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चीन का अवैध कब्जा किसी कीमत पर नहीं बर्दाश्त… लोकसभा में विदेश राज्यमंत्री ने किया साफ, लद्दाख क्षेत्र में 2 कस्बे बसाने पर भारत भड़का: बताया- बॉर्डर पर हम कर रहे तेजी से विकास

संसद के जारी बजट सत्र में भाजपा के नेतृत्व वाली जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार ने साफ कर दिया सीमा में चीन का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं है। भारत ने सीमा क्षेत्र में दो नए काउंटी स्थापित करने की चीन की घोषणा पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। इस क्षेत्र का कुछ हिस्सा लद्दाख में आता है। सरकार ने शुक्रवार (21 मार्च) को संसद को बताया कि केंद्र ने राजनयिक चैनलों के माध्यम से विरोध दर्ज कराया है।

विदेश राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा, “भारत सरकार ने इस क्षेत्र में भारतीय क्षेत्र पर चीन के अवैध कब्जे को कभी स्वीकार नहीं किया है। नए काउंटी (कस्बे) के निर्माण से न तो इस क्षेत्र पर भारत की संप्रभुता के बारे में भारत की दीर्घकालिक स्थिति प्रभावित होगी और न ही चीन के अवैध एवं जबरन कब्जे को वैधता मिलेगी।”

सदन में विदेश मंत्रालय से पूछा गया कि क्या उसे इस बात की जानकारी है कि लद्दाख में भारतीय क्षेत्र को शामिल करते हुए चीन होतान प्रांत में दो नए काउंटी स्थापित कर रहा है। विदेश मंत्रालय से इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए रणनीतिक और कूटनीतिक उपायों के बारे में भी पूछा गया। इसके साथ ही भारत द्वारा दर्ज कराए गए विरोध और चीन से मिली प्रतिक्रिया के बारे में भी पूछा गया।

इसका जवाब देते हुए कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा, “भारत सरकार चीन के होतान प्रान्त में तथाकथित दो नए काउंटी की स्थापना के बारे में चीनी द्वारा की गई घोषणा से अवगत है। इन तथाकथित काउंटियों के अधिकार क्षेत्र के कुछ हिस्से भारत के केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में आते हैं।” उन्होंने कहा कि सरकार को पता है कि चीन सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे का विकास कर रहा है।

विदेश राज्यमंत्री ने कहा, “सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के सुधार पर सावधानीपूर्वक और विशेष ध्यान दे रही है, ताकि इन क्षेत्रों के आर्थिक विकास को सुविधाजनक बनाया जा सके। इसके साथ ही भारत की रणनीतिक और सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।” मंत्रालय के अनुसार, सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे के लिए बजट आवंटन में पिछले दशक (2014-2024) में वृद्धि की गई है।

मंत्रालय की ओर से जवाब में आगे कहा गया, “अकेले सीमा सड़क संगठन (BRO) ने पिछले दशक की तुलना में इस पर तीन गुना अधिक व्यय किया है। सड़क नेटवर्क, पुलों की लंबाई और सुरंगों की संख्या में पहले की तुलना में काफी वृद्धि हुई है। इससे स्थानीय समुदायों के लिए कनेक्टिविटी बढ़ी है और हमारे सशस्त्र बलों के लिए बेहतर रसद सहायता प्रदान की गई है।”

बता दें कि लद्दाख के कुछ हिस्सों को शामिल करते हुए चीन द्वारा अपने शिनजियान के होतान इलाके में दो नए कस्बे बसाए गए हैं। इनमें से एक का नाम हेआन और दूसरे का नाम हेकांग रखा गया है। चीन में काउंटी एक प्रशासनिक इकाई है, जिसे ‘श्येन’ कहा जाता है। यह नगरपालिका से नीचे की ईकाई है। इसे आम भाषा में कस्बा कहा जा सकता है। काउंटी ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र आ सकते हैं।

‘मैंने कभी नहीं कहा कि आग बुझाने के दौरान जस्टिस वर्मा के घर नकदी नहीं मिली’: मीडिया रिपोर्टों का दिल्ली के फायर चीफ ने किया खंडन, सुप्रीम कोर्ट बोला- ट्रांसफर का मामला अलग

दिल्ली हाई कोर्ट जस्टिस यशवंत वर्मा के घर मिले भारी मात्रा में नकदी को लेकर विवाद और संशय बढ़ता जा रहा है। इस संशय के पीछे फायर डिपार्टमेंट के प्रमुख का बयान और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी कार्रवाई प्रमुख वजह है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने एक बयान में कहा है कि जस्टिस वर्मा के आवास पर हुई घटना को लेकर अफवाहें फैलाई जा रही हैं। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर अलग मामला है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजने प्रस्ताव निष्पक्ष है और यह जाँच प्रक्रिया से बिल्कुल अलग है। जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में दूसरे नंबर के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं और दिल्ली हाई कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य भी हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरण के बाद वे वहाँ वरिष्ठता क्रम में नौवें नंबर पर होंगे। जस्टिस वर्मा को प्रोन्नत करके इलाहाबाद से ही दिल्ली भेजा गया था।

दरअसल, होली की छुट्टी में जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में आग लग गई थी। उस समय जस्टिस वर्मा शहर से बाहर गए हुए थे। परिजनों ने आग को बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड को सूचित किया था। अग्निशमन कर्मियों ने आग पर काबू भी पा लिया। राहत एवं बचाव के दौरान अग्निशमन कर्मियों ने एक कमरे में भारी मात्रा में रखी गई नकदी देखी। कहा जा रहा है कि आग भी इस नकदी में ही लगी थी।

