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क्यों ‘हिन्दू राष्ट्र’ की वापसी चाहता है नेपाल: चीन-पाकिस्तान-मिशनरियों ने बना लिया अड्डा, 17 साल भ्रष्टाचार-अस्थिरता से तंग जनता की उम्मीद बने ‘राजा’

भारतीय उपमहाद्वीप एक बार फिर अशांत हो गया है। बांग्लादेश के कुछ महीनों के बाद भारत के दूसरे मित्रवत देश नेपाल में जनता का एक बड़ा तबका सड़कों पर है। राजधानी काठमांडू तक में कर्फ्यू लगाना पड़ा है। बीते लगभग तीन दशक से लगातार अशांति झेल रहे नेपाल में लाखों की भीड़ हिन्दू राजशाही को वापस लाने की माँग कर रही है। उसकी माँग है कि नेपाल को वापस हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाए। लोकतंत्र के लगभग डेढ़ दशक के प्रयोग के बाद नेपाल फिर से उसी दोराहे पर खड़ा है, जहाँ से वह 1980 के दशक के अंत में चला था।

नेपाल में बीते तीन-चार दशकों से मची इस अशांति का फायदा चीन, अमेरिका, ईसाई मिशनरियों और इस्लामी कट्टरपंथियों को मजबूत करके पाकिस्तान ने उठाया है। नेपाल का उसके हिन्दू मूल से अलगाव करके लगातार तोड़ने के प्रयास किए जाते रहे हैं। भारत के भी कुछ नेता नेपाल को इस स्थिति में धकेलने के लिए जिम्मेदार हैं। नेपाल की हिन्दू जनता अब इस स्थिति में है कि उसे लोकतंत्र की बजाय वापस राजशाही और हिन्दू राष्ट्र बनाए जाने की माँग कर रहे हैं।

राजीव गाँधी ने किया नेपाल की राजशाही को खोखला

नेपाल में वर्ष 2008 में हिन्दू राजशाही का अंत हो गया था। राजा ज्ञानेन्द्र शाह को 2008 में अपनी गद्दी छोड़नी थी। इससे पहले वामपंथियों ने लगभग एक दशक नेपाल में खूब खून बहाया था। इसी के साथ 2008 में नेपाल की लगभग ढाई सदियों पुरानी राजशाही का अंत हो गया था।

हालाँकि, नेपाल की राजशाही की अंत की कथा लगभग इससे 20 वर्ष पहले ही लिखी जाने लगी थी। भले ही बाद में नेपाल में राजशाही वामपंथियों के आंदोलन ने खत्म की हो, इसके बीज भारत के प्रधानमंत्री रहने के दौरान राजीव गाँधी ने बो दिए थे। उनके एक कदम से ही नेपाल और भारत की दूरी बढ़ी, जिसे आज तक नहीं भरा जा सका है।

1980 के दशक के अंत तक नेपाल और भारत के रिश्ते मजबूत थे। सीमा को लेकर विवाद भी विशेष नहीं था। लाखों नेपाली भारत में काम करते थे। नेपाल अपनी किसी भी जरूरत के लिए भारत पर निर्भर था। भारत नेपाल को उत्पादों की सप्लाई करने में लगभग एकाधिकार की स्थिति रखता था।

80 के दशक का अंत होते-होते यह स्थितियाँ बदल गईं। राजीव गाँधी ने वर्ष 1989 में नेपाल को हर चीज की आपूर्ति रोक दी थी। भारत ने नेपाल को जाने वाले 21 में से 19 रास्तों को बंद किया था। तेल से लेकर राशन तक की नेपाल के लिए नाकाबंदी कर दी गई थी। नेपाल में इसके बाद तेल और खाने-पीने की भारी समस्या हो गई थी।

नेपाल में केरोसिन के लिए तक लंबी-लंबी लाइनें लग गई थीं। यह कदम राजीव गाँधी ने तब उठाया था जब नेपाल में कुछ ही दिन पहले रिक्टर स्केल पर 7 से अधिक तीव्रता वाला भूकंप आया था। तब राजीव गाँधी के इस कदम दो कारण बताए गए थे।

एक कारण तब नेपाल का चीन के हथियारों का एक सौदा करना बताया गया था। भारत का पक्ष रखने वालों ने कहा था कि यह उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है और वह ऐसा नहीं होने दे सकते। वहीं दूसरा कारण नेपाल के साथ आवागमन के लिए किए गए समझौतों के खत्म होने का बताया गया था।

इन सबके चलते नेपाल में तब राज कर रहे राजा बीरेन्द्र बिक्रम शाह की भारत से ठन गई थी। यह नाकाबंदी एक वर्ष तक चली थी और इस दौरान नेपाल को भारी समस्याएँ झेलनी पड़ी थीं। नेपाल और राजा महेन्द्र के साथ इस सलूक के पीछे एक और कहानी बताई जाती है।

नेपाल के राजा बीरेन्द्र, उनकी पत्नी ऐश्वर्या, सोनिया और राजीव गाँधी के साथ (बाएँ से दाएँ)

कहा जाता है कि 1988 में तब प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पत्नी सोनिया गाँधी के साथ नेपाल गए थे। यहाँ राजीव गाँधी काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भी पहुँचे थे। लेकिन यहाँ के पुजारियों ने उनकी पत्नी सोनिया गाँधी को मदिर में प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।

कहा जाता है कि यह सोनिया गाँधी के ईसाई होने के चलते कहा गया था। राजीव गाँधी ने इसके बाद राजा महेन्द्र से विषय में मदद माँगी थी। राजा महेन्द्र ने भी इस पर कोई मदद करने से इनकार कर दिया था और कहा था कि वह धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं दे सकते। बताते हैं कि रानी ऐश्वर्या भी सोनिया के मंदिर के भीतर जाने के विरुद्ध थीं।

यह बात भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी के हवाले से तथागत रॉय ने बताई थी। बताते हैं कि नेपाल में सोनिया को मंदिर में ना घुसने देने के चलते राजीव नाराज हो गए और भारत वापस आने के बाद उन्होंने नेपाल से राजशाही उखाड़ फेंकने के लिए कदम बढ़ाए। यह नाकाबंदी उसी का एक हिस्सा था।

राजीव गाँधी ने इसके साथ ही नेपाल के राजा के खिलाफ पार्टियों को इकट्ठा करने के लिए भी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ को लगा दिया। R&AW के स्पेशल डायरेक्टर रहे अमर भूषण ने अपनी किताब ‘इनसाइड नेपाल’ में बताया है कि राजीव गाँधी के आदेश पर R&AW ने नेपाल में राजा के खिलाफ चल रहे आंदोलन को मजबूत कर दिया।

इसके लिए तमाम जासूस भी भर्ती किए गए थे। जिस समय राजीव गाँधी ने नेपाल के खिलाफ नाकाबंदी लगाई, उसी समय नेपाल में राजा की शक्तियाँ कम करने और राजनीतिक पार्टियाँ संचालित करने पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए आंदोलन चल रहा था। जब नाकाबंदी हुई तो जनता और भड़क गई।

नेपाल की जनता और छात्र भारत के खिलाफ तो गुस्सा थे ही, वह राजा बीरेन्द्र शाह के भी खिलाफ हो गए। इन्हें R&AW ने इसी दौरान संगठित कर लिया। R&AW ने इस दौरान नेपाली कॉन्ग्रेस पार्टी और कम्युनिस्टों को मजबूत किया। यह आंदोलन हिंसक भी हुआ और इसमें कई लोग मारे भी गए। अप्रैल, 1990 में राजा को आखिरकार झुकना पड़ा।

R&AW के इस ऑपरेशन के चलते 1990 में राजा को राजनीतिक पार्टियों को मंजूरी देनी पड़ी। इसके बाद नेपाल के पूर्णरूपेण राजशाही नहीं रह गया। इसका रूप सांवैधानिक राजशाही हो गया। राजीव गाँधी के इस रवैये के चलते नेपाल चीन की तरफ भी झुका।

इस तरह राजीव गाँधी ने निजी नाराजगी के चलते जहाँ नेपाल को चीन की तरफ धकेला तो वहीं उसकी राजशाही की जड़े भी खोखली कर दी। जहाँ राजीव गाँधी ने नेपाल में कम्युनिस्टों को खाद-पानी देकर राजशाही को कमजोर किया तो वहीं भारत के कम्युनिस्टों ने इस राजशाही को खत्म करने में बड़ा रोल निभाया।

सीताराम येचुरी वर्ष 2006 में कम्युनिस्ट नेताओं से मिलने भी पहुँचे थे। तब नेपाल में राजशाही और गुरिल्ला फौजें लड़ाई लड़ रहीं थी। बताया जाता है कि वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कहने पर गए थे। माना जाता है कि सीताराम येचुरी के नेपाली वामपंथियों से गहरे संबंध थे।

2006 में उन्होंने वामपंथियों और नेपाल की बाकी पार्टियों के बीच एक समझौता भी करवाया था। इसे येचुरी फॉर्मूला कहा गया था। येचुरी ने अपनी इस यात्रा में कहा था कि 1990 में जो हासिल किया गया था, उसे अब आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

अस्थिरता का फायदा मिशनरियों को

नेपाल में तीन दशक से फैली इस अस्थिरता का फायदा विदेशी शक्तियों ने खूब उठाया है। ईसाई मिशानिरियाँ इसमें आगे रही हैं। हिन्दू राष्ट्र नेपाल लम्बे समय से कई ईसाई मिशनरियाँ एक्टिव हैं। बीबीसी की 2023 में आई एक रिपोर्ट ने बताया था एक दशक में नेपाल में ईसाइयों की आबादी 68% बढ़ी है।

नेपाल में 2011 में 3.76 लाख ईसाई रहते थे। यह संख्या 2001 में मात्र 1 लाख थी। वर्तमान में नेपाल में 5.5 लाख से अधिक ईसाई रहते हैं। यह स्थिति तब है, जब नेपाल में 1951 में एक भी ईसाई नहीं था। नेपाल की यह ईसाई जनसंख्या धर्मांतरण करने बनाई गई है। धर्मांतरण के निशाने पर नेपाल के सुदूर इलाकों के हिन्दू ही होते हैं।

साफ़ है कि जिस भी समय में नेपाल में अस्थिरता बनी रही है, वहाँ तेजी से धर्मांतरण हुआ है। यह सिलसिला अब भी जारी है। ईसाई धर्मांतरण का यह खेल 2008 में नेपाल के हिन्दू राष्ट्र का दर्जा खत्म हो कर सेक्युलर राष्ट्र बनने के बाद और तेजी से बढ़ा है।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में ईसाई धर्मांतरण में बड़ा रोल दक्षिण कोरिया की ईसाई मिशनरियों का है। दक्षिण कोरिया ने करीब दो दशक पहले नेपाल में ईसाई धर्म प्रचारकों को भेजना शुरू किया था। तब से लेकर अब तक करीब 20,000 कोरियाई मिशनरी हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के अभियान में शामिल हो चुके हैं।

