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अब वक्फ की प्रॉपर्टी नहीं रहेगी संभल की मस्जिद, ओवैसी छटपटाया: जानिए कैसे नए कानून से ASI संरक्षित स्मारकों पर रुकेगा कब्जा, क्यों था ये जरूरी

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को कहा कि अगर वक्फ (संशोधन) बिल कानून बन गया, तो संभल की जामा मस्जिद वक्फ की संपत्ति नहीं रहेगी। ओवैसी ने ये बात ABP न्यूज पर संदीप चौधरी के साथ इंटरव्यू में कही।

ओवैसी ने कहा कि वक्फ (संशोधन) एक्ट के सेक्शन 3D के तहत, जो संपत्ति ASI (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के अधीन संरक्षित घोषित है, वो वक्फ की नहीं हो सकती। इसमें संभल की मस्जिद के अलावा देश भर की कई दूसरी इस्लामिक इमारतें भी शामिल हैं।

असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) के राम मंदिर (Ram Mandir) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट ने जमीन पर इस्तेमाल के आधार पर दावा माना था। लेकिन नए एक्ट के मुताबिक, इस्तेमाल का नियम तभी लागू होगा, जब जमीन पर कोई विवाद न हो या वो सरकारी संपत्ति न हो। उन्होंने आगे कहा कि इस एक्ट से ASI के तहत आने वाली सारी वक्फ संपत्तियाँ अपनी पहचान खो देंगी। ओवैसी ने कहा, “ASI की परिभाषा को बढ़ा दिया गया है। अब वो सारी संपत्तियाँ हाथ से निकल जाएँगी।”

भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) ने शनिवार (5 अप्रैल 2025) को वक्फ (संशोधन) बिल को मंजूरी दे दी, जिसके बाद ये कानून बन गया। मूल एक्ट के सेक्शन 3 में कई बदलाव किए गए हैं। ओवैसी ने जिस सेक्शन 3D का जिक्र किया, वो कहता है कि अगर कोई संरक्षित स्मारक या इलाका वक्फ की संपत्ति घोषित किया गया है, तो वो दावा अब रद्द हो जाएगा।

इस सेक्शन में लिखा है: “इस एक्ट या किसी पुराने कानून के तहत वक्फ संपत्तियों के लिए जारी कोई घोषणा या नोटिफिकेशन तब रद्द माना जाएगा, अगर वो संपत्ति उस घोषणा या नोटिफिकेशन के वक्त प्राचीन स्मारक संरक्षण एक्ट, 1904 या प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष एक्ट, 1958 के तहत संरक्षित स्मारक या संरक्षित इलाका था।”

वक्फ (संशोधन) एक्ट का सेक्शन 3D ये सुनिश्चित करता है कि किसी भी ऐसी जगह पर वक्फ का दावा नहीं किया जा सकता, जो पहले से ही हेरिटेज कानूनों के तहत संरक्षित स्मारक या इलाका घोषित हो चुकी हो। अगर पहले इस एक्ट या किसी पुराने कानून के तहत ऐसी कोई घोषणा हुई थी, तो अब उसे कानूनी तौर पर रद्द मान लिया जाएगा। इस नियम का मकसद ऐतिहासिक स्मारकों, खासकर ASI की सुरक्षा में आने वाले स्मारकों को धार्मिक दावों के तहत दोबारा वर्गीकृत होने या उन पर कब्जा होने से बचाना है, ताकि भारत की पुरातत्व और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके।

संभल में विवादित जगह से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य

नवंबर 2024 में संभल कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के संभल में जामा मस्जिद की सर्वे करने का आदेश दिया। ये आदेश हरि शंकर जैन, महंत ऋषिराज गिरी और कुछ अन्य लोगों की याचिका के जवाब में आया था।

याचिका में दावा किया गया कि ये मस्जिद भगवान कल्कि को समर्पित सदियों पुराने श्री हरि हर मंदिर की जगह पर बनाई गई थी, जिसे बाबर ने तोड़ दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये जगह हिंदुओं के लिए बहुत धार्मिक महत्व रखती है और मुगल काल में इसे जबरदस्ती मस्जिद में बदल दिया गया।

साथ ही ये 1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण एक्ट के तहत एक संरक्षित स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया है। उन्होंने ये भी कहा कि मौजूदा हालात उनके धर्म को मानने के संवैधानिक अधिकार को ठेस पहुँचा रहे हैं और इस जगह पर आम लोगों की पहुँच बहाल करने के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए।

श्री हरि मंदिर से जुड़ा ऐतिहासिक तथ्य

याचिका में श्री हरि हर मंदिर के प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व को बताया गया। इसमें कहा गया कि हिंदू शास्त्रों में इस जगह को बहुत पवित्र माना जाता है और ये भगवान कल्कि के अवतार से जुड़ी है। जो लोग नहीं जानते, उनके लिए बता दें कि भगवान कल्कि को भगवान विष्णु का दसवाँ और आखिरी अवतार माना जाता है। हिंदू मान्यता के मुताबिक, कल्कि संभल में प्रकट होंगे और कलियुग को खत्म करके सतयुग की शुरुआत करेंगे।

महिस्मत नदी के किनारे रोहिलखंड के बीच में बसे संभल शहर को अलग-अलग युगों में अलग-अलग नामों से जाना जाता था – सतयुग में सब्रित या संभलेश्वर, त्रेतायुग में महादगिरी, द्वापरयुग में पिंगला और कलियुग में संभल।

भगवान कल्कि को समर्पित श्री हरि हर मंदिर के बारे में माना जाता है कि इसे सृष्टि की शुरुआत में भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था। विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार कहा जाता है। ये मंदिर हिंदू धर्म में खास जगह रखता है, क्योंकि ये भगवान विष्णु और शिव की एकता को दिखाता है, जैसा कि शास्त्रों में लिखा है: “यथा शिवस्तथा विष्णु, यथा विष्णुस्तथा शिवः” यानी “जैसा शिव है, वैसा विष्णु; जैसा विष्णु है, वैसा शिव।” ये मंदिर प्राचीन वास्तुकला का शानदार नमूना था। याचिका में कहा गया कि ये आध्यात्मिक महत्व और खूबसूरत डिजाइन का मेल था।

याचिका के मुताबिक, मुगल आक्रमण के दौरान इस मंदिर को काफी नुकसान पहुँचा। बाबर के सेनापति हिंदू बेग ने 1527-28 में इसे आंशिक रूप से तोड़ा और मस्जिद में बदल दिया। ऐसा कहा जाता है कि ये काम बाबर के आदेश पर हुआ था, ताकि इस्लाम की ताकत दिखाई जा सके और स्थानीय हिंदू आबादी का मनोबल तोड़ा जा सके।

इस घटना का जिक्र बाबर की डायरी (बाबरनामा) में मिलता है। इसमें लिखा है कि हिंदू बेग ने मंदिर को मस्जिद में बदला। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मस्जिद के अंदर बाबर का नाम लिखी एक शिला (पत्थर का नेमप्लेट) बाद में बनाई गई नकली चीज है, जिसका मकसद मंदिर को मस्जिद में बदलने को सही ठहराना था।

ASI के अधीन संपत्ति

याचिका में इस विवादित जगह के नियंत्रण और प्रबंधन के कानूनी और प्रशासनिक इतिहास की बात भी की गई। इसमें ASI की भूमिका का जिक्र है। 22 दिसंबर 1920 को यूनाइटेड प्रोविंस की सरकार के सचिव ने एक्ट के सेक्शन 3(3) के तहत एक नोटिफिकेशन जारी कर इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे ये जगह ASI के नियंत्रण में आ गई। इसलिए ASI को इसका कानूनी संरक्षक होना चाहिए, जो इसकी देखभाल, प्रबंधन और आम लोगों की पहुँच सुनिश्चित करे।

1904 और 1958 के कानूनों के तहत ASI की जिम्मेदारी

1904 के प्राचीन स्मारक संरक्षण एक्ट और फिर 1958 के प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष एक्ट के तहत, ASI को ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों को बचाने और उनकी देखभाल करने का कानूनी अधिकार है। 1958 के एक्ट के सेक्शन 18 के मुताबिक, ASI को ये सुनिश्चित करना है कि इन स्मारकों तक आम लोगों की पहुँच बनी रहे।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ASI अपनी इस कानूनी जिम्मेदारी को निभाने में नाकाम रही, खासकर तब जब इस जगह पर धार्मिक विवाद चल रहा है। ASI की निष्क्रियता की वजह से जामा मस्जिद की मैनेजमेंट कमेटी ने इस जगह पर लोगों की पहुँच रोक दी। उनका मानना है कि ये हिंदू भक्तों के उस अधिकार का उल्लंघन है, जो इस जगह को श्री हरि हर मंदिर का मूल स्थान मानते हैं, जिसे मुगलों ने तोड़ा था।

इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ASI ने इस जगह को सुरक्षित करने, इसके ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखने या उन निशानों और चीजों को बचाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए, जो इसके हिंदू मूल को साबित कर सकते हैं। उनका कहना है कि ये ASI की कानूनी जिम्मेदारियों को पूरा न करने की नाकामी है।

संभल में सर्वे के दौरान हुई थी हिंसा

बता दें कि 19 नवंबर 2024 को पहला सर्वे तनाव भरे माहौल में हुआ, लेकिन शांति से पूरा हो गया और कोई हिंसा नहीं हुई। मगर 24 नवंबर 2024 को दूसरा सर्वे शुरू होते ही स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। कोर्ट द्वारा नियुक्त टीम जब मस्जिद के अंदर सर्वे कर रही थी, तब बड़ी संख्या में मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद और आसपास के इलाकों को घेर लिया।

गुस्साई भीड़ का ‘विरोध’ जल्दी ही हिंसक हो गया। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात पुलिस टीमों पर हमला हुआ। दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थर और डंडों से हमला किया और गोलीबारी भी की।

संभल हिंसा के बाद स्थानीय प्रशासन, राज्य सरकार और पुलिस ने दोषियों को पकड़ने के लिए कई कदम उठाए। जाँच में पता चला कि संभल के सांसद जिया उर रहमान बर्क समेत स्थानीय नेताओं ने भीड़ को भड़काया था और ये हिंसा पहले से प्लान की गई थी। घटनास्थल से पाकिस्तान में बनी गोलियाँ भी मिलीं, जिसने जाँच को और गंभीर बना दिया। 45 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया और कई FIRs के तहत मामले चल रहे हैं।

विवादित जगह पर हिंदू मंदिर के सबूत

जनवरी 2025 में मस्जिद का सर्वे रिपोर्ट चंदौसी कोर्ट में सील बंद लिफाफे में जमा किया गया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मस्जिद में दो बरगद के पेड़ हैं, जो आमतौर पर हिंदू मंदिरों से जुड़े होते हैं, जहाँ उनकी पूजा होती है। इसके अलावा मस्जिद के अंदर एक कुआँ है, जिसका एक हिस्सा अंदर और दूसरा बाहर है। कुएँ का बाहरी हिस्सा ढका हुआ था। सर्वे रिपोर्ट में करीब साढ़े चार घंटे की वीडियोग्राफी शामिल थी, जिसमें लगभग 1,200 तस्वीरें ली गईं।

रिपोर्ट में कहा गया कि मस्जिद में ऐसे निशान हैं, जो उस दौर के मंदिरों और हिंदू स्थानों की पहचान हैं। मंदिर की मूल वास्तुकला को दरवाजों, खिड़कियों और सजी हुई दीवारों पर प्लास्टर और पेंट लगाकर छिपा दिया गया है।

सेक्शन 3D और संभल मस्जिद

संभल की जामा मस्जिद का मामला सीधे तौर पर बताता है कि सेक्शन 3D क्यों जरूरी था। 1920 से ये एक केंद्रीय संरक्षित स्मारक है, फिर भी इसे वक्फ संपत्ति के तौर पर दावा किया जाता रहा। इससे न सिर्फ हिंदू भक्तों की पहुँच रुकी, जो इसे श्री हरि हर मंदिर मानते हैं, बल्कि ASI को भी दिक्कत हुई। वक्फ (संशोधन) एक्ट कानूनी साफगोई लाता है और ऐसे संरक्षित स्मारकों को धार्मिक या प्रशासनिक झगड़ों में फँसने से बचाता है।

ओवैसी का ये कहना कि “संभल मस्जिद भी वक्फ बोर्ड की नहीं रहेगी” वक्फ (संशोधन) एक्ट के मकसद को सही साबित करता है। ये एक्ट भारत की पुरातत्व धरोहर को गैरकानूनी या राजनीतिक कब्जों से बचाने के लिए है।

ASI संरक्षित स्मारकों को वक्फ संपत्ति के तौर पर दावा न करने देने से ये एक्ट ऐतिहासिक सच्चाई को बनाए रखता है और लंबे समय से चले आ रहे धार्मिक विवादों में न्याय देता है। ये सभ्यता की उन सच्चाइयों को फिर से हासिल करने और बचाने की जरूरी कोशिश है, जो सदियों की जबरदस्ती के नीचे दब गई थीं।

पूरे देश में लागू हो UCC: कर्नाटक हाई कोर्ट, कहा- मजहब के आधार पर कानून से महिलाओं से होता है भेदभाव; अब्दुल की प्रॉपर्टी पर लड़ाई से जुड़ा है मामला

कर्नाटक हाई कोर्ट ने शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को संसद एवं राज्य विधानसभाओं से समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 तहत समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने से भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य और आकांक्षाएँ सही मायने में साकार होंगी।

जस्टिस हंचते संजीवकुमार की एकल पीठ ने कहा कि समान नागरिक संहिता को लागू करने से महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित होगा, सभी जातियों और धर्मों में समानता को बढ़ावा मिलेगा तथा भाईचारे के माध्यम से व्यक्तिगत गरिमा कायम रहेगी। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार भारत में सभी महिलाएँ एक नागरिक के तौर पर समान हैं, लेकिन पर्सनल लॉ उनके साथ भेदभाव करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है। हिंदू कानून के तहत बेटी को बेटे के समान जन्मसिद्ध अधिकार और पत्नी को अपने पति के बराबर दर्जा प्राप्त है। हालाँकि, मुस्लिम कानून के तहत ऐसी समानता नहीं दिखाई देती है। इसलिए, कोर्ट ने कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश हंचते संजीवकुमार ने समान नागरिक संहिता कानून को लेकर संविधान सभा का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि संविधान सभा में भी समान नागरिक संहिता विवाद का एक विषय था। जस्टिस संजीवकुमार ने कहा कि संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था।

न्यायालय ने कहा, “संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अपने सबसे शानदार भाषण में समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क दिया है।” कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस संजीवकुमार ने आगे कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, टी कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी जैसे प्रमुख नेताओं ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था।

इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का भी हवाला दिया। इनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985), सरला मुद्गल (श्रीमती) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (1995) और जॉन वल्लमट्टम और अन्य बनाम भारत संघ (2003) प्रमुख हैं। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने का सुझाव दिया था।

दरअसल, कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अब्दुल बशीर खान नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति बँटवारे को लेकर विवाद हो गया। दरअसल, अब्दुल बशीर ने अपनी मृत्यु से पहले कोई वसीयत नहीं लिखी थी। वे अपने पीछे कई अचल संपत्तियाँ छोड़ गए, जिनमें से कुछ पैतृक थीं तथा कुछ उन्होंने स्वयं अर्जित की थीं।

अब्दुल बशीर की मौत के बाद उनकी संपत्ति के बँटवारे को लेकर उनके बच्चों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। बेटी शहनाज़ बेगम की मौत के बाद उनका प्रतिनिधित्व उनके शौहर सिराजुद्दीन मक्की (प्रतिवादी) ने किया। मक्की ने आरोप लगाया कि उन्हें संपत्ति के बँटवारे से बाहर रखा गया और उसमें से उन्हें उचित हिस्सा नहीं दिया गया। इसको लेकर मक्की ने बेंगलुरु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

नवंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने माना कि विचाराधीन तीन संपत्तियाँ संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा हैं और शहनाज़ बेगम उन में पाँचवें हिस्से की हकदार हैं। हालाँकि, ट्रायल कोर्ट ने अन्य संपत्तियों को बँटवारा योग्य नहीं बताया। ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट अब्दुल बशीर के दो बेटों- समीउल्ला खान और नूरुल्ला खान तथा बेटी राहत जान (अपीलकर्ता) ने कर्नाटक हाई कोर्ट में अपील दायर की।

