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न्यायपालिका में सुधार के लिए आया NJAC, पर सुप्रीम कोर्ट ने ही कर दिया खारिज: जज ही जज नियुक्त करेंगे, जज ही जज की जाँच करेंगे… वाली व्यवस्था से नहीं आएगी पारदर्शिता-जवाबदेही

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिली अघोषित भारी नकदी को लेकर न्यायपालिका में सुधार की जरूरत को एक बार बहस को तेज कर दिया है। न्यायपालिका में सुधार की माँग लंबे समय से हो रही है, लेकिन देश की सर्वोच्च न्यायालय इसे न्यायपालिका में हस्तक्षेप की आशंका जाहिर करके इसे खारिज करता रहा है। वहीं, न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और त्वरित न्याय की माँग लंबे समय से हो रही है।

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आवास पर होली के दिन आग लगने की घटना सामने आई थी। उस समय के सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि दमकल कर्मी आग में जले नोटों की गड्डियों को हटा रहे हैं। इसके लेकर आम लोगों से लेकर विधायिका तक के लोग सवाल उठा रहे हैं कि एक जज के पास इतनी भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी कहाँ से आई।

मामला सामने आने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने जस्टिस वर्मा को उनके गृह हाई कोर्ट इलाबादा भेजने का फैसला सुना दिया। हालाँकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इसका विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कोई कूड़ेदान नहीं है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का भी सोशल मीडिया पर भारी विरोध हुआ। उच्च तबके में भी इसको लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई।

इसके बाद CJI संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद भेजने का फैसले का नकदी मामले से कोई संबंध नहीं है। यह अलग मामला है। हालाँकि, सोशल मीडिया पर लोग पूछने लगे कि जब हाई कोर्ट से पदोन्नत करके जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट लाया गया तो फिर उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट वापस क्यों भेजा जा रहा है। लोगों ने इसे नकदी बरामदी मामले से जोड़ा।

आखिरकार CJI खन्ना ने जस्टिस मामले के दिल्ली स्थित आधारिक आवास में नकदी जलने की घटना का ‘आंतरिक’ जाँच कराने का निर्णय लिया। इस जाँच के लिए तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई है। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति एक तरह की विभागीय जाँच है। इस मामले की जाँच जज ही करेंगे, जज ही निर्णय लेंगे और जज के खिलाफ फैसला सुनाएँगे। इस तरह इस मामले में पारदर्शिता को लेकर बड़ा सवाल उठने लगा है। सोशल मीडिया पर यूजर्स का कहना है कि मामले की जाँच किसी पेशेवर जाँच एजेंसी से कराई जानी चाहिए। इससे न्यायपालिका पर विश्वसनीयता बढ़ेगी।

वहीं, सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल निकम ने कहा है कि स्थानांतरण या निलंबन पर्याप्त नहीं है। संसद को आपराधिक आरोप या महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। दरअसल, यह पहली बार नहीं है कि किसी न्यायाधीश पर इस तरह के गंभीर आरोप लगे हैं। इसके पहले कई जजों पर गंभीर आरोप लग चुके हैं। जजों पर अक्सर भाई-भतीजावाद का भी आरोप लगते रहता है, जो न्यायपालिका में दिखता भी है।

न्यायपालिका पर कब-कब उठे सवाल?

हालाँकि, आजाद भारत में अभी तक सिर्फ एक ही न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई थी। वह थे न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी। हालाँकि, यह प्रस्ताव संसद में पास नहीं हो पाया। बाद में वे सुप्रीम कोर्ट के जज भी बने। रामास्वामी अपने मुख्य न्यायाधीश ससुर की कृपा से जज बने थे। आपातकाल के दौरान उनके ससुर के घर से CBI ने अघोषित नकदी जब्त की थी। इसके कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।

रामास्वामी पर आरोप था कि उन्होंने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उचित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना अपने आधिकारिक अपार्टमेंट में बिस्तर, आलीशान साज-सज्जा और एयर कंडीशनिंग से भरपूर सामान रखने का दोषी पाया गया था। इसके परिणामस्वरूप सन 1990 के दशक में एक बड़ा राजनीतिक और न्यायिक विवाद हुआ था।

इसी तरह का आरोप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मलजीत कौर पर भी था। जस्टिस कौर के घर 13 अगस्त 2008 को 15 लाख रुपए का एक पैकेट पहुँचा। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि पैकेट गलती से जस्टिस कौर के चंडीगढ़ पते पर भेज दिया गया था, जबकि यह पैकेट उसी न्यायालय की सेवारत न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव के लिए था।

उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) केजी बालाकृष्णन थे। CJI केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले सर्वोच्च न्यायालय की कॉलेजियम ने शुरू में उनको क्लिनचिट दे दी। इसके बाद मामले की जाँच कर रही केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने साल 2009 में इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। उस समय निर्मल यादव को उत्तराखंड हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया।

बालाकृष्णन के सेवानिवृत्त होने के बाद मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने अपने पूर्ववर्ती के फैसले की जाँच और जस्टिस यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी। अन्यथा यह मामला चुपचाप खारिज कर दिया जाता। साल 2011 में यादव के सेवानिवृत्त होने के दिन राष्ट्रपति ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दी। 14 साल बाद भी यह मामला विशेष CBI अदालत में लंबित है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एसके गंगेले पर ग्वालियर में एक महिला जिला न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा। इसकी जाँच के लिए 58 सांसदों द्वारा समर्थित प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद अप्रैल 2015 में हामिद अंसारी द्वारा गठित एक समिति द्वारा मंजूरी दी गई थी। साल 2014 में उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा था।

कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन महाभियोग प्रस्ताव का विषय बनने वाले दूसरे न्यायाधीश थे। महाभियोग चलाने से पहले ही उन्होंने सितंबर 2011 में इस्तीफा दे दिया था। कलकत्ता की एक अदालत ने उन्हें तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और 1983 में अपनी कानूनी क्षमता में न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर के रूप में कार्य करते हुए 33.23 लाख रुपए का गबन करने का दोषी ठहराया था।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश पॉल डेनियल दिनाकरन प्रेमकुमार को अगस्त 2009 में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए अनुशंसित किया था। हालाँकि, कानूनी समुदाय के कई प्रतिष्ठित सदस्यों ने उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। दिसंबर 2009 में कॉलेजियम को प्रस्ताव वापस भेज दिया। उन्हें सिक्किम हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया।

जस्टिस दिनाकरन को बर्खास्त करने के लिए 76 सांसदों ने हामिद अंसारी को प्रस्ताव भेजा। इसके बाद अंसारी ने जनवरी 2010 में एक जाँच पैनल बनाया। हालाँकि, जस्टिस दिनाकरन ने समिति में अपनी अविश्वास बताया और आखिरकार 29 जुलाई 2011 को पद से इस्तीफा दे दिया। दिनाकरन पर किसानों की 300 एकड़ से अधिक जमीन कब्जाने सहित 16 गंभीर आरोप लगे थे।

केशवानंद भारती केस और सुप्रीम कोर्ट

भारतीय संसद ने संविधान में 24वाँ संशोधन पारित करके न्यायपालिका के अधिकार और न्यायिक समीक्षा की शक्ति को सीमित दिया था। इसके अलावा, 25वें और 29वें संशोधन को मंजूरी दी गई। इसका उद्देश्य मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करना और संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान को बदलने का अधिकार देना था। तब केरल के एडनार मठ के प्रमुख केशवानंद भारती ने इसको चुनौती दी।

केशवानंद भारती ने इन संशोधनों की वैधता को चुनौती देते हुए दावा किया गया कि ये संशोधन संविधान के मूल ढाँचे के खिलाफ हैं। इसके बाद केशवानंद भारती मामले का सुप्रीम कोर्ट से फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी ढाँचे की अवधारणा और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बरकरार रखते हुए संविधान को बदलने की संसद की क्षमता को सीमित कर दिया था।