इसके पहले रिपोर्ट आई थी कि बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के बाद अग्निशमन अधिकारियों ने पुलिस को इसकी जानकारी दी। पुलिस ने यह जानकारी संबंधित एजेंसियों तक आगे पहुँचाई। यह मामला आखिरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना तक पहुँचा। रिपोर्ट के मुताबिक, यह भी कहा जा रहा है कि CJI खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय से इसमें फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट माँगी है।

न्यूज एजेंसी PTI के हवाले से से कई मीडिया हाउस ने रिपोर्ट चलाई कि दिल्ली फायर चीफ अतुल गर्ग ने कहा था कि आग बुझाने के दौरान अग्निशमन सेवा के कर्मियों को कोई नकदी नहीं मिली थी। हालाँकि, कुछ समय के बाद अतुल गर्ग ने PTI की रिपोर्ट का खंडन कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने PTI को उन्होंने कभी ये नहीं कहा कि जस्टिस वर्मा के घर नकदी नहीं मिली है।

न्यूज एजेंसी IANS से बातचीत में भी अतुल गर्ग ने PTI की रिपोर्ट का खंडन किया। अतुल गर्ग ने कहा कि पता नहीं क्यों उनके नाम से यह खबर चलाई गई। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी ने कहा कि PTI की रिपोर्ट फर्जी थी। उन्होंने कहा कि PTI को बताना चाहिए कि उसकी रिपोर्ट का स्रोत कौन था। इससे न्याय और सच्चाई को बाधित करने की कोशिश करने वालों की पहचान उजागर हो जाएगी।

इससे पहले दिल्ली पुलिस के सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने कहा था, “आग की घटना 14 मार्च को रात करीब 11.30 बजे हुई। स्टोर रूम में आग लगने की सूचना मिली। यह एक छोटी सी आग थी। दमकल की दो गाड़ियाँ भेजी गईं और 15 मिनट में आग पर काबू पा लिया गया। तुगलक रोड थाने में एक दैनिक डायरी दर्ज की गई, लेकिन हमने रिपोर्ट में किसी वित्तीय बरामदगी का उल्लेख नहीं किया है।”

इससे पहले यह खबर आई थी कि जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर अचानक मिले भारी कैश की बात भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना तक पहुँची। इसके बाद उन्होंने कॉलेजियम की बैठक बुलाई। बैठक में कॉलेजियम के जजों ने मामले को बेहद चिंताजनक माना। इसके बाद सर्वसम्मति से जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट में वापस स्थानांतरण करने की सिफारिश की गई।

कॉलेजियम के सदस्यों ने मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को सुझाव दिया कि वे इसे जल्द-से-जल्द प्राप्त करने का प्रयास करें, क्योंकि इससे यह निर्णय लेने में मदद मिलेगी कि आंतरिक जाँच का आदेश दिया जाए या नहीं। यह भी कहा जा रहा है कि CJI खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय से इन-हाउस जाँच की सिफारिश कर रिपोर्ट माँगी थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने अपनी रिपोर्ट भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को सौंप दी है। जस्टिस उपाध्याय ने यह रिपोर्ट शुक्रवार (21 मार्च) को सौंपी। जस्टिस उपाध्याय ने घटना के संबंध में साक्ष्य और जानकारी एकत्र करने के लिए आंतरिक जाँच प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम रिपोर्ट की जाँच करेगा और आगे की कार्रवाई शुरू कर सकता है।

कौन हैं जस्टिस यशवंत वर्मा?

जस्टिस यशवंत वर्मा साल 2021 से दिल्ली हाई कोर्ट में जज के रूप में सेवाएँ दे रहे थे। इससे पहले 2014-21 तक वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज थे। जस्टिस यशवंत वर्मा का जन्म 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद में हुआ था। कुछ रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि इलाहाबाद से सटे मध्य प्रदेश के रीवा में उनका जन्म हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से बी.कॉम की डिग्री ली है।

इसके बाद उन्होंने साल 1992 में रीवा विश्वविद्यालय से लॉ में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 8 अगस्त 1992 को उन्होंने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में एडवोकेट के रूप में नामांकन कराया। उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में संवैधानिक, श्रम एवं औद्योगिक कानूनों के साथ-साथ कॉर्पोरेट कानून, टैक्स आदि कानूनों पर अभ्यास किया। साल 2006 में उन्हें हाई कोर्ट का विशेष वकील बना दिया गया।

इसके बाद साल 2012 से साल 2013 तक वे उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख स्थायी अधिवक्ता भी रहे। साल 2013 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर एडवोकेट) के रूप में नामित किया गया। 56 वर्षीय जस्टिस वर्मा को 13 अक्टूबर 2014 को इलाहाबाद हाई कोर्ट का एडिशनल जज नियुक्त किया गया था। उन्हें 1 फरवरी 2016 को हाई कोर्ट का स्थायी जज बना दिया गया। साल 2021 में उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट का जज बना दिया गया।

(नोट: मीडिया रिपोर्टों को अतुल गर्ग द्वारा खारिज किए जाने के बाद हमने इस रिपोर्ट में जरूरी बदलाव किए हैं।)

लखनऊ के प्राचीन हनुमान मंदिर के बाहर फेंका गया बछड़े का कटा सिर, भड़के हिंदुओं ने हंगामा किया: मदेयगंज में 2 साल में तीसरी घटना, गाय को भी मारा था चाकू

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शुक्रवार (21 मार्च 2025) को प्राचीन हनुमान मंदिर के बाहर अज्ञात लोगों ने गोवंश (बछड़े) का कटा हुआ सिर फेंक दिया। ये घटना मदेयगंज थाना क्षेत्र में दोपहर करीब 3 बजे हुई, जिसके बाद लोग भड़क गए। मंदिर परिसर में बोरी में गोवंश का कटा सिर देखते ही आसपास के लोग जमा हो गए और जमकर नारेबाजी शुरू कर दी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुस्साए लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ भी नारे लगाए, क्योंकि उनका कहना था कि ये कोई पहली घटना नहीं है। पिछले दो साल में ये तीसरी बार हुआ, जब मंदिर के आसपास ऐसी हरकत हुई। लोगों का कहना था कि अप्रैल 2024 में गाय पर चाकू से हमला हुआ था और डेढ़ साल पहले मीट फेंका गया था, लेकिन पुलिस ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया।

