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पादरी ने प्रेगनेंट करके करवाया गर्भपात, इंफेक्शन से हो गई लड़की की मौत मौत: पंजाब में बजिंदर सिंह के बाद पास्टर जशन गिल पर रेप का इल्जाम, पिता को 2 साल बाद भी न्याय का इंतजार

पादरी बजिंदर सिंह के बाद पंजाब के एक और पादरी जशन गिल पर 22 साल की एक लड़की से बलात्कार का आरोप लगा है। पादरी गिल पंजाब के गुरदासपुर का रहने वाला है। मृतक पीड़िता के पिता ने बताया है कि कैसे पादरी ने बहला फुसलाकर उनकी बेटी के साथ रेप किया और उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। लड़की की संक्रमण के कारण इलाज के दौरान मौत हो गई। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब कुछ दिन पहले ही मोहाली कोर्ट ने स्वयंभू पादरी बजिंदर सिंह को एक महिला से बलात्कार के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

बजिंदर सिंह के बाद पंजाब के एक और पादरी पर लगा रेप का आरोप

पीड़िता के पिता ने ANI को बताया कि कैसे पादरी ने उनकी बेटी को गुमराह किया और 2023 में उसके साथ बलात्कार किया। पिता के मुताबिक वे अपने परिवार के साथ गुरदासपुर जिले के अबुल खैर गाँव के एक चर्च में जाया करते थे। जशन गिल नाम का पादरी उस चर्च में ही था। उसने उनकी बेटी को गुमराह किया और बहला-फुसला कर बलात्कार किया। उस वक्त उनकी बेटी 22 साल की थी और बीसीए की छात्रा थी। पादरी ने बेटी के साथ कई बार रेप किया जिससे वो गर्भवती हो गई। पादरी को जब पता चला तो उसने खोखर गाँव में कुलवंत कौर नाम की एक नर्स से उसका गर्भपात करवा दिया।

‘पादरी की करतूत से हुई बेटी की मौत’

बेटी का गर्भपात नर्स ने लापरवाही से किया था, जिसके कारण बेटी को संक्रमण हो गया। बेटी ने पेट दर्द की शिकायत की जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान पेट में संक्रमण की जानकारी मिली और बाद में अल्ट्रासाउंड के बाद परिजनों को पता चला कि उनकी बेटी गर्भवती थी जिसका गर्भपात कराया गया है। बेटी को गंभीर हालत में अमृतसर ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

‘पादरी खुला घूम रहा, पुलिस पैसे खा रही है’

पिता के मुताबिक गुरदासपुर पुलिस ने पादरी जशन गिल की सच्चाई उजागर होने के बाद भी गिरफ्तार नहीं किया। वह खुलेआम घूमता रहा और पुलिस उससे पैसे लेती रही। यह घटना 2023 में हुई थी लेकिन सालों बाद भी पादरी का बाल भी बांका नहीं हुआ। हालात ये हो गए कि परिवार को मारने की धमकियाँ मिलने लगी जिसके बाद परिवार को अपना गाव छोड़कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

परिवार अब हर हाल में अपनी बेटी के लिए न्याय चाहता है। पंजाब पुलिस पर परिवार को विश्वास नहीं है इसलिए गुनहगार पादरी को सजा दिलवाने के लिए घटना की सीबीआई जाँच की माँग कर रहा है। इसके लिए परिवार ने पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है। जानकारों के मुताबिक पादरी पर 2023 में केस दर्ज किया गया था लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई। वो फरार है और पुलिस की कई टीमें उसे लगाई गई हैं लेकिन दो साल से उसका सुराग नहीं मिल पाया है। पादरी के संपर्क काफी ऊपर तक बताए जा रहे हैं।

‘डॉक्टर’ बन खालिद खान हिन्दू नाबालिग लड़की के पीछे पड़ा, इलाज के बहाने रखवाने लगा रोजा: शरीर पीला पड़ने पर बच्ची ने मुँह खोला, आरोपित पुलिस की गिरफ्त में

जबलपुर में एक होम्योपैथिक डॉक्टर खालिद खान को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उसपर आरोप लगा है कि उसने एक नाबालिग हिन्दू लड़की को इस्लाम कबूल करने के लिए उकसाया। इसके बाद लड़की का व्यवहार बदल गया जिसे देख घरवाले काफी परेशान हो गए। लड़की घरवालों से बात कम करती थी और हिन्दू रीति रिवाजों में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया था। लड़की की धार्मिक सोच में बदलाव के बाद इसका खुलासा हुआ।

हिन्दू लड़की को खालिद ने झांसे में लिया

बताया जा रहा है कि लड़की अगस्त 2024 में बीमार पड़ गई थी और उसके परिजन लड़की को होम्योपैथिक डॉक्टर खालिद खान के क्लिनिक पर ले गए थे। उसका क्लिनिक क्रेशर बस्ती इलाके में है। नाबालिग लड़की से सेहत की जानकारी लेते वक्त खालिद ने उससे उसका मोबाइल नंबर पूछ लिया। वो लगातार लड़की को फोन करने लगा। खालिद लड़की पर इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मानसिक तौर पर दबाव डालने लगा। लड़की उसके झाँसे में आ गई और रमजान में रोजा रखने लगी।

जब लड़की के घरवालों ने देखा कि लड़की काफी कमजोर होती जा रही है और उसका शरीर पीला पड़ रहा है तब लड़की माँ ने उससे बात की। लड़की ने इस दौरान सारी बातें बता दी। उसने कहा कि खालिद खान के कहने पर उसने रोजा रखा है। इस मामले में तिलवारा पुलिस ने आरोपित खालिद खान के खिलाफ शिकायत दर्ज किया और उसे गिरफ्तार कर लिया। तिलवारा थाने के प्रभारी ब्रजेश मिश्रा के मुताबिक आरोपित के खिलाफ लड़की को गुमराह करने, धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने के लिए कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

इस मामले में बजरंग दल समेत कई हिन्दू संगठन घटना के विरोध में सड़कों पर उतर आए और 4 अप्रैल की शाम को प्रदर्शन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग जुटे और जमकर नारेबाजी की। इन लोगों ने आरोपित खालिद खान के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि खालिद खान ने अब तक कितनी मासूम बच्चियों को अपने झाँसे में लिया है पुलिस इसका खुलासा करे। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

