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प्रधानमंत्री के रूप में पहली बार संघ मुख्यालय पहुँचे PM मोदी, संस्थापक हेडगेवार और गोलवलकर को दी श्रद्धांजलि: दीक्षा भूमि जाकर अंबेडकर को भी किया नमन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रविवार (30 मार्च 2025) को नागपुर के रेशम बाग स्थित राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ के मुख्यालय का दौरा किया। उन्होंने शताब्दी वर्ष मना रहे संघ के मुख्यालय में स्मृति मंदिर जाकर RSS के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके बाद वे भीमराव अंबेडकर से जुड़ी दीक्षा जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की RSS हेडक्वाटर की यात्रा ऐतिहासिक है। संघ मुख्यालय जाने वाले वे दूसरे प्रधानमंत्री हैं। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने 27 अगस्त 2000 को संघ कार्यालय की यात्रा की थी। पीएम मोदी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहनराव भागवत भी मौजूद थे। इस दौरान उन्होंने भागवत एवं संघ के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की।

पीएम मोदी दीक्षा भूमि जाकर भगवान गौतम बुद्ध और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को भी श्रद्धांजलि दी। इसी जगह पर डॉक्टर अंबेडकर ने सन 1956 में अपने हजारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था। दीक्षा भूमि के बाद वे कई अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। वे नागपुर में माधव नेत्रालय प्रीमियम सेंटर की आधारशिला रखेंगे। वे सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड की गोला-बारूद केंद्र का दौरा करेंगे।

विभिन्न कार्यक्रमों में पीएम मोदी के साथ संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ मंच भी साझा करेंगे। पीएम मोदी के इस दौरे को यादगार बनाने के लिए भाजपा ने पूरी तैयारी की है। महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के नागपुर आगमन पर पूरे विदर्भ में उत्साह है। प्रधानमंत्री मोदी के भव्य स्वागत के लिए 47 स्थानों पर तैयारी की गई है।

बता दें कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी साल 2012 में संघ मुख्यालय जा चुके हैं। इसके बाद साल 2013 में एक बैठक में हिस्सा लेने के लिए आरएसएस हेडक्वार्टर गए थे। हालाँकि, प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की संघ प्रमुख मोहन भागवत की मुलाकात कई मौकों पर हो चुकी है। इनमें राम मंदिर उद्घाटन का कार्यक्रम भी एक प्रमुख मौका था।

पीएम मोदी की नागपुर यात्रा को देखते हुए उनकी सुरक्षा की महत्वपूर्ण तैयारी की गई है। वहाँ 4,000 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके अलावा, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 5 कंपनियों और 1500 होमगार्ड को भी तैनात किया गया है। इसके अलावा, दूसरे जिलों से करीब 150 अधिकारियों को बुलाया गया है।

‘सब अल्लाह की देन’: हापुड़ की 42 साल की गुड़िया ने 12वें बच्चे को दिया जन्म, बच्चों ने बताया- अब्बू काम-धंधा नहीं करते, बस शराब पीते हैं और अम्मी को गालियाँ देते हैं

उत्तर प्रदेश के हापुड़ में रहने वाले इमामुद्दीन और गुड़िया के घर 12वीं बार किलकारी गूँजी। पिलखुवा कस्बे के बजरंगपुरी मोहल्ले में रहने वाली 42 साल की गुड़िया ने गुरुवार (28 मार्च 2025) को मेरठ ले जाते वक्त एंबुलेंस में अपनी बेटी को जन्म दिया। उनका कहना है, “सब अल्लाह की देन है।” इमामुद्दीन और गुड़िया 12 बच्चे पैदा कर चुके हैं, जिनमें से 2 जुड़वाँ बच्चों की मौत हो गई थी, और एक बच्ची अपने जेठ को दे दिया। अब 9 बच्चे उनके पास हैं।

हालाँकि अस्पताल की सीएमएस का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वो बताती हैं कि इमामुद्दीन और गुड़िया के घर ये 14वाँ बच्चा पैदा हुआ है। जच्चा-बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ हैं। उन्होंने बताया कि अस्पताल के बाहर ही बच्चा पैदा हो चुका था, बाद में अस्पताल में लाकर अन्य इलाज दिए गए। बच्चे का वजन 1800 ग्राम से ज्यादा है और उसे किसी तरह का खतरा नहीं है।

बड़े बेटे साहिल (24 साल) ने बताया कि अम्मी और नई बहन दोनों ठीक हैं। लेकिन हालात आसान नहीं हैं। गुड़िया का शौहर इमामुद्दीन शराबी है। जो कमाता है, सब शराब में उड़ा देता है। घर का खर्चा साहिल और उसका भाई मजदूरी करके चलाते हैं। साहिल कहता है, “अब्बू को बच्चों की परवाह नहीं, बस शराब पीते हैं और अम्मी को गालियाँ देते हैं।”

गुड़िया के सारे बच्चे अनपढ़ हैं, सिर्फ साहिल 8वीं तक पढ़ा है। वो अपने भाई-बहनों को घर पर थोड़ा-बहुत पढ़ाने की कोशिश करता है। परिवार 800 रुपये किराए के एक कमरे में रहता है।

दैनिक भास्कर ने अपनी ग्राउंड में रिपोर्ट में बताया है कि उनकी टीम गुड़िया के घर पहुँची। उनका घर सिर्फ 14×12 का एक कमरा है। अंदर ही किचन, चूल्हा, और चार बर्तन। खाने के डिब्बे खाली, कपड़े अलमारी में ठूँसे हुए। सोने के लिए तीन बिस्तर, बेड तक नहीं। गर्मी में साहिल और पिता बाहर सोते हैं। इस घर का किराया सिर्फ 800 रुपया महीने का है।

गुड़िया के हवाले से बताया गया है कि उसका निकाह करीब 18 साल की उम्र में हुआ था। वो मेरठ के स्थाई निवासी हैं। पहला बच्चा 1999 में ही हुआ, इस हिसाब से पहले बच्चे की उम्र करीब 26 साल की होगी। कई रिपोर्ट्स में गुड़िया की उम्र 50 साल बताई जा रही है। तो कई में 42 साल। ऐसे में पहले बच्चे की उम्र को ही देख लें तो गुड़िया की औसत उम्र 45 साल हो सकती है।

