Home Blog Page 426

मोदी सरकार ने तोड़ी आतंकवाद की कमर तो कश्मीरी युवाओं का फितूर भी उतरा, AK-47 वाला ‘टैटू’ मिटाने को क्लीनिकों में उमड़ी भीड़: हाथ, गर्दन, छाती पर गुदवा रखे थे

जम्मू-कश्मीर में अब युवा आतंक से मुँह मोड़ रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक आतंकवादियों को अपना नायक मानने वाले युवा अब इस जाल में नहीं फँस रहे। जो युवा कभी रियाज नाइकू और बुरहान वानी बनने का सपना देखने वाले सेना में जाने को अपनी पहली पसंद मान रहे हैं। इसी कड़ी में जम्मू-कश्मीर के युवा अब अपने टैटू हटवा रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के युवा अब तक अपने हाथ, गर्दन और छाती पर AK-47 और बिच्छू जैसे टैटू बनवा रहे थे। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि अब कश्मीर में युवा यह टैटू हटवाने के लिए भाग रहे हैं।

रिपोर्ट बताती है कि बीते 4 सालों में कई हजार युवा अपने टैटू मिटवा चुके हैं। टैटू विशेषज्ञों का कहना है कि अब लोग कश्मीरी संस्कृति और धर्म के बारे में जागरूक हो रहे हैं। अब जो लोग नए टैटू बनवा रहे हैं, उनकी भी प्राथमिकता में बदलाव आया है।

सबसे ज्यादा मिट रहे AK-47 वाले टैटू

रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ के टैटू स्टूडियो में पूरे दिन युवाओं की भीड़ रहती है। वहाँ से कुछ दूरी पर लेजर पेन से टैटू मिटाने वाले विशेषज्ञ बासित बशीर का क्लीनिक भी है। उनके क्लीनिक पर युवाओं की भीड़ हाल के दिनों में बढ़ गई है। बासित ने बताया कि सबसे अधिक AK-47 वाले टैटू हटवाने के लिए युवा आ रहे हैं। ब्वायफ्रेंड और गर्लफ्रेंड के टैटू भी मिटवाए जा रहे हैं।

सालों से हिंसा और आतंक की परछाई में रहे युवाओं के मन-मस्तिष्क पर भी आतंक की छाप आ गई थी। इसी के चलते उनके टैटू भी AK-47, कंकाल की खोपड़ी, बिच्छू, साँप और शेर जैसे टैटू शरीर के अलग अलग हिस्सों में बनवाने लगे। रिपोर्ट में बशीर ने बताया कि अब तक वह लगभग एक लाख लोगों के शरीर से ऐसे टैटू मिटा चुके हैं।

जोश में बनवा लिया था, अब उससे जुड़ाव नहीं

Wion की रिपोर्ट कहती है कि टैटू हटवाने के लिए आने वाले लोग कैमरे पर या आधिकारिक तौर पर बात नहीं करना चाहते। ऐसा इसलिए है क्योंकि कश्मीर में टैटू को एक टैबू के तौर पर देखा जाता है। इसके अलावा कई लोगों का कहना है कि ट्रेंड के दौरान बनवाए गए टैटू से अब लोगो का उतना जुड़ाव नहीं रहा।

इसके अलावा टैटू हटाने के पीछे मजहबी कारण भी है। इस्लाम मजहब में भी स्थायी टैटू की इजाजत नहीं है। टैटू बनवाकर मस्जिद में जाना हराम है। मस्जिद के इमाम भी टैटू के खिलाफ लगातार तक़रीर देते रहते हैं। इसके चलते भी बड़ी संख्या में युवा अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों में बने टैटू हटवाने के लिए पहुँच रहे हैं।

अब कौन से टैटू ट्रेंड में

टैटू बनवाने के शरीर पर कई नुकसान भी हैं, लेकिन अभी भी लोगों में टैटू बनवाने को लेकर क्रेज बना हुआ है। कहा जा रहा है कि कश्मीर में अब मजहबी की बातें ज्यादा हावी हो रही हैं। बड़े पैमाने पर लोग मजहब के प्रति झुकाव महसूस कर रहे हैं। ऐसे में टैटू बनवाने वालो में अल्लाह, 786 और धर्म से जुड़े अन्य प्रतीक गुदवा रहे हैं।

बस कहने को है ‘कानून की नजर में सब बराबर’, जान लीजिए जस्टिस यशवंत वर्मा की जगह आपके घर में लगी आग में जले मिलते नोटों के बंडल तो क्या होता?

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर होली के दिन आग लगने की घटना के दौरान भारी मात्रा में अघोषित नकदी मिलने के बारे में पता चला था। इसको लेकर हर तरफ सवाल उठने लगे। आखिरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने इस मामले में आंतरिक जाँच के लिए एक समिति गठित की है। इस आलेख में हम ये समझने का प्रयास करेंगे कि अगर यही घटना एक सामान्य आदमी के साथ हुई होता तो क्या होता।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना सिंह कहती हैं, “अगर आम आदमी के घर से इतनी नकदी बरामद होती तो पुलिस, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय या सीबीआई (CBI) जैसी एजेंसियाँ तुरंत कार्रवाई करतीं। आरोपित को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू हो जाती। मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA, 2002), आयकर अधिनियम 1961 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसे कानून की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज होता।”

वो आगे बताती हैं, “अवैध आय घोषित कर भारी जुर्माना लगाया जाता और उसकी संपत्तियों को ज़ब्त करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती। तुरंत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जाता। आरोपित को न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता और ज़मानत मिलना मुश्किल हो जाता। सामान्य आदमी से बरामद नकदी को सरकारी खजाने में जमा कर दिया जाता और आरोपित के बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए जाते।”

क्या होता, अगर जस्टिस वर्मा की जगह आम आदमी होता?

अगर जस्टिस वर्मा की जगह कोई सामान्य आदमी होता तो तब क्या होता? ये एक अहम सवाल है। अगर जस्टिस वर्मा की जगह कोई सामान्य आदमी होता तो दमकल कर्मी आग बुझाने की कार्रवाई के बाद कैश मिलने की जानकारी अपने अधिकारी को देते। इसके साथ ही वे दिल्ली पुलिस को सूचित करते। दमकल कर्मी इस घटना के बारे में अपनी डायरी में इसकी डिटेल में जानकारी देते।

वहीं, दिल्ली पुलिस के अधिकारी मौके पर पहुँचकर जाँच करते और इसकी जानकारी आयकर विभाग को देते। आयकर विभाग जिस व्यक्ति के आवास में नोट मिले या नोट जले, उससे पूछताछ करता। अगर वह व्यक्ति उस नकदी के बारे में एक-एक जानकारी देता कि किस तरह यह नकदी उससे जुड़ा है और उसने इस धन को कैसे कमाया और किस लिए रखा था।

अगर आयकर विभाग उसकी दी गई जानकारी से संतुष्ट हो जाता और उसे लगता है कि यह नकदी गलत तरीके से नहीं कमाई गई है और उसका उद्देश्य गलत नहीं था तो मामला बंद हो जाता। अगर आयकर अधिकारी उसके जवाब से संतुष्ट नहीं होते तो आय से अधिक संपत्ति जमा करने का उस पर मुकदमा दर्ज करते। साथ ही इसकी जानकारी प्रवर्तन निदेशालय (ED) को देते।

प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी मामले की जाँच करते और उन्हें लगता है कि मामला मनी लॉन्ड्रिंग का है तो इसमें FIR दर्ज करके उस व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता। इसके बाद वह ट्रायल के दौरान जेल में बंद रहता और आरोपित व्यक्ति जमानत के लिए अदालत की बार-बार चक्कर लगाता। इस तरह यह मामला आम और खास के लिए अलग हो जाता।

जस्टिस वर्मा के साथ क्या हो रही है कानूनी प्रक्रिया?