वक्फ बिल पास होते ही केरल के 50 ईसाई BJP में हुए शामिल, PM मोदी से मिल आभार प्रकट करने की जताई इच्छा: मुनम्बम में इनकी 404 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड ने ठोका है दावा

लोकसभा के बाद राज्यसभा में वक्फ संशोधन बिल पास होने के बाद केरल के 50 ईसाई भाजपा में शामिल हो गए। ये सभी लोग केरल के मुनंबम के रहने वाले हैं। लगभग 404 एकड़ में फैला मुनंबम वही इलाका है, जिस पर वक्फ बोर्ड अपना दावा करता है। इस दावे की वजह से यहाँ रहने वाले 600 से अधिक ईसाई और हिंदू परिवारों पर ग्रहण लग गया है। वक्फ बिल पास होने से इन लोगों में खुशी है।

वक्फ (संशोधन) विधेयक पारित होने के बाद भाजपा की केरल इकाई के नेताओं ने मुनंबम का दौरा किया। वहाँ के लोगों ने भाजपा नेताओं का जोरदार स्वागत किया और 50 लोग पार्टी में शामिल हो गए। केरल के इस तटीय गाँव के लोग वक्फ बोर्ड के दावों के खिलाफ पिछले 174 दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने वहाँ पहुँचकर प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की।

चंद्रशेखर ने उनसे कहा, “यह राज्य के राजनीतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दिन है। इस आंदोलन ने प्रधानमंत्री और संसद को वक्फ संशोधन विधेयक पारित करने की ताकत दी है। जब तक आपको जमीन पर राजस्व अधिकार वापस नहीं मिल जाते, हम आपके साथ हैं। मुनंबम के लोगों को उनके सांसदों और विधायकों ने धोखा दिया है, लेकिन उनकी आवाज संसद तक आखिरकार पहुँची।”

इसके बाद 50 लोग भाजपा में शामिल हो गए। मुनंबम प्रदर्शनकारियों की कार्यसमिति के संयोजक जोसेफ बेनी ने बताया कि भाजपा में शामिल होने वाले सभी 50 लोग ईसाई हैं। वे पहले कॉन्ग्रेस और सीपीआई (एम) को वोट देते थे। ईसाई बहुल मुनंबम के लोगों को उम्मीद है कि वक्फ (संशोधन) विधेयक के पारित होने से वक्फ बोर्ड द्वारा उनकी भूमि पर किए दावों का समाधान निकालने में मदद मिलेगी।

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने चंद्रशेखर से पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की व्यवस्था करने का अनुरोध किया, ताकि वे उनका आभार व्यक्त कर सकें। इस पर चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री कार्यालय से बात करने का आश्वासन दिया है। आभार प्रकट करने के लिए मुनंबम विरोध समिति ने चंद्रशेखर को ‘ईसा मसीह के अंतिम भोज’ की एक तस्वीर भेंट की। वहीं, फादर एंटनी जेवियर ने मिठाई बाँटी।

इस बीच, कैथोलिक चर्च से जुड़े मलयालम दैनिक दीपिका ने कहा कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी संघ परिवार को लेकर अल्पसंख्यकों में भय पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल, कैथोलिक चर्च ने कॉन्ग्रेस और वामपंथी से आग्रह किया था कि वे अपने सांसदों को वक्फ कानून में जनविरोधी धाराओं को हटाने के लिए लाए गए वक्फ संशोधन बिल के पक्ष में मतदान करने के लिए कहें।

हालाँकि, दोनों दलों ने चर्च की इस माँग को खारिज कर दिया था। कैथोलिक चर्च मुनंबम के लोगों के साथ खड़ा है। वहीं, ईसाई समुदाय के लोग वक्फ पारित होने के लिए चर्चों में प्रार्थना करते रहे। दरअसल, अधिकांश ईसाई परिवार वाले मुनंबम के लोगों का कहना है कि वे इस जगह पर पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं। इसके बावजूद वक्फ बोर्ड ने इस गाँव पर अपना दावा ठोका है।

क्या है मामला?

केरल वक्फ बोर्ड ने साल 2019 में दावा किया कि मुनम्बम, चेराई और पल्लिकाल द्वीप के इलाके वक्फ संपत्ति है। वक्फ बोर्ड का कहना है कि यह जमीन साल 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि यहाँ रहने वाले लोगों का दावा है कि उन्होंने इस जमीन को कानूनी रूप से दशकों पहले खरीदा था। उनकी पीढ़ियाँ यहाँ रहते आ रही हैं। इन लोगों के पास 1989 से जमीन के वैध कागजात हैं।

इन परिवारों का कहना है कि उन्होंने वैध तरीके से अपनी जमीन खरीदी है। अब वक्फ बोर्ड द्वारा किए गए दावे के बाद उन्हें इस जमीन को जबरन खाली करने के आदेश दिए जा रहे हैं। बता दें कि समुद्र तट पर बसा यह इलाका न केवल केरल के 600 से अधिक परिवारों का घर है, बल्कि यहाँ विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। इसके बावजूद, वक्फ बोर्ड ने इस इलाके पर अपना दावा ठोक दिया।

केरल के एर्नाकुलम जिले में कोच्चि से लगभग 38 किलोमीटर दूर अरब सागर के किनारे मुनम्बम स्थित है। यहाँ 610 परिवारों रहते हैं, जिनमें 510 कैथोलिक ईसाई और 100 हिंदू परिवार हैं। इन लोगों कहना है कि इन लोगों ने फारूख कॉलेज के मैनेजमेंट से यह जमीन खरीदी थी। इसको लेकर वे पिछले 60 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं, साल 2019 में वक्फ ने इसे अपनी संपत्ति घोषित कर दी।

साल 1902 तक जाती है विवाद की जड़

दरअसल, 1341 ईस्वी में केरल में भयानक बाढ़ आई। इस दौरान वाइपिन आईलैंड के ऊतरी हिस्से पर मुनम्बम बना। साल 1503 में पुर्तगालियों ने यहाँ हमला किया और 1663 में डचों ने इस पर कब्जा कर लिया। यह डचों के अधिकार में लंबे समय तक रहा। इसके बाद 1789 ईस्वी में डचों ने मुनम्बम को त्रावणकोर के महाराजा को बेच दिया। इसके बाद विवाद की शुरुआत होती है।

