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व्यंग्य: अरे भई! वो अन्नदाता है, वो भला बिल क्यों पढ़ेगा!

कसमों में सबसे बड़ी कसम कही गई है ‘कसम पैदा करने वाले की’। किसान भी पैदा करते हैं, अनाज, सब्जी, दलहन, तिलहन और आज कल आंदोलन। किसानों को अन्नदाता भी कहा जा रहा है और उनके इस पर्यायवाची शब्द को वो लोग भाजपा समर्थकों और आंदोलन विरोधियों पर मार रहे हैं, जो हमेशा यह कहते हैं कि ‘बॉर्डर पर जवान मर रहे हैं’ कह कर आप उन्हें चुप नहीं करा सकते, उन पर लोकतंत्र में सवाल पूछे जाएँगे।

लेकिन किसानों से आप सवाल नहीं पूछ सकते, खास कर उनसे तो बिलकुल नहीं जो आंदोलन करने के लिए किसान बने हैं। आप बात को समझिए कि ‘अन्नदाता’ सड़क पर आ गए हैं। इसके साथ एक और वामपंथी तत्वज्ञान समझिए कि ‘इतने लोग आए हैं, कुछ तो सही बात होगी’। ऐसी ही ‘कुछ तो बात होगी’ वाली दलील शाहीन बाग वालों ने दी थी, बाद में पता चला कि कुछ नहीं बहुत बातें थीं, और 53 लाशें दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में गिर गई।

साथ ही, इन्हें क्या पता कि आप एक बुजुर्ग युवा नेता को, जो कभी मुँह पर करुआ तेल लगा कर गरीब दिखने की कोशिश करता है, तो कभी सर पर घुँघराले बाल बना कर कंधे पर कंप्यूटर ढो कर लाने वाले पिता की तरह बनना चाहता है, लगातार पप्पू बना कर चिढ़ाएँगे तो क्या वो बदला नहीं लेगा? पप्पू को पास होना है, पप्पू को मौका मिला है, पप्पू को पप्पा बनना है, लेकिन पप्पू जगह छोड़-छोड़ कर फटी जेब लिए ‘यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ’ आता जाता रहता है, तो वो क्यों नहीं बिना बोले पिछवाड़े से समर्थन देगा?

अन्नदाता हैं भाई, मामूली चीज थोड़े ही है। आपने क्या दिया है देश को? अन्न दिया है? कोई दुष्ट यह कह देगा कि अन्न जब तक फ्री में नहीं दे रहे, तब तक काहे के अन्नदाता! ऐसे ही लोगों ने तीसरी कक्षा में ‘नहीं हुआ है अभी सवेरा सूरज की लाली पहचान, चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ चला किसान’ ध्यान से नहीं पढ़ा। कितनी भावुक कविता है। मुझे तो लगता है कि सीनियर क्लास में यही कविता पढ़ाई जाती तो अगली पंक्तियाँ यह होती कि ‘कानूनों को पढ़ने से पहले, आंदोलन करने चला किसान’।

देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि आज किसानों को सड़क पर, इस सर्दी में बैठना पड़ रहा है। क्या माँगा है उन्होंने? बस यही न कि तीनों बिल जो 27 करोड़ वयस्कों द्वारा चुने हुए सांसदों ने, काफी गहन विचार के बाद पास किया, उसे सरकार वापस ले ले क्योंकि 32 संगठन कह रहे हैं। अब आप ही बताइए कि चुने हुए 305 सांसद ज्यादा हैं, या फिर 32 संगठनों में शामिल सैकड़ों किसान? आप ही बताइए कि क्या सांसद अब किसानों के लिए कानून बनाएँगे?

आप कह देंगे कि अजीत जी, कानून बनाने का काम तो सांसद का ही है लोकतंत्र में। आपकी बात सही है, लेकिन कोई काम लम्बे समय से होता आ रहा हो, तो जरूरी नहीं कि वो सही ही हो। जैसे कि पहले के किसान इस सीजन में खेती करते थे, अब नहीं करते। पहले के किसान खेती की बेहतरी की माँग करते थे, अब वाले अर्बन नक्सलों, दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों को भड़काने वाले दंगाइयों की रिहाई की बात कर रहे हैं। पहले किसान ट्रैक्टर से खेती करते थे, अब ट्रैक्टर में आग लगाते हैं।

इसलिए, पहले सांसद कानून बनाते थे, तो अभी भी वही बनाएँगे, ये कहीं से भी उचित नहीं है। अच्छी बात तो यह होगी कि किसान अपने कानून स्वयं बनाए, आतंकी UAPA में संशोधन करे, डॉक्टर निजी प्रैक्टिस पर बिल बनाएँ। चुन कर आने का मतलब यह थोड़े ही है कि आपको खेती भी आती है। नेता लोग को क्या आता है? मोदी ने कभी कुदाल चलाई है? अमित शाह ने कभी धनिया बोया है? सॉरी, उन्होंने तो काफी धनिया बोया है पिछले साल, लेकिन आप शब्दों पर मत जाइए, भाव पर ध्यान दीजिए।

किसान का मतलब यह नहीं होता कि फटी हुई गंजी पहने हुए, दरारों वाले धान के खेत में, सर पर हाथ रखे, चिलचिलाती धूप में सूरज को ताकता रहे। किसान का मतलब है अन्नदाता, किसान का मतलब है कि वो सड़कें बंद करा सकता है, रेल रोक सकता है, और जरूरत पड़े तो सड़क पर प्रोजेक्टर लगा कर सलीमा देखते हुए इन्ज्वॉय कर सकता है।