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट में बताएगी जस्टिस आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही ‘न्यायिक कदाचार’ के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं। कदाचार गंभीर होगा तो CJI जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देंगे। वे इससे इनकार करेंगे तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित कर जस्टिस वर्मा को हटाने की कार्यवाही की सिफारिश कर सकते हैं।

इसके बाद संसद में जस्टिस पर महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे। अध्यक्ष या सभापति सांसदों और न्यायविदों से सलाह-मशविरा करेंगे। अगर स्पीकर या सभापति नोटिस को स्वीकार कर लेते हैं तो जस्टिस वर्मा के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए 3 सदस्यीय समिति गठित करेंगे।

समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देंगे। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देगी। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाएगा।

रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाएगा। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए। यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाएगा।

दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस तरह जज को हटाने का काम पूरा हो जाएगा। अभी तक के इतिहास में किसी जज पर महाभियोग से नहीं हटाया जा सका है, जबकि दो लोगों पर महाभियोग की कार्रवाई शुरू हुई है। इस तरह जज को सजा देने का काम पूरा हो जाएगा।

जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग सुप्रीम कोर्ट में खारिज

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (28 मार्च) को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सरकारी परिसर में अवैध नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने की माँग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई थी। पीठ ने कहा कि CJI के निर्देश पर मामले की इन-हाउस जाँच जारी है।

पीठ ने कहा, “इन-हाउस जाँच पूरी होने के बाद कई विकल्प खुले हैं। सीजेआई एफ़आईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं या रिपोर्ट की जाँच करने के बाद मामले को संसद को भेज सकते हैं। आज इस याचिका पर विचार करने का समय नहीं है। इन-हाउस रिपोर्ट के बाद सभी विकल्प खुले हैं। याचिका समय से पहले है।”

याचिकाकर्ता नेदुम्पारा ने अपनी याचिका में कहा था कि केरल हाई कोर्ट के तत्कालीन जज के खिलाफ POCSO मामले का आरोप था, लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। उन्होंने कहा कि जाँच करना कोर्ट का काम नहीं है। इसे पुलिस पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन-हाउस कमिटी वैधानिक प्राधिकरण नहीं है। यह विशेष एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जाँच का विकल्प नहीं हो सकती है।

नेदुम्पारा ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में आम आदमी कई सवाल पूछ रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि 14 मार्च को जब नकदी बरामद हुई, उस दिन से आज तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? जब्ती का कोई पंचनामा क्यों नहीं बनाया गया? एक सप्ताह तक इस घोटाले को क्यों छिपाया गया? आपराधिक कानून क्यों नहीं बनाया गया?

दरअसल, इसी सुप्रीम कोर्ट ने आज से 34 साल पहले 1991 में एक फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया था कि जज भी जनता के सेवक हैं। इसलिए अगर वे अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट या कोई भी कोर्ट के जज के खिलाफ भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। हालाँकि,उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्ते रखी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर CJI को लगता है कि आरोपों में दम नहीं है तो मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी कहा था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति ना हो, तब तक संबंधित जज के खिलाफ CrPC की धारा 154 के तहत मुकदमा नहीं दर्ज किया जा सकता। इस धारा के तहत पुलिस बिना वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकती है।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संभ्रांत कृष्ण का कहना है, “जस्टिस वर्मा के सरकारी निवास से भारी मात्रा में कैश पाए जाने की बात बहुत गंभीर विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने जाँच के लिए तत्परता से एक समिति का गठन कर दिया है। अगर जाँच में जस्टिस वर्मा की किसी भी रूप में कोई भूमिका सामने आती है तो फिर उन पर आम नागरिक की तरह कानूनी प्रक्रिया की जा सकती है।”

इस तरह की समस्याओं के पीछे की मूल वजहों की ओर इशारा करते हुए एडवोकेट संभ्रांत कृष्ण आगे कहते हैं, “यह पूरा प्रकरण एक बड़ी समस्या, कॉलेजियम के द्वारा जजों की नियुक्ति, की ओर हम सबका ध्यान पुनः आकर्षित करता है। जब तब इसमें सुधार और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक अयोग्य व्यक्ति भी न्याय की कुर्सी पर विराजते रहेंगे।”

रीना सिंह कहती हैं, “जस्टिस वर्मा जैसे प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ तुरंत गिरफ्तारी नहीं होती है। उन्हें राजनीतिक-सामाजिक संपर्कों का लाभ मिलता है। उनकी जमानत भी जल्दी हो सकती है, जबकि आम आदमी को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती। मीडिया कवरेज में भी आम आदमी के मामले को कठोरता से दिखाया जाता, जबकि प्रभावशाली व्यक्तियों को बचाने के प्रयास होते।”

हालाँकि, रीना सिंह और संभ्रांत कृष्ण जैसे अन्य अधिवक्ता भी ये मानते हैं कि कानून के सामने सब बराबर हैं, लेकिन कॉलेजियम एक बड़ी समस्या है। न्यायिक प्रक्रिया में समानता लाने के लिए सभी के खिलाफ निष्पक्ष जाँच, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित सुनवाई के साथ-साथ कठोर दंड का प्रावधान होना आवश्यक है, ताकि कोई भी कानून से ऊपर न हो।

जस्टिस वर्मा के घर नकदी मिलने में की एक-एक जानकारी

होली के दिन 14 मार्च 2025 मार्च की रात करीब 11.30 बजे जस्टिस वर्मा के घर में आग ली। जिस समय यह घटना हुई, उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश में थे। दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास में उनकी वृद्ध माँ और बेटी थी। आग की सूचना घर वालों ने जस्टिस वर्मा को दी। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने निजी सचिव ने दिल्ली फायर ब्रिगेड को इसकी सूचना दी।

सूचना मिलते ही दमकल की दो गाड़ियाँ मौके पर भेजी गईं और 15 मिनट में आग पर काबू पा लिया गया। उस दौरान स्टोर रूम में बोरों में भरकर रखे भारी मात्रा में नोट जल चुके थे। नोटों के बारे में दमकल कर्मियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताया। आग बुझने के बाद जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने मौके पर पहुँचे पाँच पुलिसकर्मियों को वहाँ से चले जाने के लिए कहा।

जब इस मामले के जाँच अधिकारी अगली सुबह जस्टिस वर्मा के आवास पर आए तो उन्हें वापस भेज दिया गया और बाद में आने के लिए कहा गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने घटना की रात को पंचनामा नहीं बनाया था। इसको लेकर वहाँ तैनात अधिकारियों से सवाल तलब किए जाएँगे। दरअसल, पंचनामा बनाने के लिए पाँच स्वतंत्र व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो घटनास्थल के गवाह हों और मुकदमे के दौरान वे कोर्ट में अपना बयान दे सकें।

तुगलक रोड थाने में एक दैनिक डायरी दर्ज की गई, लेकिन उसमें वित्तीय बरामदगी का जिक्र नहीं किया गया। घटना के 8 घंटे बाद इसकी जानकारी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा को मिली। दरअसल, नई दिल्ली जिला के एडिशनल डीसीपी ने 15 मार्च 2025 को सुबह 8 बजे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुबह की डायरी सौंपी थी। उस डायरी में पिछले 24 घंटों में इलाके में हुई घटनाओं का सारांश था।

इस डायरी में जस्टिस वर्मा के आवास में लगी आग का भी जिक्र था। इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को घटना की जानकारी दी गई और नोटों में लगी आग का वीडियो भी उन्हें दिखाया गया। इसके बाद पुलिस कमिश्नर इसकी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी। अंत में उन्होंने 15 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय को घटना की जानकारी दी।

इस घटना के 7 दिन बाद 21 मार्च को यह मामला मीडिया में आया। इसको लेकर हंगामा मच गया। दिल्ली के फायर चीफ अतुल गर्ग के हवाले से PTI में खबर चली कि दमकल कर्मियों ने जस्टिस वर्मा के घर में कहीं नकदी नहीं देखी। जब विवाद हुआ तो अतुल गर्ग ने कहा कि उन्होंने PTI को इस तरह का कभी बयान नहीं दिया कि जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर कोई नकदी नहीं मिली थी।

विवाद बढ़ गया तो CJI खन्ना ने 5 जजों वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बुलाई गई। आनन-फानन में कॉलेजियम ने घटना को चिंतानक बताते हुए जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया। इसको लेकर भी सवाल उठे। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके स्थानांतरण का विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ‘कूड़ेदान’ नहीं है।

जब विरोध बढ़ा तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा के स्थानांतरण का मामला इससे अलग है। इसके साथ ही CJI ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय से इस मामले की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट माँगी। CJI को सौंपी रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय कहा कि घटना के अगले दिन 15 मार्च की शाम करीब 4:50 बजे दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने आग के बारे में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को सूचित किया।

