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नेहरू ने थोपा वक्फ बोर्ड, कॉन्ग्रेसी सरकारों ने पाला-पोसा: जानिए कैसे स्वतंत्र भारत में ‘मजहबी जमींदार’ बन गया देश के लिए नासूर

वक्फ संशोधन कानून को लेकर देश में चर्चा जारी है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मस्जिदों संचालन के लिए दिए गए दो गाँवों से शुरू हुआ भारत में वक्फ संपत्ति का रिवाज आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। आज भारत में वक्फ के पास 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ हैं। दुनिया के किसी भी देश, यहाँ तक कि मुस्लिमों मुल्कों में भी वक्फ के पास इतनी संपत्तियाँ नहीं हैं।

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया था। गोरी ने सन 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया।

मुगल काल में भी मस्जिद-मकबरों-दरगाहों को इस्लामी शासक बड़ी-बड़ी संपत्तियाँ देते रहे। अंग्रेज जब आए तो उन्होंने इस पर नियंत्रण करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिमों के विरोध के बाद उन्होंने इसे कानूनी रूप से दे दिया। इस कानून का ड्राफ्ट पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना ने तैयार किया था। भारत जब आजाद हुआ तो भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेेहरू ने इसे जारी रखा।

मुस्लिम तुष्टिकरण हवा देते हुए पहली सन 1954 में देश के पंडित नेहरू ने वक्फ एक्ट बनाया। इससे वक्फ बोर्ड नाम की एक संस्था बनी। इस कानून के तहत कॉन्ग्रेस की सरकार ने बँटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों की जमीनें एवं संपत्तियाँ वक्फ बोर्डों को दे दीं। इस कानून के लागू होने के एक साल बाद यानी सन 1955 में इसमें संशोधन करके हर राज्य में वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात कही गई।

इसका परिणाम ये हुआ है कि आज देश के करीब 32 राज्यों में वक्फ बोर्ड हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में शिया और सुन्नी मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वक्फ बोर्ड हैं। ये बनाए तो गए थे वक्फ की संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन, देखरेख और उनका प्रबंधन करने के लिए, लेकिन ये बोर्ड आज सरकारी जमीनों-इमारतों के साथ-साथ हिंदुओं के पूरे-के-पूरे गाँवों तक पर दावा किए जाने लगे।

सन 1964 में एक संशोधन पारित किया गया था। इसके तहत केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के केंद्रीकरण को बढ़ावा देना शामिल था। यह भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है। यह केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता है। इसका काम केंद्र सरकार को सलाह देना है।

दरअसल, CWC का उद्देश्य वक्फ संबंधित मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देने का काम था। यह सलाह वक्फ संपत्तियों के रख-रखाव से संबंधित होता था। CWV का अध्यक्ष केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री होता है। सन 1984 में वक्फ प्रशासन के पुनर्गठन के लिए वक्फ जाँच समिति गठित की गई। उसकी रिपोर्ट का मुस्लिमों ने भारी विरोध किया। इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

शाहबानो और मंडल-कमंडल के बीच बाबरी ढाँचा गिरने के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नई परिभाषा लिखी। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने दो बड़े विवादित कानून बनाए। इनमें से एक पूजा स्थल अधिनियम और दूसरा वक्फ बोर्ड 1995 शामिल है। वक्फ बोर्ड 1995 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने वक्फ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया।

इस एक्ट की धारा 3(R) में कहा गया कि अगर किसी संपत्ति को मुस्लिम कानून के मुताबिक पवित्र, मजहबी या परोपकारी मान लिया जाए तो वह वक्फ की संपत्ति हो जाएगी। इसमें ये कहा गया है कि यदि वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई भी जमीन किसी मुस्लिम की है तो वह उसे वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है। इसके लिए वक्फ बोर्ड को कोई कागजात पेश करने की जरूरत नहीं होगी।

उस जमीन पर जिस व्यक्ति को आपत्ति होगी, उसे कागजात दिखाकर साबित करना होगा कि यह उसकी संपत्ति है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम की धारा 40 में कहा गया है कि जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड तय करेगा। बोर्ड का यह निर्णय ही अंतिम होगा, जब तक कि उस निर्णय पर वक्फ ट्रिब्यूनल रोक ना लगा दे या उसे बदल ना दे।

इसके अलावा, बोर्ड उस किसी भी संपत्ति की जाँच कर सकता है, जिसके वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जाता है। इस धारा में आगे कहा गया है कि अगर वक्फ बोर्ड को विश्वास हो जाता है कि यह वक्फ की संपत्ति है तो उसे वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दे सकता है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 40 को ‘काला कानून’ बताया है।

बात यहीं रूक जाती तो समझ में आता। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 (UPA-2) के शासनकाल में वक्फ अधिनियम को और मजबूत किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने साल 2013 में वक्फ कानून में संशोधन करके वक्फ बोर्डों को असीमित अधिकार दे दिए गए। इस संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड को स्वायत्ता दे दी गई।

इस संशोधन के जरिए इससे जुड़े विवाद में कलेक्टर को भी हस्तक्षेप करने से रोक दिया गया। इस कानून में कहा गया कि अगर वक्फ बोर्ड किसी व्यक्ति संपत्ति को वक्फ संपत्ति बता देता है तो उसके खिलाफ वह कोर्ट नहीं जा सकता। उसे वक्फ बोर्ड से ही गुहार लगाना होगा। अगर बोर्ड बात नहीं मानता है तो वह वक्फ ट्रिब्यूनल जा सकता है।

हालाँकि, कानून में यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि विवादित मामले में वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम अंतिम होगा। इस फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं। इस तरह न्याय पाने के सारे दरवाजे को इस कानून के माध्यम से यूपीए सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

अगर वर्तमान में हम वक्फ बोर्ड की संरचना की बात करें तो इसमें एक सर्वे कमिश्नर होता है। यह सर्वे कमिश्नर संपत्तियों का लेखा-जोखा रखता है। इसके अलावा, बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम IAS अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता और मुस्लिम बुद्धिजीवी जैसे लोग शामिल होते हैं।

वक्फ ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ट्रिब्यूनल में कौन शामिल होगा, इसका फैसला संबंधित राज्य की सरकार करती है। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति और वोटबैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारें आमतौर पर वक्त बोर्ड और ट्रिब्यूनल में मुस्लिमों को ही शामिल करती हैं, ताकि वो खुद को मुस्लिम हितैषी दिखा सके।

14 साल बाद RBI को मिली महिला डिप्टी गवर्नर, IMF से लेकर वर्ल्ड बैंक तक का अनुभव लेकर आई हैं पूनम गुप्ता: देश-विदेश की यूनिवर्सिटीज में रहीं प्रोफेसर

केंद्र सरकार ने बुधवार (2 अप्रैल, 2025) को तीन वर्षों के लिए पूनम गुप्ता को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का डिप्टी-गवर्नर बनाया है। पूनम वर्तमान में ‘नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च’ (NCAER) में इकोनॉमिक पॉलिसी थिंक टैंक की महानिदेशक हैं। इससे पहले जनवरी 2020 से 2025 तक माइकल देबव्रत पात्रा रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर थे।

पूनम की नियुक्ति 7 से 9 अप्रैल के बीच प्रस्तावित RBI की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक से केवल एक हफ्ते पहले ही हुई है। 1935 से अब तक, डिप्टी-गवर्नर के 65 वर्षों के कार्यकाल में सिर्फ चार महिलाएँ ही इस पद पर पहुँच पाईं हैं। RBI को जून 2003 में KJ उदेशी के रूप में पहली महिला डिप्टी-गवर्नर मिली थीं। उनके बाद श्यामला गोपीनाथ सितंबर 2004 में और उषा थोराट नवंबर 2005 में RBI की डिप्टी-गवर्नर नियुक्त होने वाली महिलाएँ थीं। 2010 तक उषा थोराट इस पद पर रहीं। अब 14 वर्षों बाद चौथी महिला डिप्टी-गवर्नर के रूप में पूनम गुप्ता का चयन हुआ है।

वर्ल्ड बैंक और IMF में काम कर चुकी हैं RBI की नई डिप्टी गवर्नर

डिप्टी-गवर्नर के साथ-साथ पूनम प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की भी सदस्य हैं और 16वें वित्त आयोग की एडवाइजरी काउंसिल की संयोजक हैं। इसके अलावा पूनम गुप्ता नीति आयोग की विकास सलाहकार समिति का महत्वपूर्ण अंग भी हैं। इससे पहले उन्होंने भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान मैक्रोइकोनॉमिक्स और व्यापार पर टास्क फोर्स की अध्यक्षता की थी।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और वॉशिंगटन डीसी स्थित विश्व बैंक में दो दशकों तक वरिष्ठ पदों पर काम करने के बाद 2021 में वह NCAER में आईं। यहाँ पूनम को इकोनॉमिक ग्रोथ, इंटरनेशनल फाइनेंशियल आर्किटेक्चर, सेंट्रल बैंकिंग, मैक्रोइकोलॉमिक्स स्टेबिलिटी, पब्लिक डेब्ट और स्टेट फाइनेंस के मसलों पर काम करने का अनुभव है।

कई विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहीं पूनम गुप्ता

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड में भी पढ़ाया। इसके साथ ही वह इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट, दिल्ली की विजिटिंग फैकल्टी भी रहीं। पूनम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (NIPFP) की आरबीआई चेयर प्रोफेसर और ‘इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशन्स रिसर्च’ (ICRIER) की प्रोफेसर भी रही हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में मास्टर्स की डिग्री लेने के साथ पूनम ने अमेरिका के मैरीलेंड यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स और पीएचडी किया है। अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र में पीएचडी के लिए पूनम को 1998 में एक्जिम बैंक पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

मुस्लिम मुल्कों सऊदी-UAE में क़ैद हैं सबसे अधिक भारतीय: जानिए कौन से हैं वो 12 देश जहाँ भारत के 10000+ नागरिक जेल में, दी जा रही निःशुल्क सहायता

दुनिया में सबसे ज्यादा सजायाफ्ता और विचाराधीन भारतीय कैदी सऊदी अरब और UAE में हैं। इन दोनों मुस्लिम देशों में 2000 से ज्यादा भारत के लोग कैद हैं। दूसरे खाड़ी देशों की बात करें तो बहरीन, कुवैत और कतर में बड़ी संख्या में भारतीय कैद हैं। इसके अलावा नेपाल में 1317, मलेशिया में 338 और चीन में 173 भारतीय अलग अलग जेलों में बंद हैं। कुल मिलाकर दुनियाभर में 10,152 भारतीय 86 देशों में कैद हैं। इनमें सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, नेपाल, चीन जैसे 12 देश अहम हैं जहाँ कुल भारतीय कैदियों में से क़रीब तीन-चौथाई कैद हैं।

2 साल में 10 कैदी आए स्वदेश

इसका खुलासा विदेश मंत्रालय ने संसद की एक समिति के सामने किया है। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की अगुवाई वाली संसदीय स्थाई समिति ने अपनी छठी रिपोर्ट में ये जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 12 देशों में से 9 देशों के साथ कैदियों के लिए प्रत्यर्पण संधि है, फिर भी पिछले 2 सालों में यानी 2023 से मार्च 2025 तक सिर्फ 10 कैदियों को ही स्वदेश लाया जा सका है। इनमें ईरान और यूके से 3-3, रूस और कंबोडिया से 2-2 कैदी शामिल हैं।

