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रजिया खातून ने इस्लामी भीड़ को दिए हथियार, आरिफ-आसिफ ने महिलाओं का साड़ी-ब्लाउज खींचा: झारखंड में त्योहार पर जनजातीय समाज का उत्पीड़न, बंदूक भी लहराया

झारखंड की राजधानी राँची से सटे पिठौरिया के हेठबालू गाँव में सरना जनजातीय समुदाय के त्योहार सरहुल उत्सव के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों ने 1 अप्रैल को हमला कर दिया था। हमले में घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इस घटना के विरोध में जनजातीय समुदाय के लोगों ने गुरुवार (3 अप्रैल 2025) को राँची-पतरातू रोड को जाम कर दिया। सामने आए वीडियो में महिला ने छेड़छाड़ करने और बंदूक से गोली मारने का भी आरोप लगाया है।

महिलाओं का कहना है कि सरना पूजा करने जाने के दौरान इस्लामी भीड़ द्वारा उन पर लाठी-डंडे से हमला किया गया और कुल्हाड़ी-बंदूक आदि दिखाकर धमकी दी गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस हमले की मास्टरमाइंड रजिया खातून है। वहीं, आसिफ और आरिफ पर महिलाओं का ब्लाउज और साड़ी खींचकर उसे फाड़ने की कोशिश की।

इस घटना से जुड़ा एक वीडियो सामने आया है। इसमें जनजातीय समुदाय की महिलाएँ बता रही हैं कि उनके साथ इस्लामी कट्टरपंथी हमलावरों ने किस तरह दुर्व्यवहार किया। वीडियो में एक लड़की ने अपने कंधे और गले पर लगे चोटों के निशान दिखाते हुए बताया कि रजिया खातून ने उसके साथ मारपीट की है। दिखने में नाबालिग लगने वाली उस लड़की ने बताया कि यात्रा के दौरान पीछे से आसिफ/आरिफ ने उनका ब्लाउज खींच लिया।

महिला ने बताया कि यात्रा में इस्लामी हमले के दौरान उसके पति पर हमला कर दिया, जिसकी वजह से उसके सिर में गहरी चोट आई है। महिला का कहना है कि उसके पति के सिर में खून जमा होने का खतरा है। महिला ने आशंका जाहिर की कि अगर उसके पति को कुछ होता है तो वह अपने बच्चे को लेकर कहाँ जाएगी। उसने चेतावनी देने के अंदाज में कहा कि अगर उसके पति को कुछ हुआ तो वह छोड़ेगी नहीं।

महिलाओं का कहना है कि हमला करने वालों में उनके गाँव के साथ-साथ आसपास के गाँवों के मुस्लिम भी शामिल थे। महिलाओं ने बताया कि हमलावरों में रजिया खातून के अलावा आसिफ अंसारी, आरिफ अंसारी, गुलशन अंसारी, गुलजार अंसारी, जुल्फान अंसारी आदि लोग भी शामिल थे। महिला ने कुल्हाड़ी दिखाते हुए कहा कि उसी से उसके भतीजे पर हमला किया गया था।

सरना पूजा के लिए निकली जनजातीय महिलाओं में बच्चियाँ से लेकर बुजुर्ग महिलाएँ तक शामिल थीं। इनमें से किसी को नहीं बख्शा गया। सरना महिलाओं का आरोप है कि सरना पूजा के लिए उन्होंने झंडा लगा रखा था। रजिया खातून ने उन झंडों को निकाल कर फेंक दिया। महिलाओं का कहना है कि रजिया ने उनसे कहा, “इस रास्ते से नहीं जाना है। तुम लोगों (जनजातीय) को अब यहाँ नहीं रहना है।”

इतना ही नहीं, महिलाओं ने यह भी कहा कि जब कट्टरपंथी मुस्लिम हमला कर रहे थे, तब रजिया सबको लाठी-हथियार दे रही थी। एक दूसरी महिला ने कहा कि रजिया खातून खुद भी सरना जनजातीय लोगों पर पत्थर फेंक रही थी। महिलाओं का आरोप है कि रजिया खातून ने बेटे ने झगड़े की शुरुआत की थी। वहीं, आसिफ अंसारी बंदूक तानकर सबको गोली मारने की धमकी दे रहा था।

महिलाओं का आरोप है कि इस बार के ईद में मुस्लिमों ने सड़कों के ऊपर झालर बाँध दिया था। जब वे सरना के लिए जा रहे थे, तो उनके झालर में इनका झंडा लग गया था। इसके बाद इस्लामी भीड़ भड़क उठी थी और उन लोगों पर हमला कर दिया था। एक अन्य महिला का कहा मुस्लिम उनके त्योहार में झमेला करते हैं।

जनजातीय समुदाय में आक्रोश

इस घटना के विरोध में सरना समुदाय के लोगों ने राँची-पतरातू रोड को सुबह नौ बजे से जाम कर दिया। इसके साथ ही पिठौरिया बाजार की सभी दुकानों को भी बंद करा दिया। आक्रोशित लोगों ने हमलावरों की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। हालाँकि, पुलिस ने दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन लोगों का कहना है कि जब तक बाकी आरोपितों को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक प्रदर्शन जारी रहेगा।

पीड़ितों का आरोप है कि न सिर्फ उनकी शोभायात्रा को रोका गया, बल्कि पाहन (पुजारी) और अन्य लोगों के साथ मारपीट भी की गई। इस घटना में रवि पाहन, नगदेव पाहन, पईनभोरा मुंडा, संदीप मुंडा, विजय मुंडा, अजय मुंडा, अरविंद मुंडा, करण मुंडा घायल हो गए हैं। पीड़ितों ने बुधवार (2 अप्रैल 2025) को जाकर थाने में शिकायत दी, जिसके आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की।

FIR में पुलिस ने आदम अंसारी, आरिफ अंसारी, मिंटु अंसारी और जुएफा अंसारी को नामजद किया है। वहीं, कई अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। शिकायत में कहा गया है कि सरहुल की शोभायात्रा हेठबालू गाँव में हरगढ़ी स्थान पर पहुँची तो हमलावरों ने धारदार हथियारों से हमला कर दिया। हमलावर पहले से ही वहाँ घात लगाकर बैठे थे।

क्या है मामला?

दरअसल, मुस्लिम समाज के लोगों ने सड़क के दोनों तरफ झालर लगाया था। इसी दौरान जनजातीय समाज ने सरहुल के मौके पर पूजा वाले रास्ते में परंपरा के अनुसार सड़क के किनारे झंडा लगा दिया। एक दिन पूर्व भी दोनों पक्षों के बीच इसको लेकर तनातनी हो चुकी थी। 1 अप्रैल को जब सरहुल मनाने के लिए जनजातीय समाज के लोग जा रहे थे मुस्लिमों के लगाए झालर में ट्रैक्टर में फँसकर टूट गया।

इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने उन पर लाठी-डंडे, ईंट-कुल्हाड़ी से हमले कर दिए। सरहुल शोभायात्रा का नेतृत्व कर रहे पाहन सहित 8 लोग इस हिंसा में घायल हुए हैं। वहीं मुस्लिम समाज का कहना है कि उनकी तरफ भी 4 लोगों को चोटें आई हैं। उसे पकड़ के पुलिस को सौंप दिया गया है। डीएसपी अमर कुमार पांडेय का कहना है कि साज-सज्जा को लेकर दोनों पक्षों में झड़प हुई थी।

पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शासनकाल में समुदाय विशेष का दुस्साहस बढ़ गया है। हेमंत सोरेन न तो सरना स्थलों की रक्षा कर पा रहे हैं, न ही सरहुल उत्सव की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहे हैं। उन्होंने सरहुल जुलूस में बाधा उत्पन्न करने वाले उपद्रवियों पर बिना विलंब सख्त कारवाई करने की अपील राँची पुलिस से की है।

बाबूलाल मरांडी ने कहा, “हेमंत सोरेन जी, फिर एक नौटंकी कीजिए – जैसे आपने पहले सरना स्थल आंदोलनकारियों पर मुक़दमा दर्ज कराया, फिर कार्रवाई रोक कर वाहवाही बटोरने का प्रयास किया। ठीक उसी तरह अब जनजातियों से प्राथमिकी दर्ज कराइए, फिर उसे निरस्त कर वाहवाही बटोरिए। ऐसे ही कुटिल राजनीति के माध्यम से जनजातीय समाज को बेवक़ूफ़ बनाकर भ्रमित करते रहिए।”

50 साल पहले अपनाया था इस्लाम, अब 10 लोगों के परिवार ने हिन्दू धर्म में की घर-वापसी: कहा – हमारे पूर्वज सनातनी थे, अब सुधार ली ग़लती

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक मुस्लिम परिवार के 10 सदस्यों ने हिंदू धर्म में घर-वापसी की। गुरुवार (3 अप्रैल, 2025) सुबह बघरा के योग साधना यशवीर आश्रम में स्वामी यशवीर महाराज ने हवन-यज्ञ करवाकर इनलोगों की शुद्धि कराई। परिवार ने 50 साल पहले इस्लाम मजहब अपनाया था। अब उन्होंने कहा हैं कि ये गलती थी, अब हम पूर्वजों के सनातन धर्म में वापस लौटना चाहते हैं।

आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज और आचार्य मृगेन्द्र ब्रह्मचारी ने वैदिक मंत्रों के साथ शुद्धिकरण यज्ञ संपन्न कराया। परिवार के सभी सदस्यों ने घी और सामग्री की आहुतियाँ दी। इस दौरान परिवार के सभी 10 सदस्यों ने इस्लामिक नाम त्याग कर हिंदू नाम अपनाए। परिवार की मुखिया फेमिदा अब राजकुमारी बन गई है। उनका बेटा दिलजान बृजेश कश्यप और उसकी पत्नी महक कविता बन गई है। फेमिदा की पोती रेशमा पूजा, पलक सविता, आलिया पायल, सना कुमारी सोनिया, खुशनुमा कुमारी साधना, पोता अरमान अमित कश्यप और इस्लाम विक्रम सिंह बन गए हैं।

बता दें कि देवबंद के कश्यप राजपूत परिवार की महिला ने 50 साल पहले मुस्लिम शख्स से शादी की थी, जिसके बाद वो फेमिदा बन गई। फेमिदा ने बताया, “मैं ज्यादा समय अपने मायके में बिताती थी। इससे ससुराल वालों को ऐतराज रहता था। कुछ वर्ष पहले पति की मौत हो गई। इसके बाद से ही ससुराल वालों ने मायका छोड़कर ससुराल में रहने का दबाव बनाने लगे। मेरे बच्चों को भी वो परेशान करते हैं। बच्चे महाराष्ट्र गए हुए हैं। वो साल छह महीने में आते हैं। उन्हें मेरे हिंदू धर्म में रहने से भी परेशानी थी। अब मैंने हिंदू धर्म में वापसी कर ली है, मेरे साथ-साथ परिवार ने भी ये कदम उठाया है।”

फेमिदा ने बताया, “अब मेरा नाम राजकुमारी है। 50 साल पहले ग़लती हुई थी। मेरा कोई भाई नहीं था। हम पाँच बहनें थीं, इसीलिए मजबूरी थी। अब अपने धर्म में वापस आ गई हूँ। काफी खुश हूँ। ईद के बाद धर्म में वापस आने का संकल्प लिया था। अब पूरा हो गया है।”

आश्रम के पीठीधीश्वर स्वामी यशवीर महाराज ने बताया, “देवबंद के निवासी मुस्लिम परिवार से थे। ये लोग यहाँ आश्रम में आए और कहने लगे कि हमने इस्लाम मजहब छोड़ दिया है, सनातन धर्म को स्वीकार कर लिया है। शुद्धि यज्ञ के माध्यम से बड़ी श्रद्धा से सनातन धर्म में घर वापसी कर ली है। यह कश्यप जाति से हैं। 5000 मुस्लिम हिंदू धर्म में वापसी करना चाहते हैं जिन्होंने किसी भी वजह से वर्षों पूर्व इस्लाम मजहब को अपना लिया था।”

‘सभी मुस्लिम पहले हिंदू थे’

स्वामी यशवीर महाराज ने कहा, “भारत में रहने वाले सभी मुस्लिम पहले हिंदू थे। इस्लामी हुकूमत में उनके पूर्वजों पर अत्याचार हुए। कई ने लालच में आकर सनातन धर्म छोड़ दिया। किसी ने भी खुशी या इस्लाम की शिक्षा से प्रभावित होकर इसे नहीं अपनाया। हमारी सभी कन्वर्टेड मुस्लिमों से अपील है कि वे अपने पूर्वजों की गलती सुधारें। सभी सनातन धर्म में लौट । अब देश में भय का माहौल नहीं है। भाजपा सरकार अच्छा काम कर रही है। लाखों-करोड़ों मुस्लिम इस्लाम छोड़ चुके हैं। जो मुस्लिम हिंदू धर्म में आना चाहते हैं, हम उनका स्वागत करते हैं।”

फिल्मों में जगाया राष्ट्रवाद, इमरजेंसी के विरुद्ध उठाई आवाज: दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार का 87 की उम्र में निधन, राष्ट्रपति से लेकर PM मोदी दुखी

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार का शुक्रवार (4 अप्रैल 2025) तड़के मुंबई के कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल में निधन हो गया। राष्ट्रपति मुर्मू और पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है।

पीएम मोदी ने एक्स पर लिखा है, “महान अभिनेता और फिल्मकार मनोज कुमार जी के निधन से बहुत दुख हुआ। वे भारतीय सिनेमा के प्रतीक थे, जिन्हें खास तौर पर उनकी देशभक्ति के जोश के लिए याद किया जाता था।”

बॉलीवुड गमगीन

बॉलीवुड में भी शोक की लहर है। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अशोक पंडित के मुताबिक, “दादा साहब फ़ाल्के पुरस्कार विजेता और भारतीय फ़िल्म जगत के दिग्गज कलाकार मनोज कुमार का निधन फिल्म जगत के लिए बड़ी क्षति है। पूरी इंडस्ट्री उनको याद करेगी।”

बॉलीवुड में देशभक्ति की आवाज बने

मनोज कुमार अपने राष्ट्रवादी फिल्मों के लिए जाने जाते थे और भारत कुमार के रूप में प्रख्यात हुए। उपकार, क्रांति, शहीद, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी राष्ट्रवादी और सामाजिक सरोकार से जुड़ी उनकी प्रमुख फिल्में रहीं। मनोज कुमार का नाम हरिकृष्ण गोस्वामी था। उनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के ऐबटाबाद में 1937 में हुआ।

