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बांग्लादेश बॉर्डर पर बाड़बंदी के लिए जमीन नहीं दे रही ममता सरकार, TMC कैडर करते हैं हुड़दंग: संसद में बोले अमित शाह, कहा- ज्यादातर घुसपैठियों के पास होता है बंगाल का आधार-वोटर कार्ड

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के गुंडे बांग्लादेश सीमा बंद करने में अड़चन डाल रहे हैं। वह सीमा पर तार लगाने गए सुरक्षाबलों के साथ बदतमीजी करते हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार भी इन्हीं गुंडों के पक्ष में है। वह भी बांग्लादेश की सीमा पर तार लगाने के लिए जमीन नहीं दे रही है। यह सारी बातें केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बताई हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार (27 मार्च, 2025) को लोकसभा में आव्रजन एवं प्रवासी विधेयक पर बोलते हुए बांग्लादेश सीमा को लेकर समस्याएँ बताईं। गृह मंत्री शाह ने विधेयक पर चर्चा के दौरान बताया कि बांग्लादेश सीमा पर सेना और BSF क्या कर रही है।

उन्होंने कहा, “हमारी बांग्लादेश से सटी हुई सीमा 2216 किलोमीटर है। इसमें से 1653 किलोमीटर बाड़ बन चुका है, इनके पास की रोड बन चुकी है, बाड़ के पास की चौकियाँ भी बन चुकी हैं। शेष 563 KM में से 112 KM पर भौगोलिक परिस्थितियों के कारण फेंसिंग व्यावहारिक नहीं है।”

गृह मंत्री शाह ने आगे बताया, “इस इलाके में नाले हैं, नदियाँ हैं, इसलिए फेंसिंग नहीं हो सकती। अब मैं बताता हूँ कि 450 किलोमीटर क्यों बाक़ी है। मैंने बंगाल सरकार को 10 बार लिखा है लेकिन सरकार जमीन नहीं दे रही फेंसिंग के लिए।”

उन्होंने आगे बताया, “450 किलोमीटर के लिए गृह सचिव ने बंगाल के सचिव के साथ 7 बार बैठक की है लेकिन जमीन नहीं दे रहे हैं। जहाँ फेंसिंग लगाने जाते हैं वहाँ सत्ताधारी पार्टी का कैडर आकर बवाल करता है, धार्मिक नारे लगाता है। 450 किलोमीटर की बाड़ बंदी बंगाल सरकार के चलते नहीं हो रही।”

गृह मंत्री ने कहा कि अगर ममता बनर्जी जमीन दे दें तो यह सीमा बंद हो जाएगी। गृह मंत्री ने घुसपैठियों को मदद देने का आरोप भी बंगाल सरकार के ऊपर लगाया। उन्होंने कहा, “बांग्लादेशी या रोहिंग्या जब घुसपैठ करते हैं, तो इन्हें आधार कार्ड कौन देता है? जितने भी बांग्लादेशी पकड़े गए हैं, उनमे से अधिकांश के पास 24 परगना का आधार कार्ड और वोटर कार्ड पाया गया।”

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर बंगाल सरकार आधार कार्ड जारी न करे, तो कोई भी घुसपैठिया भारत में नहीं घुस सकता। गौरतलब है कि इससे पहले भी पश्चिम बंगाल सरकार पर घुसपैठियों के मामले में वोटबैंक के चलते नरमी बरतने के आरोप लगते आए हैं।

जिस विधेयक पर गृह मंत्री अमित शाह बोल रहे थे, वह लोकसभा से गुरुवार को पास हो गया। यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाना है। इस विधेयक के पास होने के बाद अवैध घुसपैठियों पर नकेल कसी जा सकेगी।

जज को हटाने के लिए संविधान में महाभियोग का प्रावधान, जानिए क्या है इसकी प्रक्रिया: कौन थे जस्टिस रामास्वामी जिन पर सबसे पहले चला महाभियोग?

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली बड़ी मात्रा में अघोषित नकदी को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मामला सामने आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने तीन जजों का एक एक कमिटी बनाई है, जो इस मामले की जाँच कर रही है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की माँग लगातार तेज होने लगी है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने की एक लंबी प्रक्रिया है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया।

हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। इसके बाद CJI की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट से ही दिल्ली हाई कोर्ट में लाया गया था।

CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक जाँच’ कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने माँग की है कि इस मामले स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद को आपराधिक आरोप तय करना चाहिए या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर उन्हें हटाना चाहिए। इसी तरह कई पूर्व जज और वरिष्ठ वकील भी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की है।

क्या होता है महाभियोग? कैसे हटाए जाते हैं जज?

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की शक्तियों एवं उन्हें हटाने के बारे में बताया गया है। इसके साथ ही संसद के अनुच्छेद 124(4) में सुप्रीम कोर्ट को हटाने के लिए महाभियोग चलाने की प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 218 में कहा गया है कि हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए भी यही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।

संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि किसी जज को ‘प्रमाणित कदाचार’ और ‘अक्षमता’ के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद द्वारा कार्यवाही शुरू की जाती है और इसके दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को हटाने का आदेश देते हैं। दरअसल, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए महाभियोग का आधार और प्रक्रिया को उच्च स्तर का रखा गया है।

न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘न्यायाधीश जाँच अधिनियम 1968’ में विस्तृत रूप से बताई गई है। इस अधिनियम में जज को पद से हटाने के उद्देश्य से कार्यवाही आरंभ करने के लिए सबसे पहला चरण सदस्यों की संख्या बताई गई। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे।

अध्यक्ष या सभापति सांसदों या संबंधित लोगों से परामर्श कर सकते हैं और नोटिस से संबंधित प्रासंगिक आरोपों की जाँच करते हैं। इसके आधार पर वे प्रस्ताव को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति (जो भी इसे प्राप्त करते हैं) संबंधित जज के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे।

इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देता है। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देती है। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाता है।

रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाता है और सदन में बहस होती है। प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित होना चाहिए। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या के का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए।

यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो प्रस्ताव को स्वीकृति के लिए दूसरे सदन में भेजा जाता है। दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस दौरान अगर संसद भंग हो जाती है या उसका कार्यकाल समाप्त हो जाता है तो महाभियोग प्रस्ताव विफल हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट की ‘आंतरिक जाँच प्रक्रिया’ क्या होती है?

किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ संसद के अलावा भी शिकायत की जा सकती हैं। इसके तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJ) को चिट्ठी लिखकर या अन्य माध्यमों से संपर्क करके जाँच की माँग की जा सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के सीजे एएम भट्टाचार्जी के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोपों के बाद 1995 में एक आंतरिक तंत्र की आवश्यकता महसूस की गई।

सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति एएम भट्टाचार्जी (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 124 के तहत ‘बुरे व्यवहार’ और ‘महाभियोग योग्य दुर्व्यवहार’ के बीच अंतर को स्पष्ट किया। साथ ही शीर्ष कोर्ट ने न्यायिक कदाचार की जाँच के लिए एक ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने अक्टूबर 1997 में अपनी रिपोर्ट दी और सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 1999 में इसे अपनाया।

साल 2014 में इसमें सुप्रीम कोर्ट में इसमें संशोधन किया। साल 2014 में मध्य प्रदेश के एक न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एसके गंगेले बनाम रजिस्ट्रार जनरल हाई कोर्ट मध्य प्रदेश मामले में आंतरिक प्रक्रिया में संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अरुण मिश्रा ने सात चरण वाली प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार की।

