत को तुरंत समन किया और माँग की कि बाबरी मस्जिद को त्वरित रूप से वापस वहाँ पर खड़ा किया जाए। पाकिस्तान ने अयोध्या की इस घटना पर कूटनीतिक रूप से भी आक्रोश जताया। ‘मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा’ के लिए पाकिस्तान इतना बेचैन हो उठा कि उसने संयुक्त राष्ट्र और ‘आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ्रेंस (OIC)’ में भारत पर दबाव बनाने के लिए शिकायत करने का ऐलान किया।

राजधानी इस्लामाबाद में छात्र भी पीछे नहीं थे। कायदे आज यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारतीय दूतावास के सामने विरोध प्रदर्शन किया और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के पुतले जलाए। मुस्लिम युवाओं की भीड़ का कहना था कि इस समस्या का एक ही समाधान है – ‘हिन्दुओं के खिलाफ जिहाद’। 97% मुस्लिमों वाले मुल्क में, जिसका आधिकारिक मजहब ही इस्लाम है, जिसका बँटवारा ही इस्लाम के नाम पर हुआ था – ये सब हो रहा था और इस पर आज भी बाबरी का रोना रोने वालों के मुँह से कुछ नहीं निकलता।

अब एक ऐसे मंदिर की बात करते हैं, जिसे उस समय आंशिक रूप से ध्वस्त किया गया था लेकिन उसके 22 वर्षों बाद 2016 में उसे मिट्टी में मिला दिया गया। लाहौर में पंजाब यूनिवर्सिटी के पास स्थित जैन मंदिर में मुस्लिम भीड़ बुलडोजर, हथौड़ा और हाथों का इस्तेमाल कर के तोड़-फोड़ मचाने पहुँची। पुलिस ने उन्हें मौन अनुमति दी और तबाही का मंजर शुरू हो गया। ‘एयर इंडिया’ के दफ्तर से फर्नीचर व सामान निकाल कर उन्हें आग के हवाले कर दिया गया।

2016 में लाहौर में उस जैन मंदिर के अवशेष को भी हटा दिया गया। कोर्ट के आदेश के बावजूद उसे पंजाब प्रान्त की सरकार ने पूर्णरूपेण ध्वस्त करने का निर्णय देकर ये बता दिया कि इस्लामिक मुल्कों में मजहब पहले आता है और न्याय-व्यवस्था बाद में। एक विवादित मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के बहाने ये सब किया गया। कोर्ट ने कहा था कि इस सदियों पुरानी ऐतिहासिक स्थल के 200 फ़ीट के इर्दगिर्द में कोई निर्माण कार्य न हो, लेकिन किसी ने नहीं माना।

पुराने लाहौर के अनारकली बाजार का ये वही मंदिर था, जिसे दिसंबर 1992 में मुस्लिम भीड़ ने ध्वस्त किया था। क्या आपको पता है कि इस मंदिर का इस्तेमाल उसके बाद किस चीज के लिए किया जाता था? यहाँ कूड़ा-कचरे का प्रबंधन करने वाली कम्पनी ने अपना दफ्तर बना लिया था। तत्कालीन शाहबाज शरीफ की सरकार ने उसे पूर्णरूपेण ध्वस्त किया, उससे पहले यहाँ दुकानें खोल ली गई थीं और इसका कमर्शियल यूज किया जाता था। 1992 में NYT ने पाकिस्तान में मंदिरों को ध्वस्त किए जाने वाली घटना पर टिप्पणी करते हुए लिखा था:

“सीमा विवाद और धर्म को लेकर झगड़े के कारण भारत के साथ पाकिस्तान के रिश्ते तभी से खराब बने हुए हैं, जब 1947 में इसका गठन हुआ था। ये ब्रिटिश की एक कॉलनी थी, जिसका विभाजन कर दिया गया था। भारत की पुलिस ने दो पाकिस्तानियों को मार डाला और एक पाकिस्तान कूटनीतिक अधिकारी की पिटाई की गई, जिसके बाद ये रिश्ते और खराब हुए हैं। आज प्रदर्शनकारियों ने कराची में 5 मंदिरों पर हमले किए, पत्थरबाजी की और दक्षिणी सिंध प्रान्त में 25 मंदिरों को आग के हवाले कर दिया गया।”

बता दें कि दक्षिणी सिंध वही क्षेत्र है, जहाँ पाकिस्तान के 90% से भी अधिक हिन्दू रहते हैं लेकिन वो वहाँ भी सुरक्षित नहीं हैं और जबरन धर्मांतरण और धार्मिक स्थलों पर हमले तो आम बातें हैं। सुक्कुर नामक शहर में हिन्दुओं की दुकानों पर हमला किया गया। पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़ कर इतिश्री कर ली। पश्चिमी शहर क्वेटा में 200 की मुस्लिम भीड़ ने एक मंदिर के दरवाजे ही उखाड़ डाले थे।

ऐसा नहीं है कि ये सब सिर्फ पाकिस्तान में ही हुआ था। इसके बाद भारत में भी किस तरह से दंगे किए गए और हिन्दुओं को निशाना बनाया गया, ये किसी से छिपा नहीं है। बांग्लादेश में भी ‘एयर इंडिया’ के दफ्तर पर हमला किया गया था। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैय्यद अली ख़ामेनेई (1989 से अब तक वही हैं) ने भी बाबरी विध्वंस की निंदा की थी। उन्होंने भी तेहरान रेडियो के माध्यम से नई दिल्ली को ‘मुस्लिम अधिकारों की रक्षा’ की सलाह दी।

आज जरूरत है कि जब हमें अवध रूप से राम मंदिर को ध्वस्त कर बाबरी की याद दिलाई जाती है, तो हम भी उन्हें प्राचीन काल में अवैध रूप से क्रूरता कर के ध्वस्त किए गए 30,000 मंदिरों की याद दिलाएँ। पाकिस्तान में बाबरी वाली घटना के अगले ही दिन किस तरह से 30 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया, वो याद दिलाएँ। वो 30 प्राचीन मंदिर, उनकी जगह आज कहीं कूड़ा-करकट फेंका जाता है तो कहीं नामोंनिशान ही मिट गया है कि वहाँ कभी मंदिर था भी… यह भी याद दिलाएँ।

अपने बच्चों को तथाकथित अन्याय की याद दिलाने का दावा करने वाले लोग अपने पूर्वजों की करतूतों के बारे में अपनी अगली जनरेशन को बताएँगे भी या नहीं? या फिर वही वामपंथी इतिहासकारों के माध्यम से पढ़ाया जाता रहेगा कि अकबर महान था और अयोध्या बाबरी की वजह से ही पूरी दुनिया में विख्यात था? मुग़ल कहाँ से आए थे? बाबर का जन्म कहाँ हुआ था? तैमूर और चंगेज खान के वंशजों के बारे में अपने बच्चों को नहीं बताएँगे?