सत्ता के खिलाफ कोर्ट पहुँचे और जीता

मनोज कुमार उन नेताओं में शुमार थे जिन्होने सत्ता के खिलाफ बोलने की हिम्मत दिखाई। उन्होने इमरजेंसी का विरोध किया जिसकी वजह से उनकी फिल्मों ‘दस नंबरी’ और ‘शोर’ पर तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने रोक लगा दी। हालाँकि कोर्ट में सरकार के खिलाफ उन्होने केस जीतकर अपने अभियान को आगे बढ़ाया। फिल्म शोर को सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले दूरदर्शन पर दिखाया गया, जिसकी वजह से फिल्म ज्यादा कमाई नहीं कर पाई। इससे मनोज कुमार को काफी धक्का लगा क्योंकि फिल्म के एक्टर, निर्देशक और निर्माता वही थे।

सरकार के ऑफर को ठुकराया भारत कुमार ने

यहाँ तक कि जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उन्हें एक फिल्म की पेशकश की तो सरकार के इस ऑफर को मनोज कुमार ने ठुकरा दिया था। आर्थिक तंगी के बीच भारत कुमार का ये फैसला उनके दृढ़निश्चयी होने का प्रमाण है।

वक्फ बिल दोनों सदनों में पास, 12 घंटे चर्चा के बाद राज्यसभा में पड़े 128 वोट: मुस्लिम संगठन भड़के, ओवैसी ने भी लोकसभा में तिलमिलाकर फाड़ी थी विधेयक की कॉपी

लोकसभा के बाद वक्फ संशोधन बिल गुरुवार (4 अप्रैल 2025) की रात राज्यसभा में भी पास हो गया। इस विधेयक के पक्ष में 128 सांसदों ने वोट दिया, जबकि विरोध में 95 वोट पड़े। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद इस बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद नोटिफिकेशन जारी होते ही यह बिल कानून बन जाएगा।

राज्यसभा में इस पर लगभग 12 घंटे इस पर बहस हुई थी। विधेयक पर विपक्ष की ओर से कई संशोधन पेश किए गए, जिसे सदन ने खारिज कर दिया। बता दें कि बुधवार (3 अप्रैल 2025) की रात को लोकसभा में भी लगभग 12 घंटे तक बहस के बाद इसे पारित किया गया था। लोकसभा में इस विधेयक के पक्ष में 288 वोट पड़े थे, जबकि विरोध में 232 वोट पड़े थे।

अंतिम समय में ओडिशा की बीजू जनता दल (BJD) ने सरकार का समर्थन किया। इससे पहले BJD ने बिल का कड़ा विरोध किया था और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताया था। हालाँकि, बाद में पार्टी ने अपने सांसदों को इच्छा के अनुसार पक्ष में या विपक्ष में वोट करने की अनुमति दी। पार्टी ने कोई व्हिप जारी नहीं किया था और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर निर्णय लेने को कहा था।

दरअसल, वर्तमान में राज्यसभा सदस्यों की संख्या 236 हैं। बहुमत का आँकड़ा 119 है। वहीं, राज्यसभा में के सासंदों की कुल संख्या 98 सांसद हैं, जबकि NDA के सदस्यों की संख्या 118 है। वहीं, 6 मनोनीत सदस्य भी हैं। इस तरह NDA के पक्ष में कुल 124 संख्या है। राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के 27 सांसद हैं। अगर इंडी गठबंधन की बात करें तो यह संख्या 88 पहुँच जाती है।

राज्यसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक-2025 पर चर्चा का जवाब देते हुए अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक वैधानिक निकाय है। इस कारण से इसे धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। रिजिजू ने कहा कि मुस्लिमों की भावनाओं को देखते हुए फिर भी हमने गैर-मुस्लिमों की संख्या सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ वक्फ विधेयक से मुस्लिमों को डरा रही हैं।

विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के अधिकांश सदस्य सदन से नदारद रहे। वहीं, सत्ता पक्ष सदस्य मौजूद रहे। बिल को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाल रखा था। चर्चा के दौरान कई बार खड़े होकर उन्होंने हस्तक्षेप किया। कॉन्ग्रेस सांसद नासिर हुसैन को टोकते हुए उन्होंने कहा कि अब तक ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती थी, लेकिन विधेयक में ऐसा नहीं है।

मुस्लिम संगठनों के पास क्या है आगे का रास्ता

मुस्लिम संगठनों एवं सांसदों के विरोध के बीच वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में पास हो गया। लोकसभा में AIMIM के मुखिया ने इस बिल को फाड़ दिया था। अब ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) इसके खिलाफ कोर्ट जा सकता है। लखनऊ ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी इसका संकेत दिया है।

फिरंगी महली ने कहा, “हमारे लिए कोर्ट का दरवाजा खुला है। इनमें से कई प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 29 के खिलाफ हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि कोर्ट से हमें इंसाफ मिलेगा।” उन्होंने कहा कि AIMPLB के साथ ही अन्य संस्थाओं ने जो सुझाव JPC के सामने रखे थे, उन्हें इस बिल में शामिल नहीं किया गया है।

जब लगातार 9 घंटे चला हिन्दुओं का कत्लेआम… मस्जिद की छतों से आग के गोले फेंकती थी पाकिस्तानी फ़ौज, कतार में खड़ा करा के बरसाई गोलियाँ

ये घटना तब की है, जब बांग्लादेश ‘पूर्वी पाकिस्तान’ हुआ करता था, पाकिस्तान का एक हिस्सा। वहाँ आज़ादी का आंदोलन चल रहा था। उसे कुचलने के लिए पाकिस्तानी फ़ौज क्रूरता की हर सीमा पार कर रही थी। न केवल बंगाली बोलने वाले लोगों, बल्कि उनके साथ-साथ बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को भी निशाना बनाया जा रहा था। उन्हीं वीभत्स घटनाओं में से एक है जिंजीरा का नरसंहार।

जिंजीरा नरसंहार 1971 में ‘बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन’ के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा योजनाबद्ध तरीके से की गई हिन्दुओं के नरसंहार की दास्ताँ है। यह हत्याकांड ढाका से बूढ़ीगंगा नदी के आसपास केरानीगंज उपजिला के जिंजीरा, कालिंदी और शुभद्या जैसे स्थानों पर हुआ, जिसमें एक ही रात में करीब 5000 हिन्दुओं की हत्या कर दी गई थी।

हिन्दुओं का कत्लेआम, हजारों महिलाएँ बलात्कार की शिकार

इसकी जानकारी बांग्लादेश में उस वक्त मौजूद अमेरिकी वकील आर्चर ब्लड के कई टेलीग्रामों से भी मिलती है, जिसमें उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से तत्काल हस्तक्षेप करने की माँग की थी। उन्होंने लिखा था, “पाकिस्तानी सेना के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम योजनाबद्ध तरीके से ग़रीब लोगों के घरों पर हमला कर रहे हैं और बंगालियों और हिंदुओं की हत्या कर रहे हैं।”

एक अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना ने 1970 के दशक में कई नरसंहार किए जिसमें हिंदू पुरुषों, पेशेवरों और बुद्धिजीवियों को मारा गया। इस दौरान 20,000 से 40,000 महिलाएँ बलात्कार की शिकार हुईं।

पाकिस्तान का ‘खूनी खेल’

