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आजम खान के अब्बा के नाम पर सरकारी पैसे से बनाया था पार्क, योगी सरकार ने नाम बदला डाला

उत्तर प्रदेश में जगहों और इमारतों के नाम बदलने का सिलसिला जारी है। इस कड़ी में समाजवादी पार्टी के शासन के दौरान में बनाए गए मुमताज पार्क का नाम बदल दिया गया है। दरअसल, मुमताज पार्क सपा सांसद आज़म खान के पिता मुमताज खान के नाम पर था। अब पार्क का नाम बदल कर देश के पहले शिक्षा मंत्री और रामपुर के पहले सांसद मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर रखा गया है। सोमवार (दिसंबर 7, 2020) को केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी इसका लोकार्पण करेंगे।

उल्लेखनीय है कि सपा शासनकाल में रामपुर में आलीशान मुमताज पार्क का निर्माण कराया गया था। इस पार्क के निर्माण के लिए जिला जेल की ओर से प्रस्ताव सरकार को भेजा गया था। उस दौरान आजम खान नगर विकास मंत्री थे। उस दौरान केवल दस माह में पार्क का निर्माण किया गया था। अमृत योजना के तहत बनाए गए इस पार्क में करीब 60 लाख रुपए की लागत आई थी। 

वहीं, उद्घाटन पूर्व नगर पालिकाध्यक्ष अजहर अहमद खान ने किया था। अगस्त 2013 में पार्क के उद्घाटन बाद भी ताले नहीं खोले गए थे। पार्क का नाम आजम खान के पिता मुमताज खान के नाम पर मुमताज पार्क रखा गया। जिला प्रशासन के अथक प्रयासों के बाद 11 महीने पूर्व ही इसे आम लोगों के लिए खोला गया था।

बता दें कि भाजपा लघु उद्योग प्रकोष्ठ के वेस्ट यूपी संयोजक आकाश सक्सेना ने डीएम से शिकायत की थी कि पार्क को सरकारी पैसे से बनाया गया है। इसलिए पार्क का नाम बदल दिया जाए। इसको लेकर प्रशासनिक अफसरों ने काफी मंथन किया।

अधिकारियों के मंथन के दौरान यह पता चला कि देश के पहले शिक्षा मंत्री रहे रामपुर के पहले सांसद मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर कोई स्थल नहीं है। इसलिए उनके नाम पर ही पार्क का नाम रखा जाएगा। डीएम ने मौलाना अबुल कलाम आजाद के नाम पर मंजूरी दे दी। जिसे बाद पार्क का नाम बदल दिया गया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ सरकार ने समाजवादी पार्टी के कार्यकाल के दौरान गाजियाबाद में 51 करोड़ रुपए की लागत से निर्माण किए गए आला हजरत हज हाउस की जाँच के आदेश दिए। राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री नंद गोपाल नंदी ने हज हाउस के निर्माण में जरूरत से ज्यादा खर्च हुए धनराशि का पता चलने के बाद एसआईटी को जाँच के आदेश दिए।

वहीं लंबे अरसे से विवाद और मुकदमों में चल रही उत्तर प्रदेश के भू-माफिया आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी की दीवार पर बृहस्पतिवार (फरवरी 20, 2020) दोपहर प्रशासन ने बुलडोजर चला दिया। आजम उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित इस यूनिवर्सिटी के कुलपति हैं। यह कार्रवाई प्रशासन की तरफ से चकरोड प्रकरण में की गई।

‘मेरी पत्नी रूसी हैं लेकिन उन्होंने हिंदू धर्म अपना लिया है, भगवान शिव-पार्वती के बारे में बताता रहता हूँ’

देश में चल रहे धर्मपरिवर्तन के मामले के बीच भाजपा के नेता रहे प्रमोद महाजन (दिवंगत) के बेटे राहुल महाजन ने अपनी तीसरी पत्नी के धर्मपरिवर्तन को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने बताया कि उनकी रूसी पत्नी हिंदू धर्म में परिवर्तित हो गई हैं। बता दें कि 45 साल के राहुल महाजन ने खुद से 18 साल छोटी कजाकिस्तानी मॉडल नताल्या इलीना से शादी की थी।

एक इंटरव्यू में राहुल ने कहा, “हम रेलवे के दो ट्रैक की तरह हैं। हम एक-दूसरे के मामलों में बहुत अधिक हस्तक्षेप नहीं करते हैं और एक-दूसरे को जगह देते हैं। हम एक-दूसरे से अलग भी नहीं हैं। लेकिन हम संतुलन बनाए रखते हैं ताकि हमारी शादी सही ट्रैक पर रहे।”

राहुल महाजन ने आगे कहा, “वह रूसी हैं और हिंदू धर्म में परिवर्तित हो गई हैं और मैं हमेशा उन्हें भगवान शिव और पार्वती के बारे में बताता रहता हूँ। मैं हमेशा उनसे कहता हूँ कि पति और पत्नी का रिश्ता शिव और पार्वती जैसा होना चाहिए। मैं उन्हें भगवत गीता सिखाता हूँ और हम एक साथ कई पौराणिक चीजें पढ़ते हैं। मुझे लगता है कि आपको एक सही साथी और परिवार खोजने के लिए अच्छे भाग्य की आवश्यकता है।”