रिपोर्ट तैयार करने के लिए मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के साथ घटनास्थल का दौरा किया और वहाँ जस्टिस वर्मा से भी मुलाकात की। जस्टिस वर्मा ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि उस कमरे में नौकर, माली और कभी-कभी सीपीडब्ल्यूडी कर्मी रहते थे। जब मुख्य न्यायाधीश ने जले नोटों की तस्वीरें दिखाईं तो न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने खिलाफ किसी साजिश की आशंका व्यक्त की।

तमाम घटनाओं को लेकर चीफ जस्टिस उपाध्याय ने 25 पन्नों की अपनी रिपोर्ट CJI को भेज दी। इस रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि मामले की गहन जाँच की जरूरत है। इसके बाद CJI ने जस्टिस डीके उपाध्याय को आदेश दिया कि वे जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक कार्य ना सौंपे। साथ ही जस्टिस वर्मा से ये कहने के लिए भी कहा कि वे मोबाइल के कॉल रिकॉर्ड एवं अन्य डेटा डिलीट ना करें।

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।


सलमान खान ने पहनी राम जन्मभूमि स्पेशल एडिशन घड़ी, भड़क उठे इस्लामी कट्टरपंथी: बताया- मुर्तद, कहा- मुस्लिमों गैरत हो तो इस ज#@ का सिनेमा कभी नहीं देखना

सलमान खान की नई फिल्म ‘सिकंदर’ इस ईद पर आने वाली है, लेकिन उससे पहले उनकी घड़ी ने सोशल मीडिया पर बखेड़ा खड़ा कर दिया है। दरअसल, सलमान ने ट्विटर पर तस्वीरें डालीं और लिखा, “ईद पर थिएटर में मिलते हैं!” तस्वीरों में वो ऑरेंज रंग की घड़ी पहने कार के पास खड़े दिखे।

सलमान खान ने जो घड़ी पहनी है, वो जैकब एंड कंपनी की लिमिटेड एडिशन की घड़ी है। घड़ी में अयोध्‍या का रामलला मंदिर और हनुमान गढ़ी के बजरंग बली भी बैठे दिख रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सलमान को यह घड़ी उनकी अम्मी सुशीला चरक यानी सलमा खान ने गिफ्ट की है। दुनियाभर में इसकी सिर्फ 49 घड़ियाँ हैं और सलमान के पास इनमें से एक है। इसी एडिशन की एक घड़ी कुछ समय पहले अभिषेक बच्चन भी पहने दिखे थे।

सलमान के पोस्ट से भड़के इस्लामी कट्टरपंथी

दरअसल, सलमान खान ने जिस कंपनी की घड़ी पहनी है, उस कंपनी के मालिक का नाम जैकब अराबो है। जैकब अराबो बुखारियन यहूदी हैं, जिसे इजरायल का समर्थन करने पर इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर निशाना बनाते रहते हैं।

ऐसे में सलमान खान की तस्वीरें आते ही इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए। मिर्जा बेग नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने लिखा, “अगर मुसलमानों गैरत है और मुसलमान हो तो इस ज$#@ की कभी मूवी नहीं देखना।” इसमें आगे लिखा है – यहूदी की कंपनी की घड़ी, वो भी राम जन्मभूमि एडिशन पहनना मुस्लिमों का मजाक उड़ाना है।

मिर्जा बेग के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

मस्टर स्तोरियानी’ (@Storyani_Yam) ने सलमान को ‘मुर्तद’ करार देते हुए ट्वीट किया, “मुस्लिम्स को सलमान खान का बहिष्कार करना चाहिए। 1992 में बाबरी के लिए मुसलमानों ने जान दी, और ये राम जन्मभूमि की घड़ी पहनकर शहीदों का मजाक उड़ा रहा है।”

इस बीच, किसी ने ‘सिकंदर’ फिल्म का बहिष्कार करने की बात की, ये इल्जाम लगाते हुए कि सलमान बाबरी मस्जिद ढहाने का मजाक उड़ा रहे हैं। मजेदार बात ये है कि बहिष्कार की बात करने वाला शख्स फिलिस्तीन का समर्थन करता है, पर राम जन्मभूमि आंदोलन को गलत ठहरा रहा है।

डॉ उज्मा के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

बता दें कि ‘सिकंदर’ एक एक्शन थ्रिलर फिल्म है, जो ईद 2025 पर रिलीज होगी। इसे ए. आर. मुरुगादॉस ने डायरेक्ट किया है और साजिद नाडियाडवाला ने प्रोड्यूस किया है। फिल्म में ढेर सारा एक्शन और ड्रामा होगा। सलमान का मुरुगादॉस के साथ ये पहला प्रोजेक्ट है और फैंस को इसकी बड़ी उम्मीदें हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा पर नहीं होगी FIR, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका: कहा- इंटरनल कमेटी कर रही जाँच, अभी यह सब करने का टाइम नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के FIR नहीं दर्ज की जाएगी। उनके घर आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नगदी मिली थी। सुप्रीम कोर्ट ने यशवंत वर्मा ने खिलाफ FIR की माँग करने वाली याचिका को सुनने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभी FIR दर्ज करने का समय नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका की सुनवाई शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को जस्टिस उज्जल भुइयाँ और जस्टिस अभय एस ओका ने की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के घर कैश मिलने के मामले में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना द्वारा बनाई गई कमिटी जाँच कर रही है।

कोर्ट ने बताया कि अगर यह कमिटी कुछ गलत पाएगी तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने कहा, “इन हाउस जाँच जारी है। अगर रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ सामने आती है तो FIR दर्ज की जा सकती है या फिर मामला संसद को भी भेजा जा सकता है। आज इस पर विचार करने का समय नहीं है।”

कोर्ट ने कहा है कि वह इस में अभी हस्तक्षेप नहीं करेंगे और चीफ जस्टिस के पास सारे विकल्प खुले हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस सुनवाई के दौरान कोर्ट से आग्रह किया कि वह भले कोई आदेश ना दें लेकिन याचिका स्वीकार कर लें। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी बात नहीं मानी है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करते हुए याचिका पर सुनवाई करने से ही इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका वकील मैथ्यू जे नेदुमपारा और बाकी लोगों ने लगाई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि FIR ना दर्ज होने से आम जनता के मन में प्रश्न उठ रहे हैं।

गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर होली वाले दिन (14 मार्च, 2025) को आग लग गई थी। इसके बाद अग्निशमनकर्मियों को बुलाया गया था। उन्हें आग बुझाने के दौरान घर के एक कमरे से बड़ी मात्रा में नकद मिला था।

इसका वीडियो भी सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनके विषय में एक रिपोर्ट भी जारी की थी। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने उनका ट्रांसफर इस घटना के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक जाँच कमिटी बना दी है, इसमें तीन जस्टिस शामिल हैं। इसकी रिपोर्ट आने तक तक यशवंत वर्मा को न्यायिक काम से हटा दिया गया है।

दावा 20000 कमरों का, मिले 7000 ही: दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने बताया- किचन-टॉयलेट को भी क्लासरूम में गिनती थी केजरीवाल सरकार, ₹49 लाख की ‘देशभक्ति’ के प्रचार पर खर्च किए ₹11 करोड़

दिल्ली आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के आँकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश किए गए थे। जितने क्लासरूम बनाने का दावा केजरीवाल सरकार करती थी, उसका एक तिहाई ही असल में निर्माण हुआ था। वहीं एक ₹4 करोड़ की योजना के प्रचार के लिए ₹20 करोड़ का खर्च किया गया था। यह सारे खुलासे के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने किए हैं।

दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने दिल्ली विधानसभा में बजट सत्र की चर्चा के दौरान पूर्ववर्ती सरकार के विषय में कई आँकड़े रखे हैं। उन्होंने शुक्रवार (28 मार्च, 2025) को बताया कि केजरीवाल सरकार के दौरान शिक्षा मॉडल का प्रचार करते हुए दावा किया जाता था कि 20 हजार कमरे बनाए गए।

मंत्री सूद ने बताया कि यह झूठ था और जब इस विषय में जाँच करवाई गई तो कमरों की संख्या की 7 हजार ही निकली है। सूद ने बताया कि केजरीवाल सरकार जिन्हें क्लासरूम बताती थी, वह असल में स्टोररूम, किचन और बाकी कामों के लिए बनाए जाने वाले कमरे थे।