पाकिस्तानी सेना ने योजनाबद्ध तरीके से मुक्ति आंदोलन में शामिल लोगों के खिलाफ जमकर रक्तपात मचाया। इस दौरान धर्म को आधार बनाया गया और हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया। 1971 के भारत-पाक युद्ध के बीज 25 मार्च, 1971 को ही पड़ गए थे, जब पाकिस्तानी सेना ने शेख मुजीबुर्रहमान की ‘अवामी लीग’ के नेतृत्व वाले मुक्ति आंदोलन को दबाने के लिए ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया।

पूर्वी पाकिस्तान को खोने के कगार पर पहुँचा पाकिस्तान बौखलाया हुआ था। ये हिस्सा पाकिस्तान की मुख्य भूमि से 1600 किलोमीटर (990 मील) दूर था, इसीलिए इसे नियंत्रित करने में दिक्कतें आ रही थी। इससे गुस्साए पाकिस्तान ने बांग्लादेश पर अपनी कम होती पकड़ को बनाए रखने के लिए आखिरी कोशिश के रूप में जमकर खूनी खेल खेला। परिणाम ये हुआ कि गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया और 1 करोड़ से ज़्यादा शरणार्थी भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए। खास तौर पर पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे बांग्लादेश से सटे राज्यों में।

आत्मसमर्पण के लिए मजबूर हुआ पाकिस्तान

9 महीने के आंतरिक संघर्ष और बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना के लगातार हमले के बाद भारत के साथ निर्णायक युद्ध शुरू हुआ। 13 दिनों के भीतर, भारतीय सेना ने एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की, जिससे 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को शर्मनाक हार के बाद आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद पूर्वी पाकिस्तान का बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र के तौर पर उदय हुआ। बांग्लादेश के बनने में वहाँ के हिन्दुओं के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए पाकिस्तान ने मुक्ति वाहिनी के हिन्दू नेताओं और समर्थकों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतार दिया। ऐसे ही नरसंहारों में एक था जिंजीरा नरसंहार।

जिंजीरा नरसंहार की वो काली रात

2 अप्रैल, 1971 की रात पाकिस्तान के सरकारी टीवी चैनल ने बूढ़ीगंगा की दूसरी तरफ केरानीगंज के जिंजीरा में शरण लिए हुए मुक्ति वाहिनी समर्थकों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाने का ऐलान किया। 3 अप्रैल को मॉर्निंग न्यूज ने शीर्षक दिया, “जिंजीरा में उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई।”

हुआ यूँ कि पाकिस्तानी सेना ने 2 अप्रैल की आधी रात से केरानीगंज के आसपास सैनिकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। इन इलाकों के आसपास मुख्य रूप से हिन्दू परिवार रहते थे। उन्होंने नदी के किनारे स्थित मिटफोर्ड अस्पताल पर कब्जा कर लिया। सुबह करीब 5 बजे उन्होंने अस्पताल से सटी मस्जिद की छत से आग के गोले फेंकना शुरू किया और जिंजीरा में घुस गए। पूरे इलाके को कँटीली तारों से घेर दिया गया था, ताकि कोई भाग न सके।

पाकिस्तानी सेना लगातार लोगों पर गोलियाँ चला रही थी। यह नरसंहार करीब नौ घंटे तक चला। इस दौरान नांदेल डाक गली के एक तालाब के किनारे 60 लोगों को कतार में खड़ा करके गोली मार दी गई। सैनिकों ने बम बरसाए और घरों में घुसकर मौत का तांडव मचाया। इस नरसंहार में हज़ारों लोग मारे गए।

कब्र में छिप गए थे लोग

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना ने कम से कम 5000 नागरिकों को मार डाला। जिंजीरा, कालिंदी जैसे इलाके आवामी लीग के गढ़ थे। पाकिस्तानी सेना द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सर्च लाइट’ के बाद ढाका से बूढ़ीगंगा नदी पार कर बड़ी संख्या में हिन्दू यहाँ आए थे। ये लोग अवामी लीग के समर्थक थे।

बांग्लादेश में संयुक्त राष्ट्र मिशन के पूर्व प्रेस काउंसलर रहे अब्दुल हन्नान भी उन लोगों में शामिल थे जो घटना के दौरान वहाँ छिपे हुए थे। उन्होंने भी इस घटना का जिक्र डेली स्टार से किया है।

मुसलमानों को पाकिस्तानी सेना ने छोड़ा

हन्नान ने लिखा, “गोली दाहिनी तरफ से आ रही थी, इसलिए परिवार के साथ उत्तर की तरफ भागा। थोड़ी दूर चलने के बाद लगा उत्तर से गोली आने लगी तो पूर्व की ओर भागा, लेकिन फिर पता चला कि चारों ओर से गोली चल रही है। हम भागकर मस्जिद के पास पहुँचे। उसके पीछे एक कब्रिस्तान था। लोग कब्रों में छिपे हुए थे” हन्नान के मुताबिक, उनके पिता ने बताया कि पाकिस्तानी सैनिकों ने उनपर बंदूक तान दी थी लेकिन अल्लाह का नाम लेते ही उन्हें छोड़ दिया।

इसी तरह की एक और घटना ढाका के शंखरीबाजार में हुई। वह भी हिन्दू इलाका माना जाता था। यहाँ शंख की पारंपरिक चूड़ियाँ बनाई जाती थी। पाकिस्तानी सेना ने करीब 126 हिन्दुओं के घरों को घेर लिया और लोगों की एक एक कर गोली मार दी। घटना के बाद शंखरीबाजार वीरान हो गया।

चीनी नागरिकों से शारीरिक और प्रेम संबंध बनाने पर रोक, अमेरिका ने राजदूतों के लिए लागू किए सख्त नियम-क़ानून: नहीं माने तो छोड़नी होगी नौकरी

अमेरिकी सरकार ने चीन में तैनात अपने सरकारी अधिकारियों, उनके परिवारों और सुरक्षा मंजूरी प्राप्त ठेकेदारों के लिए सख्त प्रतिबंध लागू किया है। अब वे किसी भी चीनी नागरिक के साथ प्रेम संबंध या शारीरिक संबंध नहीं बना सकेंगे। इस नीति को जनवरी में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स ने लागू किया था।

AP (एसोसिएट प्रेस) के अनुसार, पिछले साल एक सीमित नीति लागू की गई थी, जिसमें अमेरिकी अधिकारियों को चीन में अपने दूतावास में काम वाले चीनी नागरिकों, जैसे सुरक्षा गार्ड और अन्य सहायक कर्मचारियों के साथ रिश्ते रखने से रोका था। लेकिन अब यह प्रतिबंध अमेरिकी दूतावास और वाणिज्य दूतावासों में लागू होगा। इसमें बीजिंग स्थित अमेरिकी एम्बेसी और ग्वांगझू, शंघाई, शेनयांग और वुहान स्थित वाणिज्य दूतावास शामिल हैं। इसके अलावा, यह नियम हांगकांग स्थित वाणिज्य एम्बेसी में भी लागू होगा।

हालाँकि, जिन अधिकारियों के पहले से चीनी नागरिकों के साथ संबंध हैं, वे छूट के लिए आवेदन कर सकते हैं। अगर उनका आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो उन्हें अपने संबंध खत्म करने होंगे या अपनी नौकरी ही छोड़नी होगी।

क्यों लगाया गया प्रतिबंध?