इसके तहत, किसी जज के खिलाफ शिकायत भारत के मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जा सकती है। अगर शिकायत हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या राष्ट्रपति को दी जाती है तो वे उस शिकायत को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भेजते हैं। CJI को लगता है कि शिकायत गंभीर नहीं है तो वे उसे खारिज कर सकते हैं।

अगर शिकायत गंभीर लगती तो वे आगे की प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर मामला हाई कोर्ट के किसी जज का होता है तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) उस हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में रिपोर्ट की माँग करते हैं। तमाम जाँच और आरोपित जज के बयान लेने के बाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यदि गहन जाँच की सिफारिश करते हैं तो CJI रिपोर्ट और बयान की समीक्षा करते हैं।

समीक्षा के बाद CJI एक जाँच समिति का गठन करते हैं। यह समिति तीन सदस्यीय होगी, जिसमें दो अलग-अलग हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश शामिल होंगे। यह समिति न्यायाधीश से स्पष्टीकरण माँगती है। तमाम जाँच के बाद यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट देती है। इसमें बताया जाता है कि आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही कदाचार के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं।

यदि कदाचार गंभीर नहीं हैतो CJI न्यायाधीश को सलाह दे सकते हैं और रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रख सकते हैं। यदि कदाचार गंभीर है तो CJI संबंधित न्यायाधीश को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देते हैं। यदि आरोपित न्यायाधीश इससे इनकार करता है तो CJI संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश देते हैं कि आरोपित जज को न्यायिक कार्य सौंपना बंद दें।

यदि आरोपित न्यायाधीश फिर भी इस्तीफा नहीं देता हैं तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करते हैं तथा उन्हें हटाने की कार्यवाही की सिफारिश करते हैं। इसके बाद संसद में उस न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जाती है। हालाँकि, यह तमाम आंतरिक प्रक्रिया का जिक्र संविधान में नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों के लिए खुद ही विकसित कर दिया गया है।

वो जज, जिस पर चला था पहली बार महाभियोग

भारत में आज तक 6 बार जजों को हटाने का प्रयास किया गया है। हालाँकि, इनमें से किसी को हटाया नहीं जा सका। सभी ने या तो खुद त्याग-पत्र दे दिया या फिर आरोप खारिज हो गए। इन 6 में से सिर्फ जस्टिस रामास्वामी और जस्टिस सेन के मामले में ही जाँच समिति ने आरोपों को सही पाया था। इनमें से 5 जजों पर वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे, जबकि एक में यौन कदाचार के आरोप लगे थे।

जस्टिस वीरा रामास्वामी (जी. रामास्वामी) भारत के पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें महाभियोग के जरिए हटाने का प्रयास किया गया था। रामास्वामी का निधन 8 मार्च 2025 को 96 साल की उम्र में तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में निधन हो गया। वी. रामास्वामी का के खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। हालाँकि, विपक्ष ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। रामास्वामी को सन 1971 में मद्रास हाई कोर्ट में जज बनाया गया था। इस असामान्य कदम के कारण काफी बवाल हुआ था। यह विवाद उनके कार्यकाल में आगे भी चलता रहा।

रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उचित प्रक्रियाओं का पालन किया। उन्होंने अपने फायदे के लिए सरकारी वाहनों एवं संसाधनों का जमकर दुरुपयोग किया। उन्होंने सरकारी पैसे से अपने आधिकारिक आवास में महंगे फर्नीचर, कालीन, एयरकंडिशन सिस्टम सहित अन्य विलासिता वाले सामान खरीदे।

इसको लेकर सन 1993 में जमकर राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था। उनके खिलाफ महाभियोग की माँग उठने लगी। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी अपनी मंजूरी दी थी। हालाँकि, रामास्वामी को बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत कर दिया गया। आरोपों की समीक्षा करने के बाद तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने उन्हें मामले के सुलझने तक सेवा से दूर रहने की सलाह दी।

उन्हें 18 जुलाई 1990 को आधिकारिक पत्र मिला और उन्होंने तुरंत 23 जुलाई 1990 से छह सप्ताह की छुट्टी माँग ली। तथ्यों का सत्यापन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक कमिटी गठित की। इस कमिटी ने कहा कि उसे अनुचित व्यवहार का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बाद लोकसभा के 108 सदस्यों ने 9वीं लोकसभा के अध्यक्ष से रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की।

तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के सहयोगी भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों ने लोकसभा में इस महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस को स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद तत्कालीन स्पीकर रबि राय ने 12 मार्च 1991 को समिति गठित की। समिति ने पाया कि रामास्वामी ने सार्वजनिक धन का उपयोग निजी फायदे के लिए किया और वैधानिक नियमों की अवहेलना की।

इस समिति ने रामास्वामी को 14 में से 11 आरोपों में दोषी ठहराया। वहीं, रामास्वामी ने स्पीकर द्वारा गठित समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया। 10 मई 1993 को समिति द्वारा यह निर्धारित किए जाने के बाद कि आरोपों में दम है, प्रस्ताव को चर्चा के लिए लोकसभा में लाया गया। हालाँकि, उस समय की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस के कई नेता रामास्वामी के समर्थन में आ गए।

इस महाभियोग प्रस्ताव के समर्थन में 401 सांसदों में से सिर्फ 196 ने मतदान किया। कॉन्ग्रेस और कुछ अन्य दलों के 205 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में हुए मतदान में भाग ही नहीं लिया। इस तरह यह प्रस्ताव गिर गया और वे हटाए जाने से बच गए। इस तरह वे अपना कार्यकाल पूरा होने तक आगे भी काम जज के रूप में काम करते रहे। आखिरकार 8 मार्च 2025 को उनका निधन हो गया।

कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।

वो जज, जिनके खिलाफ CBI कोर्ट में लंबित है मामला

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी लगा था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा था। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय में सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।

उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।

बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने बालाकृष्णन के फैसले को पलट दिया और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। साल 2011 में जस्टिस यादव जिस दिन सेवानिवृत्त हो रहे थे, उसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। आज 14 साल बाद भी यह मामला स्पेशल CBI कोर्ट में लंबित है।

अब प्रकाश को छू भी सकते हैं… क्या है ‘सुपर सॉलिड लाइट’, इससे कितना बदलेगा हमारा जीवन: सरल शब्दों में समझिए विज्ञान

सुबह-सुबह सूरज की रोशनी को देखकर दिन की शुरुआत करना लगभग हर व्यक्ति की चाहत होती है। इस रोशनी से ऊर्जा मिलती है, दिन अच्छा बीतेगा, ऐसा माना जाता है। लेकिन अगर यही रोशनी देखने के साथ छूने के लिए मिल जाए तो?