गुरजीत, सुखदीप, अयूब, शब्बीर: दिल्ली पुलिस ने गोलीबारी के बाद 5 खालिस्तानी व कश्मीरी आतंकियों को किया गिरफ्तार

दिल्ली में एक बड़े आतंकी हमले की साजिश का खुलासा हुआ है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सोमवार (दिसंबर 7, 2020) को शकरपुर क्षेत्र से 5 आतंकियों को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। अभी तक ये नहीं पता चल सका है कि ये आतंकी किस संगठन से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन उनमें से दो पंजाब के खालिस्तानी आतंकी हैं जबकि बाकी के 3 जम्मू कश्मीर के आतंकी हैं। ये किसी बड़े हमले की फिराक में थे।

दिल्ली में ‘किसान आंदोलन’ चल रहा है और इसकी आड़ में खालिस्तानी ताकतें फिर से सिर उठा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इन 5 आतंकियों को गिरफ्तार किए जाने से पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के साथ इनकी मुठभेड़ भी हुई। दोनों तरफ से गोलीबार के बाद इन्हें धर-दबोचा गया। उनके पास से बड़ी मात्रा में हथियार के अलावा अन्य भड़काऊ मैटेरियल्स भी जब्त किए गए हैं। दो कश्मीरी आतंकियों की पहचान मोहम्मद अयूब और मोहम्मद शब्बीर के रूप में हुई है।

गिरफ्तार आतंकियों में से दो की पहचान गुरजीत सिंह और सुखदीप सिंह के रूप में हुई है। इन्होंने एक शौर्य चक्र से सम्मानित सैन्य अधिकारी की हत्या की थी। बताया गया है कि इन आतंकियों को पाकिस्तान की ISI से फंडिंग मिल रही थी। इससे 20 दिन पहले ही दिल्ली पुलिस ने खान मार्केट से जैश-ए-मोहम्मद के 2 आतंकियों को गिरफ्तार कर के एक बड़े हमले की साजिश को नाकाम किया था।

हाल ही में खबर आई थी कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन और इसके इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) की नई साजिश है कि अब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ पंजाब के रास्ते चीन के ड्रोन्स के माध्यम से खतरनाक हथियार व अन्य दहशत का साजो-सामान भेजा जाएगा। पाकिस्तान में मौजूद खालिस्तानी संगठनों को उनके आका पंजाब में हो रहे ‘किसान आंदोलन’ का फायदा उठाकर राज्य में दहशतगर्दी को दोबारा जिंदा करने के लिए तमाम तरह की साजिश रच रहे हैं।

बॉलीवुड वाले वो हीरो-हिरोइन, जो दे रहे किसान ‘आंदोलन’ का साथ और उनका ‘कनेक्शन’

दिल्ली में चल रहे सैंकड़ों किसानों के ‘प्रदर्शन’ ने कई वामी व कट्टरपंथी आवाजों को इस दौरान सरकार के खिलाफ़ बोलने का मौका दे दिया है। ऐसे में इस बीच बॉलीवुड का वह धड़ा भी सरकार पर सवाल उठा रहा है, जिसका खुद की कही बातों पर कभी अपना स्टैंड नहीं रहता और वह बिना मुद्दे को जाने-समझे सिर्फ एक दिशा में अपने ट्वीट करने लग जाते हैं।

इस सूची में सबसे पहला नाम बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा का है। ये बॉलीवुड की एक ऐसी सेलेब्रिटी हैं, जिन्हें दीवाली आते ही पॉल्यूशन की चिंता हो जाती है। इन्हें दिल्ली आते ही धुएँ से साँस लेने में दिक्कत होने लगती है, लेकिन जब यही प्रियंका चोपड़ा मियामी में छुट्टियाँ मनाती हैं तो इन्हें सिगरेट पीने में कोई गुरेज नहीं होता और बात जब प्राकृतिक आपदाओं पर बोलने की होती है तो भी यह चुप्पी साध लेती हैं। इन्हें आज किसान आंदोलन की चिंता सता रही है और यह किसानों को फूड सोल्जर्स बताते हुए संविधान का हवाला दे रही हैं।

प्रियंका चोपड़ा और उनका ट्वीट

इसके बाद अगला नाम सोनम कपूर का है। सोनम फिलहाल लंदन में हैं और डेनियल वेबस्टर के कोट के साथ इंस्टाग्राम पर किसान आंदोलन के समर्थन में उतरी हैं। पिछले दिनों इन्हीं सोनम को इस बात की चिंता थी कि आखिर पाकिस्तान ने सारी भारतीय फिल्मों पर क्यों बैन लगा दिया है। सोनम ने यह भी बताया था कि कि उनके परिवार के पाकिस्तान के साथ मजबूत रिश्ते हैं।

सोनम कपूर और उनका पोस्ट

ऐसे ही बॉलीवुड में किसानों के समर्थन में आने वाला एक अन्य नाम एक्टर रितेश देशमुख का है। रितेश लिखते हैं कि यदि आज हम खाना खा रहे हैं तो हमें किसानों को धन्यवाद देना चाहिए। वह लिखते हैं, “मैं हमारे देश के हर किसान के साथ खड़ा हूँ।” 

रितेश देशमुख और उनका ट्वीट

हैरानी की बात यह है कि किसान आंदोलन में हर किसान के साथ खड़े होने वाले रितेश ने इससे पहले कभी अपने राज्य में होती किसानों की मौतों पर कुछ नहीं कहा। या फिर पिछले दिनों महाराष्ट्र में जो इतनी हलचल रही, उस पर टीवी कलाकारों तक ने खुल कर अपनी राय रखी, मगर रितेश देशमुख चुप रहे। सोशल मीडिया पर उनका ये ट्वीट पर पढ़ कर लोग उनसे पूछ रहे हैं कि जब महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा किसान मरते रहे, तब भी उन्होंने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा, फिर आखिर वह कैसे इस आंदोलन पर बोल पा रहे हैं।

विशाल ददलानी और उनका ट्वीट

बॉलीवुड के मशहूर गायक व शुरुआत से मोदी विरोधी रहे, विशाल ददलानी भी किसानों के आंदोलन में अपना समर्थन देते हुए लिखते हैं, “सिख किसान जिन्हें वाटर कैनन और आँसू गैस दिए जा रहे हैं, वह उन सैनिकों को पीने का पानी दे रहे हैं, जो उन पर हमला कर रहे हैं।”

दिलचस्प बात यह है कि इसी आंदोलन से ऐसी तस्वीरें भी सामने आई हैं, जहाँ सुरक्षाकर्मी प्रदर्शनकारियों को खाना देते नजर आए हैं, लेकिन विशाल ददलानी का प्रोपगेंडा उस तस्वीर पर काम नहीं करता, इसलिए वह केवल वहीं चीजें शेयर कर रहे हैं, जिनके जरिए उनकी कुंठा भी निकल जाए और किसानों को ये भी लगे कि विशान ददलानी उनके समर्थन में हैं।