नए आँकड़ों के अनुसार, नेपाल में लगभग 7758 चर्च हैं। यानी जहाँ 50 वर्ष पहले ईसाइयों की संख्या एक गाँव के बराबर नहीं थी, वहाँ आज 7700 से अधिक चर्च बन गए हैं। नेपाल में ईसाई धर्मांतरण में वामपंथी लड़ाकों का भी बड़ा रोल रहा है।

1995 के बाद से नेपाल में वामपंथी लड़ाकों ने अपना प्रभाव जमाना चालू कर दिया था। वामपंथी ज्यादातर उत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों में अपना बसेरा बनाए हुए थे। उन्होंने नेपाल की जनता को पढ़ाया कि धर्म अफीम है और हमें धर्म से कुछ नहीं मिलने वाला। वामपंथी नेपाल में हिन्दू धर्म के ही खिलाफ थे।

इसके बाद वामपंथियों और सरकार के बीच चली लड़ाई से यहाँ दरिद्रता आई। धर्म से दुराव और गरीबी ने ईसाई मिशनरियों के लिए एकदम उपजाऊ जमीन तैयार कर दी। पहले से परेशान लोगों को कहीं वित्तीय लालच देकर तो कहीं शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर बरगलाया गया और उन्हें ईसाइयत में धर्मांतरित किया गया।

ऐसा नहीं है कि नेपाल में किसी को भी इस धर्मांतरण की चिंता नहीं है। नेपाल के पूर्व उपप्रधानमंत्री कमल थापा ने बीबीसी से बात करते हुए ईसाई मिशनरियों पर कहा था कि यह जंगल में आग की तरह नेपाल के भीतर फ़ैल रही हैं। उन्होंने चिंता जताई थी कि इससे देश की संस्कृति का अस्तित्व खतरे में आ जाएगा।

इस्लामी कट्टरपंथ भी फैला रहा पाँव

नेपाल में ईसाई मिशनरियों के साथ ही इस्लामी कट्टरपंथ भी अपने पैर पसार रहा है। वर्ष 2001 में नेपाल में 9.54 लाख मुस्लिम आबादी थी। 2021 में यह बढ़कर 14 लाख से अधिक हो चुकी है। नेपाल में सिर्फ मुस्लिमों की जनसंख्या ही नहीं बढ़ी है बल्कि कट्टरपंथ भी बढ़ा है।

भारत की सीमा से लगे इलाकों में नेपाल में मस्जिद और मदरसे उग आए हैं। ऑपइंडिया ने इस मामले में 2022 में की गई एक ग्राउंड रिपोर्ट में पाया था कि सीमाई इलाकों में अर्थव्यवस्था भी बड़े स्तर पर मुस्लिमों का कब्जा है। 2008 तक हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल में मुस्लिमों ने एक गाँव का नाम बदल कर इस्लाम नगर करने तक की कोशिश की थी।

नेपाल के सीमाई इलाकों में तेजी से इस्लाम घुसपैठ कर रहा है

एक और घटना में सामने आया था कि पहले रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए पहले कच्ची झुग्गियां बसाई गईं थी और बाद में इस जगह पर पक्के मकान बनाए जाने की माँग कर दी थी। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब कट्टरपंथियों ने सड़क पर उतर कर भी उत्पात मचाया है।

चीन और ISI ने उठाया नेपाल में गड़बड़ी का फायदा

नेपाल में अस्थिरता और उसके हिन्दू राष्ट्र के दर्जे के खत्म होने का फायदा चीन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने उठाया है। ISI ने नेपाल को भारत में नकली नोट भेजने के लिए अड्डे की तरह इस्तेमाल किया था। भारत से भागे कई बड़े इस्लामी आतंकी भी नेपाल में ही पकड़े गए हैं।

पाकिस्तान नेपाल में इस्लामी कट्टरपंथियों को भड़का और अपने जासूस भेज कर इस इलाके को भी अपने लिए इस्तेमाल करता आया है। भारत के साथ खुली सीमा के चलते पाकिस्तानियों ने इसे भारत से भागने के एक रूट की तरह भी इस्तेमाल किया है। विकिलीक्स में भी सामने आया था कि पाकिस्तान ने काठमांडू में एक आतंकी संगठन तक खड़ा कर दिया था।

भारत के दबाव के बाद 2020 में नेपाल ने कई पाकिस्तानी नागरिक पकड़े थे। यह नागरिक भारत में नकली नोट लाने और आतंकी नेटवर्क बढ़ाने के लिए करते थे। 1990 के दशक के दौरान दाऊद इब्राहिम गैंग ने नेपाल को अपना बेस बनाया था। भारत में अपराध करने के बाद अपराधी नेपाल भाग जाते थे।

जहाँ पाकिस्तान अपने मंसूबे के लिए नेपाल को इस्तेमाल करता आया है, तो वहीं चीन भी अपनी विस्तारवादी नीति के चलते नेपाल को अपने घेरे में लेना चाहता है। राजीव गाँधी के नेपाल को लेकर लिए गए एक्शन ने उसे चीन की तरफ धकेल दिया था।

चीन हमेशा से ही नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। वह नेपाल के सहारे भारत को घेरना चाहता था। 2008 में कम्युनिस्टों के सत्ता में आने के बाद चीन की नेपाल में घुसपैठ को नया सहारा मिला है। कम्युनिस्ट भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन के साथ व्यापार और सहयोग बढाते हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण नेपाल का बेल्ट एवं रोड परियोजना में शामिल होना है। नेपाल इसको लेकर ना-ना करता आया है लेकिन चीन उसे इसमें शामिल कर चुका है। चीन नेपाल को श्रीलंका की तरह ही कर्ज के जाल में फंसा कर उसका इस्तेमाल भारत को उसके ही घर के पिछवाड़े में घेरने के लिए करना चाहता है।

नेपाल ने चीन से कर्ज लेकर हाल ही में पोखरा में एक नया एयरपोर्ट भी बनाया है। यह एयरपोर्ट वैसे मरीज की तरह है, जो अस्पताल पहुँचने से पहले ही मर चुका है। इस एयरपोर्ट पर पहली उड़ान के लिए नेपाल ने भारत से गुहार लगाई थी लेकिन उसने मना कर दिया। इसके बाद चीन की एक फ्लाइट से यहाँ काम चालू हुआ।

यह एयरपोर्ट ग्वादर और हम्बनटोटा की तरह खाली पड़ा है। आशंका है कि इसके लिए दिए गए कर्जे की वसूली को चीन नेपाल पर दबाव बनाकर यह एयरपोर्ट कब्जा सकता है। नेपाल के आंतरिक मामलों में भी चीन का दखल है।

2020 में चीनी महिला राजदूत के नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तक को हनीट्रैप करने की खबरें सामने आई थीं। यह जासूस भारत के खिलाफ नेपाल को भड़का रही थी। नेपाल से उसका इसके बाद तबादला कर दिया गया था।

मधेशी और पहाड़ी के झगड़े ने और बिगाड़ी स्थितियाँ

इन सब लड़ाइयों के इतर नेपाल में मधेशी और पहाड़ी के झगड़े ने और स्थितियाँ बिगाड़ी ही हैं। मधेशी नेपाल के तराई और भारत से सटे अधिकांश इलाकों में रहने वाले लोगों को कहते हैं जबकि पहाड़ी जनसंख्या देश के पर्वतीय इलाकों में बसती है।

नेपाल में राजशाही के खत्म होने के साथ ही मधेशी और पहाड़ी जनता के बीच खाई और बड़ी हो गई। मधेशी हितों की बात करने वालों का कहना है कि नेपाल की राजनीति में हमेशा से ही पहाड़ी जनता का प्रभुत्व रहा है और मधेशियों को वह प्रतिनिधित्व नहीं है जिसके वह हकदार हैं।

इसके अलावा मधेशी अपने इलाके को स्वायत्तता ना दिए जाने को लेकर भी आक्रोशित रहे हैं। इस लड़ाई का एक और सिरा नेपाल के माओवादी आंदोलन से भी जुड़ता है। दरअसल, नेपाल के माओवादी आंदोलन के अधिकांश नेता पहाड़ी जनसंख्या से आते थे।

2015 में मधेशियों ने नेपाल में बड़ा आंदोलन किया था (फोटो साभार: Hindustan Times)

इनका काडर भी यहीं से था। तमाम माओवादियों ने आंदोलन के दौरान तराई इलाकों में बड़ी लूटमार की और अपहरण तथा हत्याओं का एक दौर चलाया। इसके चलते भी अलगाव है। 2008 और 2015 में संविधान बनने के दौरान भी मधेशियों ने आंदोलन किया था।

2015 में यह आंदोलन हिंसक भी हो गया था। इसमें तमाम मधेशी मारे गए थे। काफी बवाल के बाद नेपाल की सरकार मधेशियों की कुछ मांगों को लेकर मानी थी। मधेशियों और पहाड़ियों की इस लड़ाई ने पहले से अशांत नेपाल को एक और समस्या दी है और यहाँ के लोगों की जिन्दगी कठिन कर दी है।

ऊब गए हैं नेपाल के लोग

नेपाल में बीते 30 वर्षों में जनता और विशेष कर हिन्दुओं ने इतनी अस्थिरता और लड़ाइयाँ देख ली हैं कि वह अब पुराने ढर्रे पर लौटना चाहते हैं। उन्होंने पिछले तीन दशक में राजतंत्र, संवैधानिक राजतंत्र और लोकतंत्र सब कुछ देख लिया है। इसमें सबसे बुरी स्थिति उनकी लोकतंत्र के चलते हुई है।

नेपाल में 2008 में राजशाही खत्म होने के समय लोकतांत्रिक पार्टियों ने नेपाली जनता से बड़े वादे किए थे। उन्होंने तत्कालीन राजा ज्ञानेन्द्र को पूरी प्रक्रिया से सिरे से बाहर कर दिया था। एक दशक तक हिंसा का दौर झेलने वाले नेपाली युवाओं को रोजगार और नेपाली जनता को खुशहाली का वादा किया गया था।

2025 आते-आते नेपाल में इसमें से अधिकांश वादे पूरे नहीं हुए हैं। नेपाल लोकतंत्र आने के बाद अस्थिरता का शिकार हो गया है। 2008 से 2025 के बीच 17 वर्षों में नेपाल में 13 बार सरकार बन-बिगड़ चुकी है। 13 बार प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। इनमें से 11 बार तो सरकार पूरे 2 वर्ष भी नहीं चल पाई है।