बता दें कि राहुल महाजन बिगबॉस शो में काम कर चुके हैं। सीजन 2 में आए कॉन्टेस्ट के रूप में भी लोग उन्हें जानते हैं। वर्तमान में चल रहे बिगबॉस-14 के 5 दिसंबर वाले एपिसोड में भी उन्हें देखा गया है।

राहुल महाजन ने 2018 में नतालिया इलीना से शादी की थी। यह उनकी तीसरी शादी है। उन्होंने पहले श्वेता सिंह (2006-2008) और डिंपी गांगुली (2010-2015) से शादी की थी। राहुल महाजन पर श्वेता और डिंपी दोनों ने घरेलू हिंसा का आरोप लगाया था।

’60 सालों वाला सिस्टम ठीक तो किसान बदहाल क्यों?’: कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से कमाने वाले किसानों ने प्रदर्शनकारियों को लताड़ा

जहाँ एक तरफ दिल्ली में ‘किसान आंदोलन’ के जरिए खालिस्तानी ताकतें फिर से सिर उठाने की कोशिश में लगी हैं और सरकार द्वारा बार-बार आश्वासन के बावजूद पंजाबी सलेब्रिटी आग में घी डालने का काम कर रहे हैं, वहीं गाँव के खेतों में काम कर रहे ऐसे किसान भी हैं, जिन्हें इन कृषि कानूनों का फायदा मिला है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करने वाले कई किसानों ने अपने अनुभव साझा किए। आइए देखते हैं कैसे ये कृषि कानून किसानों के लिए लाभदायक हैं।

आंदोलनकारियों का कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से उनकी जमीनें प्राइवेट कम्पनियाँ हड़प लेंगी, जबकि बिल में इसका पूरा प्रावधान है। आपको उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित सिसाना गाँव के बारे में जानना चाहिए, जहाँ 30 वर्षों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। इस गाँव की सफलता की दास्तान इसी से समझ लीजिए कि यहाँ के किसानों को अपनी उगाई सब्जियों के भाव दिल्ली स्थित आजादपुर मंडी से ज्यादा मिलती है, जो देश की शीर्ष मंडी कही जाती है।

‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित एक खबर में उन किसानों से बात कर उनके निजी अनुभव साझा किए गए हैं, जिनकी हरी सब्जियाँ खेत से ही बिक जाती हैं। किसान सुनील कुमार ने अपनी खेत में गाजर और नलकूप के कमरे में रखी कंपनी की प्लास्टिक की खाली कैरेट और काँटा दिखा कर बताया कि 3 एकड़ मूली की खेती करते हैं। उनकी उगाई मूली को कम्पनी ने 3 से 4 रुपए किलो खरीदा। वहीं मंडी में मात्र 1.5-2 रुपए मिलते हैं।

उन्होंने 3 बीघा में डेढ़ माह की मूली खेती से 30,000 रुपए आराम से कमा लिए। गाजर भी 12-15 रुपए किलो बिक जाता है। उन्होंने बताया कि कम्पनी तुरंत भुगतान करती है, आज तक कभी देरी नहीं हुई। हर सप्ताह बैंक में रुपए आ जाते हैं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि इसका विरोध क्यों हो रहा है? शलजम की खेती करने वाले जितेंद्र चौहान ने बताया कि उन्हें मंडी से ज्यादा भाव मिलता है, कभी कम नहीं।

गाँव के किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार किसानों का अहित नहीं कर रही है। एक किसान रणवीर सिंह ने बताया कि उनके गाँव में 1987 से ही कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग चली आ रही है। शुरू में वहाँ भी विरोध हुआ था, लेकिन एक बार फायदा होने लगा तो सभी किसान ऐसा ही करने लगे। गाजर, मूली, शलजम, धनिया, पालक, सरसों, बैंगन, टमाटर, हरी मिर्च और अन्य हरी सब्जियों की खेती वहाँ धड़ल्ले से हो रही है।

वहीं सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में एक किसान ने बताया कि वो छठ में गाँव गया था और वहाँ गेहूँ बोया जा रहा है, उसके पिता को फुर्सत ही नहीं है। साथ ही कहा कि वो सारे किसान नेताओं से पूछ रहे हैं कि पिछले 60 वर्षों से जो कानून चल रहा था, वो ठीक था तो किसान खुशहाल था क्या? उन्होंने कहा कि अगर किसान खुशहाल थे तो क्या अब 3 महीने में ही सारी बदहाली आ गई? उन्होंने इसके लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराया।

किसान ने पूछा कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में किसान नहीं हैं क्या? वहाँ के किसान ही जाकर पंजाब में इनका काम करते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी को बदनाम करने वाले अपने हाथ से काम नहीं करते, वो हमारे मेहनत के बल पर टिके हुए हैं। वहीं उज्जैन के एक किसान ने बताया कि वो 80 बीघा में गेहूँ, प्याज लहसुन, आलू और खरीफ में सोयाबीन की खेती करता है। उसने बताया कि ये कृषि कानून किसानों के हित में हैं।

पीएम मोदी ने भी महाराष्ट्र के धुले ज़िले के किसान जितेन्द्र भोइजी का जिक्र किया था, जिन्होंने कृषि कानूनों का सटीक इस्तेमाल किया। पीएम ने बताया था कि जितेन्द्र भोइजी ने मक्के की खेती की थी और सही दामों के लिए उसे व्यापारियों को बेचना तय किया। फसल की कुल कीमत तय हुई करीब 3.32 लाख रुपए। तय ये हुआ था कि बाकी का पैसा उन्हें 15 दिन में चुका दिया जाएगा। लेकिन, बाद में परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि उन्हें बाकी का पेमेन्ट नहीं मिला। ऐसे में नए कृषि कानून उनके काम आए।