यहाँ उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड के इन सेलेब्रिटीज का किसान आंदोलन में बढ़-चढ़ कर समर्थन देना, कहीं न कहीं इनकी मोदी घृणा को दर्शाता है, न कि किसानों के प्रति सहानुभूति को। इतने नामी चेहरे होने के बाद यदि ये किसानों या सरकार से मुद्दे को सुलझाने को अपील करें, तब भी बात वही होगी और इनका स्टैंड भी सामने आएगा। लेकिन नहीं। इन्हें अपने ट्वीट उसी दिशा में करने हैं, जिससे सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बने।

सनी दिओल

वर्तमान में एक ओर जहाँ सनी दिओल जैसे कलाकार खुल कर इस बात को स्पष्ट कह रहे हैं कि वह किसानों के साथ खड़े हैं और ये भी जानते हैं कि कि कई लोग इस आंदोलन का फायदा उठाना चाहते हैं। वहीं बॉलीवुड का ये वाला हिस्सा केवल लगातार किसानों के समर्थन में आने के नाम पर उन्हें उकसाने का काम कर रहा है, बिलकुल उसी तरह जैसे योगेंद्र यादव, चंद्र शेखर रावण जैसे लोग प्रदर्शन में पहुँच कर पूरे आंदोलन का राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रहे हैं और उनके अजेंडे को हवा देने के लिए पूरा वामी गिरोह इस पर लगातार अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है।

रोशनी एक्ट मतलब जम्मू का ‘इस्लामीकरण’: रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में बसाने की साजिश

9 अक्टूबर, 2020 का दिन जम्मू-कश्मीर की तारीख के चुनिन्दा महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। इस ऐतिहासिक दिन इकजुट जम्मू संगठन के अध्यक्ष एडवोकेट अंकुर शर्मा द्वारा जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में दायर किए गए दो वादों (PIL-41/2014 और CMP- 48/2014) पर अपना निर्णय देकर उनके पक्ष की पुष्टि की।

पहले वाद में उन्होंने रोशनी एक्ट की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए उसे निरस्त करने की माँग की थी। सन् 2001 में फारुख अब्दुल्ला की सरकार द्वारा पारित किए गए ‘द जम्मू-कश्मीर स्टेट लैंड्स (वेस्टिंग ऑफ़ ऑनरशिप टू द ओक्युपेंट्स) एक्ट-2001’ के तहत राज्य सरकार ने मामूली कीमतें तय करते हुए सरकारी भूमि का अतिक्रमण करने वाले लोगों को ही उस भूमि का क़ानूनी कब्ज़ा देने का प्रावधान कर दिया।

सबसे पहले सन् 1990 तक के कब्जों को वैधता देने की बात हुई, फिर बाद की मुफ़्ती मोहम्मद सईद और गुलाम नबी आज़ाद की सरकारों ने अपने चहेतों को लाभ पहुँचाने के लिए इस तिथि को आगे बढ़ाते हुए 2003 और 2007 तक के अवैध कब्जों को भी वैधता प्रदान कर दी।

इस कानून को रोशनी एक्ट इसलिए कहा गया क्योंकि इससे अर्जित धन से राज्य में बिजली परियोजनाएँ लगाकर विद्युतीकरण करते हुए राज्य में रोशनी फैलानी थी। लेकिन इसका ठीक उलट काम हुआ। न सिर्फ सरकारी जमीन की बंदरबाँट और संगठित लूट-खसोट हुई,बल्कि जम्मू संभाग के जनसांख्यकीय परिवर्तन की सुनियोजित साजिश भी हुई।

इस एक्ट के लाभार्थियों की सूची देखने से साफ़ पता चलता है कि यह जम्मू संभाग के ‘इस्लामीकरण’ का सरकारी षड्यंत्र था। उदाहरणस्वरूप जम्मू के उपायुक्त द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट के अनुसार तवी नदी के कछार में अतिक्रमण करने वाले 668 लोगों में से 667 मुस्लिम समुदाय से हैं। तमाम रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठिए भी इसके लाभार्थी रहे हैं।

जम्मू शहर की सीमावर्ती वनभूमि पर बसाई गई भटिंडी नामक कॉलोनी (जिसे स्थानीय लोग ‘मिनी पाकिस्तान’ कहते हैं) एक और उदाहरण है। हजारों की संख्या में रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठिए भी इसके ‘लाभार्थी’ रहे हैं। सुन्जवाँ और सिद्धड़ा भी अतिक्रमण के बड़े ठिकाने हैं।

यह धर्म-विशेष के लोगों को लाभ पहुँचाकर, विशेष रूप से जम्मू संभाग में उनके वोट बनवा कर और बढ़वा कर लोकतंत्र के अपहरण और अपनी सत्ता के स्थायीकरण की बड़ी सुनियोजित और संगठित कोशिश थी। रोशनी एक्ट वास्तव में भ्रष्टाचार और जेहादी एजेंडे के कॉकटेल की बेमिसाल नज़ीर है।

अपने दूसरे वाद में एडवोकेट अंकुर शर्मा ने 25000 करोड़ से ज्यादा मूल्य की इस साढ़े तीन लाख कैनाल भूमि की लूट-खसोट की जाँच ACB की जगह सीबीआई से कराने की माँग की, ताकि इस गुनाह में शामिल रसूखदार नेता और नौकरशाह जाँच को प्रभावित न कर सकें। ज्ञातव्य है कि इस लूट-खसोट में न सिर्फ मंत्री, सांसद, विधायक आदि राजनेता बल्कि पुलिस-प्रशासन के आला अफसर भी शामिल रहे हैं।

सर्वप्रथम सन् 2011 में प्रोफ़ेसर एसके भल्ला इस मामले को एक जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय में लेकर गए। उसके बाद भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में इस भूमि घोटाले की वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी बदनीयती पर प्रश्नचिह्न लगाए गए। उसके बाद अंकुर शर्मा ने इस मामले को अंतिम परिणति तक पहुँचाते हुए देश की आँख खोलने वाले इस भूमि घोटाले का पर्दाफाश करने में सक्रिय भूमिका निभाई।

इस भ्रष्टाचार में नेताओं, नौकरशाहों और भू-माफिया की आपसी साँठ-गाँठ और धर्म-विशेष के लोगों को सुनियोजित लाभ पहुँचाने के कारण ही इसे ‘जमीन जेहाद’ भी कहा जा सकता है। यह घोटाला ‘रक्षकों के भक्षक’ बन जाने की लोमहर्षक कहानी है। संवैधानिक शपथ और राजधर्म  की खुली अवहेलना और धार्मिक भेदभाव की दास्तान भी इस घोटाले की अन्तर्निहित पटकथा है।