राजशाही के खिलाफ हथियार उठाने वाले वामपंथी दल आज आपस में ही सिर फुटौव्वल का शिकार हैं। शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली, पुष्प कमल दहल प्रचंड और बाबूराम भट्टाराई जैसे नेताओं के इर्द-गिर्द ही नेपाल की राजनीति बीते लगभग 2 दशक से घूम रही है।

लोकतंत्र के आने के बाद नेपाल के नेता आपस के ही झगड़े नहीं सुलटा पाए हैं। वर्तमान में नेपाल में बेरोजगारी दर 12% से भी अधिक है, जो कि भयावह है। युवाओं में तो यह दर 20% के भी पार है। बड़ी संख्या में युवा काम करने के लिए नेपाल से भारत या फिर अरब और यूरोपियन देशों में भाग रहे हैं।

नेपाल में युवा बेरोजगारी की दर 20% से अधिक है (फोटो साभार: The Kathmandu Post)

एक रिपोर्ट बताती है कि नेपाल से रोज औसतन 1700 लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। देश छोड़ने वालों में अधिकांश युवा हैं। नेपाल की जनसंख्या का लगभग 10% हिस्सा दूसरे देशों में काम की तलाश में जा चुका है। वर्तमान में लगभग 23-24 लाख लोग नेपाल छोड़ कर विदेशों में काम कर रहे हैं।

बेरोजगारी के अलावा दूसरा बड़ा मुद्दा नेपाल में लोकतंत्र के बाद आया भ्रष्टाचार है। राजशाही के समय सत्ता केंद्रीकृत थी और भ्रष्टाचार का सामना आम जनता को रोजाना के काम में नहीं करना पड़ता था। लेकिन अब भ्रष्टाचार ने नेपाल में गहरी जड़ें जमा ली हैं।

द काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट बताती है कि नेपाल में 2023 में भ्रष्टाचार के 28 हजार से अधिक मामले दर्ज हुए थे। कई जगह तो सरकारी विभागों का काम इसलिए अटका पड़ा है क्योंकि वहाँ कई अधिकारी और कर्मचारी भ्रष्टाचार के आरोप में या तो निलंबित हैं या जेल काट रहे हैं।

इन सबके चलते आम जनता में असंतोष है। इसके अलावा मूलभूत सुविधाओं का भी टोटा है। एक रिपोर्ट बताती है कि नेपाल में 73% लोगों को स्वच्छ पीने का पानी नहीं मिलता है। एक और रिपोर्ट बताती है कि नेपाल की लगभग 35 लाख जनता अभी बिजली से वंचित है। पहाड़ी इलाकों में सड़कों की भी कमी है। इसके चलते नेपाल के लोग अब ऊब चुके हैं।

अब फिर राजशाही और हिन्दू राष्ट्र की माँग

नेपाल को बीते 3 दशक से हिंदुत्व और राजशाही से दूर किया जाता रहा है। वर्तमान में नेपाल सेक्युलर राष्ट्र है। यहाँ राजशाही भी नहीं है। लेकिन तब भी लोगों की समस्याएँ नहीं सुलझ पाई हैं। उन्हें अब लग रहा है कि माओवादी आंदोलन के चलते हटाई गई राजशाही वापस उनका देश ठीक कर सकती है।

नेपाल में राजशाही का इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना राजा पृथ्वी नारायण शाह ने की थी। उसके बाद 2008 तक उनकी ही पीढ़ियों ने यहाँ शासन किया। हालाँकि, इस बीच राजशाही के सामने कई समस्याएँ भी आईं।

19वीं शताब्दी के मध्य से 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक इस परिवार को कब्जे में रख कर राणा परिवार नेपाल पर शासन करता रहा था। हालाँकि, 1950 के दशक में राजा त्रिभुवन शाह ने तख्तापलट करके सत्ता वापस अपने हाथ में ले ली थी। उनकी 1955 में मौत हो गई। इसके बाद महेन्द्र 1972 तक राजा रहे।

1972 के बाद बीरेन्द्र बिक्रम शाह राजा बने। उनका कार्यकाल घटनाओं से भरा हुआ था। चाहे 1989 में राजीव गाँधी से नाकाबंदी का सामना हो या फिर 1990 में लोकतंत्र का सामना। उनके ही राज के दौरान नेपाल में वामपंथी आंदोलन भी चालू हो गया था। हालाँकि, 2001 में राजा बीरेन्द्र और बाक़ी पूरे परिवार की उनके बेटे दीपेन्द्र ने हत्या कर दी थी।

राजा ज्ञानेन्द्र का अब भी जनता में बड़ा सम्मान है (फोटो साभार: The Kathmandu Post)

इसके बाद उनके भाई ज्ञानेन्द्र को राजा बनाया गया था। ज्ञानेन्द्र का कार्यकाल नेपाल में राजशाही का अंत था। ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल के दौरान नेपाल में सत्ता परिवर्तन हुआ था। ज्ञानेन्द्र के कार्यकाल तक नेपाल हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था।

17 वर्ष बाद वापस नेपाल उसी मोड़ पर है। इन 17 वर्षों में नेपाल में लोकतंत्र वह करने में सक्षम नहीं रहा है, जो वहाँ की जनता चाहती है। ऐसे में बीते कुछ समय से राजा ज्ञानेन्द्र को वापस लाने की माँग उठी है। नेपाल के हिन्दुओं को लगता है कि राजशाही और हिन्दू राष्ट्र के दर्जे की वापसी ही उनके लिए अब एक रास्ता बचा है।

यह कोशिश एकतरफ़ा नहीं है। नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र ने हाल ही में एक वीडियो जारी किया था। उन्होंने इस दौरान ‘जिम्मेदारी अपने हाथ में लेने’ की बात कही थी। यह एक बड़ा सन्देश था। नेपाल में राजशाही के जाने के बाद यह पहली बार था जब पूर्व राजा ने ऐसी बात कही हो।

राजा ज्ञानेन्द्र के लिए लोकतंत्र के दौरान भी समर्थन कुछ कम नहीं हुआ था। जनता का एक बड़ा हिस्सा अब भी राजा के प्रति श्रद्धा रखता है। 9 मार्च, 2025 को नेपाल के राजा ज्ञानेन्द्र शाह वापस राजधानी काठमांडू आए थे। वह इससे पहले पूरे देश के मंदिरों की यात्रा पर थे।

उनके काठमांडू आने के बाद एयरपोर्ट के बाहर लाखों की भीड़ ने स्वागत किया था। इसने उनके समर्थन बारे में सब स्पष्ट कर दिया। उनके समर्थकों ने वापस आने के बाद राजशाही समर्थक नारे भी लगाए थे। समर्थकों के हाथों में ‘राजशाही वापस लाओ’, ‘हमें हमारा राजा वापस दो’ और ‘ये नेपाल ज्ञानेंद्र का है’ की तख्तियां थी।

नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए आवाज उठाने वालों में सबसे बड़ा नाम राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी का है। यह पार्टी नेपाल में राजशाही के साथ ही हिन्दू राष्ट्र की वापसी चाहती है। यह पार्टी बड़े प्रदर्शन भी आयोजित कर चुकी है। राजा ज्ञानेन्द्र की काठमांडू वापसी के बाद बड़ा समारोह भी इसी पार्टी के नेतृत्व में आयोजित किया गया था।

यह सिर्फ एक ट्रेलर भर था। 28 मार्च, 2025 को नेपाल में राजशाही के लिए हो रहा आंदोलन हिंसक हो गया। RPP ने 28 मार्च को एक बड़ा प्रदर्शन काठमांडू में किया। इस आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने राजशाही की वापसी की माँग की। इस आन्दोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठियाँ चलाई और फायरिंग भी कर दी।

इसके चलते 1 प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। इससे आंदोलन और उग्र हो गया। काठमांडू के तिन्कुने इलाके में हुए इस प्रदर्शन के दौरान पुलिसिया कार्रवाई के विरोध में उग्र हुए समर्थकों ने कई इमारतों में तोड़फोड़ की। एक इमारत में आग लगा दी। इसके चलते एक मीडियाकर्मी की मौत हो गई।

राजशाही को लेकर हुए प्रदर्शन में हाल ही में 2 लोग मारे गए थे (फोटो साभार: The Kathmandu Post)

काठमांडू में इस प्रदर्शन के चलते कर्फ्यू लगाना पड़ा। यहाँ सेना भी बुलानी पड़ गई। इस आंदोलन ने दिखाया कि नेपाल में राजशाही का कितना बड़ा तबका समर्थन करता है। RPP की केन्द्रीय समिति की सदस्य स्वाति मिश्रा ने कहा कि वह राज ज्ञानेन्द्र को एक राजा के रूप में नहीं बल्कि अभिभावक के रूप में वापस चाहते हैं।

RPP का कहना है कि वह हिन्दू धर्म को नेपाल में एक स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में उपयोग करना चाहते हैं। RPP की इस बात में वजन भी दिखाई पड़ता है। नेपाल के एकीकरण और उसकी स्थिरता में धर्म का बड़ा रोल रहा है। लोगों को लगता है कि देश को सेक्युलर बनाए जाने के बाद ही अथिरता का माहौल आया है।

नेपाल में राजतंत्र के समय हिन्दू धर्म राजशाही पर भी नियंत्रण रखने वाली शक्ति के रूप में भी था। नेपाल की धार्मिक जनता और राजा का धर्म के प्रति जुड़ाव उसे अस्थिर होने से बचाता था। हालाँकि, नेपाल में संविधान संशोधन करके इसे सेक्युलर किया गया। यह वामपंथी पार्टियों का एक एजेंडा था।

इसके चलते नेपाल में धर्म एकीकरण करने वाली शक्ति के की हैसियत से तो हटा ही, बल्कि नेपाल, चीन की तरफ भी झुक गया। धर्म ही नेपाल को भारत से भी मजबूती से जोड़ कर रखता था। वामपंथी पार्टियाँ अब भारत की बजाय चीन की तरफ भागती हैं। इससे लेकिन जनता का जुड़ाव नहीं हो पाता। क्योंकि उसका सांस्कृतिक जुड़ाव भारत से है।

नेपाल की जनता को अब लगता है कि लोकतंत्र ने उन्हें केवल भ्रष्टाचार, अस्थिरता, आंतरिक लड़ाई और वादे ही दिए हैं जबकि राजशाही के दौर में वह ज्यादा समृद्ध थे। इसीलिए राजशाही का समर्थन करने वालों में आम जनता के साथ ही नेपाल के बड़े व्यापारी भी शामिल हैं।