इधर, सिराजुद्दीन मक्की ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आपत्ति दायर की, जिसमें अपने हिस्से को बढ़ाने या पहले के आदेश में संशोधन की माँग की गई। हाई कोर्ट ने दोनों पक्ष की याचिकाओं को स्वीकार किया और अपील एवं आपत्ति याचिका, दोनों पर एक साथ सुनवाई की। तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

बंगाल के नंदीग्राम में बनेगा अयोध्या जैसा राम मंदिर, 1.5 एकड़ में होगा फैला: BJP विधायक सुवेंदु अधिकारी ने रामनवमी पर रखीं नींव, TMC भड़की

बंगाल में राम मंदिर बनवाने के लिए भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने राम नवमी के मौके पर मंदिर की आधारशिला रखी। यह मंदिर नंदीग्राम के सोनाचूडा में बनाया जाएगा। इसका मॉडल अयोध्या के राम मंदिर पर ही आधारित होगा।

खुद सुवेंदु अधिकारी ने इस शिलान्यास समारोह की तस्वीरें अपने सोशल मीडिया पर साझा की है। वीडियो में सैंकड़ों लोग भगवा धारण करके, सनातन की पताका लिए कार्यक्रम में शामिल होते दिख रहे हैं। वहीं सुवेंदु अधिकारी को सभी भक्तों का अभिवादन और मंदिर की आधारशिला रखने देखा जा सकता है।

अपने एक्स में ये वीडियो साझा करते हुए उन्होंने लिखा, “भारतीय सनातन संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, अयोध्या में ऐतिहासिक पवित्र राम जन्मभूमि मंदिर की तर्ज पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र को समर्पित एक भव्य मंदिर का भूमिपूजन और शिलान्यास का शुभ समारोह आज रामनवमी के पावन अवसर पर आयोजित किया गया।”

उन्होंने बताया कि शिलान्यास समारोह नंदीग्राम के पहले ‘हिंदू शहीद’ स्वर्गीय देवव्रत मैती की पत्नी श्रीमती कल्पना मैती द्वारा किया गया। आगे वह बोले, “यह उन सभी के लिए एक ऐतिहासिक और खुशी का अवसर है, जो भगवान राम के धर्म, साहस और करुणा के मूल्यों को अपने दिल के करीब रखते हैं। इस मंदिर का निर्माण केवल ईंट और गारा रखना नहीं है, यह विश्वास, एकता और सांस्कृतिक गौरव की विरासत का निर्माण है।”

बता दें कि अयोध्या वाले राम मंदिर की तर्ज पर बंगाल में बनने जा रहा ये मंदिर करीबन 3.5 बिघा (लगभग 1.5 एकड़) भूमि पर बनाया जाएगा। इस मंदिर की विशेषता होगी कि यहाँ मुख्य पूजा स्थल के अलावा एक गौशाला, गौशाला, एक आयुष स्वास्थ्य केंद्र और आगंतुकों के लिए एक अतिथि गृह भी होगा।

गौरतलब है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस ने इस मंदिर के बनने की खबर पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने यह आरोप लगाया कि शुभेंदु अधिकारी ने उस भूमि का उपयोग किया है जिसे पहले शहीद परिवारों की याद में अस्पताल बनाने के लिए खरीदा गया था। टीएमसी नेता कुणाल घोष ने कहा कि यह धार्मिक राजनीति का उदाहरण है और अधिकारियों को इस मुद्दे पर जनता से जवाब देना चाहिए।

ये भी मालूम हो कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के लिए नंदीग्राम में भाजपा नेता द्वारा मंदिर की आधारशिला रखा जाना इसलिए भी परेशान करने वाला है नंदीग्राम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ रहा है। यहाँ 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसने ममता को राजनीतिक रूप से प्रमुखता दिलाई थी। अब, सुवेंदु अधिकारी ने इस स्थान पर राम मंदिर बनाने की घोषणा की है। सुवेंदु अधिकारी इसी जगह से भाजपा के विधायक हैं।

राम मंदिर, 370, तीन तलाक, वक्फ… धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय: धैर्य का यह पाठ BJP समर्थकों को भी इस स्थापना दिवस पर पढ़ना चाहिए

आज 6 अप्रैल है। रामनवमी है। बीजेपी का स्थापना दिवस भी। यह तारीखों का गजब संयोग है कि 2025 में राम को उनके जन्मस्थान में विराजमान करने वाली पार्टी की स्थापना की तारीख रामनवमी को ही पड़ी है।

अयोध्या के रामजन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के कोर एजेंडे में रहा है। सालों तक ‘मंदिर वहीं बनाएँगे, पर तारीख नहीं बताएँगे’, जैसे तंज कस बीजेपी का मजाक उड़ाया गया है। आज न केवल रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हैं, बल्कि जिस बीजेपी का ‘काउ बेल्ट पार्टी’ कहकर मजाक बनाया जाता था, वह भी पूरे देश में फैल चुकी है।

इस यात्रा में कई मौके आए जब पार्टी के समर्थक भी अधीर हो गए। खासकर, 2014 के बाद से, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने राजनीतिक सफलताओं की नई गाथा लिखनी प्रारंभ की, ऐसे समर्थक भी मैगी बनने की गति से परिणाम की आकांक्षा करने लगे, जिन्होंने शनै: शनै: पार्टी को खड़े होते देखा है।

वास्तविकता यही है कि बीजेपी कभी अपने कोर मुद्दों से पीछे नहीं हटी। उसकी सरकारों ने ऐसे मोर्चों पर कार्य कर दिखाया है जिसकी स्वतंत्र भारत में कल्पना नहीं की जाती रही है। जिन मुद्दों को छूने मात्र से देश जलने की धमकी दी जाती है। उन मुद्दों को भी धीरे—धीरे शांति के साथ दफन किया गया है।

जैसे, हाल में संसद से पास हुआ वक्फ संशोधन विधेयक। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से यह कानून भी अब बन चुका है। आज से 10 वर्ष पूर्व कोई सोच तक नहीं सकता था कि कोई सरकार वक्फ, तीन तलाक और 370 जैसे मुद्दों को छू भी पाएगी। इन्हें छूना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था।

मुस्लिमों की सड़क पर शक्ति प्रदर्शन का इतना डर भारतीय जनमानस में बैठा हुआ था कि सब ऐसी कोई कल्पना से ही डर जाते थे। आज खुद को दक्षिणपंथी बताने वाले तक आशंका जताते थे कि अगर ऐसे कानून छुए गए तो इस देश में खून खराबा होगा, हिंदुओं पर हमले होंगे और ना जाने कितनी जानें जाएँगी।

आशंका के विपरीत चाहे वक्फ हो या फिर नागरिकता संशोधन अधिनियम के लागू होने का समय, ‘सब शांतिपूर्वक’ से निपट गया। एकाध जुबानी जुगाली और बयानों को छोड़ दें तो देश के वो बटेर तक नहीं मरी। इस कानून के संसद में पारित होने ने साफ कर दिया कि भाजपा अपने एजेंडे पर कायम है और लगातार एक एक करके उन्हें पूरा करेगी। लेकिन इस पूरे एपिसोड से एक और बात निकल कर आती है, वो ये है कि पार्टी अपने हर वादे को पूरा करेगी लेकिन समय देख कर।

इस बात को समझना जनता और विशेषकर उन समर्थकों के लिए जरूरी है, जो हर बात पर मोदी से आशा रखते हैं कि वह बम-बंदूक चला दें और एकदम कठोर एक्शन ले लें। किसी भी पार्टी का समर्थक होने के नाते कार्यकर्ता की आकांक्षा होती है कि सभी एजेंडा फटाफट पूरे हों। लेकिन सरकारें इस तरह नहीं चलती।

वर्ष 2020 में होने वाले शाहीन बाग के ड्रामे को लेकर पूरा देश गुस्सा था। चाहे शरजील इमाम का देश काटने वाला बयान हो या फिर कुदरती बिरयानी और बिल्किस दादी वाले ड्रामे, सबको मालूम था कि इस भीड़ का असल एजेंडा देश को एक गृह युद्ध में झोंकना था। तब सरकार ने उन्हें थकाया, बैठे रहने दिया और बाद में उनपर हंटर चलाया। तुरंत लाठी और गोली चलाने से क्या होता, बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