गुड़िया कहती है, “पहले शौहर अच्छा था, लेकिन शराब की लत ने सब बर्बाद कर दिया। अब वो अपनी कमाई सिर्फ शराब में उड़ाया है। घर चलाने के लिए मैं भी मजदूरी करती थी, लेकिन अब दोनों बेटे कमाते हैं।”

ये पूछा गया कि क्या वो आगे भी बच्चे पैदा करेगी, इस सवाल के जवाब में वो कहती है, “ये अल्लाह की मर्जी है।” घर में खाने का ठिकाना नहीं। सुबह खाएँ तो शाम की चिंता, शाम खाएँ तो सुबह की फिक्र। फिर भी गुड़िया सबकुछ अल्लाह पर छोड़ देती है।

गुड़िया की एक बेटी की शादी हो चुकी है, वो अपनी बेटी के साथ अम्मी से मिलने आई थी। बताया जा रहा है कि उस लड़की की उम्र सिर्फ 18-19 साल है, और उसकी शादी 2017 में ही हो गई थी, मतलब 13-14 साल की उम्र में ही… और अब वो खुद एक बच्ची की अम्मी है।

गुड़िया का सबसे बड़ा बेटा 24 साल का साहिल बताता है, “मैं वेल्डिंग करता हूँ, और छोटा भाई मजदूरी। उसी से घर चलता है। अब्बू तो अम्मी को घर न आने तक कहते हैं।” गुड़िया के पास उम्मीद बस अल्लाह है।

गुड़िया के बच्चों में साहिल (24), राहिल (23), समीर (20), रिहाना (19) शादीशुदा, इमराना (17), रमजानि (15), फैजान (13), अलीशा (6) और आरम (4) हैं। आरम को उसने अपने जेठ को दे दिया है। अभी नई बच्ची का नाम नहीं रखा गया है।

हिंदुओं का धार्मिक जुलूस जाता देख भड़के नमाजी, बवाल में घरों-दुकानों में तोड़-फोड़: बंगाल के मालदा में हिंसा के बाद सुरक्षाबल तैनात, 34 उपद्रवी गिरफ्तार

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के मोथाबाड़ी में 27 मार्च को हुई सांप्रदायिक हिंसा में पुलिस ने 34 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है। एहतियात के तौर पर प्रशासन ने इलाके में इंटरनेट सेवा बंद कर दी है। इसके साथ रैपिड एक्शन फोर्स की तीन कंपनियों को तैनात किया गया है। दरअसल, 28 मार्च को भाजपा ने आरोप लगाया था कि मोथाबाड़ी में हिंदुओं के घरों एवं दुकानों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।

इसको लेकर भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने राज्यपाल सीवी आनंद बोस को पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने राज्य सरकार को निर्देश देने की माँग की थी कि मोथाबारी क्षेत्र में हिंदुओं की सुरक्षा के लिए CAPF (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) की तैनाती की जाए। सुवेंदु अधिकारी ने कहा था कि इलाके में हिंदुओं को खतरा बढ़ता जा रहा है और उनकी सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।

ईद की नमाज और त्योहार को देखते हुए प्रशासन ने इलाके में धारा 144 नहीं लागू की है। उधर, कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार (28 मार्च) को जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक (SP) से इस मामले में 3 अप्रैल तक एक्शन रिपोर्ट माँगी है। कोर्ट ने कहा कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह अपेक्षा की जाती है कि सरकार को हिंसा से प्रभावित लोगों की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि 26 मार्च को मोथाबाड़ी मस्जिद में नमाज हो रही थी। इस दौरान वहाँ से हिंदुओं का एक धार्मिक जुलूस गुजर रहा था। जुलूस में लोग जयकारे लगाते जा रहे थे। इससे मुस्लिम नाराज हो गए और उन्होंने वहाँ से गुजरने एवं जयकारे लगाने का विरोध किया। बाद में भीड़ उग्र हो गई और कई हिंदुओं के घरों, दुकानों और गाड़ियों को लूटकर उनमें तोड़फोड़ एवं आगजनी की।

इसके बाद अगले दिन शुक्रवार को हिंदू पक्ष ने हिंसा के विरोध में प्रदर्शन किया। जिले के इंग्लिश बाजार थाना इलाके के बाँधापुकुर मोड़ पर काफी संख्या में लोग पहुँचे और सड़क जाम कर दिया। पुलिस ने भीड़ को जबरन हटाने की कोशिश की तो भीड़ उग्र हो गई। इस दौरान पुलिस ने भीड़ पर लाठी चार्ज किया और आँसू गैस के गोले दागे। इसके बाद भीड़ नियंत्रित हुई।

पुलिस महानिरीक्षक राजेश यादव का कहना है कि राज्य सशस्त्र पुलिस और RAF की तीन कंपनियों को कालियाचक ब्लॉक के संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया है। मालदा पुलिस का कहना है कि इस हिंसा को लेकर अब तक छह मामले दर्ज किए गए हैं और कुल 34 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। अन्य लोगों की पहचान और उनकी गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं।

इस मामले को भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने 28 मार्च को उठाया था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर कुछ वीडियो शेयर करते हुए उन्होंने आरोप लगाया था कि मोथाबाड़ी में हिंदू व्यापारियों की दुकानों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं, केंद्रीय शिक्षा एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास राज्यमंत्री डॉक्टर सुकांत मजूमदार ने भी हिंसा से संबंधित कई वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया थ।

सुकांत मजूमदार ने वीडियो शेयर करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा था, “दक्षिण मालदा के मोथाबाड़ी से भयावह दृश्य– हिंदू घरों और दुकानों को हिंसक भीड़ द्वारा तोड़ा गया। ममता बनर्जी और उनकी मूकदर्शक बंगाल पुलिस क्या कर रहे हैं? चुप्पी। यह उनकी बेशर्म तुष्टीकरण राजनीति की कीमत है- कानूनहीनता, भय और हिंदुओं के साथ अन्याय!”