राम-रावण वाली बात पर सैफ अली खान ने माँगी माफी, माँ सीता पर घटिया टिप्पणी पर अभी भी खामोश

सैफ अली खान अपनी आने वाली फिल्म आदिपुरुष को लेकर चर्चा का विषय बने हुए हैं। हाल ही में उन्होंने फिल्म में अपने किरदार के बारे में बात करते हुए एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसके कारण लोगों की भावनाएँ आहत हो गईं और सैफ लोगों के निशाने पर आए गए। वहीं अब सैफ अली खान ने अपने बयान के लिए माफी माँगी है। हालाँकि माँ सीता पर दिए गए आपत्तिजनक बयान को लेकर उन्होंने कोई सफाई नहीं पेश की है।

बता दें कि सैफ ने एक इंटरव्यू के दौरान फिल्म में रावण द्वारा सीता के अपहरण को सही ठहराने, रावण की बहन सूर्पणखा के साथ लक्ष्मण का व्यवहार, सीताहरण और लंकापति रावण के अच्छे पहलू यानी मानवीय रूप के बारे में बात की थी। इसके चलते उन्हें सोशल मीडिया पर काफी तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उनकी टिप्पणी कई नेटिज़न्स को अच्छी नहीं लगी और सोशल मीडिया पर आलोचना के साथ ‘बॉयकाट आदिपुरुष’ का ट्रेंड शुरू हो गया।

अब सैफ अली खान ने सोशल मीडिया पर लोगों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए अपने बयान पर लीपापोती करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा:

“मुझे पता चला है कि एक साक्षात्कार के दौरान मेरे एक बयान ने विवाद पैदा कर दिया है और लोगों की भावनाओं को आहत किया है। यह मेरा इरादा कभी नहीं था या इस तरह का मतलब नहीं था। मैं ईमानदारी से हर किसी से माफी माँगना और अपना बयान वापस लेना चाहूँगा। भगवान राम, मेरे लिए हमेशा धार्मिकता और वीरता के प्रतीक रहे हैं। आदिपुरुष बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के बारे में है और पूरी टीम मिलकर काम कर रही है ताकि महाकाव्य को बिना किसी विकृतियों के प्रस्तुत किया जा सके।”

उनका माफीनामा भी नेटीज़न्स को कुछ रास नहीं आया है।

सैफ की माफ़ी के बाद भाजपा नेता राम कदम ने उन पर तंज कसा है। कदम ने ट्वीट कर कहा, “हर कलाकार, फिल्म निर्माता-निर्देशक के प्रति हमें आदर तथा सम्मान है अपितु किसी भी धर्म की भावनाएँ आहत करने का अधिकार किसी को भी नहीं है। देर पर दुरुस्त। प्यार से बोलो जय श्रीराम…”

बता दें कि अन्य लोगों की ही तरह भाजपा नेता राम कदम ने भी सैफ अली खान के बयान पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था, “अभिनेता सैफ अली खान आदिपुरुष नाम की फ़िल्म में रावण की भूमिका निभाने वाले हैं। सैफ अली खान, रावण के रोल को हीरो की तरह पेश करने की बात करते हैं, रावण के दुष्कृत्य को फ़िल्म के जरिए न्याय देंगे? यह कैसे संभव है?”

उन्होंने यह भी कहा, “प्रभु श्रीराम धर्म को स्थापित करते हैं। श्रीराम और रावण के बीच युद्ध धर्म और अधर्म की लड़ाई है। फ़िल्म निर्माता तथा निर्देशक हिन्दू आस्थाओं का सम्मान करते हुए फ़िल्म बनाएँ। जिस प्रकार से Omraut जी नें Tanaji फिल्म में समस्त हिन्दुओं का तथा मराठों का सम्मान किया था, उसी तरह इस फिल्म में भी हिन्दुओं की आस्था और श्रद्धा का सम्मान हो। हमारी आस्था को आँच और ठेस पहुँचे, ऐसा कृत हिन्दू समाज कताई सहन नहीं करेगा।”

गौरतलब है कि मुंबई मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक सैफ अली खान ने अपने किरदार के बारे में बोलते हुए कहा था, “एक राक्षस राजा का किरदार निभाना काफी दिलचस्प है, लेकिन ये इतना भी क्रूर नहीं है। हम इसे काफी मनोरंजक बनाने वाले हैं। सीता का अपहरण और राम के साथ हुए युद्ध को हम उसकी बहन के लिए बदले की भावना से जोड़कर दिखाने वाले हैं, जिसकी नाक लक्ष्मण ने काट दी थी।”

‘आदिपुरुष’ में भगवान राम के किरदार में प्रभास और सीता के किरदार में कृति सेनन नज़र आने वाली हैं। सैफ अली खान ने ये भी बताया था कि प्रभास और उनके बीच जो एक्शन सीक्वेंस होंगे, उन्हें काफी बड़े स्तर पर फिल्माया जाएगा। इस फिल्म का बजट 400 करोड़ रुपए से अधिक होगा और इसके लिए शीर्ष तकनीकी विशेषज्ञों को लगाया जा रहा है। जनवरी 2021 से इसकी शूटिंग प्रारंभ होने वाली है।