हसीना ने कुछ दिन धैर्य से काम लिया, लेकिन बाद में पुलिस को खुली छूट दी। उसने इस्लामी कट्टरपंथियों को वह दे दिया, जो वह चाहते थे। यह था उकसावे का मौका। इसके बाद हसीना को देश छोड़ना पड़ा। उनका घर जमींदोज हो गया और मोहम्मद युनुस नाम की कठपुतली ढाका में आकर बैठ गई। पीछे से उसे इस्लामी कट्टरपंथी ही चला रहे हैं, यह दुनिया को पता है।

शाहीन बाग की कारस्तानिययों का सरकार ने कोई संज्ञान नहीं लिया। यह कहना झूठ है। आज शरजील इमाम, उमर खालिद और खालिद सैफी जैसे लोग जेलों में सड़ रहे हैं। उन दादी और नेताओं का कोई नामलेवा तक नहीं बचा जो सरकार को उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसी तरह मोदी सरकार के CAA कानून को रोकने पर भी समर्थकों ने प्रश्न उठाए थे। वह मार्च, 2024 में लागू भी हो गया और कोई कुछ नहीं बोल सका। इसी तरह अनुच्छेद 370 का मामला रहा। भाजपा सरकार ने ऐसे समय पर यह हटाया कि इसे वापस लाना अब संभव नहीं है।

वक्फ बोर्ड को लेकर आज से कुछ साल पहले व्हाट्सऐप पर मैसेज चलते थे, यह कानून कितना भयावह है, इसके विषय में बताया जाता था। अब वो इतिहास हो चुका। साल भर तक दिल्ली घेर कर बैठने वाले कथित किसान आंदोलनकारी भी आज अप्रासंगिक हो गए, उनके भीतर ही आज इतने गुट और सिर फुटौव्वल है कि एका नहीं हो पा रहा।

सरकार जिस दिन चाहेगी कानून लागू हो जाएगा। समर्थकों को समझना होगा कि हम चीन की तरह कोई देश नहीं जहाँ लोकतंत्र नाम की चिड़िया का उड़ना मना हो। ना हम पाकिस्तान हैं जहाँ फौज जो चाहे, संगीनों की नोक के बल पर वो कर ले। हम पूर्ण रूप से लोकतंत्र हैं और विरोधी आवाज का भी सम्मान करते हैं।

महान दार्शनिक प्लेटो का कहना है कि जो काम एक आदमी एक घंटे में राजतंत्र में करता है, वही काम लोकतंत्र में 7 आदमियों की समिति मिलाकर 7 दिन में करती है।

भारत के संबंध में भी यही बात है, यहाँ सब काम झटके से नहीं हो सकते। लेकिन जो होता है, स्थाई होता है। इस हिसाब से देखा जाए तो मोदी सरकार बीते 10 सालों के भीतर इतने मुद्दे हल करने के सफल रही है, जितने बीते 67 साल में भी पार्टियां नहीं कर पाई थीं। अगर आपको मोदी सरकार की स्पीड कछुए जैसी लगती हो, तो समझिए कि इससे पूर्व में काम घोंघे की रफ़्तार से होते थे।

मालदीव का भारत विरोध और फिर मुइज्जु का भारत आकर कर्ज माँगना इसका क्लासिक उदाहरण है। स्वाभाविक है कि भारत के किसी शहर के एक मुहल्ले की आबादी वाला देश आपके प्रधानमंत्री पर अपमानजनक टिप्पणियां करे तो गुस्सा आती है।

आप चाहते हैं कि उस देश को मसल कर रख दिया जाए। लेकिन सरकार ऐसे नहीं सोचती। उसने इसी मुइज्जु को दिल्ली बुलाकर भिखारी साबित किया। वो दिन दूर नहीं है जब यही सरकार UCC भी लाएगी और वह भी देश में लागू होगा।

आगे चलकर शायद देश का संविधान अपने मूल स्वरूप में भी वापस लौट सके। उसमें जबरदस्ती समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का जो पुट डाला गया है, उसे हटाया जाए।

ऐसे सैकड़ों उदाहरण है और लिखने की कोई सीमा नहीं है, लेकिन समर्थकों को एक बात समझने की जरूरत है:

धीरे-धीरे होय रे मना, सब धीरे-धीरे होय।

रंजना के घर में घुसा, पानी माँगा और जमीन पर पटक कर मार डाला… उम्रकैद काट रहे मोहम्मद अकबर को ‘अच्छा व्यवहार’ देख छोड़ा, 8 महीने बाद ही फिर कर दी हत्या

महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण में एक शख्स ने सड़क के किनारे मोमोज की दुकान खोलने के लिए 60 साल की एक वृद्धा की हत्या कर दी। 30 वर्षीय हत्यारा अकबर मोहम्मद शेख उर्फ़ चाँद (चाँद शेख उर्फ अकबर) एक आदतन अपराधी है। उसने रंजना चंद्रकांत पाटेकर के घर में घुसकर रंजना की हत्या कर दी और लूटपाट की। कुछ दिन पहले ही उसे ‘अच्छे व्यवहार’ के कारण जेल से छोड़ा गया था।

यह घटना 20 मार्च की है। अंबिवली इलाके में 60 साल की रंजना पाटेकर अपने घर में मृत पाई गई थीं। पुलिस ने जब जाँच शुरू की तो उसे कोई सुराग हाथ नहीं लगा। इलाके बेहद घना था और वहाँ सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे। इस कारण से महिला के घर में किसी को आते-जाते किसी ने नहीं देखा। यह पुलिस के लिए बेहद चुनौती भरा वक्त था।

इस बीच मृत महिला के परिजनों ने अपने पड़ोसी दीपेश सपकाले पर हत्या की आशंका व्यक्त की। आशंका के आधार पर महाराष्ट्र पुलिस ने दीपेश सपकाले को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। हालाँकि, लगातार पूछताछ के बाद भी सपकाले के पास से लूट का माल बरामद नहीं हुआ और ना ही इसके बारे में वह कोई जानकारी दे पाया। इसके बाद पुलिस ने इलाके के सभी अपराधियों की सूची जुटाई।

पुलिस ने लगभग 25 लोगों से पूछताछ की। इसी बीच खड़कपाड़ा पुलिस के खबरियों ने चाँद के बारे में जानकारी दी। किसी तरह पुलिस को उसके बारे में जानकारी मिली और उसे शुक्रवार (4 अप्रैल) को अटाली क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया गया। वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक अमरनाथ वाघमोडे ने बताया कि आरोपित अकबर मोहम्मद शेख उर्फ़ चाँद के पास से चोरी के गहने बरामद कर लिए गए हैं।

आरोपित चाँद ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। उसने पुलिस को बताया कि घटना वाले दिन रंजना का दरवाजा खटखटाया और पानी माँगा। जब रंजना पानी लाने के लिए अंदर गई तो वह घर में जबरन भीतर घुस गया और टीवी की आवाज तेज कर दी, ताकि आवाज बाहर ना जाए। जब महिला पानी लेकर आई तो चाँद ने उसकी गला और मुँह पकड़कर जमीन पर पटक दिया।

इस दौरान उसने महिला की घोंटकर हत्या कर दी। महिला की हत्या करने के बाद चाँद ने उसकी कानों से लगभग एक लाख रुपए की कीमत वाली सोने की बालियाँ निकाल लीं और वहाँ से फरार हो गया। गिरफ्तारी के बाद उसने पुलिस को बताया कि जेल से बाहर आने के बाद वह बेरोजगार था। वह रोड के किनारे मोमोज का ठेला लगाना चाहता था।

उसने बताया कि मोमोज का ठेला लगाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। इसके उसने लूटने की योजना बनाई। उसने बुजुर्ग महिला को अपना टारगेट बना लिया। वह महिला के घर की लगातार रेकी करने लगा। वह ठाणे के निकट आंबिवली इलाके के ही नवनाथ कॉलोनी में रहता है। उसका पहले से ही आपराधिक रिकॉर्ड रहा है।

पुलिस उपायुक्त अतुल जेंडे के अनुसार, आरोपित चाँद कुछ महीने पहले ही आधारवाड़ी जेल से छूटकर आया था। उसके खिलाफ खड़कपाड़ा के कोलसेवाड़ी पुलिस स्टेशन में साल 2014 में हत्या का एक मामला दर्ज किया गया था। उसने कल्याण की ही एक अन्य महिला की इसी तरह हत्या की थी। उस समय वह गैस सिलेंडर डिलीवरी बॉय के तौर पर काम करता था।