केजरीवाल सरकार ने शौचालयों तक को बच्चों की पढ़ाई का कमरा बता दिया था। मंत्री सूद ने बताया है कि भाजपा सरकार अब लोक निर्माण विभाग (PWD) को इस विषय में आदेश देगी कि वह मात्र क्लास रूम को ही गिने ना कि बाकी तरह के निर्माण को।

शिक्षा मंत्री सूद ने यह भी बताया है कि केजरीवाल सरकार के दौरान स्कूलों में हैप्पीनेस करिकुलम नाम का पाठ्क्रम जोड़ा गया था। इस पर ₹4 करोड़ खर्च किए गए थे। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसके प्रचार पर ₹20 करोड़ का खर्च कर डाला।

उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल की सरकार के दौरान देशभक्ति करिकुलम पर ₹49 लाख खर्च किए गए और इसके प्रचार पर ₹11 करोड़ से अधिक खर्च कर दिए गए। आशीष सूद ने आम आदमी पार्टी से कहा कि उनके कर्म वापस उनके पास आएँगे।

दिल्ली के स्कूलों में कमरों को निर्माण को लेकर यह पहला खुलासा नहीं है। इससे पहले केजरीवाल सरकार पर स्कूल कमरों के निर्माण में हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप लगा था। मनीष सिसोदिया और सत्येन्द्र जैन पर आरोप है कि उन्होंने ₹1300 करोड़ का घोटाला स्कूल के कमरों के निर्माण में किया।

आरोप है कि उन्होंने उन एजेंसियों को भी पैसे दे दिए जिन्होंने कमरे बनाए ही नहीं। इसको लेकर दर्ज की गई शिकायत के बाद उन पर मुकदमा चलाने की मंजूरी भी राष्ट्रपति मुर्मू ने हाल ही में दे दी थी। अब इस मामले में आगे कार्रवाई होनी है।

शिक्षा मॉडल पर चिल्लाने वाली केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में स्कूल पर कुछ ख़ास काम नहीं किया था। एक रिपोर्ट बताती है कि आम आदमी पार्टी के शासन के दौरान दिल्ली के भीतर मात्र 75 नए स्कूल बनाए गए थे। पुराने स्कूलों को नया नाम देकर या उनमें मरम्मत का काम करवा कर केजरीवाल लाइमलाईट लूटना चाहते थे।

ST की कुलदेवी को हटाकर बनाया ‘माता मरियम का मंदिर’, अकेले तापी में बन गए 1500 चर्च: दक्षिण गुजरात में ईसाई धर्मांतरण से हिंदू कार्यकर्ताओं ने किया आगाह

गुजरात के जनजाति बहुल क्षेत्रों में तेजी से ईसाई मिशनरियाँ घुसपैठ कर रही हैं। भोले-भाले आदिवासियों का धर्मांतरण करके इस इलाके की जनसांख्यिकी बदलने का काम तेजी से चल रहा है। इन सबके बावजूद सरकार से लेकर मीडिया तक इस मुद्दे पर सुप्त अवस्था में है। हिन्दू कार्यकर्ता लगातार इस समस्या से लड़ रहे हैं, लेकिन वह भी अब हार रहे हैं।

कथावाचक मोरारी बापू के एक ऐलान के बाद ईसाई धर्मांतरण की यह समस्या एक बार फिर चर्चा में आई है। मोरारी बापू ने यहाँ ईसाई धर्मांतरण रोकने के लिए हर नए खुलने वाले स्कूल को ₹1 लाख दान देने का वादा किया है। उन्होंने इस मामले में राज्य सरकार से ध्यान देने की बात कही है।

जमीनी स्थितियाँ, आँकड़े और स्थानीय लोगों के अनुभव बताते हैं कि अगर सरकार ने जल्द इस विषय में कोई एक्शन नहीं लिया तो तो बहुत जल्द इस इलाके में बड़े बदलाव आएँगे। इसकी शुरुआत हो चुकी है और एक्शन के लिए काफी कम समय बचा है।

ऑपइंडिया ने इस मामले में ईसाई धर्मांतरण से प्रभावित वापी जिले के कार्यकर्ताओं से बात की है। यह कार्यकर्ता देव बिरसा सेना के हैं। उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में इस पूरे गठजोड़ पर प्रकाश डाला। देव बिरसा सेना के नेता अरविंद वसावा का कहना है कि महज कुछ वर्षों में तापी में करीब 1,500 छोटे-बड़े चर्च स्थापित हो गए हैं और उनमें से अधिकांश अवैध हैं।

इसके अलावा, यहाँ ईसाइयों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार कोई भी धर्म परिवर्तन नहीं कर रहा है। इस मुद्दे पर हिंदू संगठनों द्वारा भी बड़ी लड़ाई लड़ी जा रही है। उनकी माँग है कि इस गतिविधि पर तभी नियंत्रण होगा जब धर्म परिवर्तन करने वालों को जनजाति सूची से बाहर कर दिया जाएगा।

प्रलोभन और अंधविश्वास से बना रहे ईसाई

देव बिरसा सेना के कार्यकर्ता अरविंद वसावा का कहना है कि पूरा तापी-सोनघर इलाका जनजातीय इलाका है। उन्होंने आरोप लगाया कि यहाँ अवैध रूप से 1500 चर्च स्थापित किए गए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया है कि विभिन्न राज्यों से आने वाले ईसाई पादरी क्षेत्र में सार्वजनिक बैठकों और प्रार्थना सभाओं से लेकर कई कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

वसावा का सवाल है कि जब यह पूरा इलाका कानूनी तौर पर जनजातीय इलाका है और यहाँ सरकारी रिकॉर्ड में कोई भी ईसाई नहीं बना है तो फिर यहाँ इन कार्यक्रमों को क्यों अनुमति दी जा रही है। वसावा ने आरोप लगाया कि ईसाई मिशनरियाँ विभिन्न प्रलोभन देकर और अंधविश्वास फैलाकर आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रहे हैं।

उन्होंने बताया है कि कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से ईसाई नहीं बन पाया है। उनका कहना है कि संविधान में जनजातियों संस्कृति को संरक्षण दिए जाने के बावजूद इन क्षेत्रों में इतनी बड़ी संख्या में चर्च बनाए गए हैं और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

सरकारी रिकॉर्ड में नहीं किया जाता बदलाव

वसावा ने आगे बताया, “धर्म परिवर्तन के लगातार सबूत माँगे जाते हैं। लेकिन धर्म परिवर्तन करने वाले लोग कभी भी सार्वजनिक रूप से अपने ईसाई होने का प्रमाण नहीं देते। वे निजी चर्चाओं तक ही धर्म परिवर्तन की बातें सीमित रखते हैं। पूरे दक्षिण गुजरात में जनजातीय समुदाय है, वहाँ ईसाई नहीं हैं, फिर तापी जैसे जिलों के गाँवों में चर्च क्यों बनाए गए?”

वसावा ने कहा, “हम वनवासी हैं, तो हमारे इलाके में ईसाई जनसभा और बड़े कार्यक्रमों की क्या ज़रूरत है? अलग-अलग राज्यों से ईसाई पादरी, प्रचारक और बड़े लोग सिर्फ़ यहीं सभा करने क्यों आते हैं? यहाँ कोई जब कागजी तौर पर ईसाई नहीं हैं तो उनके यहाँ आने की क्या आवश्यकता है। अगर इस इलाके में कोई ईसाई है, तो सरकारी रिकॉर्ड दिखाइए।”

वसावा ने आरोप लगाया कि मिशनरियों द्वारा ईसाइयत में धर्मांतरित लोगों को सरकारी अभिलेखों में केवल जनजातीय हिंदू के रूप में लिखवाया जाता है। वे अन्य सभी जनजातीय संस्कृतियों, परंपराओं और त्योहारों का भी बहिष्कार कर रहे हैं।

वसावा ने बताया कि यह धर्मांतरित लोग अपनी ही संस्कृति के त्योहारों के लिए दान इकट्ठा करते समय भी पैसा नहीं देते। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा,”इस तरह तो अगली दूसरी या तीसरी पीढ़ी में हम और हमारी संस्कृति दोनों ही खत्म हो जाएगे, हमारा अस्तित्व ही मिट जाएगा।”