अमेरिकी सरकार ने पहले भी ऐसे प्रतिबंध लगाए हैं। 1987 में सोवियत संघ और चीन में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को स्थानीय नागरिकों (महिलाओं/पुरुषों) से दोस्ती करने, डेट करने या संबंध बनाने से रोक दिया गया था। इसकी वजह एक मामला था, जिसमें मॉस्को में तैनात एक अमेरिकी मरीन को सोवियत की महिला जासूस ने प्रेम-संबंध बनाकर फँसाया था।

खुफिया एजेंसियाँ अक्सर आकर्षक पुरुषों और महिलाओं का इस्तेमाल कर गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश करती हैं। यह विशेष रूप से शीत युद्ध के दौरान काफी आम था। अमेरिका का मानना है कि चीन अभी भी इस तरह की रणनीतियों का इस्तेमाल कर रहा है।

चीन कर रहा ‘हनीपॉट’ का उपयोग

अमेरिकी राजनयिकों और खुफिया विशेषज्ञों के अनुसार, चीन अमेरिकी रहस्यों तक पहुँचने के लिए ‘हनीपॉट’ तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। पोस्टिंग से पहले, अमेरिकी अधिकारियों को ये जानकारी दी जाती है कि चीनी खुफिया एजेंसियां सुंदर महिलाओं को उनके करीब भेज सकती हैं। इसके अलावा, किसी भी महत्वपूर्ण अमेरिकी राजनयिक पर दर्जनों चीनी सुरक्षा एजेंट नजर रख सकते हैं।

अमेरिकी अधिकारियों को इस नए प्रतिबंध की जानकारी जनवरी में मौखिक और इलेक्ट्रॉनिक रूप से दी गई थी। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई है। इससे पहले, चीन में तैनात अमेरिकी अधिकारियों को अपने चीनी नागरिकों के साथ किसी भी करीबी संपर्क की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देने की आवश्यकता होती थी लेकिन उस पर पूरा प्रतिबंध नहीं था।

खतरे में है हर हिंदू, सरकारी सुरक्षा के भरोसे हम जीवनभर नहीं बैठ सकते… पर कवर्धा का ‘सुरक्षा मॉडल’ आत्मसात तो कर ही सकते हैं

यदि आपको लगता है कि कासगंज के चंदन गुप्ता का ही परिवार खतरे में है तो आप गलत हैं। यदि आपको लगता है कि खतरा केवल नुपुर शर्मा तक ही सीमित है तो आप गलत हैं। यदि आपको लगता है कि कमलेश तिवारी, कन्हैया लाल तेली, उमेश कोल्हे की हत्या के बाद ‘सर तन से जुदा’ का खतरा आपके ऊपर से टल चुका है तो भी आप गलत हैं।

खतरा तो कथित गंगा-जमुनी तहजीब का राग अलापने वाले, जय भीम-जय मीम का नारा लगाने वाले, मुगलों में सेकुलरिज्म का अब्बा देखने वाला हिंदुओं को भी है। क्योंकि सारे हिंदू काफिर हैं। लिबरल, वामपंथी, दलित चिंतक, सेकुलर जैसे टैग्स की भूमिका उनकी सूची में आपका नाम थोड़ा नीचे दर्ज करवाने तक ही सीमित है।

यह खतरा केवल कुछ गलियों, गाँवों, शहरों, जिलों, प्रांतों तक भी सीमित नहीं है। वे गह-गह पसरे हुए हैं। आपसे यह खतरा उतना ही दूर है, जितना एक मुस्लिम को मुस्लिम भीड़ का हिस्सा बनने में लगना है। इस खतरे को भाँपकर, हमें सुरक्षित रखने के लिए सरकारें (यदि वह तुष्टिकरण वाली न हो तो) सख्त कानून बना सकती हैं। किसी व्यक्ति/परिवार पर खतरों का आकलन कर उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है।

पर यह संभव नहीं है कि हर हिंदू को सरकार सुरक्षा दे। यह भी संभव नहीं है कि जो व्यक्ति/परिवार ऐसे खतरों में घिरा हो उसे जीवनभर सुरक्षा दी जाए। ऐसा करना उस व्यक्ति/परिवार के जीवन को भी कठिन बना देगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि हम हिंदू क्या करें? वह व्यक्ति/परिवार क्या करे जिसका शिकार करने को इस्लामी कट्टरपंथी घात लगाए बैठे हैं? इसका मुकम्मल जवाब दे पाना तो कठिन है। पर कवर्धा के हिंदुओं ने जिस तरह दुर्गेश देवांगन के परिवार की सुरक्षा की है, उस मॉडल को आगे बढ़ाकर हम काफी हद तक इस खतरे को कम अवश्य कर सकते हैं।

कवर्धा में क्या हुआ था?

2021 में छत्तीसगढ़ के कवर्धा में करमा माता मंदिर पर लगे भगवा ध्वज को इस्लामी कट्टरपंथियों ने फाड़कर फेंक दिया था। इसका विरोध करने पर दुर्गेश देवांगन नाम के युवक को बेरहमी से पीटा गया। हिंदुओं पर पत्थरबाजी हुई। उस समय राज्य में भूपेश बघेल के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही थी। स्थानीय विधायक मोहम्मद अकबर उस सरकार का प्रभावशाली मंत्री था।

इसका असर पुलिसिया कार्रवाई में भी दिखा। कथित तौर पर थाने लाकर भी हिंदुओं को पीटा गया। दुर्गेश देवांगन का तो कई दिनों तक पता भी नहीं चला था। यह भी आरोप है कि पुलिस के साथ तलवार लेकर इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर घूम रहे थे। कर्फ्यू और जबरन बल प्रयोग कर हिंदू संगठनों के नेताओं को कवर्धा पहुँचने से रोका गया। स्थानीय हिंदुओं की मानें तो हिंदुओं के इस दमन को मोहम्मद अकबर का पूर्ण समर्थन था। मोहम्मद अकबर को भूपेश बघेल का संरक्षण था। कवर्धा से लेकर रायपुर तक व्यवस्था में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो हिंदुओं की व्यथा सुने। सुनी भी नहीं गई।

हिंदुओं के आत्मबल का प्रतीक है धर्म ध्वजा चौक

आज छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है। कवर्धा के विधायक विजय शर्मा राज्य के उप मुख्यमंत्री हैं। मोहम्मद अकबर और उसको संरक्षण देने वाले भूपेश बघेल की हनक 2023 के विधानसभा चुनावों में जनता निकाल चुकी है। ऐसे में आपको शायद यह अनुभूति न हो कि 2021 की उस घटना के बाद से चुनाव के नतीजे आने तक, कवर्धा के हिंदू किस खतरे के बीच रह रहे थे। किन तरह के खतरों के बीच दुर्गेश देवांगन और उसका परिवार एक-एक दिन काट रहा था।