कुछ लोग एक तस्वीर घुमा रहे हैं कि देखो प्रोजेक्टर और स्क्रीन लगा कर सिनेमा चल रहा है। मतलब, क्या चाहते हैं आप लोग? किसान रिलेक्स न करे? जब हरी पगड़ी वाले अन्नदाता भाई चार महीने का राशन ले कर आ गए हैं, कुछ के बच्चे वहीं ऑनलाइन क्लास करते हैं और फिर बाकी टाइम बाप के लिए वो भगत सिंह बन जाते हैं, वो थोड़े ‘लेज़ी लम्हे’ न गुजारें? मैं तो कहता हूँ कि वहीं जेसीबी से बीच सड़क में एक छोटा सा पूल खोद दो, पानी भर दो और स्वीमिंग पूल का भी आनंद लो।

पहले तो जोश-जोश में साइन करा लिया कि अम्बानी और अडानी का कुछ भी इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसमें ‘जियो’ कम्पनी का सिम भी था। आप ही बताइए कि डेढ़ जीबी डेटा वाला सिस्टम भी हटा दिया आत्मसम्मान में, और आत्मनिर्भरता को सुचारु बनाने वाले इंटरनेट के कुछ साइटों को पहले ही संघी, फासीवादी सरकार ने बंद करा रखा है, फिर आदमी प्रोजक्टर पर सिनेमा भी न देखे? चाहते क्या हैं लोग?

नहीं, आप लोगों को चाहिए कि सोते-जागते ये किसान नारेबाजी क्यों नहीं कर रहे हैं। ये क्या तरीका है? आंदोलन का ये मतलब थोड़े ही है कि नारेबाजी किए जा रहे हैं, गला फाड़ा दिया। अरे टीवी वाले आएँगे तो दस-बीस आदमी लगा देंगे नारा। बाकी लोगों को बस भीड़ में दिखना चाहिए। ऐसा भी क्या काम करना कि जो टीवी पर दिखे ही नहीं। आप लोग यह चाहते हैं कि बेचारे किसान, जो कि अन्नदाता होते हैं, बिना कैमरे के फर्जी का हल्ला करते रहे? ये किस तरह की घटिया सोच है? आप क्यों चाहते हैं कि कोई व्यक्ति ऐसा काम करे जिसका कोई परिणाम ही न हो?

‘आंदोलन कर रहे हैं तो सिनेमा क्यों देख रहे हैं, बिरयानी क्यों खा रहे हैं’ जैसी बातें करना सीधे तौर पर अन्नदाताओं को नीचा दिखाने की कोशिश है। जब कोई व्यक्ति राशन-पानी ले कर किसी मिशन पर निकल गया है, तो उसे नारा लगाने और हल्ला करने के अलावा खाना बनाना, रिलेक्स करना, गीत गाना, ट्वीट करना, मोदी को ठोकने की बात सोचना, खालिस्तानी पोस्टर और नारे लगाना आदि भी तो करना ही होगा न! अंग्रेजी में कहावत है कि ‘वरायटी इज़ द स्पाइस ऑफ लाइफ’। तो इधर वरायटी-वरायटी के काम हुए, उधर जीवन में मसाला मिल गया, शाहीन बाग वाला मुल्ला मुर्गा ले आया, मसाला लगा कर मैरिनेट कर दिया…

यह भी पाया गया कि कुछ लोग कह रहे हैं कि किसानों ने कानून ही नहीं पढ़ा है। आप ही बताइए कि अन्नदाता अन्न उपजाएगा, उसे मंडी में 8.5% टैक्स और ट्रकों की एंट्री फीस दे कर आढ़तियों को बेचेगा, या फिर वो बिल पढ़ने के झंझट में रहेगा? पढ़ना होता तो वो आंदोलन क्यों करते? शाहीन बाग वालों ने क्या CAA वाला कानून पढ़ा था? आंदोलन करें कि कानून को पढ़ने के चक्कर में रहें?

कानून का कागज अगर गलती से पढ़ लेंगे, तो यह भी तो समस्या है कि कहीं उन्हें यह लग जाए कि कानून में तो पहले की सारी बातें हैं ही, और किसानों को नए विकल्प दिए गए हैं, तो वो आंदोलन कर पाएँगे? अंग्रेज़ी में एक कहावत है (दूसरी कहावत, आज तो मैं ‘ऑन फायर’ हूँ) कि ‘इग्नरेंस इज़ ब्लिस’। कोई पगड़ी वाला किसान अगर सड़क पर ब्लिस का अनुभव करना चाहता है, तो वो इतनी भीड़ में क्या करेगा? उसको तो इग्नरेंस से ही ब्लिस मिल सकेगा तत्काल में। इसलिए, कानून को पढ़ने का तो कोई तुक ही नहीं बनता। जो भी लोग यह कह रहे हैं कि किसानों को एक बार बिल पढ़ लेना चाहिए, वो अन्नदाता के दुश्मन हैं, और उन्हें लानत है।

आप सोचिए कि 32 संगठन के लोग हैं वहाँ, और यह कह रहे हैं कि पाँच सौ संगठन के किसानों की बात है यह तो क्या आप यह कहेंगे कि कहाँ हैं बाकी के किसान? आप यह कहेंगे कि बिहारी किसान कहाँ है, यूपी वाला क्यों नहीं आ रहा? क्या आपको नहीं पता कि बिहार और यूपी वाला खेतों में खरीफ सीजन की तैयारी कर रहा है? किसान किसान होता है, क्या बिहारी, क्या पंजाबी। आप क्या अन्नदाता के नाम पर, उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर सकते कि पूरे देश के किसान उनके साथ हैं? शर्म कीजिए कि आपकी थाली में जो रोटी है, वो यही अन्नदाता देता है। ठीक है कि आप पैसे देते हैं लेकिन पैसों से क्या होता है, कोई अनाज उपजा रहा है आपके लिए, क्या यह कम बात है।