सोचने को तो कुछ भी सोचा जा सकता है। लेकिन अब धरातल पर भी साइंस फिक्शन की ये बात सच हो रही है। इटली के सीएनआर नैनोटेक (Consiglio Nazionale delle Ricerche) के एटोनियो गियानफेट (Antonio Gianfrate) और यूनिवर्सिटी ऑफ पाविया (University of Pavia) के डेविड निग्रो (Davide Nigro) की टीम ने रिसर्च कर ये दिखा दिया है कि प्रकाश भी ठोस हो सकता है।

17वीं सदी से अब तक शोध चालू

प्रकाश को लेकर 17वीं और 18वीं शताब्दी में शोध शुरू हुए। न्यूटन और हाइजेंस जब लाइट पर काम कर रहे थे, तब से ही यह बहस चल रही है कि प्रकाश असल में है क्या? कोई कण या तरंग? न्यूटन का मानना था कि प्रकाश कणों से बना है।

इसके बाद 20वीं सदी में एल्बर्ट आइंस्टीन ‘थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’ लेकर आए और बताया कि प्रकाश दो तरह से काम कर सकता है। यानी लाइट का डुअल बिहेवियर होता है। इसमें कण भी हैं और तरंग भी। 1905 में आई इस थ्योरी में आइंस्टीन ने ये बताया कि पदार्थ के द्रव्यमान से ऊर्जा बनाई जा सकती है। वैसे ही ऊर्जा से पदार्थ बन सकता है। हालाँकि उन्होंने भी इसके ठोस में बदलने की संभावना से इनकार कर दिया था।

इसके बाद 1942 में एनरीको फर्मी ने संयुक्त राष्ट्र में ये दिखाया कि यूरेनियम जैसे पदार्थ से हम ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। हालाँकि ऊर्जा या फोटॉन से कोई ठोस पदार्थ बने, इस तरह के शोध में सफलता नहीं मिल पा रही थी। यही कारण है कि बाद में भी शोध जारी रहे।

प्रकाश को लेकर इतनी संभावनाओं के बावजूद अब तक सफलता क्यों नहीं मिली? इसका उत्तर है कि किसी भी ठोस पदार्थ का द्रव्यमान होता है। इसके उलट प्रकाश फोटॉन से बनता है, जिसका कोई द्रव्यमान या रेस्ट मास नहीं होता या कहा जाए शून्य होता है।

लाइट बन गई ‘सुपर सॉलिड’

नेचर पत्रिका में छपी इटली के वैज्ञानिकों की रिसर्च अब कौतूहल का विषय बनी हुई है। वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि प्रकाश को एक ‘सुपर सॉलिड’ पदार्थ में बदला जा सकता है। इसे ‘सुपर सॉलिड लाइट’ नाम दिया गया है। असल में सुपर सॉलिड एक ऐसी अवस्था है, जिसमें किसी पदार्थ को इस तरह ठंडा किया जाता है कि उसके परमाणु एक ही क्वांटम अवस्था में पहुँच जाते है। इसमें पदार्थ होता तो ठोस है, लेकिन उसकी संरचना फ्लुइड की तरह होती है। यानी ये बिना रुकावट के बहता रहता है।

इस तरह के सुपर सॉलिड पदार्थ को अब तक सिर्फ बोस-आइंस्टीन कंडेंसेट्स (बीईसी) में ही देखा गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस रिसर्च से भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग और ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव आ सकते हैं। इस रिसर्च को क्वांटम फिजिक्स के लिए एक अहम मील का पत्थर कहा जा सकता है।

कैसे जम गया प्रकाश?

वैज्ञानिकों ने प्रकाश को सामान्य रूप से तापमान कम करके नहीं जमाया, बल्कि इसके लिए खास तकनीक का उपयोग किया। उन्होंने क्वांटम तकनीक का उपयोग कर गैलियम आर्सेनाइड की संरचना में माइक्रोस्कोपिक रिज (सूक्ष्म लकीरें) के जरिए फोटॉन को नियंत्रित किया। इसके बाद प्रकाश को सुपर सॉलिड अवस्था में बदला गया।

इस रिसर्च से क्वांटम कंप्यूटिंग में नई टेक्नोलॉजी के नए आयाम सामने आ सकते हैं। क्वांटम कंप्यूटर एक तरह के सुपर कंप्यूटर होते हैं, जिनका उपयोग बड़े रिसर्च और जटिल गुणा-भाग करने के लिए किया जाता है। नया शोध इन सुपर कंप्यूटर की स्पीड और अधिक तेज कर सकता है। इससे सेमी कंडक्टर, स्पेस रिसर्च, टेक्नोलॉजी, स्वास्थ्य, साइबर सुरक्षा के साथ अन्य रिसर्च में मदद मिल सकती है।

आम इंसान को इस रिसर्च से क्या मिलेगा?

आम आदमी के लिए ये रिसर्च तुरंत तो नहीं पर भविष्य में कई तकनीकी बदलाव ला सकता है। इससे हमारे रोजमर्रा के जीवन में बेहतरी आ सकती है। भविष्य में आम इंसान भी बेहतर आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस (AI) और स्मार्ट तकनीक का उपयोग कर सकता है।

नए मोबाइल और गैजेट्स के लिहाज से देखा जाए तो नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अत्याधुनिक ऑप्टिकल विकसित किए जा सकते हैं। अल्ट्रा थिन डिस्प्ले के मोबाइल और अत्यधिक शक्तिशाली प्रोसेसर तैयार हो सकते हैं। बैटरी लाइफ बढ़ जाएगी।

इसे ऐसे समझा जा सकता है कि आगे चलकर आपका मोबाइल चार्जर मिनटों में फोन की बैटरी फुल चार्ज कर देगा। आपके डेटा ट्रांसफर की गति कई गुना तेज हो सकती है। सुपरफास्ट इंटरनेट की सुविधा दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी पहुँच सकती है।

क्वांटम इंटरनेट पद्धति विकसित की जाएगी, जिससे इंटरनेट अधिक सुरक्षित हो जाएगा और हैकिंग नहीं हो पाएगी। कैंसर जैसी बीमारी के लिए बेहतर शोध हो सकते हैं। क्वांटम सेंसर और इमेजिंग तकनीक पैथालॉजी और एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जाँच सुविधाओं को सटीक बना सकता है।

पर्यावरण के लिहाज से भी ये शोध एक बेहतर विकल्प बन कर सामने आ सकते हैं। हरित ऊर्जा को भी बढ़ावा मिलेगा जो पर्यावरण के संरक्षण में सहायक होगा। इस खोज से ऊर्जा उत्पादन और भंडारण के लिए कई नए विकल्प मिल सकते हैं। अक्षय ऊर्जा, बैटरी और सुपर कंडक्टिविटी को बेहतर बना कर बिजली की खपत को कम किया जा सकता है। इससे उन जगहों तक बिजली पहुँचने के आसार होंगे जहाँ आज तक बिजली नहीं पहुँच पाई है।

फिक्शन से असल रिसर्च पर पहुँच गई साइंस

स्कूल में साइंस की पढ़ाई में बेंजीन और कार्बन के बारे में बच्चों को कई रिएक्शन समझाए जाते हैं। साइंस फिक्शन की ये बात सिर्फ याद करने तक ही सीमित रहती थी। वैज्ञानिकों के इस शोध ने फिक्शन को वास्तविक दुनिया के करीब ला दिया है। सूर्य के जिस प्रकाश को हमें सिर्फ देखने भर से ही गर्मी महसूस होने लगती है, जरा सोचिए कि अगर उसे ठोस में बदला जाएगा तो कितने नए शोध सामने आएँगे और कितने अविष्कारों से हम परिचित होंगे।

द्वारकाधीश ही नहीं… स्वामीनारायण संप्रदाय की किताब में भगवान राम, शिव और माता चामुंडा का भी अपमान: ऑपइंडिया की पड़ताल में खुलासा, यहाँ देखें सारे सबूत

गुजरात में स्वामीनारायण संप्रदाय विवादों में घिर गया है। स्वामीनारायण संप्रदाय को अपनी विवादास्पद पुस्तकों, उनके धर्मगुरुओं के अपमानजनक बयानों और अपने सिर्फ अपने ही गुरुओं की ही सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने जैसे मुद्दों पर हिन्दुओं के क्रोध का सामना करना पड़ रहा है।