नेपाल के बड़े कारोबारी दुर्गा परसाई भी इसी आंदोलन का हिस्सा हैं। नेपाल की जनता के साथ ही उसका अभिजात्य वर्ग भी राजशाही का समर्थक रहा है। बॉलीवुड अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यहाँ के संविधान ने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया है। कोइराला नेपाल के शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से आती हैं।

उन्होंने कहा था कि नेपाल में राजा को नए संविधान में एक स्थान दिया जाना चाहिए था। उन्होंने नेपाल की वर्तमान व्यवस्था को एक ‘लोकतंत्र का मुखौटा’ बताया था। उन्होंने कहा था कि राजशाही का आज भी 90% नेपाली जनता किसी ना किसी तरह से समर्थन करती है। मनीषा कोइराला ने बताया था कि नेपाल के लोगों के मन से राजशाही को हटाया नहीं जा सकता।

अब चाहे कोइराला हों नेपाल की आम जनता, सब यह मानते हैं कि राजशाही वापस उनकी समस्याएँ हल कर सकती है। नेपाल की राजनीतिक पार्टियाँ राजशाही के लिए हो रहे आंदोलन के पीछे राजा ज्ञानेन्द्र का हाथ मानती हैं। उनका भारत के ऊपर भी राजशाही को हवा देने का आरोप है।

यह कोई नई बात नहीं है, काठमांडू के भीतर एक कटोरी के जमीन पर गिरने को भी भारत की साजिश बता दिया जाता है। पार्टियाँ राजा की किसी भी तरह से वापसी नहीं चाहती। भारत ने अभी इस आंदोलन और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर कोई प्रतिक्रया नहीं दी है।

देखने वाली बात होगी कि आगे नेपाल में वापस राजा का शासन आ पाता है या लोकतंत्र अपनी जगह वापस बनाए रखता है। नेपाल वापस हिन्दू राष्ट्र बनेगा या नहीं, यह समय के गर्भ में है। कोई बीच का रास्ता भी सामने आ सकता है जहाँ राजा और लोकतंत्र, दोनों को हिस्सेदारी दी जाए।

रजिया खातून ने इस्लामी भीड़ को दिए हथियार, आरिफ-आसिफ ने महिलाओं का साड़ी-ब्लाउज खींचा: झारखंड में त्योहार पर जनजातीय समाज का उत्पीड़न, बंदूक भी लहराया

झारखंड की राजधानी राँची से सटे पिठौरिया के हेठबालू गाँव में सरना जनजातीय समुदाय के त्योहार सरहुल उत्सव के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों ने 1 अप्रैल को हमला कर दिया था। हमले में घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना के विरोध में जनजातीय समुदाय के लोगों ने गुरुवार (3 अप्रैल 2025) को राँची-पतरातू रोड को जाम कर दिया। सामने आए वीडियो में महिला ने छेड़छाड़ करने और बंदूक से गोली मारने का भी आरोप लगाया है।

महिलाओं का कहना है कि सरना पूजा करने जाने के दौरान इस्लामी भीड़ द्वारा उन पर लाठी-डंडे से हमला किया गया और कुल्हाड़ी-बंदूक आदि दिखाकर धमकी दी गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस हमले की मास्टरमाइंड रजिया खातून है। वहीं, आसिफ और आरिफ पर महिलाओं का ब्लाउज और साड़ी खींचकर उसे फाड़ने की कोशिश की।

इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है। इसमें जनजातीय समुदाय की महिलाएँ बता रही हैं कि उनके साथ इस्लामी कट्टरपंथी हमलावरों ने किस तरह दुर्व्यवहार किया। वीडियो में एक लड़की ने अपने कंधे और गले पर लगे चोटों के निशान दिखाते हुए बताया कि रजिया खातून ने उसके साथ मारपीट की है। दिखने में नाबालिग लगने वाली उस लड़की ने बताया कि यात्रा के दौरान पीछे से आसिफ/आरिफ ने उनका ब्लाउज खींच लिया।

महिला ने बताया कि यात्रा में इस्लामी हमले के दौरान उसके पति पर हमला कर दिया, जिसकी वजह से उसके सिर में गहरी चोट आई है। महिला का कहना है कि उसके पति के सिर में खून जमा होने का खतरा है। महिला ने आशंका जाहिर की कि अगर उसके पति को कुछ होता है तो वह अपने बच्चे को लेकर कहाँ जाएगी। उसने चेतावनी देने के अंदाज में कहा कि अगर उसके पति को कुछ हुआ तो वह छोड़ेगी नहीं।

महिलाओं का कहना है कि हमला करने वालों में उनके गाँव के साथ-साथ आसपास के गाँवों के मुस्लिम भी शामिल थे। महिलाओं ने बताया कि हमलावरों में रजिया खातून के अलावा आसिफ अंसारी, आरिफ अंसारी, गुलशन अंसारी, गुलजार अंसारी, जुल्फान अंसारी आदि लोग भी शामिल थे। महिला ने कुल्हाड़ी दिखाते हुए कहा कि उसी से उसके भतीजे पर हमला किया गया था।

सरना पूजा के लिए निकली जनजातीय महिलाओं में बच्चियाँ से लेकर बुजुर्ग महिलाएँ तक शामिल थीं। इनमें से किसी को नहीं बख्शा गया। सरना महिलाओं का आरोप है कि सरना पूजा के लिए उन्होंने झंडा लगा रखा था। रजिया खातून ने उन झंडों को निकाल कर फेंक दिया। महिलाओं का कहना है कि रजिया ने उनसे कहा, “इस रास्ते से नहीं जाना है। तुम लोगों (जनजातीय) को अब यहाँ नहीं रहना है।”

इतना ही नहीं, महिलाओं ने यह भी कहा कि जब कट्टरपंथी मुस्लिम हमला कर रहे थे, तब रजिया सबको लाठी-हथियार दे रही थी। एक दूसरी महिला ने कहा कि रजिया खातून खुद भी सरना जनजातीय लोगों पर पत्थर फेंक रही थी। महिलाओं का आरोप है कि रजिया खातून ने बेटे ने झगड़े की शुरुआत की थी। वहीं, आसिफ अंसारी बंदूक तानकर सबको गोली मारने की धमकी दे रहा था।

महिलाओं का आरोप है कि इस बार के ईद में मुस्लिमों ने सड़कों के ऊपर झालर बाँध दिया था। जब वे सरना के लिए जा रहे थे, तो उनके झालर में इनका झंडा लग गया था। इसके बाद इस्लामी भीड़ भड़क उठी थी और उन लोगों पर हमला कर दिया था। एक अन्य महिला का कहा मुस्लिम उनके त्योहार में झमेला करते हैं।

जनजातीय समुदाय में आक्रोश

इस घटना के विरोध में सरना समुदाय के लोगों ने राँची-पतरातू रोड को सुबह नौ बजे से जाम कर दिया। इसके साथ ही पिठौरिया बाजार की सभी दुकानों को भी बंद करा दिया। आक्रोशित लोगों ने हमलावरों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। हालाँकि, पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन लोगों का कहना है कि जब तक बाकी आरोपितों को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा।

पीड़ितों का आरोप है कि न सिर्फ उनकी शोभायात्रा को रोका गया, बल्कि पाहन (पुजारी) और अन्य लोगों के साथ मारपीट भी की गई। इस घटना में रवि पाहन, नगदेव पाहन, पईनभोरा मुंडा, संदीप मुंडा, विजय मुंडा, अजय मुंडा, अरविंद मुंडा, करण मुंडा घायल हो गए हैं। पीड़ितों ने बुधवार (2 अप्रैल 2025) को जाकर थाने में शिकायत दी, जिसके आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की।

FIR में पुलिस ने आदम अंसारी, आरिफ अंसारी, मिंटु अंसारी और जुएफा अंसारी को नामजद किया है। वहीं, कई अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि सरहुल की शोभायात्रा हेठबालू गाँव में हरगढ़ी स्थान पर पहुँची तो हमलावरों ने धारदार हथियारों से हमला कर दिया। हमलावर पहले से ही वहाँ घात लगाकर बैठे थे।

क्या है मामला?

दरअसल, मुस्लिम समाज के लोगों ने सड़क के दोनों तरफ झालर लगाया था। इसी दौरान जनजातीय समाज ने सरहुल के मौके पर पूजा वाले रास्ते में परंपरा के अनुसार सड़क के किनारे झंडा लगा दिया। एक दिन पूर्व भी दोनों पक्षों के बीच इसको लेकर तनातनी हो चुकी थी। 1 अप्रैल को जब सरहुल मनाने के लिए जनजातीय समाज के लोग जा रहे थे मुस्लिमों के लगाए झालर में ट्रैक्टर में फँसकर टूट गया।

इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने उन पर लाठी-डंडे, ईंट-कुल्हाड़ी से हमले कर दिए। सरहुल शोभायात्रा का नेतृत्व कर रहे पाहन सहित 8 लोग इस हिंसा में घायल हुए हैं। वहीं मुस्लिम समाज का कहना है कि उनकी तरफ भी 4 लोगों को चोटें आई हैं। उसे पकड़ के पुलिस को सौंप दिया गया है। डीएसपी अमर कुमार पांडेय का कहना है कि साज-सज्जा को लेकर दोनों पक्षों में झड़प हुई थी।

पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शासनकाल में समुदाय विशेष का दुस्साहस बढ़ गया है। हेमंत सोरेन न तो सरना स्थलों की रक्षा कर पा रहे हैं, न ही सरहुल उत्सव की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं। उन्होंने सरहुल जुलूस में बाधा उत्पन्न करने वाले उपद्रवियों पर बिना विलंब सख्त कारवाई करने की अपील राँची पुलिस से की है।

बाबूलाल मरांडी ने कहा, “हेमंत सोरेन जी, फिर एक नौटंकी कीजिए – जैसे आपने पहले सरना स्थल आंदोलनकारियों पर मुक़दमा दर्ज कराया, फिर कार्रवाई रोक कर वाहवाही बटोरने का प्रयास किया। ठीक उसी तरह अब जनजातियों से प्राथमिकी दर्ज कराइए, फिर उसे निरस्त कर वाहवाही बटोरिए। ऐसे ही कुटिल राजनीति के माध्यम से जनजातीय समाज को बेवक़ूफ़ बनाकर भ्रमित करते रहिए।”

50 साल पहले अपनाया था इस्लाम, अब 10 लोगों के परिवार ने हिन्दू धर्म में की घर-वापसी: कहा – हमारे पूर्वज सनातनी थे, अब सुधार ली ग़लती