इससे पहले सैफ ने कहा था कि फिल्म की स्क्रिप्ट पर बिलकुल भरोसा नहीं था, क्योंकि उसका भारतीय इतिहास से कोई संबंध नहीं था। भारत के बहुसंख्यक रामायण में विश्वास करते हैं, वह रामायण को भारत के इतिहास की तरह ही देखते हैं। इसलिए लोगों के लिए यह बात हजम करना मुश्किल है जो इंसान अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत की अवधारणा में भरोसा नहीं रखता था, वह लंकेश का किरदार निभा रहा है।

‘मंदिर वहीं बनाएँगे’: अयोध्या में मंदिर निर्माण का संकल्प लेकर सोमनाथ से चले आडवाणी का वह ऐतिहासिक भाषण

राम मंदिर आंदोलन में दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका को कोई नहीं भूल सकता। सोशल मीडिया पर बाबरी मस्जिद विध्वंस की 28वीं वर्षगाँठ पर प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान दिया गया उनका आइकॉनिक भाषण काफी वायरल हो रहा है।

1990 में सोमनाथ से शुरू हुए प्रसिद्ध रथ यात्रा के दौरान, आडवाणी ने बिहार के तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव सहित उन सभी लोगों पर तीखा हमला किया, जिन्होंने प्रसिद्ध रथ यात्रा को रोकने की पूरी कोशिश की थी।

आडवाणी ने रथ यात्रा के दौरान अपने एक भाषण में कहा था, लोग कहते है कि आप अदालत का फैसला क्यों नहीं मानते? अदालत क्या इस बात का फैसला करेगी कि यहाँ श्री राम का जन्म हुआ था कि नहीं हुआ था?” नेताओं से रथयात्रा को नहीं रोकने का आग्रह करते हुए आडवाणी ने कहा था, “आप से तो इतनी ही आशा है कि बीच में मत पड़ो। रास्ते मे मत आओ। क्योंकि यह जो रथ है, लोकरथ है। जनता का रथ है।” आडवाणी ने उस वक़्त कहा था, “मंदिर वहीं बनाएँगे। उसको कौन रोकेगा। कौन सी सरकार रोकने वाली है?”

बता दें राम मंदिर निर्माण को लेकर समर्थन जुटाने के लिए आडवाणी ने 25 सितंबर, 1990 को गुजरात के सोमनाथ से रथयात्रा शुरू की, जिसे विभिन्न राज्यों से होते हुए 30 अक्तूबर को अयोध्या पहुँचना था। हालाँकि इस दौरान यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए यात्रा को बीच में ही रोक दिया गया। देश के कई हिस्सों में काफी हिंसा हुई। बिहार पहुँचने के बाद आडवाणी को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के आदेश पर 23 अक्टूबर को समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया था।

2 साल के भीतर भव्य राम मंदिर होगा जाएगा तैयार

6 दिसंबर, 1992 को अचानक से हुई एक घटना में कारसेवकों ने अयोध्या में विवादित ढाँचे को ध्वस्त कर दिया था। वहीं सालों से चल रहा भूमि विवाद आखिरकार 9 नवंबर, 2019 को समाप्त हुआ, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने रामलला के पक्ष में निर्णय दिया और राम मंदिर के निर्माण की अनुमति दे दी। 5 अगस्त, 2020 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मंदिर का शिलान्यास किया गया। उम्मीद है कि 2 साल के भीतर भव्य रामलला का मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा।

लाखों लोगों का संघर्ष कि ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’ से ‘मंदिर वहीं बन रहा है’ पूरा हो रहा है।

प्यारे हिन्दुओ! बच्चों को सिखाना कि 400 साल पहले कुछ आतंकियों ने हमारे मंदिर पर पूरी मस्जिद ही रख दी थी

AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने एक ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने मुस्लिमों को कुछ सलाह दी है। जाहिर है कि उनकी पार्टी के नाम में ही ‘मुसलमीन’ है, अतएव वो कैसी राजनीति करते हैं- ये सभी को पता है। असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि बाबरी मस्जिद अयोध्या में 400 वर्षों तक खड़ा रहा और ‘हमारे (मुस्लिमों के) पूर्वजों’ ने न सिर्फ वहाँ पर नमाज पढ़ी और साथ इफ्तार तोड़ा, बल्कि मौत के बाद भी वो वहीं दफ़न हुए। बाबरी मस्जिद का राग अलापने वाले ओवैसी बताएँगे कि राम मंदिर को जिन आतंकियों ने तोड़ा, वो किनके पूर्वज थे?

उन्होंने मुस्लिमों से कहा कि इस ‘अन्याय’ को कभी मत भूलो। साथ ही दावा किया कि दिसंबर 22-23, 1949 को बाबरी मस्जिद को ‘अपवित्र’ कर उस पर अवैध रूप से कब्ज़ा कर लिया गया और अगले 42 वर्षों तक ये जारी रहा। उन्होंने दावा किया कि दिसंबर 6, 1992 को पूरी दुनिया के सामने इसे ध्वस्त कर दिया गया और ऐसा करने वालों को 1 दिन की भी सज़ा नहीं मिली। ओवैसी ने 1949 और 1992 तो याद दिलाया, लेकिन 1528 से पहले के इतिहास को खुद भूल गए।