31 देशों से कैदियों के ट्रांसफर का समझौता

विदेश मंत्रालय ने समिति को बताया है कि 31 देशों के साथ भारत का कैदियों के प्रत्यर्पण को लेकर द्विपक्षीय समझौता है। इनमें सऊदी अरब, यूएई, क़तर, ईरान, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, बांग्लादेश, बोस्निया, ब्राजील, बुलगारिया, कंबोडिया, मालदीव्स, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, सोमालिया, कज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, एजिप्ट, हॉगकॉग, यूके वियतनाम, श्रीलंका, थाईलैंड शामिल हैं। लेकिन, प्रक्रिया में वक्त लगता है क्योंकि TSP समझौते के तहत मेजबान देश और मूल देश के बीच सहमति जरूरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने कहा है, “भारत ने सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर दो बहुपक्षीय सम्मेलनों पर भी हस्ताक्षर किए हैं। इसका अर्थ है कि इंटर-अमेरिकन सम्मेलन और सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर यूरोप परिषद सम्मेलन के आधार पर सदस्य राज्यों और अन्य देशों के सजायाफ्ता व्यक्ति अपनी सजा की शेष अवधि पूरी करने के लिए अपने मूल देशों में स्थानांतरण की माँग कर सकते हैं।”

कैदियों को दी जा रही निःशुल्क कानूनी सहायता

रिपोर्ट में कहा गया है, “भारतीय कैदियों को वापस लाने में मिल रहा ‘कम सक्सेस रेट’ के कारण हमें इन प्रयासों की समीक्षा करनी होगी।” हालाँकि, मंत्रालय ने जानकारी दी है कि कई विचाराधीन कैदियों की मदद भारतीय काउंसलर कर रहे हैं। कैदियों को जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। इसके लिए कैदियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

विदेशी जेलों में बंद कैदियों की बड़ी संख्या को ध्यान में रखते हुए, समिति ने कहा कि वह चाहती है कि सरकार समझौतों और सम्मेलनों को लागू करने में आ रहीं बाधाओं का अध्ययन करे और यदि जरूरी हो, तो कैदियों के सुगम प्रत्यर्पण की सुविधा के लिए मौजूदा समझौतों में संशोधन करे या नए समझौते बनाए। पैनल ने कैदियों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को आसान बनाने और विदेशी जेलों में भारतीय नागरिकों के साथ अच्छा व्यवहार हो इसके लिए उन देशों के साथ ‘कूटनीतिक प्रयास’ करने पर जोर दिया।

रिपोर्ट में अवैध तरीके से रह रहे भारतीय नागरिकों को अमेरिका द्वारा निकाले जाने का भी उल्लेख किया गया है। समिति का कहना है कि अमेरिका से लौटे इन भारतीयों को फिर से बसाने की जिम्मेदारी उन राज्य सरकारों की है जहाँ से ये लोग आते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प ने किया टैरिफ का ऐलान, भारत के सामानों पर लगेगा 26%: जानिए क्या होगा निर्यात पर असर, क्यों भारत को मिला ‘डिस्काउंट’

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनिया के कई देशों पर आयात शुल्क (टैरिफ) की घोषणा कर दी है। इस दायरे में यूरोप, अमेरिका के पड़ोसी देश और चीन समेत तमाम एशियाई राष्ट्र भी आए हैं। भारतीय सामानों पर अमेरिका ने 26% का टैरिफ लगाया है। यह एशियाई देशों पर लगाए गए टैरिफ में सबसे कम में से एक है। ट्रम्प ने टैरिफ लगाते समय पीएम मोदी का भी जिक्र किया है। भारत पिछले कुछ समय से अमेरिका के साथ इन टैरिफ को लेकर बातचीत कर रहा था। उसने इनसे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तैयारी भी कर ली थी।

क्या हैं ट्रम्प के टैरिफ, इसका क्या मतलब?

बुधवार (2 अप्रैल, 2025) की रात को ‘मेक अमेरिका वेल्थी अगेन’ नाम के एक अभियान के तहत दुनिया के अलग-अलग देशों पर नए टैरिफ का ऐलान किया। ट्रम्प ने विश्व के लगभग 100 देशों के विरुद्ध यह टैरिफ लगाए हैं। ‘टैरिफ’ शब्द का मतलब किसी सामान पर लगने वाले आयात शुल्क से है।

भारत में इसे आमतौर पर कस्टम ड्यूटी के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब है कि अमेरिका में किसी सामान के पहुँचने के बाद ग्राहक के पास उसके जाने तक कितना टैक्स लगाया जाएगा। सभी देश अपनी नीतियों के हिसाब से यह टैरिफ लगाते हैं।

ट्रम्प की इस बार की टैरिफ नीति का आधार कुछ दूसरा है। ट्रम्प का कहना है कि दुनिया के बाकी देशों ने अमेरिका की खुली अर्थव्यवस्था का गलत फायदा उठाया है। उनका कहना है कि अमेरिकी सामान को बाकी देश ऊँचे आयात शुल्क लगाकर आने बाजार में नहीं घुसने देते, जबकि वह देश अपना सामान अमेरिका में धड़ल्ले से बेचते हैं।

इसीलिए ट्रम्प ने सत्ता में आने से पहले ही ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ का ऐलान कर दिया था। ट्रम्प ने कहा था कि जो देश अमेरिकी सामान पर जितना टैरिफ लगाएगा, वापस उतना ही टैरिफ अमेरिका में उस देश के सामान पर लगा दिया जाएगा। ट्रम्प की इन शिकायतों के दायरे में सबसे बड़ा नाम चीन रहा है।

भारत भी ट्रम्प के निशाने पर था। इसी कड़ी में अब ट्रम्प ने नए टैरिफ का ऐलान कर दिया है। इनका सबसे बड़ा नुकसान उन देशों को होगा, जो अमेरिका में सामान निर्यात करते हैं। इसमें भारत भी शामिल है। हालाँकि, अपनी इस कवायद में ट्रम्प ने किसी भी देश को नहीं बख्शा है।

भारत पर कितना लगा?

राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने ऐलान में बताया है कि अमेरिका भारतीय सामान पर 26% का टैरिफ लगाएगा। राष्ट्रपति ट्रम्प ने इन टैरिफ का ऐलान करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री मोदी वापस गए हैं। वे मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं, लेकिन मैंने कहा कि आप मेरे मित्र हैं, लेकिन आप हमारे साथ ठीक बर्ताव नहीं कर रहे हैं।”

राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि भारत उनके सामानों पर 52% टैरिफ लगाता है लेकिन अमेरिका भारतीय सामान पर लगभग ना के बराबर ही टैरिफ लगाता है। इससे पहले भी राष्ट्रपति ट्रम्प आरोप लगा चुके हैं कि भारत अपना बाजार अमेरिकी सामानों के लिए मुश्किल बनाता है जबकि अमेरिका के भीतर बड़ा व्यापार करता है।

इसका भारत पर क्या असर?

इन टैरिफ का सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ेगा। अब अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान 26% महँगे दामों पर बिकेंगे। इससे उनकी अमेरिकी स्थानीय उत्पादों या फिर दूसरे देश से आए उत्पादों के मुकाबले किफायत कम हो जाएगी। भारतीय सामानों पर अभी तक अमेरिका में औसतन 3% का टैरिफ लगता आया है।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात सहयोगी है। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत ने 2024 में अमेरिका को 87 बिलियन डॉलर (लगभग ₹7.5 लाख करोड़) का निर्यात किया। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 18% है। अमेरिका के साथ भारत व्यापार अधिशेष में रहता है। यानी अमेरिका को भारत जितना निर्यात करता है, उससे कम अमेरिकी सामान का आयात करता है।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

विदेशों के साथ व्यापार का लेखाजोखा रखने वाले वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 की तीन तिमाहियों (अप्रैल-जून) में ही भारत की तरफ व्यापार का पलड़ा लगभग 30 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.5 लाख करोड़) से अधिक झुका है।

अब यह स्थिति कुछ बदल सकती है। राष्ट्रपति ट्रम्प के इस कदम का नुकसान भारतीय फार्मा कम्पनियों और टेलीकॉम क्षेत्र को होगा। वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2024-25 के अप्रैल से जून के बीच भारत ने अमेरिका को ₹63 हजार करोड़ से ज्यादा की दवाइयाँ बेचीं हैं।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

वहीं भारत ने इसी दौरान ₹55 हजार करोड़ से अधिक के टेलीकॉम उत्पाद भी अमेरिका को बेचे हैं। इसके बाद रत्न और हीरे भी भारत का बड़ा निर्यात हैं। अब इन सब पर असर पड़ेगा। संभव है कि उनके निर्यात में कुछ कमी देखने को मिले। हालाँकि, भारत पहले ही इन टैरिफ की तैयारी कर चुका है।

फरवरी, 2025 में आई सिटीबैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत को अमेरिका के टैरिफ से लगभग ₹50 हजार करोड़ का नुकसान सालाना हो सकता है। रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक नुकसान स्टील और एल्युमीनियम जैसे सेक्टर उठाएँगे। दवाइयों को लेकर थोड़ा असर जरूर पड़ेगा लेकिन इससे कोई ख़ास अंतर नहीं आने वाला।

सिटीबैंक की रिपोर्ट के इतर, हाल ही में आई भारतीय स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट ने कहा है कि भारत को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। स्टेट बैंक की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका के इस कदम के बाद भारत के अमेरिका को निर्यातों में लगभग 3%-3.5% की कमी आ सकती है। भारत इसे आसानी से झेल सकता है।

जल्द ही बन सकती है भारत-अमेरिका में बात

अमेरिका के भारत पर लगाए गए टैरिफ का प्रभाव जल्द खत्म भी हो सकता है। भारत और अमेरिका के बीच वर्तमान में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत चल रही है। भारत ने यह टैरिफ आने से एक दिन पहले ही FTA के लिए बातचीत की शर्तों को मंजूरी दी थी।

1 अप्रैल को ही FTA के लिए बात करने आए अमेरिकी अधिकारी वापस गए थे। भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों के बीच यह बातचीत 4 दिनों तक चली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता इस वर्ष की गर्मियों तक अंतिम रूप ले सकता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक जोर लगा रहा है और इसे जल्द ही पूरा करना चाहता है।

भारत ने यह टैरिफ के ऐलान से कुछ समय पहले ही अमेरिकी सामानों पर कई तरह के टैक्स हटा लिए थे। इससे अमेरिकी प्रशासन में सकारात्मक सन्देश गया है। भारत पर लगाए गए 26% टैरिफ को इसीलिए ‘छूट वाली दरें’ कहा जा रहा है।

दुनिया के लिए चिंता का सबब

भारत पर एशिया के भीतर जापान और कोरिया के बाद सबसे कम टैरिफ ट्रम्प प्रशासन ने लगाए हैं। हालाँकि, सबसे तगड़ा झटका चीन, बांग्लादेश और विएतनाम जैसे देशों को लगा है। चीन पर सर्वाधिक 54% टैरिफ थोपे गए हैं। इसमें से 34% टैरिफ जबकि 20% लेवी टैक्स है।

अब चीन का अमेरिका में निर्यात और भी महँगा हो जाएगा। अमेरिका, चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। वह इस जवाब में अमेरिका पर भी टैरिफ लगा सकता है। ट्रम्प के पहले कायर्काल में भी ऐसी ही जंग हुई थी। वहीं बांग्लादेश और विएतनाम बहुत बड़े पैमाने पर इसके भुक्तभोगी बनेंगे।

बांग्लादेश के कपड़ों पर अब अमेरिका के भीतर 37% का टैरिफ लगेगा। बाकी सामान पर यही दर लागू होगी। बांग्लादेश के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा लगभग 20% है। अब अमेरिकी बाजार बांग्लादेश के लिए और भी मुश्किल हो जाएगा।

इसके अलावा पहले ही मंदी की मार झेल रहा यूरोपियन यूनियन भी इस टैरिफ के दंश से नहीं बचा है। उस पर 20% का टैरिफ लगाया गया है। इसका असर भी आगे आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। ट्रम्प के इस ऐलान के बाद वैश्विक व्यापार में कमी आ सकती है।