मैं 2021 की उस घटना के करीब एक साल बाद कवर्धा गया था। उस समय हिंदुओं ने अपने आत्मबल से करमा माता मंदिर के पास धर्म ध्वजा चौक बना ली थी। 108 फीट ऊँचा भगवा ध्वज लहरा रहा था। इससे कुछ ही कदमों की दूरी पर दुर्गेश देवांगन के पिता की आलू, प्याज और मसालों की दुकान थी। दुकान के शटर पर बजरंगबली विराजमान थे तो साइनबोर्ड पर राम का नाम अंकित था। दुकान पर पहुँचते ही मेरा अभिवादन ‘जय श्रीराम’ के साथ हुआ था। यकीन मानिए मुझे भी उस समय वहाँ के हिंदुओं पर मंडरा रहे खतरों की अनुभूति नहीं हो पाई थी। मुझे भी लगा कि 2021 की घटना शायद उतनी भयावह नहीं थी, जैसा वहाँ से आए वीडियो को देखकर और कवर्धा के लोगों से फोन पर बातचीत से प्रतीत होती थी।

हिंदू ही हिंदू का बना सुरक्षा कवच

लेकिन जब मैंने दुर्गेश देवांगन के परिवार और स्थानीय हिंदुओं से बातचीत करना प्रारंभ किया तो पता चला कि हमारी जानकारी से कहीं अधिक बुरे तरीके से 2021 में हिंदुओं का दमन किया गया था। उनकी आवाज कुचल दी गई थी। साल भर बाद भी हिंदुओं को डराने धमकाने का सिलसिला जारी था। पुलिस तमाशबीन बनी हुई थी।

दुर्गेश के पिता संतोष देवांगन ने ऑपइंडिया को बताया था, “विधायक का करनी है पूरा। जब मेरा लड़का मार खाया तो पीटने वालों के साथ अकबर (विधायक मोहम्मद अकबर) का लड़का भी था। अब हम पर राजीनामे का दबाव बनाया जा रहा है।” संतोष देवांगन ने बताया कि उस घटना के बाद एक तरफ उनके बेटे का पता नहीं चल रहा था, दूसरी तरफ उनके घर के बाहर पुलिस का पहरा बिठा दिया गया। परिवार की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार के लोग न किसी से मिल सके और न कोई उनसे मिल सके।

विश्व हिंदू परिषद के कबीरधाम जिले के कार्यकारी अध्यक्ष कैलाश शर्मा ने ऑपइंडिया को बताया था कि पहले सुनियोजित तरीके से हिंदुओं पर हमले की घटना को अंजाम दिया गया। फिर स्थानीय स्तर पर जो भी हिंदुओं के पक्ष में खड़ा हुआ मोहम्मद अकबर के इशारे पर उसका दमन किया गया। इसका असर यह था कि सालभर बाद भी हिंदू भयभीत थे।

जिन हिंदुओं की उस समय गिरफ्तारी हुई थी उनमें आज के डिप्टी सीएम विजय शर्मा भी थे। जब हम दुर्गेश के परिवार से बातचीत कर रहे थे, उस समय भी वे अचानक से उस परिवार का हाल जानने के लिए आए थे। संतोष देवांगन ने बताया कि जब से शर्मा जेल से बाहर आए है, कवर्धा में रहते हुए कोई भी ऐसा दिन नहीं बीतता, जब वे उनके परिवार का हाल जानने खुद नहीं आते। कवर्धा से बाहर रहने पर भी वे फोन के जरिए उनके परिवार के संपर्क में बने रहते हैं।

देवांगन के मुताबिक विहिप और अन्य हिंदू संगठनों के पदाधिकारी भी नियमित रूप से उनका और उन जैसे पीड़ितों की इसी तरह चिंता करते हैं। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था कि धमकियों और खतरों के बीच हिंदुओं का यह सहयोग उनके परिवार के लिए बड़ा बल है। इसके कारण ही उनका जीवन सामान्य हो पाया है। वे निश्चिंत होकर दुकान चला पा रहे हैं। ऑपइंडिया से बातचीत में कुछ और पीड़ित हिंदुओं ने भी इसी तरह का सहयोग मिलने की पुष्टि की थी।

कवर्धा का यह सुरक्षा मॉडल हमें क्या बताता है?

कवर्धा के इस सुरक्षा मॉडल में हम हिंदुओं के लिए सीधा संदेश यह है कि सरकार और तंत्र के भरोसे बैठे रहना ठीक नहीं है। बाहरी मदद की उम्मीद नहीं रखनी है। स्थानीय स्तर पर ही यदि हम नियमित रूप से केवल एक-दूसरे की सुरक्षा की चिंता करने लगे तो कैसी भी प्रतिकूल परिस्थिति में हम परिस्थिति बदल सकते हैं। खतरे से घिरे हिंदू परिवार का जीवन सामान्य कर सकते हैं। मार डाले जाने के भय से घर बैठने की जगह, उन्हें अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए उसी बाजार में निश्चिंत होकर व्यवसाय करने को प्रेरित कर सकते हैं, जहाँ से वे कट्टरपंथियों के निशाने पर आए थे।

वैसे भी सत्य यही है कि इस्लामी कट्टरपंथ के खतरे को कम करना ही हमारे हाथ में है। एक-दूसरे का सुरक्षा कवच बनना ही हमारे हाथ में है। क्योंकि जब तक इस्लाम है, जब तक हिंदू काफिर हैं, इस खतरे को कम ही किया जा सकता है, उसका समूल नाश संभव नहीं है।

BIMSTEC में भाग लेने बैंकॉक पहुँचे PM मोदी: रामायण का मंचन देख हुए गदगद, थाईलैंड ने रामकथा के सम्मान में जारी किया स्पेशल स्टाम्प

देश में वक्फ संशोधन बिल को लेकर राज्यसभा में चर्चा जारी है। इस बीच गुरुवार (3 अप्रैल) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी BIMSTEC की बैठक में भाग लेने के लिए दो दिवासीय थाईलैंड की यात्रा पर राजधानी बैकॉक पहुँचे। वहाँ भारतीय समुदाय ने प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। पीएम मोदी ने वहाँ थाई रामायण ‘रामाकियेन’ का प्रदर्शन देखा। इस दौरान वे बेहद प्रसन्न नजर आए।

पीएम मोदी ने कहा, “ऐसा सांस्कृतिक जुड़ाव किसी और से नहीं मिलता। थाई रामायण रामकियेन का एक आकर्षक प्रदर्शन देखा। यह वास्तव में बेहद समृद्ध अनुभव था, जिसने भारत और थाईलैंड की साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को खूबसूरती से प्रदर्शित किया।” पीएम मोदी ने कहा कि रामायण एशिया के इतने सारे हिस्सों में दिलों और परंपराओं को जोड़ने का काम करता है।

कार्यक्रम के दौरान थाईलैंड के छात्रों के एक समूह ने भरतनाट्यम और थाईलैंड के प्रसिद्ध नृत्य ‘खोन’ को मिलाकर रामकियेन का प्रदर्शन किया। इस दौरान थाईलैंड ने रामायण पर एक विशेष स्टाम्प जारी किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थाईलैंड की प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा के साथ वार्ता की। इसके साथ ही उन्होंने वहाँ के अन्य नेताओं से भी चर्चा की।

प्रधानमंत्री मोदी के थाईलैंड के ऐतिहासिक ‘वात फो मंदिर’ भी जाने की उम्मीद है। यह देश के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह बौद्ध मंदिर बैंकॉक में स्थित है। इसमें भगवान बुद्ध की लेटी हुई मुद्रा में विशाल प्रतिमा है। इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर में भगवान बुद्ध की 1,000 से अधिक प्रतिमाएँ हैं। इसके अलावा, यहाँ 90 से अधिक स्तूप भी हैं।