इस ट्वीट के रिप्लाई में लोगों ने उनसे पूछा कि जब कुछ साल मुस्लिमों के वहाँ नमाज पढ़ने से वो मुस्लिमों का स्थल हो गया तो जिस मंदिर को तोड़ कर ये मस्जिद बनाई गई थी, क्या वहाँ हिन्दू प्रार्थना नहीं करते होंगे? हिन्दुओं की आस्था उस राम मंदिर में नहीं रही होगी, जिनके अयोध्या से लेकर लंका तक का सफर पूरे भारतवर्ष की एकता का परिचायक है? राम का इतिहास किसी 1528, 1949 या 1992 का मोहताज तो नहीं? ये तो आपके क्रंदन का हिस्सा है।

इसी तरह कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) ने विवादित ढाँचे की स्मृति में एक पोस्टर साझा किया। इस पोस्टर में लिखा है, “एक दिन बाबरी का उदय ज़रूर होगा” और “हम इसे भूल नहीं सकते हैं।” इस पोस्टर को पीएफ़आई के तमाम समर्थक साझा कर रहे हैं और इसके साथ ही #BabriYaadRahegi हैशटैग का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। इसके अलावा तमाम कट्टरपंथी इस्लामी भी इस तरह के नफ़रत भरे ट्वीट कर रहे हैं

6 दिसम्बर को कुछ लोग सप्रेम ऐसे वाकये लिखते हैं जैसे कि देश और समाज उसी समय से शुरू हुआ जब से बाबरी में मूर्तियाँ रखवा दी गईं। बड़े ही भोलेपन के साथ इस घटना को ‘आतंकी’ तक लिख दिया जाता है। उतनी ही मासूमियत के साथ ये कह दिया जाता है कि ये सबसे बड़ी घटना थी और सबके केन्द्र में ‘दक्षिणपंथी विचारधारा’ को रख दिया जाता है। हाँ, है दक्षिणपंथी विचारधारा, और तुम्हारे कामपंथी, आतंकी, दोगले वामपंथ से ज़्यादा समय तक रहेगा।

बाबरी मस्जिद में किसी ने मूर्तियाँ रखी तो इतिहास और भूगोल गिन रहे हो, अयोध्या में राम जन्मभूमि पर कोई पूरी मस्जिद रख गया, उसका क्या? तुम्हें आतंक की याद हिन्दुओं द्वारा मूर्ति रखते हुए ही आती है? 6 दिसम्बर अगर भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन है, तो फिर जिस-जिस दिन मंदिर तोड़े गए, बस्तियों में आग लगी, बलात्कार हुए, नरसंहार हुए, और उनके आकाओं ने उन जगहों पर न सिर्फ मस्जिद उठा दिए, बल्कि उनके नाम बदल डाले, उनकी पहचान छीनकर एक विदेशी बुर्क़े से ढक दिया, उन दिनों को कौन सा रंग दोगे?

शर्म करो बे चिरकुटों के सरगना! थोड़ी तो शर्म कर लोग अगर बची हो तो। तुम चाहे जितना पिनपिना लो, जितनी खुजली मचा लो, अगर बाबरी विध्वंस आतंकी घटना थी, तो ऐसी तमाम आतंकी घटनाओं के समक्ष मैं इस्लामी आतंक की हर तारीख़ को रखकर तोलूँगा। क्योंकि तुम्हारी समझ में अगर भारतीय समाज की शुरुआत पचास के दशक से होती है, तो तुम्हें ये बताना ज़रूरी है कि देश इस्लामी बलात्कारियों, लुटेरे अंग्रेज़ों और दोगले वामपंथियों से पहले भी था, और आगे भी रहेगा।

तुम बस छटपटाओ, बिलबिलाओ, कुथते रहो। तुम्हारी हर फ़र्ज़ी डिजिटल आउटरीच और नक़ाब के पीछे का सच प्रेस क्लब की शामों और निजी ज़िंदगी में आइने के सामने निकलकर आ ही जाता है। तुम्हारे जैसे नमकहरामों और आतंकियों के हिमायतियों की रेंगती, रीढ़हीन ज़िंदगियों पर राह चलते थूकना चाहिए लोगों को। जिनके लिए इतिहास ही बाबरी मस्जिद के निर्माण के साथ शुरू होता है, वो क्या जानते नहीं कि सनातन और हिन्दुओं का गौरवशाली इतिहास कई हजार वर्ष पुराना है?

लोगों का कहना है कि असलियत तो ये है कि असदुद्दीन ओवैसी या अन्य कट्टरपंथी मुस्लिम ‘ गजवा-ए-हिन्द’ के ख्वाब से बाहर नहीं निकल पाए हैं और शायद इसीलिए जब वो कई सालों से न्यायालय के फैसले को मानने की बातें कर रहे थे, अब उनका सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोसा नहीं रहा। अब जब सुप्रीम कोर्ट में चीजें स्पष्ट हो गई हैं और वहाँ राम मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो चुका है, संविधान को मानने वाले कुछ लोगों की शरीयत वाली मानसिकता जा ही नहीं रही।

याद दिलाने को तो लोग असदुद्दीन ओवैसी को ये भी याद दिला रहे हैं कि जब उनके मजहब का कोई अस्तित्व ही नहीं था, तब अयोध्या में राम मंदिर हुआ करता था। जिस मंदिर को अवैध तरीके से तोड़ा गया, वहाँ आज संवैधानिक तरीके से मंदिर बन रही है तो दिक्कत क्यों? असदुद्दीन ओवैसी अपने बच्चों को ये नहीं याद दिलाएँगे कि अयोध्या, मथुरा और काशी अखंड भारत की आध्यात्मिक राजधानियों की तरह थे, हजारों वर्षों तक।