म्यांमार में 334 परमाणु बमों जितनी उर्जा वाला था भूकंप, मृतकों की संख्या 1000 के पार : भारत ने शुरू किया ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’, PM मोदी ने मिलिटरी जुंटा चीफ से की बात

म्यांमार में शुक्रवार (28 मार्च 2025) को आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने भयानक तबाही मचाई है। मृतकों की संख्या 1000 को पार कर चुकी है। रॉयटर्स के मुताबिक, सैन्य सरकार ने बताया कि 1,002 लोग मर चुके हैं, 2400 से ज्यादा घायल हैं।

इस बीच, शनिवार (29 मार्च 2025) दोपहर 3:30 बजे फिर 5.1 तीव्रता का झटका आया, जिससे लोग दहशत में घरों से भागे। दो दिन में तीन बड़े झटके सहम गए हैं। वहीं, भारी तबाही के चलते म्यांमार के 6 राज्यों और पूरे थाईलैंड में इमरजेंसी लगा दी गई है।

म्यांमार में मची तबाही के बीच, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सैन्य प्रमुख जनरल मिन आंग ह्लाइंग से भी बात कर मदद की बात कही है। पीएम मोदी ने कहा कि करीबी दोस्त और पड़ोसी के रूप में, भारत इस कठिन समय में म्यांमार के लोगों के साथ मजबूती से खड़ा है।

म्यांमार की मदद के लिए भारत ने ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ शुरू कर दिया है। इसके तहत पहली खेप में 15 टन राहत सामग्री शामिल है, जिसमें टेंट, कंबल, स्लीपिंग बैग, खाने के पैकेट, स्वच्छता किट, जनरेटर और आवश्यक दवाएँ शामिल हैं। भारत अपनी तरफ से मदद बढ़ा रहा है। भारत ने राहत कार्यों में तेजी लाने के लिए NDRF के 80 बचाव कर्मियों का एक दल भी भेजा है।

अमेरिकी एजेंसी यूनाइटेड स्टेट जियोलॉजिकल सर्वे USGS का कहना है कि मृतकों की संख्या 10,000 तक जा सकती है। यूएसजीएस ने कहा कि शोधकर्ताओं ने बताया कि म्यांमार दो भूगर्भीय प्लेटों के बीच में स्थित है, इस कारण वहाँ भूकंप की स्थिति ज्यादा खराब होती है। इस भूकंप के विनाशकारी होने के पीछे की सबसे बड़ी वजह ये है कि इसका केंद्र धरती में बहुत गहराई में नहीं था। आम तौर पर भूकंप के केंद्र जमीन में 25 किमी तक नीचे होते हैं, लेकिन इस भूकंप का केंद्र महज 10 किमी ही नीचे था।

थाईलैंड के बैंकॉक में 30 मंजिला इमारत ढह गई, 10 लोगों की जान चली गई। वहाँ 2,000 से ज्यादा इमारतों को नुकसान हुआ। थाईलैंड में एक मस्जिद गिरने से 20 लोगों की भी मौत की खबर आई है। वहीं, कई बौद्ध पगोडा भी तबाह हो चुके हैं।

जियोलॉजिस्ट जेस फीनिक्स ने CNN से कहा म्यांमार से थाईलैंक तक आए इस भूकंप ने 334 परमाणु विस्फोट जितनी ऊर्जा पैदा की, ऐसे झटके महीनों तक आ सकते हैं। इस भूकंप की वजह से पैदा हुई उर्जा ने सबकुछ तबाह कर दिया है और पलक झपकते ही बड़ी से बड़ी बिल्डिंगें जमींदोज हो गई। बिल्डिंगों के गिरने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। इसका असर दूसरे दिन 5.1 तीव्रता के भूकंप के झटके से दिख भी चुका है।

थाईलैंड के जियोलॉजिस्ट्स के मुताबिक यह देश में 200 साल में आया सबसे बड़ा भूकंप है। भूकंप के झटके इतने शक्तिशाली थे कि केंद्र से सैंकड़ों किमी दूर बैंकॉक के कई इमारतें नष्ट हो गईं।

बता दें कि 1930 से 1956 तक 6 बड़े भूकंप आए थे। इस बार भी मांडले में इरावदी नदी का पुराना अवा ब्रिज ढह गया। लोग डरे हुए हैं, घरों में जाने की हिम्मत नहीं। म्यांमार की खराब मेडिकल सुविधाएँ मुसीबत बढ़ा रही हैं। हर तरफ अफरा-तफरी है, लोग अपनों को ढूँढ रहे हैं।

जयपुर में वीर तेजाजी की मूर्ति तोड़ने पर भड़के लोग, टोंक रोड किया जाम : MP हनुमान बेनीवाल बोले – ‘ये धार्मिक भावनाओं को भड़काने की साजिश’

जयपुर के साँगानेर इलाके में शुक्रवार (28 मार्च 2025) को वीर तेजाजी महाराज के मंदिर में उनकी मूर्ति को अज्ञात लोगों ने तोड़ दिया। जिसके बाद लोग भड़क गए और सड़क पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे। ये मामला प्रताप नगर सेक्टर-3 का है, जहाँ शनिवार (29 मार्च 2025) की सुबह जब श्रद्धालुओं ने यह देखा, तो वो भड़क गए। तेजाजी महाराज की मूर्ति को क्षतिग्रस्त देखकर स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए। जयपुर-टोंक रोड पर टायर जलाए गए, नारेबाजी हुई और करीब तीन घंटे तक जाम लगा रहा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुबह 10 बजे से मंदिर के बाहर भीड़ जमा होने लगी थी। विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल के कार्यकर्ता भी पहुँच गए। गुस्साए लोगों ने दोषियों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने समझाने की कोशिश की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो हल्की ताकत का इस्तेमाल कर जाम खुलवाया। अब स्थिति कंट्रोल में है, लेकिन लोगों का गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ। साँगानेर के बाजार बंद रहे, दुकानें सूनी पड़ी थीं।

नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल मौके पर पहुँचे और इसे धार्मिक भावनाओं को भड़काने की साजिश बताया। उन्होंने जयपुर पुलिस कमिश्नर से फोन पर बात कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की माँग की। वहीं, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा, “यह सिर्फ मूर्ति नहीं, हमारी विरासत और आस्था पर हमला है। सरकार तुरंत कदम उठाए।” विधायक विकास चौधरी और रामनिवास गावाड़िया भी वहाँ पहुँचे, लोगों को शांत करने की कोशिश की।

इस बीच, पुलिस ने भारी फोर्स तैनात कर दी है। मंदिर के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं, और कुछ संदिग्धों के सुराग मिले हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही आरोपितों को पकड़ लिया जाएगा। लोगों का कहना है कि सिर्फ गिरफ्तारी से काम नहीं चलेगा, धार्मिक स्थलों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए। यह घटना जयपुर के लिए एक काला धब्बा बन गई है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया।