यहाँ ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस फैसले के जरिए न्यायपालिका ने अपने अधिकार को खतरे में डालने वाले संशोधनों को पलटने के लिए एक तंत्र विकसित कर दिया और खुद को और भी अधिक शक्ति दे दी। तब से इस फैसले को ‘न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा’ और न्यायिक सुधारों का विरोध करने के लिए लागू किया गया है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम सिस्टम विकसित कर लिया।

कॉलेजियम का खेल

भारत की न्यायपालिका दुनिया की संभवत: अकेली ऐसी न्यायपालिका है, जो अपना नियम भी खुद ही तय करती है। चाहे वह नियुक्ति हो, जाँच हो या कार्रवाई…. इसमें किसी संघीय एजेंसी या किसी अन्य की कोई भूमिका नहीं होती है। इसके लिए कोर्ट ने 1993 में अपने ही निर्णय के आधार पर कॉलेजियम भी बना लिया था, जो पारदर्शिता और जवाबदेही के हिसाब से संदिग्ध है।

इस कॉलेजियम सिस्टम को हटाने के लिए सरकार ने लगातार प्रयास किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट सरकार के निर्णय को ही खारिज कर देता। पिछले कुछ समय में देश के उपराष्ट्रपति से लेकर कानून मंत्री तक कॉलेजियम के खिलाफ बोल चुके हैं। आम लोग भी कॉलेजियम को खत्म करने का समर्थन करते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इन सब बातों पर ध्यान नहीं देता।

कॉलेजियम सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से ही आया है। इसे देश की संसद ने नहीं बनाया है और ना ही संविधान में इसके लिए कोई प्रावधान है। दरअसल, सन 1981 में ‘First Judges Case (गुप्ता केस)’ में कहा गया था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय जजों की नियुक्ति-ट्रांसफर में सर्वोपरि नहीं है। इसके बाद 1993 में ‘कॉलेजियम सिस्टम’ लाया गया।

इस कॉलेजियम सिस्टम में CJI की अध्यक्षता में 2 वरिष्ठतम जजों को डाला गया। सन 1998 में समिति की संख्या 5 कर दी गई। इसमें CJI के अलावा सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम जज होते हैं। इसी तरह हाई कोर्ट में भी ऐसे ही कॉलेजियम करता है। इसमें रिटायर हो रहा CJI ही अपने उत्तराधिकारी की अनुशंसा करता है। यह कुछ-कुछ राजतंत्र जैसा था। कुछ विवादों के बाद ये पद वरिष्ठता के आधार पर दिया जाने लगा।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के मामले में कॉलेजियम पहले केंद्रीय कानून मंत्री को अपनी अनुशंसा भेजता है। वहाँ से यह प्रधानमंत्री के पास जाता है। फिर केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति करते हैं। इस पूरे सिस्टम में कहीं पारदर्शिता नहीं है। साथ ही भाई-भतीजावाद का जबरदस्त बोलबाला है। इसके कारण कई प्रतिभावान जूनियर जज-वकील पीछे रह जाते हैं।

अब तक के जजों की नियुक्ति से इसे समझा जा सकता है। साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट के 38% जजों के परिवार का न्यायपालिका से कनेक्शन है। इससे भाई-भतीजावाद को समझा जा सकता है। इतना नहीं, RTI और लोकपाल के दायरे में सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं आते हैं। इतना ही नहीं, जजों को अपनी संपत्तियाँ घोषित करने की भी जरूरत नहीं होती है, जबकि ब्यूरोक्रेट्स को ऐसा करना होता है।

लचर न्यायिक व्यवस्था के कारण देश की अदालतों में दिसंबर 2024 तक 5.1 करोड़ मामले लंबित हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक हैं। साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 70,852 थी। अगर सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा छुट्टियाँ लेने की बात की जाए तो साल 2022 में वे 83 दिन छुट्टियों पर रहे। अगर 50 दिन रविवार के भी जोड़ दीजिए तो यह संख्या 133 दिन हो जाता है यानी साल के 36% दिन।

विश्व न्याय परियोजना द्वारा प्रकाशित ‘विधि नियम सूचकांक 2023’ में भारत की रैंकिंग न्यायिक विलंबों को प्रदर्शित करती है और बताती है कि भारत में न्यायिक सुधार कितना जरूरी है। इस रिपोर्ट में भारत को नागरिक न्याय में 142 देशों में से 111वें स्थान पर तथा आपराधिक न्याय में 93वें स्थान पर रखा गया है। इन व्यवस्थाओं को देखते हुए न्यायिक सुधार की लगातार माँग की जाती रहती है।

न्यायिक सुधार

‘न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक, 2010’ के जरिए न्यायिक मानक निर्धारित किए थे। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को बर्खास्त करने की प्रक्रिया बनाई बनाई गई। इस विधेयक में न्यायाधीशों की संपत्ति और देनदारियों के साथ-साथ उनकी पत्नी और बच्चों की संपत्ति एवं देनदारियों का खुलासा करना अनिवार्य कर दिया गया था।

विधेयक में ‘राष्ट्रीय न्यायिक निगरानी समिति’ की स्थापना की बात कही गई थी, जो जजों के खिलाफ शिकायतों की जाँच करने वाली एजेंसी बनाने की बात कही गई थी। इसके अलावा, विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया था कि कोई भी व्यक्ति किसी न्यायाधीश के ‘दुर्व्यवहार’ के बारे में निगरानी समिति से शिकायत कर सकता है। बाद में इस बिल को संसद की स्थायी समिति को भेज दिया गया।

मई 2012 में लोकसभा में इस विधेयक को पारित भी कर दिया गया, लेकिन 15वीं लोकसभा के भंग होने के कारण यह समाप्त हो गया। इसमें भ्रष्टाचार और यौन उत्पीड़न के आरोपित जजों की समय सीमा के तहत जाँच की बात कही गई थी। विधेयक में यह भी कहा गया था कि पैनल को शिकायतें मिलने के बाद उन्हें जाँच समिति को भेजा जाएगा और यदि आरोप गंभीर हैं तो अध्यक्ष जाँच का अनुरोध करेंगे।

विधेयक में निगरानी समिति की देखरेख भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) को दिया गया। CJI को जाँच दल गठन करने की शक्ति दी गई। न्यायाधीश के खिलाफ जाँच कैमरे के सामने की जानी चाहिए थी। यदि जाँच के बाद आरोप साबित हो जाते हैं तो न्यायाधीश का न्यायिक कार्य निलंबित किया करने की बात कही गई थी। हालाँकि, इस विधेयक का बड़े पैमाने पर विरोध हुआ।

विधि आयोग के तत्कालीन प्रमुख और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह ने कहा कि इसका न्यायिक स्वतंत्रता पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विधेयक संविधान द्वारा उच्च न्यायपालिका को दी गई सुरक्षा का उल्लंघन करता है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के वर्तमान जज द्वारा कदाचार का दावा करने वाली सार्वजनिक शिकायतों की अनुमति देता है, जिसके कारण उन पर महाभियोग चलाया जा सकता है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC)

साल 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सरकार ने न्यायिक क्षेत्रों में भी सुधार करने की कोशिश की थी। मोदी सरकार साल 2014 में संविधान में 99वाँ संशोधन करके नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन (NJAC) अधिनियम लेकर आई। इसमें सरकार ने कॉलेजियम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए ‘NJAC’ के प्रावधानों को शामिल किया था।

NJAC में 6 सदस्यों का प्रावधान किया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं। इन दो विशेषज्ञों का चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मिलकर करेंगे। इसमें यह भी प्रावधान है कि ये दो विशेषज्ञ हर तीन साल पर बदलते रहेंगे।

इसके साथ ही साल 2014 में संविधान संशोधन करके केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति के मामले में बड़ा बदलाव किया। इस संशोधन में संसद को यह अधिकार दिया गया कि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से जुड़े नियमों को बना सकता है और जरूरत पड़ी तो उसमें बदलाव भी कर सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा इस कानून को बनाने के बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्युडिशियल अप्वाइंटमेंट्स कमीशन अधिनियम को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘संविधान के आधारभूत ढाँचे से छेड़छाड़’ बताया। बता दें कि संविधान में सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में बताया गया है, जबकि देश में कानून बनाने का अधिकार सरकार और संसद के पास ही है।