इसके अलावा सभी देश अब अपने घरेलू बाजार की तरफ ध्यान देने को भी मजबूर होंगे। विश्व भर में मैन्युफैक्चरिंग पर भी असर पड़ने वाला है। पहले पश्चिमी देशों और अमेरिका से चीन या दक्षिणपूर्वी एशिया की तरफ भागने वाली कम्पनियाँ वापस अमेरिका में उत्पादन चालू करने का सोच सकती हैं।

तेलंगाना में कॉन्ग्रेस सरकार के ‘नंगा नाच’ पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- हम शक्तिहीन नहीं: जानिए क्या है विधायकों की अयोग्यता याचिका से जुड़ा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (2 अप्रैल 2025) को BRS (भारत राष्ट्र समिति) के विधायकों की अयोग्यता की याचिकाओं पर नोटिस जारी करने में लगभग 10 महीने लगाने पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष से सवाल पूछा है। ये विधायक BRS छोड़कर कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के बयान की आलोचना की और उसे 10वीं अनुसूची का मजाक बताया।

कॉन्ग्रेस नेता एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने विधानसभा में कहा था कि विधायकों के पाला बदलने पर भी उपचुनाव नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सीएम के बयान पर आपत्ति जताई। दरअसल, संविधान की 10वीं अनुसूची दल बदलने से संबंधित अयोग्यता के प्रावधानों से संबंधित है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता से संबंधित आवेदिन पर निर्णय लेने में देरी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। एक याचिका में तीन विधायकों की अयोग्यता से संबंधित तेलंगाना हाई कोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। वहीं, दूसरी याचिका में दल बदलने वाले सात अन्य विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई थी।

दल बदलने वाले विधायकों को लेकर BRS ने हाई कोर्ट में याचिका दी थी। इस याचिका पर सुनवाई करने के बाद तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 9 सितंबर 2024 को विधानसभा सचिव को निर्देश किया था। इस निर्देश में कहा गया था कि वे विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष रखें तथा चार सप्ताह के भीतर सुनवाई निर्धारित करें।

इसको लेकर कॉन्ग्रेस ने अपील की। इसके बाद पिछले साल नवंबर में हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ ने सुनवाई की। इस सुनवाई में दो जजों की खंडपीठ ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष को तीनों विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर ‘उचित समय’ के भीतर फैसला करना चाहिए। उचित समय को लेकर स्पष्ट नहीं था। इसको लेकर BRS ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि पहली अयोग्यता याचिका 18 मार्च 2024 को दायर की गई थी। उसके बाद 2 अप्रैल और 8 अप्रैल को दो और याचिकाएँ दायर की गईं। हाई कोर्ट में याचिका 10 अप्रैल 2024 को दायर की गई थी। रोहतगी ने कहा, “क्या यह उचित समय तक इंतजार करना है?”

अयोग्यता याचिकाओं पर नोटिस देने में इतना समय लगने के सवाल पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह मामला हाई कोर्ट में लंबित था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश मुकुल रोहतगी से पूछा, “तो फिर जब मामला हमारे संज्ञान में था, तब आपने नोटिस क्यों जारी किया? क्या हमें अब अवमानना ​​का नोटिस जारी करना चाहिए?”

इस पर रोहतगी ने कहा कि हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका 15 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी और स्पीकर ने अगले दिन नोटिस जारी किया था। पीठ ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि जब मामला हाई कोर्ट में था तो स्पीकर ने कार्रवाई करने से परहेज किया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो उन्होंने कार्रवाई की।

जस्टिस गवई ने कहा कि हाई कोर्ट की एकल पीठ ने सिर्फ 4 सप्ताह के भीतर शेड्यूल तय करने का निर्देश दिया था, ना कि उस समय सीमा में पूरे मामले का निपटारा करने के लिए कहा था। सर्वोच्च अदालत ने पूछा, “यदि अध्यक्ष कोई कार्रवाई नहीं करते हैं तो इस देश की अदालतें, जिनके पास न केवल शक्ति है, बल्कि संविधान के संरक्षक के रूप में उनका कर्तव्य भी है, शक्तिहीन हो जाएँगी?”

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल निर्णय की सत्यता की जाँच करने के लिए लागू होती है। उन्होंने कहा, “चूँकि इस मामले में कोई निर्णय नहीं हुआ है तो क्या न्यायालय को सिर्फ खड़े होकर लोकतंत्र के नंगा नाच को देखते रहना चाहिए?” कोर्ट ने कहा कि उसके निर्देशों की अवहेलना की जाती है तो वह शक्तिहीन है।

अदालत ने सवाल किया, “हम शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सम्मान करते हैं, लेकिन जब कोई संवैधानिक प्रावधान किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनाया जाता है तो क्या अदालतों को उसे निरस्त करने की अनुमति देनी चाहिए?” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था।

इससे पहले 25 मार्च को बीआरएस नेता पाडी कौशिक रेड्डी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम ने तर्क दिया था कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या संवैधानिक न्यायालय के पास संवैधानिक प्राधिकरण को अपने आदेश के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करने का अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायालयों को ऐसी शक्ति से वंचित करना ‘न्याय की पूर्ण विफलता’ होगी।

इस मामले में 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार और अन्य से जवाब माँगा था, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि समय पर निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने ऐसी स्थिति के खिलाफ चेतावनी दी थी कि ‘ऑपरेशन सफल हो जाए, लेकिन मरीज मर जाए’ का कोई फायदा नहीं है। कोर्ट ने विधायक दानम नागेंदर, वेंकटराव तेलम और कडियम श्रीहरि से भी जवाब माँगा था।

वक़्फ़ बिल को लोकसभा की मंजूरी, 12 घंटे से ज्यादा चली बहस: अब राज्यसभा में पेश होगा, 288 वोट समर्थन में मिले

लोकसभा में बुधवार (2 अप्रैल, 2025) को 12 घंटे से भी अधिक चली बहस के बाद आखिरकार पारित कर दिया गया। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी दिनभर संसद से गायब थे, लेकिन वोटिंग के वक़्त वो सदन में पहुँचे। जहाँ वक़्फ़ संशोधन विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े, वहीं इसके विरोध में 232 वोट पड़े। AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी व कॉन्ग्रेस नेता KC वेणुगोपाल द्वारा सुझाए गए संशोधनों को भी लोकसभा ने ध्वनिमत से खारिज कर दिया।

ये विधेयक 1995 के वक़्फ़ एक्ट को संशोधित करता है। वहीं 1923 के मुसलमान वक़्फ़ एक्ट को ये पूरी तरह रद्द कर देता है। बता दें कि सरकार ने लोकसभा में 2 बिल पेश किए थे। पहला, वक़्फ़ संशोधन विधेयक, 2025 और दूसरा, मुसलमान वक़्फ़ रिपील बिल, 2024. भाजपा के सहयोगी दलों जदयू, TDP और लोजपा ने इस बिल के समर्थन में वोट किया। इसके साथ ही वक़्फ़ एक्ट की उस धारा-40 को भी हटा दिया गया है, जिसके तहत वक़्फ़ बोर्ड को किसी भी संपत्ति को वक़्फ़ घोषित करने का अधिकार था।

साथ ही अब सेन्ट्रल वक़्फ़ काउंसिल में 2 ग़ैर-मुस्लिम सदस्यों को नियुक्त करने का रास्ता भी साफ़ हो गया है। मोदी सरकार ने स्पष्ट कहा कि वक़्फ़ बोर्ड कोई मजहबी संस्था नहीं है। साथ ही ये प्रावधान भी किया गया है कि कोई मुस्लिम शख्स अगर वक़्फ़ को संपत्ति दान में देता है, इसके लिए ज़रूरी है कि वो कम से कम 5 वर्षों से इस्लाम मजहब की प्रैक्टिस कर रहा हो। केंद्र ने ये भी साफ़ किया है कि राज्य सरकारों को पूर्ण अधिकार दिए जा रहे हैं, हर राज्य के वक़्फ़ बोर्ड्स हैं।

अब गुरुवार को इस विधेयक को राज्यसभा में पेश किया जाएगा। वहाँ भी NDA बहुमत में है, ऐसे में बिल को पास कराने के लिए सरकार कोई ख़ास जद्दोजहद नहीं करनी पड़ेगी। ये इसीलिए भी ख़ास है क्योंकि भाजपा केंद्र में अभी अपने दम पर पूर्ण बहुमत में नहीं है और JDU व TDP जैसी पार्टियाँ उसकी साथी हैं जो ‘सेक्युलर’ कही जाती रही हैं। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने बार-बार समझाया है कि इस बिल का मजहब से कोई लेना-देना नहीं है, ये संपत्तियों का मामला है।

भाजपा का बार-बार यही कहना रहा कि ये बिल अल्पसंख्यकों के हित में है। पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस केवल अल्पसंख्यकों की बातें करती रही। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में शाहबानो नामक महिला को अधिकार न मिले और मुल्ले-मौलवी ख़ुश हों इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलट दिया गया था। राज्यसभा में भी इस बिल को लेकर लंबी बहस होगी। बता दें कि इस बिल को संसदीय समिति JPC के पास भेजा गया था, फिर वापस लोकसभा में पेश किया गया।

अखंड भारत की शुरुआत बांग्लादेश से सटे ‘चिकन नेक’ को चौड़ा करके: बंगाल के हिन्दुओं को वापस मिले उनकी मातृभूमि, जानिए यह क्यों जरूरी

वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध ने इस उपमहाद्वीप का नक्शा बदल दिया। बांग्लादेश को इस युद्ध के बाद पश्चिमी पाकिस्तान से मुक्ति मिली। करोड़ों बंगालियों का अपने एक संप्रभु राष्ट्र का सपना पूरा हुआ। यह काम भारत के बिना हो ही नहीं सकता था। बांग्लादेश के निर्माण ने बंगाली लोगों की लुप्त होती आकांक्षाओं को पुनर्जीवित किया। बांग्लादेश के निर्माण के बाद भले ही कई चुनौतियाँ आई, लेकिन दोनों देशों के संबंध मधुर बने रहे।

अगस्त, 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद दोनों देशों के सम्बन्धों में खटास आई है। राजनयिक से लेकर बाकी स्तर पर बांग्लादेश और भारत के बीच रोज किसी ना किसी मुद्दे पर तल्खी बढ़ी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस की तथाकथित अंतरिम सरकार की इस्लामी कट्टरपंथी नीति है। मुहम्मद यूनुस की सरकार हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों के क्रूर उत्पीड़न को चुपचाप देख रही है। वह लगातार ऐसी हरकतें कर रही है, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव बढ़े।

पूर्वोत्तर राज्यों पर बांग्लादेश की नजर

भारत से लगातार टकराव मोल लेने का एक और उदाहरण हाल ही मोहम्मद यूनुस की चीन यात्रा में देखने को मिला यहाँ उन्होंने चीन को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के पास लगे इलाके में आमंत्रित किया। यूनुस ने कहा कि भारत के सात पूर्वोत्तर राज्य जमीन से घिरे हुए हैं।

उन्होंने कहा “भारत के 7 राज्य, भारत का पूर्वी हिस्सा, जिन्हें सेवेन सिस्टर्स (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा) कहते हैं। वे भारत के जमीन से घिरे हुए हैं। उनके पास समुद्र तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं है।”

इसके बाद उन्होंने बांग्लादेश को इस इलाके के समुद्र के एकमात्र मालिक के रूप में बताया और चीन को इसका फायदा उठाने के लिए न्योता दिया। मोहम्मद यूनुस ने कहा कि इस इलाके में आकर चीन उत्पादन और उनकी बिक्री कर सकता है। उन्होंने चीन के निवेश को रिझाने के लिए इस इलाके को मुफीद बताया और कहा कि यहाँ से निर्यात भी हो सकता है।

मोहम्मद यूनुस ने दावा किया कि बांग्लादेश के इस इलाके से चीन नेपाल और भूटान तक का फायदा उठा सकता है। मोहम्मद यूनुस ने यह सभी बातें यह जानते हुए कहीं कि इससे भारत की चिंताएँ बढेंगी। भारत कभी भी अपने इलाके से कुछ सौर किलोमीटर दूर चीन की मौजूदगी नहीं चाहेगा।