बता दें कि राजस्थान सरकार ने साल 2023 में वीर तेजाजी कल्याण बोर्ड बनाया था, ताकि समाज की बेहतरी के लिए काम हो सके। लेकिन आज लोग पूछ रहे हैं- जब आस्था की रक्षा ही न हो सके, तो ऐसे बोर्ड का क्या फायदा? फिलहाल, पुलिस और प्रशासन हालात पर नजर रखे हुए हैं। उम्मीद है कि दोषियों को सजा मिलेगी और लोग फिर से शांति से अपने आराध्य की पूजा कर सकेंगे।

इस्लाम को नीचा दिखाता है हिंदुत्व… US की ह्यूस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाया जा रहा ऐसा ‘हिंदूफोबिक’ कंटेंट: भारतीय छात्र भड़के, विरोध देख यूनिवर्सिटी ने जारी की सफाई

अमेरिका के ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी में चल रहा एक कोर्स ‘लिव्ड हिंदू रिलिजन’ इन दिनों सुर्खियों में है। भारतीय-अमेरिकी छात्र ने इस कोर्स पर हिंदूफोबिया यानी हिंदू विरोधी होने का गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कोर्स हिंदू धर्म को गलत तरीके से पेश करता है और भारत के राजनीतिक हालात को तोड़-मरोड़ कर दिखाता है।

दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी ने इसका बचाव करते हुए कहा कि ये कोर्स एकेडमिक फ्रीडम का हिस्सा है और इसमें किसी धर्म के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं है। इस विवाद ने सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक हंगामा मचा दिया है।

भारतीय-अमेरिकी छात्र वसंत भट्ट का आरोप है कि कोर्स को पढ़ाने वाले प्रोफेसर आरोन माइकल उलरे हिंदू धर्म को एक ‘औपनिवेशिक ढाँचा’ बताते हैं, न कि प्राचीन और जीवंत परंपरा। भट्ट के मुताबिक, प्रोफेसर कहते हैं कि ‘हिंदू’ शब्द हाल का है और इसे पुराने ग्रंथों में नहीं देखा जाता। कोर्स में ये भी दावा किया गया कि हिंदुत्व यानी ‘हिंदू-नेस’ को हिंदू राष्ट्रवादी इस्तेमाल करते हैं ताकि दूसरे मजहबों, खासकर इस्लाम को नीचा दिखा सकें।

भट्ट ने कोर्स का एक हिस्सा शेयर किया, जिसमें कहा गया, “हिंदू शब्द नया है, ग्रंथों में नहीं मिलता। हिंदुत्व वो शब्द है, जिसे हिंदू राष्ट्रवादी अपनी पहचान के लिए इस्तेमाल करते हैं।” ये सुनकर भट्ट और कई हिंदू छात्रों का गुस्सा भड़क उठा। उनका मानना है कि ये उनकी आस्था पर हमला है।

इतना ही नहीं, कोर्स में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘हिंदू कट्टरपंथी’ कहा गया और भारत को हिंदू राष्ट्रवादी देश बताते हुए अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का आरोप लगाया गया। भट्ट ने इसे ‘बौद्धिक रूप से खोखला’ और ‘हिंदूफोबिक’ करार दिया।

सोशल मीडिया पर भी लोगों ने गुस्सा जाहिर किया। एक यूजर ने लिखा, “मोदी को हिंदू कट्टरपंथी कहना और हमारी परंपरा को राजनीतिक हथियार बताना हिंदूफोबिया है।”

हिंदू ऑन कैंपस नाम के एक स्टूडेंट ग्रुप ने कहा, “इन दावों के पीछे कोई सबूत नहीं है। राजनीतिक मतभेद ठीक हैं, लेकिन हिंदू पहचान को बदनाम करना गलत है।” भट्ट ने इसकी शिकायत कॉलेज ऑफ लिबरल आर्ट्स एंड सोशल साइंसेज के डीन से की, जिसके बाद यूनिवर्सिटी ने जाँच शुरू की।

सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ता देख हिंदू ऑन कैंपस ने ट्वीट किया, “मोदी पर कोर्स का हमला नस्लीय और धार्मिक भेदभाव है।” कई लोगों ने इसे उदारवादी शिक्षा में हिंदू विरोधी रवैये का सबूत बताया। एक यूजर ने लिखा, “हिंदू धर्म को सदियों से गलत दिखाया गया, और अब ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी भी यही कर रही है।” भट्ट का कहना है कि कोर्स हिंदू धर्म की जटिलता और समृद्धि को नजरअंदाज करता है और इसे सिर्फ एक राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करता है।

यूनिवर्सिटी ने दी सफाई

इस मुद्दे पर यूनिवर्सिटी की तरफ से सफाई जारी की गई है। ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी ने बयान जारी कर कहा कि वो एकेडमिक फ्रीडम को महत्व देती है। यूनिवर्सिटी के मुताबिक, ‘लिव्ड हिंदू रिलिजन’ कोर्स धार्मिक अध्ययन के अकादमिक ढाँचे पर आधारित है। यूनिवर्सिटी का कहना है कि ‘फंडामेंटलिज्म’ जैसे शब्द इसमें विश्लेषण के लिए इस्तेमाल होते हैं, न कि किसी धर्म को नीचा दिखाने के लिए।

बयान में कहा गया, “धार्मिक अध्ययन में फंडामेंटलिज्म का मतलब एक ऐसी विचारधारा से है जो धर्म के ‘सच्चे’ रूप को बनाए रखने का दावा करती है। ये कोई आलोचना नहीं, बल्कि धर्म के विकास को समझने का तरीका है।” यूनिवर्सिटी ने ये भी साफ किया कि कोर्स में भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के उभार को मौजूदा घटनाओं से जोड़ा गया है, लेकिन ये हिंदू धर्म की आलोचना नहीं है।

इस कोर्ट को तैयार करने वाले प्रोफेसर उलरे ने भी सफाई दी है। उनका कहना है कि कोर्स में हिंदू धर्म को एकरूप नहीं दिखाया गया। उन्होंने कहा, “मैंने कभी हिंदू धर्म को औपनिवेशिक ढाँचा या अल्पसंख्यकों पर अत्याचार का जरिया नहीं कहा। कोर्स में हिंदू धर्म की ऐतिहासिक जटिलता और समृद्धि को दिखाया जाता है।” उलरे ने ये भी कहा कि उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। यूनिवर्सिटी ने कहा कि वो छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लेती है और आरोपों की जाँच की जा रही है।