जो जैसे समझे, उसे उसी भाषा में समझाना जरूरी: ‘बुलडोजर सिस्टम’ पर बोले CM योगी, कहा- भलाई के काम नहीं करता वक्फ बोर्ड, जब हिंदू रहेंगे सेफ तभी मुस्लिम भी होंगे सुरक्षित

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि 100 मुस्लिम परिवारों के 50 हिन्दू सुरक्षित नहीं हो सकते। उन्होंने कहा है कि वक्फ बिल से मुस्लिमों को भी फायदा होगा। सीएम योगी ने स्पष्ट किया है कि हर व्यक्ति को कानून के दायरे में रह कर सबक सिखाया जाएगा।

यह सारी बातें सीएम योगी आदित्यनाथ ने बुधवार (26 मार्च, 2025) को ANI के एक पॉडकास्ट में की है। उन्होंने कहा कि एक योगी के रूप में वह सभी की खुशी की कामना करते हैं। सीएम योगी ने कहा कि वह ‘सबका साथ-सबका विकास’ में विश्वास रखते हैं। इस पॉडकास्‍ट में सीएम योगी ने वक्फ बिल, मुसलमानों की सुरक्षा और बुल्डोजर जस्टिस पर अपनी राय रखी।

सीएम योगी ने कहा, “100 हिंदू परिवारों के बीच एक मुस्लिम परिवार सबसे सुरक्षित है। उन्हें अपने सभी धार्मिक कार्यों का पालन करने की स्वतंत्रता होगी, लेकिन क्या 100 मुस्लिम परिवारों के बीच 50 हिंदू सुरक्षित हो सकते हैं? नहीं। बांग्लादेश इसका उदाहरण है। इससे पहले पाकिस्तान इसका उदाहरण था। अफगानिस्तान में क्या हुआ? अगर धुआँ है या किसी को चोट लग रही है, तो हमें इससे पहले ही सावधान हो जाना चाहिए। इसी बात का ध्यान रखने की जरूरत है।” उन्होंने कहा कि वह सभी के साथ समान व्यवहार करते हैं।

सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की सुरक्षा पर बात की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुसलमान सबसे सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा, “अगर हिंदू सुरक्षित हैं, तो मुसलमान भी सुरक्षित हैं। अगर 2017 से पहले यूपी में दंगे होते थे, अगर हिंदुओं की दुकानें जल रही थीं, तो मुसलमानों की दुकानें भी जल रही थीं। अगर हिंदुओं के घर जल रहे थे, तो मुसलमानों के घर भी जल रहे थे। 2017 के बाद दंगे बंद हो गए।”

सीएम योगी ने कहा, “मैं एक साधारण नागरिक हूँ, उत्तर प्रदेश का नागरिक हूँ और मैं एक योगी हूँ, जो सभी की खुशी की कामना करता हूँ। मैं सभी के साथ और विकास में विश्वास करता हूँ।”

वक्फ बिल से मुसलमानों और देश को फायदा

सीएम योगी ने इस पॉडकास्ट के दौरान वक्फ बिल को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा, ” मस्जिद लेकर क्या करेगी? वक्फ बिल के बारे में लोगों को गुमराह किया जा रहा है। वक्फ के नाम पर कितनी जमीनों पर कब्जा किया जाएगा?”

सीएम योगी ने कहा, “वक्फ के नाम पर आज तक एक भी समाज कल्याण का काम नहीं किया गया है। उसके नाम पर जो भी आता है उसका व्यक्तिगत लाभ लिया जाता है। औने-पौने दाम पर बेचा जाता है। एक ही जमान को कई लोगों को बेचा है। इससे इनके लिए भा संकट आएगा और जिसने खरीदा उसके ऊपर भी संकट आएगा।”

पिछले सालों में वक्फ को लेकर हुई गड़बड़ियों पर सीएम योगी ने कहा, “वक्फ के नाम पर पिछली सरकारों में कई ऊल-जुलूल फैसले लिए गए हैं। जिस जमीन को वक्फ ने कहा हमारी है, वो उन्हें दे दी गई। आपको ये ताकत किसने दी कि आप किसी भी स्थल को कब्जा कर लेंगे? वक्फ संशोधन अधिनियम आज की आवश्यकता है। ये देश और मुसलमानों के हित में है।”

बुलडोजर एक्शन पर बोले सीएम

बुलडोजर जस्टिस को लेकर किए गए सवालों पर सीएम योगी ने कहा, “जो न्याय में विश्वास रखते हैं उन्हें न्याय मिलता है और जो स्वयं कानून को अपने हाथ में लेते हैं, उन्हें कानून के दायरे में रहकर सबक सिखाया जाता है। जो जैसे समझेगा, उसे उसी भाषा में समझाना चाहिए। कोई हिंसक बनकर प्रहार करने सामने आ जाए तो सामने गिड़गिड़ाऐ, ये तो नहीं होगा, उस हिंसा का प्रतिकार तो करना होगा।”

सीएम योगी ने स्पष्ट किया कि अपराध के रोग को हटाना जरूरी है।

नुपुर शर्मा को मौत की धमकी, नारा दिया- जो सूफी की बात करेगा, वही भारत पर राज करेगा: जानिए कौन है नागपुर दंगों में गिरफ्तार हुआ हामिद इंजीनियर

नागपुर में हिंदू विरोधी मुस्लिमों की हिंसा केस में माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) का कार्यकारी अध्यक्ष मोहम्मद हामिद इंजीनियर पुलिस के हत्थे चढ़ गया। नागपुर पुलिस ने ये गिरफ्तारी 17 मार्च 2025 को नागपुर के हिंदू विरोधी हिंसा मामले में हुई। हामिद एक समय मुस्लिम समुदाय का बड़ा चेहरा था और 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल रहा था। मगर अब उस पर देशद्रोह और दंगे भड़काने जैसे संगीन इल्जाम हैं। पुलिस ने कहा कि हामिद ने भड़काऊ भाषणों से माहौल खराब किया और दंगों के सरगना फहीम खान की मेंटरिंग की।

साल 2022 में हामिद तब चर्चा में आया था जब उसने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा को जान से मारने की धमकी दी थी। नागपुर के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (DCP) लोहित मटानी ने उसकी गिरफ्तारी की तस्दीक की।

सरकारी नौकरी से कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा तक

हामिद ने शुरुआत में महाराष्ट्र के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) में नौकरी की थी, इसीलिए लोग उसे ‘इंजीनियर’ कहने लगे। साल 2002 में वो लोगों की नजर में आया जब नागपुर के मोमिनपुरा में एक मस्जिद पर कब्जे का झगड़ा हुआ। मस्जिद पहले अहले सुन्नत जमात के पास थी, लेकिन तबलीगी जमात के लोगों ने उस पर कब्जा कर लिया। तबलीगी जमात देवबंदी विचारधारा से जुड़ा समूह है, जो कई बार कट्टरपंथी हरकतों में फंसा है। हामिद बरेलवी स्कूल से था, और इन दोनों में गहरे मतभेद हैं।

इस झगड़े के बाद हामिद ने कट्टरपंथ की राह पकड़ ली। उसने ‘ईमान तंजीम’ नाम का एक ग्रुप बनाया, जो बरेलवी सुन्नी पहचान और सूफी ढोंग को बचाने का दावा करता था। हामिद ने एक भाषण में कहा था, “हमें लगा कि प्रशासन हमेशा सियासी दबदबे वालों का साथ देता है, इसलिए ईमान तंजीम बनाया।”

हामिद को वहाबी और देवबंदी विचारों का सुन्नी संस्थानों पर कब्जा बर्दाश्त नहीं था। वो जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों पर खुलकर हमला बोलता था। उसने मौलाना अबुल कलाम आजाद को निशाने पर लेते हुए कहा था कि अबुल कलाम आजाद ने बरेलवी हितों को कुचल दिया था। उसके भाषण ज्यादातर सूफी ढोंग, दरगाहों का धंधा और पैगंबर के नाम पर कट्टरता फैलाने वाले होते थे।