साल 1902 में त्रावणकोर के महाराजा ने गुजरात से आए एक किसान अब्दुल सत्तार मूसा हाजी सैत को यहाँ की 404 एकड़ जमीन और 60 एकड़ जल क्षेत्र पट्टे पर दिया था। उस समय, यह जमीन मछुआरों के लिए अलग रखी गई थी, जो वहाँ कई वर्षों से रह रहे थे। 1948 में सेठ के उत्तराधिकारी एवं दामाद सिद्दीक सैत ने यह जमीन अपने नाम पर पंजीकृत करवा ली।

इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा समुद्री कटाव के कारण खो गया और साल 1934 की भारी बारिश ने पांडरा समुद्र किनारे की जमीन को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। हालाँकि, सिद्दीक सैत द्वारा पंजीकृत जमीन में मछुआरों के रहने वाले इलाके भी शामिल हो गए। साल 1950 में सिद्दीक सैत ने यह जमीन फरूख कॉलेज को उपहार में दे दी, जो मुस्लिमों को शिक्षित करने के लिए 1948 में बनाया गया था।

इसके साथ ही सिद्दीकी सैत ने शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि कॉलेज केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही इसका उपयोग करेगा। अगर कभी कॉलेज बंद हो जाता है तो जमीन वापस सिद्दीकी सैत के वंशजों को लौटा दी जाएगी। हालाँकि, दस्तावेजों में गलती से या जानबूझकर ‘वक्फ’ शब्द लिख दिया गया, जिससे अब यह विवाद खड़ा हो गया है। कहा जाता है कि 1 नवंबर 1950 को कोच्चि के एडापल्ली में उप-पंजीयक कार्यालय में एक वक्फ पंजीकृत किया गया था। इसमें सैत ने फारूक कॉलेज के अध्यक्ष के पक्ष में पंजीकृत कराया था।

विवाद की शुरुआत और आयोग का गठन

फारूख कॉलेज के प्रबंधन को करीब एक दशक बाद जमीन का मालिकाना हक मिल गया। साल 1960 के दशक के आखिर में जमीन पर कब्जा करने वालों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। कॉलेज प्रबंधन यहाँ रहने वाले लोगों को बेदखल करना चाहता था। कैथोलिक ईसाई और दलित हिंदू समुदाय के ये लोग पीढ़ियों से वहाँ रह रहे थे, लेकिन उनके पास स्वामित्व साबित करने के लिए कानूनी दस्तावेज नहीं थे।

आखिरकार, अदालत के बाहर समझौते में कॉलेज प्रबंधन ने बाजार दर पर जमीन को अपने कब्जेदारों को बेचने का फैसला किया। दस्तावेजों से पता चलता है कि बिक्री के कामों में कॉलेज प्रबंधन ने यह उल्लेख नहीं किया कि विचाराधीन भूमि वक्फ संपत्ति थी, जिसे शिक्षा के उद्देश्य से कॉलेज प्रबंधन समिति के अध्यक्ष को दिया गया था। इसके बजाय उन्होंने कहा कि यह संपत्ति 1950 में गिफ्ट डीड में मिली थी।

निसार आयोग और नया विवाद: केरल राज्य वक्फ बोर्ड के खिलाफ कई शिकायतों मिलने के बाद वीएस अच्युतानंदन के नेतृत्व वाली सीपीआई (एम) सरकार ने 2008 में एक आयोग गठित किया। यह आयोग सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश एमए निसार के नेतृत्व में नियुक्त किया गया। आयोग का काम बोर्ड द्वारा परिसंपत्तियों के नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय करना था।

इसके अलावा, अयोग को इन परिसंपत्तियों की वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश करना भी शामिल था। आयोग ने साल 2009 में अपनी रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट में आयोग ने मुनंबम में जमीन को वक्फ संपत्ति माना और कहा कि कॉलेज प्रबंधन ने बोर्ड की सहमति के बिना इसकी बिक्री को मंजूरी दे दी थी। इसने इसकी वसूली के लिए कार्रवाई की सिफारिश की थी।

वक्फ बोर्ड ने घोषित कर दी वक्फ संपत्ति: इसके बाद साल 2019 में वक्फ बोर्ड ने खुद ही मुनंबम भूमि को वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 40 और 41 के अनुसार वक्फ संपत्ति घोषित कर दी। बोर्ड ने राजस्व विभाग को निर्देश दिया कि वह भूमि के वर्तमान कब्जेदारों (जो कई वर्षों से कर का भुगतान कर रहे थे) से भूमि कर स्वीकार ना करे।

राजस्व विभाग को दिए गए इस निर्देश को राज्य सरकार ने साल 2022 में खारिज कर दिया। इसके बाद बोर्ड ने राज्य सरकार के फैसले को केरल हाई कोर्ट में उसी साल चुनौती दी। न्यायालय ने फिलहाल राज्य सरकार के फैसलों पर रोक लगा दी है। वर्तमान में, इस विवाद को लेकर भूमि के कब्जेदारों के साथ-साथ वक्फ संरक्षण समिति की ओर से एक दर्जन से अधिक अपीलें न्यायालय में लंबित हैं।

राहुल गाँधी ने तैश में आकर किया था वीर सावरकर का अपमान, अब केस में बुरा फँसे: इलाहाबाद HC ने राहत देने से किया मना, ट्रायल कोर्ट ने भी कहा था- दुश्मनी फैलाने वाला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) को विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले राहुल गाँधी को राहत देने से इनकार कर दिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने साल 2022 में भारत जोड़ो यात्रा रैली के दौरान यह टिप्पणी की थी। इस मामले में सत्र न्यायालय ने उन्हें तलब किया था। इस आदेश को हाई कोर्ट ने रद्द करने से इनकार कर दिया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने राहुल गाँधी की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि राहुल गाँधी के पास दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 397 (निचली अदालत के रिकॉर्ड की समीक्षा) के तहत सत्र न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर करने का विकल्प है। पिछले साल दिसंबर में लखनऊ सत्र न्यायालय ने उन्हें अदालत में हाजिर होने के लिए कहा था।