डमी स्कूलों से की पढ़ाई तो नहीं मिलेगी ‘ बोर्ड एग्जाम’ में एंट्री… CBSE का करारा प्रहार: शिक्षा में अनुशासन और समग्र विकास की ओर बड़ा कदम, NEP-2020 के अनुरूप सुधार

भारत में शिक्षा प्रणाली एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रही है। इसी क्रम में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसके तहत ऐसे छात्रों को कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा में बैठने से रोक दिया जाएगा, जो किसी मान्यता प्राप्त नियमित स्कूल में नामांकित नहीं हैं। यह निर्णय तथाकथित ‘डमी स्कूलों’ के खिलाफ एक सख्त कदम है, जो शिक्षा व्यवस्था की पवित्रता बनाए रखने और छात्रों को समग्र शिक्षा प्रदान करने के लिए उठाया गया है।

यह कदम न केवल शिक्षा के मूल्यों को मजबूत करता है, बल्कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप भी है। साथ ही, यह हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा कोचिंग संस्थानों के लिए जारी दिशा-निर्देशों और राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल की भावना को भी समर्थन देता है। यह सुधार शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, अनुशासन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक आवश्यक पहल है।

शिक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना

CBSE का यह निर्णय वर्षों से चली आ रही उस प्रवृत्ति के खिलाफ है, जिसमें मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र डमी स्कूलों में प्रवेश लेते हैं। ये स्कूल नाममात्र के होते हैं और इनमें छात्रों को नियमित कक्षाओं में भाग लेने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे छात्र सिर्फ बोर्ड परीक्षा देने के लिए पंजीकृत होते हैं और पूरा समय कोचिंग संस्थानों में बिताते हैं। यह न केवल शिक्षा के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है बल्कि बोर्ड परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।

CBSE द्वारा तय किए गए 75% उपस्थिति नियम को सख्ती से लागू करना और स्कूलों को जवाबदेह बनाना, यह सुनिश्चित करेगा कि छात्र केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि समग्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूलों में नामांकित हों। यह कदम स्कूल प्रबंधन एवं छात्रों और माता-पिता की सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ाने का कार्य करेगा और शिक्षा को महज़ एक औपचारिकता की बजाय एक अनुशासित प्रक्रिया बनाएगा।

यह एक लंबे समय से अपेक्षित सुधार है, जिसे CBSE को पहले ही लागू कर देना चाहिए था। कोटा, दिल्ली, जयपुर, लखनऊ, पटना जैसे शहरों में हजारों बच्चे नियमित स्कूल छोड़कर केवल कोचिंग कक्षाओं में जा रहे हैं, जो कि सरकार की NEP और केंद्र सरकार द्वारा जारी कोचिंग संस्थान के दिशा-निर्देशों के खिलाफ एक खुला विरोध है।

आखिरकार दिल्ली स्थित केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE मुख्यालय ने दिल्ली के नजफगढ़, मुंडका और नांगलोई जैसे क्षेत्रों में चल रहे डमी स्कूलों के कारोबार का संज्ञान लिया है। ऐसे में मुख्य मुद्दा यह है कि CBSE के अधिकारी कितनी ईमानदारी से स्कूलों से नियमों का पालन करवाते हैं।

NEP-2020 के साथ पूर्ण समन्वय

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का प्रमुख उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि छात्रों के चिंतनशील, रचनात्मक और व्यावहारिक कौशल को विकसित करना है। यह नीति स्कूली शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम आधारित पढ़ाई से आगे बढ़ाकर विद्यालयों को जीवन के लिए तैयार करने पर ज़ोर देती है।

CBSE द्वारा लिया गया यह निर्णय NEP-2020 के उन्हीं सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है, जिसमें कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल विषयों का ज्ञान प्राप्त करना नहीं है। इसका उद्देश्य नैतिक मूल्यों, नेतृत्व कौशल और सृजनात्मकता को भी विकसित करना होना चाहिए। डमी स्कूलों पर प्रतिबंध से यह सुनिश्चित होगा कि छात्र स्कूल के अनुभवात्मक शिक्षण प्रणाली, सह-पाठयक्रम गतिविधियों और सामाजिक विकास का लाभ उठा सकें।

इसके अलावा, यह निर्णय समग्र मूल्यांकन (Continuous and Comprehensive Evaluation) की नीति को भी बल देता है, जहाँ छात्र/छात्राओं का मूल्यांकन केवल बोर्ड परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी पूरी शैक्षणिक यात्रा के दौरान उनके प्रदर्शन और कौशल विकास पर किया जाता है।

कोचिंग संस्थानों पर प्रभाव: संतुलन बनाना अनिवार्य होगा

इस कदम का सबसे बड़ा प्रभाव देश के कोचिंग संस्थानों पर पड़ेगा, जो वर्षों से डमी स्कूल प्रणाली पर निर्भर थे। विशेष रूप से कोटा, दिल्ली, पटना और अन्य शहरों में बड़ी संख्या में छात्र डमी स्कूलों में दाखिला लेकर पूर्ण रूप से कोचिंग संस्थानों में समय बिताते थे।

हाल ही में राजस्थान सरकार ने कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल पेश किया, जिसमें कोचिंग संस्थानों के कामकाज को नियमित करने, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने और एक संतुलित शैक्षणिक वातावरण बनाए रखने की दिशा में कड़े नियम बनाए गए हैं। यह बदलाव कोचिंग संस्थानों को अपनी रणनीति बदलने और अपने पाठ्यक्रम को अधिक व्यापक बनाने के लिए मजबूर करेगा।

अब कोचिंग सेंटर केवल परीक्षा क्रैक करने का अड्डा नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें एक पूरक शिक्षा प्रणाली के रूप में कार्य करना होगा। कोचिंग संस्थानों को अब छात्रों को प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के साथ-साथ आलोचनात्मक सोच, समस्या समाधान कौशल और समय प्रबंधन सिखाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इससे कोचिंग संस्थाओं में भी एक उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षण प्रणाली विकसित होगी।