इस मामले में चाँद शेख और एक अन्य डिलीवरी बॉय को कोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। हालाँकि, उसके ‘अच्छे व्यवहार’ को देखते हुए उसे 10 साल बाद ही रिहा कर दिया गया। आरोपित चाँद आठ महीने पहले ही जेल से रिहा होकर बाहर आया था। बाहर आते ही उसने एक दूसरी महिला को अपना निशाना बना लिया।

अंग्रेज जमाने के जिस पम्बन ब्रिज से बह गई ट्रेन, उसकी जगह मोदी सरकार ने खड़ा किया नया पुल: रामनवमी पर PM ने राष्ट्र को किया समर्पित, जानिए इसकी खासियतें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चैत्र रामनवमी के दिन यानी रविवार (6 अप्रैल 2025) को तमिलनाडु के रामेश्वरम में पम्बन ब्रिज का उद्घाटन किया। इस दौरान पीएम मोदी ने सड़क पुल से एक ट्रेन और एक जहाज को हरी झंडी दिखाई। इसके साथ ही उन्होंने इसके संचालन को और इसके बारे में जानकारी ली। यह ब्रिज भारत की शानदार इंजीनियरिंग का नमूना है।

पीएम मोदी ने साल 2019 में इसका शिलान्यास किया था। इसे डबल ट्रैक और हाई-स्पीड ट्रेनों के लिए डिजाइन किया गया है। इसे 2022 में बनना था, लेकिन कोविड के कारण इसमें देर हो गई। अब यहाँ से इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र रामेश्वरम के प्रसिद्ध रामनाथस्वामी मंदिर जाएँगे और वहाँ रामनवमी के शुभ अवसर पर पूजा-अर्चना करेंगे।

रामायण में कहा गया है कि लंका में आततायी रावण का वध करने जाने के लिए भगवान राम ने रामेश्वरम के पास धनुषकोडी से ही सेतु निर्माण का काम शुरू किया था। बता दें कि पीएम मोदी श्रीलंका से लौटकर सीधे तमिलनाडु पहुँचे हैं। यहाँ वह राज्य में 8,300 करोड़ रुपए से अधिक की रेल और सड़क परियोजनाओं का भी शिलान्यास एवं उद्घाटन करेंगे।

नए पम्बन ब्रिज की खासियत

पम्बन ब्रिज रामेश्वर के पम्बन द्वीप को भारत की मुख्य भूमि तमिलनाडु के मंडपम से जोड़ता है। यह भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज है, जिसकी ऊँचाई 3 मीटर है। समुद्र तल से इसकी नेविगेशनल एयर क्लीयरेंस 22 मीटर है। ब्रिज की लंबाई 2.08 किलोमीटर (यानी 2,070 मीटर या 6790 फीट) है। इसे सरकारी कंपनी रेल विकास निगम लिमिटेड ने 535 करोड़ रुपए की लागत से बनाया है।

पम्बन ब्रिज में समुद्र के पार 100 स्पैन (यानी अलग-अलग हिस्से) हैं। इनमें से 99 स्पैन 18.30 मीटर का और एक प्रमुख लिफ्ट स्पैन 72.5 मीटर का है। समुद्री जहाज गुजरते समय यह स्पैन ऊपर उठ जाएगा। ऊपर उठने वाले ‘लिफ्ट स्पैन’ 16 मीटर चौड़ा है और इसका कुल वजन 550 टन है। पम्बन ब्रिज एक रेलवे ब्रिज है, जो बांद्रा-वर्ली सी लिंक के बाद देश का दूसरा सबसे लंबा रेलवे ब्रिज है।

दक्षिण रेलवे ने कहा कि यह ब्रिज 58 साल तक सुरक्षित है। पुराने पुल की तुलना में इसकी ऊँचाई को भी बढ़ाया गया है। इससे ज्यादा ऊँचाई वाले जहाज पुल के नीचे से गुजर पाएँगे। पुराना पुल 19 मीटर ऊँचाई तक खुलता था, लेकिन नए पुल में 22 मीटर खुलता है। इसके अलावा, इस पुल पर रेलवे का दोहरा ट्रैक बिछाया गया है। इसके साथ ही ट्रैक का इलेक्ट्रिफिकेशन भी किया गया है।

सफेद रंग में दिख रहा नया पम्बन ब्रिज (साभार: इंडिया टुडे)

नए पम्बन ब्रिज पर ट्रेन की गति 75 किलोमीटर प्रतिघंटा रहेगी। इससे पहले यह गति सीमा सिर्फ 10 किलोमीटर प्रतिघंटा थी। हालाँकि, लिफ्ट स्पैन वाले हिस्से पर ट्रेन की अधिकतम गति की सीमा 50 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है। यह वर्टिकल लिफ्ट स्पैन देश का पहला और दुनिया में दूसरा है। इस स्टील ब्रिज का डिजाइन अंतर्राष्ट्रीय कंसल्टेंट TYPSA ने किया है।

इसे यूरोपीय और भारतीय कोड के साथ डिजाइन किया गया है। टिकाऊ एवं मजबूती के लिए इसमें स्टेनलेस स्टील का प्रयोग किया गया है। इस पर जंग या समुद्र की नमकीन पानी से बचाने के लिए ब्रिज पर पॉलीसिलोक्सेन कोटिंग की गई है। इससे पहले वाले पुल में जंग लगने के कारण उसे साल 2022 में बंद कर दिया गया था। इससे रामेश्वरम और मंडपम के बीच रेल संपर्क खत्म हो गया था।

हालाँकि, रेलवे ब्रिज के समानांतर ही एक सड़क पुल है। इस सड़क पुल से मंडपम और रामेश्वरम का संपर्क बना रहा। पीएम मोदी द्वारा उद्घाटन करने से पहले दक्षिण रेलवे ने नए पम्बन ब्रिज का कई चरणों में ट्रायल किया। सबसे पहले 12 जुलाई 2024 पर हल्के इंजन का ट्रायल रन किया गया। सुरक्षा की पुष्टि होने के बाद 4 अगस्त 2024 को इस पर टावर कार ट्रायल रन किया गया।

इस ट्रायल में रामेश्वरम स्टेशन तक ओवरहेड इक्विपमेंट टावर कार चलाई गई थी। इस ब्रिज का अंतिम ट्रायल 31 जनवरी 2025 को हुआ। इस ट्रायल में रामेश्वरम एक्सप्रेस ट्रेन को ब्रिज पर दौड़ाया गया। यह ट्रायल पूरी तरह सफल रहा था। ट्रेन को मुख्य भूमि मंडपम से रामेश्वरम स्टेशन तक ले जाया गया था। इस दौरान इंडियन कोस्ट गार्ड की पेट्रोलिंग बोट के लिए लिफ्ट स्पैन को पहली बार ऊपर उठाया गया था।

कैसे काम करता है यह ब्रिज

नए पम्बन ब्रिज के नीचे से जब समुद्री जहाज को निकलना होगा तो इसका नेविगेशन ब्रिज यानी लिफ्ट स्पैन (समुद्री जहाजों के लिए खुलने वाले ब्रिज) ऊपर उठ जाएगा। इसके बाद इसके नीचे से समुद्री जहाज या क्रूज निकल सकेंगे। इस लिफ्ट स्पैन को ऊपर उठने में 5 मिनट का समय लगेगा। इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम पर काम करने वाला यह स्पैन 5 मिनट में ही 22 मीटर तक ऊपर उठ सकता है।

पुराना और उसके बगल में नया पम्बन ब्रिज (साभार: द हिंदू)

समुद्री जहाज को पार कराने के लिए नए पम्बन ब्रिज के लिफ्ट स्पैन को ऊपर करना होगा। इसके लिए सिर्फ एक आदमी की जरूरत होती है। यह आदमी बटन दबाएगा और लिफ्ट स्पैन में ऊपर उठ जाएगा। यानी यह पूरी तरह ऑटोमेटिक है। वहीं, इसके पहले वाला पम्बन पुल कैंटिलीवर पुल था। इसे लीवर के जरिए खोला जाता था। पुल को ऊपर की ओर उठाकर खोलने के लिए 14 आदमी मिलकर लीवर घुमाते थे।