हंगामा बढ़ता देख लखनऊ (उत्तर) के विधायक नीरज बोरा मौके पर पहुँचे। उन्होंने लोगों को शांत कराया और पुलिस को सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया। पुलिस के बड़े अधिकारी जैसे एडीसीपी सेंट्रल मनीषा सिंह और एसीपी महानगर, भारी फोर्स के साथ वहाँ तैनात हुए। आरएसएस के नगर संघचालक अशोक दीक्षित भी कार्यकर्ताओं के साथ पहुँचे और दोषियों को कड़ी सजा देने की माँग की। इस घटना से लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा। एक शख्स ने कहा, “ये हद हो गई, पुलिस अगर पहले कार्रवाई करती तो आज ये नौबत न आती।”

लखनऊ पुलिस ने बयान जारी कर बताया कि 21 मार्च को सूचना मिलते ही फोर्स ने मौके पर पहुँचकर हालात सँभाले। धार्मिक भावनाओं को देखते हुए सिर को तुरंत हटाया गया। पुलिस का कहना है कि शांति व्यवस्था कायम है और सीसीटीवी फुटेज खंगाली जा रही है। खास टीमें बनाई गई हैं, जो वैज्ञानिक और तकनीकी सबूत जुटा रही हैं। पुलिस ने लोगों से अपील की कि अफवाहों पर ध्यान न दें और सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट न करें।

विधायक नीरज बोरा ने इसे सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश बताया और कहा, “दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” एडीसीपी मनीषा सिंह ने भी कहा कि पोस्टमॉर्टम के लिए वेटरनरी डॉक्टर की मदद ली जा रही है और पीएसी फोर्स तैनात की गई है।

जिनके 3 या उससे अधिक बच्चे, उनको नहीं मिलेंगे दिल्ली में हर महीने ₹2500: भाजपा सरकार लगाएगी कड़े नियम, कैबिनेट ने योजना के लिए दिए हैं ₹5100 करोड़

दिल्ली की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार ‘महिला समृद्धि योजना’ में कड़े नियम एवं शर्त लागू कर सकती है। दिल्ली में इस योजना का लाभ परिवार की सबसे बड़ी महिला को मिलेगा। दिल्ली सरकार उन महिलाओं को भी इस योजना का लाभ नहीं देगी, जिनके तीन से अधिक बच्चे हैं। इसके तहत तीन बच्चों की माँ इस योजना का लाभ नहीं ले पाएँगी।

बीजेपी ने दिल्ली चुनाव के दौरान अपने संकल्प पत्र में गरीब परिवार की महिलाओं के लिए ₹2500 महीने का भत्ता दिए जाने का वादा किया था। दिल्ली सरकार ने इस योजना को लागू करने का ऐलान 8 मार्च, 2025 को महिला दिवस के मौके पर किया था।

इस योजना को लागू करने के लिए दिल्ली कैबिनेट ने ₹5100 करोड़ की मंजूरी भी दे दी है। हालाँकि, इस योजना का लाभ लेने के लिए कई जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी ताकि यह पैसा अपात्र लोगों को ना मिल सके।

इन्हें नहीं मिल पाएगा लाभ

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर कोई महिला 3 से अधिक बच्चों की माँ है तो वह इस योजना का लाभ नहीं ले पाएगी। इसके अलावा अगर किसी महिला के बच्चों का टीकाकरण नहीं हुआ है तो उसे भी इस योजना से बाहर रखा जाएगा।

इसके अलावा अगर एक BPL कार्ड पर एक से अधिक महिला का नाम शामिल है तो घर की सबसे उम्रदराज महिला को ही इसका लाभ दिया जाएगा। इसके अलावा यदि महिला को विधवा या वृद्धावस्था पेंशन जैसी किसी अन्य योजना का लाभ मिल रहा है तो उसे भी लाभार्थियों की सूची में शामिल नहीं किया जाएगा।

किसे मिल सकता है योजना का लाभ

महिला समृद्धि योजना सिर्फ गरीब व जरूरतमंद महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए लाई गई है। इसके तहत 21 से 60 वर्ष तक की BPL कार्डधारक महिला इसकी लाभार्थी बन पाएगी। BPL कार्ड उन्हीं परिवारों को जारी किया जाता है जिनकी वार्षिक आय ₹1 लाख से कम होती है।

इस योजना का लाभ उन महिलाओं को मिलेगा जो दिल्ली में कम से कम 5 वर्षों से रह रही हों और जिनके परिवार की सालाना आय ₹3 लाख से कम हो। अनुमान है कि दिल्ली के भीतर 20 से 25 लाख BPL कार्ड धारक लगभग महिलाएँ हैं।

पैसे लेकर वोट देना ‘कदाचार’, कंडक्टर का टिकट न देना ‘भ्रष्टाचार’… लेकिन जज के घर ‘करोड़ों’ मिलना ‘चिंताजनक’: कभी SC ने MP-MLA पर केस चलाने को पलटा था फैसला, आज ‘जस्टिस वर्मा’ मामले में ‘ट्रांसफर’

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने सजा के तौर पर उन्हें वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया है। अब ‘इन-हाउस’ जाँच भी होगी। ‘पैसों के पहाड़’ का खुलासा एक दुर्घटना के चलते हुआ। कहा जा रहा है कि यह नकदी 15 करोड़ रुपए से अधिक है। हालाँकि, इसकी गिनती नहीं हुई है।