स्कूल प्रबंधकों के लिए चुनौती और अवसर

स्कूल मालिकों के लिए यह निर्णय जहाँ एक बड़ी चुनौती है, वहीं एक नया अवसर भी प्रस्तुत करता है। अब ऐसे स्कूलों की पहचान होगी, जो केवल डमी छात्रों को नामांकित कर रहे थे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में विफल थे। इस फैसले से अच्छे स्कूलों को मजबूती मिलेगी, क्योंकि वे अब अपने शिक्षण गुणवत्ता को और बेहतर बना सकते हैं।

इसके साथ ही, यह निर्णय स्कूलों को डिजिटल लर्निंग, प्रयोगात्मक शिक्षा और नवाचार आधारित शिक्षण तकनीकों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करेगा। स्कूल यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर शिक्षण सुविधाओं पर ध्यान देंगे तो उन्हें भी इसका लाभ मिलेगा और वे छात्र/छात्राओं एवं उनके माता-पिता के लिए अधिक आकर्षक बनेंगे।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर प्रभाव

शुरुआत में यह निर्णय उन छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण लग सकता है, जो केवल प्रतियोगी परीक्षाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। हालाँकि, दीर्घकालिक दृष्टि से यह बदलाव उनके समग्र विकास के लिए अत्यंत लाभकारी साबित होगा। जब छात्र नियमित रूप से स्कूल जाएँगे तो उन्हें केवल परीक्षा की रणनीति ही नहीं, बल्कि जीवन के लिए आवश्यक कौशल भी विकसित करने का अवसर मिलेगा।

स्कूलों में शिक्षकों से संवाद, परियोजना कार्यों में भागीदारी, और सह-पाठयक्रम गतिविधियों के माध्यम से वे समस्या समाधान, टीम वर्क, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों को विकसित कर सकेंगे। इसके अलावा, यह निर्णय राज्य कोटा प्रणाली के दुरुपयोग को भी रोकेगा, जहाँ छात्र अपनी 12वीं की परीक्षा किसी विशेष राज्य से देकर वहाँ के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश लेने की कोशिश करते थे। इससे प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी होगी और केवल योग्य उम्मीदवारों को ही लाभ मिलेगा।

निष्कर्ष: एक मजबूत और निष्पक्ष शिक्षा प्रणाली की ओर अग्रसर भारत

CBSE द्वारा डमी स्कूलों पर प्रतिबंध और नियमित विद्यालयों में उपस्थिति को अनिवार्य बनाने का निर्णय एक बहु प्रतीक्षित सुधार है। यह कदम NEP-2020 की उस व्यापक सोच के अनुरूप है, जिसमें शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार करने वाला एक सशक्त माध्यम माना गया है।

इस फैसले से न केवल छात्रों की शिक्षा प्रणाली को मजबूती मिलेगी, बल्कि कोचिंग संस्थान और स्कूल प्रबंधक भी अधिक उत्तरदायी बनेंगे। अब कोचिंग संस्थानों को परीक्षा-केंद्रित अध्ययन के बजाय छात्रों को समग्र रूप से विकसित करने की दिशा में कार्य करना होगा। वहीं स्कूलों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करने और नवीनतम शिक्षण तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

छात्रों के लिए यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संदेश है कि शिक्षा केवल अंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण विकास यात्रा है। उन्हें अब परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ अन्य कौशलों को भी सीखने का अवसर मिलेगा, जिससे वे न केवल एक अच्छे प्रतियोगी बल्कि एक अच्छे नागरिक भी बन सकेंगे। इस बहु प्रतीक्षित सुधार का दूरगामी प्रभाव भारतीय शिक्षा प्रणाली पर पड़ेगा और एक नई पीढ़ी को तैयार करने में मदद करेगा, जो ज्ञान, अनुशासन और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण होगी।

ईसाई धर्मांतरण के लिए ST बच्चों का हो रहा ब्रेनवॉश, MP के मंडला में बाल आयोग को SFI स्कूल के अवैध हॉस्टल से मिले 48 बच्चे: छात्रों का लक्ष्य- पास्टर और सिस्टर बनना, फंडिंग पर सवाल

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में ईसाई मिशनरियाँ सक्रिय हैं। ये स्कूल चला रही हैं, ये हॉस्टल चला रही हैं, जिनमें बच्चों को शिक्षा के नाम पर ईसाई बनाया जा रहा है। मंडला के घुटास ग्राम में साइन फॉर इंडिया नाम का स्कूल है, इसके हॉस्टल में रहने वाले 15 लड़कियों और 33 लड़कों को ईसाई बना दिया गया है। इस स्कूल को हॉस्टल चलाने की अनुमति तक नहीं है।

मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की जाँच में पता चला कि इन बच्चों का ब्रेनवॉश करके उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। इस स्कूल को ओडिशा का ज्योति राज बिना किसी अनुमति के चला रहा है। आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सारी जानकारी भोपाल मुख्यालय व प्रशासन को कार्रवाई के लिए भेज दी है।

बच्चों का ब्रेनवॉश और मजहबी किताबें

बाल संरक्षण आयोग के सदस्य ओंकार सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि ये 48 बच्चे दामोह, अनूपपुर, ओडिशा राज्य और आसपास के इलाकों से लाए गए थे। टीम ने जब बच्चों से बात की, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं। बच्चे डॉक्टर या इंजीनियर बनने की बजाय पास्टर और सिस्टर बनने की बात कह रहे थे। बच्चों ने खुद बताया कि उन्हें ईसाई धर्म से जुड़ने के लिए कहा गया है। जाँच में पाया गया कि उनका पूरी तरह से ब्रेनवॉश कर दिया गया था। स्कूल में बाइबिल समेत कई मजहबी किताबें भी मिलीं, जो इस बात का सबूत थीं कि यहाँ धार्मिक गतिविधियाँ चल रही थीं।

बाइबिल के साथ होती है स्कूल में प्रार्थना

आयोग की टीम के सामने ही एक अजीब नजारा देखने को मिला। स्कूल में प्रार्थना खुले में नहीं, बल्कि छत के नीचे एक अंडरग्राउंड जगह पर हो रही थी। आमतौर पर स्कूलों में प्रार्थना खुले में होती है, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं था। टीम ने बच्चों से बातचीत और प्रार्थना का पूरा वीडियो रिकॉर्ड किया, जो अब सबूत के तौर पर प्रशासन और भोपाल मुख्यालय को भेजा गया है।