जलाराम बापा के अपमान का विवाद अभी शांत भी नहीं हुआ था कि स्वामीनारायण संप्रदाय द्वारा द्वारकाधीश भगवान कृष्ण के अपमान का एक और विवाद सामने आ गया है। इसके बाद से द्वारका में स्थिति बिगड़ती जा रही है। इस मामले में ब्रह्म समाज के साथ-साथ पूरे हिंदू समुदाय ने स्वामीनारायण संप्रदाय को 48 घंटे के भीतर माफी माँगने का अल्टीमेटम दिया है।

विवाद की जड़ स्वामीनारायण संप्रदाय की एक पुस्तक है। पुस्तक का नाम है ‘श्रीजी संकल्पमूर्ति सद्गुरु श्री गोपालानंद स्वामी की वार्ता’। इस पुस्तक में भगवान द्वारकाधीश (कृष्ण) और पवित्र तीर्थ स्थल द्वारका के बारे में अपमानजनक लेख लिखने का आरोप है।

ऑपइंडिया के पास यह पुस्तक मौजूद है। ऑपइंडिया ने जब इस पुस्तक का अध्ययन किया तो कई खुलासे हुए। न केवल भगवान कृष्ण, बल्कि इस पुस्तक में भगवान राम, भगवान शंकर, भगवान हनुमान और भगवान गणपति के बारे में भी अपमानजनक लेख हैं।

इतना ही नहीं, इस पुस्तक में देवी चामुंडा, जिन्हें देवी पार्वती के अवतार के रूप में पूजा जाता है, उनके बारे में भी अपमानजनक बातें लिखी हैं। इस पुस्तक में एक जगह पर कहा गया है कि द्वारका में कोई भगवान ही नहीं है। इसके साथ ही भगवान कृष्ण की महिमा को कम करके ‘स्वामीनारायण’ को सर्वोच्च साबित करने का भी झूठा प्रयास भी किया गया है।

क्या है विवाद?

हाल ही में स्वामीनारायण संप्रदाय के एक स्वामी ने जलाराम बापा के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद पूरे गुजरात में विरोध हुआ था। इसके बाद वीरपुर में माफ़ी माँगी, लेकिन उस घटना के कुछ दिनों बाद स्वामीनारायण संप्रदाय की एक पुस्तक भी विवाद में आ गई है, इसमें आरोप लगाया गया है कि उसमें भगवान कृष्ण का अपमान किया गया है।

सोशल मीडिया पर लोग आरोप लगा रहे हैं कि संप्रदाय बार-बार हिंदू देवी-देवताओं का अपमान कर रहा है। संप्रदाय की श्रीजी संकल्पमूर्ति सद्गुरु श्री गोपालानंद स्वामी की वार्ता नामक पुस्तक में कहानी संख्या 33 में लिखा गया है “द्वारका में भगवान कहाँ होंगे? यदि आप भगवान को देखना चाहते हैं, तो वडताल जाइये।”

इसके साथ ही ब्राह्मण समुदाय को लेकर भी टिप्पणी की गई है। इसके सामने आने के बाद ब्रह्म समाज और हिंदू समाज ने संयुक्त रूप से द्वारका में विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन करने वाले हिन्दुओं ने संप्रदाय के स्वामियों को 48 घंटे के भीतर द्वारका आकर भगवान से माफी माँगने का का अल्टीमेटम भी दिया है।

इस पुस्तक में ऐसा क्या लिखा?

विवादास्पद पुस्तक की जाँच करते समय, ऑपइंडिया ने पाया कि कहानी संख्या 33 में स्वामीनारायण संप्रदाय के एक भक्त ‘अबासाहेब’ का उल्लेख है। पुस्तक में कहा गया है कि वह एक चरित्रवान व्यक्ति थे और उन्हें गोपालानंद स्वामी के दर्शन से लाभ हुआ।

पुस्तक आगे बताती है, “उन्होंने एक बार स्वामी से पूछा कि चूंकि उनके परिवार के सदस्य ‘कुसंगी’ हैं, इसलिए वह द्वारका जाने के लिए कह रहे हैं, तो उन्हें इस स्थिति में क्या करना चाहिए?” जवाब में गोपालानंद स्वामी कहते हैं, “द्वारका में भगवान कहाँ हैं? अगर भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन करने हैं तो वडताल चले जाइए। वहाँ भगवान स्वामीनारायण आपकी मनोकामना पूरी करेंगे।”

पुस्तक में आगे लिखा है, “स्वामी की अनुमति लेकर आबासाहेब चल पड़े। लेकिन उनके रिश्तेदार उनके खिलाफ थे, और उन्होंने द्वारका ही जाने पर बहुत जोर दिया। अंततः वे द्वारका की ओर चल पड़े और समुद्र तट पर जाकर जहाज पर सवार हो गए, तभी समुद्र में भयंकर तूफान आ गया।”

पुस्तक बताती है कि इसके बाद आबा साहेब ने सोचा कि यह सब गोपालानंद स्वामी की बात ना मानने के चलते हुआ। आगे इस कहानी कहती है कि डूबते समय आबासाहेब ने ‘स्वामीनारायण-स्वामीनारायण’ का जाप करना शुरू कर दिया।

पुस्तक में लिखा है कि गोपालानंद स्वामी ने आबासाहेब को दर्शन देकर एक लकड़ी का टुकड़ा हाथ में लेने को कहा था, जिसके कारण आबासाहेब उस टुकड़े को हाथ में लेकर समुद्र पार कर गए थे।

पुस्तक में गोपालानंद आबासाहेब से कहते हैं, “आपके परिवार के सदस्य आपके पिछले जन्म के दुश्मन हैं, इसलिए उन्होंने आपको गुमराह किया, लेकिन क्योंकि आप हमारे भक्त हैं, इसलिए हमने आपकी रक्षा की।”

इस कथा में द्वारका जाने की इच्छा रखने वालों को ‘कुसंगी’ बताया गया है। इसके अलावा, यह दावा करना कि द्वारका में कोई भगवान नहीं है, एक तरह से हिन्दू धर्म का अपमान ही है। इसके बाद अपने धर्मगुरु को असल भगवान भी बताया गया है।

पुस्तक में और भी विवादित बातें

इसी किताब की आगे की पड़ताल करने पर ऑपइंडिया ने पाया कि कहानी नंबर 25 में भी एक व्यक्ति का जिक्र है जिसका नाम नारुपंत नाना है। इस कथा में हिन्दू देवी चामुंडा के विषय में अपमानजनक बातें की गई हैं।

इस कहानी के अनुसार यह भक्त नारूपंत एक बार गोपालानंद के पास गए, इस दौरान नारूपंत के माथे पर तिलक देखकर गोपालानंद ने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा, ”आप किस भगवान के उपासक हैं?” जवाब में उन्होंने कहा कि वे नारूपंत देवी के उपासक हैं और उनकी मां चामुंडा उनकी कुलदेवी हैं।

इस कहानी में इसके बाद गोपालानंद कहते हैं, “आप भगवान की पूजा करने के बजाय एक ‘छोटी’ देवी की पूजा क्यों करते हैं?” इसी कहानी में पेज नंबर 45 पर गोपालानंद कहते हैं, “देवी-देवताओं की पूजा करने से अंतत: घोर नरक की प्राप्ति होती है, लेकिन कल्याण नहीं होता।”