दरअसल, होली की छुट्टी में जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में आग लग गई थी। उस समय जस्टिस वर्मा शहर से बाहर गए हुए थे। परिजनों ने आग को बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड को सूचित किया था। अग्निशमन कर्मियों ने आग पर काबू भी पा लिया। राहत एवं बचाव के दौरान अग्निशमन कर्मियों ने एक कमरे में भारी मात्रा में रखी गई नकदी देखी। कहा जा रहा है कि आग भी इस नकदी में ही लगी थी।

इसके बाद बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के बाद उन्होंने पुलिस को इसकी जानकारी दी। पुलिस ने यह जानकारी संबंधित एजेंसियों तक आगे पहुँचाई। यह मामला आखिरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना तक पहुँचा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह भी कहा जा रहा है कि CJI खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय से इसमें फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट माँगी है।

इस दौरान कॉलेजियम के सदस्यों ने मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को सुझाव दिया कि वे इसे जल्द-से-जल्द प्राप्त करने का प्रयास करें, क्योंकि इससे यह निर्णय लेने में मदद मिलेगी कि आंतरिक जाँच का आदेश दिया जाए या नहीं। आनन-फानन में CJI खन्ना ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के 5 सदस्यों वाली कॉलेजियम की बैठक बुलाई। कॉलेजियम ने इस घटना को चिंताजनक माना।

इसके बाद सजा के रूप में सर्वसम्मति से जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट में वापस स्थानांतरण करने की सिफारिश की गई। जस्टिस वर्मा 2021 से दिल्ली हाई कोर्ट में जज के रूप में सेवाएँ दे रहे थे। इससे पहले 2014-21 तक वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज थे। बता दें कि इस तरह के मामले में आमतौर पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) कार्रवाई करती है, लेकिन यह मामला कोर्ट से जुड़ा है।

दिल्ली पुलिस के सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है, “आग की घटना 14 मार्च को रात करीब 11.30 बजे हुई। स्टोर रूम में आग लगने की सूचना मिली थी। यह एक छोटी सी आग थी। दमकल की दो गाड़ियाँ भेजी गईं और 15 मिनट में आग पर काबू पा लिया गया। तुगलक रोड थाने में एक दैनिक डायरी दर्ज की गई, लेकिन हमने रिपोर्ट में किसी वित्तीय बरामदगी का उल्लेख नहीं किया है।”

स्थानांतरण के रूप में सजा देने को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हो रही है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने शुक्रवार (21 मार्च) की सुबह एक पूर्ण बैठक की। इसमें सुझाव दिया गया कि दंडात्मक स्थानांतरण पर्याप्त नहीं होगा और जज के खिलाफ कुछ ठोस कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके बाद कोर्ट ने सर्वसम्मति से इन-हाउस जाँच पर सहमति जताई।

इस प्रक्रिया का पहला कदम स्थानांतरण है। स्थानांतरण अभी प्रक्रियाधीन है और सरकार ने अभी इसकी मंजूरी नहीं दी है। वहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और सभी न्यायाधीशों को कड़े शब्दों में पत्र लिखा है। एसोसिएशन ने कहा, “हम कूड़ेदान नहीं हैं।” एसोसिएशन ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार अस्वीकार्य है।

रिश्वत मामले में MP/MLA पर मुकदमा चलाने के लिए बदला था निर्णय

मार्च 2024 में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से 1998 के एक फैसले को पलट दिया था। 1998 के उस फैसले में विधायकों को रिश्वत लेकर सदन में भाषण देने या वोट देने पर अभियोजन से छूट दी गई थी। तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि संसद या विधानसभाओं में वोट या भाषण के लिए रिश्वत लेने वाले सांसदों और विधायकों पर मुकदमा चलाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पीवी नरसिम्हा मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों के फैसले से वह असहमत है। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि सांसद-विधायकों द्वारा भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भारतीय लोकतंत्र के कामकाज को नष्ट कर देती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “रिश्वतखोरी को संसदीय विशेषाधिकारों का संरक्षण प्राप्त नहीं है। 1998 का फैसला संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के विपरीत है।”

दरअसल, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्रमुख शिबू सोरेन और उनके चार सांसदों ने 1993 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार को समर्थन में वोट देने के लिए कथित तौर पर रिश्वत ली थी। इस मामले में शिबू सोरेन एवं चार अन्य सांसदों के खिलाफ CBI ने मुकदमा दर्ज किया था। हालाँकि, 1998 में 5 सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विधायकों एवं सांसदों को राहत दे दी थी।

पैसे लेकर यात्रियों को टिकट नहीं देना विश्वासघात, नौकरी से निकालना सही: सुप्रीम कोर्ट

अक्टूबर 2016 में भी सुप्रीम कोर्ट ने रिश्वतखोरी पर न्याय का पाठ पढ़ाया था। सुप्रीम कोर्ट ने एक बस कंडक्टर को नौकरी से निकालने के फैसले को इसलिए सही ठहराया था, क्योंकि उसने 78 यात्रियों से किराया तो ले लिया था, लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया था। इस पर उसके नियोक्ता ने कंडक्टर को नौकरी से निकाल दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने नियोक्ता के फैसले को सही ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में कहा था, “जहाँ कोई व्यक्ति सार्वजनिक धन से संबंधित काम करता है या वित्तीय लेन-देन में लगा होता है या किसी भरोसेमंद व्यक्ति की हैसियत से काम करता है, वहाँ उच्चतम स्तर की ईमानदारी और विश्वसनीयता अनिवार्य और अपवाद रहित है।”

दरअसल, 8 अक्टूबर 1990 को उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की एक निरीक्षण टीम ने औचक निरीक्षण किया था। इसमें पाया था कि 78 यात्रियों ने कंडक्टर प्रदीप कुमार को किराया दिया था, लेकिन कंडक्टर ने उन्हें टिकट नहीं दिए थे। घटना की विभागीय जाँच हुई और दो साल बाद परिवहन निगम ने उसे कदाचार के लिए नौकरी से निकाल दिया।