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक मुस्लिम परिवार के 10 सदस्यों ने हिंदू धर्म में घर-वापसी की। गुरुवार (3 अप्रैल, 2025) सुबह बघरा के योग साधना यशवीर आश्रम में स्वामी यशवीर महाराज ने हवन-यज्ञ करवाकर इनलोगों की शुद्धि कराई। परिवार ने 50 साल पहले इस्लाम मजहब अपनाया था। अब उन्होंने कहा हैं कि ये गलती थी, अब हम पूर्वजों के सनातन धर्म में वापस लौटना चाहते हैं।

आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज और आचार्य मृगेन्द्र ब्रह्मचारी ने वैदिक मंत्रों के साथ शुद्धिकरण यज्ञ संपन्न कराया। परिवार के सभी सदस्यों ने घी और सामग्री की आहुतियाँ दी। इस दौरान परिवार के सभी 10 सदस्यों ने इस्लामिक नाम त्याग कर हिंदू नाम अपनाए। परिवार की मुखिया फेमिदा अब राजकुमारी बन गई है। उनका बेटा दिलजान बृजेश कश्यप और उसकी पत्नी महक कविता बन गई है। फेमिदा की पोती रेशमा पूजा, पलक सविता, आलिया पायल, सना कुमारी सोनिया, खुशनुमा कुमारी साधना, पोता अरमान अमित कश्यप और इस्लाम विक्रम सिंह बन गए हैं।

बता दें कि देवबंद के कश्यप राजपूत परिवार की महिला ने 50 साल पहले मुस्लिम शख्स से शादी की थी, जिसके बाद वो फेमिदा बन गई। फेमिदा ने बताया, “मैं ज्यादा समय अपने मायके में बिताती थी। इससे ससुराल वालों को ऐतराज रहता था। कुछ वर्ष पहले पति की मौत हो गई। इसके बाद से ही ससुराल वालों ने मायका छोड़कर ससुराल में रहने का दबाव बनाने लगे। मेरे बच्चों को भी वो परेशान करते हैं। बच्चे महाराष्ट्र गए हुए हैं। वो साल छह महीने में आते हैं। उन्हें मेरे हिंदू धर्म में रहने से भी परेशानी थी। अब मैंने हिंदू धर्म में वापसी कर ली है, मेरे साथ-साथ परिवार ने भी ये कदम उठाया है।”

फेमिदा ने बताया, “अब मेरा नाम राजकुमारी है। 50 साल पहले ग़लती हुई थी। मेरा कोई भाई नहीं था। हम पाँच बहनें थीं, इसीलिए मजबूरी थी। अब अपने धर्म में वापस आ गई हूँ। काफी खुश हूँ। ईद के बाद धर्म में वापस आने का संकल्प लिया था। अब पूरा हो गया है।”

आश्रम के पीठीधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज ने बताया, “देवबंद के निवासी मुस्लिम परिवार से थे। ये लोग यहाँ आश्रम में आए और कहने लगे कि हमने इस्लाम मजहब छोड़ दिया है, सनातन धर्म को स्वीकार कर लिया है। शुद्धि यज्ञ के माध्यम से बड़ी श्रद्धा से सनातन धर्म में घर वापसी कर ली है। यह कश्यप जाति से हैं। 5000 मुस्लिम हिंदू धर्म में वापसी करना चाहते हैं जिन्होंने किसी भी वजह से वर्षों पूर्व इस्लाम मजहब को अपना लिया था।”

‘सभी मुस्लिम पहले हिंदू थे’

स्वामी यशवीर महाराज ने कहा, “भारत में रहने वाले सभी मुस्लिम पहले हिंदू थे। इस्लामी हुकूमत में उनके पूर्वजों पर अत्याचार हुए। कई ने लालच में आकर सनातन धर्म छोड़ दिया। किसी ने भी खुशी या इस्लाम की शिक्षा से प्रभावित होकर इसे नहीं अपनाया। हमारी सभी कन्वर्टेड मुस्लिमों से अपील है कि वे अपने पूर्वजों की गलती सुधारें। सभी सनातन धर्म में लौट । अब देश में भय का माहौल नहीं है। भाजपा सरकार अच्छा काम कर रही है। लाखों-करोड़ों मुस्लिम इस्लाम छोड़ चुके हैं। जो मुस्लिम हिंदू धर्म में आना चाहते हैं, हम उनका स्वागत करते हैं।”

फिल्मों में जगाया राष्ट्रवाद, इमरजेंसी के विरुद्ध उठाई आवाज: दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार का 87 की उम्र में निधन, राष्ट्रपति से लेकर PM मोदी दुखी

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार का शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) तड़के मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल में निधन हो गया। राष्ट्रपति मुर्मू और पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है।

पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा है, “महान अभिनेता और फिल्मकार मनोज कुमार जी के निधन से बहुत दुख हुआ। वे भारतीय सिनेमा के प्रतीक थे, जिन्हें खास तौर पर उनकी देशभक्ति के जोश के लिए याद किया जाता था।”

बॉलीवुड गमगीन

बॉलीवुड में भी शोक की लहर है। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अशोक पंडित के मुताबिक, “दादा साहब फ़ाल्के पुरस्कार विजेता और भारतीय फ़िल्म जगत के दिग्गज कलाकार मनोज कुमार का निधन फिल्म जगत के लिए बड़ी क्षति है। पूरी इंडस्ट्री उनको याद करेगी।”

बॉलीवुड में देशभक्ति की आवाज बने

मनोज कुमार अपने राष्ट्रवादी फिल्मों के लिए जाने जाते थे और भारत कुमार के रूप में प्रख्यात हुए। उपकार, क्रांति, शहीद, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी राष्ट्रवादी और सामाजिक सरोकार से जुड़ी उनकी प्रमुख फिल्में रहीं। मनोज कुमार का नाम हरिकृष्ण गोस्वामी था। उनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के ऐबटाबाद में 1937 में हुआ।

सत्ता के खिलाफ कोर्ट पहुँचे और जीता

मनोज कुमार उन नेताओं में शुमार थे जिन्होने सत्ता के खिलाफ बोलने की हिम्मत दिखाई। उन्होने इमरजेंसी का विरोध किया जिसकी वजह से उनकी फिल्मों ‘दस नंबरी’ और ‘शोर’ पर तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने रोक लगा दी। हालाँकि कोर्ट में सरकार के खिलाफ उन्होने केस जीतकर अपने अभियान को आगे बढ़ाया। फिल्म शोर को सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले दूरदर्शन पर दिखाया गया, जिसकी वजह से फिल्म ज्यादा कमाई नहीं कर पाई। इससे मनोज कुमार को काफी धक्का लगा क्योंकि फिल्म के एक्टर, निर्देशक और निर्माता वही थे।

सरकार के ऑफर को ठुकराया भारत कुमार ने

यहाँ तक कि जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उन्हें एक फिल्म की पेशकश की तो सरकार के इस ऑफर को मनोज कुमार ने ठुकरा दिया था। आर्थिक तंगी के बीच भारत कुमार का ये फैसला उनके दृढ़निश्चयी होने का प्रमाण है।

वक्फ बिल दोनों सदनों में पास, 12 घंटे चर्चा के बाद राज्यसभा में पड़े 128 वोट: मुस्लिम संगठन भड़के, ओवैसी ने भी लोकसभा में तिलमिलाकर फाड़ी थी विधेयक की कॉपी

लोकसभा के बाद वक्फ संशोधन बिल गुरुवार (4 अप्रैल 2025) की रात राज्यसभा में भी पास हो गया। इस विधेयक के पक्ष में 128 सांसदों ने वोट दिया, जबकि विरोध में 95 वोट पड़े। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद नोटिफिकेशन जारी होते ही यह बिल कानून बन जाएगा।

राज्यसभा में इस पर लगभग 12 घंटे इस पर बहस हुई थी। विधेयक पर विपक्ष की ओर से कई संशोधन पेश किए गए, जिसे सदन ने खारिज कर दिया। बता दें कि बुधवार (3 अप्रैल 2025) की रात को लोकसभा में भी लगभग 12 घंटे तक बहस के बाद इसे पारित किया गया था। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े थे, जबकि विरोध में 232 वोट पड़े थे।

अंतिम समय में ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD) ने सरकार का समर्थन किया। इससे पहले BJD ने बिल का कड़ा विरोध किया था और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया था। हालाँकि, बाद में पार्टी ने अपने सांसदों को इच्छा के अनुसार पक्ष में या विपक्ष में वोट करने की अनुमति दी। पार्टी ने कोई व्हिप जारी नहीं किया था और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर निर्णय लेने को कहा था।

दरअसल, वर्तमान में राज्यसभा सदस्यों की संख्या 236 हैं। बहुमत का आँकड़ा 119 है। वहीं, राज्यसभा में के सासंदों की कुल संख्या 98 सांसद हैं, जबकि NDA के सदस्यों की संख्या 118 है। वहीं, 6 मनोनीत सदस्य भी हैं। इस तरह NDA के पक्ष में कुल 124 संख्या है। राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के 27 सांसद हैं। अगर इंडी गठबंधन की बात करें तो यह संख्या 88 पहुँच जाती है।

राज्यसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025 पर चर्चा का जवाब देते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक वैधानिक निकाय है। इस कारण से इसे धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। रिजिजू ने कहा कि मुस्लिमों की भावनाओं को देखते हुए फिर भी हमने गैर-मुस्लिमों की संख्या सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ वक्फ विधेयक से मुस्लिमों को डरा रही हैं।

विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के अधिकांश सदस्य सदन से नदारद रहे। वहीं, सत्ता पक्ष सदस्य मौजूद रहे। बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल रखा था। चर्चा के दौरान कई बार खड़े होकर उन्होंने हस्तक्षेप किया। कॉन्ग्रेस सांसद नासिर हुसैन को टोकते हुए उन्होंने कहा कि अब तक ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन विधेयक में ऐसा नहीं है।

मुस्लिम संगठनों के पास क्या है आगे का रास्ता

मुस्लिम संगठनों एवं सांसदों के विरोध के बीच वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में पास हो गया। लोकसभा में AIMIM के मुखिया ने इस बिल को फाड़ दिया था। अब ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) इसके खिलाफ कोर्ट जा सकता है। लखनऊ ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी इसका संकेत दिया है।

फिरंगी महली ने कहा, “हमारे लिए कोर्ट का दरवाजा खुला है। इनमें से कई प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 के खिलाफ हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि कोर्ट से हमें इंसाफ मिलेगा।” उन्होंने कहा कि AIMPLB के साथ ही अन्य संस्थाओं ने जो सुझाव JPC के सामने रखे थे, उन्हें इस बिल में शामिल नहीं किया गया है।