अदालत के इस आदेश को रद्द करने के लिए राहुल गाँधी ने हाई कोर्ट में याचिका दी थी। अपने आदेश में ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि राहुल गाँधी ने कहा था कि सावरकर एक ब्रिटिश नौकर थे, जिन्हें पेंशन मिलती थी। ट्रायल कोर्ट ने कहा कि इन टिप्पणियों से समाज में नफरत और दुर्भावना फैली है। इसलिए, ट्रायल कोर्ट ने राहुल गाँधी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला पाया है।

अदालत ने पाया था कि राहुल गाँधी ने 17 नवंबर 2022 को समाज में नफरत और दुर्भावना फैलाई थी। लखनऊ के अपर सिविल जज (सीनियर डिविजन)/एसीजेएम आलोक वर्मा ने अपने आदेश में कहा था, “प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहले से छपे पर्चे और पत्रक वितरित करना दर्शाता है कि राहुल गाँधी ने समाज में नफरत और दुश्मनी फैलाकर राष्ट्र की बुनियादी विशेषताओं को कमजोर और अपमानित किया है।”

दरअसल, सावरकर के खिलाफ की गई टिप्पणी को लेकर अधिवक्ता नृपेंद्र पांडे ने राहुल गाँधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। याचिका में कहा गया है, “राष्ट्रवादी विचारधारा के महान नेता क्रांतिवीर सावरकर आजादी के इतिहास में एक निडर स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने भारत माता को गुलामी से मुक्त कराने के लिए अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचारों को सहन किया।”

पांडे ने अपनी शिकायत में यह भी दावा किया है कि महात्मा गाँधी ने पहले भी विनायक दामोदर सावरकर को देशभक्त माना था। अधिवक्ता की शिकायत के बाद कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं रायबरेली से लोकसभा सांसद राहुल गाँधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (शत्रुता को बढ़ावा देना) और 505 (सार्वजनिक शरारत) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

शिकायत के बाद जून 2023 में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अंबरीश कुमार श्रीवास्तव ने पांडे की शिकायत को खारिज कर दिया था। इसके बाद पांडे ने सत्र न्यायालय में इसे चुनौती दी थी। सत्र न्यायालय ने तब याचिका को स्वीकार कर लिया और मामले को वापस मजिस्ट्रेट अदालत में भेज दिया था।

कैम्पस में धूमधाम से इफ्तार और ईद, लेकिन रामनवमी की अनुमति नहीं: जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों ने ममता बनर्जी की सरकार को ललकारा, कहा- हर क़ीमत पर मनाएँगे

कोलकाता के जादवपुर यूनिवर्सिटी में रामनवमी के आयोजन को लेकर बवाल मचा हुआ है। छात्र-छात्राओं ने यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर रामनवमी मनाने की तैयारी की थी, लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसकी मंजूरी नहीं दी। विद्यार्थियों का कहना है कि कुछ दिन पहले रमजान के दौरान कैंपस में इफ्तार और ईद भी मनाई गई थी। ऐसे में प्रशासन रामनवमी उत्सव क्यों नहीं मनाने देना चाहता?

दरअसल, जादवपुर यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों ने कैंपस में रामनवमी उत्सव मानने के लिए 28 मार्च को वाइस चांसलर कार्यालय को आवेदन दिया था। अब 3 मार्च को इस आवेदन पर विचार करने के लिए वाइस चांसलर के कार्यालय में एक बैठक की। सदस्यों ने बैठक में रामनवमी मनाने की इजाजत देने संबंधी छात्रों की माँगों को अस्वीकार कर दिया।

इसके पीछे विश्वविद्यालय प्रशासन ने दो तर्क दिए हैं। पहला ये कि यूनिवर्सिटी कैंपस में रामनवमी मनाने की परंपरा नहीं रही है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कहा कि पिछले साल भी विद्यार्थियों को रामनवमी मनाने की अनुमति नहीं दी गई थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दूसरा तर्क यह दिया कि अभी यूनिवर्सिटी में VC नहीं हैं। ऐसे में नई परंपरा शुरू करने का फैसला नहीं लिया जा सकता।

छात्रों को मिला बीजेपी का साथ

यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा आवेदन खारिज करने के बाद भी विद्यार्थी कैंपस में रामनवमी मनाने के लिए अड़े हुए हैं। छात्रों के समर्थन में अब बीजेपी भी आ गई है और राज्य की ममता बनर्जी की सरकार पर हमला बोला है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि बंगाल की ममता बनर्जी सरकार जान-बूझकर ईद और इफ्तार कैंपस में करने देती है, लेकिन रामनवमी का उत्सव नहीं मनाने देती। ये सरासर अन्याय है।

उधर, छात्रों ने भी ठान लिया है कि वो रामनवमी मना कर ही रहेंगे। इसको लेकर तनाव का माहौल बन गया है। वहीं, पुलिस भी अलर्ट पर है। बता दें कि जादवपुर यूनिवर्सिटी वामपंथियों का गढ़ रहा है। यहाँ SFI काफी मजबूत है। यह छात्र संगठन रामनवमी का विरोध कर रहा है। वहीं, ABVP रामनवमी मनाने पर अड़ी हुई है। ऐसे में दो छात्र संगठन भी आमने-सामने आ गए हैं।

नजीम ने खुलेआम कुरान फाड़ कर हवा में उड़ाए पन्ने, पुलिस ने उपद्रवी मुस्लिम भीड़ को खदेड़ा: आरोपित हिरासत में

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के जलालाबाद कस्बे में गुरुवार (3 अप्रैल, 2025) रात कुरान के पन्ने फाड़ने की घटना सामने आई। पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित युवक को हिरासत में ले लिया है। घटना जलालाबाद थाना क्षेत्र में तहसील रोड पर हुई, जो थाना परिसर से मात्र 50 मीटर की दूरी पर है।

घटना का विवरण

गुरुवार रात करीब 9 बजे कुछ स्थानीय मुस्लिमों ने कुरान के कुछ पन्ने फटे हुए देखे, जिसके बाद क्षेत्र में हंगामा मच गया। देखते ही देखते घटनास्थल पर हजारों मुस्लिमों की भीड़ जुट गई। सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक (एसपी) राजेश द्विवेदी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे। इसके बाद उन्होंने आक्रोशित मुस्लिम भीड़ को शांत करने का प्रयास किया। बार-बार चेताने के बाद भी शांत न होने पर पुलिस ने उन्हें लाठियाँ भाँजकर खदेड़ा और हालात को नियंत्रित किया।