यह भी लोग कह रहे हैं कि मैं खबरदाता हूँ, वो चिकित्सादाता है, वो मनोरंजनदाता है, वो शिक्षादाता है, रवीश फेकन्यूज और प्रपंचदाता है, सब लोग कुछ न कुछ दे ही रहे हैं, तो सब अपने नाम में ‘दाता’ लगा कर इमोशनल ब्लैकमेल करने लगें? कोई कहेगा कि मैं चिकित्सा न करूँ तो तुम मर जाओगे, कोई कहेगा कि मैं मनोरंजन न करूँ तो तुम बोर हो जाओगे, कोई कहेगा कि मैं खबर न दूँ तो तुम्हें पता ही नहीं चलेगा कि दुनिया में क्या चल रहा है, रवीश कहेगा कि वो फेकन्यूज और प्रोपेगेंडा न करे तो वामपंथियों को ऑर्गेज्म ही नहीं मिलेगा…

लेकिन, आप ही सोचिए कि क्या ये सब किसान के आगे कुछ भी हैं? इलाजदाता डॉक्टर चिकित्सा न दें तो आदमी मर जाएगा। तो भाई मेरे, जब वो मर ही गया तो उसे क्या पता चलेगा कि चिकित्सा का क्या महत्व है। लेकिन अन्नदाता अगर अन्न न दें तो आप जीवित नहीं रह पाएँगे। दोनों बातों में अंतर है। एक के न मिलने पर आदमी मर जाता है, दूसरे के न मिलने पर आदमी जीवित नहीं रह पाता। इसलिए उसका वैल्यू अधिक है। मरने पर आदमी मर ही जाता है, लेकिन जीवित न रहने पर आदमी महसूस करता है कि वो जीवित नहीं रह पा रहा है। फिलॉसफी वाली बात है, आपको समझ में नहीं आएगी।

इसलिए ये सब मत कहा कीजिए कि शिक्षादाता कल आंदोलन कर के कहेगा कि हम न पढ़ाएँ तो तुम पढ़ ही नहीं पाओगे। ठीक है, नहीं पढ़ पाएँगे। कम से कम एक फायदा तो होगा कि किसान आंदोलन या शाहीन बाग टाइप कुछ करेंगे तो ये तो नहीं कह पाएगा कोई कि तुमने तो बिल पढ़ा ही नहीं। है कि नहीं? सारे ‘दाता’ एक नहीं होते, और दाताओं में ‘अन्नदाता’ का विशेष महत्व है क्योंकि वो आंदोलनदाता बने हुए हैं।

तत्काल प्रभाव से सरकार को चाहिए कि किसानों के सारे कानून वो निरस्त करे और उन्हें नए संसद भवन के भूमिपूजन की ईंट के बगल में बिठा कर, उनसे पूछ कर, नए कानून बनवाए। साथ ही, एक संशोधन यह भी करे कि अगर 370 हटाना हो तो कश्मीरी आतंकियों से राय ली जाए, रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाना है तो कोर्ट न जा कर बाबर की औलादों से निर्णय लिखवाए जाएँ, और सांसद बनने का सिस्टम खतम हो।

आप ही सोचिए कि क्या मतलब है सांसद का या प्रधानमंत्री का? उसको हर चीज आती है क्या? फिर वही आदमी किसान पर भी कानून बनाता है, इसरो में रॉकेट का फंड भी देता है, सर्जिकल स्ट्राइक का भी निर्णय लेता है, कोरोना में लॉकडाउन की भी बात करता है… सब काम बस दस-बीस लोग मिल कर तय कर लेते हैं! ये कोई तरीका है? किसने भेजा है उनको अपना प्रतिनिधि बना कर…

नए संसद भवन के भूमिपूजन से भड़की कॉन्ग्रेस, कहा- यह अंतिम संस्कार में DJ बजाने जैसा

नए संसद भवन को लेकर कॉन्ग्रेस सहित विपक्षी पार्टी बौखलाए हुए हैं। तरह-तरह की बयानबाजी कर वे सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने एक तरफ जहाँ इस मुद्दे को देशी और स्वदेशी से जोड़ दिया। वहीं पार्टी के प्रवक्ता ने यह कह दिया कि नया संसद भवन बनाना, अंतिम संस्कार के वक्त डीजे बजाने के बराबर है।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट कर अपनी अपनी भड़ास निकाली है। उन्होंने कहा, “ब्रिट्स द्वारा निर्मित मौजूदा संसद भवन मध्य प्रदेश के मुरैना में चौसठ योगिनी मंदिर से एक उल्लेखनीय समानता रखता है, जबकि नई ‘आत्मानिर्भर’ संसद भवन वाशिंगटन डीसी में पेंटागन से शानदार समानता रखती है।”

जयराम रमेश ने पुराने संसद भवन और नए संसद भवन की डिजाइन के साथ-साथ चौसठ योगिनी मंदिर और पेंटागन की तस्वीरें भी साझा की हैं।

वहीं कॉन्ग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल का कहना है, “नई इमारत की आधारशिला रखने का निर्णय हृदयहीन, संवेदनहीन और बेशर्मी से भरा है। खास कर ऐसे समय में जब देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। बीजेपी लोगों को राहत देने के बजाय फालतू जुलूस निकाल रही है।”

उन्होंने आगे कहा, “सरकार का यह कदम अंतिम संस्कार के वक्त डीजे बजाने के बराबर है। काले कृषि कानूनों के माध्यम से भाजपा ने किसानों की आजीविका पर बुलडोजर चला दिया, दूसरी तरफ वह जनता का पैसा भवन निर्माण पर खर्च कर रही है आज जिस चीज की जरूरत नहीं थी उसे बीजेपी कर रही है। अहंकार को संतुष्ट करने के लिए।”

शेरगिल ने दावा किया, “महत्वाकांक्षी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में नए संसद भवन की आधारशिला रखने का काम ‘किसानों से रोटी छीनने के बाद केक की दुकान खोलने’ जैसा है।”