इसके बाद कंडक्टर प्रदीप कुमार ने श्रम न्यायालय का रुख किया और उसे नौकरी से निकालने के फैसले को ‘बहुत कठोर’ बताया। श्रम न्यायालय ने निगम को बकाया वेतन दिए बिना सेवा में निरंतरता और पूर्ण वेतन के साथ कंडक्टर को फिर से नौकरी पर रखने का निर्देश दिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने भी 2008 में श्रम न्यायालय के फैसले के खिलाफ निगम की अपील को खारिज कर दिया था।

हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ परिवहन निगम सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। सुप्रीम कोर्ट ने निगम की अपील पर सुनवाई करते हुए श्रम न्यायालय के निष्कर्ष को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की सजा का निर्धारण इसमें शामिल धनराशि से नहीं, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति और उसके द्वारा किए गए सार्वजनिक कर्तव्य के प्रकार से होता है। इसके साथ ही उसने कंडक्टर को नौकरी से निकालने के फैसले को सही ठहराया।

तुलसी पर अब्दुल हकीम ने काटकर डाले गुप्तांग के बाल, पुलिस ने नहीं लिया एक्शन: केरल HC ने फटकारा, कार्रवाई के निर्देश दिए

केरल हाई कोर्ट ने गुरुवायूर के नेशनल पैराडाइज़ रेस्टोरेंट के मालिक अब्दुल हकीम के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है। हकीम ने एक वीडियो में तुलसी के पौधे (थुलसीथारा) के साथ बेहद आपत्तिजनक हरकत की, जो हिंदू धर्म में पवित्र मानी जाती है। उसने अपने निजी अंग से बाल निकालकर तुलसी पर डाले, जिससे लोगों में गुस्सा भड़क गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, केरल हाई कोर्ट ने कहा कि ये हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला कृत्य है। ये बात जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने अलप्पुझा के श्रीराज आर को जमानत देते हुए कही। श्रीराज ने ये वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम पर शेयर किया था, जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया। श्रीराज पर पहले धार्मिक उन्माद फैलाने का आरोप था, जिसे बाद में बदलकर धार्मिक समूहों में दुश्मनी बढ़ाने की धारा में कर दिया गया। इस मामले में सुनवाई के दौरान श्रीराज ने कहा कि उसने पहले से वायरल वीडियो शेयर किया, लेकिन हकीम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस मामले में हाई कोर्ट ने पुलिस से पूछा कि हकीम के खिलाफ अब तक केस क्यों नहीं दर्ज हुआ। हकीम गुरुवायूर मंदिर के पास होटल चलाता है और ड्राइविंग लाइसेंस भी रखता है। इस पर पुलिस ने दावा किया कि हकीम 25 साल से मानसिक रूप से बीमार है। हालाँकि कोर्ट ने तुरंत ही पुलिस के दावे पर सवाल उठाया और पूछा कि अगर ऐसा (वो मानसिक रूप से बीमार) है तो उसे होटल और गाड़ी चलाने की इजाजत कैसे मिली?

जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने कहा कि इसकी जाँच होनी चाहिए कि उसे लाइसेंस कैसे मिला और कैसे वो अब भी होटल चला रहा है। इसके बाद कोर्ट ने पुलिस को हकीम के मानसिक स्वास्थ्य और लाइसेंस की जाँच के साथ कानूनी कदम उठाने को कहा। लोगों का कहना है कि ये सिर्फ अपमान नहीं, बल्कि आस्था पर हमला है।

पहले भी विवादों से घिरा रहा है अब्दुल हकीम, लेकिन नहीं हुई कोई कार्रवाई

बता दें कि अब्दुल हकीम पहले भी विवादों में रहा है। उसने तुलसी का अपमान करने के अलावा कई कारनामें किए हैं। साल 2017 में उसके रेस्टोरेंट से बासी खाना जब्त हुआ था, ये तीसरी बार था जब छापा पड़ा। लोग कहते हैं कि राजनीतिक दबाव से मामले दब गए।

हकीम पर अयप्पा भक्तों की बसों पर पत्थर फेंकने का भी आरोप है, जिसकी शिकायत गुरुवायूर थाने में दर्ज है। इसके अलावा, उसके रेस्टोरेंट के बाथरूम में हिडन कैमरा लगाने का गंभीर इल्जाम भी लगा। हिंदू संगठनों ने इसे लेकर कई बार आवाज उठाई, पर कार्रवाई नहीं हुई। तुलसी अपमान का वीडियो वायरल होने के बाद विश्व हिंदू परिषद ने तुलसी पूजन कर विरोध जताया। पुलिस ने हकीम को मानसिक बीमार बताया, लेकिन लोग सवाल उठा रहे हैं कि फिर वो होटल कैसे चला रहा है।

पंजाब में स्थानीय भीड़ ने बिहारी स्टूडेंट्स पर बोला हमला… हाथ में तलवारें, छात्र लहूलुहान: रिपोर्ट में दावा, वाइस चांसलर ने कहा – लड़ाई बिहारी छात्रों के दो गुटों में

पंजाब के बठिंडा में गुरु काशी यूनिवर्सिटी के कैंपस में बिहार के छात्रों पर हमलों की खबर आ रही है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहारी छात्रों को निशाना बनाकर तलवारों से हमला किया गया। कई छात्रों के सिर फट गए, हड्डियाँ टूट गईं और खून से लथपथ हालत में वो मदद की गुहार लगा रहे हैं।