छठे बिम्सटेक सम्मेलन में भाग लेने आए पीएम मोदी का थाईलैंड के उप-प्रधानमंत्री और परिवहन मंत्री सूर्या जुंगरुंगरेंगकिट ने हवाई अड्डे पर स्वागत किया। वहाँ से वे होटल पहुँचे। वहाँ भारतीय प्रवासियों और भारतीय समुदाय के लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। पीएम मोदी को देखकर लोगों ने ‘मोदी-मोदी’, ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदेमातरम’ के नारे लगाए।

शुक्रवार (4 अप्रैल) को वे बिम्सटेक के नेताओं के साथ वार्ता करेंगे। BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) देशों में थाईलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार और भूटान के नेता शिरकत करेंगे। उन्होंने बिम्सटेक नेताओं के साथ चर्चा को लेकर उत्सुकता जारी की।

बता दें कि भारत और थाईलैंड का लगभग दो हजार साल पुराना संबंध है। भारत से ही थाईलैंड में बौद्ध धर्म और वैदिक धर्म एवं रामायण पहुँचा है। थाई संस्करण में भगवान राम को ‘फ्रा राम’ कहा जाता है। सम्राट अशोक के समय बौद्ध भिक्षुओं ने थाईलैंड में भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को फैलाया था। थाईलैंड को प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ‘स्वर्णभूमि’ (सोने की भूमि) कहा गया है।

400 एकड़ की हरियाली तबाह कर रही कॉन्ग्रेस सरकार, हाईकोर्ट ने नीलामी पर लगाई रोक: पेड़-पौधे, झीलों और घाटियों को बचाने के लिए चल रहा विरोध प्रदर्शन

हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) और तेलंगाना सरकार के बीच कांचा गाचीबोवली में 400 एकड़ जमीन को लेकर विवाद बढ़ गया है। यहाँ राज्य सरकार द्वारा जंगलों के पेड़ काटवाए और चट्टानों को हटावाए जा रहे हैं। इस पर तेलंगाना हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। वहीं, विश्वविद्यालय के छात्रों ने राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

दरअसल, तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार ने यहाँ आईटी पार्क के विकास के लिए 400 एकड़ जमीन की नीलामी करने का फैसला किया है। यहाँ पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक रूप से स्थित विशाल भूखंडों की माँग बढ़ गई है। यहाँ कई कंपनियों ने अपने मुख्यालय स्थापित कर लिए हैं। हालाँकि, तेलंगाना सरकार और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के बीच का ये मामला अब हाईकोर्ट पहुँच गया है।

मंगलवार (01 अप्रैल 2025) को छात्रों ने तेलंगाना इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन (TIIC) को ज़मीन सौंपने के खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दायर की। बुधवार को HC में सुनवाई के दौरान अगले आदेश तक जमीन पर किसी भी गतिविधि पर रोक लगा दी। दरअसल, 30 मार्च से ही बुलडोजर आदि लगाकर वहाँ जमीनों की सफाई की जा रही थी।

उधर, इसके विरोध में 1 अप्रैल 2025 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच दो जगहों पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के 500 छात्रों ने विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर धरना दिया, जबकि अन्य 150 छात्र प्रशासनिक भवन के सामने विरोध कर रहे थे। उन्होंने विश्वविद्यालय की भूमि पर अतिक्रमण रोकने की माँग की।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सरकार ज़मीन साफ करने में लग गई है। बुलडोजर और भारी मशीनरी से पेड़ों को काटा जा रहा है। यह क्षेत्र इकॉलॉजिक रूप से महत्व रखता है और इसे बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। उधर, सरकार का कहना है कि यह वनभूमि नहीं है। इसे साल 2003 में निजी स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी को ट्रांसफर किया गया था।

बावजूद इसके, प्रशासन ने भूमि समतलीकरण के लिए काम शुरु कर दिया है। इस बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। पुलिस ने दो छात्र समेत 53 लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस पर बल प्रयोग और छात्रों से बदतमीजी करने का आरोप है। वहीं, लाठीचार्ज करने के आरोपों को पुलिस ने मानने से इनकार किया।

ABVP के पीएचडी छात्र निशांत रेड्डी ने प्रशासन की चुप्पी पर नाराजगी जताते हुए कहा, “पिछले तीन दिनों से विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई जवाब नहीं दिया है। हम छात्र इस जमीन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि असली हितधारक चुप हैं।” छात्रों ने सुरक्षा बढ़ाने पर भी असंतोष जताया, क्योंकि बिना आईडी कार्ड के परिसर में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया है।

गाचीबोवली पुलिस ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और भारतीय जनता युवा मोर्चा के कुछ सदस्यों को भी गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय छात्र संघ ने 2 अप्रैल से अनिश्चितकालीन विरोध और कक्षाओं के बहिष्कार की घोषणा की। उन्होंने प्रशासन पर राज्य सरकार को विश्वविद्यालय की जमीन सौंपने का आरोप लगाया और इस मामले में लिखित गारंटी की माँग की।

जमीन विवाद का राजनीतिक मोड़

  • जमीनी विवाद ने अब राजनीतिक मोड़ ले लिया है। विपक्षी दल तेलंगाना सरकार पर पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील आईटी हब का निर्णय रद्द करने के लिए दबाव बना रहे हैं। भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने विवाद पर चुटकी लेते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की ‘मोहब्बत की दुकान’ अब हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी तक पहुँच गई है।

BRS का कहना है कि राहुल गाँधी को उनकी पार्टी के उद्देश्यों के खिलाफ काम करना भारी पड़ गया है। BRS ने आंदोलनकारी छात्रों और पत्रकारों की गिरफ्तारी की भी आलोचना की। BRS के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामाराव ने कहा कि यह ‘नासमझी’ भरा कदम है, क्योंकि यह हैदराबाद को शुद्ध वायु से वंचित करेगा।

वहीं, विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता अल्लेती महेश्वर रेड्डी की अध्यक्षता में पार्टी विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल घटनास्थल पर जाने वाला था। उन्होंने पूछा कि राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार कांचा गाचीबोवली में सैकड़ों बुलडोजर और मशीनों से पेड़ों को हटाकर 400 एकड़ जमीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश क्यों कर रही है। विधायक के आवास के पास कई पुलिस अधिकारी तैनात किए गए।

महेश्वर रेड्डी का कहना है कि पुलिस ने उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी। ना ही पुलिस ने बताया कि उन्हें क्यों रोका जा रहा है। रेड्डी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने भाजपा के बाकी नेताओं और विधायकों को भी उनके घरों से बाहर निकलने से रोक दिया। BJP नेता पायल शंकर को 1 अप्रैल को आंदोलन में भाग लेने के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय जाते समय हिरासत में लिया गया था।

प्रदेश के BJP प्रवक्ता एनवी सुभाष ने सवाल किया, “सरकार कब से रियल एस्टेट डीलर बन गई है।” उन्होंने पुलिस की प्रतिक्रिया को लोकतांत्रिक अधिकारों पर अस्वीकार्य हमला बताया और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया। उन्होंने बताया कि उस समय तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के नेता रहे वर्तमान सीएम ए. रेवंत रेड्डी ने 2007-08 में सवाल उठाया था।