नए पम्बन ब्रिज की खास बात यह है कि यह समुद्री हलचल या चक्रवात का भी ध्यान रखता है। अगर समुद्री हवा की गति 58 किलोमीटर प्रति घंटा या उससे ज्यादा हो जाती है तो यह वर्टिकल सिस्टम काम नहीं करेगा। यहाँ पर ऑटोमैटिक रेड सिग्नल हो जाएगा। यानी हवा की गति सामान्य होने तक पुल पर ट्रेन की आवाजाही बंद रहेगी। तूफान, चक्रवात जैसी आपदा में सुरक्षा को ध्यान में रखकर यह सिस्टम तैयार किया गया है।

पुराना पम्बन ब्रिज का इतिहास

पम्बन का पुराना रेलवे पुल अंग्रेजों ने 111 साल पहले बनवाया था। रेलवे बोर्ड के सूचना एवं प्रकाशन के कार्यकारी निदेशक दिलीप कुमार ने बताया कि पम्बन के पुराने पुल को 24 फरवरी 1914 को शुरू किया गया था। दरअसल, ब्रिटिश शासन ने सन 1850 में भारत और श्रीलंका को जोड़ने के लिए समुद्री मार्ग बनाने की योजना बनाई थी। इसके लिए पाल्क स्ट्रेट में एक नहर बनाने पर विचार किया गया।

नहर बनाना आसान नहीं है। इसके लिए आर्थिक सहित भौगोलिक कारण जिम्मेदार थे। जब अंग्रेजों को लगा कि यह योजना असंभव है तो अंग्रेजों ने अन्य विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया। नए प्लान में अंग्रेजों ने तमिलनाडु के मंडपम और पम्बन द्वीप के बीच रेलवे लाइन बिछाने का फैसला किया। इसके बाद धनुषकोडी से श्रीलंका की राजधानी कोलंबो तक नाव से जोड़ने की योजना बनाई।

इस योजना पर काम करते हुए साल 1870 में पम्बन ब्रिज बनाने का प्लान तैयार किया गया। विभिन्न कारणों से इस पम्बन ब्रिज बनाने का काम 41 साल बाद यानी साल 1911 में शुरू हुआ। आखिरकार तीन साल में बाद 143 खंभों पर 2.2 लंबा एक ब्रिज बनकर तैयार हो गया और 24 फरवरी 1914 को इस पर रेल सेवा शुरू हुई। उस समय पम्बन पुल को बनाने की कुल लागत 20 लाख रुपए आई थी।

पुराना पम्बन ब्रिज (साभार: जागरण)

पुराने पुल का डिजाइन जर्मन इंजीनियर शेरजर तैयार किया था। इसलिए इसे ‘कैंटिलीवर शेरजर रोलिंग लिफ्ट ब्रिज’ भी कहा जाता था। इसे समुद्र के खारे पानी और तेज हवाओं से बचाने के लिए खास किस्म के लोहे से बनाया गया था। यह ब्रिज इंग्लैंड की राजधानी लंदन की टेम्स नदी पर बने ‘ट्रावर ब्रिज’ की तर्ज पर बनाया गया था। टावर ब्रिज का उद्धाटन 1895 में हुआ था और यह ब्रिज आज भी चालू है।

पम्बन का पुराना ब्रिज बेहद मजबूत था। वह साल 1964 के चक्रवात को भी झेल गया था। हालाँकि, ब्रिज को काफी नुकसान पहुँचा था, लेकिन मरम्मत के बाद इसे फिर से चालू कर दिया गया था। दरअसल, 23 दिसंबर 1964 को 240 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चक्रवात आया था। इस भयानक चक्रवात में धनुषकोडी पूरी तरह बर्बाद हो गया था। वहीं, इस ब्रिज को भी भारी नुकसान पहुँचा था।

उस दिन रात 11 बजे 6 डिब्बों वाली 653 पम्बन-धनुषकोडी पैसेंजर ट्रेन पुल पार कर रामेश्वरम से धनुषकोडी की ओर जा रही थी। चक्रवात के कारण यह ट्रेन समुद्र में पलट गई और बह गई। इसमें सवार लगभग 150 लोगों की मौत हो गई। अगली सुबह सिर्फ ट्रेन का सिर्फ इंजन मिला, बाकी हिस्से समुद्र में बह गए थे। तब यह ट्रेन धनुषकोडी तक जाती थी।

उस चक्रवात में पुराने ब्रिज के हुए नुकसान का मरम्मत करने की जिम्मेदारी दिल्ली मेट्रो को शुरू कराने वाले प्रसिद्ध इंजीनियर ई. श्रीधरन को दी गई थी। उन्होंने सिर्फ 46 दिनों में ही इसकी मरम्मत करके इस पुल को फिर से शुरू कर दिया था। साल 1988 तक यह ब्रिज मंडप को रामेश्वरम से जोड़ने का एक मात्र संपर्क-सूत्र था। बाद में यहाँ सड़क पुल बनाया गया।

जबलपुर में ‘इस्लामी धर्मांतरण का क्लीनिक’ चलाने वाला डॉक्टर खालिद खान गिरफ्तार, इलाज के लिए आई हिंदू लड़की को मुस्लिम बनाने पर था अमादा: पढ़िए FIR की डिटेल

मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक दीनी डॉक्टर गिरफ्तार किया गया है। यहाँ क्रेशर बस्ती, तिलवारा इलाके में खालिद खान नाम का डॉक्टर नाबालिग हिंदू लड़की के ब्रेनवॉश और इस्लाम में कन्वर्जन के एकदम करीब था। हालाँकि वो अब पुलिस की गिरफ्त में है।

जबलपुर के इस मामले में 17 साल 11 महीने की नाबालिग लड़की के पिता ने 2 अप्रैल 2025 को पुलिस को दी गई शिकायत में सारे घटनाक्रम को विस्तार से लिखा है। इसके बाद क्लीनिक में बैठ ‘दीनी’ काम करने वाले खालिद के खिलाफ तिलवारा थाने में एफआईआर दर्ज हुई है।

पीड़ित परिवार का कहना है कि खालिद खान ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर, लालच देकर और हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काकर इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया। ऑपइंडिया के पास इस केस के एफआईआर की कॉपी मौजूद है।

पीड़ित परिवार के मुताबिक, सब कुछ पिछले साल अगस्त से शुरू हुआ। लड़की को बुखार हुआ तो वो पास के खान क्लीनिक में इलाज के लिए गई, जहाँ खालिद खान बैठता था। यहीं से खालिद खान ने लड़की को अपने जाल में फँसाना शुरू किया। उसने लड़की का नंबर लिया और लगातार फोन पर बातें करने लगा।

परिवार का आरोप है कि खालिद खान ने हिंदू धर्म को बुरा-भला कहा, इस्लाम को श्रेष्ठ बताया और बाहर पढ़ाई, अच्छा घर और सुख-सुविधाओं का लालच देकर उसे धर्म बदलने के लिए उकसाया। लड़की नाबालिग और नासमझ थी, इसलिए वो उसके बहकावे में आ गई। उसने पूजा-पाठ छोड़ दिया और खालिद खान के कहने पर मुस्लिम रीति-रिवाज अपनाने लगी।

परिवार ने जब खालिद खान को समझाने की कोशिश की, तो उसने धमकी दी कि लड़की अब उसके कहने पर चलेगी। उसने कहा, “अगर तुमने उसे रोका, तो मैं लड़की से तुम्हारे खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखवा दूँगा।” परिवार डर गया, लेकिन खालिद खान रुका नहीं। उसने फोन और छिपकर मिलकर लड़की पर दबाव बनाना जारी रखा। हालत ये हुई कि लड़की ने रमजान में रोजा रखना शुरू कर दिया। उसका शरीर कमजोर होने लगा, चेहरा पीला पड़ गया। माँ ने जब पूछा तो लड़की ने सारी बातें उगल दीं। उसने बताया कि खालिद खान के कहने पर उसने ऐसा किया।

पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और खालिद खान को गिरफ्तार कर लिया। तिलवारा थाने के प्रभारी ब्रजेश मिश्रा ने बताया कि खालिद खान के खिलाफ मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम-2021 की धारा 3 और 5 के तहत मामला दर्ज किया गया है। परिवार का कहना है कि खालिद खान ने उनकी बेटी की जिंदगी बर्बाद करने की कोशिश की।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सूर्यकांत शर्मा ने बताया कि तिलवारा घाट थानान्तर्गत क्रेशर बस्ती में डॉक्टर खालिद खान होम्योपैथिक क्लीनिक चलाता था। क्षेत्र में रहने वाली एक नाबालिग बच्ची उसके पास इलाज के लिए जाती थी। इलाज की आड़ में डॉक्टर उसका ब्रेन वॉश कर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव बनाने लगा था। उसके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। फिलहाल उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