सीसीटीवी फुटेज से आरोपित की पहचान

पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जाँच की, जिसमें एक युवक कुरान के पन्नों को हवा में उड़ाता हुआ नजर आया। फुटेज के आधार पर आरोपित की पहचान नजीम के रूप में हुई, जो जलालाबाद कस्बे का ही निवासी है। पुलिस ने आरोपित को रात में ही हिरासत में ले लिया।

पुलिस का बयान

एसपी राजेश द्विवेदी ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा, “घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मौके पर पहुँचकर भीड़ को शांत कराया और स्थिति को नियंत्रण में लिया। सीसीटीवी फुटेज की जाँच में आरोपित की पहचान हुई, जिसे हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।”

आरोपित की मानसिक स्थिति पर सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि आरोपित नजीम मानसिक रूप से अस्वस्थ है। हालाँकि, पुलिस इस दावे की सत्यता की जाँच कर रही है। एसपी द्विवेदी ने बताया कि इलाके में शांति बनी हुई है और पुलिस हर स्थिति पर कड़ी नजर रख रही है।

माहौल शांत, पुलिस सतर्क

घटना के बाद से इलाके में किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रशासन की अपील है कि लोग अफवाहों पर ध्यान न दें और शांति बनाए रखें। पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। विदेश में भी कुरान के साथ छेड़छाड़ की घटनाएँ होती रही रही है। स्वीडन में कुरान जलाने वाले इराकी व्यक्ति सलवान मोमिका की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

ईसाई धर्म में नहीं हुई परिवर्तित, मिशनरी कॉलेज ने एग्जाम देने से रोका: छत्तीसगढ़ की हिंदू छात्रा ने लगाया आरोप, BJP नेता बोले- रद्द हो संस्थान की मान्यता

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में एक मिशनरी नर्सिंग कॉलेज में ईसाई धर्मांतरण का खेल सामने आया है। यहाँ छात्राओं पर ईसाइयत अपनाने का दबाव डाला जाता है। अगर वह न मानें तो परीक्षा न देने के साथ अन्य तरह से परेशान किया जाता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना जशपुर के कुनकुरी थाना क्षेत्र के तहत होलीक्रॉस नर्सिंग कॉलेज है। यहाँ नर्सिंग की फाईनल ईयर की छात्रा ने प्रिंसिपल विंसी जोसेफ पर धर्मांतरण का दबाव बनाने का आरोप लगाया है। छात्रा का कहना है कि जीएनएम फर्स्ट ईयर में एडमिशन लेने के तीन महीने के बाद प्रिंसिपल ने अपने पास बुलाकर हिंदू से ईसाई बनने का ऑफर दिया।

छात्रा ने इस बात को नजरअंदाज किया तो ये प्रस्ताव, दबाव में बदल गया। प्रिंसिपल विंसी बार-बार धर्मांतरण कर नन बनने के लिए कहती। जब छात्रा ने इसके लिए साफ तौर पर मना कर दिया तो कॉलेज प्रबंधन ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। उसकी अटेंडेंस नहीं लगाई जाती थी।

छात्रा ने बताया कि उसे कक्षा से बाहर कर दिया जाता था। उसके कॉलेज परिसर में आने से रोक लगा दी गई। फिर 1 अप्रैल 2024 को उसे हॉस्टल से निकाल दिया गया। पढ़ाई और वार्षिक परीक्षा में भी न बैठने देने का प्रयास किया गया।

छात्रा ने इस बात की शिकायत उच्चाधिकारियों से की तो उसे परीक्षा में तो बैठने दिया गया लेकिन प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल करने की धमकी दी। अब इस पूरे मामले पर छात्रा ने कलेक्टर और एसपी से लिखित शिकायत कर कार्रवाई की माँग की है।

पीड़ित छात्रा के पिता दिव्यांग हैं। उसकी माँ ने मीडिया को बताया,”बेटी ने कई बार इस प्रताड़ना के विषय में जानकारी दे चुकी है। उसे कॉलेज की सिस्टर (प्रिंसिपल) बार बार उसे नन बनने को कहती थी। मैंने उसे हमेशा यही का कि वो पढ़ाई पर ध्यान दे। अगर नन ही बनना है तो हमारे हिंदू धर्म में भी ब्रह्मकुमारी हैं। उसमें चली जाना। कॉलेज वाले लोग बच्ची की छोटी सी गलती पर भी हमको बुला कर बहुत डाँटते थे। हम कुछ नहीं कहते थे क्योंकि हम गरीब लोग हैं। बच्ची को किसी तरह पढ़ा रहे हैं।”

हिंदू संगठनों ने की कॉलेज बंद करने की माँग

छात्रा के साथ हुई इस मानसिक प्रताड़ना को लेकर छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता और अखिल भारतीय घर वापसी संगठन के प्रमुख प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा,”शिक्षा के आड़ में धर्मांतरण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। होलीक्रॉस नर्सिंग कॉलेज (कुनकुरी) जिला जशपुर में बहन छात्रा को जबरन प्रताड़ित कर धर्मांतरण करने वालों को बिलकुल बख्शा न जाए, संबंधित प्राचार्या के खिलाफ कानूनी कारवाई हो और उस संस्था की मान्यता रद्द करके तत्काल बंद किया जाए।”

इस घटना के बाद हिंदू संगठनों में रोष व्याप्त है। विश्व हिंदू परिषद के जिला प्रमुख करनैल सिंह ने गरीब हिंदू लड़की के धर्मांतरण करने के खिलाफ आरोपितों पर तुरंत कार्रवाई करने और कॉलेज को बंद करने की माँग की है।

BJP संख्याबल को लेकर आश्वस्त, RSS का हिन्दू हित पर ज़ोर: काफूर हो चुकी है विपक्ष की 240 वाली ख़ुशी, वक़्फ़ बिल ने समर्थकों में भी भरा नया उत्साह