इसके बाद स्वामी गोपालानंद इस भक्त को कहते हैं, “यदि आप इस जन्म का अर्थ प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप देवी-देवताओं की पूजा छोड़कर हमारे गुरु श्री स्वामीनारायण भगवान की पूजा करें। वह सर्वेश्वर, सभी अवतारों के अवतार, सभी कारणों के कारण, एकमात्र ईश्वर हैं। इससे आपको निश्चित रूप से अटूट सुख की प्राप्ति होगी।”

कहानी में पेज नंबर 46 पर कहा गया है कि माता चामुंडा ने स्वप्न में नरूपंत को दर्शन देकर कहा, “अरे नरूपंत, देखो, हनुमान जी और गणपति दोनों ही स्वामीनारायण का नाम जप रहे हैं, हमारे मित्र माता चामुंडा के सामने कह रहे हैं कि नरूपंत सत्संगी हो गए हैं, इसलिए अब तुम्हें यहाँ से चले जाना चाहिए।”

आगे कहा गया है, “वास्तव में स्वामीनारायण ही एकमात्र भगवान हैं, अब तुम्हें (नरूपंत) उन्हीं की पूजा करनी चाहिए। हम भी अब से वहीं जाएँगे।” इस पूरी वार्ता का निष्कर्ष यह है कि स्वामी ‘स्वामीनारायण’ को ही भगवान बताया गया है और बाकी हिन्दू भगवानों को उनका उपासक बताया गया है।

इसके अलावा इसी पुस्तक में पेज संख्या 103 पर एक विवादित लेख भी है। इसमें कहा गया है, “गोपालानंद के सामने गदा पकड़े हनुमानजी काँप रहे हैं।” इसके अलावा पेज नंबर 44 पर रणछोड़रायजी का भी अपमान किया गया है। इसके अलावा पेज नंबर 49 पर भगवान शंकर को भी स्वामीनारायण और गोपालानंद की पूजा करते हुए दिखाया गया है।

वीडियो में भी की विवादित टिप्पणियाँ

इस पुस्तक पर जारी विवाद के बीच संप्रदाय के एक और स्वामी ने आपत्तिजनक बयान दिया है। सोशल मीडिया पर सामने आए 59 सेकंड के वीडियो में सूरत के वड रोड स्थित स्वामीनारायण गुरुकुल के स्वामी नीलकंठ चरण भगवान कृष्ण के बारे में बात करते नजर आ रहे हैं।

वह वीडियो में बताते हैं, “महाराज कहते हैं कि जब हम द्वारका गए तो द्वारकापति प्रार्थना की कि आप एक बड़ा मंदिर, एक बड़ा मंदिर बनाइए तो मैं वहाँ आकर रहना चाहता हूँ।” आगे स्वामी कहते हैं कि इसके कई वर्षों बाद स्वामी सच्चिदानंद ने मंदिर बनाने का निर्णय लिया और वडताल में मंदिर बनवाया।

स्वामी नीलकंठ चरण ने आगे कहा, “यह भी कहा जाता है कि मंदिर निर्माण के बाद द्वारकापति स्वामी सच्चिदानंद वडताल आये थे।” वायरल वीडियो ने इस विवाद की आग में घी डालने का काम किया है। हालाँकि, पुस्तक पर विवाद भी बना हुआ है।

अन्य किताबों में भी अपमान

ऊपर बताई गई किताब में ही नहीं बल्कि स्वामीनारायण संप्रदाय में कई ऐसी पुस्तकें हैं, जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करके अपनी बात ऊँची दिखाने का प्रयास किया गया है। स्वामीनारायण संप्रदाय के तथाकथित संतों ने भी बार-बार भगवान शिव, राम और कृष्ण का मजाक उड़ाया है और उन्हें ‘स्वामीनारायण’ का अंश और सेवक बताया है।

हाल ही में ऐसे कई ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें स्वामीनारायण संप्रदाय के स्वामियों ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया है। हाल ही में एक स्वामी ने हिंदू उत्सव ‘नवरात्रि’ को ‘लवरात्रि’ कहकर उसका अपमान किया था।

भड़के पुजारी और ब्राह्मण

इस पूरे विवाद को लेकर द्वारका के पुजारी ब्राह्मण समुदाय में काफी रोष है। ऑपइंडिया से बात करते हुए गुगली ब्रह्म समाज के अध्यक्ष यज्ञेशभाई उपाध्याय ने कहा कि वह, उनका समाज और पूरा हिंदू समाज भगवान श्री द्वारकाधीश का बार-बार अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।

उन्होंने बताया है कि उनके समुदाय के साथ-साथ पूरे हिंदू समुदाय ने इस मामले में सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए अधिकारियों को एक याचिका सौंपी है। उन्होंने स्वामीनारायण संप्रदाय की विवादास्पद पुस्तक को भी हटाए जाने की बात कही है।

उन्होंने कहा कि स्वामीनारायण संप्रदाय के एक स्वामी ने भी द्वारका के गुगली ब्राह्मणों पर टिप्पणी की थी और उन्हें ‘धन हड़पने वाले’ बताया था। उनका आरोप है कि स्वामी ने कहा था कि गुगली ब्राह्मण द्वारका में लोगों को लूटते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि स्वामीनारायण संप्रदाय के संत जो भी बयान देना चाहते हैं, देते हैं, लेकिन उनके पास इसका कोई सबूत नहीं है।

जो नेहरू से लेकर मनमोहन तक नहीं कर पाए, वो मोदी सरकार में हुआ मुमकिन: अप्रैल में पूरे भारत से रेल के जरिए जुड़ जाएगी कश्मीर घाटी, पहली ही ट्रेन होगी वन्दे भारत

अप्रैल, 2025 में भारत के किसी भी हिस्से ट्रेन पकड़ के कश्मीर घाटी पहुँचा जा सकेगा। कश्मीर घाटी में ट्रेन पहुँचाने के लिए सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। देश का अब तक का सबसे कठिन प्रोजेक्ट पूरा करके इसे दूसरे हिस्सों से जोड़ा गया है। कश्मीर को मिलने वाली पहली ट्रेन वन्दे भारत एक्सप्रेस होगी, यह भी सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 19 अप्रैल, 2025 को पीएम मोदी कटरा से श्रीनगर के लिए पहली ट्रेन को झंडी दिखा सकते हैं। कयास लगाए रहे हैं कि यह कार्यक्रम जम्मू-कश्मीर में ही होगा। ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के साथ ही पीएम मोदी उस चेनाब के पुल का भी दौरा करेंगे, जिसके चलते यह रेल लिंक जुड़ा है।

यह दुनिया का सबसे ऊँचा रेल ब्रिज है और इस ट्रेन रूट की मुख्य कड़ी है। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि पीएम मोदी इस दौरान एक रैली को भी संबोधित कर सकते हैं। इस कायर्क्रम में संभवतः जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी शामिल होंगे।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि सबसे पहले ट्रेन कटरा से श्रीनगर के बीच चलेगी। हालाँकि, जल्द ही ट्रेन जम्मू और श्रीनगर के बीच भी चलेगी। बताया जा रहा है कि इस रूट पर सबसे पहले वन्दे भारत एक्सप्रेस चलाई जाएगी। दिल्ली से सीधे श्रीनगर ट्रेन सेवाओं को बाद में चालू किया जा सकता है।

इससे पहले कश्मीर में बनिहाल से लेकर बारामूला तक ट्रेन चलाई गई थी। श्रीनगर इसी लाइन का हिस्सा है। अब बनिहाल को कटरा से जोड़ा गया है। यह रूट 111 किलोमीटर का है। इसमें 104 किलोमीटर रास्ता सुरंगों और ब्रिज के सहारे बनाया गया है।