डीपीसी केके उपाध्याय ने बताया कि उन्हें पहले से शक था कि स्कूल में कुछ गलत चल रहा है। जब आयोग की टीम पहुँची, तो बच्चों को बाइबिल के साथ प्रार्थना कक्ष में जाते देखा। बच्चों ने कहा कि वे रोज शाम 6:30 बजे ईसाई प्रार्थना करते हैं और पहले वे दूसरे धर्म को मानते थे।

बच्चियों के कमरे में लगे हैं सीसीटीवी कैमरे

बाल संरक्षण आयोग की सदस्य डॉ. निवेदिता शर्मा ने बताया कि स्कूल के दस्तावेजों में बच्चों का धर्म हिंदू और जाति गोंड लिखा था, लेकिन हॉस्टल के रिकॉर्ड में उन्हें क्रिश्चियन दिखाया गया। बच्चों के पूरे कागजात भी नहीं मिले। हैरानी की बात ये कि हॉस्टल में बच्चियों के बाथरूम में कैमरे लगे थे, जो बेहद आपत्तिजनक है। इन 48 बच्चों में 15 लड़कियाँ और 33 लड़के शामिल हैं – जो मंडला, ओडिशा और अनूपपुर से लाए गए थे। बच्चों के माता-पिता की अनुमति के बिना उन्हें धार्मिक गतिविधियों में शामिल किया जा रहा था।

गोंड के साथ बैगा जनजाति के बच्चे भी निशाने पर

मंडला जिले के सामाजिक कार्यकर्ता तारेंद्र चौरसिया ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि बच्चों के हाथ में कलावा, माथे पर तिलक, सब गायब हैं। हिंदू प्रतीकों को मिटा दिया गया है। गोंड बच्चे हैं। पूरी तरह से ईसाई बनाए जा चुके हैं। प्रार्थना में ईशू की प्रार्थना करते हैं, बाइबिल हाथ में लिए रहते हैं। ये सभी बच्चे गोंड और बैगा जनजाति के हैं। बैना जनजाति की संख्या तेजी से खत्म हो रही है और इसमें सबसे बड़ा योगदान इन मिशनरियों का है।

तारेंद्र चौरसिया ने कहा, “सबसे बड़ा विषय यह है कि यहाँ आदिवासी बच्चों के साथ-साथ बैगा जनजाति बच्चों को भी कन्वर्ट किया जा चुका है। बिना माता-पिता के अनुमति के इनको प्रार्थना कराई जाती है एवँ उनके स्कूल फॉर्म में भी क्रिश्चियन रिलिजन लिखा गया है। इसी तरह आदिवासी जिला मंडला में ईसाई मिशनरियों के द्वारा विद्यालय को धर्मांतरण का अड्डा बनाया हुआ है, लगभग सभी स्कूलों में इसी तरह के मामले सामने आ रहे हैं।”

इस मामले से जुड़े वीडियो – फोटो ऑपइंडिया के पास मौजूद हैं। प्रार्थना करने से लेकर एमपी बाल संरक्षण आयोग के सदस्यों से बातचीत तक के, इन वीडियो और अन्य जानकारियों को कार्रवाई के लिए आगे भेजा गया है। हैरानी की बात है कि बामुश्किल 100 परिवारों वाले इस पिछड़े से गाँव में ईसाई मिशनरियाँ करोड़ों खर्च करके स्कूल बना रही हैं और उसमें बच्चों को मामूली फीस पर पढ़ाया जा रहा है। आखिर इसके पीछे का मकसद क्या है और कौन इस काम के लिए पैसे दे रहा है, इसकी जाँच बेहद जरूरी है।

साफ तौर पर ये पूरा मामला ईसाई मिशनरियों की करतूतों की ओर इशारा कर रहा है। बिना अनुमति के स्कूल चलाना, बच्चों का ब्रेनवॉश करना और धर्मांतरण की कोशिश करना गंभीर अपराध है। मुख्य आरोपित ज्योति राज ओडिशा का रहने वाला है और उसके खिलाफ कार्रवाई की माँग तेज हो गई है। प्रशासन से संपर्क कर इस मामले में सख्त कदम उठाने को कहा गया है। ये घटना एक बार फिर सवाल उठाती है कि क्या मिशनरी गतिविधियों के नाम पर बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है?

‘न्यायपालिका का सबसे काला दिन…’ जस्टिस यशवंत वर्मा के ‘ट्रांसफर’ से भड़के इलाहाबाद HC के वकील, बार एसोसिएशन विरोध में उतरा: ‘कैश कांड’ में महिला की एंट्री से जाँचकर्ता भी परेशान

कैश कांड में फँसे दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरण करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (28 मार्च 2025) को जारी कर दी। स्थानांतरण की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे केंद्र स्वीकार कर लिया है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग भी खारिज कर दी। इस बीच जस्टिस वर्मा के घर में किसी रहस्यमयी महिला के आने बात भी सामने आ रही है।

दरअसल, होली के दिन 14 मार्च की रात करीब 11.30 बजे जस्टिस वर्मा के घर में आग लगी थी। उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश में थे। दिल्ली के आधिकारिक आवास में उनकी वृद्ध माँ और बेटी थी। जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने दिल्ली फायर ब्रिगेड को इसकी सूचना दी। दमकल कर्मी जब जस्टिस वर्मा के घर आए तो वहाँ बोरों में भरी हुई नोटों की गड्डियों में आग लगी देखी।

मीडिया में यह खबर सात दिन बाद 21 मार्च को आई। इसके बाद बवाल होने लगे। आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम की बैठक बुलाई और जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने का आदेश जारी कर दिया। वर्मा वहीं से दिल्ली हाई कोर्ट में प्रोन्नत होकर आए थे। उधर, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस वर्मा के स्थानांतरण का विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कूड़ेदान नहीं है।

जस्टिस वर्मा के घर मिली भारी नकदी के मामला तूल पकड़ने लगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय से रिपोर्ट माँगी। रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि गहन जाँच की जरूरत है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय एक आंतरिक जाँच कमिटी बनाई, जो मामले की जाँच कर रही है।

इस बीच एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा कि जस्टिस वर्मा पर FIR दर्ज करने की माँग की। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि इस पर विचार करने से इनकार कर दिया। वहीं, यह मामला संसद में भी गूँजा। बाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अनुमति के बाद ही FIR दर्ज की जा सकती है।