रोशनी एक्ट की आड़ में सरकारी भूमि की लूट का आलम यह था कि नैशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों के प्रदेश कार्यालय इसी एक्ट की आड़ में हथियाई गई भूमि पर बने हैं। कॉन्ग्रेस-पीडीपी गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री रहे गुलाम नबी आज़ाद ने सैकड़ों करोड़ की सरकारी भूमि अपने चहेतों को कौड़ियों के भाव आवंटित कर दी।

गुलाम नबी आज़ाद और पूर्व प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मंत्री गुलाम रसूल कार जिस ख़िदमत ट्रस्ट के न्यासी रहे हैं, वह भी बड़े अतिक्रमणकारियों की सूची में शामिल है। बड़े नामों में फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और उनकी बुआ सुरैय्या अब्दुल्ला मट्टू और खालिदा अब्दुल्ला शाह, पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम मोहम्मद शाह के साहिबजादे, भांजे और अन्य कई परिजन, पीडीपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री हसीब द्राबू और काजी मोहम्मद अफ़ज़ल के बेटे टीपू सुल्तान, कॉन्ग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री केके अमला जैसे लोग भी आरोपित हैं।

इनके अलावा पीडीपी के ही अब्दुल मजीद वानी और ताज मोहिउद्दीन, नैशनल कॉन्फ्रेस के नेता और पूर्व मंत्री सज्जाद अहमद किचलू, तनवीर किचलू, सैय्यद आखून,जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्य सचिव मोहम्मद शफी पंडित, पूर्व एडवोकेट जनरल असलम गोनी, जम्मू-कश्मीर बैंक के पूर्व चेयरमैन एमवाई खान, पूर्व न्यायाधीश अली मोहम्मद के साहिबजादे अशफाक अहमद मीर, पूर्व पुलिस अधिकारी नासिर अली, खालिद दुर्रानी और मिर्ज़ा रशीद, पूर्व वन अधिकारी कमर अली और सुल्तान अली, उद्योगपति मुश्ताक छाया, मोहम्मद सलीम बख्शी और मोहम्मद हुसैन जान, ओवेस अहमद, जमात अली जैसे ‘बड़ी पहुँच वाले’ लोग भी इसके लाभार्थी हैं।

ये सूची जम्मू और कश्मीर संभाग के मंडलायुक्तों द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के निर्देश पर जारी की गई है। सीबीआई जाँच आगे बढ़ने पर उसके जाल में और भी अनेक बड़ी मछलियाँ फँसेगी।

धर्म विशेष (हिन्दू धर्म) और क्षेत्र विशेष (जम्मू संभाग) के लोगों के साथ भेदभाव और उपेक्षा और सरकारी संसाधनों की लूट-खसोट और बंदरबाँट यहाँ की सरकारों का स्वभाव रहा है। इसलिए इस जाँच से गुपकार गैंग के पेट में दर्द होना अस्वाभाविक नहीं है।

गुपकार गैंग में नैशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला, पीडीपी की अध्यक्षा और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन, जम्मू-कश्मीर कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीए मीर जैसे कई नेता (जिन्हें गुलाम नबी आज़ाद और पी चिदम्बरम जैसे केन्द्रीय कॉन्ग्रेसी नेताओं की शह मिली हुई है) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मोहम्मद युसूफ तारिगामी आदि शामिल हैं।

गुपकार गैंग स्वार्थप्रेरित और बेमेल गठजोड़ है। यह 5 अगस्त 2019, 31 अक्टूबर 2019 और 9 अक्टूबर 2020 जैसे कुछ दूरगामी निर्णयों से खिसियायी बिल्लियों की मिलीभगत से बना एक ऐसा गिरोह है जोकि मिलकर खम्भा नोंचने की कोशिश कर रहा है। यह गिरोहबंदी ख़ुद के अप्रासंगिक होते जाने की आशंका की भी उपज है।

जम्मू-कश्मीर की जनता इस अपवित्र और अवसरवादी गठजोड़ के वास्तविक मंसूबों से अनभिज्ञ नहीं है। जिस गुपकार गैंग के सरगना आज केंद्र सरकार की विभिन्न विकासवादी और राष्ट्रीय एकीकरण वाली नीतियों से जम्मू-कश्मीर की ‘डेमोग्राफी’ के बदलने का बेसुरा राग अलाप रहे हैं, वे स्वयं जम्मू संभाग की डेमोग्राफी को बदलने के गुनाह में संलिप्त रहे हैं। सन् 2001 और 2011 की जनगणना के आँकड़े और सन् 2000 से पहले और बाद की मतदाता सूची इस तथ्य की तस्दीक करते हैं।

9 अक्टूबर, 2020 को दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में जम्मू-कश्मीर के माननीय उच्च न्यायालय ने न सिर्फ रोशनी एक्ट को असंवैधानिक घोषित कर दिया, बल्कि देश के इस सबसे बड़े भूमि घोटाले और जम्मू संभाग के इस्लामीकरण की जेहादी साजिश की जाँच सीबीआई को सौंप दी। अब इस घोटाले की जाँच उच्च न्यायालय की निगरानी में हो रही है और सीबीआई को भी हर 8 सप्ताह बाद नियमित रूप से प्रगति रिपोर्ट उच्च न्यायालय में जमा करनी पड़ती है।

जैसे-जैसे यह जाँच रफ़्तार पकड़ रही है, नए-नए राज़फाश हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर को निजी जागीर समझकर अदल-बदलकर शासन करने वाले ‘शाही ख़ानदानों’ की बदहवाशी, बेचैनी और बौखलाहट बढ़ती जा रही है। जो सियासी दुश्मन होने का नाटक रचते हुए सत्तर सालों से जम्मू-कश्मीर के लोगों को बरगलाते हुए लूट और झूठ की राजनीति में आकंठ डूबे हुए थे, वे आज गुपकार घोषणा-पत्र के नाम पर नापाक गठजोड़ बना रहे हैं और जम्मू-कश्मीर की भोली-भाली जनता को एकबार फिर बेवकूफ बनाने की साजिश रचने में मशगूल हो गए हैं।

आज ‘रोशनी एक्ट’ के अंधेरों से जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक परिचित है। तमाम राजनेताओं और नौकरशाहों ने इस एक्ट की आड़ में बड़े पैमाने पर सरकारी भूमि को हड़प लिया था। अब उस जमीन का हिसाब-किताब किया जा रहा है और उसे इनके कब्जे से मुक्त कराकर आम जनता की आवश्यकताओं और हितों के अनुरूप उपयोग करने की सम्भावना बन रही है।

जम्मू-कश्मीर में हाल तक जारी अंधेरगर्दी और अराजकता पर अंकुश लगने से घबराए हुए नैशनल कॉन्फ्रेस और पीडीपी जैसे चिर-प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल भी अब एक मंच पर आ रहे हैं। वस्तुतः, गुपकार गैंग जम्मू-कश्मीर के लुटेरों और मतलबपरस्तों का मौकापरस्त गठजोड़ मात्र है।

अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए फारुख अब्दुल्ला द्वारा चीन से सहायता लेने की बात करना और महबूबा मुफ़्ती द्वारा अनुच्छेद 370 की बहाली तक तिरंगा न उठाने की बात कहना, इस गठजोड़ और इसके आकाओं की असलियत का खुलासा करते हैं। चीन और शेख अब्दुल्ला परिवार दोनों ही पंडित जवाहर लाल नेहरू की आँखों के तारे थे। आज सारा देश इन दोनों के कारनामे और असलियत देख रहा है।

उल्लेखनीय है कि रोशनी एक्ट तो गुपकार गैंग की कारस्तानियों की बानगी भर है। अभी ऐसे अनेक कच्चे चिट्ठे खुलने बाकी हैं। रोशनी एक्ट वाली जाँच में तो मात्र साढ़े तीन लाख कैनाल भूमि की लूट का ही हिसाब-किताब हो रहा है। जाँच तो इस बात की भी होनी चाहिए कि साढ़े तीन लाख कैनाल भूमि ‘लुटाने’ से कितनी कमाई हुई, उससे कितने पॉवर प्रोजेक्ट लगे और कितने गाँवों का विद्युतीकरण हुआ।

इसके नीति-नियंताओं की नीयत के मद्देनज़र सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका परिणाम ढाक के तीन पात से ज्यादा कुछ न हुआ होगा। इसके अलावा सन् 2014 के आँकड़ों के अनुसार साढ़े सत्रह लाख कैनाल वन भूमि, नदी भूमि और अन्य भूमि पर धर्म विशेष के लोगों ने और रसूखदार नेता और नौकरशाहों ने अतिक्रमण कर रखा है। उस सबका हिसाब होना बाकी है।

एक ऐसा ही कारनामा तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती का 14 फरवरी, 2018 का वह फरमान है, जिसके तहत जम्मू संभाग में सरकारी जमीन पर कब्ज़ा करने वाले किसी भी घुमंतू जनजाति के (मुस्लिम) व्यक्ति पर डीसी या एसपी कार्रवाई नहीं कर सकते। यदि न्यायालय की ओर से अतिक्रमण हटाने के लिए कोई आदेश आता है, तो भी पुलिस ऐसे मामलों में प्रशासन की सहायता नहीं करेगी। गौहत्या और गौवंश की तस्करी करने वालों पर भी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।

ये सारी की सारी कारगुजारियाँ सांप्रदायिक तुष्टिकरण और मुस्लिम ध्रुवीकरण का नायाब उदाहरण हैं। इनका विरोध करना साम्प्रदायिकता है और आँख मूंदकर इनका समर्थन करना सेकुलर होना है। भारत में सेकुलरिज्म की दुनिया से अलग और अजब परिभाषा चलती है।

पिछला एक साल जम्मू-कश्मीर के लिए निर्णायक रहा है। अब यहाँ जमीनी बदलाव की आधारभूमि तैयार हो चुकी है। कई पुराने कानूनों को या तो निरस्त किया गया है या फिर उनमें आवश्यक संशोधन किए गए हैं। ऐसा करके न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के शेष भारत के साथ एकीकरण की सभी बाधाओं और अड़चनों को समाप्त किया गया है बल्कि समृद्धि, प्रगति और विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया गया है।

पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर की नई अधिवास नीति, मीडिया नीति, भूमि स्वामित्व नीति और भाषा नीति में बदलाव करते हुए हर तरह की दूरी और अलगाव को खत्म किया जा रहा है। त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत जिला विकास परिषद् के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। बहुत जल्दी जम्मू-कश्मीर की औद्योगिक नीति भी घोषित होने वाली है।

जम्मू-कश्मीर के नए उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने ‘चलो गाँव की ओर’ और ‘माइ सिटी माइ प्राइड’ जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत करके शासन-प्रशासन को जनता से जोड़ने और उसे संवेदनशील बनाने की पहल की है। ये कार्यक्रम विकास योजनाओं में जनभागीदारी पर बल देने वाले हैं। सभी हितधारकों ख़ासकर आम नागरिकों में भरोसा पैदा करके और उन्हें साथ जोड़कर ही सरकारी योजनाओं का सफल कार्यान्वयन संभव है।

जम्मू-कश्मीर भू-स्वामित्व कानून में बदलाव के बाद उनके द्वारा आयोजित ‘निवेशक सम्मेलन’ का विशेष महत्व है। इस सम्मेलन में देश के 30 शीर्षस्थ उद्योगपतियों ने भागीदारी करते हुए जम्मू-कश्मीर में भारी आर्थिक निवेश के प्रति आश्वस्त किया है। यह निवेशक सम्मलेन नयी संभावनाओं का सूत्रपात करने वाला है।

नए भू-स्वामित्व कानून के सम्बन्ध में गुपकार गैंग यहाँ के मूल निवासियों को भड़काने की साजिश कर रहा है और उसके आका “जम्मू-कश्मीर ऑन सेल” जैसे भ्रामक बयान दे रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इस कानून में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की भांति सुरक्षात्मक प्रावधान किए गए हैं। कृषि भूमि को जम्मू-कश्मीर के कृषकों को ही बेचा जा सकता है। सरकार ही औद्योगिक इकाइयों के लिए भूमि चिह्नित करते हुए किसानों को बाजार मूल्य देकर उसका अधिग्रहण करेगी और उद्यमियों को उद्योग लगाने हेतु आवंटित करेगी। इसलिए ‘बाहरी’ लोगों द्वारा जम्मू-कश्मीर की भूमि हथियाने की आशंकाएँ निर्मूल हैं।

यह संशोधित कानून नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना द्वारा जम्मू-कश्मीर के नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर मुहैया कराएगा। अन्य नौकरीपेशा और कामकाजी भारतीयों के यहाँ बसने से भी अर्थव्यवस्था में गतिशीलता पैदा होगी। इस नई नीति के लागू हो जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में पूँजी निवेश की अपार संभावनाएँ हैं।

जिस प्रकार सन 1991 के बजट के बाद भारतीय अर्थ-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए थे, ठीक उसी प्रकार के परिवर्तन के मुहाने पर अभी जम्मू-कश्मीर है। पूँजी-निवेश और आर्थिक-पुनर्नियोजन के लिए उसके द्वार खुल चुके हैं। यह सचमुच एक ऐतिहासिक परिघटना है।