बठिंडा के गुरु काशी यूनिवर्सिटी के पीड़ित छात्रों का कहना है कि पिछले 5 दिनों से हालात भयावह बने हुए हैं। इनमें बीटेक, बीफार्मा, बीसीए, एमसीए, एमबीए जैसे कोर्स के छात्र शामिल हैं, जो पढ़ाई के लिए घर से इतनी दूर आए थे। लेकिन अब उनकी जान पर बन आई है।

छात्रों ने बताया कि हमलावरों में स्थानीय लोग भी शामिल थे, जिन्होंने बेरहमी से तलवारें चलाईं। दो दर्जन से ज्यादा छात्र घायल हैं और कुछ की हालत गंभीर है। छात्रों का आरोप है कि पंजाब पुलिस ने उनकी मदद करने की बजाय उल्टा बिहारी छात्रों को ही हिरासत में ले लिया।

छात्रों का आरोप है कि यूनिवर्सिटी के सुरक्षा गार्ड भी हमलावरों के साथ मिले हुए थे और उन्होंने फायरिंग तक की। लहूलुहान छात्रों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और शिक्षा मंत्री को मेल भेजकर मदद माँगी है। इस घटनाक्रम से जुड़े फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहे हैं।

वहीं, यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. एसके बावा ने कहा कि ये झगड़ा बिहारी और पंजाबी छात्रों के बीच नहीं, बल्कि बिहार के छात्रों के दो गुटों के बीच हुआ था। एक गुट ने अपने स्थानीय दोस्तों को बुला लिया, जिससे बात बिगड़ गई। डॉ. बावा ने कहा कि हमलावर छात्रों की पहचान कर ली गई है और उन्हें यूनिवर्सिटी से निकाल दिया जाएगा।

जो तुष्टिकरण से करे प्यार, वो इफ्तार से कैसे करे इनकार: राम मंदिर-महाकुंभ को No-No, मुस्लिम लीग को YES; कॉन्ग्रेस की राजनीति का यही सार

लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव हारने और राज्यों में दशकों से सत्ता से बाहर होने के बाद भी कॉन्ग्रेस अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति छोड़ने को तैयार नहीं है। हिन्दुओं के संघर्ष के प्रतीक राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और महाकुंभ से दूरी बनाने वाला कॉन्ग्रेस नेतृत्व अब इफ्तार में सहर्ष शामिल हो रहा है। यह इफ्तार आयोजन भी उस संगठन का था, जिसकी जड़ें मोहम्मद अली जिन्ना की बनाई मुस्लिम लीग में हैं। हालाँकि, गाँधी परिवार के हर काम पर ह्म्ल्ला मचाने वाली कॉन्ग्रेस इस इफ्तार को लेकर चुप भी है।

भारत की राजनीति में हिन्दू (या जो अपने आप को हिन्दू बताते हों) नेताओं की इफ्तार में जाने की तस्वीरे 2014 से पहले आम थीं। इसे वोटबैंक राजनीति का एक बड़ा हथियार माना जाता था। यह ‘इफ्तार राजनीति’ राष्ट्रपति भवन तक पहुँच गई थी। हालाँकि, 2014 में जब मुस्लिम तुष्टिकरण से त्रस्त भारत की जनता ने भाजपा को बहुमत दिया तो इससे देश की राजनीति 180 डिग्री घूम गई। इसके बाद ‘टोपी’ पहनने-पहनाने वालों की संख्या में भारी गिरावट आई और उसी अनुपात में धीमे-धीमे इफ्तार पार्टी में कमी आने लगी।

लेकिन 2025 में इफ्तार राजनीति की वापसी हुई है। इस बार भी ‘इफ्तार राजनीति’ की झंडाबरदार कॉन्ग्रेस ही है। नई दिल्ली में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने गुरुवार (20 मार्च, 2025) को एक इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। इसमें कई विपक्षी नेता आमंत्रित किए थे। इफ्तार पार्टी में पहुँचने वालों में सबसे बड़ा नाम कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी का था। उनके साथ ही कॉन्ग्रेस के मुखिया मल्लिकार्जुन खरगे भी शामिल हुए। दोनों नेताओं ने सपा मुखिया अखिलेश यादव और AAP नेता संजय सिंह के साथ इफ्तार किया।

इसकी तस्वीरें सामने आईं तो लोगों के मन में एक ही सवाल कौंधा। इस इफ्तार से मात्र 2 माह पहले ही 144 वर्षों के बाद प्रयागराज में हिन्दुओं का सबसे बड़ा समागम ‘महाकुंभ’ हुआ था। महाकुंभ में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और सिलचर से लेकर पोरबंदर तक के हिन्दू आए। ट्रेनें-बसें भरी रहीं। प्रयागराज से 200-400 किलोमीटर दूर तक के शहर महाकुंभ आने वाले श्रद्धालुओं से जाम हो गए। लेकिन इस 60 करोड़ की संख्या में 2 नाम गायब मिले थे।

इनमें से एक नाम इफ्तार पार्टी में शामिल होने वाली कॉन्ग्रेस की डी-फैक्टो मुखिया सोनिया गाँधी का था। दूसरा नाम ‘दत्तात्रेय ब्राह्मण‘ राहुल गाँधी का था। इन दोनों मनुष्यों को कोई महाकुंभ में नहीं देख सका। सक्रिय राजनीति में 2024 में कदम रखने वाली प्रियंका गाँधी भी इससे दूर रहीं। यानी इफ्तार पार्टी में एक बुलावे पर पहुँचने वाले कॉन्ग्रेस नेता प्रयागराज नहीं जा पाए। विडंबना यह है कि प्रयागराज वही शहर है जहाँ से यह परिवार निकला है।