अमित शाह ने यह भी कहा कि CJI संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बताई गई प्रक्रिया के तहत मामले का संज्ञान लिया। उन्होंने जाँच के लिए जजों की एक समिति भी बनाई है। समिति की जाँच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए। इस बीच केेंद्र सरकार ने जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद स्थानांतरण करने की स्वीकृति दे दी और सुप्रीम कोर्ट ने इसका आदेश भी जारी कर दिया।

अधिसूचना में कहा गया है, “राष्ट्रपति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने का निर्णय लिया है।” हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने समिति की जाँच रिपोर्ट आने तक जस्टिस वर्मा को न्यायिक कार्यों से दूर रखने का भी आदेश दिया है। उधर बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल तिवारी ने इसे भारतीय न्यायपालिका का काला दिन बताया और कहा कि इसको लेकर बेमियादी हड़ताल जारी रहेगा।

‘रहस्यमयी महिला’ और जले एवं बचे हुए नोटों की गुमशुदगी

जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में मिली भारी मात्रा में नकदी के मामले में एक महिला की एंट्री हो गई है। मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि जस्टिस वर्मा के घर में आग लगने के कुछ देर बाद एक महिला कार से वहाँ पहुँची थी। महिला ने वहाँ तैनात पुलिस अधिकारियों को अपनी बातों में उलझाया और जस्टिस वर्मा के बंगले के स्टोर रूम में चली गई। कहा जा रहा है कि कुछ पुलिसकर्मी भी उसके साथ गए थे।

इस मामले में दो पुलिस अधिकारी और एक जूनियर अधिकारी जाँच के दायरे में हैं। जाँचकर्ता यह भी जाँच कर रहे हैं कि स्टोर रूम से जले और बिना जले नोटों को हटाने में उस महिला की कोई भूमिका थी और इसमें उसकी किसी पुलिस कर्मी ने सहायता की थी? फिलहाल, वहाँ तैनात 5 पुलिस कर्मियों को अपना मोबाइल पुलिस में जाँच के लिए जमा करने का आदेश दे दिया गया है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जाँच में पता चला है कि जस्टिस वर्मा के घर पर लगी आग में वहाँ रखी नकदी का कुछ ही हिस्सा जला था। वहाँ पर नोटों की गड्डियों से भरे कई बैग रखे थे, जलने से बच गए थे। ऐसे में जाँचकर्ता ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि जले हुए नोटों और जलने से बच गए नोटों से भरे बैगों का क्या हुआ।

यह भी पता लगाया जा रहा है कि घटना वाली रात को जज के आवास से कुछ नकदी निकाली भी गई थी या नहीं। दरअसल, जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोर रूम में 14 मार्च की रात आग लगी थी। यह आग बेहद मामूली थी और 15 मिनट में ही इसे बुझा दिया गया था। हालाँकि, पुलिस और दमकल कर्मी वहाँ 2 घंटे तक रहे थे। यह फायर डिपार्टमेंट की रिपोर्ट में कहा गया है।

म्यांमार-थाईलैंड में विनाशकारी भूकंप, नमाज पढ़ते समय मस्जिद गिरने से 20 की मौत: सोने का पगोड़ा भी गिरा, देखिए तबाही के Videos

म्यांमार में शुक्रवार (28 मार्च 2025) को 7.7 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया, जिसके बाद हर तरफ तबाही फैल गई। इसका असला पड़ोसी देश थाईलैंड में भी पड़ा है, वहाँ भी व्यापक नुकसान की शुरुआती खबर है। स्थानीय समयानुसार दोपहर 12:50 बजे ये धरती काँपी और इसके 12 मिनट बाद 6.8 का झटका फिर लगा। इसका केंद्र सागाइंग शहर से 16 किमी दूर था, सिर्फ 10 किमी की गहराई पर।

खबरों के मुताबिक, म्यांमार में अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है। मांडले में एक मस्जिद ढह गई, जहाँ नमाज पढ़ रहे लोग मलबे में दब गए। वहाँ से 20 मौतों की खबर है। एक यूनिवर्सिटी में आग लग गई और लोग डर से चीखते-भागते दिखे। नेपीडॉ की सड़कें टूट गईं, और 1000 बेड वाला अस्पताल घायलों से भर गया। म्यांमार की सेना ने आपातकाल घोषित कर दुनिया से मदद माँगी है।

इस भूकंप का असर थाईलैंड तक पहुँचा। बैंकॉक में 900 किमी दूर एक 30 मंजिला इमारत ढह गई, जिसमें 78 मजदूर फँस गए। तीन की मौत हो चुकी है। बांग सू के डिप्टी पुलिस चीफ वोरापत सुकथाई ने कहा, “मैंने लोगों को मदद माँगते सुना, पर घायलों की संख्या अभी साफ नहीं।”

इस बीच, थाई पीएम पेतोंगतार्न शिनवात्रा ने आपात बैठक बुलाई और बैंकॉक में आपातकाल लगा दिया। मेट्रो-रेल सेवाएँ बंद कर दी गई हैं, लोग सड़कों पर डरे हुए हैं। भूकंप का असर चीन के युन्नान, भारत के कोलकाता, मणिपुर और बांग्लादेश के ढाका-चटगाँव तक पड़ा है।।

मांडले का मशहूर महामुनि पगोड़ा भी टूट गया, जिसे भारत ने 2020 में ठीक करवाया था। 2016 में भी भूकंप ने इसे तोड़ा था। ये बौद्धों का पवित्र स्थल है, जहाँ हर दिन भक्तों की भीड़ रहती है। अब फिर से मलबे में बदल गया। म्यांमार का सागाइंग फॉल्ट भूकंपों के लिए जाना जाता है।

बता दें कि 1930 से 1956 तक 6 बड़े भूकंप आए थे। साल 2016 में बागान में 6.8 तीव्रता से तीन लोग मारे गए थे। इस बार भी मांडले में इरावदी नदी का पुराना अवा ब्रिज ढह गया। लोग डरे हुए हैं, घरों में जाने की हिम्मत नहीं। म्यांमार की खराब मेडिकल सुविधाएँ मुसीबत बढ़ा रही हैं। हर तरफ अफरा-तफरी है, लोग अपनों को ढूँढ रहे हैं।