साल 2009 में हामिद ने माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) बनाई। इसका नारा था, “जो सूफी संतों की बात करेगा, वही भारत पर राज करेगा”। इससे उसकी कट्टर सोच साफ दिखती थी। MDP ने कई राज्यों में चुनाव लड़ा, लेकिन कहीं कामयाबी नहीं मिली। फिर भी सांप्रदायिक तनाव के मौके पर ये पार्टी सड़कों पर कूद पड़ती थी।

सूफी बनकर की थी पीएम मोदी से मुलाकात

साल 2015 में हामिद चर्चा में तब आया था, जब उसने पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। ये मुलाकात पीएम की सूफी पहल के तहत हुई थी, जिसमें पहला मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल था। हामिद ने वहाँ वहाबी विचारधारा के बढ़ते असर का रोना रोया था।

उसने पीएम मोदी से कहा था, “सुन्नी वक्फ बोर्ड पर कट्टर सोच हावी हो गई है। कई सुन्नी संस्थानों पर कब्जा हो गया है, जहाँ कट्टरपंथी विचार फैलाए जा रहे हैं। अगर ये सोच भारत में फैली, तो देश के लिए खतरा होगा।”

उसने अहले सुन्नतुल जमात के लिए अलग वक्फ बोर्ड की माँग करते हुए कहा, “वहाबियों को उनका अलग वहाबी वक्फ बोर्ड दे दो।” उस वक्त कुछ लोग उसे नरम सूफी आवाज समझ बैठे, जो कट्टर इस्लामी जवाब दे रहा था।

पैगंबर के नाम पर धमकियों भरा अतीत

हामिद 15 साल पहले नजर में आया था, जब उसके टैबलॉयड ‘इमाम की आवाज’ में गुजरात और जयपुर में सिलसिलेवार बम धमाकों की बात कही गई। उसकी कॉपियाँ गुजरात के बड़े पुलिस अफसरों को भेजी गईं। हामिद ने सफाई दी कि मुस्लिम समुदाय में गुटबाजी और खूनखराबे की बात कर रहा था।

साल 2011 में उसे हिरासत में लिया गया था, जब मोमिनपुरा में कथित सूफी संत बाबा मुस्तफा के दफन को लेकर भीड़ ने हिंसा की थी। इस हंगामे में उसकी बड़ी भूमिका थी, जो आपसी झगड़ों से जुड़ी थी।

हामिद की कट्टरता 2022 में खुलकर सामने आई, जब उसने नुपुर शर्मा के खिलाफ जहरीले बयान दिए। जून 2022 के पहले हफ्ते में नागपुर में MDP के बैनर तले प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें उसने नुपुर शर्मा और दिल्ली बीजेपी के पूर्व नेता नवीन जिंदल को मौत की धमकी दी।

उसने कहा, “पैगंबर मोहम्मद की शान में गुस्ताखी करने की एक ही सजा है – मौत। कोई आपको रोक नहीं सकता। आप अपनी मौत का फरमान लिख रहे हैं।” उसने 2019 में कमलेश तिवारी की हत्या का हवाला देते हुए कहा, “ये मत सोचो कि मामला सुलझ गया तो आप बच जाओगे। ईशनिंदा मत करो।”

यही वो वक्त था जब MDP सिर्फ नाम की पार्टी से आगे बढ़कर सड़कों पर कट्टर आंदोलन करने लगी। ये लोग इस्लाम का अपमान करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग लेकर हंगामा करते थे।

नागपुर में हिंदू विरोधी दंगों में रहा शामिल

बता दें कि 17 मार्च 2025 को नागपुर के महाल इलाके में मुस्लिमों ने हिंदुओं पर हमले किए थे। जिसमें हिंदुओं के घरों, गाड़ियों को निशाना बनाया गया, साथ ही पुलिस वालों पर भी हमले किए गए थे। अफवाह फैली कि कुरान का अपमान हुआ। ये अफवाह तब उड़ी जब हिंदू संगठन खुल्दाबाद में औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे।

पुलिस का कहना है कि MDP के नागपुर शहर अध्यक्ष फहीम खान ने इन अफवाहों को हवा दी। उसने भड़काऊ वीडियो फैलाकर उत्तरी और मध्य नागपुर में भीड़ जुटाई। 19 मार्च 2025 को उसे दंगों का सरगना बताकर पकड़ा गया।

फहीम की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की नजर हामिद इंजीनियर पर पड़ी। हामिद ने फहीम की गिरफ्तारी का विरोध किया और फहीम के समर्थन में बयानबाजी की। इस दौरान उसने यूट्यूब चैनल पर जहरीले बयान दिए, जिसके बाद 21 मार्च 2025 को पुलिस ने उसे धर दबोचा। उसके साथ ही यूट्यूबर मोहम्मद शहजाद खान को भी पकड़ा गया था, जो उसकी पार्टी MDP का सदस्य है।

साध्वी प्रज्ञा से दिशा सालियान तक परमबीर सिंह की वर्दी पर छींटे कई, जब सलमान खान को खोज रही थी मुंबई पुलिस तब उनके साथ कर रहे थे पार्टी: ‘भगोड़ा’ भी घोषित कर चुकी है कोर्ट, जानिए इनसे जुड़े विवाद

दिशा सालियान की मौत के मामले में उनके पिता सतीश सालियान ने मुंबई पुलिस में लिखित शिकायत देकर शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे, एक्टर डिनो मोरिया, सूरज पंचोली और कुछ पुलिस वालों के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। सतीश का दावा है कि उनकी बेटी के साथ गैंगरेप हुआ और फिर उसकी हत्या कर दी गई। इस शिकायत में आदित्य ठाकरे को मुख्य आरोपित बताया गया है, साथ ही तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर सच को दबाने का इल्जाम लगाया गया है। वकील नीलेश ओझा ने कहा कि ये शिकायत जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस ने स्वीकार कर ली है और इसमें परमबीर सिंह का नाम भी है, जो उस वक्त मुंबई पुलिस कमिश्नर थे। ओझा का कहना है कि परमबीर ने सबूत मिटाने और मामले को रफा-दफा करने में अहम रोल निभाया।

परमबीर सिंह को इस FIR में कवरअप का मास्टरमाइंड कहा गया है। शिकायत में दावा है कि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके झूठ बोला और आदित्य ठाकरे को बचाने की कोशिश की। सतीश सालियान और उनके वकील का आरोप है कि परमबीर ने पुलिस की ताकत का गलत इस्तेमाल किया और सच को सामने आने से रोका। ये पहली बार नहीं है जब परमबीर सिंह किसी विवाद में फँसे हों। परमबीर का नाम पहले भी कई बड़े मामलों में आ चुका है, जहाँ उन पर गंभीर इल्जाम लगे हैं।

कर्नल पुरोहित को यातनाएँ देने में परमबीर सिंह रहा आगे

साल 2008 के मालेगांव बम धमाके में कर्नल श्रीकांत पुरोहित को आरोपित बनाया गया था। कर्नल ने कोर्ट में बताया कि परमबीर सिंह और ATS के अफसरों ने उन्हें टॉर्चर किया। उनके साथ मारपीट, गालियाँ और प्राइवेट पार्ट्स पर हमला किया गया, ताकि वो ‘भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव कबूल लें। कर्नल का कहना है कि परमबीर ने कॉन्ग्रेस की शह पर उन्हें फँसाया और उनकी जिंदगी बर्बाद कर दी।

सलमान खान के साथ पार्टी करता था परमबीर

साल 2012 में सलमान खान के हिट एंड रन केस में समन नहीं पहुँचा, क्योंकि पुलिस ने कहा वो शहर से बाहर हैं। बाद में खुलासा हुआ कि सलमान उस वक्त मुंबई में ही थे और परमबीर सिंह के साथ पार्टी कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, परमबीर ने सलमान को बचाने की कोशिश की। इसने सवाल उठाया कि क्या परमबीर बड़े लोगों को फायदा पहुँचाने में लगे थे।