पर्यटन, सीमेंट, बिजली, औषधिक सम्पदा, ऊनी वस्त्र, चावल, केसर, फल, मेवा, शहद और दुग्ध-उत्पाद आदि से सम्बंधित यहाँ के उद्योग-धंधे और व्यापार आवश्यक पूँजी-निवेश और नई श्रम-शक्ति, कौशल और प्रतिभा से कई गुना विकसित होने वाले हैं। अगर ये उद्योग-धंधे और व्यापार अपनी पूर्ण-क्षमतानुसार विकसित होते हैं तो इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अधिकाधिक अवसर मिलेंगे। एक बार फिर उनके हाथ में पत्थर और बंदूक की जगह कलम-किताब और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट होंगे।

जम्मू-कश्मीर ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की उर्वरा-भूमि है। यहाँ की जीवन-शैली और चिंतन प्राचीन काल से ही उन्नत और प्रगत रहा है। बीच में गुपकार गैंग जैसे तत्वों द्वारा भोले-भाले लोगों को बरगलाने से कुछ अशांति, अवरोध और अंतराल पैदा हो गया था। अब पठन-पाठन और चिंतन की अड़चनों और अशांति की क्रमिक समाप्ति हो रही है। इस प्रकार एक विशेष अर्थ में यह जम्मू-कश्मीर की समृद्ध ज्ञान-परम्परा के नवजागरण की बेला भी है।

यहाँ वैष्णो देवी और अमरनाथ धाम जैसे अनेक सर्वमान्य तीर्थस्थल हैं। यहाँ का वातावरण प्रदुषण-मुक्त है और श्रेष्ठतम शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल है। इसलिए यहाँ प्राकृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य पर्यटन के विकास की अपरिमित संभावनाएँ हैं। अब इन संभावनाओं का सुनियोजित विकास और सतत दोहन करने की आवश्यकता है।

जम्मू-कश्मीर के नौजवानों को देश की मुख्यधारा में शामिल करके और विकास-योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करके ही पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को मात दी जा सकती है। शांति,सौहार्द, सद्भाव, समरसता और सहयोग किसी भी सभ्यता के पूर्ण विकास की आधारभूमि है। कश्मीर की ज्ञान-समृद्ध सभ्यता अब प्रगति और परिवर्तन की राह पकड़ रही है।

अपनी कारस्तानियों के उजागर होने से और अपनी विश्वसनीयता में आ रही लगातार गिरावट से गुपकार गैंग तिलमिला रहा है। इसलिए वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए हर हथकंडा आजमा रहा है और लोगों को बरगलाने की हरसंभव कोशिश कर रहा है।

‘मेरी गाड़ी 40 साल से चल रही, तेरी तो गैराज से भी नहीं निकली’: अनिल कपूर ने गालीबाज अनुराग कश्यप को क्यों धोया?

सोशल मीडिया पर फ़िल्मी हस्तियों की लड़ाई कोई नई बात नहीं है। लेकिन, सवाल ये उठता है कि उनके लड़ने का कारण क्या है? हाल ही में अनिल कपूर और अनुराग कश्यप आपस में लड़ गए। ट्विटर पर दोनों के बीच काफी बहस हुई और लोग असमंजस में पड़े रहे कि आखिर हुआ क्या है? इस ‘AK vs AK’ की लड़ाई में गालीबाज अनुराग कश्यप की अन्य लोगों ने भी जम कर क्लास ली। आइए, देखते हैं ये शुरू कैसे हुआ।

अनिल कपूर ने वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम्स’ को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने पर ख़ुशी जताते हुए बधाई दी तो अनुराग कश्यप ने कहा कि योग्य लोगों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना अच्छी बात है। लेकिन, साथ ही उन्होंने अनिल कपूर से पूछ डाला कि आपका ऑस्कर कहाँ है? आप जीते भी थे या सिर्फ नॉमिनेशन? बता दें कि 2008 में आई ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ 9 कैटेगरी में 10 ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेट हुई थी, जिनमें से फिल्म को 8 अवॉर्ड्स मिले।

इसके बाद अनिल कपूर ने ऑस्कर अवॉर्ड के साथ अपनी तस्वीर शेयर करते हुए अनुराग कश्यप को लिखा कि आप ऑस्कर के सबसे करीब तब आए थे, जब आपने टीवी पर ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ को ऑस्कर अवॉर्ड्स जीतते हुए देखा था। इस पर अनुराग कश्यप ने लिखा कि ‘पुरानी और बुरी फिल्मों के राजा’ को ये बात नहीं कहनी चाहिए। साथ ही पूछा कि ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ में इस किरदार के लिए क्या आप दूसरी चॉइस नहीं थे?

इस पर अनिल कपूर ने कहा कि मुझे नीचा दिखाने वाली फ़िल्में मिले या फिर ऊपर उठाने वाली, उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं है। उन्होंने कहा कि काम, काम होता है। साथ ही अनुराग कश्यप से कहा कि तुम्हारी तरह मुझे काम ढूँढने वक्त बाल नहीं नोचने पड़ते। इस पर गालीबाज निर्देशक ने उनसे कहा कि आप अपने बालों की बात तो मत ही करो, क्योंकि आपको बाल की वजह से ही फ़िल्में मिला करती थीं।

इस पर अनिल कपूर ने उन्हें लताड़ा कि आपके पास मेरी तरह करियर होने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कुशलता होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “ऐसे ही मेरी गाड़ी 40 साल से नहीं चल रही है।” इस पर अनुराग कश्यप ने अनिल कपूर की 4 ताज़ा फिल्मों ‘पागलपंती, फैनी खान, टोटल धमाल और रेस-3’ के पोस्टर्स शेयर करते हुए लिखा कि 40 साल पुरानी गाड़ी को उच्च-गुणवत्ता वाला नहीं कहते, कुछ को खटारा भी कहते हैं।

इस पर अनिल कपूर ने लिखा कि मेरी गाड़ी तो 40 वर्षों से चल भी रही है, लेकिन तुम्हारी तो गैरेज से निकली तक नहीं। उन्होंने अनुराग कश्यप के फिल्म ‘बॉम्बे वेलवेट’ के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन गिनाते हुए कहा कि उसने बस 43 करोड़ रुपए कमाए, जबकि उनकी रेस-3 ने बॉक्स ऑफिस पर 300 करोड़ रुपए बटोरे। इसके बाद अनुराग कश्यप ने जैकी श्रॉफ के साथ अनिल की एक पुरानी तस्वीर शेयर कर ‘गुड बाय’ लिख दिया।

हालाँकि, आपको जान कर आश्चर्य होगा कि ये झगड़ा असली नहीं था। निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने को जन्मदिवस की बधाई देते हुए उन्होंने खुद इस ओर इशारा दे दिया। उन्होंने लिखा कि अनुराग तो तुम्हारा दोस्त है, लेकिन ट्रेलर में संभाल लेना। साथ ही कहा कि आपको अपने ‘असली वाले AK’ की तरफ से ढेर सारा प्यार। इन सबके पीछे Netflix पर रिलीज होने वाली फिल्म ‘AK vs AK’ है, जिसका ट्रेलर रिलीज होने वाला है।