कश्मीर को जम्मू से जोड़ने का यह प्रोजेक्ट मोदी सरकार में पूरा हुआ है। जम्मू कश्मीर में इस पूरे प्रोजेक्ट को USBRL का नाम दिया गया है। इसका अर्थ उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लाइन और इस प्रोजेक्ट में लगभग ₹41 हजार करोड़ का खर्च हुआ है।

इस प्रोजक्ट को बनाने के लिए कोंकण रेलवे और IRCON जैसी एजेंसियों को लगाया गया था। पीएम मोदी ने यहाँ ट्रेन को झंडी दिखाने से पहले जम्मू-कश्मीर की रेल डिवीजन भी अलग कर दी थी। अब जम्मू भी एक रेल डीविजन बन चुका है, इससे पहले यह फिरोजपुर से नियंत्रित होता था।

मोदी सरकार में सिर्फ कश्मीर ही नहीं बल्कि उत्तरपूर्व का भारत भी रेल लिंक से जुड़ा है। 2014 में मेघालय, 2021 में मणिपुर रेलवे के माध्यम से भारत से जुड़े थे। मिजोरम की राजधानी आइजोल भी 2025 में रेलवे से जुड़ जाएगी। उत्तर पूर्व के बाकी राज्यों में मीटर गेज को ब्रोड गेज में बदला जा रहा है।

कोई सिगरेट धूक रहा, कोई टॉयलेट में बैठकर तो कोई बेड पर लेटकर जज के सामने हो रहा पेश: दिल्ली से गुजरात तक ऑनलाइन सुनवाई में अलग ही चल रही ‘नौटंकी’

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 25 मार्च को वर्चुअल सुनवाई के दौरान सिगरेट पीने पर वादी सुशील कुमार को तलब किया है। कोर्ट ने सुशील कुमार को 29 मार्च 2025 को अदालत में उपस्थित रहने और अपना स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोर्ट में सुशील कुमार स्पष्टीकरण दें कि कार्यवाही के दौरान धूम्रपान करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए।

वसीयत से संबंधित मामले की सुनवाई कर रहे जज (पश्चिम) शिव कुमार ने 25 मार्च 2025 को दिए गए अपने आदेश में कहा, “आवेदक संख्या 1/श्री सुशील कुमार को एन.डी.ओ.एच. (अगली सुनवाई की तिथि) पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने के लिए न्यायालय नोटिस द्वारा जारी किया जाता है।” उन्होंने इस मामले को सुनवाई के लिए 29 मार्च का दिन सूचीबद्ध किया है।

कोर्ट ने कहा कि जब अन्य मामलों की सुनवाई चल रही थी, तब सुशील कुमार फोन पर बात कर रहे थे। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें ऐसा करने से मना भी किया, क्योंकि इससे कार्यवाही में बाधा आ रही थी। इसके बाद भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया। इसके बाद उन्हें म्यूट मोड पर रख दिया गया। जब उनसे इस ‘दुर्व्यवहार’ के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कोर्ट से माफी माँग ली और कहा कि वे दोबारा ऐसी गलती नहीं करेंगे।

इसके कुछ ही देर बाद कोर्ट आदेश लिखने में लगा तो सुशील कुमार कैमरा के सामने ही सिगरेट पीने लगे। इस दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का काम सँभाल रहे कोर्ट के कर्मचारी ने देख लिया। इसको लेकर जब उनसे सवाल किया गया तो सुशील कुमार वेब मीटिंग छोड़कर चले गए। वहीं, सुशील कुमार के वकील भी अगली सुनवाई की तारीख लेकर कोर्ट रूम से चले गए।

शौचालय में बैठकर वर्चुअल कोर्ट की कार्यवाही में शामिल हुआ शख्स

हाल ही में वर्चुअल सुनवाई के दौरान गुजरात में ऐसे दो मामले सामने आए हैं। एक मामले में एक व्यक्ति शौचालय में बैठकर कोर्ट की कार्यवाही में भाग ले रहा था। वहीं, दूसरे मामले में सुनवाई के दौरान एक व्यक्ति बेड पर लेटा हुआ था। गुजरात हाई कोर्ट में 17 जनवरी को सुनवाई के दौरान धवलभाई कनुभाई अंबालाल पटेल नाम का व्यक्ति शौचालय में बैठकर अदालत की कार्यवाही में शामिल हुआ था।

हाई कोर्ट के जस्टिस एमके ठक्कर की पीठ ने इस मामले में पटेल के व्यवहार की निंदा की थी। इसके साथ ही कोर्ट की गरिमा को कम करने के लिए 42 वर्षीय पटेल पर 2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया। न्यायालय ने पटेल पर सामुदायिक सेवा का दंड भी लगाया। उन्हें दो सप्ताह तक हाई कोर्ट परिसर में स्थित बगीचों में पानी देने और सफाई करने का निर्देश दिया। उन्हें रोजाना 8 घंटे काम करना तय हुआ।

पटेल अपने पिता के खिलाफ एक मामले से संबंधित सुनवाई में वर्चुअली शामिल हुए थे। ऑनलाइन सुनवाई के दौरान उन्होंने अभद्र व्यवहार किया। इसके कारण अदालत ने उन्हें डिस्कनेक्ट कर दिया। कुछ समय बाद पटेल सुनवाई में फिर शामिल हुए। इस बार वे शौचालय में बैठे हुए थे। इसके बाद उन्हें फिर हटा दिया गया। बाद में अदालत ने सोला पुलिस स्टेशन को इसकी जाँच करने का निर्देश दिया।

बेड पर लेटे हुए कोर्ट की सुनवाई में शामिल हुआ

इसी तरह 13 फरवरी को न्यायमूर्ति एमके ठक्कर की अदालत में कार्रवाई के दौरान वामदेव गाँधी नामक एक व्यक्ति अपने बिस्तर पर लेटे हुए था। वह अदालत की कार्यवाही को लेटकर ऐसे देख रहा था, जैसे कि वह कोई फिल्म देख रहा हो और उसका उसका आनंद ले रहा हो। जब अदालत की नजर वामदेव गाँधी की हरकत पर पड़ी तो कोर्ट ने उन पर 25,000 रुपए का जुर्माना ठोक दिया।

अदालत ने कहा, “न्याय तक पहुँच और व्यापक जनहित के लिए ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा प्रदान की गई है। सुनवाई में जुड़ने वाले व्यक्ति को अदालत की गरिमा को बनाए रखना होगा। इस तरह का आचरण अदालत की गरिमा और शिष्टाचार से समझौता करता है। इसलिए इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अगर इस तरह के कृत्य से सख्ती से नहीं निपटा जाता है तो इससे जनता की नज़र में अदालत की गरिमा कम हो सकती है।”

1971 का युद्ध हमारे रिश्ते का मार्गदर्शक, एक-दूसरे की चिंताओं को समझ कर आगे बढ़ेगा रिश्ता: पीएम मोदी ने बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस पर मोहम्मद युनुस को लिखा पत्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को पत्र लिखा है। पीएम मोदी ने यह पत्र बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस (26 मार्च, 2025) के मौके पर लिखा है। पीएम मोदी ने कहा है कि 1971 का मुक्तियुद्ध अभी भी दोनों देशों के रिश्तों का मार्गदर्शक है। उन्होंने दोनों देशों के बीच ‘चिंताओं’ को समझने की बात कही है।