मुस्लिमों से गलबहियाँ और हिन्दू आयोजनों से दूरी का गाँधी परिवार का यह कोई पहला मामला नहीं है। यह परंपरा जवाहर लाल नेहरू ने तभी शुरू की थी, जब उन्होंने हिन्दुओं द्वारा खँडहर से वापस तैयार किए गए सोमनाथ मंदिर में जाने से मना किया था। खुद तो नेहरू इस कार्यक्रम में नहीं ही गए थे, उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को भी जाने से रोकने की कोशिश की थी। उसी ‘क्षद्म धर्मनिरपेक्षता’ की परंपरा का निर्वहन गाँधी परिवार एकदम मन लगाकर कर रहा है।

महाकुंभ से पहले ठीक एक वर्ष पहले भी गाँधी परिवार ने स्पष्ट कर दिया था कि उनकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। 500 वर्षों के संघर्ष के बाद हिन्दुओं को मिले राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण कॉन्ग्रेस ने ठुकरा दिया था। सोनिया गाँधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी ने इस कार्यक्रम में शामिल होने से मना किया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से कोई शामिल नहीं हुआ था। हास्यास्पद ये है कि IUML की इफ्तार पार्टी में शामिल होने वाली कॉन्ग्रेस ने राम मंदिर का न्योता इसलिए ठुकराया था क्योंकि उसके हिसाब से यह RSS-BJP का कार्यक्रम था।

इफ्तार में लेकिन ‘तुष्टिकरण को जो करे प्यार, इफ्तार से कैसे करे इनकार’ के फार्मूला पर चलते हुए तुरंत शिरकत की गई। यह IUML वही पार्टी है, जिसके पहले अध्यक्ष मुहम्मद इस्माइल ने भारत के विभाजन के लिए हुए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। इन्हीं मुहम्मद इस्माइल ने संविधान सभा में भारतीय मुस्लिमों के लिए शरिया कानून को बनाए रखने की वकालत की थी।

कॉन्ग्रेस को लेकर इन सब बातों से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है, वह तो इस पार्टी के साथ मिलकर केरल में चुनाव लड़ती है। हालाँकि, ये इफ्तार एक तरह से थोड़ा अलग रहा। गाँधी परिवार के तीन बार लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी उनकी विक्ट्री साइन वाली तस्वीरें सामने आती हैं। इस इफ्तार की एक भी तस्वीर कॉन्ग्रेस ने साझा नहीं की। अब यह क्यों किया गया ये साफ़ नहीं है। लेकिन, कुछ चीजें जरूर साफ़ हैं और वह हैं कॉन्ग्रेस की हिन्दुओं से अलगाव की नीति, उसका मुस्लिम प्रेम और उसकी तुष्टिकरण की राजनीति को लेकर प्रतिबद्धता।

कर्नाटक विधानसभा में मुस्लिम कोटा बिल पास, कॉन्ग्रेस अब सरकारी ठेकों में मुसलमानों को देगी 4% रिजर्वेशन: BJP नेता विरोध में उतरे, विधेयक की कॉपी भी फाड़ी

भारी हंगामे के बीच शुक्रवार (21 मार्च 2025) को कर्नाटक विधानसभा में मुस्लिमों को सरकारी ठेके में 4 प्रतिशत कोटा देने का बिल पास हो गया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने बजट में इसकी घोषणा की थी और कुछ दिन पहले इसे कैबिनेट में मंजूरी दी थी। भाजपा ने इसे असंवैधानिक बताते हुए सदन में जमकर विरोध किया और कोर्ट में चुनौती देने की कसम खाई।

भाजपा के विधायकों ने विधानसभा के वेल में घुसकर सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस की सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ जमकर नारे लगाए। भाजपा नेताओं ने बिल की कॉपी को फाड़ दिया और स्पीकर पर कागज फेंके दिया। इतना ही नहीं, वे विधानसभा अध्यक्ष स्पीकर की सीट पर भी चढ़ गए। भाजपा नेताओं ने अपने विरोध प्रदर्शन का बचाव किया और कहा कि उन्होंने जो भी किया सही किया।

भाजपा विधायक भरत शेट्टी ने कहा, “हनी ट्रैप घोटाले पर चर्चा करने के बजाय मुख्यमंत्री मुस्लिमों को चार प्रतिशत आरक्षण का बिल पेश करने में व्यस्त थे। इसलिए हमने विरोध किया। सरकार पक्ष के विधायकों ने भी कागज फाड़े और हम पर किताबें फेंकी। हमने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया।” विपक्षी दल भाजपा ने सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया।

वहीं, सत्ताधारी कॉन्ग्रेस सरकार ने अपने कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह अल्पसंख्यकों के लिए सामाजिक न्याय और आर्थिक अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दरअसल, इस कानून में प्रावधान किया गया है कि मुस्लिम ठेकेदारों को सरकारी निविदाओं में 4 प्रतिशत कोटा मिलेगा। इससे वे सार्वजनिक अनुबंधों के लिए अधिक प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।

इससे पहले कर्नाटक के भाजपा के वरिष्ठ विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल ने बुधवार (19 मार्च 2025) को मुस्लिम कोटा विधेयक को खारिज करने की माँग करते हुए राज्यपाल थावरचंद गहलोत को एक चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने इसे असंवैधानिक बताया। बता दें कि इससे पहले बुधवार (19 मार्च) को कर्नाटक विधानसभा ने केंद्र के वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया।

उस समय भाजपा सदन से वॉकआउट कर चुकी थी। प्रस्ताव को कानून एवं संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने पेश किया था। पाटिल ने विधानसभा में प्रस्ताव पढ़ते हुए कहा, “यह सदन सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से आग्रह करता है कि वह वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 को तुरंत वापस लेकर देश की सर्वसम्मत राय का सम्मान करे, जिसमें ऐसे प्रावधान हैं जो संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।”

‘पत्नी का अकेले में पोर्न देखना, हस्तमैथुन करना जुर्म नहीं’: मद्रास हाई कोर्ट ने पति की तलाक वाली याचिका खारिज की, कहा- यह डिवोर्स का आधार नहीं