मोहमद यूनुस यह भी जानते हैं कि बांग्लादेश भारत के लिए पड़ोसी होने के साथ ही रणनीतिक महत्व भी रखता है, क्योंकि देश के कई स्थान ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ के पास स्थित हैं, जिसे अक्सर ‘चिकन नेक’ के रूप में जाना जाता है। यह लगभग 20 किलोमीटर चौड़ा संक्रा गलियारा है, जो पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है।

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब मोहम्मद यूनुस ने ऐसा को गैर जिम्मेदाराना बयान दिया हो। इससे पहले अगस्त, 2024 में एक इंटरव्यू में कहा था, “यदि आप बांग्लादेश को अस्थिर करेंगे, तो इसका असर पूरे बांग्लादेश में फैलेगा, जिसमें म्यांमार और पश्चिम बंगाल और सेवेन सिस्टर्स भी शामिल हैं।”

मोहम्मद यूनुस 26 मार्च, 2024 को बांग्लादेश से चीन गए थे। वह 4 दिन की यात्रा पर चीन पहुँचे थे। यहाँ उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इस यात्रा को बांग्लादेश के उप विदेश मंत्री ने एक ‘सन्देश’ भेजने वाली यात्रा बताया।

यूनुस के बयान से खड़े हुए कान

मोहम्मद यूनुस की इस टिप्पणी का भारत में तगड़ा विरोध हुआ। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इसे ‘अपमानजनक और कड़ी निंदा योग्य’ बताया। उन्होंने चिकन नेक के इलाके के आसपास और नीचे नर रास्ते तलाशे जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मोहम्मद यूनुस लगातार अपना एजेंडा लेकर चल रहे हैं।

राजनीति और सुरक्षा विशेषज्ञ क्रिस ब्लैकबर्न ने इस टिप्पणी को ‘चिंताजनक’ और ‘स्पष्टीकरण’ के लायक बयान बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि इस बयान में क्या यूनुस भारत के सेवेन सिस्टर्स राज्यों के पास चीन की भागीदारी की वकालत कर रहे थे।

अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य संजीव सान्याल ने इस मुद्दे पर लिखा, “दिलचस्प है कि यूनुस चीन से इस आधार पर सार्वजनिक अपील कर रहे हैं कि भारत के 7 राज्य चारों ओर से जमीन से घिरे हुए हैं।” उन्होंने इस बयान को लेकर शंकाएँ जताईं।

चिकन नेक और इसका रणनीतिक महत्त्व

लगभग 20 किलोमीटर चौड़ाई वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ के नाम से भी जाना जाता है, पूर्वोत्तर राज्यों और भारत के बीच एकमात्र रास्ता है। इसके एक तरफ बांग्लादेश तो दूसरी तरफ नेपाल और भूटान है। यह भारत के 2.62 लाख वर्ग किलोमीटर या भारत के कुल जमीन के 8% हिस्से को जोड़ता है।

इसमें बांग्लादेश के उत्तर दिनाजपुर जिले के उत्तरी क्षेत्र और दार्जिलिंग जिले के दक्षिणी क्षेत्र शामिल हैं। इन जिलों की सीमा बांग्लादेश के साथ ही बिहार के पूर्णिया और किशनगंज से लगती है, यह दोनों मुस्लिम बहुल जिले हैं।

पूर्वोत्तर राज्यों की 99% सीमाएँ पाँच पड़ोसी देशों: चीन, म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल से सटी हुई हैं। यह कॉरिडोर इन राज्यों की सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों के लिए एक आवश्यक माध्यम बन जाता है। पूर्वोत्तर भारत अपनी लगभग सभी ज़रूरतों के लिए सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भर है।

चिकन नेक कॉरिडोर के काफी छोटा होने के चलते पूर्वोत्तर भारत से बाकी देश को जोड़ने में बड़ी समस्याएँ आती हैं और वहाँ माल भेजना भी महँगा पड़ता है। अगर कभी युद्ध की स्थिति बने और इस हिस्से पर हमला हो तो बाकी भारत को पूर्वोत्तर से जोड़ना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए, इस कॉरिडोर को लेकर चिंताएँ अब भी बनी हुई हैं, इसका एक कारण चीन का लगातार विस्तारवादी नीतियाँ अपनाना भी है। कई सैन्य अधिकारियों समेत रक्षा विशेषज्ञों ने भी इस चिंता को लेकर बात की है। पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने गलियारे को ‘संवेदनशील’ और भारत के लिए एक प्रमुख सुरक्षा प्राथमिकता बताया है।

अक्टूबर, 2024 में एक कॉन्क्लेव के दौरान पूर्वी कमान के पूर्व प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने कहा था कि म्यांमार में लड़ाई और बांग्लादेश में राजनीतिक संघर्ष के चलतेकलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और चटगाँव बंदरगाह के माध्यम से त्रिपुरा तक कनेक्टिविटी जैसे अन्य मार्ग बाधित हो गए हैं।

उन्होंने बताया था कि इसके चलते सिलीगुड़ी कॉरिडोर और भी महत्वपूर्ण चैनल बन चुका है। उन्होंने चीन-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CMEC) के माध्यम से म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी बात की थी। इसके अलावा बांग्लादेश के दिनाजपुर के रंगपुर डिवीजन में चीनी मजदूरों की बढ़ती संख्या भी उतनी ही परेशानी वाली बात है।

बांग्लादेश के अलावा नेपाल में भी चीन का बढ़ता प्रभाव चिंता की बात है। विशेषकर इस गलियारे के पास लगती नेपाल सीमा के भीतर चीन के प्रोजेक्ट समस्या को और भी बढ़ाते हैं। 2017 में 73 दिनों तक चले डोकलाम विवाद के दौरान, चीन ने इस भूटान के माध्यम से घुसपैठ की थी। हालाँकि भारत ने इस घटना में चीन को पटखनी दी थी।

इन सबके साथ ही चीन जबरदस्ती कब्जाए गए तिब्बत के चुम्बी घाटी से भी सिलीगुड़ी कॉरिडोर को घेरता है। जनरल कलीता ने बताया था कि चीन ने तिब्बत के इस इलाके में कई इन्फ्रा प्रोजेक्ट चालू किए हैं। इनमें नए सैन्य अड्डे और नई एयरफील्ड शामिल हैं।

चीन ने कथित तौर पर LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के पास अरुणाचल के करीब 90 नई बस्तियाँ बनाई हैं। 2018 और 2022 के बीच इनमें से 600 से ज़्यादा नए घर या ऐसे ही ढाँचे सामने आए हैं। मई, 2024 में ली गई सैटेलाइट तस्वीरों में माजिदुनचुन और झुआंगनान जैसी जगहों पर नए निर्माण दिखाई देते हैं। नागरिक और सैन्य दोनों तरह के ढाँचे हैं।

तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के ल्होखा प्रान्त और न्यिंगची (अरुणाचल के पास) के आस-पास के कई इलाके LAC से 5 से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। जनरल कलीता ने बताया था कि अगर चीन की सभी हरकतों को एक नक़्शे पर उभारा जाए तो पता चलेगा कि यह सब सिलीगुड़ी कॉरिडोर को घेरने के लिए हो रहा है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर का महत्व ऐसे भी समझा जा सकता है कि रोज 10 लाख से अधिक वाहन इससे होकर गुजरते हैं। रोज इस कॉरिडोर से 2400 टन माल गुजरता है और इससे ₹142 करोड़ राजस्व की रोज कमाई होती है। जनरल कलीता ने स्पष्ट किया था कि चीन इस गलियारे को घेरने के लिए लगातार आक्रामक होता रहेगा।

इस कॉरिडोर की समस्याओं को देखते हुए भारत ने पूर्व में बांग्लादेश से कुछ समझौते किए थे। इसके चलते भारत पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश की सड़कें और वहाँ के नदी वाले रास्ते उपयोग करता आया है। कोलकाता से अगरतला जाने वाली एक बस इसका उदाहरण है।

यह बस बांग्लादेश होते हुए अगरतला जाती है, इससे इसका सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र बचता है। भारत बांग्लादेश के चटगाँव बंदरगाह के माध्यम से पूवोत्तर में माल भेजता है, इसके चलते बांग्लादेश को बड़ी कमाई होता है। हालाँकि, यह कोई पक्का उपाय नहीं है क्योंक बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के चलते किसी भी दिन यह समझौते टूट चुके हैं।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दुश्मनों की रही है नजर

भारत के संबंध में सिलीगुड़ी कॉरिडोर एक हमेशा बने रहने वाले खतरे के रूप में है। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि भारत के दुश्मन इस कमजोरी को पहचानते हैं। वह इसका फायदा उठाने के भी प्रयास करते रहे हैं। मुहम्मद यूनुस का हालिया बयान इस्लामी कट्टरपंथियों की इस कॉरिडोर के विषय में धमकियों को भी याद दिलाते हैं।

CAA कानून के खिलाफ होने वाले प्रदर्शन के दौरान इस कॉरिडोर की कमजोरी को लेकर इस्लामी कट्टरपंथी शरजील इमाम ने बयान दिया था। उसने मुसलमानों से अपील की थी कि वह चिकन नेक को काट दें और पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से अलग कर दें।

शरजील इमाम ने कहा था कि यह सब करने के लिए उसे 5 लाख मुसलमानों की जरूरत है। उसने कहा था कि ऐसा होने पर भारत महीनों तक पूर्वोत्तर से अलग रहेगा और यहाँ भारतीय सेना को जाने के लिए हवाई रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ेगा। उसने दावा किया था कि असम में बंगालियों का नरसंहार हो रहा है।

शरजील इमाम ने इस दौरान यह भी साफ कर दिया था कि चिकन नेक कॉरिडोर के आसपास मुस्लिम बसते हैं और उन्हें इस कॉरिडोर तोड़ने के खिलाफ भड़काना होगा। उसने मुस्लिमों को चिकन नेक काटने के खिलाफ भड़काना जिम्मेदारी बताया था।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर 30 वर्ष पूर्व हिंदू बहुल था। हालाँकि, रोहिंग्याओं और हज़ारों बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ के चलते यहाँ की डेमोग्राफी बदल चुकी है। इस इलाके में बांग्लादेश और म्यांमार से मुस्लिमों के आने के चलते उत्तर बंगाल और असम के बांग्लादेश से लगने वाले अधिकांश जिले मुस्लिम बहुल हैं।

इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के एक पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर ने स्वराज्य की एक रिपोर्ट में बताया, “उत्तर बंगाल के बड़े हिस्से में यह डेमोग्राफी का बदलाव एक गंभीर मुद्दा बन गया है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गम्भीर खतरा भी है। पिछले कुछ दशकों में IB समेत बाक़ी एजेंसियों ने केंद्र सरकार को इस संबंध में रिपोर्ट सौंपी हैं।”

अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT), जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), जो अल कायदा और बांग्लादेश में ISIS से जुड़े संगठनों से जुड़ा है। इस इस्लामी आतंकी संगठन ने भी कॉरिडोर को काट देने की रणनीति बनाई थी। ये इस्लामी आतंकी संगठन इस इलाके की आबादी को कट्टर बनाने और चिकन नेक और बिहार में कई सभाएँ भी कर रहे हैं।

IB के पूर्व शीर्ष अफसर ने बताया, “इस क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिम अवैध घुसपैठिए हैं या फिर बांग्लादेश और म्यांमार से आए घुसपैठियों के वंशज हैं। उनसे कहा जा रहा है कि वह भारत के खिलाफ आवाज उठाए क्योंकि यह कथित तौर पर मुस्लिमों पर अत्याचार करता है।”