भाजपा विधायक पर भी आरोप

आदिवासियों को धर्मांतरण से बचाने वाले संगठन ने स्थानीय भाजपा विधायक मोहन कोंकणी पर भी कई आरोप जड़े हैं। उन्होंने दावा किया कि कोंकणी एक ऐसे कार्यक्रम में मौजूद थे जहाँ ईसाई धर्मांतरण की बात हो रही थी। उनका एक वीडियो भी वायरल हुआ है।

वीडियो में कोंकणी को ईसाई संप्रदाय के एक सार्वजनिक समारोह में मुख्य अतिथि और वक्ता के रूप में भाषण देते हुए देखा गया। इस वीडियो में वहाँ मौजूद लोगों से कह रहे थे कि वे ईसाई कार्यक्रम में अन्य लोगों को भी लेकर आएँ। देव बिरसा सेना ने कहा है कि विधायक ने जनसभा में खुलेआम मिशनरियों को प्रोत्साहित किया और उनसे अन्य लोगों को भी वहाँ लाने को कहा।

इस घटना के बारे में वसावा ने कहा, “कोंकणी विधायक खुद लोगों का धर्म परिवर्तन नहीं करते, बल्कि वे उन्हें प्रोत्साहित करते हैं और माहौल बनाते हैं। उनके गाँव के बगल में हरिपुरा नाम का एक गाँव है, यहाँ पहाड़ी पर चर्च बनाया गया है और सड़कें और लाइटें भी लगाई गई हैं। यह सब किसके लिए हो रहा है?”

वसावा ने आगे कहा, “विधायक मोहन कोंकणी का वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वे ईसाइयों वाली भाषा बोल रहे हैं। वे एक कट्टर ईसाई हैं और उन्हें देखकर कई जनजातीय लोग भी उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। कोंकणी के वीडियो में जीसस प्रभु और मदर मैरी जैसे शब्दों का भी उल्लेख किया गया है।”

ईसाइयों ने हटाई कुलदेवी, पहाड़ी पर किया कब्जा

अरविंद वसावा ने सोनगढ़ तालुका के नियाना बंदरपाड़ा गाँव में एक पहाड़ी पर स्थित एक हिंदू मंदिर के विषय में भी बताया है। उन्होंने कहा कि गिद्धमाड़ी आया डूंगर जनजाति की कुलदेवी माता का निवास स्थान है और हिंदू वहाँ पूजा-अर्चना करते हैं।

उन्होंने आगे बताया कि समय के साथ क्षेत्र में तेजी से बढ़ती ईसाई आबादी के कारण इस पहाड़ी पर आवागमन धीरे-धीरे कम हो गया और फिर ईसाई मिशनरियों ने वहाँ अपना स्थान स्थापित कर लिया जिसे ‘माता मरियम का मंदिर’ कहा जाता है।

अरविंद वसावा ने बताया है कि आज आदिवासियों को उस पहाड़ी में जाने तक नहीं दिया जाता है। जनजातीय लोग अपनी कुलदेवी की पूजा या आराधना भी नहीं कर सकते। वसावा ने बताया है कि ईसाइयों ने वहाँ पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया है। उनका दावा है कि जब त्योहारों में जनजातीय लोग पूजा करने के लिए मंदिर जाने की कोशिश करते हैं तो उन्हें भी भगा दिया जाता है।

कार्यकर्ताओं की सरकार से क्या अपेक्षा?

देव बिरसा सेना के अरविंद वसावा ने ऑपइंडिया के माध्यम से सरकार से दक्षिण गुजरात में धर्मांतरण रोकने और अवैध निर्माण को हटाने की माँग की है। उन्होंने सरकार से उनकी संस्कृति को बचाने के लिए सहायता चाहते हैं।

उन्होंने कहा, “हमारी जनजातीय संस्कृति, परंपरा, भाषा और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कृपया हमारा सहयोग करें और किसी भी कीमत पर ऐसी अवैध गतिविधियों को रोकें। आज कई गाँव ऐसे हैं जहां सिर्फ 10 जनजातीय लोग बचे हैं। बाकी सभी ने अपने पूर्वजों की परंपराओं और कुलदेवी-देवताओं को त्याग दिया है।”

उन्होंने कहा, “यहाँ के लोगों ने जनजातीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए विदेशी ताकतों से भी हाथ मिला लिया है। सरकार से हमारी बस यही माँग है कि हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज और हमारे पूर्वजों की विरासत बची रहे और हमारा अस्तित्व बचा रहे। हम सरकार से साफ अपील करते हैं कि वह हमारे पक्ष में आए, हमारी मदद करे…हमें और कुछ नहीं चाहिए।”

वायरल वीडियो में विधायक कोंकणी ने क्या कहा?

भाजपा विधायक मोहन कोंकणी ईसाई समुदाय द्वारा आयोजित एक सभा में वनवासी समुदाय को संबोधित करने गए थे। वनवासी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वायरल वीडियो में मोहन कोंकणी द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा किसी ईसाई पादरी जैसी लगती है।

अपने संबोधन की शुरुआत में उन्होंने कहा, “प्रभु यीशु मसीह के नाम पर, मैं सभी को अपना प्रेमपूर्ण अभिवादन करता हूँ और मुझे बोलने का अवसर देने के लिए परमेश्वर पिता को धन्यवाद देता हूँ।” उन्होंने अपने संबोधन में ‘यूहन्ना’ शब्द का उपयोग किया।

उन्होंने कहा, “यूहन्ना (जो यीशु मसीह के जन्म से पहले आए थे, या यीशु के कार्य के लिए भेजा गया था) ने पहले अध्याय में लिखा है, “जितने लोगों ने उसे ग्रहण किया और उसका अनुसरण किया, उन्हें उसने परमेश्वर (यीशु मसीह) की संतान बनने का अधिकार दिया।”

वायरल वीडियो में कोंकणी ने वह न्यू टेस्टामेंट (ईसाई बाइबिल) को लेकर कहते हैं कि इसमें लिखा है, “तुम सब के सब मेरी शरण में आओ… ईश्वर यहाँ चमत्कारी कार्य करने आए हैं और उन्होंने आप लोगों को स्वीकार कर लिया है।” कोंकणी ने इस कार्यक्रम में और लोगों को लेकर आने को कहा।

विधायक कोंकणी ने क्या कहा?

ऑपइंडिया ने इस मामले को लेकर विधायक मोहन कोंकणी से भी बात की। उन्होंने कहा कि वह धर्मांतरण को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं और अगर ऐसा कर रहे हैं तो इस पर सबूत पेश कर कार्रवाई की जानी चाहिए। उनसे जब वायरल वीडियो के विषय में पूछा गया तो भी उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

उन्होंने कहा कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में जाना चाहिए और वहाँ अच्छा बोलना चाहिए। उनसे यह भी पूछा गया कि यदि तापी क्षेत्र में कानूनी रूप से कोई ईसाई नहीं है, तो फिर देश के सबसे बड़े पादरी और ईसाई प्रचारक वहाँ बैठकें करने क्यों आते हैं?

कोंकणी ने कहा कि देश में हर कोई स्वतंत्र है, इसलिए वे कहीं भी बैठक कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर पुलिस ने इसकी अनुमति दी होती तो इस बारे में पुलिस से पूछना ज्यादा उचित होता। उन्होंने यह भी दावा किया है कि इस विवाद के संबंध में उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया है।

उनसे स्थानीय लोगों के इस आरोप के बारे में भी पूछा गया कि वह ईसाई धर्मांतरण को बढ़ावा दे रहे हैं। जवाब में उन्होंने कहा कि भले ही यह अंदरूनी तौर पर हो रहा हो, लेकिन सबूत मुहैया कराए जाने चाहिए और कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके अलावा, जब हमने देव बिरसा सेना का जिक्र किया गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी सेना के बारे में जानकारी नहीं है।

पूरी चर्चा के दौरान विधायक ने केवल साक्ष्यों की बात की तथा अपनी संलिप्तता से स्पष्ट इनकार करने के बजाय, साक्ष्य जुटाने तथा कार्रवाई करने की बात कही।

दक्षिण गुजरात में भयावह स्थिति

दक्षिण गुजरात और विशेषकर तापी-डांग में गुप्त ईसाई धर्मांतरण कार्यक्रम और अभियान लंबे समय से चल रहे हैं। लेकिन मोरारी बापू के मंच से दिए गए बयान के बाद इस पर अब चर्चा चालो हो गई है। मोरारी बापू ने कहा कि इस क्षेत्र के अधिकांश शिक्षक ईसाई हैं और वे जनजातीय बच्चों को ईसाई बना रहे हैं।