जून 2024 में जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आए थे तब कॉन्ग्रेस ने ऐसे जश्न मनाया था जैसे वो चुनाव ही जीत गई हो। 99 सीटों पर अटकी कॉन्ग्रेस ने भाजपा को 240 सीटों पर रोकना ही अपने लिए सबसे बड़ी सफलता माना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी लोकप्रियता से एक ऐसा बेंचमार्क सेट किया कि कॉन्ग्रेस समझ ही नहीं पाई कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है। ‘400 पार’ के नारे में कॉन्ग्रेस समेत पूरा विपक्ष ऐसा उलझा कि NDA को 400 पर रोकने और फैज़ाबाद लोकसभा सीट जीतने की खुशियाँ मनाने में वो ये भी भूल गया कि PM पद की शपथ तो मोदी ही लेने वाले हैं।

कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत को तो प्रफुल्लित होकर पार्टी के वॉररूम में मुट्ठी भींच कर लहराते हुए भी देखा गया। ख़ैर, ये तो थी नेताओं की बात। अब आते हैं मीडिया पर। मीडिया में एक बहस छिड़ गई कि आख़िर मोदी सरकार के कोर एजेंडों का क्या होगा। जैसे – वक़्फ़ बोर्ड में सुधार, UCC (समान नागरिक संहिता), मुस्लिम आरक्षण ख़त्म करना और वर्शिप एक्ट में बदलाव। अब भाजपा ने लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में वक़्फ़ बिल को पारित करा के 2 चीजें एकदम साफ़ कर दी हैं।

संख्याबल को लेकर निश्चिंत है भाजपा, वक्फ पर हुई गहन चर्चा

पहली, भाजपा अपने कोर एजेंडे से भटकने वाली नहीं है। दूसरी, भाजपा के पास इस तरह के बदलावों के लिए संख्याबल मौजूद है। अपने दूसरे कार्यकाल में पार्टी ने राम मंदिर निर्माण से लेकर जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 व 35A निरस्त करने और CAA जैसा क़ानून लाने जैसे बड़े फ़ैसले लिए। हाँ, किसान सुधार बिल ज़रूर वापस लेने पड़े लेकिन वो भाजपा के कोर हिंदुत्व या राष्ट्रवाद वाले एजेंडे का हिस्सा नहीं था। ‘दैनिक भास्कर’ ने जून 2024 में एक ‘एक्सप्लेनर’ के जरिए समझाया था कि कैसे नीतीश-नायडू कभी UCC लागू नहीं होने देंगे। साथ ही शंका जताई थी कि भाजपा के कोर मुद्दों का क्या होगा।

वक़्फ़ संशोधन विधेयक को पहले ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) के पास भेजा गया, उसके बाद इसे लोकसभा में 288-232 और राज्यसभा में 128-95 के बहुमत के साथ पारित कराया गया। बड़ी बात ये है कि जदयू और TDP जैसे साथी दलों ने भी भाजपा का साथ दिया। जबकि ये दोनों पार्टियाँ और इसके नेता सेक्युलर छवि बनाए रखने के लिए जाने जाते हैं। चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार इफ्तारी नेताओं में से एक हैं। इतना ही नहीं, महादलित नेताओं चिराग पासवान की LJP और जीतन राम माँझी की HAM भी सरकार के साथ खड़ी रही। यहाँ तक कि नवीन पटनायक ने अपनी BJD के सांसदों को भी स्वेच्छा से वोट करने के लिए स्वतंत्र कर दिया।

ख़ास बात ये रही कि वक़्फ़ बिल को पास कराने से पहले लोकसभा और राज्यसभा में गहन चर्चा हुई। दोनों सदनों में वोटिंग की प्रक्रिया रात के क़रीब 1 बजे पूरी कराई गई। भाजपा के शीर्ष नेता मिशन मोड में कार्य करने के लिए जाने जाते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह स्वयं ही रात भर डटे रहे, लोकसभा में भी और फिर राज्यसभा में भी। केंद्रीय संसदीय व अल्पसंख्यक कार्यमंत्री किरेन रिजिजू बार-बार बिल के प्रावधानों को समझाते रहे और हर शंका का जवाब देते रहे।

एक और ध्यान देने वाली बात ये है कि इधर संसद में वक़्फ़ बिल पर चर्चा चल रही थी, उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थाईलैंड में BIMSTEC की बैठक में हिस्सा लेने पहुँचे। पीएम मोदी लोकसभा सांसद भी हैं, ऐसे में भाजपा को अगर संख्याबल को लेकर ज़रा सी भी शंका होती तो बिल पास कराने का समय तब रखा जाता जब प्रधानमंत्री दिल्ली में होते। लेकिन, पार्टी इसे लेकर पहले से ही आश्वस्त थी। उत्तर प्रदेश में अक्सर बात-बात पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क जाया करती थी, वहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही चेता दिया कि दंगों की स्थिति में दंगाइयों की बाप-दादा की कमाई संपत्ति भी चली जाएगी, क्योंकि नुक़सान की भरपाई उसी संपत्ति से होगी।

बतौर PM पहली बार RSS मुख्यालय पहुँचे मोदी, गठबंधन साथी भी सदन में साथ

साफ़ है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी तरह सरकार चला रहे हैं जैसे उन्होंने तब चलाया था जब अकेले BJP के पास 303 सीटें हुआ करती थीं। रही बात UCC की तो उत्तराखंड में इसे पहले ही लागू किया जा चुका है और एक मॉडल के रूप में उसका अध्ययन किया जा रहा है। हाँ, मुस्लिम आरक्षण ख़त्म करने पर ज़रूर भाजपा को परेशानी आ सकती है लेकिन बहुत कुछ इसपर भी निर्भर करता है कि अक्टूबर में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में NDA का प्रदर्शन कैसी रहता है और नीतीश कुमार का स्वास्थ्य तबतक कैसा रहता है। अगले साल असम में भी चुनाव होने हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने रामनवमी को प्रतिष्ठा का विषय बनाया हुआ है। पार्टी चुनावी अभियानों में भी मिशन मोड में है। थोड़ी रणनीति बदली ज़रूर है, जिसका परिणाम महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली में जीत के रूप में मिला। अब तो संसद में अमित शाह ने यहाँ तक कह दिया है कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों में योगी आदित्यनाथ CM के रूप में रिपीट होने वाले हैं।