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज नए संसद भवन का भूमि पूजन किया, जिसे लगभग 971 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाना है। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के बीच की जगह का पुनर्विकास शामिल है। हिन्दू रीति-रिवाज़ों के अंतर्गत भूमि पूजन का कार्यक्रम आयोजित किया गया।

बता दें भूमिपूजन के बाद से ही टीएमसी सहित कई विपक्षी पार्टी इसके विरोध में जुट गए हैं।

इमरान खान के मंत्री ने ‘किसान’ आंदोलन का किया समर्थन, POk के एक्टिविस्ट ने कहा- पहले पाकिस्तान सँभाल ले

हाल ही में पाकिस्तान के विज्ञान और तकनीक मंत्री फ़वाद चौधरी ने भारत में हो रहे किसान आंदोलन का समर्थन किया था। इस पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) कार्यकर्ता डॉ अमजद अयूब मिर्ज़ा की तरफ से प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने पाकिस्तानी मंत्री को नसीहत देते हुए बुधवार (9 दिसंबर 2020) को कहा कि उन्हें इसके बदले पाकिस्तान पर ध्यान देना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 13 दिसंबर को लाहौर में पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) द्वारा सरकार विरोधी रैली का आयोजन किया जाएगा। 

पीओके कार्यकर्ता ने पाकिस्तान सरकार पर आरोप भी लगाया कि वह किसान आंदोलन को भारत के खिलाफ़ इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहे हैं। अमजद अयूब मिर्ज़ा ने अपने बयान में कहा, “यह नाटक किसी और को दिखाइए। मेरा चौधरी साहब ने निवेदन है कि पहले वह अपने गिरेबान में झाँक कर देख लें जहाँ एक बड़ा सरकार विरोधी आंदोलन होने वाला है।” बता दें फवाद चौधरी ने बीते सोमवार को किए गए अपने ट्वीट में भारत सरकार को बिना बिना दिल का (Heartless) कहा था। 

इसके अलावा पाकिस्तानी मंत्री ने यह भी कहा था कि उनका दिल सरहद पार आंदोलन कर रहे पंजाबी किसान भाईयों में लगा हुआ है। इस ट्वीट की आलोचना करते हुए पीओके कार्यकर्ता ने कहा था इस्लामाबाद के पास सरकार विरोधी आंदोलन को रोकने की कोई योजना नहीं है।

अमजद अयूब मिर्ज़ा ने पाकिस्तान सरकार की आलोचना करते हुए कहा था, “तुम्हारी (इमरान खान) सरकार खुद काँप रही है और अंदाज़ा नहीं है कि आगे क्या करना है। पाकिस्तान सरकार के लिए स्थिति ऐसी हो गई है कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि छुपना कहाँ है।” 

पीओके कार्यकर्ता ने पाकिस्तानी मंत्री के पुलवामा हमले को इमरान खान सरकार की उपलब्धि बताने वाले बयान का भी उल्लेख किया। इस बयान पर पाकिस्तानी मंत्री की आलोचना करते हुए अमजद अयूब मिर्ज़ा ने कहा, “यह वही व्यक्ति है जिसने नेशनल असेंबली में खड़े होकर स्वीकार किया था कि हमने (पाकिस्तान) वह हमला (पुलवामा) करवाया था। पाकिस्तान के लोगों को इस बात के लिए पाकिस्तान की इमरान सरकार पर गर्व करना चाहिए। इस मामले में दखल देकर यह लोग (पाकिस्तानी सरकार) भारत को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। सभी देख सकते हैं कि अमेरिका से लेकर लंदन तक हर जगह खालिस्तानी समर्थकों के झंडे नज़र आ रहे हैं।”

अंत में पीओके कार्यकर्ता ने वहाँ की पीड़ित आबादी का उल्लेख करते हुए पाकिस्तानी मंत्री से सवाल किया कि वह पीओके के लोगों के लिए भी यही भावना रखते हैं। उन्होंने कहा, “क्या आप लोगों को गिलगिट बाल्टिस्तान के लोगों का दर्द महसूस नहीं होता है? यहाँ के शहरों में पानी तक नहीं है, क्या आप उन 100 सरकारी कर्मचारियों का दर्द महसूस करते हैं जिन्हें आपने अपनी सरकार बनने के बाद नौकरी से निकाला।”       

तैमूर पर बड़ी कंट्रोवर्सी हुई, इस बार आखिरी मिनट में दूँगी सरप्राइज: होने वाले बच्चे के नाम पर करीना कपूर

बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर बहुत जल्द अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली हैं। पिछली बार की तरह इस बार भी वह अपनी प्रेगनेंसी को लेकर हर जगह खुल कर बात कर रही हैं। अभी हाल में उन्होंने What Women Want के एपिसोड में नेहा धूपिया से बातचीत में दूसरे बच्चे के नाम को लेकर चर्चा करते हुए कहा कि इस बार वह सबको सरप्राइज देंगी।

इस शो में नेहा धूपिया ने जब करीना कपूर ने पूछा कि परिवार या दोस्तों में से उन्हें अपने दूसरे बच्चे के नाम के लिए क्या सजेशन मिलते हैं? तब करीना ने तैमूर के समय हुए विवाद का मुद्दा उठाया। करीना ने कहा कि अभी तक सैफ या उन्होंने इस पर सोचा नहीं है, क्योंकि उन्हें तैमूर के नाम पर हुआ विवाद अच्छे से याद है।

करीना कपूर खान ने इस शो में कहा, “तैमूर को लेकर उठे विवाद के बाद मैंने और सैफ ने इस बारे में नहीं सोचा है। हम इसे आखिर तक छोड़ना चाहते हैं और बिलकुल अंत में सरप्राइज देंगे।”