इस बयान के बाद विधायक मोहन कोंकणी ने बापू के बयान का खंडन किया और कुछ दिनों बाद वे ईसाई समुदाय के एक विशाल कार्यक्रम में पहुंचे। इसके बाद से उनका वीडियो वायरल हो रहा है और धर्मांतरण के मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है।

लेकिन, हकीकत यह है कि इन घटनाओं से पहले भी तापी-डांग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ईसाई धर्मांतरण हो रहा था। दिसंबर 2022 में तापी के सोनगढ़ में नाना बंदरपाड़ा के जराली गाँव में एक हिंदू मंदिर को हटाया गया था, इससे विवाद पैदा हो गया था।

पुलिस के दखल के बाद हिंदुओं को पूजा का अधिकार दे दिया गया, लेकिन वे अभी भी वहाँ नहीं जा पा रहे हैं। स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि उन्हें ईसाइयों द्वारा धमकाया जा रहा है और पूजा करने से रोका जा रहा है। वर्ष 2022 में तापी से एक परिवार के 5 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था।

उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने हिंदू आदिवासियों को धोखा देकर उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया था। इसके अलावा, जुलाई 2023 में तापी के सोनगढ़ स्थित सरकारी स्कूल में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बाइबल पाठ का आयोजन किया गया था। इसको लेकर भी प्रदर्शन हुए थे।

न केवल तापी या डांग में, बल्कि दक्षिण गुजरात के नवसारी में भी हाल ही में दो ईसाई शिक्षकों को गिरफ्तार किया गया था। वे सार्वजनिक रूप से हिंदू धर्म का अपमान कर रहे थे और ईसाई धर्म का प्रसार करने के लिए लोगों को गुमराह कर रहे थे। उसका वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने भी कार्रवाई की।

नवसारी में एक सामाजिक संगठन से जुड़े कार्यकर्ता रवि नायक ने ऑपइंडिया को बताया कि नवसारी के ग्रामीण इलाकों में भी बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन अभियान चल रहा है। ये तो कुछ मामले हैं जो प्रकाश में आए हैं। अनगिनत मामले तो ऐसे हैं जिन्हें कोई कवरेज नहीं मिला।

बंगाल के मालदा में हिंसा, दावा- हिंदुओं के घरों-दुकानों को ‘मुस्लिम भीड़’ ने चुन-चुनकर बनाया निशाना: गवर्नर को लिखा पत्र- सनातनियों की रक्षा के लिए केंद्रीय बल करें तैनात

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के मोथाबाड़ी क्षेत्र में गुरुवार (27 मार्च 2025) को सांप्रदायिक हिंसा की खबरें सामने आई हैं। इसको लेकर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। वायरल हो रहे वीडियो में हिंसक भीड़ को सड़कों पर मार्च करते हुए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हुए देखा जा सकता है। आरोप है कि मुस्लिम भीड़ हिंदू व्यापारियों की दुकानों को चुन-चुनकर निशाना बना रही है।

हिंसा की जानकारी देते हुए बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस को पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने राज्य सरकार को निर्देश देने की माँग की है कि मोथाबारी क्षेत्र में हिंदुओ की सुरक्षा के लिए CAPF (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) की तैनाती की जाए। सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया है कि इलाके में हिंदुओं को खतरा बढ़ता जा रहा है और उनकी सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

BJP विधायक सुवेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर कुछ वीडियो भी साझा किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मोथाबाड़ी में बिना उकसावे के हिंदू व्यापारियों की दुकानों को निशाना बनाया जा रहा है। भाजपा नेता ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से इन हमलों को रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई करने की अपील की है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया कि दोपहर 1 बजे से इन हमलों की शुरुआत हुई।

केंद्रीय शिक्षा और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास राज्यमंत्री डॉक्टर सुकांत मजूमदार ने भी इन घटनाओं के वीडियो साझा करते हुए लिखा, “दक्षिण मालदा के मोथाबाड़ी से भयावह दृश्य- हिंदू घरों और दुकानों को हिंसक भीड़ द्वारा तोड़ा गया। ममता बनर्जी और उनकी मूकदर्शक बंगाल पुलिस क्या कर रहे हैं? चुप्पी। यह उनकी बेशर्म तुष्टीकरण राजनीति की कीमत है- कानूनहीनता, भय और हिंदुओं के साथ अन्याय!”

सुकांत मजूमदार द्वारा शेयर किए गए वीडियो में से एक में दिख रहा है कि हिंसक भीड़ बिना किसी उकसावे के दुकानों में तोड़फोड़ कर रही है। भीड़ के हाथों में इस्लामी झंडे भी हैं। वहीं, दूसरे वीडियो में संपत्तियों और घरों में तोड़फोड़ की घटना दिख रही है। BJP IT सेल हेड अमित मालवीय ने भी अपने सोशल मीडिया साइट पर एक वीडियो साझा किया है।

उन्होंने कहा कि मोथाबाड़ी में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही है, जहाँ मुस्लिम समुदाय की भीड़ बिना किसी उकसावे के हिंदू घरों, दुकानों और वाहनों पर हमला कर रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी पर लंदन में होने और राज्य में हो रही इस अराजकता से बेखबर रहने का आरोप लगाया है। दरअसल, इन वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं की गई है और ना ही बंगाल सरकार या पुलिस अधिकारियों द्वारा घटना पर कोई बयान दिया गया है।

भारत कोई धर्मशाला नहीं… जानिए मोदी सरकार के इमिग्रेशन बिल से कैसे घुसपैठ पर लगेगी लगाम? 4 पुराने कानून खत्म, विदेशियों को 6 श्रेणी में बाँटा

लोकसभा में गुरुवार (27 मार्च 2025) को इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट (Immigration and Foreigners Act) 2025 पास हो गया है। यह नया कानून भारत में विदेशियों के आने, रुकने और जाने को कंट्रोल करने के लिए बनाया गया है। इस बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ-साफ कहा कि भारत उन लोगों का स्वागत करता है जो पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा या व्यापार के लिए यहाँ आते हैं, लेकिन उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है। यानी जो लोग गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसने की कोशिश करेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

यह नया कानून पुराने इमिग्रेशन से जुड़े कई कानूनों को खत्म करता है, जैसे कि पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम 1920, 1939 का विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, 1946 का विदेशियों का अधिनियम और साल 2000 का इमिग्रेशन कानून। इस नए बिल का मकसद है कि इमिग्रेशन की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जाए और अवैध तरीके से भारत में घुसने वालों को रोका जाए। आइए, इस बिल की सारी अहम बातों को एक-एक करके समझते हैं, ताकि आपको पता चल सके कि यह कानून क्या कहता है और इसका असर क्या होगा।

क्या है इस बिल का मकसद?

सबसे पहले बात करते हैं कि यह बिल क्यों लाया गया? दरअसल, भारत में हर साल लाखों लोग बाहर से आते हैं। कुछ लोग टूरिस्ट बनकर, कुछ पढ़ाई के लिए, कुछ बिजनेस के लिए और कुछ शरण लेने के लिए। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि लोग गलत तरीके से भारत में घुस आते हैं या अपने वीजा की समय सीमा से ज्यादा वक्त तक रुक जाते हैं। ऐसे लोगों की वजह से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

इस नए कानून का मकसद है-

  • भारत में आने-जाने की प्रक्रिया को आसान और साफ-सुथरा बनाया जाए।
  • अवैध तरीके से घुसने वालों को रोका जाए।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जाए।
  • जो लोग सही मकसद से भारत आते हैं, जैसे टूरिस्ट, स्टूडेंट्स या बिजनेसमैन, उनके लिए रास्ता आसान हो।
  • शरणार्थियों को भी सही तरीके से मदद मिले, जो अपने देश में मुसीबत की वजह से भारत आते हैं।

यह कानून केंद्र सरकार की ओर से आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित होने के बाद लागू होगा। यानी जब सरकार इसकी आधिकारिक घोषणा कर देगी, तभी से यह लागू हो जाएगा।

विदेशियों को छह श्रेणियों में बाँटा गया

इस बिल की एक खास बात यह है कि इसमें विदेशियों को छह अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा गया है। इससे यह साफ हो जाता है कि किस तरह के विदेशी को क्या अधिकार मिलेंगे और उनकी क्या जिम्मेदारियाँ होंगी। इन श्रेणियों में शामिल हैं-