ये भी ध्यान दीजिए कि नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री 11 वर्षों में पहली बार नागपुर स्थित RSS के मुख्यालय पहुँचे। सरसंघचालक मोहन भागवत के साथ उन्होंने संघ के संस्थापक KB हेडगेवार और दूसरे सरसंघचालक MS गोलवलकर की समाधि ‘स्मृति मंदिर’ में श्रद्धासुमन अर्पित किए। यानी, ख़ुद प्रधानमंत्री संघ के साथ अपनी नज़दीकी दिखाने में भी नहीं हिचके। उन्होंने परवाह नहीं की कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया क्या कहेगा। संघ ने दिल्ली में अपना भव्य मुख्यालय भी बनवाया, भले ही इसमें उसे 100 वर्ष लग गए। कुल मिलकर सबकुछ वैसा ही चल रहा है जैसा 2014 और 2024 के बीच में चला करता था।

मुख्यधारा की राजनीति में हिंदुत्व की ज़ोरदार वापसी

हाल ही में मथुरा में हुई भाजपा-संघ की एक बैठक में भी RSS ने स्पष्ट कहा कि हिन्दू हितों का ध्यान रखना होगा। इससे पहले काशी और मथुरा में स्वयंसेवकों को सक्रिय भूमिका निभाने की सलाह RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबोले दे चुके हैं। उधर विपक्ष हिन्दुओं को बाँटने की सारी साजिश रचकर थक चुका है। राहुल गाँधी प्रधानमंत्री के सचिवों में OBC/SC/ST गिनते रहते हैं और जातीय जनगणना की बातें करते रहते हैं, अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला भी जातिवाद पर आधारित है, दिल्ली चुनाव से पहले डॉ अंबेडकर के अपमान का मुद्दा बनाकर अमित शाह और भाजपा को घेरा गया – इसके बावजूद भाजपा का जनाधार कमजोर नहीं हुआ है।

अबतक तो वो समर्थक भी निराश हो चुके हैं जो ‘मोदी बनाम Who’ का जवाब I.N.D.I. गठबंधन का नाम लेकर दिया करते थे। उनका हतोत्साह का कारण ये है कि पिछले कुछ चुनावों में ये दल आपस में ही लड़ बैठे। अभी की स्थिति भी देखें तो बिहार में राजद और कॉन्ग्रेस के बीच में रार चल रही है। कॉन्ग्रेस ने राजद पर सीट शेयरिंग में दबाव बनाने के लिए कन्हैया कुमार को बिहार में पदयात्रा के लिए उतार दिया है। भाजपा के लिए ये आदर्श स्थिति है। समर्थक उत्साहित हैं। महाकुंभ 2025 के बाद हिंदुत्व एक बार फिर मुख्यधारा की राजनीति में वापसी कर चुका है।

शेख हसीना के हटने के बाद पहली बार मुहम्मद यूनुस से मिले PM मोदी, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार रोकने के लिए भारत ने दी थी नसीहत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार (4 अप्रैल, 2025) को बैंकॉक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस से मुलाकात की। । पिछले साल बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद से हटने के बाद यह उनकी पहली मुलाकात थी।

भारत-बांग्लादेश के बीच अहम बैठक

भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध इन दिनों काफी तनावपूर्ण हैं। दक्षिण एशियाई पड़ोसियों के साथ शेख हसीना के कार्यकाल में काफी मजबूत संबंध थे। अगस्त में तख्तापलट के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ. यूनुस सरकार पाकिस्तान परस्त मानी जाती है।

भारत की शरणार्थी बनीं हसीना

बांग्लादेश में कट्टरपंथी संगठन के छात्रों के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर उपद्रव और हिंसा हुई थी, जिसके कारण शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा। बांग्लादेश की बागडोर कट्टरपंथियों के हाथों में चली गई और भारत के खिलाफ नारेबाजी की गई। बांग्लादेश के साथ तनाव उस वक्त और बढ़ गया जब भारत ने शेख हसीना को शरण देने का फैसला किया। नई दिल्ली ने ढाका के शेख हसीना को देने के अनुरोध पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। बांग्लादेश की कट्टरपंथी सरकार शेख हसीना को मुकदमे का सामना करने के लिए स्वदेश भेजने की माँग कर रही है।

बांग्लादेश सरकार के प्रेस कार्यालय ने बताया है कि नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मुहम्मद यूनुस ने बैंकॉक में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। बिम्सटेक बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बनाया गया संगठन है जिसके सदस्य भारत, बांग्लादेश, थाईलैंड, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और भूटान हैं।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हैं अत्याचार

भारत ने बांग्लादेश से बार-बार अपने अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कहा है। दरअसल मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद से कट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दू आ गए हैं। हालांकि बांग्लादेश का कहना है कि हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और यह सांप्रदायिक मुद्दा नहीं है।

संबंधों को स्थिर करना होगी प्राथमिकता

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विदेश नीति के प्रमुख हर्ष पंत ने कहा, “उम्मीद है कि इस बैठक से कुछ जुड़ाव फिर से बनाने की प्रक्रिया शुरू होगी।” “मुझे लगता है कि इस समय, शायद संबंधों को स्थिर करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए।”

लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों के साथ, दोनों देश 4000 किलोमीटर (2500 मील) की सीमा साझा करते हैं। भारत ने बांग्लादेश के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान पाकिस्तान की मुख्य भूमि से अलग हो गया था।

फिर से शाहीन बाग़ सजाने की तैयारी, दंगों की साजिश? CAA के बाद अब वक्फ के बहाने रामनवमी पर हो सकती है हिंसा, एजेंसियों के कान खड़े

वक्फ कानून की असीमित शक्तियों पर लगाम कसने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल पेश किया, जिसे संसद के दोनों सदनों में पारित कर लिया गया है। अब इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह कानून बन जाएगा। इस बीच मुस्लिमों के विरोध को लेकर सरकारें सतर्क हैं। खासकर पिछले कुछ समय से रामनवमी पर हिंदुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को देखकर यह सतर्कता लाजिमी है।

हालात का अनुमान लगाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने तो पुलिस कर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं। उन्हें सेवा में वापस लौटने के लिए कह दिया गया है। दरअसल, वक्फ बिल को लेकर मुस्लिमों के मजहबी नेता से लेकर मुस्लिम संगठनों के प्रमुख तक वक्फ को लेकर अफवाह फैला रहे हैं और मुस्लिमों को एक तरह से उकसाने का काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने यहाँ तक धमकी दे दी है कि कृषि कानूनों की तरह इसे भी वापस लेना होगा।