दरअसल, ‘AK vs AK’ में जहाँ अनिल कपूर एक फिल्म स्टार का किरदार निभा रहे हैं, वहीं अनुराग कश्यप एक निर्देशक का। दोनों अपनी वास्तविक ज़िंदगी के पेशे को ही स्क्रीन पर भी जिएँगे। इसकी कहानी कुछ यूँ है कि फिल्म स्टार से निर्देशक का झगड़ा होने के बाद निर्देशक अपमानित महसूस करेगा और बदला लेने के लिए उसकी बेटी का अपहरण करेगा। अनिल कपूर और अनुराग कश्यप अभिनीत 1:48 घंटे की ‘AK vs AK’ एक क्राइम जॉनर की डार्क-कॉमेडी फिल्म होगी।

हाल ही में मीटू अभियान के तहत पायल घोष ने अनुराग कश्यप के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए कई एक्ट्रेस का नाम इस मामले में उजागर किया था। उस समय उन्होंने अनुराग पर आरोप लगाते हुए कहा था कि जब उन्होंने अनुराग की हरकतों का विरोध किया था तो उन्होंने उनसे कहा कि ये सब तो नॉर्मल बात है। पायल के मुताबिक, कश्यप ने घोष से यह भी कहा था कि बॉलीवुड की कई एक्ट्रेस उनके साथ बहुत सहज हैं।

‘किसानों को हानि कम, मिलेगा अच्छा दाम’: 10 साल कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने तब प्राइवेट सेक्टर की पैरवी करते लिखे थे पत्र

NCP के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार आज ‘किसानों’ के आंदोलन को समर्थन देते हुए कृषि कानूनों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। महाराष्ट्र विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए तीन दलों का गठबंधन बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले शरद पवार यूपीए के 10 वर्षों में लगातार केंद्रीय कृषि मंत्री बने रहे थे और तब वो इन्हीं कृषि सुधारों की पैरवी कर रहे थे, जिनके विरोध में आज वो खड़े हैं। उन्होंने APMC सुधारों को लेकर मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा था।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर तब इन्हीं कृषि सुधारों की पैरवी करने वाली कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार में शामिल रही पार्टियाँ आज इसके विरोध में क्यों हैं? अगस्त 2010 में शरद पवार ने मुख्यमंत्रियों को जो पत्र लिखा था, उसमें ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, विकास और आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि के लिए एक अच्छी कार्यप्रणाली वाले बाजार की आवश्यकता पर जोर दिया था। उनका कहना था कि इसके लिए कोल्ड चेन सहित पूरे मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश की आवश्यकता है।

उन्होंने तब इन सबके लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी पर जोर दिया था, जबकि आज ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर किसानों की जमीनें ले लेंगे और उन्हें रुपए नहीं देंगे। ये सब बावजूद इसके हो रहा है कि कानून में किसानों के हाथ में सारी चीजें दे दी गई हैं और कई राज्यों में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए वो पहले से अच्छी कमाई कर रहे हैं। तब शरद पवार ने प्राइवेट सेक्टर की सहभागिता के लिए एक सटीक नीति-नियमन के माहौल की ज़रूरत पर बल दिया था।

शरद गोविंदराव पवार ने लिखा था कि इन सबके लिए राज्यों के APMC एक्ट में बदलाव की आवश्यकता है और किसानों व व्यापारियों के भले के लिए प्राइवेट सेक्टर को उत्साहित कर के उनमें प्रतियोगिता वाला वातावरण पैदा करना होगा। साथ ही 2007 में APMC एक्ट में बदलाव के लिए केंद्र ने एक ड्राफ्ट भी बनाया था, जिससे राज्य बदलाव को लेकर दिशा-निर्देश ले सकते थे। तब उन्होंने बिना देरी के इसे लागू करने की बात कही थी।

ये ऐसा पहला पत्र नहीं है, बल्कि तत्कालीन कृषि मंत्री ने 2011 में भी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखे गए पत्र में बताया था कि कैसे प्राइवेट सेक्टर का रोल कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में अहम रहने वाला है और इस सम्बन्ध में नीति-नियमन बनाया जाना चाहिए। कृषि मार्केटिंग को बढ़ावा देने के लिए यूपीए सरकार ने एक कमिटी भी बनाई थी। बकौल शरद पवार, इससे न सिर्फ उत्पादों की सप्लाई बढ़ेगी, बल्कि कटाई के बाद होने वाली हानि पर लगाम लगेगी और किसानों को ज्यादा दाम मिलेगा।

इधर केंद्र के कृषि कानूनों का समर्थन करते हुए भाजपा सांसद और वरिष्ठ अभिनेता सनी देओल ने कहा है, “मेरी पूरी दुनिया से विनती है कि यह किसान और हमारी सरकार का मामला है, इसके बीच में कोई ना आए क्योंकि दोनों आपस में बातचीत कर इसका हल निकालेंगे। मैं जानता हूँ कि कई लोग इसका फायदा उठाना चाहते हैं और वो लोग अड़चन डाल रहे हैं। वह किसानों के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रहे उनका अपना ही खुद का कोई स्वार्थ हो सकता है।”

‘सनातन धर्म को उखाड़ फेंकेंगे, भगवा को मिटा देंगे’: तमिलनाडु में हिंदू नेता और IMK प्रमुख अर्जुन संपत पर हमला

तमिलनाडु में डीएमके (DMK) और विदुथालाई चिरुथैगल कच्ची (VCK) के कार्यकर्ताओं ने जबरन इंदु मक्कल काची (IMK) के प्रमुख अर्जुन संपत का घेराव कर उन्हें बाबासाहेब अंबेडकर को श्रद्धांजलि देने से रोकने की कोशिश की।

Communemag की एक रिपोर्ट के अनुसार, IMK प्रमुख अर्जुन संपत भारत रत्न बीआर अंबेडकर की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने चेन्नई के राजा अन्नामलाई पुरम स्थित स्मारक गए थे। इसी दौरान वीसीके और डीएमके के कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें परिसर में प्रवेश करने से रोका।

बता दें पार्टी कार्यकर्ताओं ने गेट बंद कर अर्जुन संपत के खिलाफ नारे लगाए। इतना ही नहीं बाबासाहेब आंबेडकर को सम्मान देने के लिए आए आईएमके सदस्यों पर आक्रामक रुख अख्तियार करते और हिंदू विरोधी बयान देते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा ने यह भी कहा कि वे सनातन धर्म को उखाड़ फेंकेंगे और भगवा को मिटा देंगे। वीसीके के झंडे लिए मुस्लिम समुदाय के दो सदस्यों ने अर्जुन संपत का भगवा शॉल खींचने की भी कोशिश की।