आगे उन्होंने बताया, “उन्हें बताया जा रहा है कि वे इस क्षेत्र में बहुसंख्यक हैं और उन्हें भारत को हरा कर इस्लामी राज स्थापित करने में मदद करनी होगी। कई भड़काने वाले इस इलाके को बांग्लादेश में मिलाने के लिए वकालत कर रहे हैं।”

IB में काम कर चुके वाले एक उप निदेशक ने इस विषय पर कहा, “गजवा-ए-हिंद की वकालत करने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों की योजना के अनुसार, चिकन नेक कॉरिडोर में संचार को रोक कर और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमला करके भारत को खतरे में डाला जाए।”

उन्होंने बताया, “प्लान यह है कि हमले के समय में सरकारी कॉरिडोर में अपनी सारी शक्ति नहीं उपयोग कर पाएगी और युद्ध वाले मोर्चे पर फंसी होगी। इस कॉरिडोर में लम्बे समय तक विवाद चला तो बाहरी शक्तियां इसका फायदा उठा शक्ति हैं और यह भारत से लाग भी हो सकता है।”

IB में दशकों तक काम कर चुके अफसर के अनुसार, “इस्लामी कट्टरपंथियों की योजना के अनुसार सिर्फ़ चिकन नेक कॉरिडोर में रहने वाले मुसलमान ही विद्रोह नहीं करेंगे। बिहार के किशनगंज और पूर्णिया जिलों में रहने वाले उनके साथी घुसपैठिए भी विद्रोह में शामिल होंगे और उन सभी को बांग्लादेश में रहने वाले मुस्लिमों का समर्थन मिलेगा।”

मोदी सरकार ने चिकन नेक सुरक्षित करने को उठाए कदम

फरवरी 2025 में, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस बात की पुष्टि की थी कि मोदी प्रशासन इस कॉरिडोर के चलते आने वाली तमाम समस्याओं को पूरी तरह जानती है। इसलिए उसने पूर्वोत्तर के साथ निर्बाध संपर्क बनाए रखने के लिए एक रणनीति विकसित की है।”

मुख्यमंत्री सरमा ने बताया कि भारतीय रेलवे कनेक्टिविटी में सुधार के लिए चिकन नेक में 4 अतिरिक्त रेलवे ट्रैक बनाएगा। इसके अलावा, जल्द ही गलियारे में दो और रेलवे लाइनें शुरू करने की योजना है, जिससे असम और अन्य क्षेत्रों में रेलवे के इन्फ्रा को मजबूती मिलेगी।

इसके अलावा सरकार उन पर निगरानी रख रही है जो चिकन नेक को खतरे में डालने की बात कर रहे हैं। सरकार ने इस इलाके में निवेश बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए हैं। हाल ही में सम्पन्न हुए असम के इन्वेस्टर समिट में भी इस पर जोर था।

इस इलाके में इन्फ्रा भी मजबूत किया जा रहा है। भारत सिलीगुड़ी के माध्यम से एक मल्टीमॉडल कॉरिडोर बनाए जाने की योजना बना रहा है। इसमें हाईस्पीड रेल और सुरंगे तक शामिल होने वाली हैं। इसके अलावा भारत अरुणाचल फ्रंटियर हाइवे बनाने वाला है। यह देश की सबसे बड़ी इन्फ्रा परियोजनाओं में से एक होगा, इसकी लागत ₹42 हजार करोड़ होने की संभावना है।

पूर्वोत्तर राज्यों में कामों के लिए जिम्मेदार मंत्री ज्योतारिदित्य सिंधिया ने हाल ही में बताया, “पिछले 10 वर्षों में हमने करीब साढ़े पाँच हजार किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए हैं। जिस क्षेत्र में केवल 10,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग थे, आज वहाँ 16,000 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग हैं।”

उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर प्रश्न भी उठाए और आरोप लगाया कि उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों की अनदेखी की। उन्होंने बताया, “60 साल में क्या बना था? सारे इन्फ्रा का 60% 10 साल में बनाया गया है। पिछले 10 साल में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत ₹50,000 करोड़ की लागत से 45,000 किलोमीटर का निर्माण किया गया है।”

उन्होंने कहा, “यह राजमार्गों की बात है। अगर आप रेलवे को देखें, तो रेलवे ट्रैक बनाने की गति मोटे तौर पर पहले 6.5 किलोमीटर/महीने थी। यह अब बढ़कर 19 किलोमीटर/महीने हो गई है। पिछले 10 साल में 2,000 किलोमीटर रेलवे ट्रैक बनाए गए हैं।”

उनके अनुसार, पहले पूर्वोत्तर में मात्र हवाई अड्डे हुआ करते थे लेकिन अब इनकी संख्या बढ़ कर 17 हो चुकी है। उनोने बताया कि अब 1990 उड़ाने पूर्वोत्तर राज्यों से चलती हैं। इसके अलावा पानी के जरिए भी यातायात बढ़ा है। मंत्री सिंधिया ने बताया कि पहले मात्र एक जलमार्ग हुआ करता था जो अब बढ़ कर 20 हो चुके हैं।

अंग्रेजों ने बोए जहर के बीज

सिलीगुड़ी कॉरिडोर की समस्या अंग्रेजों की दी हुई है। यहाँ तक यह नाम भी उनका ही दिया है। अंग्रेजों ने 1905 में बंगाल को पहली बार विभाजित किया था। इसका उद्देश्य बंगाल में बढ़ते आंदोलन को रोकना था। इसके बाद 1911 में राज्य को मिलाया तो गया लेकिन धार्मिक विभागं के बीज बो दिए गए।

फोटो साभार: GeeksforGeeks

यही आगे चल के 1947 में भारत के विभाजन का एक कारण बना। बंगाल, असम और बाकी पूर्वोत्तर के राज्यों वह हिस्सा तोड़ के अलग कर दिया गया, जहा हिन्दू बसा करते थे। इस विभाजन के चलते भारत ने अपना महत्वपूर्ण भूभाग खो दिया।

अंग्रेज विभाजन का रास्ता हमेशा हिन्दुओं को कमजोर करने और अपने खिलाफ विद्रोह ना पैदा होने देने के लिए चलते करते थे। इस रणनीति को उन्होंने बार-बार अपनाया था। इसमें उनका साथ देने वाले इस्लामी कट्टरपंथी गुट भी होते थे। इन्होने पाकिस्तान बनाने में अंत में सफलता पाई। पाकिस्तान की बात सबसे पहले मुस्लिमों ने 1930 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में रखी थी।

पाकिस्तान बनाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना ‘हिन्दुओं के राज’ में नहीं रहना चाहता और इसलिए वह मुस्लिमों के अलग मुल्क चाहता था। उसकी बात को खाद पानी देने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवादी थे। इनमें एक नाम प्रधानमंत्री चर्चिल भी था। अंग्रेज मानते थे कि पाकिस्तान हमेशा ब्रिटेन का एक वफादार रहेगा।

अंग्रेजों की सोची-समझी ‘फूट डालो और राज करो’ आगे चल कर हिंसा में बदल गई। उन्होंने इस नीति के अंतर्गत लाहौर, सिंध और चटगाँव जैसे इलाकों में रहने वाले हिन्दुओं को बेदखल कर दिया और इसे मुस्लिमों को दे दिया।

भारत के विभाजन के चलते दोनों समुदायों की दुश्मनी ही नहीं बढ़ी बल्कि भारत के लिए दो इस्लामी देश, आतंकवाद और कूटनीतिक चुनौतियाँ भी सामने आ गई। विभाजन के चलते ही पूर्वोत्तर शेष भारत से अलग-थलग पड़ गया और उसका विकास दशकों तक नहीं हो सका। वह चीन भी घिर गया।

विभाजन के चलते ही पूर्वोत्तर से चटगाँव बंदरगाह छिन गया। यह हिस्सा इसके बाद बांग्लादेश को दे दिया गया। एकदम किनारे होने के चक्कर में नई दिल्ली इस इलाके पर ध्यान नहीं दे पाई और यह विकास की मुख्यधारा से पीछे छूट गया। यही कारण है कि यह इलाका अब आंतरिक और बाहरी खतरों के प्रति संवेदनशील है।

विभाजन ने जनजातियों के साथ भी किया अन्याय

पाकिस्तान बनाए जाने के समय भारत के पूर्वोत्तर के हिस्से लगभग 1000 मील का क्षेत्र काट दिया गया था। हालाँकि, इसका उस पाकिस्तान से कोई लेना देना नहीं था जो पश्चिम में बनाया गया था और जहाँ के रहने वाले अधिकतर पश्तून और पंजाबी हैं। बांग्लादेश में रहने वाले अधिकांश लोग बंगाली हैं और उनकी संस्कृति दूसरे हिस्से से बिलकुल अलग है।

प्राचीन भारत का पूर्वी क्षेत्र, जो काफी हद तक वर्तमान बांग्लादेश में है, महाजनपद काल में भी फल फूल रहा था। ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी के दौरान फला-फूला अंग साम्राज्य इसका एक बड़ा उदाहरण है। बांग्लादेश मौर्य और गुप्त साम्राज्यों सहित कई प्राचीन भारतीय साम्राज्यों का हिस्सा था।

फोटो साभार: IAS/Facebook

बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र में कई भारतीय जनजातीय समूह रहते हैं। इनमें चकमा, संताल, गारो और त्रिपुरा शामिल हैं, जिन्हें स्वदेशी या जातीय अल्पसंख्यक माना जाता है। बांग्लादेश में 54 से ज़्यादा जनजातीय समूह रहते हैं। यह बांग्लादेश के कुछ समतल जमीन वाले जिलों में भी हैं।

बांग्लादेश की सरकार 50 जातीय समूहों के अस्तित्व को स्वीकार करती है, फिर भी वह इन्हें कोई संरक्षण नहीं देती। परंपरागत रूप से, इनमें से कई समूह ईसाई, बौद्ध या हिंदू रहे हैं जबकि उनमें से कुछ प्रकृति के पूजक भी हैं।

भारत के 1947 के विभाजन के दौरान चटगाँव वाले इस इलाके को पाकिस्तान को सौंपा गया था। इस पर विवाद भी हुआ था। स्थानीय लोग इससे भड़क गए थे। यहाँ तब कोई भी मुस्लिम नहीं बसते थे। लेकिन पाकिस्तान की सरकार ने इसके बाद यहाँ बंगाली मुस्लिमों को बसाना चालू कर दिया।

1964 में इसके विशेष दर्जे को भी पाकिस्तान सरकार ने समाप्त कर दिया। इसके बाद यहाँ और तेजी से बंगाली मुस्लिम बसाए जाने लगे। 1979 से 1983 के बीच पहाड़ी इलाकों में बंगालियों को बसाने के लिए बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा योजना चलाई गई।

यह इसलिए बांग्लादेश सरकार ने किया ताकि यहाँ के जनजातीय लोगों की जमीन छीनी जा सके।बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद, जनजातीय लोगों के प्रतिनिधिमंडल ने नए प्रशासन से CHT इलाके को स्वायत्तता देने की याचिका दायर की, लेकिन इसे नहीं स्वीकार नहीं किया गया।

बांग्लादेश में लगातार सरकारों द्वारा उनके प्रतिरोध को हिंसक रूप से दबा दिया गया है। मौजूदा शासन के तहत उनकी स्थिति और भी खराब होती जा रही है। अंग्रेजों और मुस्लिमों के स्वार्थी हितों को पूरा करने के लिए बनाई गई सीमाओं के चलते यह जनजातीय लोग उपेक्षा झेलने को मजबूर हैं।

अब भारत के लिए ऐतिहासिक गलती सुधारने का समय

दुनिया के सभी बड़े देश जैसे कि रूस, चीन, इजरायल और अमेरिका आदि ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा और सामरिक हितों को साधने के लिए विस्तार किया है। रूस का क्रीमिया पर कब्जा और यूक्रेन पर हमला इसी कड़ी का एक हिस्सा हैं।

हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड और पनामा नहर पर कब्जा करने की बात कही, यह उनकी विस्तारवादी नीति का ही परिणाम है। चीन तो लगातार भारत में ही घुसता आया है। उसकी विस्तारवादी नीति से उसके सारे पड़ोसी परेशान हैं।

कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र जबरदस्ती उकसावे को बर्दाश्त नहीं करेगा। और तब तो यह असहनीय होगा जब वह राष्ट्र आपको भड़काए जिसका निर्माण ही आपकी मेहनत से हुआ हो और वह आपसे कई गुना छोटा हो। भारत और बांग्लादेश के बीच बहुत बड़े अंतर हैं। भारत जमीन के मामले में तो बांग्लादेश से बड़ा है कि उसकी सेना भी बांग्लादेश के मुकाबले कई गुना मजबूत है।

भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है, वहीं बांग्लादेश के पास ढंग के मिसाइल भी नहीं हैं। मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद से लगातार बांग्लादेश भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। वह कहीं चीन तो कहीं अमेरिका की गोद में बैठने को आतुर दिखाई देता है।

इसका सीधा अर्थ यह मालूम होता है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन भारत को नुकसान पहुँचाने के लिए किया गया है। ऐसा कुछ होने से रोकने के लिए अब कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। ऐसे में भारत बांग्लादेश के उन इलाकों का विलय करने की सोच सकता है, जो इसके लिए रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है।

इसलिए, अगर भारत बांग्लादेश के उन इलाकों पर जहाँ गैर-मुस्लिम या हिंदू आबादी बड़े रूप में मौजूद है पर कब्जा करता है इससे न केवल यूनुस और उनकी सरकार द्वारा खड़े किए गए खतरे का खात्मा हो जाएगा, बल्कि इससे सामरिक फायदा भी होगा। उदाहरण के लिए अगर भारत चटगाँव बंदरगाह कब्जा ले तो पूर्वोत्तर के राज्य जमीन से घिरे नहीं रहेंगे।

इससे उन देशों को भी सबक मिलेगा जो भारत से कई गुना छोटे होने के बाद और मदद लेने के बाद आँख दिखाते हैं। इससे एक फायदा बांग्लादेश के हिन्दुओं और वहाँ की जनजातियों को भी होगा जो वर्तमान प्रशासन में अत्याचार झेल रहे हैं।

इन समुदायों को बलात्कार, हत्या और लूटपाट की घटनाओं का सामना करना पड़ा है, उनके मंदिरों और पूजा स्थलों को नष्ट और अपवित्र किया गया है, जबकि राज्य ने केवल इन अत्याचारों को बढ़ावा दिया है। हिंदुओं की घटती संख्या बांग्लादेश में उनकी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का प्रमाण है।

फोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस

बांग्लादेश में रहने वाले हिन्दुओं को उनकी मातृभूमि वापस दिलाना भारत की जिम्मेदारी है। यह तब और जरूरी हो जाता है जब पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच रिश्ते गहरे हो रहे हैं। 1971 में अलगाव के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सीधा व्यापार शुरू हुआ है।

कराची के पोर्ट कासिम से सरकार द्वारा स्वीकृत पहला माल रवाना हुआ। फरवरी की शुरुआत में, बांग्लादेश ने ट्रेडिंग कॉरपोरेशन ऑफ पाकिस्तान (TCP) से 50,000 टन पाकिस्तानी चावल खरीदने पर सहमति जताई, जिससे सौदा अंतिम रूप ले लिया। बांग्लादेश लगातार भारत विरोधी बयान भी दे रहा है।

क्या है निष्कर्ष?

पाकिस्तान के जनरल AAK नियाज़ी ने बंगालियों की नस्ल बदलने की बात कही थी। उन्होंने कहा, “मैं इस ह*म*दी क़ौम की नस्ल बदल दूँगा। ये मुझे समझाते हैं।” मेजर जनरल (रिटायर्ड) ख़ादिम हुसैन राजा, पूर्वी पाकिस्तान में 14 डिवीज़न के जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग थे।

उन्होंने बताया है कि पाकिस्तानी अपने सैनिक बंगाली महिलाओं का रेप करने के लिए लगा देंगे। बंगाली अफसर इससे नाराज थे। इसके चलते एक बंगाली अफसर ने आत्महत्या तक कर ली। उन्होंने यह सारी बातें अपनी पुस्तक “ए स्ट्रेंजर इन माई ओन कंट्री: ईस्ट पाकिस्तान, 1969-1971” में लिखा है।

बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के बाद नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ भारत के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अब भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अपने अतीत से सबक लेकर अपने और अपने लोगों के हित में काम करे। अब हिन्दुओं को इस्लामी शासन से मुक्त करवाने का भी समय है।

बंगभूमि, बंग सेना द्वारा चलाया गया एक आंदोलन था जिसका उद्देश्य एक बांग्ला हिन्दू राष्ट्र बनाना था। 1973 में बांग्लादेश को अपनी स्वतंत्रता मिलने के तुरंत बाद भारत में इस संगठन की स्थापना की गई थी, ताकि देश से हिंदू शरणार्थियों की सहायता की जा सके, क्योंकि 1971 में बांग्लादेश में अत्याचारों के दौरान पाकिस्तानी सेना ने उन्हें निशाना बनाया था।

शायद अब समय आ गया है कि इस तरह की एक और पहल शुरू की जाए। इस बात में कोई शक नहीं है कि भारतीय सेना सिलीगुड़ी कॉरिडोर में किसी भी दुस्साहस को कुचल देगी। वह भारत को आने वाले कोई भी खतरे को खत्म कर देगी।

अगर बांग्लादेशऔर दुस्साहस दिखाता है तो नौसेना भी उसे भूखा मरने पर मजबूर कर सकती है। लकिन रंगपुर, राजशाही और खुलना के कुछ हिस्सों को लेकर, त्रिपुरा की सीमा पर स्थित चटगाँव को अपने देश में मिलाना एक स्थायी समाधान होगा। अब समय आ गया है कि चिकन नेक को हाथी की सूंड की तरह चौड़ा कर दिया जाएगा।

जॉर्ज सोरोस की संस्था से ₹25 करोड़, USAID से मिले ₹8 करोड़: बेंगलुरु की 3 कंपनियों की जाँच कर रही ED, जानिए केस की एक-एक डिटेल

अमेरिका की एजेंसी USAID और जॉर्ज सोरोस के बीच एक ऐसा कनेक्शन सामने आया है, जिसने भारत में हलचल मचा दी है। Enforcement Directorate (ED) की जाँच में पता चला कि बेंगलुरु की कंपनी ASAR Social Impact Advisors को सोरोस की फंडिंग के साथ-साथ USAID से भी पैसा मिला।

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ED पिछले कुछ समय से सोरोस के Soros Economic Development Fund (SEDF) से जुड़े मामले की जाँच कर रही थी, जिसमें बेंगलुरु की तीन कंपनियों – ASAR Social Impact Advisors, Rootbridge Services Pvt Ltd और Rootbridge Academy Ltd को 2021 से 2024 के बीच 25 करोड़ रुपये मिले। इसके साथ ही खुलासा हुआ है कि ASAR को 2022-23 में USAID से भी 8 करोड़ रुपये मिले।

ED को शक है कि फेमा (Foreign Exchange Management Act) का उल्लंघन हुआ है। ASAR ने सफाई दी कि USAID का पैसा दिल्ली के थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरोनमेंट एंड वॉटर (Council on Energy, Environment and Water (CEEW)) को दी गई सर्विसेज के लिए रीइंबर्समेंट था। सीईईडब्ल्यू का कहना है कि उनका काम हवा को साफ करने से जुड़ा था, जो अब खत्म हो चुका है। लेकिन एएसएआर (ASAR) के अधिकारी ये साफ नहीं बता पाए कि उन्होंने सीईईडब्ल्यू को क्या सर्विस दी और यूएसएआईडी इसमें कैसे शामिल हुआ। ये रहस्य अभी अनसुलझा है।

सीईईडब्ल्यू ने बयान जारी कर साफ किया, “हमारा जॉर्ज सोरोस या ओपन सोसायटी फाउंडेशन से कोई लिंक नहीं है। हमने कभी उनसे फंडिंग नहीं ली। ASAR को यूएसएआईडी के एक प्रोजेक्ट के लिए हायर किया था, जो अब खत्म हो गया। हमारा उससे अब कोई रिश्ता नहीं है।” सीईईडब्ल्यू (CEEW) ने ये भी कहा कि उनसे ईडी द्वारा कोई सवाल नहीं पूछा गया और वो अपने मिशन -भारत के सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए रिसर्च- पर फोकस्ड हैं। उनका कहना है कि उनका काम ट्रांसपेरेंट है और वो किसी भी जाँच में सहयोग करेंगे।

दूसरी तरफ, यूएसएआईडी (USAID) पर ट्रंप प्रशासन पहले ही ‘लेफ्ट, लिबरल और वोक’ एजेंडा फैलाने का आरोप लगा चुका है। अब ईडी ये जानना चाहती है कि यूएसएआईडी का पैसा भारत में किस मकसद से आया।

बता दें कि सोरोस की संस्था ओपन सोसायटी फाउंडेशन को 2016 में भारत के गृह मंत्रालय ने ‘Prior Reference Category’ में डाला था। इसका मतलब है कि इसे भारत में किसी भी नॉन-प्रॉफिट को फंड देने से पहले मंजूरी लेनी पड़ती है। ईडी अब ये जाँच रही है कि क्या ओएसएफ ने नियमों का पालन किया या नहीं। साथ ही सोरोस की फंडिंग सिविल राइट्स ग्रुप्स और थिंक टैंक्स तक कैसे पहुँची, ये भी जाँच का हिस्सा है।

रूटब्रिज सर्विसेज और रूटब्रिज एकेडमी को भी एसईडीएफ (SEDF) से पैसा मिला, जो ओपन सोसायटी फाउंडेशन का इनवेस्टमेंट आर्म है। ईडी के सूत्रों का कहना है कि इन फंड्स का मकसद और इस्तेमाल संदिग्ध है।

कहीं जलाई तो कहीं खंडित की प्रतिमाएँ, कहीं बच्चों समेत छिपा हिन्दू परिवार तो कहीं फूँक दिए खेत: बंगाल में मार्च में हिन्दुओं पर हमले के 8 बड़े मामले

हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ गई है, और हिंदू समुदाय पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। सत्तारूढ़ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार हिंदू पूजा स्थलों, दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को निशाना बनाकर की जाने वाली हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ को रोकने में विफल रही है। ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति और अपराधियों के खिलाफ पुलिस की ढिलाई व निष्क्रियता ने स्थिति को और खराब कर दिया है। अकेले मार्च 2025 में पश्चिम बंगाल में हिंदू समुदाय पर 8 हमले हुए।

नाओदा में हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों पर हमला (9 मार्च)

भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी दी थी कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा ब्लॉक के पटिकाबारी बाजार में हिंदू समुदाय की दुकानों और संपत्तियों पर हमला किया गया। अधिकारी ने ट्वीट किया, “कुछ घंटे पहले, बदमाशों ने मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा ब्लॉक के पटिकाबारी बाजार में हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों में तोड़फोड़ की और आग लगा दी।” उन्होंने पश्चिम बंगाल पुलिस और राज्य के मुख्य सचिव से तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। भाजपा नेता ने कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए सशस्त्र बलों की तैनाती की माँग की।

सुवेंदु अधिकारी ने स्थिति को शांत करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) की तैनाती की भी माँग की। उन्होंने कहा, “यदि आप स्थिति को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं हैं, तो कृपया माननीय बंगाल के राज्यपाल से BSF कर्मियों की तैनाती के लिए अनुरोध करें ताकि कानून और व्यवस्था की स्थिति बहाल हो सके।” भाजपा प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी हिंदुओं की दुकानों और संपत्तियों पर हमले का वीडियो साझा किया। उन्होंने ममता बनर्जी के समर्थकों पर तोड़फोड़ और आगजनी की साजिश रचने का आरोप लगाया।