परमबीर ने छिपाया 26/11 हमले के दोषी कसाब का फोन

रिटायर्ड ACP शमशेर खान पठान ने दावा किया कि 26/11 हमले में कसाब के पास से मिला फोन परमबीर ने अपने पास रख लिया। इस फोन से पाकिस्तान के हैंडलर्स का पता चल सकता था, लेकिन परमबीर ने इसे जाँच टीम को नहीं दिया। पठान ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को लिखे पत्र में कहा था कि 26/11 के बाद कसाब के पास से मिले जिस फोन को परमबीर सिंह ने जब्त किया, कथित तौर पर उसी फ़ोन पर कसाब को उसके आका पाकिस्तान से ऑर्डर दे रहे थे।

साध्वी प्रज्ञा पर भी किया अत्याचार

परमबीर सिंह पर साध्वी प्रज्ञा को प्रताड़ित करने के गंभीर आरोप हैं। प्रज्ञा ने कहा था कि मालेगांव केस में उन्हें हिरासत में टॉर्चर किया गया, उन्हें बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उन्हें वेंटीलेटर तक पर जाना पड़ा। उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गई। उन्हें पोर्न दिखाकर भद्दे सवाल पूछे गए। साध्वी का दावा है कि परमबीर ने ‘भगवा आतंक’ का झूठा नैरेटिव बनाने के लिए ये सब किया।

26/11 हमले के समय नहीं निभाया फर्ज

मुंबई अटैक 26/11 के दौरान परमबीर सिंह पर आतंकियों से मुकाबला करने से इनकार करने का आरोप लगा। तत्कालीन कमिश्नर हसन गफूर ने कहा कि परमबीर और कुछ अफसर ड्यूटी से पीछे हट गए। एक PIL में भी दावा किया गया कि उनकी लापरवाही से कई जानें बचाई जा सकती थीं। बता दें कि 2009 में 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के तुरंत बाद हमले के दौरान कर्तव्य की लापरवाही के आरोप में परमबीर सिंह और तीन अन्य अतिरिक्त पुलिस कमिश्नरों के खिलाफ याचिका दायर की गई थी।

सिंचाई घोटाले में अजित पवार को दी थी क्लीनचिट

महाराष्ट्र में ACB के डीजी रहते हुए परमबीर ने अजित पवार को सिंचाई घोटाले में क्लीनचिट दे दी। इस घोटाले में अजित पर करोड़ों के गबन का आरोप था। परमबीर के इस फैसले पर सवाल उठे कि क्या उन्होंने राजनीतिक दबाव में ऐसा किया।

ड्रग केस में सलिल चतुर्वेदी को फँसाने का आरोप

साल 2009 में परमबीर पर प्रोवोग के को-ओनर सलिल चतुर्वेदी को ड्रग केस में फँसाने का इल्जाम लगा। CID की जाँच में पता चला कि परमबीर की टीम ने चतुर्वेदी के घर में कोकीन प्लांट की थी। बाद में चतुर्वेदी बरी हो गए।

जबरन वसूली के केस में कोर्ट में घोषित किया था भगोड़ा

2021 में परमबीर पर होटल कारोबारी बिमल अग्रवाल से 11 लाख की वसूली का केस दर्ज हुआ। समन के बावजूद वो पेश नहीं हुए। मुंबई कोर्ट ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया और संपत्ति कुर्क करने की बात कही।

परमबीर सिंह का करियर विवादों से भरा रहा। 2021 में मुंबई कोर्ट ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया था, लेकिन बाद में महाराष्ट्र सरकार ने कुछ केस वापस ले लिए। आज वो मुंबई के लीलावती अस्पताल में डायरेक्टर हैं। पुलिस की वर्दी से अस्पताल के बोर्डरूम तक का उनका सफर सवाल उठाता है कि क्या सच को दबाने और विवादों से बचने की उनकी कला ही उन्हें आगे ले गई। दिशा सालियान केस में उनका नाम फिर से चर्चा में है, लेकिन क्या इस बार सच सामने आएगा, ये वक्त ही बताएगा।

संभल में सपा नेता ने भाजपा के गुलफाम यादव को जहरीले इंजेक्शन से मरवाया था, जेल से छुड़वाए थे हत्यारे: ब्लॉक प्रमुख बेटा की कुर्सी बचाने को रची साजिश

उत्तर प्रदेश के संभल में भाजपा नेता गुलफाम यादव की हत्या सपा नेता महेश यादव ने करवाई थी। महेश यादव ने अपने बेटे का ब्लॉक प्रमुख बचाने को लेकर यह हत्या करवाई है। महेश यादव ने इस हत्या के लिए बरेली जेल से एक अपराधी की जमानत करवाई थी। पुलिस ने अब महेश यादव, उसके बेटे समेत हत्यारों को गिरफ्तार कर लिया है।

इस घटना की साजिश का पूरा खुलासा संभल के एसपी कृष्ण कुमार ने मंगलवार (25 मार्च, 2025) को किया है। एसपी कृष्ण कुमार ने बताया कि इस मामले में जुनावई ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रवि यादव, उसके पिता और ग्राम प्रधान महेश यादव, मुकेश यादव, रामनिवास, सुधीर और विकास को गिरफ्तार किया गया है। एसपी ने बताया है कि हत्या मामले में 3 लोग फरार हैं।

ब्लॉक प्रमुख पद की थी लड़ाई

एसपी कृष्ण कुमार ने बताया कि ब्लॉक प्रमुख रवि यादव के खिलाफ गुलफाम यादव अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले थे। बताया गया है कि गुलफाम अपने बेटे को ब्लॉक प्रमुख बनाना चाहते थे। इसके चलते रवि यादव का पिता महेश यादव परेशान था। इसके बाद उसने गुलफाम यादव की हत्या की योजना बनाई। इसके लिए उसने अपराधियों का सहारा लेने का निर्णय लिया।

महेश यादव ने इसके बाद बरेली जेल में बंद अपराधी धर्मवीर उर्फ़ धम्मा से मुलाक़ात की। यह मुलाकात 19 नवम्बर, 2024 को जेल के भीतर ही हुई थी। धम्मा को महेश यादव ने हत्या के बदले जमानत करवाने की बात कही। धम्मा जब इस हत्या के लिए राजी हो गया तो उसकी जमानत का इंतजाम किया गया।

इस जमानत के लिए ₹35 हजार का खर्च हुआ। धम्मा इसके बाद जेल से बाहर आ गया। महेश यादव ने ₹1 लाख और धम्म पर खर्च किए। इसके जरिए धम्मा का गिरवीं पड़ा ट्रैक्टर छुड़वाया गया। महेश यादव ने इसके बाद हत्या की प्लानिंग की।

महेश यादव ने साजिश रची कि हत्या चुपचाप तरीके से की जाए, जिससे किसी को पता ना चले। इसी के लिए जहरीले केमिकल वाला इंजेक्शन लगाने की योजना बनाई गई। धम्मा ने इस साजिश में नेमपाल और महेश यादव को भी शामिल कर लिया।

इंजेक्शन की नेमपाल ने दी सलाह

नेमपाल ने धम्मा को इंजेक्शन से हत्या की सलाह दी थी। नेमपाल रामनिवास नाम के शख्स से यह जहरीला इंजेक्शन लाया था। जेल से बाहर आने के बाद धम्मा गुलफाम से नजदीकियाँ भी बढाने लगा था। वह उनके पास उठता-बैठता था। हत्या वाले दिन (10 मार्च, 2025) भी धम्मा गुलफाम के पास जाकर बैठ गया था।

नेमपाल और महेश इसके बाद घर के भीतर गए और गुलफाम यादव के इंजेक्शन लगा दिया। इससे उनकी मौत हो गई। हत्या के बाद तीनों फरार हो गए। हत्या करवाने वाले महेश यादव ने धम्मा समेत बाकी को कई दिनों तक शरण भी दी। वहीं पुलिस ने इस मामले में हत्या के बाद जाँच चालू की थी।

अंतत: उसने इस मामले का खुलासा किया और जुनावई के पास से ही इन लोगों को गिरफ्तार किया है। एसपी कृष्ण कुमार ने बताया है कि नेमपाल और धम्मा अभी भी फरार हैं और उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास किया जा रहा है।