जब लगातार 9 घंटे चला हिन्दुओं का कत्लेआम… मस्जिद की छतों से आग के गोले फेंकती थी पाकिस्तानी फ़ौज, कतार में खड़ा करा के बरसाई गोलियाँ

ये घटना तब की है, जब बांग्लादेश ‘पूर्वी पाकिस्तान’ हुआ करता था, पाकिस्तान का एक हिस्सा। वहाँ आज़ादी का आंदोलन चल रहा था। उसे कुचलने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज क्रूरता की हर सीमा पार कर रही थी। न केवल बंगाली बोलने वाले लोगों, बल्कि उनके साथ-साथ बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को भी निशाना बनाया जा रहा था। उन्हीं वीभत्स घटनाओं में से एक है जिंजीरा का नरसंहार।

जिंजीरा नरसंहार 1971 में ‘बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन’ के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा योजनाबद्ध तरीके से की गई हिन्दुओं के नरसंहार की दास्ताँ है। यह हत्याकांड ढाका से बूढ़ीगंगा नदी के आसपास केरानीगंज उपजिला के जिंजीरा, कालिंदी और शुभद्या जैसे स्थानों पर हुआ, जिसमें एक ही रात में करीब 5000 हिन्दुओं की हत्या कर दी गई थी।

हिन्दुओं का कत्लेआम, हजारों महिलाएँ बलात्कार की शिकार

इसकी जानकारी बांग्लादेश में उस वक्त मौजूद अमेरिकी वकील आर्चर ब्लड के कई टेलीग्रामों से भी मिलती है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से तत्काल हस्तक्षेप करने की माँग की थी। उन्होंने लिखा था, “पाकिस्तानी सेना के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम योजनाबद्ध तरीके से ग़रीब लोगों के घरों पर हमला कर रहे हैं और बंगालियों और हिंदुओं की हत्या कर रहे हैं।”

एक अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना ने 1970 के दशक में कई नरसंहार किए जिसमें हिंदू पुरुषों, पेशेवरों और बुद्धिजीवियों को मारा गया। इस दौरान 20,000 से 40,000 महिलाएँ बलात्कार की शिकार हुईं।

पाकिस्तान का ‘खूनी खेल’

पाकिस्तानी सेना ने योजनाबद्ध तरीके से मुक्ति आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ जमकर रक्तपात मचाया। इस दौरान धर्म को आधार बनाया गया और हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बीज 25 मार्च, 1971 को ही पड़ गए थे, जब पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीबुर्रहमान की ‘अवामी लीग’ के नेतृत्व वाले मुक्ति आंदोलन को दबाने के लिए ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया।

पूर्वी पाकिस्तान को खोने के कगार पर पहुँचा पाकिस्तान बौखलाया हुआ था। ये हिस्सा पाकिस्तान की मुख्य भूमि से 1600 किलोमीटर (990 मील) दूर था, इसीलिए इसे नियंत्रित करने में दिक्कतें आ रही थी। इससे गुस्साए पाकिस्तान ने बांग्लादेश पर अपनी कम होती पकड़ को बनाए रखने के लिए आखिरी कोशिश के रूप में जमकर खूनी खेल खेला। परिणाम ये हुआ कि गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया और 1 करोड़ से ज़्यादा शरणार्थी भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए। खास तौर पर पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे बांग्लादेश से सटे राज्यों में।

आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हुआ पाकिस्तान

9 महीने के आंतरिक संघर्ष और बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना के लगातार हमले के बाद भारत के साथ निर्णायक युद्ध शुरू हुआ। 13 दिनों के भीतर, भारतीय सेना ने एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की, जिससे 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को शर्मनाक हार के बाद आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान का बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र के तौर पर उदय हुआ। बांग्लादेश के बनने में वहाँ के हिन्दुओं के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान ने मुक्ति वाहिनी के हिन्दू नेताओं और समर्थकों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतार दिया। ऐसे ही नरसंहारों में एक था जिंजीरा नरसंहार।

जिंजीरा नरसंहार की वो काली रात

2 अप्रैल, 1971 की रात पाकिस्तान के सरकारी टीवी चैनल ने बूढ़ीगंगा की दूसरी तरफ केरानीगंज के जिंजीरा में शरण लिए हुए मुक्ति वाहिनी समर्थकों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाने का ऐलान किया। 3 अप्रैल को मॉर्निंग न्यूज ने शीर्षक दिया, “जिंजीरा में उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई।”

हुआ यूँ कि पाकिस्तानी सेना ने 2 अप्रैल की आधी रात से केरानीगंज के आसपास सैनिकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। इन इलाकों के आसपास मुख्य रूप से हिन्दू परिवार रहते थे। उन्होंने नदी के किनारे स्थित मिटफोर्ड अस्पताल पर कब्जा कर लिया। सुबह करीब 5 बजे उन्होंने अस्पताल से सटी मस्जिद की छत से आग के गोले फेंकना शुरू किया और जिंजीरा में घुस गए। पूरे इलाके को कँटीली तारों से घेर दिया गया था, ताकि कोई भाग न सके।

पाकिस्तानी सेना लगातार लोगों पर गोलियाँ चला रही थी। यह नरसंहार करीब नौ घंटे तक चला। इस दौरान नांदेल डाक गली के एक तालाब के किनारे 60 लोगों को कतार में खड़ा करके गोली मार दी गई। सैनिकों ने बम बरसाए और घरों में घुसकर मौत का तांडव मचाया। इस नरसंहार में हज़ारों लोग मारे गए।

कब्र में छिप गए थे लोग

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना ने कम से कम 5000 नागरिकों को मार डाला। जिंजीरा, कालिंदी जैसे इलाके आवामी लीग के गढ़ थे। पाकिस्तानी सेना द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सर्च लाइट’ के बाद ढाका से बूढ़ीगंगा नदी पार कर बड़ी संख्या में हिन्दू यहाँ आए थे। ये लोग अवामी लीग के समर्थक थे।

बांग्लादेश में संयुक्त राष्ट्र मिशन के पूर्व प्रेस काउंसलर रहे अब्दुल हन्नान भी उन लोगों में शामिल थे जो घटना के दौरान वहाँ छिपे हुए थे। उन्होंने भी इस घटना का जिक्र डेली स्टार से किया है।

मुसलमानों को पाकिस्तानी सेना ने छोड़ा

हन्नान ने लिखा, “गोली दाहिनी तरफ से आ रही थी, इसलिए परिवार के साथ उत्तर की तरफ भागा। थोड़ी दूर चलने के बाद लगा उत्तर से गोली आने लगी तो पूर्व की ओर भागा, लेकिन फिर पता चला कि चारों ओर से गोली चल रही है। हम भागकर मस्जिद के पास पहुँचे। उसके पीछे एक कब्रिस्तान था। लोग कब्रों में छिपे हुए थे” हन्नान के मुताबिक, उनके पिता ने बताया कि पाकिस्तानी सैनिकों ने उनपर बंदूक तान दी थी लेकिन अल्लाह का नाम लेते ही उन्हें छोड़ दिया।

इसी तरह की एक और घटना ढाका के शंखरीबाजार में हुई। वह भी हिन्दू इलाका माना जाता था। यहाँ शंख की पारंपरिक चूड़ियाँ बनाई जाती थी। पाकिस्तानी सेना ने करीब 126 हिन्दुओं के घरों को घेर लिया और लोगों की एक एक कर गोली मार दी। घटना के बाद शंखरीबाजार वीरान हो गया।

चीनी नागरिकों से शारीरिक और प्रेम संबंध बनाने पर रोक, अमेरिका ने राजदूतों के लिए लागू किए सख्त नियम-क़ानून: नहीं माने तो छोड़नी होगी नौकरी

अमेरिकी सरकार ने चीन में तैनात अपने सरकारी अधिकारियों, उनके परिवारों और सुरक्षा मंजूरी प्राप्त ठेकेदारों के लिए सख्त प्रतिबंध लागू किया है। अब वे किसी भी चीनी नागरिक के साथ प्रेम संबंध या शारीरिक संबंध नहीं बना सकेंगे। इस नीति को जनवरी में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स ने लागू किया था।

AP (एसोसिएट प्रेस) के अनुसार, पिछले साल एक सीमित नीति लागू की गई थी, जिसमें अमेरिकी अधिकारियों को चीन में अपने दूतावास में काम वाले चीनी नागरिकों, जैसे सुरक्षा गार्ड और अन्य सहायक कर्मचारियों के साथ रिश्ते रखने से रोका था। लेकिन अब यह प्रतिबंध अमेरिकी दूतावास और वाणिज्य दूतावासों में लागू होगा। इसमें बीजिंग स्थित अमेरिकी एम्बेसी और ग्वांगझू, शंघाई, शेनयांग और वुहान स्थित वाणिज्य दूतावास शामिल हैं। इसके अलावा, यह नियम हांगकांग स्थित वाणिज्य एम्बेसी में भी लागू होगा।

हालाँकि, जिन अधिकारियों के पहले से चीनी नागरिकों के साथ संबंध हैं, वे छूट के लिए आवेदन कर सकते हैं। अगर उनका आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो उन्हें अपने संबंध खत्म करने होंगे या अपनी नौकरी ही छोड़नी होगी।

क्यों लगाया गया प्रतिबंध?