इसके बाद नेहा धूपिया ने करीना से मजाक में बच्चे के नाम पर पोल कराने को भी कहा, मगर करीना ने ऐसा तरीका चुनने से मना कर दिया। इस शो में दोनों अभिनेत्रियों ने मुख्यत: माँ बनने के बाद सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की, लेकिन बातों के बीच में छिड़े इस मुद्दे ने पूरी बातचीत को कहीं और पहुँचा दिया। फिल्मी मिर्ची के यूट्यूब चैनल पर अपलोड इस वीडियो में 11 मिनट 40 सेकेंड से शुरू बातचीत में हम करीना के इस वर्जन को सुन सकते हैं।

याद दिला दें कि साल 2017 में करीना कपूर और सैफ अली खान के पहले बच्चे के नामकरण के बाद सोशल मीडिया पर ‘तैमूर’ नाम को लेकर बहस छिड़ गई थी। लोगों का कहना था कि यह नाम एक आक्रांता का है जबकि सैफ अली खान और करीना कपूर खान का मत था कि फारसी में इसका IRON होता है।

साल 2018 के एक इंटरव्यू में करीना कपूर ने इस नाम पर खुल कर बात की थी। उनका कहना था कि डिलिवरी के लिए अस्पताल जाने से एक दिन पहले सैफ अली खान ने बेटे का नाम फैज रखने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि यह नाम काफी अच्छा है और रोमांटिक है। मगर करीना ने इससे मना किया। उनका मत था कि तैमूर का मतलब लोहा होता है और वह चाहती हैं कि वो जिस बच्चे को जन्म दें, वह फाइटर हो। वह एक आयरन मैन पैदा करना चाहती थी।

‘हम अल्टीमेटम दे रहे हैं, कानून वापस लो, वरना घेरेंगे रेलवे ट्रैक’: किसान नेताओं की PM मोदी को धमकी

दिल्ली में कृषि कानूनों को निरस्त कराने के लिए प्रदर्शन पर बैठे किसानों की ओर से अब धमकियाँ आने लगी हैं। पिछले दिनों सरकार का विरोध करने के लिए इनकी ओर से तीन चरण तय किए गए थे। अब कहा गया है कि यदि माँग नहीं सुनी गई तो रेलवे ट्रैक ब्लॉक किए जाएँगे।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार किसानों के नेता बूता सिंह ने कहा, “हमने 10 दिसंबर तक का अल्टीमेटम दिया हुआ है। अगर पीएम हमारी सुनवाई नहीं करते और कानून निरस्त नहीं करते, तो हम रेलवे ट्रैक्स को ब्लॉक करेंगे। ये निर्णय आज की मीटिंग में लिया गया है कि अब भारत के सभी लोग पटरियों पर उतरेंगे। संयुक्त किसान मंच इसकी तारीख तय करेगा और घोषणा होगी।”

इसके बाद भारतीय किसान यूनियन के बलबीर सिंह ने मीडिया से कहा कि केंद्र सरकार मान चुकी है कि उन्होंने ट्रेडर्स के लिए कानून बनाए। अगर कृषि राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है तो उन्हें इस विषय पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है।

उल्लेखनीय है कि किसानों के इस फैसले से पूर्व उन्होंने अपने आंदोलन को नया रूप देने का फैसला किया था और तीन चरण तय किए थे। किसानों की ओर से 4 दिसंबर को ऐलान किया गया था कि वह 5 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला फूँकेंगे, 7 दिसंबर को अवॉर्ड वापसी करेंगे और 8 दिसंबर को भारत बंद करेंगे। हालाँकि, इनमें से भारत बंद का प्लॉन 8 दिसंबर को बुरी तरह विफल दिखा और हर जगह हर काम सुचारू रूप से होता दिखा।

यह भी बता दें कि किसान यूनियन के नेता की ओर से जो कृषि को राज्य सरकार का अधिकार बताया जा रहा है, उस बिंदु पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से चर्चा की। नरेंद्र सिंह तोमर ने सरकार की ओर से ऐसे प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा कि किसानों को बता दिया गया है कि व्यापार पर कानून बनाने के अधिकार केंद्र सरकार रखती है।

इसके अलावा कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार किसानों की हर समस्या का समाधान करना चाहती है। लेकिन किसान एक ही बात पर अड़े हैं कि सिर्फ कानून को निरस्त किया जाए, जबकि यह कानून किसानों को मंडी की बेड़ियों से आजाद करने के लिए था, ताकि वह अपनी उपज देश में कहीं भी किसी को भी बेच सकें।

हिरासत में तृप्ति देसाई: ‘सभ्य’ तरीके से कपड़े पहनने को कहा तो साईबाबा मंदिर की बोर्ड उखाड़ने लगी

साईबाबा मंदिर न्यास ने हाल ही में स्थानीय लोगों और अन्य भक्तों की शिकायतों के बाद मंदिर परिसर के बाहर एक बोर्ड लगाकर श्रद्धालुओं से भारतीय संस्कृति के मुताबिक ‘सभ्य’ तरीके से कपड़े पहननें की अपील की थी। जिसपर तिलमिला कर खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाली तृप्ति देसाई और उनके संगठन के अन्य सदस्यों ने इसका विरोध करने और पोस्टर को उतारने का फैसला किया।

हालाँकि, ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कान्हुराज बागटे ने स्पष्ट किया था कि उन्होंने श्रद्धालुओं पर कोई ड्रेस कोड लागू नहीं किया है और यह संदेश केवल एक अपील है। लेकिन तृप्ति ने मामले को जानबूझकर तूल देने और व्यर्थ में इसका विरोध करने का फैसला कर लिया। जबकि यह बात सब जानते है कि ज्यादातर भक्त मंदिर में सहज कपड़े पहनकर ही प्रवेश करते है।

वहीं यह खबर सामने आई है कि महाराष्ट्र के अहमदनगर में पुलिस ने तृप्ति देसाई और उनके संगठन के अन्य सदस्यों को शिरडी जाते समय रास्ते में हिरासत में ले लिया है। बता दें वह मंदिर के अंदर अपने कुछ भी कपड़े पहनने के अधिकार की माँग करने के लिए जा रही थी।