VCK और DMK के लोगों ने भारत माता के नारे लगाने पर भी जताई आपत्ति

वामपंथी ‘पेरियारिस्ट’ संगठनों और कम्युनिस्ट संगठनों के लोगों ने कथित तौर पर आईएमके नेता पर हमला करने की कोशिश भी की। साथ ही स्मारक के अंदर ‘भारत माता की जय’ के नारे पर भी आपत्ति जताई। हालाँकि पुलिस की मदद से अर्जुन संपत और आईएमके के अन्य नेता बाद में बाबा साहेब को श्रद्धांजलि देने में सफल हुए।

इस मामले पर अर्जुन संपत ने कहा, “सामाजिक न्याय के ये तथाकथित झंडाबरदार मुझे बाबासाहेब को सम्मान देने से रोक कर, एक प्रकार से मुझसे अछूतों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। बाबासाहेब के नाम का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें खुद पर शर्म आनी चाहिए। वे VCK या DMK के नेता नहीं हैं। वे सभी भारतीयों के नेता हैं।”

संपत ने कहा कि वीसीके और डीएमके के गुंडों का अलोकतांत्रिक और निर्मम व्यवहार उन्हें श्रद्धांजलि देने से नहीं रोक सकेगा। वे बाबा साहेब को सम्मान देने के लिए और अन्य 5 जगहों पर जाएँगे जहाँ उनकी प्रतिमाएँ रखी हुई है। आईएमके नेता ने कहा, “आईएमके बाबासाहेब के सिद्धांत का पालन करता है, जबकि वीसीके गुंडे ईवीआर के अनुसरण करते हैं।”

उन्होंने कहा कि वीसीके प्रमुख को अपने कैडरों पर नजर रखनी चाहिए और उन पर नियंत्रण करना चाहिए जो बाबासाहेब के नाम पर ऐसी तुच्छ हरकतें कर रहे हैं। उन्होंने तमिलनाडु सरकार से ऐसे उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई करने का भी आग्रह किया है।

हिंसा से संलिप्त VCK

आपको बता दें वामपंथी राजनीतिक दल वीसीके के कार्यकर्ता और विशेषकर इस दल के प्रमुख थोल थिरुमावलवन को हिंदुओं, विशेषकर उच्च जाति समुदायों के खिलाफ उनमें भरे नफरत के लिए जाना जाता है। इन्होंने हमेशा हिंदू संगठनों पर हमला और उनके साथ दुर्व्यवहार किया है।

तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के वेदाचंदुर में हिंदू संगठन, इंदु मक्कल काची (आईएमके) के एक पदाधिकारी मणिकंदन प्रभु पर वीसीके के सदस्यों ने चाकू से हमला कर दिया था। मणिकंदन प्रभु IMK के लिए वेदांतूर विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी के रूप में काम करते थे।

इतना ही नहीं थिरुमावलवन ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए यह तक कह दिया था कि हिन्दू धर्म में, खासकर ब्राह्मणों में महिलाओं को सेक्स वर्कर्स (Sex workers) यानी वेश्या माना जाता है। साथ ही, VCK प्रमुख ने कहा कि हिन्दू धर्म में महिलाओं का स्थान पुरुषों से नीचे रखा गया है। 26 सितम्बर को ‘पेरियार टीवी’ (Periyar TV) नाम के यूट्यूब चैनल से बात करते हुए, थिरुमावलवन ने सनातन धर्म और हिंदू मान्यताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में महिलाओं को सेक्स वर्कर माना जाता है।

शहजाद ने सोनिया को सरेराह गोली मारी, मृतका के परिवार ने निकाह से कर दिया था इनकार

पाकिस्तान के रावलपिंडी में रविवार (दिसंबर 6, 2020) को एक मुस्लिम लड़के ने ईसाई लड़की की गोली मारकर हत्या कर दी। मृत लड़की का नाम सोनिया था। गोली मारने वाले की पहचान शहजाद के तौर पर हुई है। उसकी तलाश की जा रही है।

बताया जा रहा है कि शहजाद ने मृतका से शादी का प्रस्ताव उसके घर वालों को भेजा था। इसे लड़की के माता-पिता ने ठुकरा दिया था।

इस संबंध में रावलपिंडी के कोराल पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया है। एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, रावलपिंडी के कोरल पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने दावा किया कि फैजान नाम के एक आरोपfl को गिरफ्तार किया गया है, जबकि प्रमुख संदिग्ध शहजाद की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है।

बताया जा रहा है कि शहजाद की माँ ने भी अपने बेटे की शादी का प्रस्ताव पीड़िता सोनिया के लिए भेजा था। लेकिन उसके माता-पिता ने इनकार कर दिया था, क्योंकि वे अपनी बेटी की शादी फैजान नाम के दूसरे लड़के से करवाना चाहते थे।

पुलिस ने आपसी रंजिश का मामला बताया

पुलिस के मुताबिक, लड़की रविवार को फैजान के साथ हाइवे पर जा रही थी। इस बीच, शहजाद ने उस पर गोलियाँ चला दी। जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने कहा कि प्रारंभिक जाँच के अनुसार, हत्या व्यक्तिगत आक्रोश से की गई है। यह आपसी रंजिश का मामला लग रहा है। हालाँकि, पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) ने कहा कि पुलिस सभी पहलुओं की जाँच कर रही है।

बता दें कि पाकिस्तान में पिछले महीने एक ईसाई लड़की आरजू रजा को अगवा करने, धर्म परिवर्तन करवाने और जबरन एक 44 साल के मुस्लिम व्यक्ति से शादी कराने का मामला सामने आया था।

वहीं अगस्त 2020 में लाहौर हाई कोर्ट ने एक हैरान करने वाले फैसले में ईसाई नाबालिग लड़की को उस व्यक्ति के पास लौटने का हुक्म दिया, जिसने उसे अगवा किया था। अपहरणकर्ता ने जबरन धर्मांतरण कर उससे निकाह कर लिया था। मारिया शहबाज़ (Maria Shahbaz) नाम की इस 14 साल वर्षीय लड़की को अप्रैल में मोहम्मद नक्श और उसके साथियों ने फैसलाबाद में अगवा कर लिया था। काम पर जाते वक्त उसे अगवा किया गया था। इस मामले में फैसलाबाद की अदालत ने कहा था कि लड़की को पुनर्वास केंद्र भेजा जाए। साथ ही उसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए। लेकिन लाहौर की हाई कोर्ट ने इस आदेश को ही बदल दिया।   

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों से होता है भेदभाव

पाकिस्तान ने कई मौकों पर अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा का भरोसा दिलाया है। लेकिन, इनके साथ भेदभाव की घटना हर दिन सामने आती है। हिंसा, हत्या, अपहरण, रेप और जबरन धर्म परिवर्तन जैसी घटनाएँ होती रहती है। हिंदू, ईसाई, सिख, अहमदिया, और शियाओं को बहुत मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने हाल ही में कहा था कि अल्पसंख्यक समुदायों पर भयानक हिंसा हुई है।