पीड़ित पिता की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर का अंश

इस घटना से नाराज बजरंग दल और हिंदू संगठनों ने 4 अप्रैल 2025 को सड़कों पर प्रदर्शन किया। लोगों ने खालिद खान के खिलाफ सख्त सजा की माँग की और पूछा कि उसने और कितनी मासूम लड़कियों को अपने जाल में फँसाया होगा।

वक्फ बिल बना कानून, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किए हस्ताक्षर: विरोध में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं 4 याचिका, मुस्लिम संगठन कर रहे विरोध

संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद वक्फ (संशोधन) बिल-2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपनी मंजूरी दे दी है। इसका गजट नोटिफिकेशन जारी हो गया है। इसके साथ ही अब वक्फ (संशोधन) बिल-2025 कानून बन गया है। अधिसूचना में कहा गया है, ‘संसद से पारित वक्फ संशोधन अधिनियम को 5 अप्रैल 2025 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है और इसे सामान्य जानकारी के लिए प्रकाशित किया जाता है।’

बता दें कि यह बिल बुधवार (3 अप्रैल 2025) की रात को लोकसभा में लगभग 12 घंटे तक बहस के बाद पारित हुआ था। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े थे, जबकि विरोध में 232 वोट पड़े थे। इसके बाद यह बिल गुरुवार (4 अप्रैल 2025) की रात राज्यसभा में भी पास हो गया। इस विधेयक के पक्ष में 128 सांसदों ने वोट दिया, जबकि विरोध में 95 वोट पड़े।

भारत का राजपत्र (साभार: TOI)

राज्यसभा में इस बिल पर लगभग 12 घंटे तक चर्चा चली थी। इस विधेयक पर विपक्ष की ओर से कई संशोधन भी पेश किए गए थे, लेकिन सदन ने इन संशोधनों को खारिज कर दिया था। राज्यसभा में वोटिंग के दौरान अंतिम समय में ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD) ने सरकार का समर्थन किया। इससे पहले BJD ने बिल का कड़ा विरोध किया था और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया था। 

इसके अलावा, संसद ने मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2025 को भी मंजूरी दी। यह बिल 1923 के ‘मुसलमान वक्फ अधिनियम’ को निरस्त करता है। इसे खत्म करने का उद्देश्य इसके पुराने प्रावधानों को खत्म करना है। अब जबकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद के दोनों सदनों में पारित इन विधेयकों पर हस्ताक्षर कर दिया है तो ये कानून लागू हो गए हैं।

दरअसल, वर्तमान में राज्यसभा सदस्यों की संख्या 236 हैं। बहुमत का आँकड़ा 119 है। वहीं, राज्यसभा में के सासंदों की कुल संख्या 98 सांसद हैं, जबकि NDA के सदस्यों की संख्या 118 है। वहीं, 6 मनोनीत सदस्य भी हैं। इस तरह NDA के पक्ष में कुल 124 संख्या है। राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के 27 सांसद हैं। अगर इंडी गठबंधन की बात करें तो यह संख्या 88 पहुँच जाती है।

राज्यसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025 पर चर्चा का जवाब देते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक वैधानिक निकाय है। इस कारण से इसे धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। रिजिजू ने कहा कि मुस्लिमों की भावनाओं को देखते हुए फिर भी हमने गैर-मुस्लिमों की संख्या सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ वक्फ विधेयक से मुस्लिमों को डरा रही हैं।

विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के अधिकांश सदस्य सदन से नदारद रहे। वहीं, सत्ता पक्ष सदस्य मौजूद रहे। बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल रखा था। चर्चा के दौरान कई बार खड़े होकर उन्होंने हस्तक्षेप किया। कॉन्ग्रेस सांसद नासिर हुसैन को टोकते हुए उन्होंने कहा कि अब तक ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन विधेयक में ऐसा नहीं है।

सरकार का कहना है कि इस अधिनियम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में सुधार करना, लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ाना और वक्फ बोर्डों में विभिन्न मुस्लिम संप्रदायों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। इसमें विरासत स्थलों की सुरक्षा, सामाजिक कल्याण में सुधार और मुस्लिम विधवाओं एवं तलाकशुदा महिलाओं सहित हाशिए पर पड़े लोगों के आर्थिक समावेशन का समर्थन करने के प्रावधान भी शामिल हैं।

वहीं, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि इस कानून से लाखों गरीब मुस्लिमों को लाभ होगा। उन्होंने कहा, “यह कानून व्यापक हितधारक परामर्श पर आधारित है और इसमें संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशें शामिल हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्रीय वक्फ परिषद में 22 सदस्य होंगे, जिसमें चार से अधिक गैर-मुस्लिम नहीं होंगे।

इस कानून के खिलाफ में कोर्ट पहुँचे विरोधी

वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 (तब बिल था) को लागू करने पर रोक लगाने की माँग वाली 4 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई हैं। इनमें से दो याचिकाएँ शनिवार (5 अप्रैल 2025) को लागू की गई हैं। एक याचिका वक्फ घोटाले के आरोपित AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने और दूसरी याचिका ‘एसोसिएशन फॉर द प्रोटेक्शन इन द मैटर्स ऑफ सिविल राइट्स’ नामक संस्था ने दाखिल की है।

इससे एक दिन पहले यानी शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को कॉन्ग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इसे चुनौती दी थी। अपनी याचिका में इसकी वैधता को चुनौती देते हुए दोनों ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) कानून भारत के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

बिहार के किशनगंज से लोकसभा सांसद मोहम्मद जावेद ने अधिवक्ता अनस तनवीर के माध्यम से दायर अपनी याचिका में कहा है कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों और उनके प्रबंधन पर मनमाने ढंग से प्रतिबंध लगाता है। इस कारण से मुस्लिमों मजहबी स्वायत्तता कमजोर होती है। उन्होंने यह भी कहा है कि इसमें विभिन्न प्रतिबंधों के जरिए मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव किया गया है।

वहीं, असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी याचिका में कहा है कि इस विधेयक के माध्यम से वक्फों और बौद्ध, जैन और सिख धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्तों को दी जाने वाली कई सुरक्षा को छीन लिया है। याचिका में कहा गया है, “यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है, जो धर्म के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।” वहीं, इसके खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने देश में विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

दिल्ली में ₹10 लाख का इलाज मुफ्त, लागू हुई ‘आयुष्मान भारत योजना’: BJP सरकार ने किया ₹2144 करोड़ का बजट पास, जानिए किसे मिलेगा फायदा

दिल्ली में शनिवार (5 अप्रैल 2025) को प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना को लागू कर दिया गया है। इसके लिए केंद्र और नई दिल्ली सरकार ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। नई दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक पहुँचाने की दिशा में ये महत्वपूर्ण कदम है।

आयुष्मान योजना तहत दिल्ली में इसकी पात्रता वाले परिवारों को सालाना 10 लाख रुपए की सहायता मिलेगी। इसमें केंद्र से पाँच और दिल्ली सरकार की ओर से पाँच लाख रुपए शामिल होंगे। अन्य राज्यों में 5 लाख रुपए तक का है।

योजना लागू होने के पहले चरण में 10 अप्रैल तक एक लाख लोगों का आयुष्मान कार्ड बनाए जाएँगे। बीजेपी ने विधानसभा चुनाव से पहले ही ऐलान किया था कि सत्ता में आने के बाद इस योजना को दिल्ली में लागू किया जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन लोगों के पास अंत्योदय अन्न योजना (AAY) का कार्ड है, उनके कार्ड सबसे पहले बनाए जाएँगे। राशन कार्ड की श्रेणी में ये सबसे नीचे आते हैं। इन परिवारों को 35 किलो राशन हर माह दिया जाता रहै। उनके बाद बीपीएल कार्ड धारकों की बारी आएगी। इस योजना के लिए सरकार ने 2144 करोड़ रुपए का बजट पास किया है।

गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल सरकार के वक्त राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 की सिफारिश के तहत दिल्ली में आयुष्मान योजना को लागू नहीं किया गया था। उलटा इस योजना के तहत दिए जा रहे हेल्थ कवर पर सवाल उठाए गए थे। लेकिन अब जब सरकार बदली है और कमान भाजपा के हाथ आई है तो उन्होंने दिल्ली के गरीब परिवारों को यह तोहफा दिया है।

शहनाज की जो दलीलें कोर्ट ने नहीं मानी, उसको आधार बना ‘मुस्लिम विक्टिम’ कार्ड चल रहा The Wire: हिंदू लड़की से रोजा रखवाने का मामला

उत्तर प्रदेश के झाँसी में शाहनाज और खुशनुमा नाम की दो महिलाओं ने 16 साल की एक हिंदू नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण करने की कोशिश की थी। उन्होंने नाबालिग को झाँसा दिया था कि रोजा रखने से वह अमीर हो जाएगी। इसके बाद नाबालिग लड़की ने 2-3 दिन तक रोजा भी रखा। अब इस मामले को वामपंथी प्रोपेंगडा न्यूज पोर्टल ‘द वायर’ ने आरोपितों की जमानत याचिका के हवाले से पैसे का मामला बताकर एक अलग एंगल देने की कोशिश की है।

दरअसल, यह मामला झाँसी के कोतवाली थाना क्षेत्र के भांडेरी गेट बाहर मोहल्ले से जुड़ा है। एक व्यक्ति ने अपनी पड़ोसी 40 वर्षीया शहनाज उर्फ सना और खुशनुमा पर आरोप लगाया था कि दोनों ने उसकी 16 साल की नाबालिग बेटी का इस्लाम में धर्मांतरण करने की कोशिश की। इसके लिए दोनों ने उसकी बेटी को बहकाया और रोजा रखने और नमाज पढ़ने के लिए उकसाया।

पिता का कहना था कि दोनों मुस्लिम महिलाओं ने उसकी बेटी को झाँसा दिया कि अगर वह मुस्लिमों के पाक महीने में रोजा रखने और नमाज पढ़ने से उसके परिवार की तरक्की होगी और वह अमीर हो जाएगी। चूँकि, दोनों पड़ोसी हैं तो नाबालिग ने शहनाज की बातों पर विश्वास कर लिया। नाबालिग लड़की ने रोजा रखना शुरू कर दिया और घर में नमाज पढ़ने लगी। तीन-चार दिन तक उसने ऐसा किया।

एक दिन उसके परिजनों ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया। उन्होंने नाबालिग लड़की को समझाया। जब शहनाज को पता चला कि नाबालिग के घर वालों ने उसका विरोध किया है तो वह उनके घर पहुँच गई।शहनाज नाबालिग लड़की के चाचा के कमरे में घुस गई और दरवाजा बंद करके आत्महत्या कर परिवार को फँसाने की धमकी देने लगी। इससे घबरा कर पीड़िता के चाचा ने पुलिस को फोन करके बुलाया।

शहनाज उन्हें झूठे मुकदमे में फँसाने की धमकी देते हुए वहाँ से भाग गई। घटना की जानकारी हिंदू संगठनों को मिली तो उन्होंने इसे धर्मांतरण का मुद्दा बताकर विरोध प्रदर्शन किया। नाबालिग लड़की के पिता ने 13 मार्च को कोतवाली थाने जाकर शिकायत दी। इसके आधार पर पुलिस ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5 (1) मुकदमा दर्ज कर लिया।

सीओ सिटी स्नेहा तिवारी ने कहा था कि शहनाज के खिलाफ नाबालिग लड़की को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने का केस दर्ज किया गया है। बाद में पुलिस ने दोनों महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद दोनों महिलाओं को कोर्ट में पेश करके जेल भेज दिया गया। पुलिस ने शांति भंग करने, जान से मारने या गंभीर चोट पहुँचाने और संपत्ति को नष्ट करने की धमकी देने, आपराधिक धमकी देने जैसी धाराएँ जोड़ीं।

इसके बाद दोनों महिलाओं ने जमानत के लिए कोर्ट में अर्जी दी। इस पर 26 मार्च को कोर्ट ने सुनवाई की। झाँसी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विजय कुमार वर्मा ने शहनाज़ को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। जज विजय कुमार वर्मा ने कहा कि शहनाज़ जाँच के दौरान गवाहों या सबूतों को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि वह पीड़िता के बगल में रहती है। इस आधार पर शहनाज की जमानत याचिका खारिज हो गई।

वामपंथी प्रोपेंगेडा पोर्टल वायर ने दिया नया एंगल

सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा संचालित वामपंथी प्रोपगेंडा वेब पोर्टल इस खबर को शहनाज की जमानत याचिका के आधार पर एक अलग एंगल देने की कोशिश की है। जमानत की याचिका दायर होने से पहले धर्मांतरण की कोशिश वाली इस खबर को विस्तार से वायर ने अपने पोर्टल पर जगह भी नहीं दी। अब इस पोर्टल पर उमर राशिद ने इसे धर्मांतरण को वित्तीय विवाद के रूप में दिखाने की कोशिश की है।

उमर राशिद ने ‘रोज़ा या आर्थिक विवाद: यूपी में एक मुस्लिम महिला को रमज़ान के दौरान ‘धर्मांतरण’ के लिए क्यों गिरफ़्तार किया गया?’ शीर्षक वाले अपनी खबर में आरोपितों के दावों को आधार बनाया है। जाहिर है कि कोई भी अपराधी ये नहीं कहता है कि उसने अपराध किया है। वह अक्सर यही कहता है कि सामने वाले ने उसे झूठे केस में फँसाया है और मामला कुछ दूसरा है।

इस मामले में भी राशिद ने आरोपित शहनाज के हवाले से धर्मांतरण के प्रयास वाले आरोपों को वित्तीय विवाद बनाने की कोशिश की और बड़ी चालाकी से मीडिया में सामने आया धर्मांतरण एंगल धूमिल करने का प्रयास किया। उसने आरोपित शहनाज के हवाले से रिपोर्ट में कहा कि कर्ज चुकाने से बचने की कोशिश में धर्मांतरण के केस में फँसाने के लिए झूठी कहानी रची है। शहनाज का कहना है कि शिकायकर्ता हिंदू व्यक्ति कुछ समय पहले बीमार पड़ गया था और उसकी पत्नी ने उससे 50,000 रुपए उधार लिए थे।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शिकायतकर्ता की पत्नी ने शहनाज से 10 दिनों में पैसे लौटाने का वादा किया था। जब वह पैसे वापस नहीं किए तो वह माँगने के लिए उसके घर जाने लगी, लेकिन शिकायतकर्ता की पत्नी किसी ना किसी बहाने से उसे टालती रही। घटना के दिन वह पैसे माँगने के लिए ही शिकायतकर्ता के घर गई थी, लेकिन शिकायतकर्ता के भाई ने उसे घर में बंद कर दिया।

उमर राशिद ने इस आरोप को बताने के लिए प्रोपगेंडा वेबसाइट के आर्टिकल में आधार शहनाज की बेल को रखा है जो हिंदू बच्ची से नमाज पढ़वाने, रोजा रखने के केस में आरोपित है। जाहिर है कि वह अपने-आप को पाक-साफ बताएगी ही और वो क्यों स्वीकारेगी कि उसने वो काम किया है। इस पूरे मामले में द वायर के पत्रकार ने पूर्व में क्या केस था इस पर तो बात रखी है, लेकिन इन वित्तीय लेन-देन के आरोप में पीड़ित या पुलिस जाँच का क्या कहना है इसे नहीं जाना। पूरी रिपोर्ट बेल याचिका पर बनाई गई। अगर पक्ष जाना भी होगा तो रिपोर्ट देख मालूम पड़ता है मामले को अलग मोड़ देने के उद्देश्य से या पाठकों के मन में भ्रम पैदा करने के उद्देश्य से उस पक्ष को रिपोर्ट में शामिल नहीं किया होगा।

वायर का यह रवैया कोई नया नहीं है। वह हिंदू विरोधियों और वामपंथियों के पक्ष में ऐसे ही तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए जाना जाता है। इस तरह की एक पक्षीय रिपोर्ट को लेकर द वायर मीडिया सर्किल में काफी बदनाम भी है। इस मामले में भी पोर्टल ने कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की है।