तलाक की माँग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा पोर्न देखना और हस्तमैथुन करना पति के लिए तलाक का आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि पोर्न में महिलाओं को अपमानजनक तरीके से दिखाया जाता है। लंबे समय तक पोर्न देखने से दर्शक पर नकारात्मक असर पड़ता है। इसलिए, यह नैतिक रूप से गलत हो सकता है, लेकिन निजी तौर पर इसे देखना अपराध नहीं है।

हाई कोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस आर. पूर्णिमा की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि निजी तौर पर पोर्न देखना अपराध नहीं है। पत्नी द्वारा अपने पति को शामिल किए बिना ही अकेले में पोर्न देखना वैवाहिक क्रूरता नहीं मानी जाएगी। साथ ही पत्नी पर हस्तमैथुन करने का आरोप भी तलाक का आधार नहीं है। इस तरह कोर्ट ने पति द्वारा तलाक की माँग वाली याचिका खारिज कर दी।

खंडपीठ ने 19 मार्च 2025 को दिए को दिए अपने फैसले में आगे कहा, “नैतिकता के व्यक्तिगत और सामुदायिक मानक एक बात है और कानून का उल्लंघन दूसरी बात है। केवल निजी तौर पर पोर्न देखना याचिकाकर्ता (पति) के लिए क्रूरता नहीं माना जा सकता। यदि पोर्न देखने वाला व्यक्ति अपने पति या पत्नी को साथ शामिल होने के लिए मजबूर करता है तो यह क्रूरता माना जाएगा।”

मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ ने आगे कहा, पोर्न देखने वाले पति या पत्नी के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।” हाई कोर्ट ने पोर्न की लत को लेकर आगे कहा, “यदि इस लत के कारण किसी के वैवाहिक दायित्वों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो यह कार्रवाई योग्य आधार प्रदान कर सकता है।” कोर्ट ने कहा कि पोर्न देखना या हस्तमैथुन करना महिला की यौन स्वच्छंदता है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायालय ने कहा कि किसी महिला से इस तरह के आरोप पर जवाब माँगना उसकी यौन स्वायत्तता का घोर उल्लंघन होगा। न्यायालय ने सवाल उठाया कि यदि एक महिला हस्तमैथुन करती है तो इसे इतना कलंकित क्यों माना जाता है, जबकि हस्तमैथुन करने वाले पुरुषों के साथ ऐसा कोई कलंक नहीं जुड़ा है।

कोर्ट ने कहा, “जब पुरुषों में हस्तमैथुन को आम माना जाता है तो महिलाओं द्वारा हस्तमैथुन को कलंकित नहीं माना जा सकता है। यह भी सच है कि पुरुष हस्तमैथुन करने के तुरंत बाद संभोग में शामिल नहीं हो सकते, लेकिन महिलाओं के मामले में ऐसा नहीं होता। यह स्थापित नहीं है कि अगर पत्नी को हस्तमैथुन की आदत है तो पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंध प्रभावित होंगे।”

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अगर शादी के बाद कोई महिला विवाहेतर संबंध बनाती है तो यह तलाक का आधार बन सकता है। हालाँकि, आत्म-सुख पाने के लिए पोर्न देखना और हस्तमैथुन करना तलाक का कारण नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि पत्नी के इन व्यवहारों को किसी तरह से नहीं कहा जा सकता है कि यह पति के प्रति क्रूरता है।

अपनी याचिका में पति ने यह भी दावा किया कि उसकी पत्नी यौन रोगों (STD) से पीड़ित है। हालाँकि, कोर्ट ने पाया कि पति ने केवल आयुर्वेदिक केंद्र की कुछ रिपोर्टों का हवाला दिया था। मेडिकल ब्लड टेस्ट रिपोर्ट के अभाव में कोर्ट ने पति के आरोप को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इन रोगों का पता सिर्फ खून जाँच से ही लगाया जा सकता है। कोर्ट ने इन दावों को अपुष्ट बताया।

खंडपीठ ने क्रांतिकारी कवि और कार्यकर्ता नामदेव ढसाल की पत्नी मल्लिका अमार शेख का उदाहरण भी दिया, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में बताया है कि कैसे उनके पति ने उन्हें यौन रोग दिए। इसको लेकर कोर्ट ने कहा, “क्या नामदेव ढसाल इस आधार पर तलाक की याचिका दायर कर सकते थे कि उनकी पत्नी एसटीडी से पीड़ित है? इसका जवाब ‘नहीं’ है।”

दरअसल, यह मामला तमिलनाडु के करूर जिले के एक व्यक्ति और उसकी पत्नी से जुड़ा है। दोनों की शादी जुलाई 2018 में हिंदू रीति-रिवाजों के तहत एक मंदिर में हुई थी। दोनों की यह दूसरी शादी थी। शादी के बाद दोनों को संतान भी नहीं है। दिसंबर 2020 में पति-पत्नी अलग हो गए। इस दौरान पत्नी से पति से भरण-पोषण की माँग की, जबकि पति ने तलाक की माँग की।

तलाक की माँग करते हुए पति ने फरवरी 2024 में करूर के पारिवारिक न्यायालय में एक याचिका दी। याचिका में उसने पत्नी पर आरोप लगाया था कि वह बहुत खर्चीली है। वह घरेलू काम करने से मना करती है और ससुराल वालों से बुरा व्यवहार करती है। इसके अलावा, वह पोर्न देखने की आदी है, हस्तमैथुन करती है और फोन पर लंबी बातचीत करती है। साथ ही वह यौन रोगों से ग्रसित है।

पारिवारिक न्यायालय ने पति के सभी तर्कों को सुनने के बाद उसकी याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि इसमें तलाक के लिए आधार नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ता पति ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले को साल 2024 मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी। हालाँकि, मद्रास हाई कोर्ट ने पति के तर्कों को एक बार फिर से खारिज कर दिया।