वहीं यह भी बताया जा रहा है कि तृप्ति देसाई को हिरासत में लिए जाने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़कर जश्न मनाया है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र सब डिविजनल ऑफिस ने सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई को मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को नोटिस जारी किया था। सब डिविजनल ऑफिस, शिरडी ने कार्यकर्ता तृप्ति देसाई को नोटिस जारी करते हुए उन्हें 8 दिसंबर से 11 दिसंबर के बीच शिरडी में प्रवेश नहीं करने के लिए कहा था। कार्यालय ने कहा है कि उनके यहाँ आने से कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है। यदि वह आदेश का उल्लंघन करती है तो उसे 188 आईपीसी के अनुसार दंडित किया जाएगा।

बहरहाल, नोटिस की अवहेलना करते हुए देसाई अपनी संगठन ‘भूमाता ब्रिगेड’ के 10 सदस्यों के साथ गुरुवार को शिरडी जाने के लिए पुणे से रवाना हुईं थी। अहमदनगर के पुलिस अधीक्षक मनोज पाटिल ने कहा, ‘‘पुलिस ने बंबई पुलिस कानून की धारा 68 के तहत देसाई और संगठन के 15-16 अन्य सदस्यों को हिरासत में लिया है।’’

किसानों को फसल बेचने की स्वतंत्रता मिले, बिना टैक्स के खरीद-फरोख्त हो, तो किसी को क्या आपत्ति होगी?: कृषि मंत्री

नए कृषि कानूनों को निरस्त कराने के लिए केंद्र सरकार के ख़िलाफ दिल्ली में जारी किसान आंदोलन के बीच आज कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल ने किसान आंदोलन को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में नरेंद्र सिंह तोमर ने सबसे पहले पश्चिम बंगाल में हुई घटना को लेकर ममता सरकार की निंदा की और घटना को अंजाम देने वालों के ख़िलाफ कार्रवाई की माँग की।

आगे उन्होंने नए कृषि कानूनों पर बात की। उन्होंने कहा कि सारे कानून दो सदनों में लंबी बहस के बाद पारित हुए थे। सभी ने इस पर अपनी राय दी थी तब जाकर यह पूरे देश भर में लागू हुआ। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे पिछले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी सरकार के नेतृत्व में किसानों के उत्थान के लिए लगातार काम हुए हैं। कैसे पीएम नरेंद्र मोदी ये सपना संजोए बैठे हैं कि किसानों की आय साल 2022 तक दुगनी हो। इस क्षेत्र में अधिक से अधिक अनुदान दिया जाए और लाभकारी योजनाओं को लागू किया जाए।

2014 से पहले यूरिया सृजन की किल्लत को याद कराते हुए तोमर बोले कि तब मुख्यमंत्री दिल्ली में डेरा डालकर अपनी माँग रखते थे, और उसकी कालाबाजारी होती थी। पीएम मोदी के आने के बाद यूरिया की कमी कभी किसी किसान को नहीं हुई। इसी प्रकार के बहुत सारे विषय है जिनपर पिछले 6 साल में काम हुआ। नए कानूनों को लेकर भी देश की अपेक्षा यही थी कि इनके माध्यम से इस क्षेत्र का विकास होगा। कई बुद्धिजीवियों की ओर से इस पर अक्सर सिफारिशें हुईं कि ये कानून आए।

उन्होंने कहा कि इस कानून के जरिए सरकार का उद्देश्य किसानों को मंडी की बेड़ियों से आजाद करना चाहती थी जिससे वे अपनी उपज देश में कहीं भी, किसी को भी, अपनी कीमत पर बेच सकें। उन्होंने पूछा कि किसानों को बेचने की स्वतंत्रता मिल जाए और बिना टैक्स के खरीद फरोख्त हो, तो इससे किसे क्या आपत्ति होगी? कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि अभी कोई भी कानून यह नहीं कहता कि तीन दिन के भीतर उपज बेचने के बाद किसान को उसकी कीमत मिलने का प्रावधान हो जाएगा, लेकिन इस कानून में यह प्रावधान सुनिश्चित किया गया है।

उन्होंने कहा कि हमें लगता था कि कानून के जरिए लोग इसका फायदा उठाएँगे, किसान महँगी फसलों की ओर आकर्षित होगा, बुवाई के समय उसे मूल्य की गारंटी मिल जाएगी और इसमें किसान की भूमि को पूरी सुरक्षा देने का प्रबंध किया गया है। 

आगे केंद्रीय मंत्री ने किसानों को भेजे गए प्रस्ताव के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि किसान चाहते हैं कि नए कानून निरस्त हों। लेकिन सरकार कह रही है कि वो खुले दिमाग के साथ उन प्रावधानों पर बातचीत करने के लिए तैयार हैं जिन पर किसानों को आपत्ति है।

उन्होंने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये कानून एपीएमसी या एमएसपी को प्रभावित नहीं करते हैं और सरकार ने इस बात को समझाने की कोशिश की है। इसके अलावा सरकार की ओर से यह भी कह दिया गया है कि एमएसपी चलती रहेगी।

उन्होंने बताया कि रबी और खरीफ की खरीद अच्छे से हुई है। एमएसपी को डेढ़ गुना किया गया है, खरीद की वॉल्यूम भी बढ़ाया गया है। अगर इसके बावजूद एमएसपी के मामले में किसानों को कोई शंका है तो सरकार लिखित में आश्वासन देने को तैयार है। 

किसान बातचीत में कृषि कानूनों को अवैध बताते हैं और कहते हैं कि कृषि राज्यों का विषय हैं, सरकार इसमें नियम नहीं बना सकती। इस पर केंद्र सरकार की ओर से उन्हें समझाया गया कि व्यापार पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार रखती है।