पीएम मोदी ने लिखा, “मैं बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर आपको और बांग्लादेश के लोगों को अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ। यह दिन हमारे साझा इतिहास और बलिदानों का प्रमाण है, इसने हमारी हमारी द्विपक्षीय साझेदारी की नींव रखी है। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम की भावना हमारे संबंधों के लिए मार्गदर्शन का प्रकाश बनी हुई है।”

पीएम मोदी ने कहा कि संग्राम की यह भावना लगातार दोनों देशों के लोगों को फायदा पहुँचा रही है। पीएम मोदी ने आगे लिखा, “हम शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए अपनी साझा आकांक्षाओं तथा एक-दूसरे के हितों और चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता के आधार पर इस साझेदारी को और आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस पर पीएम मोदी के साथ ही राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी शुभकामनाएँ दी हैं। उन्होंने भी दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्ते की वकालत की है। प्रधानमंत्री शेख हसीना के अगस्त, 2024 में सत्ता से हटने के बाद यह दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।

गौरतलब है कि 26 मार्च, 1971 को ही बांग्लादेश में शेख मुजीबुर रहमान और उनके साथी नेताओं ने पाकिस्तान से आजादी का ऐलान किया था। इसके बाद दिसम्बर, 1971 तक युद्ध चला था। भारत ने दिसम्बर में पाकिस्तान की फ़ौज से आत्मसमर्पण करवाया था। इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान ही बांग्लादेश बना था।

हाल ही में बांग्लादेश विदेश मंत्रालय की तरफ से मोहम्मद यूनुस और पीएम मोदी के बीच मुलाक़ात के लिए भी प्रयास किया गया था। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने यह समय थाईलैंड में होने वाली BIMSTEC समिट के लिए माँगा था। हालाँकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से अभी इस पर कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।

थाईलैंड में यह समिट 1 अप्रैल-5 अप्रैल के बीच होनी है। यह पहला मौक़ा होगा जब पीएम मोदी और सलाहकार यूनुस एक ही मंच साझा करेंगे। हालाँकि, दोनों नेताओं के बीच इस सम्मेलन से इतर कोई बातचीत होगी या नहीं, या स्पष्ट नहीं है।

बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत का कोई भी बड़ा नेता नहीं गया है। भारत की तरफ से विदेश सचिव विक्रम मिसरी एक बार बांग्लादेश गए हैं। भारत लगातार बांग्लादेश पर सत्ता परिवर्तन के बाद हिन्दुओं पर हमला करने वालों पर सख्ती करने की अपील करता आया है। बांग्लादेश कहता है कि उसके देश में ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।

राजस्थान के जिस गाँव में एक भी मुस्लिम नहीं, उस गाँव के पते पर भी बंगाल-बिहार के मुस्लिमों ने कराया रजिस्ट्रेशन: 29000 फर्जी खातों में लिया गया ‘PM किसान सम्मान निधि’ का पैसा

राजस्थान के पाली में एक फ्रॉड का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ हिंदुओं के गाँव में मुस्लिमों के नाम से फर्जी अकाउंट बनाकर ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ से 7 करोड़ रुपए ले लिए गए। इन गाँवों में एक भी मुस्लिम नहीं हैं। जिन खातों में ये ट्रांसफर किए गए, वे पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के नाम पर बनाए गए हैं। पाली में ऐसे लगभग 29 हजार फर्जी खाते मिले हैं।

जाँच में पाली जिले के देसूरी में 20 हजार, रानी में 9,004 और मारवाड़ जंक्शन में 62 फर्जी खाते मिले। इस मामले में अब मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। हैरानी की बात है कि ये फर्जीवाड़ा साल 2020 में हुआ, लेकिन अधिकारियों ने यह बात सामने नहीं आने दी। इस मामले में उन्होंने FIR भी नहीं दर्ज करवाई थी। हालाँकि, अधिकारियों ने फर्जी खातों को ब्लॉक करके उसमें राशि जाने पर रोक लगा दी थी।

दैनिक भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 से अगस्त 2020 के बीच फर्जी किसानों के नाम से CSC और ईमित्र के माध्यम से पीएम सम्मान निधि के लिए आवेदन किया गया। आवेदन का पटवारी ने सत्यापन किया और उसे तहसीलदार को भेज दिया। तहसीलदार ने भी जाँच करके आवेदन पत्रों को कलेक्टर भेज दिया। इस तरह ये सूची केंद्र सरकार के पास पहुँच गई।

फर्जी नामों वाले खाते (साभार: भास्कर)

इसके बाद केंद्र सरकार ने इन खातों में किसान निधि के पैसे भेजने शुरू कर दिए। अब आशंका जताई जा रही है कि सरकारी आईडी को हैक करके इन आवेदनों को स्वीकृत कर लिया गया था। हालाँकि, इस मामले की फिलहाल जाँच चल रही है। यह पता लगाया जा रहा है कि इन आवेदनों को एक ही सरकारी आईडी को हैक करके स्वीकृत किया गया था या अलग-अलग आईडी से।

दरअसल, साल 2020 में अधिकारियों ने पाया कि देसूरी में पीएम किसान सम्मान निधि के लिए आवेदनों की भारी संख्या में आवेदन किए गए। इसके कारण लंबित आवेदनों की संख्या में भारी वृद्धि हो गई। उस साल 5 नवंबर को 265 लंबित आवेदनों की संख्या 21 दिसंबर तक अचानक 19,331 तक पहुँच गई। अधिकारियों ने जाँच किया तो पता चला कि ये खाते फर्जी हैं।

जाँच में पता चला कि ये खाते पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के नाम पर बनाए गए हैं। इनमें से 95 प्रतिशत खाते मुस्लिमों के नाम से थे। जाँच में पता चला कि देसूरी गाँव में एक भी मुस्लिम नहीं हैं। इस तरह राजस्थान के बाहर के 4,793 बैंक अकाउंट में किसान सम्मान निधि का 1 करोड़ 51 लाख 24 हजार रुपए ट्रांसफर भी हो चुके थे। इसके बाद इन खातों को फ्रीज कर दिया गया।

यही हाल रानी ब्लॉक के वरकाणा गाँव का भी है। इस गाँव में भी एक भी मुस्लिम नहीं हैं। यहाँ मुस्लिमों के नाम से 9,004 फर्जी खाते खोल लिए गए। इन सबका पंजीकरण एक ही दिन किया गया था। आश्चर्य की बात ये है कि ये सभी खाते रानी स्थित बैंक की एक शाखा में खोले गए। मुस्लिमों के नाम पर बने इन खातों में किसान सम्मान निधि की 3 किस्त भी जा चुकी थी।

जाँच के दौरान पता चला कि ये सभी खाते पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के नाम पर खुले हैं। इनमें 90 प्रतिशत नाम मुस्लिम हैं। इन सभी का पंजीकरण एक ही समय पर किया गया था और इन सभी आवेदनों को सरकारी पोर्टल पर अलग-अलग तारीख को एक ही समय में स्वीकृत भी किया गया था। वहीं, राज्य के मारवाड़ जंक्शन में फिलहाल 62 फर्जी खाते मिले हैं।

अधिकारियों का कहना है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कई ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो फर्जी आईडी बनाकर किसान सम्मान निधि के पैसे ले रहे हैं। बिना किसी ओटीपी के पोर्टल पर इन फर्जी आवेदनों को स्वीकृत कर लिया गया, जबकि उस गाँव के जो असली किसान हैं उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया। इस तरह कुल 32 हजार फर्जी आवेदन दिए गए थे।