मुलायम सिंह यादव के खिलाफ लड़ चुके थे गुलफाम

धर्मवीर उर्फ़ धम्मा ने जिन गुलफाम यादव की हत्या कर दी, वह संभल और पड़ोसी जिले कासगंज की राजनीति में बड़ा नाम थे। वह राज्य पिछड़ा आयोग में सदस्य रहे थे। उनकी पत्नी 3 बार से लगातार प्रधान हैं। उनका बेटा दिव्य प्रकाश ब्लॉक प्रमुख रह चुका है। उसी को दोबारा प्रमुख बनाने की जुगत में गुलफाम यादव थे।

जिस गुन्नौर इलाके से गुलफाम यादव आते थे, वहाँ यादव जनसंख्या काफी अधिक है। वह भाजपा के पुराने कार्यकर्ता थे और 2007 में भी विधानसभा चुनाव गुन्नौर विधानसभा से लड़ चुके थे। उन्होंने 2004 में भी मुलायम सिंह यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन हार गए थे।

मस्जिद में घुस गया कुत्ता, मुस्लिम भीड़ ने शिव मंदिर में कीर्तन कर रही हिंदू महिलाओं पर कर दिया पथराव: लाठी-डंडों से भी किया वार, UP के मुरादाबाद में भारी फोर्स तैनात

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद स्थित एक गाँव की मस्जिद में पालतू कुत्ता घुस जाने पर दो समूहों के बीच विवाद हो गया। इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने तरावीह की नमाज के बाद मंदिर में कीर्तन कर रही महिलाओं पर जमकर पथराव कर दिया। हालात को देखते हुए एसपी ग्रामीण ने गाँव में फ्लैग मार्च किया और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया है। इस मामले में 30 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

यह घटना जिले के बिलारी थाना क्षेत्र के बहादुरपुर गाँव की है। यहाँ सोमवार (24 मार्च 2025) की शाम को गाँव के ही विनोद कश्यप का पालतू कुत्ता मस्जिद में घुस गया। कुत्ते को असलम के बेटे ईशान ने ईंट मार दिया। हिंदू पक्ष ने कुत्ते को ईंट मारने का विरोध किया। यह बात दोनों समुदायों के बीच तनाव का कारण बन गया। हालाँकि, कुछ लोगों ने बीच-बचाव करके मामले को शांत करा दिया।

उसी दिन शाम को रमजान के महीने में होने वाली तरावीह की नमाज के बाद मुस्लिमों ने हंगामा कर दिया। तकरीबन 25-30 मुस्लिमों की भीड़ ने गाँव के मंदिर में भजन-कीर्तन कर रहीं रही कुछ महिलाओं पर पथराव कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने हिंदू पक्ष पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया और उन्हें बुरी तरह पीटा। कीर्तन में विनोद नाम का व्यक्ति भी शामिल था, जिसका कुत्ता मस्जिद में घुसा था।

भीड़ में शामिल गाँव के ही असलम, शरीफ, रफीक, ईशान आदि ने धमकी देते हुए विनोद पर जानलेवा हमला कर दिया और उसका गला दबोचकर उसे दबाने की कोशिश की। उन्होंने विनोद और उसके भतीजे पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया और बुरे तरीके से पिटाई की। हमले की बात सुनकर हिंदू भी अपने घरों से बाहर आ गए। लोगों को आता देखकर आरोपित मौके से फरार हो गए।

इस घटना की जानकारी किसी ने पुलिस को दे दी। घटना का पता चलते ही पुलिस अधीक्षक ग्रामीण आकाश सिंह और सीओ राजेश तिवारी भारी संख्या में पुलिस बल लेकर मौके पर पहुँच गया। पुलिस ने एंबुलेंस बुलाकर घायलों को तुरंत अस्पताल भेजवाया। पुलिस ने विनोद कश्यप की तहरीर पर 30 आरोपितों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया है।

जिन आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया हैं, उनके नाम हैं- असलम, शरीफ, रफीक, ईशान, मिसबाहुल, अकरम, शकील, तौफीक, सफीक, अल्ली, फिरासत, इरफान, मजीद, शफीक, रिजवान, सलीम और उसके चार लड़के। इसके अलावा, पुलिस ने कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है। पुलिस ने मौके से असलम, ईशान, शफीक और रफीक को गिरफ्तार कर लिया है। बाकी की तलाश की जा रही है।

बता दें कि बहादरपुर गाँव में मंदिर और मस्जिद एक ही रास्ते पर स्थित हैं। दोनों के बीच की दूरी सिर्फ 80 मीटर ही है। वहीं, बहादुरपुर गाँव में तीन चौथाई संख्या बहुसंख्यकों की है। वहीं, गाँव में एक चौथाई अल्पसंख्यक वर्ग के लोग हैं। गाँव के बुजुर्गों का कहना है कि इस गाँव में इससे पहले कभी कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं हुआ है।

अमानवीय, संवेदनहीन, घृणित… सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर लगाई रोक, ‘स्तन दबाने-पायजामा खोलने’ को रेप का प्रयास नहीं मानने का मामला: बच्ची को खींचकर ले गए थे 3 युवक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी ‘स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास नहीं है’ को संवेदनहीन और घिनौना बताया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट के फैसले पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए उस पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की बेंच ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए बुधवार (26 मार्च) को सुनवाई की।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने हाई कोर्ट पर अपनी कड़ी असहमति व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हमें यह कहते हुए कष्ट हो रहा है कि (इलाहाबाद हाई कोर्ट की) विवादित आदेश में की गई कुछ टिप्पणियाँ निर्णय लिखने वाले जज की ओर से संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाती हैं।”

पीठ ने कहा कि यह फैसला अचानक नहीं सुनाया गया था, बल्कि करीब चार महीने तक इसे सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया है। इसका मतलब यह है कि न्यायाधीश ने उचित विचार-विमर्श और दिमाग लगाने के बाद फैसला सुनाया है। पीठ ने कहा कि ये टिप्पणी कानून के सिद्धांतों से पूरी तरह विपरीत हैं और यह संवेदनहीन एवं अमानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। इसलिए टिप्पणियों पर रोक लगाना मजबूरी है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भारत संघ, उत्तर प्रदेश राज्य के साथ-साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट में पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। वहीं, भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी पेश हुए और उन्होंने फैसले की निंदा करते हुए इसे चौंकाने वाला बताया। दरअसल, सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था। अदालत ने इसी का संज्ञान लिया है।

इससे पहले जस्टिस बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने इस मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया था। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की वकील अंजलि पटेल ने याचिका दाखिल कर हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करने की माँग की थी। साथ ही हाई कोर्ट के जजों द्वारा की जाने वाली अनुचित टिप्पणियों को देखते हुए जजों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करने की माँग की थी।

इस मामले पर 24 मार्च को पेश वकील ने जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस पीबी वराले की खंडपीठ के समक्ष दलीलें शुरू करते हुए ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ की बात कही। इसके तुरंत बाद जस्टिस बेला त्रिवेदी ने वकील को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके साथ ही कहा कि कहा कि कोर्ट में ‘लेक्चरबाजी’ की अनुमति नहीं होनी चाहिए। इसके बाद जस्टिस बेला त्रिवेदी ने याचिका को खारिज कर दी।

बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की एकल पीठ ने 14 मार्च को कासगंज में एक नाबालिग लड़की से हुए यौन उत्पीड़न के एक मामले में सुनवाई के दौरान यह विवादित टिप्पणी की थी। जस्टिस मिश्रा ने कहा था कि किसी लड़की का स्तन पकड़ना, उसके पायजामे के नाड़े तोड़ना और उसे पुलिया के नीचे खींचना… रेप या रेप के प्रयास वाले अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।

जस्टिस मिश्रा ने अपने फैसले में इसके पीछे यह तर्क दिया था कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपितों की कार्रवाई अपराध करने की तैयारी से आगे बढ़ चुकी थी। अदालत ने कहा था कि बलात्कार के प्रयास और अपराध की तैयारी के बीच अंतर को सही तरीके से समझना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को संशोधित करने का भी निर्देश दिया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का देश भर में जमकर आलोचना हुई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के नए बेंच ने एक चिट्ठी के आधार पर मामले का संज्ञान लिया। बता दें कि यह मामला 11 वर्षीय लड़की से संबंधित है। 10 नवंबर 2021 को आरोपित पवन, आकाश और अशोक ने पुलिया के नीचे खींचकर लेकर जाने की कोशिश करते हुए यौन उत्पीड़न की थी। आरोपितों में से एक ने बच्ची के स्तन दबाए थे।