क्या वो अपने बच्चों को याद नहीं दिलाएँगे कि सूर्यवंशी राजा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने जहाँ राज किया था, आज भी उनमें आस्था रखने वाले राष्ट्र के लिए वो जगह उनकी भक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है। क्या वो अपने बच्चों को ये नहीं याद दिलाएँगे कि एक स्वाभिमानी राष्ट्र की अपनी संरचनाओं को तोड़ कर गुलामी की याद दिलाने वाले ढाँचे बना दिए थे? और इन सब में कितनों का खून बहा, इसका तो अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।

अपने बच्चों को तथाकथित अन्याय की याद दिलाने का दावा करने वाले लोग अपने पूर्वजों की करतूतों के बारे में अपनी अगली जनरेशन को बताएँगे भी या नहीं? या फिर वही वामपंथी इतिहासकारों के माध्यम से पढ़ाया जाता रहेगा कि अकबर महान था और अयोध्या बाबरी की वजह से ही पूरी दुनिया में विख्यात था? मुग़ल कहाँ से आए थे? बाबर का जन्म कहाँ हुआ था? तैमूर और चंगेज खान के वंशजों के बारे में अपने बच्चों को नहीं बताएँगे?

हिन्दुओं को अपने बच्चों को बताना चाहिए कि किस तरह ‘चोरी, ऊपर से सीनाजोरी’ के कहावत को चरितार्थ करते हुए इस देश में कुछ लोगों ने जहाँ हजारों मंदिरों का ध्वंस करने वालों का गुणगान भी किया और जब हिन्दुओं ने अपने खिलाफ हुए अन्याय को याद करते हुए बार-बार बलिदान देकर एक मामले में न्याय प्राप्त किया, तो उलटा उन्हें ही असहिष्णु कहा गया। अभी तो हजारों मंदिर हैं, जिनके ऊपर विदेशी ढाँचे बना दिए गए हैं। अभी तो न्याय की उम्मीद जगी है, पूरा न्याय तो बाकी है।

‘एक दिन बाबरी का उदय होगा’: DM-SP ऑफिस से लेकर आस्था मंदिर तक, बिहार के कई शहरों में PFI के भड़काऊ पोस्टर

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) ने बिहार के कई शहरों में भड़काऊ पोस्टर लगाए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पोस्टर कटिहार, पूर्णिया और दरभंगा में लगाए गए हैं। पोस्टर पर बाबरी मस्जिद के तीन गुंबद बने हुए हैं और इस पर लिखा है, “एक दिन बाबरी का उदय होगा। हम 6 दिसंबर 1992 को कभी नहीं भूल पाएँगे।”

रिपोर्टों के अनुसार कटिहार जिला में कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार, एसपी और जिलाधिकारी दफ्तर के सामने ये पोस्टर लगाए गए हैं। पूर्णिया में जेल चौक और आस्था मंदिर के नज़दीक भी इसी तरह के पोस्टर लगे हैं। साथ ही दरभंगा के भी कई क्षेत्रों में इस तरह के पोस्टर देखने को मिले हैं। इन सभी पोस्टर में पीएफ़आई के दिल्ली दफ्तर का पता दिया गया है।

कटिहार के एसपी विकास कुमार ने कहा, “हमें सूचना मिली थी कि कई प्रशासनिक जगहों पर विवादित पोस्टर लगाए गए हैं। हमने इसकी जाँच शुरू कर दी है। फ़िलहाल पुलिस इस घटना के बाद अलर्ट पर है।”

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी दरभंगा में PFI ने पोस्टर लगाकर फैसले का विरोध किया। उन पोस्टरों पर भी उकसाने वाली बातें लिखी थी।

सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और विदेशी फंडिंग को लेकर हाल ही में पीएफआई के कई ठिकानों पर देशभर में छापेमारी की गई है। इस दौरान बिहार में भी छापे पड़े थे। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दरभंगा के सिंहवाड़ा थाना क्षेत्र के अंतर्गत शंकरपुर में पीएफ़आई के जनरल सेक्रेटरी मोहम्मद सनाउल्लाह के घर छापा मारा था। यह छापा सीएए और एनआरसी विरोधी प्रदर्शन के दौरान फंडिंग को लेकर मारा गया था। फ़िलहाल ईडी इस संबंध में पीएफ़आई के अन्य सदस्यों से पूछताछ कर रही है। ईडी की कार्रवाई के दौरान सनाउल्लाह अपने आवास पर नहीं था।    

इसके अलावा पूर्णिया के केहाट सहायक थाना क्षेत्र स्थित लाइन बाज़ार राजाबरी चौक के पीएफ़आई कार्यालय में भी गुरुवार को लगभग 8 घंटे तक छापामारी की कार्रवाई चली थी। ईडी की 4 सदस्यों की टीम के छापे की जानकारी मिलते ही वहाँ सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी और हंगामा करने लगे थे। हंगामे के बावजूद ईडी ने कार्रवाई की और कई अहम दस्तावेज़ बरामद किए थे।   

बता दें कि पीएफ़आई और एसडीपीआई अपनी अराजक गतिविधियों, आपराधिक कृत्यों, जबरन धर्मांतरण और देश विरोधी गतिविधियों की वजह से संदेह और जाँच के दायरे में रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ईडी ने 9 राज्यों के कुल 26 ठिकानों पर छापेमारी का अभियान चलाया था।   