बरुईपुर में देवी शीतला की मूर्ति में आग लगाई गई (7 मार्च )

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बरुईपुर शहर में शेख इंदु नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति ने देवी शीतला की मूर्ति को तोड़ दिया और उसमें आग लगा दी। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट में जली हुई मूर्तियों और क्षतिग्रस्त हिंदू मंदिर के दृश्य देखे जा सकते हैं।

स्थानीय लोगों ने आरोपित को पकड़ लिया, जो तोड़फोड़ और आगजनी में शामिल था। बरुईपुर पुलिस ने 7 मार्च को ट्वीट कर दावा किया कि आरोपित ‘मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं’ से ग्रस्त है और उसे हिरासत में ले लिया गया है। पुलिस ने बताया कि मामले की जाँच जारी है और आरोपी बाहरी व्यक्ति है।

बरुईपुर पुलिस द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट

बशीरहाट में काली मंदिर पर हमला (9 मार्च)

भाजपा नेता दिलीप घोष ने एक्स पर जानकारी दी कि पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट शहर के शंखचूरा बाजार में काली मंदिर पर हमला हुआ और हिंदू देवता की मूर्ति को तोड़ दिया गया। भाजपा नेता ने कहा कि मंदिर पर हमला स्थानीय टीएमसी नेता शाहनूर मंडल के नेतृत्व में हुआ।

पश्चिम बंगाल पुलिस ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि इस अपराध के पीछे कोई सांप्रदायिक पहलू नहीं है और आरोपित व्यक्ति मानसिक रूप से अस्थिर है।

बशीरहाट पुलिस जिले द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट

नंदीग्राम में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ी गईं (14 मार्च)

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमित मालवीय ने एक्स पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम ब्लॉक 2 के कमालपुर गाँव में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को अपवित्र अवस्था में देखा जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूजा और राम नारायण कीर्तन को कुछ लोगों ने बर्दाश्त नहीं किया और स्थल पर तोड़फोड़ की गई।

अमित मालवीय के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

एक वीडियो में एक व्यक्ति को यह कहते हुए सुना गया कि “पुलिस की प्रतिक्रिया मौन है, आप देख सकते हैं कि पुलिस कुछ नहीं कर रही है।” वीडियो में एक पुलिसकर्मी को घटना को रिकॉर्ड कर रहे व्यक्ति को धमकाते हुए भी देखा गया।

मालदा के मोथाबारी में हिंसा गुरुवार (27 मार्च 2025)

मालदा जिले के मोथाबारी गाँव में हिंसक भीड़ ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले व्यापारिक प्रतिष्ठानों और घरों को निशाना बनाया। एक हिंदू महिला ने बताया कि कैसे हिंदुओं के घरों को नष्ट कर दिया गया और लोग अपने बच्चों के साथ बिस्तरों के नीचे छिपने को मजबूर हुए।

एक पीड़िता ने कहा, “मुस्लिमों ने हिंदुओं के घर और दुकानें बर्बाद कर दीं और हमारा सामान लूट लिया। अब हम कैसे जिएँगे?” महिलाओं को अपनी धार्मिक पहचान छिपाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, और उन पर हिजाब जैसा सिर ढकने का दबाव डाला जा रहा है।

झाउबोना में हिंदुओं के स्वामित्व वाले पान के खेतों में आग लगाई गई शनिवार (29 मार्च 2025)

भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के झाउबोना में हिंदू समुदाय पर लक्षित हमलों के वीडियो साझा किए। उन्होंने कहा कि ‘जिहादी भीड़‘ ने हिंदुओं के स्वामित्व वाले पान के खेतों में आग लगा दी, दुकानों को लूट लिया और निर्दोष हिंदुओं पर हमले किए। उन्होंने ममता बनर्जी की तुष्टिकरण नीति को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया।

पूर्व मेदिनीपुर में पूजा पंडाल पर हमला शनिवार (29 मार्च 2025)

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के दक्षिण बरबरिया गाँव में ‘हिंसक मुस्लिम भीड़‘ ने माँ चंडी के पूजा पंडाल पर हमला किया और धारदार हथियारों से 10 हिंदू भक्तों को घायल कर दिया। घायलों को इलाज के लिए मुगबेरिया अस्पताल ले जाया गया।

दक्षिण दिनाजपुर में शीतला माता की मूर्ति तोड़ी गई रविवार (30 मार्च 2025)

भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी कि दक्षिण दिनाजपुर जिले के केशबपुर गाँव में श्री शीतला माता मंदिर में तोड़फोड़ की गई और देवी की मूर्ति को क्षतिग्रस्त किया गया। उन्होंने इस घटना की तत्काल जाँच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।

पश्चिम बंगाल में हालिया घटनाएँ कानून-व्यवस्था की चिंताजनक स्थिति को उजागर करती हैं। भाजपा नेताओं ने हिंसा और हमलों के लिए राज्य सरकार की नीति को जिम्मेदार ठहराया है और BSF की तैनाती की माँग की है। इन घटनाओं ने हिंदू समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया है।

(ये ख़बर ऑपइंडिया पर अंग्रेजी में भी उपलब्ध है, पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।)

वक्फ: साल 1185 से झेल रहा भारत, मोहम्मद गोरी ने की थी शुरुआत, फिर मोहम्मद जिन्ना ने दिया कानूनी शक्ल: 2 गाँवों से आज बन गया देश का सबसे बड़ा जमींदार

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले में 70 साल के किसान राजगोपाल अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी 1.2 एकड़ जमीन बेचने की तैयारी कर रहे थे। सपने संजोए हुए थे कि बेटी का हाथ पीले करके उसे विदा करेंगे। लेकिन जब वे सब-रजिस्ट्रार ऑफिस पहुँचे, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्हें 20 पन्नों का एक दस्तावेज थमाया गया, जिसमें लिखा था कि उनकी जमीन तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की है।

सिर्फ उनकी जमीन ही नहीं, बल्कि उनका पूरा गाँव तिरुचेन्थुरई, जहाँ 1500 साल पुराना सुंदरेश्वरार मंदिर भी है, सभी को वक्फ की संपत्ति बता दिया गया। गाँव वाले हैरान थे, गुस्से में थे और डरे हुए भी। यह खबर जंगल की आग की तरह फैली और पूरे देश में वक्फ कानून पर बहस छिड़ गई।

यह कोई अकेला मामला नहीं था। आसपास के 18 और गाँवों को भी वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया गया। लोग सवाल उठाने लगे कि आखिर यह वक्फ बोर्ड है क्या, जिसके पास आज 9.4 लाख एकड़ जमीन है? यह करीब 3,804 वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जो भारतीय रेलवे और भारतीय सेना के बाद देश का सबसे बड़ा जमींदार माना जाता है।

इसकी शुरुआत 12वीं सदी में दो गाँवों के दान से हुई थी, और आज यह एक विशाल साम्राज्य बन चुका है। केंद्र सरकार अब वक्फ संशोधन विधेयक ला रही है। ऐसे में चलते हैं वक्फ की जड़ों तक, और समझते हैं कि वक्फ क्या है, भारत में कैसे आया और आज क्यों विवादों में है।

वक्फ का मतलब क्या है?

वक्फ अरबी शब्द ‘वकुफा’ से आया है, जिसका मतलब है ठहरना या रोकना। इस्लाम में वक्फ का अर्थ है ऐसी संपत्ति जो जन-कल्याण के लिए दान की जाए। इसे एक तरह का स्थायी दान कह सकते हैं, जिसे न बेचा जा सकता है, न उपहार में दिया जा सकता है, और न ही विरासत में हस्तांतरित किया जा सकता है। जो इसे दान करता है, उसे ‘वाकिफ’ कहते हैं

वाकिफ यह भी तय कर सकता है कि उसकी संपत्ति या उससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल किस काम के लिए होगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई कहे कि उसकी जमीन से होने वाली कमाई सिर्फ अनाथ बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो, तो ऐसा ही होगा।

इस्लाम में वक्फ की शुरुआत पैगंबर मोहम्मद के समय से मानी जाती है। एक कहानी है कि खलीफा उमर ने खैबर में एक जमीन हासिल की और पैगंबर से पूछा कि इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल क्या हो सकता है। पैगंबर ने कहा, “इसे रोक लो, बाँध लो, और इससे होने वाला फायदा लोगों की जरूरतों पर खर्च करो।” इसी तरह, मदीना में 600 खजूर के पेड़ों का एक बाग वक्फ किया गया था, जिसकी कमाई से गरीबों की मदद होती थी। यह वक्फ के सबसे पुराने उदाहरणों में से एक है।

भारत में वक्फ की शुरुआत

भारत में वक्फ की कहानी इस्लाम के साथ शुरू होती है। इस्लामिक परंपरा के महत्वपूर्ण हिस्से वक्फ की भारत में सैकड़ों सालों से मौजूदगी है। इसका मतलब है ऐसी संपत्ति को जन-कल्याण के लिए दान करना, जिसे न बेचा जा सके, न उपहार में दिया जा सके, और न ही किसी को विरासत में हस्तांतरित किया जा सके।

भारत में इसकी शुरुआत इस्लाम के आगमन से मानी जाती है, जो 7वीं सदी में अरब व्यापारियों के साथ शुरू हुई। लेकिन इसे शासकीय स्तर पर लागू करने की कहानी 12वीं सदी से शुरू होती है, जब मोहम्मद गोरी ने पहला कदम उठाया। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, मुगल शासकों, ब्रिटिश काल और 20वीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से जुड़े मुस्लिम वक्फ एक्ट तक यह परंपरा विकसित होती रही। आइए, इसकी पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।

मोहम्मद गोरी और वक्फ की शुरुआत

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय अक्सर अफगानी आक्रमणकारी और लुटेरे शासक मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया और 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली और उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा किया। गोरी का मकसद सिर्फ सत्ता हासिल करना नहीं था, बल्कि इस्लामी संस्थानों को मजबूत करना भी था।

इतिहासकार विपुल सिंह की किताब इंटरप्रेटिंग मेडिवल इंडिया और अयनुल मुल्क मुल्तानी की फारसी किताब इन्शा-ए-महरु के अनुसार, गोरी ने 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया, जो उस समय एक प्रमुख मजहबी नेता की उपाधि थी। यह भारत में वक्फ का पहला दर्ज उदाहरण माना जाता है।

विपुल सिंह की किताब का कवर (फोटो साभार: Amazon)

गोरी का यह कदम धार्मिक और सामुदायिक कल्याण के लिए था, ताकि मस्जिद की देखभाल और मुसलमानों की शिक्षा के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। हालाँकि, कुछ वामपंथी इतिहासकार जैसे प्रोफेसर इरफान हबीब मानते हैं कि वक्फ की अवधारणा इससे पहले भी व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद थी, लेकिन गोरी ने इसे शासकीय पहचान दी। इन दो गाँवों से शुरू हुई यह परंपरा आगे चलकर लाखों एकड़ तक फैल गई। गोरी की मृत्यु 1206 में हुई, लेकिन उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया।

कुतुबुद्दीन ऐबक और दिल्ली सल्तनत की नींव

मोहम्मद गोरी का गुलाम और सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक साल 1206 में दिल्ली सल्तनत का पहला सुल्तान बना। उसने 1206 से 1210 तक शासन किया और भारत में इस्लामी शासन की नींव रखी। ऐबक के दौर में वक्फ को औपचारिक रूप से लागू करने का कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं मिलता, लेकिन उसने इस्लामिक परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए, जो वक्फ के विकास में मददगार साबित हुए।