टूरिस्ट (पर्यटक): जो लोग घूमने-फिरने के लिए भारत आते हैं।

स्टूडेंट्स (छात्र): जो पढ़ाई के लिए भारत आते हैं।

बिजनेस वीजा होल्डर (व्यापारी): जो बिजनेस या व्यापार के लिए आते हैं।

शरणार्थी: जो अपने देश में उत्पीड़न की वजह से भारत में शरण लेने आते हैं।

अवैध अप्रवासी: जो बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसते हैं।

अन्य: इसमें वो लोग आते हैं जो किसी और वजह से भारत में हैं, जैसे मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए।

इस तरह से श्रेणियाँ बनाकर सरकार ने यह साफ कर दिया है कि हर तरह के विदेशी के लिए अलग नियम होंगे।

कानून में सख्त सजा का प्रावधान

इस बिल में सबसे ज्यादा जोर सख्ती पर दिया गया है। अगर कोई विदेशी गलत तरीके से भारत में घुसता है, जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है या अपने वीजा के नियम तोड़ता है, तो उसके लिए सख्त सजा का प्रावधान है। इसके लिए अलग-अलग तरह की सजा भी होगी, जिसमें…

अवैध प्रवेश: अगर कोई बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसता है, उसे अवैध अप्रवासी माना जाएगा। ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जा सकता है, निर्वासित (देश से बाहर निकाला) किया जा सकता है या ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा।

वीजा की समय सीमा से ज्यादा रुकना: अगर कोई अपने वीजा की अवधि से ज्यादा वक्त तक भारत में रुकता है, तो उसे भी सजा मिलेगी। मामूली उल्लंघन में 5 साल तक भारत में दोबारा आने पर रोक लग सकती है। साथ ही चेतावनी या जुर्माना भी हो सकता है।

बार-बार गलती करने वालों पर सख्ती: अगर कोई बार-बार नियम तोड़ता है, तो उस पर और सख्त कार्रवाई होगी। लंबे समय तक भारत में आने पर रोक लग सकती है।

अवैध रूप से दोबारा घुसने की कोशिश: अगर कोई निर्वासित व्यक्ति दोबारा अवैध तरीके से भारत में घुसने की कोशिश करता है, तो उसे 10 साल की जेल और आजीवन भारत में आने पर रोक लग सकती है।

बड़े अपराध: अगर कोई धोखाधड़ी, गंभीर अपराध या आतंकवाद जैसी गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो उसे तुरंत निर्वासित किया जाएगा, जेल होगी और हमेशा के लिए ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा।

शरणार्थियों के लिए खास प्रावधान

इस बिल में शरणार्थियों को भी ध्यान में रखा गया है। जो लोग अपने देश में उत्पीड़न की वजह से भारत में शरण लेने आते हैं, उनके लिए बेहतर सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं। यह प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से बनाए गए हैं, ताकि भारत अपनी मानवीय जिम्मेदारियों को निभा सके। ऐसे लोगों को कानूनी मान्यता और सहायता दी जाएगी, ताकि वे सुरक्षित रह सकें।

वीजा प्रक्रिया को बनाया गया आसान

जो लोग सही मकसद से भारत आते हैं, जैसे टूरिस्ट, स्टूडेंट्स या बिजनेसमैन, उनके लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। नए कानून के तहत वीजा लेने की प्रक्रिया को सरल किया गया है, ताकि लोगों को ज्यादा परेशानी न हो। ई-वीजा की 9 श्रेणियाँ बनाई गई हैं, इनमें ई-पर्यटन वीजा, ई-व्यापार वीजा, ई-चिकित्सा वीजा, चिकित्सा परिचारक वीजा, ई-आयुष वीजा, ई-प्रचारक वीजा, ई-छात्र वीजा और ई-छात्र आश्रित वीजा शामिल हैं। भारत में रुकने और जाने की प्रक्रिया को भी सुगम बनाया गया है।

इसके साथ ही कुछ सख्त नियम भी जोड़े गए हैं। जिसमें…

1- टूरिस्ट और स्टूडेंट्स को किसी भी तरह की नौकरी या बिजनेस करने की इजाजत नहीं होगी।

2- बिजनेस वीजा वालों को भारत में सैलरी वाली नौकरी करने की अनुमति नहीं होगी।

3- अगर कोई वीजा होल्डर किसी अपराध या धोखाधड़ी में शामिल पाया जाता है, तो उसका वीजा रद्द कर दिया जाएगा।

4- अगर वीजा जाली दस्तावेजों से लिया गया है, या कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है, तो भी वीजा रद्द होगा।

FRRO को सूचना देना जरूरी

इस बिल में एक और अहम नियम है। अगर कोई विदेशी भारत में है और उसकी दी गई जानकारी में कोई बदलाव होता है, जैसे – पता बदलना, नौकरी बदलनी या यूनिवर्सिटी बदलनी, तो उसे तुरंत फॉरेन रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (FRRO) को सूचित करना होगा। अगर कोई इस नियम को नहीं मानता, तो उसे जुर्माना भरना पड़ सकता है या उसे देश से निकाल दिया जा सकता है।

किन लोगों को माना जाएगा अवैध अप्रवासी?

इस बिल में साफ तौर पर बताया गया है कि अवैध अप्रवासी कौन होगा। अगर कोई व्यक्ति बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसता है, या अपने वीजा की समय सीमा से ज्यादा वक्त तक रुकता है, तो उसे अवैध अप्रवासी माना जाएगा। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे ऐसे लोगों को हिरासत में लें, निर्वासित करें या ब्लैक लिस्ट में डाल दें।

क्या कहते हैं आँकड़े?

इस बिल में कुछ आँकड़े भी दिए गए हैं, जो बताते हैं कि भारत में अवैध अप्रवास का मसला कितना बड़ा है। 20 मार्च 2025 तक के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 14 लाख लोग बिना सही दस्तावेजों के रह रहे हैं। इनमें से 5% लोग बांग्लादेश से हैं, 5% श्रीलंका से, 5% म्यांमार से और 5% अफगानिस्तान से हैं। बाकी 80% लोग नेपाल, भूटान, मालदीव और अफ्रीकी देशों से हैं।

इन लोगों में से 5% टूरिस्ट हैं, 5% स्टूडेंट्स, 5% बिजनेस वीजा होल्डर, 5% शरणार्थी, और 5% अवैध अप्रवासी हैं। बाकी 70% अन्य श्रेणियों में आते हैं। इनमें से 5% लोग बिना सही दस्तावेजों के भारत में घुसे हैं, 5% ने जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है, और 5% ने अपने वीजा की समय सीमा से ज्यादा वक्त तक रुकने की कोशिश की है। बाकी 85% ने अन्य नियम तोड़े हैं। इन लोगों में से 5% को चेतावनी दी गई है, 5% पर जुर्माना लगाया गया है, 5% को निर्वासित किया गया है, और 5% को ब्लैक लिस्ट में डाला गया है। बाकी 80% पर अन्य कार्रवाई की गई है।

इन आँकड़ों से साफ है कि अवैध अप्रवास एक बड़ा मसला है और इस नए कानून के जरिए सरकार इसे रोकने की कोशिश कर रही है।

क्या होगा इसका असर?