B.Com वाला मो. शारिक और B.Tech कर रहा मुनीर अहमद गिरफ्तार: संघियों का सर काटना चाहते थे दोनों

मंगलुरु पुलिस ने ग्राफिटी बनाने के संबंध में दो व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है। इन्होंने पिछले सप्ताह शहर के विभिन्न हिस्सों में लश्कर-ए-तैयबा और तालिबान जैसे इस्लामी आतंकवादी संगठनों के समर्थन में ग्राफिटी बनाया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंगलुरु पुलिस ने मोहम्मद शारिक और मज्ज मुनीर अहमद नाम के दो अपराधियों को गिरफ्तार किया है। दोनों को तीर्थहल्ली से गिरफ्तार किया गया है।

22 वर्षीय मोहम्मद शारिक ने बीकॉम पूरा किया है और तीर्थहल्ली में कपड़े की दुकान चला रहा है। वहीं एक अन्य आरोपित मज्ज मुनीर अहमद वर्तमान में मंगलुरु के एक निजी कॉलेज से बीटेक की पढ़ाई कर रहा है। पुलिस ने बताया कि आरोपित मुनीर अहमद मंगलुरु में ऑनलाइन फूड डिलीवरी एजेंट के रूप में काम करता था।

इससे पहले कर्नाटक के मेंगलुरु में एक अपार्टमेंट की दीवारों पर संघियों और मनुवादियों को धमकी भरी भयावह बातें लिखने के मामले में पुलिस ने गुरुवार (दिसंबर 3, 2020) को एक मोहम्मद नजीर नामक युवक को गिरफ्तार किया था। सोशल मीडिया पर आरोपित को जॉमेटो का डिलीवरी ब्वॉय बताया गया।

मेंगलुरु में 28 नवंबर को पुलिस चौकी की दीवार पर एक ग्राफिटी देखी गई थी। इसमें लिखा था, “गुस्ताख़-ए-रसूल की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा।” 

इसके अलावा इससे पहले एक अपार्टमेंट की दीवार पर लिखा गया था, “हमें इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जाए कि हमें संघियों और मनुवादियों का सामना करने के लिए लश्कर-ए-तैय्यबा और तालिबान की मदद लेनी पड़े।” आगे लश्कर के समर्थन में लिखा था, “‘लश्कर जिंदाबाद।”

मामले के उजागर होने के कुछ समय बाद ऑपइंडिया ने इस संबंध में पुलिस से बात की थी। पुलिस ने हमें तब विस्तार से जानकारी देते हुए कहा था कि पहली ग्राफिटी मेंगलुरु के सर्किट रोड स्थित अपार्टमेंट पर बनाई गई। जिसके बाद कदरी पुलिस थाने ने इस प्रकरण के संबंध में मामला दर्ज कर लिया है और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जाँच शुरू किया गया।

मंगलुरु पुलिस कमिश्नर विकाश कुमार ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि आरोपी ने पब्लिसिटी हासिल करने के लिए इस तरह का अपराध किया। गौरतलब है कि पिछले दिनों मेंगलुरू की दीवारों पर लिखी गई ये बातें बिलकुल ऐसी थीं, जैसे पाकिस्तान के लोग फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के विरोध में उतरे थे।

तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) के हज़ारों समर्थक फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के विरोध में रावलपिंडी की सड़कों पर उतरे थे। उनका विरोध इस मुद्दे पर था कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाने के अधिकार का बचाव किया था। 

आतंकियों से संबंध का जिस पर है आरोप, जो हो चुका है इसी कारण गिरफ्तार… उसके घर गईं महबूबा मुफ्ती

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती खुल कर उन लोगों का समर्थन कर रही हैं, जिन पर आतंकियों के साथ सम्बन्ध के आरोप हैं। अब वो शनिवार (दिसंबर 5, 2020) को अपनी बेटी इल्तिजा मुफ़्ती के साथ वहीद उर रहमान पारा के घर पहुँचीं। वहीद उर रहमान पारा उनकी पार्टी PDP की युवा शाखा के अध्यक्ष हैं। उन्हें हाल ही में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने आतंकियों के साथ सम्बन्ध के आरोपों में गिरफ्तार किया।

जम्मू कश्मीर में हो रहे DDC चुनाव में भी ‘गुपकार गैंग’ ने वहीद को अपना उम्मीदवार बनाया है। महबूबा मुफ़्ती उनके घर पर लगभग आधे घंटे तक रहीं और परिजनों से मुलाकात की। इस दौरान PDP के कई नेता और स्थानीय कार्यकर्ता भी उनके साथ रहे। महबूबा मुफ़्ती ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि वो वहीद की जीत सुनिश्चित करें। हालाँकि, उन्होंने वहाँ मौजूद मीडिया से बात करने से इनकार कर दिया।

महबूबा मुफ़्ती ने इससे पहले शुक्रवार (नवंबर 27, 2020) को पुलवामा जाने का प्रयास किया था, लेकिन सुरक्षा कारणों से उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी गई। वाहिद उर रहमान पारा को NIA पूछताछ के लिए दिल्ली लेकर गई थी, जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप है कि वहीद ने 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान आतंकियों की मदद ली थी। गिरफ्तार निलंबीर DSP देवेंद्र सिंह से भी उनके सम्बन्ध सामने आए थे।