अमेरिकी सरकार ने पहले भी ऐसे प्रतिबंध लगाए हैं। 1987 में सोवियत संघ और चीन में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को स्थानीय नागरिकों (महिलाओं/पुरुषों) से दोस्ती करने, डेट करने या संबंध बनाने से रोक दिया गया था। इसकी वजह एक मामला था, जिसमें मॉस्को में तैनात एक अमेरिकी मरीन को सोवियत की महिला जासूस ने प्रेम-संबंध बनाकर फँसाया था।

खुफिया एजेंसियाँ अक्सर आकर्षक पुरुषों और महिलाओं का इस्तेमाल कर गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश करती हैं। यह विशेष रूप से शीत युद्ध के दौरान काफी आम था। अमेरिका का मानना है कि चीन अभी भी इस तरह की रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है।

चीन कर रहा ‘हनीपॉट’ का उपयोग

अमेरिकी राजनयिकों और खुफिया विशेषज्ञों के अनुसार, चीन अमेरिकी रहस्यों तक पहुँचने के लिए ‘हनीपॉट’ तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। पोस्टिंग से पहले, अमेरिकी अधिकारियों को ये जानकारी दी जाती है कि चीनी खुफिया एजेंसियां सुंदर महिलाओं को उनके करीब भेज सकती हैं। इसके अलावा, किसी भी महत्वपूर्ण अमेरिकी राजनयिक पर दर्जनों चीनी सुरक्षा एजेंट नजर रख सकते हैं।

अमेरिकी अधिकारियों को इस नए प्रतिबंध की जानकारी जनवरी में मौखिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी गई थी। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। इससे पहले, चीन में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को अपने चीनी नागरिकों के साथ किसी भी करीबी संपर्क की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देने की आवश्यकता होती थी लेकिन उस पर पूरा प्रतिबंध नहीं था।

खतरे में है हर हिंदू, सरकारी सुरक्षा के भरोसे हम जीवनभर नहीं बैठ सकते… पर कवर्धा का ‘सुरक्षा मॉडल’ आत्मसात तो कर ही सकते हैं

यदि आपको लगता है कि कासगंज के चंदन गुप्ता का ही परिवार खतरे में है तो आप गलत हैं। यदि आपको लगता है कि खतरा केवल नुपुर शर्मा तक ही सीमित है तो आप गलत हैं। यदि आपको लगता है कि कमलेश तिवारी, कन्हैया लाल तेली, उमेश कोल्हे की हत्या के बाद ‘सर तन से जुदा’ का खतरा आपके ऊपर से टल चुका है तो भी आप गलत हैं।

खतरा तो कथित गंगा-जमुनी तहजीब का राग अलापने वाले, जय भीम-जय मीम का नारा लगाने वाले, मुगलों में सेकुलरिज्म का अब्बा देखने वाला हिंदुओं को भी है। क्योंकि सारे हिंदू काफिर हैं। लिबरल, वामपंथी, दलित चिंतक, सेकुलर जैसे टैग्स की भूमिका उनकी सूची में आपका नाम थोड़ा नीचे दर्ज करवाने तक ही सीमित है।

यह खतरा केवल कुछ गलियों, गाँवों, शहरों, जिलों, प्रांतों तक भी सीमित नहीं है। वे गह-गह पसरे हुए हैं। आपसे यह खतरा उतना ही दूर है, जितना एक मुस्लिम को मुस्लिम भीड़ का हिस्सा बनने में लगना है। इस खतरे को भाँपकर, हमें सुरक्षित रखने के लिए सरकारें (यदि वह तुष्टिकरण वाली न हो तो) सख्त कानून बना सकती हैं। किसी व्यक्ति/परिवार पर खतरों का आकलन कर उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है।

पर यह संभव नहीं है कि हर हिंदू को सरकार सुरक्षा दे। यह भी संभव नहीं है कि जो व्यक्ति/परिवार ऐसे खतरों में घिरा हो उसे जीवनभर सुरक्षा दी जाए। ऐसा करना उस व्यक्ति/परिवार के जीवन को भी कठिन बना देगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि हम हिंदू क्या करें? वह व्यक्ति/परिवार क्या करे जिसका शिकार करने को इस्लामी कट्टरपंथी घात लगाए बैठे हैं? इसका मुकम्मल जवाब दे पाना तो कठिन है। पर कवर्धा के हिंदुओं ने जिस तरह दुर्गेश देवांगन के परिवार की सुरक्षा की है, उस मॉडल को आगे बढ़ाकर हम काफी हद तक इस खतरे को कम अवश्य कर सकते हैं।

कवर्धा में क्या हुआ था?

2021 में छत्तीसगढ़ के कवर्धा में करमा माता मंदिर पर लगे भगवा ध्वज को इस्लामी कट्टरपंथियों ने फाड़कर फेंक दिया था। इसका विरोध करने पर दुर्गेश देवांगन नाम के युवक को बेरहमी से पीटा गया। हिंदुओं पर पत्थरबाजी हुई। उस समय राज्य में भूपेश बघेल के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही थी। स्थानीय विधायक मोहम्मद अकबर उस सरकार का प्रभावशाली मंत्री था।

इसका असर पुलिसिया कार्रवाई में भी दिखा। कथित तौर पर थाने लाकर भी हिंदुओं को पीटा गया। दुर्गेश देवांगन का तो कई दिनों तक पता भी नहीं चला था। यह भी आरोप है कि पुलिस के साथ तलवार लेकर इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर घूम रहे थे। कर्फ्यू और जबरन बल प्रयोग कर हिंदू संगठनों के नेताओं को कवर्धा पहुँचने से रोका गया। स्थानीय हिंदुओं की मानें तो हिंदुओं के इस दमन को मोहम्मद अकबर का पूर्ण समर्थन था। मोहम्मद अकबर को भूपेश बघेल का संरक्षण था। कवर्धा से लेकर रायपुर तक व्यवस्था में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो हिंदुओं की व्यथा सुने। सुनी भी नहीं गई।

हिंदुओं के आत्मबल का प्रतीक है धर्म ध्वजा चौक

आज छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है। कवर्धा के विधायक विजय शर्मा राज्य के उप मुख्यमंत्री हैं। मोहम्मद अकबर और उसको संरक्षण देने वाले भूपेश बघेल की हनक 2023 के विधानसभा चुनावों में जनता निकाल चुकी है। ऐसे में आपको शायद यह अनुभूति न हो कि 2021 की उस घटना के बाद से चुनाव के नतीजे आने तक, कवर्धा के हिंदू किस खतरे के बीच रह रहे थे। किन तरह के खतरों के बीच दुर्गेश देवांगन और उसका परिवार एक-एक दिन काट रहा था।

मैं 2021 की उस घटना के करीब एक साल बाद कवर्धा गया था। उस समय हिंदुओं ने अपने आत्मबल से करमा माता मंदिर के पास धर्म ध्वजा चौक बना ली थी। 108 फीट ऊँचा भगवा ध्वज लहरा रहा था। इससे कुछ ही कदमों की दूरी पर दुर्गेश देवांगन के पिता की आलू, प्याज और मसालों की दुकान थी। दुकान के शटर पर बजरंगबली विराजमान थे तो साइनबोर्ड पर राम का नाम अंकित था। दुकान पर पहुँचते ही मेरा अभिवादन ‘जय श्रीराम’ के साथ हुआ था। यकीन मानिए मुझे भी उस समय वहाँ के हिंदुओं पर मंडरा रहे खतरों की अनुभूति नहीं हो पाई थी। मुझे भी लगा कि 2021 की घटना शायद उतनी भयावह नहीं थी, जैसा वहाँ से आए वीडियो को देखकर और कवर्धा के लोगों से फोन पर बातचीत से प्रतीत होती थी।

हिंदू ही हिंदू का बना सुरक्षा कवच

लेकिन जब मैंने दुर्गेश देवांगन के परिवार और स्थानीय हिंदुओं से बातचीत करना प्रारंभ किया तो पता चला कि हमारी जानकारी से कहीं अधिक बुरे तरीके से 2021 में हिंदुओं का दमन किया गया था। उनकी आवाज कुचल दी गई थी। साल भर बाद भी हिंदुओं को डराने धमकाने का सिलसिला जारी था। पुलिस तमाशबीन बनी हुई थी।

दुर्गेश के पिता संतोष देवांगन ने ऑपइंडिया को बताया था, “विधायक का करनी है पूरा। जब मेरा लड़का मार खाया तो पीटने वालों के साथ अकबर (विधायक मोहम्मद अकबर) का लड़का भी था। अब हम पर राजीनामे का दबाव बनाया जा रहा है।” संतोष देवांगन ने बताया कि उस घटना के बाद एक तरफ उनके बेटे का पता नहीं चल रहा था, दूसरी तरफ उनके घर के बाहर पुलिस का पहरा बिठा दिया गया। परिवार की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार के लोग न किसी से मिल सके और न कोई उनसे मिल सके।

विश्व हिंदू परिषद के कबीरधाम जिले के कार्यकारी अध्यक्ष कैलाश शर्मा ने ऑपइंडिया को बताया था कि पहले सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हमले की घटना को अंजाम दिया गया। फिर स्थानीय स्तर पर जो भी हिंदुओं के पक्ष में खड़ा हुआ मोहम्मद अकबर के इशारे पर उसका दमन किया गया। इसका असर यह था कि सालभर बाद भी हिंदू भयभीत थे।

जिन हिंदुओं की उस समय गिरफ्तारी हुई थी उनमें आज के डिप्टी सीएम विजय शर्मा भी थे। जब हम दुर्गेश के परिवार से बातचीत कर रहे थे, उस समय भी वे अचानक से उस परिवार का हाल जानने के लिए आए थे। संतोष देवांगन ने बताया कि जब से शर्मा जेल से बाहर आए है, कवर्धा में रहते हुए कोई भी ऐसा दिन नहीं बीतता, जब वे उनके परिवार का हाल जानने खुद नहीं आते। कवर्धा से बाहर रहने पर भी वे फोन के जरिए उनके परिवार के संपर्क में बने रहते हैं।

देवांगन के मुताबिक विहिप और अन्य हिंदू संगठनों के पदाधिकारी भी नियमित रूप से उनका और उन जैसे पीड़ितों की इसी तरह चिंता करते हैं। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था कि धमकियों और खतरों के बीच हिंदुओं का यह सहयोग उनके परिवार के लिए बड़ा बल है। इसके कारण ही उनका जीवन सामान्य हो पाया है। वे निश्चिंत होकर दुकान चला पा रहे हैं। ऑपइंडिया से बातचीत में कुछ और पीड़ित हिंदुओं ने भी इसी तरह का सहयोग मिलने की पुष्टि की थी।

कवर्धा का यह सुरक्षा मॉडल हमें क्या बताता है?