वहीं, दूसरे आरोपित ने पीड़िता बच्ची के पायजामे का नाड़ा खोल दिया था। जब लड़की चिल्लाने लगी तो शोर सुनकर वहाँ से गुजर रहे लोगों ने हस्तक्षेप किया। इसके बाद आरोपित फरार हो गए। बाद में पॉक्सो एक्ट की धाराओं में केस दर्ज हुआ। निचली अदालत ने इसको लेकर समन जारी किया। इसके बाद आरोपित पक्ष इसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा। यहाँ इन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने रेप नहीं किया।

‘चर्च में ही गंदा काम करता था पादरी बजिंदर’: यौन शोषण पीड़िता ने NCW को सुनाई आपबीती, जिसको मारे थप्पड़ उसने बताया- रेप के केस में मेरे पति को फँसाना चाहता है

पंजाब में चंगाई सभाएँ करवाने वाले पादरी पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली पीड़िता ने राष्ट्रीय महिला आयोग की पदाधिकरियों से मुलाक़ात की है। पीड़िता ने अपनी पूरी आपबीती आयोग को सुनाई है। पीड़िता ने कहा है कि अब उसे पादरी बजिंदर सिंह पर कार्रवाई की उम्मीद जगी है।

इस बीच पंजाब पुलिस ने पादरी बजिंदर सिंह के खिलाफ एक और महिला से मारपीट के मामले में FIR दर्ज कर ली है। इस महिला ने बताया है कि वह चर्च छोड़ना चाहती थी, जिसके चलते उसे बजिंदर सिंह ने पीटा। महिला ने बताया है कि उसके पति को भी झूठे केस फँसाए जाने की कोशिश बजिंदर सिंह कर रहा था।

यौन शोषण की पीड़िता बोली- मेरी पूरी बात सुनी

बजिंदर सिंह के खिलाफ यौन शोषण की FIR करवाने वाली पीड़िता ने मंगलवार (25 मार्च, 2025) को दिल्ली राष्ट्रीय महिला आयोग में अपनी आपबीती सुनाई है। पीड़िता ने बताया, “उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और समझी। सारी चीजें उन्होंने देखी हैं। पुलिस-प्रशासन से भी उन्होंने जानकारी ली है कि क्या कार्रवाई इस मामले में हुई है।”

महिला ने बताया, “उन्होंने हमें यही आश्वासन दिया है कि चिंता नहीं करनी है। जो भी कानूनी कार्रवाई करनी है, उसमें पूरा साथ दिया जाएगा। महिला आयोग ने कहा है कि हम पूरी तरह से आपके साथ हैं… मैंने अंदर पूरी एकदम साफ़ तौर पर बता दी थीं।”

पीड़िता ने बताया कि महिला आयोग ने उसे सुरक्षा देने का वादा भी किया है। पीड़िता ने बताया है कि महिला आयोग के एक्शन के चलते उसे अब बजिंदर सिंह के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद जगी है। पीड़िता के साथ ही पंजाब पुलिस के अधिकारियों को भी महिला आयोग ने तलब किया था।

इस पीड़िता ने फरवरी, 2025 में बजिंदर सिंह के विरुद्ध FIR दर्ज करवाई थी। पीड़िता ने बताया था कि वह 17 वर्ष की आयु से अपने परिजनों के साथ बजिंदर सिंह के चर्च आती थी। यहीं पर पहले बजिंदर सिंह ने उसका नंबर ले लिया। इसके बाद बजिंदर सिंह उसे भद्दे मैसेज करने लगा।

पीड़िता ने बताया कि बजिंदर सिंह उस पर विवाह करने का दबाव भी डालता था। पीड़िता ने FIR में कहा था कि गले लगाने के बहाने से वह उसे गलत तरीके से छूता था। पीड़िता ने शिकायत में बताया था कि बजिंदर सिंह रविवार को उसे अपने केबिन में अकेले बुलाता था और उसका यौन शोषण करता था। उसे धमकियाँ भी दी जाती थीं।

इस मामले में बजिंदर सिंह की एक बार कोर्ट में भी पेशी हो चुकी है। इसी बीच उसकी कुछ और वीडियो सामने आई थीं, जिसमें वह एक आदमी और एक महिला को बेरहमी से पीटते हुए दिखा था। इस विषय में भी पंजाब पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।

चर्च से निकलना चाहा, तो बजिंदर ने पीटा

बजिंदर सिंह के खिलाफ एक महिला और बाकियों के साथ मारपीट के मामले में मोहाली में FIR दर्ज की गई है। पीड़ित महिला ने बताया है कि वह बजिंदर सिंह के चर्च में ही सालों से काम करती थी। उसने बताया है कि चर्च छोड़ने के उसके फैसले पर बजिंदर सिंह भड़का हुआ था।

महिला ने बताया कि उसने चर्च से त्यागपत्र दिया था लेकिन इसके बाद बजिंदर सिंह ने उसे सबके सामने बेइज्जत किया। उसके चेले महिला का पीछा करने लगे। महिला का आधार कार्ड, पैन और बाकी कागज भी जब्त कर लिए गए हैं। उसने बताया है कि बजिंदर सिंह सादे कागजों पर भी दस्तखत करवाए हैं।

महिला ने मीडिया को बताया कि बजिंदर सिंह ने उसे रविवार की प्रार्थना के बाद अपने केबिन में बुलाया था। उसने बताया कि यहाँ बजिंदर सिंह से एक युवक अपनी बहन को परेशान ना किए जाने को लेकर बात रखने आया था। इसी को लेकर बजिंदर सिंह ने उसकी पिटाई कर दी। बजिंदर सिंह ने उस पर अपनी बहन को चर्च आने से रोकने का आरोप लगाया।

महिला ने बताया कि इस मारपीट में जब बीच बराव की कोशिश को तो उसके ऊपर भी बजिंदर सिंह ने हमला कर दिया। महिला ने बताया कि उसके चेहरे पर मुक्के मारे गए और गला दबाया गया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि चर्च छोड़ने के चलते बजिंदर सिंह उसके पति को छेड़छाड़ के मामले में फंसाने की कोशिश कर रहा है।

बजिंदर सिंह उसके पति के पास कोई महिला भेजकर पुलिस में मामला दर्ज करवाएगा, इसकी आशंका पीडिता ने दर्ज करवाई है। इस मामले में अब मोहाली पुलिस ने सभी पीड़ितों के बयान दर्ज कर लिए हैं और बजिंदर सिंह के खिलाफ जाँच कर रही है।

8 घंटे बाद दिल्ली पुलिस को लगी जस्टिस यशवंत वर्मा के घर लगी आग की भनक, 2 बार दरवाजे से लौटा दिए गए जवान-अधिकारी: रिपोर्ट, जाँच पैनल ने घटनास्थल का किया दौरा

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के लगभग आठ घंटे बाद तक दिल्ली पुलिस मुख्यालय को इसकी जानकारी नहीं थी। आग को बुझा लिए जाने के बाद जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने मौके पर पहुँचे पाँच पुलिसकर्मियों को वहाँ से चले जाने और सुबह आने को कहा। जिस समय यह घटना हुई थी, उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी सहित घर से बाहर थे।

इंडियन एक्सप्रेस ने दिल्ली पुलिस के उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। सूत्रों ने यह भी बताया कि जब इस मामले के जाँच अधिकारी अगली सुबह जस्टिस वर्मा के आवास पर आए तो उन्हें वापस भेज दिया गया और बाद में आने के लिए कहा गया। इस अंग्रेजी समाचार पत्र ने जस्टिस वर्मा के निजी सचिव से भी संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।