सरकार की ओर से बातचीत के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन किसान कोई सुझाव नहीं दे रहे, बस एक माँग पर अड़ें हैं कि कानून निरस्त हो। ऐसे सरकार बस जानना चाहती थी कि किसानों को किन प्रावधानों से दिक्कत है। जब उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया तो सरकार की ओर से ऐसे मुद्दे ढूँढे गए जिनसे किसानों को आपत्ति हो सकती है।

सरकार हर तरह से किसानों की समस्या का समाधान करना चाह रही है। वह टैक्स मुद्दे पर भी विचार करने को तैयार हैं। उनकी ओर से प्रस्ताव दिया गया है कि राज्य सरकार निजी मंडियों की व्यवस्था भी लागू कर सकेगी और राज्य सरकार निजी मंडियों पर भी टैक्स लगा सकेगी। एक्ट में यह प्रावधान था कि पैन कार्ड से ही खरीद हो सके। 

सरकार सोचती थी कि व्यापारी और किसान दोनों इंस्पेक्टर राज और लाइसेंसी राज से बच सकें। लेकिन किसानों को यदि ऐसा लगता है कि पैन कार्ड तो किसी के भी पास होगा और कोई भी खरीद कर सकेगा तो ऐसे में वह क्या करेंगे? इस आशंका को दूर करने के लिए सरकार की ओर से प्रस्ताव रखा गया कि राज्य सरकारों को पंजीयन के नियम बनाने की शक्ति दी जाएगी।

उन्होंने किसानों की जमीन पर उद्योगपतियों के कब्जे की बात पर भी अपनी तरफ से स्पष्टता दी। तोमर ने बताया कि गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग लंबे समय से चल रही है, लेकिन कहीं भी यह देखने को नहीं मिला कि उद्योगपतियों ने किसानों की जमीन हड़पी हो। फिर भी नए कानून में प्रावधान बनाया है कि इन कानूनों के तहत होने वाला समझौता केवल किसानों की उपज और खरीदने वाले के बीच होगा। इन कानूनों में किसान की जमीन को लेकर किसी लीज या समझौते का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। 

‘किसी को कुछ नहीं हुआ, सभी सुरक्षित हैं’: नड्डा के काफिले पर पथराव को लेकर बंगाल पुलिस का जवाब

पश्चिम बंगाल में आज (10 दिसंबर 2020) भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफ़िले पर पथराव की घटना हुई थी। घटना के दौरान भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय की गाड़ी पर ईंटें फेकी गई। इस घटना के तमाम वीडियो और तस्वीरें पूरे सोशल मीडिया चर्चा का कारण बनी हुई हैं। यह सब बंगाल पुलिस की मौजूदगी में हुआ। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए पुलिस ने कहा है कि किसी को कुछ नहीं हुआ है और सभी लोग सुरक्षित हैं। 

पश्चिम बंगाल पुलिस की तरफ से जारी किए गए आधिकारिक बयान में कहा गया है, “भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा डायमंड हार्बर और साउथ 24 परगना स्थित कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गए हैं। वह पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनके काफ़िले को कुछ भी नहीं हुआ है। डायमंड हार्बर के फाल्टा पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत देबीपुर में सड़क किनारे खड़े लोगों ने काफ़िले पर पत्थरबाजी की थी। अभी तक सामने आई जानकारी के अनुसार सभी सुरक्षित और स्थिति शांतिपूर्ण है। फ़िलहाल मामले की जाँच की जा रही है कि घटनास्थल पर असल में हुआ क्या था।” 

केंद्र सरकार ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफ़िले पर हुई पत्थरबाजी और दौरे के समय सुरक्षा में हुई भारी चूक को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार से रिपोर्ट तलब की है। सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह थी कि पश्चिम बंगाल में भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं पर यह हमला पुलिस की मौजूदगी में हुआ। बता दें आज (दिसंबर 10, 2020) दक्षिण 24 परगना में डायमंड हार्बर की ओर एक कार्यक्रम के लिए जाते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा के काफिले पर हमला हुआ था। 

इस हमले में बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय की गाड़ी पर ईंट फेंकी गई थी। उन्होंने वीडियो साझा करते हुए पूरी घटना की सूचना दी और पुलिस प्रशासन की नाकामयाबी को उजागर किया था। कैलाश विजयवर्गीय ने लिखा, “बंगाल पुलिस को पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जी के कार्यक्रम की जानकारी दी गई थी, लेकिन एक बार फिर बंगाल पुलिस नाकाम रही। सिराकोल बस स्टैंड के पास पुलिस के सामने ही TMC गुंडों ने हमारे कार्यकर्ताओं को मारा और मेरी गाड़ी पर पथराव किया।”

बता दें कि इससे पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने जेपी नड्डा की सुरक्षा में कमी का आरोप लगाया था, जिसके बाद गृह मंत्रालय ने भाजपा नेताओं की चिंता पर पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब माँगा था। आज दिलीप घोष ने हमले की जानकारी देते हुए कहा, “डायमंड हार्बर के लिए जाते हुए टीएमसी समर्थकों ने हमारे लिए सड़कों को ब्लॉक कर दिया और नड्डा जी के वाहन समेत अन्य गाड़ियों पर पथराव किया।” घोष के अनुसार, टीएमसी अब अपना असली रंग दिखाने लगी है।

कुशीनगर में लड़की के हाथ में कलावा देख ग्रामीणों ने दी पुलिस को गुपचुप निकाह की खबर: मौलवी समेत 3 हिरासत में

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के कसया क्षेत्र में पुलिस ने युवक-युवती और मौलवी को हिरासत में लिया। खबरों में बताया गया कि मौलवी को देर रात घर पर बुलाकर युवक दूसरे समुदाय की युवती से चुपचाप निकाह करने का प्लॉन कर रहा थाा, लेकिन पुलिस समय पर पहुँचकर मौलवी समेत तीन लोगों को अपने साथ ले गई।