कवर्धा के इस सुरक्षा मॉडल में हम हिंदुओं के लिए सीधा संदेश यह है कि सरकार और तंत्र के भरोसे बैठे रहना ठीक नहीं है। बाहरी मदद की उम्मीद नहीं रखनी है। स्थानीय स्तर पर ही यदि हम नियमित रूप से केवल एक-दूसरे की सुरक्षा की चिंता करने लगे तो कैसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में हम परिस्थिति बदल सकते हैं। खतरे से घिरे हिंदू परिवार का जीवन सामान्य कर सकते हैं। मार डाले जाने के भय से घर बैठने की जगह, उन्हें अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए उसी बाजार में निश्चिंत होकर व्यवसाय करने को प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ से वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आए थे।

वैसे भी सत्य यही है कि इस्लामी कट्टरपंथ के खतरे को कम करना ही हमारे हाथ में है। एक-दूसरे का सुरक्षा कवच बनना ही हमारे हाथ में है। क्योंकि जब तक इस्लाम है, जब तक हिंदू काफिर हैं, इस खतरे को कम ही किया जा सकता है, उसका समूल नाश संभव नहीं है।

BIMSTEC में भाग लेने बैंकॉक पहुँचे PM मोदी: रामायण का मंचन देख हुए गदगद, थाईलैंड ने रामकथा के सम्मान में जारी किया स्पेशल स्टाम्प

देश में वक्फ संशोधन बिल को लेकर राज्यसभा में चर्चा जारी है। इस बीच गुरुवार (3 अप्रैल) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी BIMSTEC की बैठक में भाग लेने के लिए दो दिवासीय थाईलैंड की यात्रा पर राजधानी बैकॉक पहुँचे। वहाँ भारतीय समुदाय ने प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। पीएम मोदी ने वहाँ थाई रामायण ‘रामाकियेन’ का प्रदर्शन देखा। इस दौरान वे बेहद प्रसन्न नजर आए।

पीएम मोदी ने कहा, “ऐसा सांस्कृतिक जुड़ाव किसी और से नहीं मिलता। थाई रामायण रामकियेन का एक आकर्षक प्रदर्शन देखा। यह वास्तव में बेहद समृद्ध अनुभव था, जिसने भारत और थाईलैंड की साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को खूबसूरती से प्रदर्शित किया।” पीएम मोदी ने कहा कि रामायण एशिया के इतने सारे हिस्सों में दिलों और परंपराओं को जोड़ने का काम करता है।

कार्यक्रम के दौरान थाईलैंड के छात्रों के एक समूह ने भरतनाट्यम और थाईलैंड के प्रसिद्ध नृत्य ‘खोन’ को मिलाकर रामकियेन का प्रदर्शन किया। इस दौरान थाईलैंड ने रामायण पर एक विशेष स्टाम्प जारी किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थाईलैंड की प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा के साथ वार्ता की। इसके साथ ही उन्होंने वहाँ के अन्य नेताओं से भी चर्चा की।

प्रधानमंत्री मोदी के थाईलैंड के ऐतिहासिक ‘वात फो मंदिर’ भी जाने की उम्मीद है। यह देश के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह बौद्ध मंदिर बैंकॉक में स्थित है। इसमें भगवान बुद्ध की लेटी हुई मुद्रा में विशाल प्रतिमा है। इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर में भगवान बुद्ध की 1,000 से अधिक प्रतिमाएँ हैं। इसके अलावा, यहाँ 90 से अधिक स्तूप भी हैं।

छठे बिम्सटेक सम्मेलन में भाग लेने आए पीएम मोदी का थाईलैंड के उप-प्रधानमंत्री और परिवहन मंत्री सूर्या जुंगरुंगरेंगकिट ने हवाई अड्डे पर स्वागत किया। वहाँ से वे होटल पहुँचे। वहाँ भारतीय प्रवासियों और भारतीय समुदाय के लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। पीएम मोदी को देखकर लोगों ने ‘मोदी-मोदी’, ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदेमातरम’ के नारे लगाए।

शुक्रवार (4 अप्रैल) को वे बिम्सटेक के नेताओं के साथ वार्ता करेंगे। BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) देशों में थाईलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार और भूटान के नेता शिरकत करेंगे। उन्होंने बिम्सटेक नेताओं के साथ चर्चा को लेकर उत्सुकता जारी की।

बता दें कि भारत और थाईलैंड का लगभग दो हजार साल पुराना संबंध है। भारत से ही थाईलैंड में बौद्ध धर्म और वैदिक धर्म एवं रामायण पहुँचा है। थाई संस्करण में भगवान राम को ‘फ्रा राम’ कहा जाता है। सम्राट अशोक के समय बौद्ध भिक्षुओं ने थाईलैंड में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को फैलाया था। थाईलैंड को प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ‘स्वर्णभूमि’ (सोने की भूमि) कहा गया है।

400 एकड़ की हरियाली तबाह कर रही कॉन्ग्रेस सरकार, हाईकोर्ट ने नीलामी पर लगाई रोक: पेड़-पौधे, झीलों और घाटियों को बचाने के लिए चल रहा विरोध प्रदर्शन

हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) और तेलंगाना सरकार के बीच कांचा गाचीबोवली में 400 एकड़ जमीन को लेकर विवाद बढ़ गया है। यहाँ राज्य सरकार द्वारा जंगलों के पेड़ काटवाए और चट्टानों को हटावाए जा रहे हैं। इस पर तेलंगाना हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। वहीं, विश्वविद्यालय के छात्रों ने राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

दरअसल, तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार ने यहाँ आईटी पार्क के विकास के लिए 400 एकड़ जमीन की नीलामी करने का फैसला किया है। यहाँ पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक रूप से स्थित विशाल भूखंडों की माँग बढ़ गई है। यहाँ कई कंपनियों ने अपने मुख्यालय स्थापित कर लिए हैं। हालाँकि, तेलंगाना सरकार और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के बीच का ये मामला अब हाईकोर्ट पहुँच गया है।

मंगलवार (01 अप्रैल 2025) को छात्रों ने तेलंगाना इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन (TIIC) को ज़मीन सौंपने के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दायर की। बुधवार को HC में सुनवाई के दौरान अगले आदेश तक जमीन पर किसी भी गतिविधि पर रोक लगा दी। दरअसल, 30 मार्च से ही बुलडोजर आदि लगाकर वहाँ जमीनों की सफाई की जा रही थी।

उधर, इसके विरोध में 1 अप्रैल 2025 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच दो जगहों पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के 500 छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना दिया, जबकि अन्य 150 छात्र प्रशासनिक भवन के सामने विरोध कर रहे थे। उन्होंने विश्वविद्यालय की भूमि पर अतिक्रमण रोकने की माँग की।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार ज़मीन साफ करने में लग गई है। बुलडोजर और भारी मशीनरी से पेड़ों को काटा जा रहा है। यह क्षेत्र इकॉलॉजिक रूप से महत्व रखता है और इसे बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। उधर, सरकार का कहना है कि यह वनभूमि नहीं है। इसे साल 2003 में निजी स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी को ट्रांसफर किया गया था।

बावजूद इसके, प्रशासन ने भूमि समतलीकरण के लिए काम शुरु कर दिया है। इस बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। पुलिस ने दो छात्र समेत 53 लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस पर बल प्रयोग और छात्रों से बदतमीजी करने का आरोप है। वहीं, लाठीचार्ज करने के आरोपों को पुलिस ने मानने से इनकार किया।

ABVP के पीएचडी छात्र निशांत रेड्डी ने प्रशासन की चुप्पी पर नाराजगी जताते हुए कहा, “पिछले तीन दिनों से विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया है। हम छात्र इस जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि असली हितधारक चुप हैं।” छात्रों ने सुरक्षा बढ़ाने पर भी असंतोष जताया, क्योंकि बिना आईडी कार्ड के परिसर में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है।

गाचीबोवली पुलिस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारतीय जनता युवा मोर्चा के कुछ सदस्यों को भी गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय छात्र संघ ने 2 अप्रैल से अनिश्चितकालीन विरोध और कक्षाओं के बहिष्कार की घोषणा की। उन्होंने प्रशासन पर राज्य सरकार को विश्वविद्यालय की जमीन सौंपने का आरोप लगाया और इस मामले में लिखित गारंटी की माँग की।

जमीन विवाद का राजनीतिक मोड़

  • जमीनी विवाद ने अब राजनीतिक मोड़ ले लिया है। विपक्षी दल तेलंगाना सरकार पर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील आईटी हब का निर्णय रद्द करने के लिए दबाव बना रहे हैं। भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने विवाद पर चुटकी लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की ‘मोहब्बत की दुकान’ अब हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी तक पहुँच गई है।

BRS का कहना है कि राहुल गाँधी को उनकी पार्टी के उद्देश्यों के खिलाफ काम करना भारी पड़ गया है। BRS ने आंदोलनकारी छात्रों और पत्रकारों की गिरफ्तारी की भी आलोचना की। BRS के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने कहा कि यह ‘नासमझी’ भरा कदम है, क्योंकि यह हैदराबाद को शुद्ध वायु से वंचित करेगा।

वहीं, विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता अल्लेती महेश्वर रेड्डी की अध्यक्षता में पार्टी विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल घटनास्थल पर जाने वाला था। उन्होंने पूछा कि राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार कांचा गाचीबोवली में सैकड़ों बुलडोजर और मशीनों से पेड़ों को हटाकर 400 एकड़ जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश क्यों कर रही है। विधायक के आवास के पास कई पुलिस अधिकारी तैनात किए गए।

महेश्वर रेड्डी का कहना है कि पुलिस ने उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी। ना ही पुलिस ने बताया कि उन्हें क्यों रोका जा रहा है। रेड्डी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने भाजपा के बाकी नेताओं और विधायकों को भी उनके घरों से बाहर निकलने से रोक दिया। BJP नेता पायल शंकर को 1 अप्रैल को आंदोलन में भाग लेने के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय जाते समय हिरासत में लिया गया था।

प्रदेश के BJP प्रवक्ता एनवी सुभाष ने सवाल किया, “सरकार कब से रियल एस्टेट डीलर बन गई है।” उन्होंने पुलिस की प्रतिक्रिया को लोकतांत्रिक अधिकारों पर अस्वीकार्य हमला बताया और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि उस समय तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेता रहे वर्तमान सीएम ए. रेवंत रेड्डी ने 2007-08 में सवाल उठाया था।

उन्होंने कहा कि रेवंत रेड्डी ने TRS नेता रहते हुए कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा दिल्ली में एक डेवलपर को जमीन सौंपने के इसी तरह के कदम का विरोध किया था। उन्होंने पूछा, “अब क्या बदल गया है? क्या मुख्यमंत्री सिर्फ़ खाली खजाने को भरने, गाँधी परिवार को खुश करने और उनके मुफ़्त उपहारों के एजेंडे को निधि देने के लिए अपने पिछले रुख को छोड़ रहे हैं।”

कई साल पुराना है विवाद

हैदराबाद यूनिवर्सिटी और सराकार के बीच ये विवाद सालों पुराना है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने दावा किया है कि 1975 में उसे 2324 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी। इनमें से 400 एकड़ का यह भूभाग भी शामिल है। साल 2022 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यूनिवर्सिटी के पास इस भूमि के हस्तांतरण के कोई अधिकारिक दस्तावेज नहीं है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे सरकार की भूमि माना। हालाँकि, पर्यावरणविदों का कहना है कि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। यहाँ 455 से अधिक प्रजातियों की वनस्पति और जीव मौजूद हैं। एनजीओ वटा फाउंडेशन ने ज़मीन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने और ‘डीम्ड फोरेस्ट’ का दर्जा देने की माँग की।