NIA द्वारा गिरफ्तार हिज्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों नवीद बाबू और इरफान शफी मीर से पूछताछ के दौरान पता चला था कि इनके वहीद के साथ सम्बन्ध हैं। जब संसद में अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने वाला विधेयक पेश किया गया था, तब सुरक्षा कारणों से हिरासत में लिए गए नेताओं में वहीद भी शामिल थे। उन्हें फ़रवरी 2020 में रिलीज किया गया था। इसके बाद 2 महीनों तक उन्हें हाउस अरेस्ट में रखा गया था।

हालाँकि, वाहिद को जिस मामले में गिरफ्तार किया गया है, वो 2018 का है। इसीलिए, स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ये उनके हिरासत में रहने की अवधि के दौरान का कोई मामला नहीं है। महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि ये आरोप गलत हैं और PDP सहित जम्मू कश्मीर की मुख्यधारा की अन्य राजनीतिक पार्टियों को धमकाने और उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए ये कार्रवाई की गई है। उन्होंने न्यायपालिका से वहीद की रिहाई की माँग की।

PDP ने आरोप लगाया है कि वहीद का क्षेत्र पुलवामा रहा है और वो वहीं से DDC के चुनाव में उतरे थे। पार्टी ने भाजपा पर राज्य की राजनीतिक प्रक्रिया को क्षति पहुँचाने का आरोप लगाया। पार्टी ने इसके लिए RSS तक को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि नई दिल्ली उनकी ‘आवाज़ दबाने की कोशिश’ कर रहा है। वाहिद लम्बे समय से अनुच्छेद-370 के समर्थक रहे हैं और सरकार के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं।

हाल ही में रोशनी लैंड स्कैम में भी जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और PDP की मुखिया महबूबा मुफ्ती का नाम सामने आया। ये लैंड स्कैम अपने-आप में प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। गरीबों को शासित जमीन मुहैया कराने और प्रदेश में बिजली लाने के लिए जिस कानून को बनाया गया था, जम्मू कश्मीर के नेताओं ने उसका जम कर फायदा उठाया और अकूत धन-संपत्ति अर्जित की। जबकि जनता गरीब ही बनी रही।

‘बाबरी मस्जिद दोबारा बनाएँगे’ से लेकर SC पर शक-आरोप… कट्टरपंथी इस्लामी ट्रेंड करा रहे #BabriYaadRahega

बाबरी मस्जिद विध्वंस को आज 28 साल पूरे हो चुके हैं। 6 दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों की भीड़ ने श्रीराम जन्मभूमि, अयोध्या स्थित विवादित ढाँचा गिरा दिया था। ऐसा विध्वंस जो सुनियोजित नहीं था, उसकी सालगिरह के मौके पर कट्टरपंथी इस्लामी ट्विटर पर #BabriYaadRahegi (बाबरी याद रहेगी) हैशटैग ट्रेंड करा रहे हैं और हिन्दुओं पर नफ़रत भरी टिप्पणियाँ कर रहे हैं।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) ने विवादित ढाँचे की स्मृति में एक पोस्टर साझा किया। इस पोस्टर में लिखा है, “एक दिन बाबरी का उदय ज़रूर होगा” और “हम इसे भूल नहीं सकते हैं।” इस पोस्टर को पीएफ़आई के तमाम समर्थक साझा कर रहे हैं और इसके साथ ही #BabriYaadRahegi हैशटैग का इस्तेमाल भी कर रहे हैं।

इसके अलावा तमाम कट्टरपंथी इस्लामी भी इस तरह के नफ़रत भरे ट्वीट कर रहे हैं। सिराज अहमद नाम के ट्विटर यूज़र ने कारसेवकों को आतंकवादी कहा और आरोप लगाया कि भारतीय न्यायपालिका न्याय दिलाने में असफल रही है। 

वहीं कुछ ने इसे लोकतांत्रिक देश के लिए शर्म का विषय बताया और कहा कि वह अपने बच्चों को बताएँगे कि कैसे बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। इसके अलावा कुछ का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर निर्माण का आदेश अन्यायपूर्ण था। 

एक सोशल मीडिया यूज़र ने आरोप लगाया कि उद्देश्य राम जन्मभूमि पर ढाँचा गिराने का नहीं था बल्कि मस्जिद का विध्वंस करना था। जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय की एक छात्रा आफरीन फातिमा ने कहा, “बाबरी थी, बाबरी है, बाबरी रहेगी।”

जनवरी 2020 में आफरीन ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को गलत ठहराया था और सीएए-एनआरसी के विरोध प्रदर्शन में भाषण देते हुए अफज़ल गुरु को निर्दोष बताया था। आफरीन इन विरोध प्रदर्शन की वजह से फरवरी 2020 के दौरान हुए हिन्दू विरोधी दंगों का मुख्य चेहरा भी थी। 

9 नवंबर को सुनाया गया था ऐतिहासिक फैसला

9 नवंबर 2019 को विवादित ज़मीन हिन्दुओं को देते हुए रामलला विराजमान के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र सरकार भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाए, जिसके बाद फरवरी 2020 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाया गया था। 5 अगस्त 2020 को श्रीराम जन्मभूमि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, तमाम नेताओं और संतों की मौजूदगी में भूमिपूजन कराया गया था। आगामी दो वर्षों में श्रीराम मंदिर का निर्माण पूरा हो जाएगा।