ऐबक ने दिल्ली में कुतुब मीनार और कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद की नींव रखी। ये मजहबी स्थल बाद में वक्फ संपत्तियों का हिस्सा बने। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी की किताब तारीख-ए-फिरोज शाही के मुताबिक, उस दौर में शासक अक्सर मस्जिदों और मदरसों के लिए जमीनें दान करते थे। ऐबक का शासन छोटा था, लेकिन उसने इस्लामी कानूनों को लागू करने की शुरुआत की, जिसने वक्फ को मजबूत करने का रास्ता खोला। उसकी मृत्यु के बाद उसका दामाद इल्तुतमिश सत्ता में आया, जिसने वक्फ को और व्यवस्थित किया।

इल्तुतमिश और वक्फ का संगठन

दिल्ली सल्तनत का तीसरा सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश 1211 से 1236 तक शासक रहा। उसे भारत में इस्लामी शासन को मजबूत करने वाला पहला शासक माना जाता है। इल्तुतमिश ने न सिर्फ सल्तनत को संगठित किया, बल्कि इस्लामी कानूनों और परंपराओं को व्यवस्थित करने में भी अहम भूमिका निभाई। वक्फ इसकी एक बड़ी मिसाल है।

इल्तुतमिश के शासन में मस्जिदों, मदरसों और अन्य मजहबी कार्यों के लिए संपत्तियाँ दान करने की प्रथा बढ़ी। बदायूँ में शम्सी मस्जिद, जिसका निर्माण उसके शासनकाल में हुआ, एक वक्फ संपत्ति का उदाहरण है।

इतिहासकार विपुल सिंह लिखते हैं कि इल्तुतमिश ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर कमेटियाँ बनाईं, जिन्हें मुतवल्ली कहा जाता था। ये कमेटियाँ संपत्ति की देखभाल और उससे होने वाली आय को जन-कल्याण में लगाने का काम करती थीं। इल्तुतमिश के दौर में ज्यादातर संपत्ति शासकों के पास होती थी, इसलिए वे ही वाकिफ (दानदाता) बनते थे।

उसकी बनाई मस्जिदें और मदरसे वक्फ के तहत संरक्षित किए गए। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी के मुताबिक, बदायूँ में मिरान मुलहिम की कब्र और बिलग्राम में ख्वाजा मजद अल-दीन का मकबरा भी इल्तुतमिश के समय की वक्फ संपत्तियों के उदाहरण हैं। इल्तुतमिश ने वक्फ को एक संस्थागत रूप दिया, जो बाद के शासकों के लिए आधार बना।

16वीं-17वीं सदी मुगल काल में वक्फ का विस्तार

मुगल काल में वक्फ ने नया आयाम लिया। बाबर (1526-1530) ने 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। उसके बाद हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे शासकों ने वक्फ को और संगठित किया।

बाबर और हुमायूँ: बाबर ने अपने छोटे शासन में वक्फ को बढ़ावा दिया। उसने दिल्ली में मस्जिदें बनवाईं, जो बाद में वक्फ संपत्ति बनीं। हुमायूँ का शासन अस्थिर रहा, लेकिन उसने भी इस काम को जारी रखा।

अकबर (1556-1605): अकबर ने वक्फ को व्यापक रूप दिया। उसने लखनऊ में फरांगी महल को वक्फ किया, जो एक बड़ा इस्लामिक शिक्षण केंद्र बना। अकबर ने मजहबी कार्यों के लिए जमीनें दान कीं और वक्फ के प्रबंधन को मजबूत करने के लिए नियम बनाए।

शाहजहाँ (1628-1658): शाहजहाँ ने ताजमहल के रखरखाव के लिए 30 गाँव और एक परगना वक्फ में दिया। विद्वान अमीर अफाक अहमद फैजी लिखते हैं कि यह मुगल काल में वक्फ का सबसे बड़ा उदाहरण था। शाहजहाँ ने दिल्ली में जामा मस्जिद भी बनवाई, जो वक्फ संपत्ति का हिस्सा बनी।

औरंगजेब (1658-1707): औरंगजेब ने भी वक्फ को बढ़ावा दिया, लेकिन उसका फोकस मजहबी कार्यों पर ज्यादा था। उसने कई मस्जिदों और कब्रिस्तानों के लिए जमीनें दान की।

मुगल काल में वक्फ संपत्तियों की संख्या तेजी से बढ़ी। शासकों के अलावा आम लोग भी अपनी जमीनें दान करने लगे। ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम समुदाय के फैलने और धर्म परिवर्तन के साथ वक्फ का दायरा बढ़ता गया।

ब्रिटिश काल में वक्फ का औपचारिक ढाँचा

ब्रिटिश शासन में वक्फ को कानूनी और संगठित रूप मिला। उससे पहले यह व्यक्तिगत और समुदाय स्तर पर चलता था। प्रोफेसर इरफान हबीब बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने वक्फ को नियंत्रित करने की कोशिश की, ताकि उसकी संपत्तियों का प्रबंधन व्यवस्थित हो सके।

साल 1913 में वक्फ बोर्ड की शुरुआत: 1913 में ब्रिटिश सरकार ने मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट (Mussalman Waqf Validating Act, 1913) पारित किया। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों की निगरानी करना और उनके दुरुपयोग को रोकना था। यह पहला मौका था जब वक्फ को सरकारी स्तर पर मान्यता मिली।

साल 1923 का वक्फ एक्ट: 5 अगस्त 1923 को मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 लाया गया, जिसने वक्फ को कानूनी आधार दिया। इस एक्ट के तहत वक्फ संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन और प्रबंधन शुरू हुआ। बोर्ड बनाए गए, जिनमें समुदाय के लोग और सरकार के प्रतिनिधि शामिल थे।

हबीब कहते हैं, “ब्रिटिश काल में जमींदार और नवाब अपनी अतिरिक्त संपत्तियाँ दान कर दिया करते थे। यह प्रथा पहले से थी, लेकिन इसे संगठित करने की कोशिश ब्रिटिश सरकार ने की।” इस दौर में वक्फ की संपत्तियाँ मस्जिदों, कब्रिस्तानों और मदरसों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसमें नकदी और इमारतें भी शामिल हुईं।

क्या था जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट?

केंद्र सरकार वक्फ संशोधन बिल लोकसभा में लाई। इसे लेकर सरकार और विपक्ष में जमकर रस्साकसी चली। इसी बीच बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने मोहम्मद अली जिन्ना का जिक्र छेड़ दिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “1911 में जिन्ना मुस्लिम वक्फ एक्ट लेकर आए थे, और 1954 तक इसे ‘जिन्ना लॉ’ के नाम से जाना जाता था। हिंदुओं और मुसलमानों के अलग-अलग कानूनों ने इस देश में विभाजन को जन्म दिया।” तो आखिर क्या है ये जिन्ना का मुस्लिम वक्फ एक्ट? ये भी समझ लेते हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना 20वीं सदी की शुरुआत में कॉन्ग्रेस का नेता था। वो एक बड़ा वकील था और उस समय तक उसका इस्लामी कट्टरता वाला चेहरा सामने नहीं आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1911-1913 के दौरान जिन्ना ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के तहत इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में एक महत्वपूर्ण कानून को पेश करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट, 1913 कहा जाता है। यह एक्ट वक्फ संपत्तियों से संबंधित कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए बनाया गया था।

1913 का एक्ट क्यों बना?

19वीं सदी के अंत में ब्रिटिश अदालतों और प्रिवी काउंसिल ने कई फैसले दिए, जिनमें वक्फ की वैधता पर सवाल उठे। खास तौर पर, 1894 के अब्दुल फतह बनाम सईदन मामले में प्रिवी काउंसिल ने फैसला दिया कि अगर कोई वक्फ अपने परिवार के लाभ (वक्फ-अलाल-औलाद) के लिए बनाया गया है, तो वह इस्लामी कानून के तहत वैध नहीं होगा। इस फैसले ने भारत में मुस्लिम समुदाय में चिंता पैदा की, क्योंकि पारिवारिक वक्फ उनकी परंपरा का हिस्सा थे।

इस समस्या को हल करने के लिए मुस्लिम नेताओं ने ब्रिटिश सरकार से एक नया कानून बनाने की माँग की। जिन्ना तब इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य था। उसने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया। 7 मार्च 1911 को यह बिल पेश किया गया, जिसे बाद में संशोधनों के साथ 1913 में पारित किया गया। यह कानून 7 मार्च 1913 को लागू हुआ। इसका मकसद था कि पारिवारिक वक्फ को कानूनी मान्यता मिले और प्रिवी काउंसिल के फैसले से सामने आया असमंजस खत्म हो।

क्या सच में कहते हैं इसे जिन्ना लॉ?

निशिकांत दुबे का दावा है कि 1954 तक इसे जिन्ना लॉ कहा जाता था, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों में कहीं भी इसका जिक्र नहीं मिलता। चूँकि यह जिन्ना के प्रयासों से आया था, इसलिए इसे जिन्ना लॉ के रूप में जोड़ा जाता है। लेकिन आधिकारिक तौर पर इसका नाम हमेशा मुसलमान वक्फ वैलिडेटिंग एक्ट- 1913 ही रहा।

साल 1923 में मुसलमान वक्फ एक्ट 1923 पारित हुआ, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा था। आजादी के बाद भारत सरकार ने वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए 1954 में एक नया वक्फ एक्ट बनाया। इसके बाद 1995 और 2013 में इसमें संशोधन हुए और अब 2025 में वक्फ संशोधन बिल पेश किया जा रहा है।

सातवीं शताब्दी में इस्लाम के साथ दक्षिण भारत में आ गया था वक्फ

वक्फ की कहानी सिर्फ शासकों तक सीमित नहीं है। 7वीं सदी में अरब व्यापारियों ने दक्षिण भारत में इस्लाम के साथ वक्फ की परंपरा लाई। मालाबार क्षेत्र में मस्जिदें और कब्रिस्तान इसके शुरुआती उदाहरण हैं।

इतिहासकार सतीश चंद्रा की किताब मेडिवल इंडिया के मुताबिक, दक्कन के बहमनी सल्तनत और विजयनगर साम्राज्य के बीच संपर्क में भी वक्फ का जिक्र मिलता है। स्वतंत्रता के बाद 1954 में वक्फ एक्ट आया, जिसे 1995 और 2013 में संशोधित किया गया। आज वक्फ बोर्ड के पास 9.4 लाख एकड़ जमीन है, जो इसे देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बनाती है।

सतीश चंद्रा की किताब का कवर पेज (फोटो साभार: Amazon)

वक्फ के विस्तार के साथ ही बढ़े विवाद

दो गाँवों से शुरू हुआ वक्फ आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। इसमें 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ शामिल हैं। मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान और इमामबाड़े इसके बड़े हिस्से हैं।

वामपंथी इतिहासकास इरफान हबीब की चिंता है, “जिस संपत्ति का कोई मालिक नहीं होता, उसके सब मालिक बन जाते हैं। वक्फ के साथ भी यही हुआ। कई जगह इसका दुरुपयोग हुआ।” वे कहते हैं कि लोग संशोधन बिल पर शक करते हैं कि सरकार इसके जरिए जमीनों पर कब्जा करना चाहती है। हबीब कहते हैं, “वक्फ समाज के लिए बना था। इसे उसी भावना से चलाना चाहिए।”

मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली कहते हैं, “वक्फ में कोई गैर-कानूनी कब्जा नहीं होता। यह आरोप बेबुनियाद हैं। मुसलमानों ने अपनी जमीनें दान की हैं।” मौलाना खालिद कहते हैं, “वक्फ इस्लाम में नमाज और हज जितना अहम है। यह 1400 साल से चली आ रही परंपरा है।” लेकिन वे मानते हैं कि इसमें नीयत बदल गई है।

आज वक्फ बोर्ड की ताकत और उससे जुड़े विवाद सरकार के लिए चुनौती हैं। यह संशोधन कितना कारगर होगा, यह वक्त बताएगा। लेकिन राजगोपाल जैसे लोगों का दर्द और सवाल अभी अनसुने हैं।