वक्फ संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान हैदराबाद से सांसद और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन औवेसी पहले ही सदन में उसकी कॉपी फाड़ चुके हैं। वो ये भी कह चुके हैं कि इस बिल के माध्यम से सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों को ही नहीं, बल्कि उनके मजहबी स्थलों- मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान आदि पर कब्जा कर लेगी। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही थी।

हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा, “ये बिल मुस्लिमों के साथ अन्याय है। यह एक जंग का ऐलान है। हमारे मदरसों और मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इसके जरिए मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का शहरी बनाने की कोशिश की जा रही है।”

इस्लामी नेता इसहाक गोरा ने कहा कि यह बिल मुस्लिमों के धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनी हकों पर सीधा हमला है। इससे मुस्लिमों की वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण हो जाएगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, “विधेयक पास हो जाता है तो हम इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। हम चुप नहीं बैठेंगे।”

वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस बिल को बहुसंख्यकवादी मानसिकता वाला बताया है। संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सरकार जबरन इस बिल को संसद में लाई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद मुंबई के अध्यक्ष मौलाना सिराज खान ने तो धमकी तक दे डाली। उन्होंने कहा, “सरकार ध्यान से सुन ले, हम जेल जाने से डरते नहीं हैं।”

सिराज ने कहा, “हमारे किसी भी मामले में अगर सरकार दखलअंदाजी करेगी तो हम जेलों को आबाद करेंगे। हम अपनी आजादी के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। हमारे नबी ने जीने का जो तरीका बताया है, हम उसी के हिसाब से जीने की कोशिश करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग की तरह देश भर में धरना प्रदर्शन किया जाएगा। महाराष्ट्र में भी शाहीन बाग की तरह आंदोलन किया जाएगा।”

शाहीन बाग की तर्ज पर हिंसा भड़काने की कोशिश

जिस तरह मुस्लिम नेता और मौलाना बयान दे रहे हैं, वह भड़काने वाला है। इसी तरह बात नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर फैलाई गई थी कि CAA और NRC कानून के जरिए मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। ठीक उसी तर्ज पर वक्फ बिल को लेकर भी अफवाह फैलाने की कोशिश। की जा रही है कि सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों और मस्जिद-दरगाहों पर कब्जा कर लेगी।

अगर मुस्लिम नेताओं से लेकर धर्मगुरुओं के बयानों को देखें तो वक्फ संशोधन बिल को लेकर भी ये अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मुस्लिमों को भ्रमित करके अधिक से अधिक उनका समर्थन हासिल किया जा सके। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को लेकर भी ऐसी ही अफवाह फैलाई गई थी।

उस समय तमाम नेता ने ऐसा ही किया था। जेल में बंद शरजील इमाम ने जामिया से लेकर तमाम देश के दूसरे हिस्सों तक में इसको लेकर अफवाह फैलाई थी। शरजील इमाम ने पैंफलेट छपवाकर कई मस्जिदों और यूनिवर्सिटी में बँटवाया और खुद बाँटा था। पैंफलेट में लिखा था कि मुस्लिमों को नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (CAA-NRC) का विरोध करना चाहिए>

पैंफलेंट सभी मुस्लिमों को एक साथ मिलकर विरोध करने की अपील की गई थी। मुस्लिमों को भड़काने के लिए इसमें कश्मीर से लेकर बाबरी ढाँचे तक का जिक्र गया था। उसमें लिखा गया था कि पहले कश्मीर, फिर बाबरी मस्जिद और अब CAA हुआ है। इस पैंफलेट में दिल्ली को डिस्टर्ब करने के लिए कहा गया था, ताकि दुनिया भर की मीडिया का ध्यान इस ओर जाए।

इस पैंफलेट बाँटने के एक दिन बाद 15 दिसंबर 2020 को कई जगहों पर हिंसा फैल गई थी। इसमें दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिर्विसटी की हिंसा भी शामिल थी। आगे चलकर CAA-NRC के नाम पर की किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को हिंसक बना दिया गया और आखिरकार फरवरी 2020 में पूर्वी दिल्ली के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई थी।

रामनवमी और हनुमान जयंती को लेकर सावधानी

शाहीन बाग की तर्ज पर ही वक्फ संशोधन बिल के विरोध के नाम पर एक बार फिर दिल्ली एवं अन्य जगहों को दहलाने की कोशिश की जा सकती है। रामनवमी पर वैसे भी पिछले कई सालों से सुनियोजित तरीके से हमले किए जा रहे हैं। ये हमले सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि यूपी-बिहार और झारखंड से लेकर कर्नाटक एवं महाराष्ट्र तक में दिया जाता रहा है।

कट्टरपंथियों द्वारा रामनवमी पर हिंसा की इस परिपाटी को वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध के नाम पर दोहराने की कोशिश इस साल भी की जा सकती है। वैसे तो मूर्ति-पूजक हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिम बहुल इलाकों में हमला करने की घटनाएँ अक्सर आती रहती हैं, लेकिन साल 2019 के बाद रामनवमी एवं हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर हमले की घटनाएँ अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई हैं।

बता दें कि साल 2019 भारती राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। इसी साल 5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। इसको लेकर कुछ कट्टरपंथियों के मन में एक कसक पैदा हो गई। इसी बीच 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 140 से अटके अयोध्या विवाद पर हिंदुओं के पक्ष में फैसला दे दिया।

कट्टरपंथियों पर यह दोहरी मार थी। अभी एक महीना भी नहीं बीते होंगे कि 11 दिसंबर 2019 को भारत सरकार ने नागरिक संशोधन विधेयक (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) कानून पास कर दिया। यह वह ऐसा था, जिसमें पड़ोसी इस्लामी देशों में रहने वाले वहाँ के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था।

इसको लेकर भी कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं भारत विरोधी शक्तियों ने मुस्लिमों को भड़काना शुरू कर दिया कि इससे मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। इसके बाद बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई थी। मन में बसी यह कसक रामनवमी जैसी धार्मिक यात्रा पर हमला करके कट्टरपंथी निकालते रहते हैं। इस बार भी वे कुछ ऐसा ही करने की सोच रहे हैं। इससे सतर्क रहने की जरूरत है।