दरअसल, नई दिल्ली जिला के एडिशनल डीसीपी ने 15 मार्च 2025 को सुबह 8 बजे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुबह की डायरी सौंपी थी। उस डायरी में पिछले 24 घंटों में इलाके में हुई घटनाओं का सारांश था। इसमें जस्टिस वर्मा के आवास में लगी आग का भी जिक्र था। इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को घटना की जानकारी दी गई और नोटों में लगी आग का वीडियो भी उन्हें दिखाया गया।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा ने केंद्र में अपने उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। उसके बाद उसी दिन शाम को करीब 4.50 बजे दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय को इसकी जानकारी दी गई। इसके बाद जस्टिस उपाध्याय के रजिस्ट्रार सह सचिव ने सितंबर 2024 से लेकर घटना तक जस्टिस वर्मा का सुरक्षा विवरण माँगा।

दिल्ली पुलिस ने जस्टिस वर्मा के सुरक्षा डिटेल दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस उपाध्याय को भेज दिया। पुलिस ने बताया कि इस अवधि के दौरान CRPF के जवान और दिल्ली पुलिस के तीन अधिकारी रोटेशन के आधार पर जस्टिस वर्मा के आवास पर तैनात थे। वहीं, सूत्रों का कहना है कि दिल्ली पुलिस से पूछा गया है कि घटना की रात को पंचनामा क्यों नहीं बनाया गया।

पंचनामा बनाने के लिए पाँच स्वतंत्र व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो घटनास्थल के गवाह हों और मुकदमे के दौरान वे अपना बयान दे सकें। यह भी पता चला है कि मामले की जाँच करने वाली आंतरिक पैनल इस पर विचार कर रहा है। वहीं, आग लगने के दौरान सबसे पहले पहुँचने वाले 5 पुलिसकर्मियों से अपना फोन दिल्ली पुलिस मुख्यालय को सौंपने के लिए कहा गया है। पैनल इसका जाँच करेगा।

वहीं, पैनल जस्टिस वर्मा के पिछले छह महीनों के कॉल डेटा रिकॉर्ड की भी जाँच करेगा है। उन्हें अपने फोन से कोई भी जानकारी डिलीट नहीं करने के लिए कहा गया है। बता दें कि मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा का स्थानांतरण दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया था। हालाँकि, बाद में CJI संजीव खन्ना ने जाँच के लिए विभिन्न हाई कोर्ट के तीन जजों की समिति गठित की है।

पैनल ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। पैनल ने मंगलवार (25 मार्च) को जस्टिस वर्मा के आवास पहुँची और जहाँ नोटों में आग लगी थी, वहाँ लगभग 45 मिनट तक निरीक्षण किया। पैनल जज वर्मा के पीए और दिल्ली अग्निशमन विभाग के प्रमुख अतुल गर्ग को बयान देने के लिए बुलाएगा। अतुल गर्ग के हवाले से मीडिया में खबर आई थी कि ‘जज के आवास पर घटना के दौरान कोई नकदी नहीं मिली थी’।

जस्टिस वर्मा ने भी दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय को दिए अपने स्पष्टीकरण में अतुल गर्ग के बयान का हवाला दिया था। हालाँकि, बाद में अतुल गर्ग ने इनकार कर दिया था कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था। इस मामले में अब जाँच पैनल जस्टिस वर्मा से भी पूछताछ करेगी। इसके साथ ही आग की घटना का कॉल जिन अग्निशमन कर्मियों ने उठाया था, उनसे पूछताछ की जाएगी।

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा के घर में लगी आग लेकर 21 मार्च की अग्नि रिपोर्ट के विवरण में कहा गया है कि सफदरजंग फायर स्टेशन को 14 मार्च की रात 11.35 बजे कॉल आया था। इसमें जज के घर में आग लगने की सूचना दी गई थी। इसके बाद दमकलकर्मी रात 11:43 बजे घटनास्थल पर पहुँचे। वे दो घंटे बाद यानी रात 1.56 बजे घटनास्थ से वापस लौट गए।

बता दें कि होली के दिन 14 मार्च की रात को करीब 11:30 बजे जस्टिस वर्मा के आवास से सटे स्टोर रूम में आग लग गई थी। यह आग बोरे में बंद रखे गए नोटों की गड्डियों में लगा था। इसके बाद जस्टिस वर्मा के पीए ने दिल्ली अग्निशमन सेवा को फोन करके घटना की जानकारी दी थी। आग बुझाने के दौरान का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें दिख रहा है कि 500 रुपए की गड्डियाँ जली हुई हैं।

जिस समय यह घटना हुई थी उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली में नहीं थे। कहा जाता है कि उस समय वे अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश गए थे। घर में सिर्फ उनकी वृद्ध माँ और एक बेटी थी। मामला जब उठा तो जस्टिस वर्मा ने अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के सभी आरोपों को नकार दिया और इसे एक साजिश बताया। उन्होंने कहा कि जिस जगह पर आग लगी, वह उनके आवास का मुख्य हिस्सा नहीं है।

हजारीबाग की जामा मस्जिद के पास मंगला जुलूस पर पत्थरबाजी, हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस को करनी पड़ी हवाई फायरिंग: महाशिवरात्रि-होली पर भी झारखंड में हिंदुओं पर हुआ था हमला

झारखंड के हजारीबाग में हिंदुओं के लिए त्योहार मनाना मुश्किल होता जा रहा है। मंगलवार (25 मार्च 2025) देर रात रामनवमी की तैयारी में निकाले गए मंगला जुलूस पर कुछ उपद्रवियों ने पत्थरबाजी कर दी। ये सब सदर थाना क्षेत्र में जामा मस्जिद चौक के पास हुआ, जहाँ हिंदू अपने अखाड़ों के साथ शांति से जुलूस निकाल रहे थे। लेकिन अचानक पत्थर चलने शुरू हो गए, जिससे पूरा इलाका तनाव में आ गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को चार राउंड हवाई फायरिंग करनी पड़ी और आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। हर साल होली के बाद मंगलवार को हजारीबाग में मंगला जुलूस निकलता है। इस बार भी अखाड़ों के लोग ढोल-नगाड़ों के साथ चौक-चौराहों से गुजर रहे थे। जुलूस में कुछ गाने बज रहे थे, जिन पर दूसरे पक्ष ने आपत्ति जताई। बस इसी बात पर पहले बहस हुई, फिर पत्थरबाजी शुरू हो गई।

हिंदुओं का कहना है कि उनका जुलूस शांतिपूर्ण था, लेकिन असामाजिक तत्वों ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ा। पत्थरबाजी के साथ तोड़फोड़ भी हुई। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, फायरिंग की, तब जाकर भीड़ भागी। अब इलाके को छावनी बना दिया गया है और पुलिस हर तरफ नजर रख रही है।

हजारीबाग की डिप्टी कमिश्नर नैंसी सहाय ने कहा कि अब हालात काबू में हैं। उन्होंने बताया कि रामनवमी से पहले निकाले जा रहे दूसरे मंगला जुलूस पर पथराव किया गया। ये जगह झंडा चौक के पास है। जुलूस में गाना बजाने का विरोध करते हुए हमला किया गया है। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है।

हजारीबाग के एसपी अरविंद कुमार सिंह मौके पर पहुँचे और लोगों से शांति की अपील की। अब FIR दर्ज की जा रही है और पुलिस दोनों पक्षों को समझाने में लगी है। लेकिन इलाके में तनाव अभी भी बना हुआ है।

महाशिवरात्रि पर भी हिंदुओं पर हुआ था हमला

बता दें कि हजारीबाग में ये कोई नई बात नहीं। अभी फरवरी 2025 में महाशिवरात्रि के दिन हजारीबाग के इचाक में झंडा लगाने को लेकर हिंदुओं पर हमला हुआ था। पत्थरबाजी और आगजनी में कई लोग घायल हुए थे, वाहनों को जलाया गया था। तब भाजपा नेता संजय सेठ ने इसे घुसपैठियों की साजिश बताया था और हेमंत सोरेन सरकार पर हिंदुओं की सुरक्षा में नाकाम रहने का इल्जाम लगाया था।

यही नहीं, अभी 14 मार्च 2025 को गिरिडीह में होली के दिन भी हिंदुओं पर पत्थरबाजी हुई थी। हजारीबाग में त्योहारों पर हिंदुओं को टारगेट करने की घटनाएं बढ़ रही हैं। लोग अब हर जुलूस और उत्सव में डर के साथ शामिल हो रहे हैं।