छत्तीसगढ़ में भी मुस्लिमों के नाम पर फर्जी किसान

राजस्थान में सामने आया मामला किसी बड़े गिरोह का काम लगता है, क्योंकि ऐसा ही मामला मार्च 2024 में छत्तीसगढ़ में भी सामने आया था। बेमेतरा जिले के एक गाँव में 856 फर्जी किसानों के खातों में किसान सम्मान निधि का पैसा डालने का आरोप लगा था। इनमें से 198 किसानों के खातों तो पश्चिम बंगाल में थे। मामला सामने आने के बाद जिले के कलेक्टर ने जाँच के आदेश दिए थे।

दरअसल, जिले के बेरला ब्लॉक के बरगाँव में 656 मुस्लिमों के नाम पर खुले खातों में इस योजना के पैसे जा रहे थे। जाँच में पता चला कि इस गाँव में सिर्फ 19 मुस्लिम किसान ही हैं। ये सभी गाँव में रहते भी नहीं थे। इस पूरे मामले में लगभग 3 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया था। ये वो मामले हैं, जो अब तक सामने आए हैं।

अब यूट्यूब ने निकाली कुणाल कामरा की हेकड़ी, T-Series ने वीडियो पर कॉपीराइट ठोंका: भड़का ‘कॉमेडियन’ बोला- ‘कठपुतली बनना बंद करो’

कॉमेडी के नाम पर हिंदू घृणा फैलाने वाला कुणाल कामरा इन दिनों चारों तरफ से फंस गया है। पहले डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को लेकर बयान पर बवाल मचा तो हर जगह उसका विरोध हुआ। अब खबर है कि यूट्यूब ने कुणाल कामरा के स्टैंड-अप वीडियो “नया भारत: A Comedy Special” पर कॉपीराइट स्ट्राइक लगा दी है।

इस स्ट्राइक के बाद कामरा भड़का हुआ है। कामरा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा, “हैलो @TSeries, स्टॉप बिंग ए स्टूज। पैरोडी और सटायर कानूनी रूप से फेयर यूज़ के अंतर्गत आते हैं। मैंने गाने के बोल या मूल संगीत का उपयोग नहीं किया है। अगर आप इस वीडियो को हटा देते हैं तो हर कवर गाना/डांस वीडियो भी हटाया जा सकता है।”

कुणाल कामरा ने इसके बाद टी सीरिज को माफिया बता दिया। कामरा ने एकनाथ शिंदे और बाकी लोगों पर जो मजाक वाले गाने बनाए थे, उनमें टी सीरिज के गानों के धुन इस्तेमाल हुई थी। ऐसे में टी सीरिज ने संभवतः इस पर स्ट्राइक लगाई है। हालाँकि, टी सीरिज ने इस स्ट्राइक को लेकर पुष्टि नहीं की है।

इस स्ट्राइक के बाद कुणाल कामरा के यूट्यूब चैनल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उनकी रीच भी यूट्यूब घटा सकता है और अगर दोबारा स्ट्राइक होती है तो उनका चैनल बंद भी हो सकता है। कुणाल कामरा को यूट्यूब पर फैन्स से मिलने वाले पैसे भी बंद हो सकते हैं।

गौरतलब है कि रविवार (23 मार्च, 2025) को मुंबई में एक लाइव कार्यक्रम के दौरान कुणाल कामरा ने एकनाथ शिंदे को ‘गद्दार’ बताया था और उन पर एक अपमानजनक गाना गया था। उन्होंने एकनाथ शिंदे को रिक्शावाला बताया और कहा कि अगर उनकी नजर से देखा जाए तो शिंदे गद्दार नजर आएँगे।

कामरा ने कहा था कि एकनाथ शिंदे ने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया। कामरा ने यह भी दावा किया कि एकनाथ शिंदे ने ‘बाप चुराया है।’ उनका इशारा बालासाहेब ठाकरे की तरफ था। गौरतलब है कि एकनाथ शिंदे लगातार बालासाहेब की राजनीति के आदर्शों से समझौता करने का आरोप उद्धव ठाकरे पर लगाते हैं।

इस मामले में कुणाल कामरा के खिलाफ FIR दर्ज करवाई गई थी। उनको दो बार मुंबई पुलिस पेश होने के लिए नोटिस भेज चुकी है। कुणाल कामरा के फोन और बैंक खातों की जाँच की बात भी महाराष्ट्र सरकार कह चुकी है। कुणाल कामरा कथित तौर पर तमिलनाडु में है।

संभल हिंसा के दौरान पुलिस की गोली से नहीं हुई मौतें, अवैध हथियारों से चली थी ताबड़तोड़ गोलियाँ: फॉरेंसिक रिपोर्ट से पुष्टि; पड़ताल में PAK निर्मित कारतूस हुए थे बरामद

उत्तर प्रदेश के संभल में नवम्बर, 2024 में हुई हिंसा के दौरान सारी फायरिंग अवैध हथियारों से हुई थी। पुलिस ने इस दौरान गोलियाँ नहीं चलाई थीं। यह हिंसा में जब्त किए गए हथियारों की बैलिस्टिक रिपोर्ट से सामने आया है। संभल हिंसा में फायरिंग के कारण 4 लोगों की मौत हुई थी, इस संबंध में दो दंगाई पकड़े गए थे।

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, बैलिस्टिक जाँच के लिए हिंसा के बाद जब्त किए गए हथियारों और घटनास्थल से प्राप्त गोलियों को फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया था। इस फॉरेंसिक रिपोर्ट में सामने आया है कि पुलिस की तरफ से हिंसा के दौरान फायरिंग नहीं की गई थी।

संभल पुलिस को बैलिस्टिक जाँच की यह रिपोर्ट मिल गई है। हालाँकि, अभी कुछ जानकारियाँ सामने आना बाकी हैं। पुलिस ने बताया है कि अभी हिंसा के बाद मिले अवैध हथियारों और खाली कारतूसों का मिला किया जाएगा, इसके बाद ही कुछ और जानकारी सामने आ सकेगी।

बैलिस्टिक रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि संभल में हिंसा के दौरान जो गोलियाँ चली थीं, उनके लिए अवैध हथियारों का इस्तेमाल हुआ था। एक पुलिस अधिकारी ने कहा है कि जो लोग मारे गए थे, उनके शवों से गोलियाँ नहीं बरामद हुई हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि क्या गोलियाँ उनके शरीर को पार कर गई थीं।

संभल में पुलिस को एक पाकिस्तानी कारतूस भी मिला था। इसके विषय में भी जाँच की जा रही है। ताजा बैलिस्टिक रिपोर्ट से उन लोगों के दावे फेल हो गए हैं, जो पुलिस पर फायरिंग का आरोप लगा रहे थे। यह आरोप लगाने वालों में सपा नेताओं से लेकर कई इस्लामी नेता भी थे।

संभल सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने भी हत्याओं का आरोप पुलिस पर मढ़ा था। जामा मस्जिद के सदर जफर अली ने भी यह बात प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कही थी। पुलिस फायरिंग से लगातार इनकार करती रही थी और उसने हिंसा के दौरान रबर की गोलियाँ चलाने की बात बताई थी।

संभल हिंसा के दौरान बिलाल, अयान, कैफ और नईम नाम के 4 लड़कों की मौत हुई थी। पुलिस ने इन लड़कों की हत्या के मामले में गैंगस्टर शारिक साठा के गुर्गे मुल्ला अफरोज और वारिस को गिरफ्तार किया था। इन्होंने हिंसा के दौरान फायरिंग करने की बात कबूली थी।