पूरा मामला गुरमिया गाँव के खान टोला का है। यहाँ एक समुदाय विशेष का युवक अपने साथ एक युवती को लेकर आया जिसके हाथ में लोगों ने कलावा बँधा देखा। कुछ देर में लोगों को उसी युवक के घर में मौलवी जाता भी दिखा, जिसके बाद लोगों का शक बढ़ गया। रात के करीब 9 बजे निकाह की तैयारियाँ देख गाँव के लोगों ने सारी बात आपस में बताई और इकट्ठा होकर पुलिस को मामले से सूचित कराया।

पुलिस जब मौके पर पहुँची तब मकान मालिक, युवती और मौलवी वहाँ मौजूद थे। पुलिस उनसे पूछताछ करने के लिए उन्हें अपने साथ ले गई। थाने में लड़की ने बताया कि वह पुरानी बस्ती थाना मुबारकपुर जिला आजमगढ़ की रहने वाली है।

इस आधार पर पुलिस ने उस इलाके के थाने से इनकी जानकारी मँगाई। जाँच में पता चला कि लड़की 13 दिन पहले फरार हुई थी। तलाश के बाद भी उसका सुराग किसी को नहीं मिला। उसके परिवार ने उसके गायब होने की रिपोर्ट भी करवाई हुई है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, गुरमिया निवासी युवक से लड़की की बात इंटरनेट के जरिए शुरू हुई थी। बात होते होते दोनों में प्रेम हो गया और लड़की ने अपने घरवालों को शादी में रोड़ा बनता देख युवक के साथ भागने का निर्णय लिया। घर से फरार होने के बाद दोनों ने कुछ समय देवरिया और गोरखपुर में बिताया। इसके बाद वह गुरमिया आए।

कुछ लोग इन दोनों को एक समुदाय का बताते रहे। मगर, स्थानीयों का कहना है कि उन्होंने लड़की के हाथ में कलावा देखा। इस पूरे मामले पर कुशीनगर के एसपी विनोद कुमार सिंह ने कहा कि युवक-युवती बालिग हैं और एक की गुमशुदगी मुबारकपुर थाने में दर्ज है। लड़की के घरवालों की शिकायत पर अब आगे की कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि हिंदुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने इस केस में लड़की के घरवालों से बात करके पता लगाया है कि लड़का-लड़की दोनों एक ही मजहब से संबंध रखते हैं। लेकिन उनको सूचना दी गई थी कि लड़की अलग धर्म से है। उन्होंने ताजा जानकारी होते ही मकान मालिक और मौलवी को रिहा कर दिया है।

बेटों के खून से सने चावल माँ को खिलाने वाले वामपंथियों ने दिल्ली दंगों के लिए अमित शाह को ठहराया जिम्मेदार

दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने बुधवार (दिसंबर 09, 2020) को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए उन पर हिंसा भड़काने और और जाँच में पक्षपात का आरोप लगाया है। उससे भी बड़ी खबर यह है कि प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘दी टेलीग्राफ’ ने सीपीएम के इस आरोप को ‘फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट’ का दर्जा दिया है।

‘दी टेलीग्राफ’ के अनुसार, कथित फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट, जिसक शीर्षक ‘फरवरी 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा’ है, में कहा गया है कि अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय की भूमिका इस हिंसा को बढ़ाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार थी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि दिल्ली के दंगों को ‘सांप्रदायिक हिंसा’ कहना गलत है क्योंकि ‘दंगे’ एक ऐसी स्थिति का वर्णन करते हैं जहाँ दोनों पक्ष समान रूप से सहभागी हों। सीपीएम का आरोप है कि दिल्ली दंगों में एक ओर आक्रामक हिंदुत्व मॉब थी, जबकि दूसरी ओर के लोग इन हमलों से खुद को बचाने की कोशिश कर रहे थे। यही नहीं, सीपीएम का कहना है कि लगभग सभी जगहों पर पुलिस भी हिन्दुओं के साथ रही जिसके वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं।

गौरतलब है कि इस साल फरवरी माह में दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में 53 लोग मारे गए थे। मरने वालों में आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, दिलबर नेगी समेत दोनों समुदायों के लोग शामिल थे।

यह कथित ‘फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट’, सीपीएम पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात और राज्य सचिव केएम तिवारी, द्वारा पार्टी की ‘राहत और पुनर्वास एकजुटता समिति’ द्वारा किए गए साक्षात्कार में 400 लोगों की प्रतिक्रियाओं के संदर्भ और स्पष्टीकरण देने के लिए जारी की गई है।

वामपंथियों ने भाइयों को मारकर माँ को खिलाए थे खून से सने चावल

उल्लेखनीय है कि दिल्ली दंगों के लिए केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराने वाली यह वही कम्युनिस्ट पार्टी है, जिसके काडरों ने वर्ष 1969 में ही बंगाल के बर्दवान जिले के सेन भाइयों की हत्या कर अपने राजनीतिक नजरिए का परिचय दे दिया था। बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सेनबाड़ी हत्या से शायद ही कोई अपरिचित हो। वर्ष 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए।

सेनबाड़ी हत्याकांड के दौरान सीपीआई (एम) के कार्यकर्ताओं की भीड़ ने घरों में आग लगा दी, परिवार के दो भाइयों, प्रणब कुमार सेन और मलय कुमार सेन को परिवार के सदस्यों के सामने काट दिया गया था। यही नहीं, एक निजी ट्यूटर, जितेंद्रनाथ राय, जो परिवार में बच्चों को पढ़ाने के लिए आए थे, को भी काट दिया गया था। बाद में मारे गए भाइयों की माँ को अपने मृत बेटों के खून से सना चावल खाने के लिए मजबूर किया गया।