इस नए कानून का असर कई तरह से देखने को मिलेगा। इस बिल से-

  • अवैध अप्रवास पर लगाम लगेगी। जो लोग गलत तरीके से भारत में घुसने की कोशिश करेंगे, उनके लिए सजा सख्त होगी, जिससे ऐसे मामले कम हो सकते हैं।
  • जो लोग सही मकसद से भारत आते हैं, उनके लिए प्रक्रिया आसान होगी।
  • शरणार्थियों को कानूनी मदद मिलेगी, जिससे उनकी जिंदगी बेहतर हो सकती है।

इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट 2025 एक ऐसा कानून है, जो भारत में इमिग्रेशन की प्रक्रिया को साफ-सुथरा और सुरक्षित बनाने की कोशिश करता है। इसके खंड और उपखंड साफ तौर पर बताते हैं कि विदेशियों को क्या करना होगा और क्या नहीं। यह कानून अवैध अप्रवास को रोकने, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और सही मकसद से आने वालों को आसानी देने के लिए बनाया गया है। इसमें शरणार्थियों के हक की भी रक्षा की गई है।

नाबालिग से 10 युवकों ने किया रेप, Video बनाकर कहा- जब बुलाएँगे, आना होगा: पीड़िता की माँ बोली- शिकायत करने पर SC-ST एक्ट में फँसाने की दी धमकी, बिहार के दरभंगा की घटना

बिहार के दरभंगा में दलित समाज 10 लड़कों ने 16 साल की एक नाबालिग युवती के साथ गैंगरेप किया। लड़की जब बेहोश हो गई तो आरोपित उसे नंग-धड़ंग छोड़कर भाग निकले। आरोपितों ने बलात्कार का वीडियो भी बनाया और पीड़िता से कहा कि जब भी बुलाया जाएगा तो उसे आना पड़ेगा। शिकायत करने पर पीड़िता के परिवार को SC-ST Act में फँसाने की धमकी भी दी। पुलिस ने 2 आरोपितों को पकड़ा है।

यह मामला दरभंगा के बहेड़ा थाना क्षेत्र के एक गाँव की है। पीड़िता ने 25 मार्च 2025 को गाँव के चौकीदार के बेटे दुर्गेश पासवान को मुख्य आरोपित बनाते हुए कुल 10 लोगों के खिलाफ गैंगरेप की FIR दर्ज कराई। प्राथमिकी में लड़की की माँ ने बताया कि यह घटना 15 मार्च की शाम की है। मामले में 10 दिन बाद रिपोर्ट दर्ज कराने को लेकर पीड़िता की माँ ने कहा कि आरोपितों ने शिकायत करने पर हरिजन एक्ट में फँसाने की धमकी दी थी।

FIR के अनुसार, पीड़िता 15 मार्च की देर शाम को शौच के लिए गई थी। उसी दौरान चौकीदार का बेटा दुर्गेश पासवान मिला। उसने लड़की को बहलाकर धोबीया गाछी में ले गया। वहाँ सुमित पासवान, दिलखुश पासवान, सचित पासवान, अमित पासवान, अंकुश पासवान, सुजीत पासवान, विशाल पासवान, राघव पासवान और अंकित पासवान मौजूद थे। वे सभी नशे में थे।

आरोपितों ने पीड़िता का बारी-बारी से रेप किया। जब लड़की देर रात तक घर नहीं लौटी तो घर वालों ने उसकी खोजबीन शुरू कर दी। पीड़िता की माँ ने बताया कि उसकी बेटी पासवान टोला के पास बेहोशी हालत में मिली। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, घटना के दौरान जब पीड़िता बेहोश हो गई तो आरोपितों ने उसे जख्मी और नंगी हालत में छोड़कर वहाँ से भाग निकले।

पीड़िता की माँ का कहना है कि बेटी को घर लाया गया। जब वह होश में आई तो उसने घटना की जानकारी दी। पीड़िता ने बताया कि आरोपितों ने उसका अश्लील वीडियो भी बनाया है और धमकी दी थी कि अगर शिकायत की तो पूरे परिवार को एसटी-एससी एक्ट में फँसा दिया जाएगा। परिजनों का कहना है कि वे लोक-लाज और हरिजन एक्ट के डर से चुप्पी साध ली।

भास्कर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
दरभंगा गैंगरेप पीड़िता की माँ का दैनिक भास्कर में प्रकाशित बयान का स्क्रीनशॉट

इस बीच आरोपित लड़की को वीडियो कॉल करके धमकी देते कि उसे जब भी बुलाया जाएगा तो उसे आना पड़ेगा। वे कहते कि अगर नहीं आई तो वे उसकी अश्लील वीडियो वायरल कर देंगे। धीरे-धीरे यह बात गाँव के लोगों को पता चल गई। मामला खुल जाने के बाद आखिरकार पीड़िता के परिजनों ने थाने में दुर्गेश पासवान सहित 10 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया।

बेहड़ा थाना के SHO चंद्रकांत गौरी ने बताया कि पीड़िता का मेडिकल कराया गया है। पीड़िता की माँ की शिकायत के बाद पुलिस टीम ने घटनास्थल का मुआयना किया। वहाँ पर खून के धब्बे भी मिले हैं। एसपी ग्रामीण आलोक कुमार ने कहा कि इस मामले में साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। फिलहाल दुर्गेश पासवान और सुमित पासवान को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं, बाकी 8 आरोपितोें के लिए छापेमारी की जा रही है।

वहीं, मुख्य आरोपित दुर्गेश पासवान के परिजनों ने गैंगरेप के आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि आरोप लगाने वाले शराब का काम करते हैं और दुर्गेश के चौकीदार पिता ने इसकी शिकायत कर दी थी। इससे नाराज होकर लड़की का परिवार उसे फँसा रहा है। उनका दावा है कि होली के दिन हुई इस घटना के दिन दुर्गेश गाँव में नहीं था।

बांग्लादेश बॉर्डर पर बाड़बंदी के लिए जमीन नहीं दे रही ममता सरकार, TMC कैडर करते हैं हुड़दंग: संसद में बोले अमित शाह, कहा- ज्यादातर घुसपैठियों के पास होता है बंगाल का आधार-वोटर कार्ड

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के गुंडे बांग्लादेश सीमा बंद करने में अड़चन डाल रहे हैं। वह सीमा पर तार लगाने गए सुरक्षाबलों के साथ बदतमीजी करते हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार भी इन्हीं गुंडों के पक्ष में है। वह भी बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए जमीन नहीं दे रही है। यह सारी बातें केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बताई हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार (27 मार्च, 2025) को लोकसभा में आव्रजन एवं प्रवासी विधेयक पर बोलते हुए बांग्लादेश सीमा को लेकर समस्याएँ बताईं। गृह मंत्री शाह ने विधेयक पर चर्चा के दौरान बताया कि बांग्लादेश सीमा पर सेना और BSF क्या कर रही है।

उन्होंने कहा, “हमारी बांग्लादेश से सटी हुई सीमा 2216 किलोमीटर है। इसमें से 1653 किलोमीटर बाड़ बन चुका है, इनके पास की रोड बन चुकी है, बाड़ के पास की चौकियाँ भी बन चुकी हैं। शेष 563 KM में से 112 KM पर भौगोलिक परिस्थितियों के कारण फेंसिंग व्यावहारिक नहीं है।”

गृह मंत्री शाह ने आगे बताया, “इस इलाके में नाले हैं, नदियाँ हैं, इसलिए फेंसिंग नहीं हो सकती। अब मैं बताता हूँ कि 450 किलोमीटर क्यों बाक़ी है। मैंने बंगाल सरकार को 10 बार लिखा है लेकिन सरकार जमीन नहीं दे रही फेंसिंग के लिए।”

उन्होंने आगे बताया, “450 किलोमीटर के लिए गृह सचिव ने बंगाल के सचिव के साथ 7 बार बैठक की है लेकिन जमीन नहीं दे रहे हैं। जहाँ फेंसिंग लगाने जाते हैं वहाँ सत्ताधारी पार्टी का कैडर आकर बवाल करता है, धार्मिक नारे लगाता है। 450 किलोमीटर की बाड़ बंदी बंगाल सरकार के चलते नहीं हो रही।”

गृह मंत्री ने कहा कि अगर ममता बनर्जी जमीन दे दें तो यह सीमा बंद हो जाएगी। गृह मंत्री ने घुसपैठियों को मदद देने का आरोप भी बंगाल सरकार के ऊपर लगाया। उन्होंने कहा, “बांग्लादेशी या रोहिंग्या जब घुसपैठ करते हैं, तो इन्हें आधार कार्ड कौन देता है? जितने भी बांग्लादेशी पकड़े गए हैं, उनमे से अधिकांश के पास 24 परगना का आधार कार्ड और वोटर कार्ड पाया गया।”

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर बंगाल सरकार आधार कार्ड जारी न करे, तो कोई भी घुसपैठिया भारत में नहीं घुस सकता। गौरतलब है कि इससे पहले भी पश्चिम बंगाल सरकार पर घुसपैठियों के मामले में वोटबैंक के चलते नरमी बरतने के आरोप लगते आए हैं।

जिस विधेयक पर गृह मंत्री अमित शाह बोल रहे थे, वह लोकसभा से गुरुवार को पास हो गया। यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाना है। इस विधेयक के पास होने के बाद अवैध घुसपैठियों पर नकेल कसी जा सकेगी।