उन्होंने कहा कि रेवंत रेड्डी ने TRS नेता रहते हुए कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा दिल्ली में एक डेवलपर को जमीन सौंपने के इसी तरह के कदम का विरोध किया था। उन्होंने पूछा, “अब क्या बदल गया है? क्या मुख्यमंत्री सिर्फ़ खाली खजाने को भरने, गाँधी परिवार को खुश करने और उनके मुफ़्त उपहारों के एजेंडे को निधि देने के लिए अपने पिछले रुख को छोड़ रहे हैं।”

कई साल पुराना है विवाद

हैदराबाद यूनिवर्सिटी और सराकार के बीच ये विवाद सालों पुराना है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय ने दावा किया है कि 1975 में उसे 2324 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी। इनमें से 400 एकड़ का यह भूभाग भी शामिल है। साल 2022 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यूनिवर्सिटी के पास इस भूमि के हस्तांतरण के कोई अधिकारिक दस्तावेज नहीं है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे सरकार की भूमि माना। हालाँकि, पर्यावरणविदों का कहना है कि यह क्षेत्र जैव विविधता से भरपूर है। यहाँ 455 से अधिक प्रजातियों की वनस्पति और जीव मौजूद हैं। एनजीओ वटा फाउंडेशन ने ज़मीन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने और ‘डीम्ड फोरेस्ट’ का दर्जा देने की माँग की।

नेहरू ने थोपा वक्फ बोर्ड, कॉन्ग्रेसी सरकारों ने पाला-पोसा: जानिए कैसे स्वतंत्र भारत में ‘मजहबी जमींदार’ बन गया देश के लिए नासूर

वक्फ संशोधन कानून को लेकर देश में चर्चा जारी है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मस्जिदों संचालन के लिए दिए गए दो गाँवों से शुरू हुआ भारत में वक्फ संपत्ति का रिवाज आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। आज भारत में वक्फ के पास 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ हैं। दुनिया के किसी भी देश, यहाँ तक कि मुस्लिमों मुल्कों में भी वक्फ के पास इतनी संपत्तियाँ नहीं हैं।

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया था। गोरी ने सन 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया।

मुगल काल में भी मस्जिद-मकबरों-दरगाहों को इस्लामी शासक बड़ी-बड़ी संपत्तियाँ देते रहे। अंग्रेज जब आए तो उन्होंने इस पर नियंत्रण करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिमों के विरोध के बाद उन्होंने इसे कानूनी रूप से दे दिया। इस कानून का ड्राफ्ट पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना ने तैयार किया था। भारत जब आजाद हुआ तो भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेेहरू ने इसे जारी रखा।

मुस्लिम तुष्टिकरण हवा देते हुए पहली सन 1954 में देश के पंडित नेहरू ने वक्फ एक्ट बनाया। इससे वक्फ बोर्ड नाम की एक संस्था बनी। इस कानून के तहत कॉन्ग्रेस की सरकार ने बँटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों की जमीनें एवं संपत्तियाँ वक्फ बोर्डों को दे दीं। इस कानून के लागू होने के एक साल बाद यानी सन 1955 में इसमें संशोधन करके हर राज्य में वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात कही गई।

इसका परिणाम ये हुआ है कि आज देश के करीब 32 राज्यों में वक्फ बोर्ड हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में शिया और सुन्नी मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वक्फ बोर्ड हैं। ये बनाए तो गए थे वक्फ की संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन, देखरेख और उनका प्रबंधन करने के लिए, लेकिन ये बोर्ड आज सरकारी जमीनों-इमारतों के साथ-साथ हिंदुओं के पूरे-के-पूरे गाँवों तक पर दावा किए जाने लगे।

सन 1964 में एक संशोधन पारित किया गया था। इसके तहत केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के केंद्रीकरण को बढ़ावा देना शामिल था। यह भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है। यह केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता है। इसका काम केंद्र सरकार को सलाह देना है।

दरअसल, CWC का उद्देश्य वक्फ संबंधित मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देने का काम था। यह सलाह वक्फ संपत्तियों के रख-रखाव से संबंधित होता था। CWV का अध्यक्ष केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री होता है। सन 1984 में वक्फ प्रशासन के पुनर्गठन के लिए वक्फ जाँच समिति गठित की गई। उसकी रिपोर्ट का मुस्लिमों ने भारी विरोध किया। इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

शाहबानो और मंडल-कमंडल के बीच बाबरी ढाँचा गिरने के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नई परिभाषा लिखी। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने दो बड़े विवादित कानून बनाए। इनमें से एक पूजा स्थल अधिनियम और दूसरा वक्फ बोर्ड 1995 शामिल है। वक्फ बोर्ड 1995 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने वक्फ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया।

इस एक्ट की धारा 3(R) में कहा गया कि अगर किसी संपत्ति को मुस्लिम कानून के मुताबिक पवित्र, मजहबी या परोपकारी मान लिया जाए तो वह वक्फ की संपत्ति हो जाएगी। इसमें ये कहा गया है कि यदि वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई भी जमीन किसी मुस्लिम की है तो वह उसे वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है। इसके लिए वक्फ बोर्ड को कोई कागजात पेश करने की जरूरत नहीं होगी।

उस जमीन पर जिस व्यक्ति को आपत्ति होगी, उसे कागजात दिखाकर साबित करना होगा कि यह उसकी संपत्ति है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम की धारा 40 में कहा गया है कि जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड तय करेगा। बोर्ड का यह निर्णय ही अंतिम होगा, जब तक कि उस निर्णय पर वक्फ ट्रिब्यूनल रोक ना लगा दे या उसे बदल ना दे।

इसके अलावा, बोर्ड उस किसी भी संपत्ति की जाँच कर सकता है, जिसके वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जाता है। इस धारा में आगे कहा गया है कि अगर वक्फ बोर्ड को विश्वास हो जाता है कि यह वक्फ की संपत्ति है तो उसे वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दे सकता है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 40 को ‘काला कानून’ बताया है।

बात यहीं रूक जाती तो समझ में आता। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 (UPA-2) के शासनकाल में वक्फ अधिनियम को और मजबूत किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने साल 2013 में वक्फ कानून में संशोधन करके वक्फ बोर्डों को असीमित अधिकार दे दिए गए। इस संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड को स्वायत्ता दे दी गई।

इस संशोधन के जरिए इससे जुड़े विवाद में कलेक्टर को भी हस्तक्षेप करने से रोक दिया गया। इस कानून में कहा गया कि अगर वक्फ बोर्ड किसी व्यक्ति संपत्ति को वक्फ संपत्ति बता देता है तो उसके खिलाफ वह कोर्ट नहीं जा सकता। उसे वक्फ बोर्ड से ही गुहार लगाना होगा। अगर बोर्ड बात नहीं मानता है तो वह वक्फ ट्रिब्यूनल जा सकता है।

हालाँकि, कानून में यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि विवादित मामले में वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम अंतिम होगा। इस फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं। इस तरह न्याय पाने के सारे दरवाजे को इस कानून के माध्यम से यूपीए सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

अगर वर्तमान में हम वक्फ बोर्ड की संरचना की बात करें तो इसमें एक सर्वे कमिश्नर होता है। यह सर्वे कमिश्नर संपत्तियों का लेखा-जोखा रखता है। इसके अलावा, बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम IAS अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता और मुस्लिम बुद्धिजीवी जैसे लोग शामिल होते हैं।

वक्फ ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ट्रिब्यूनल में कौन शामिल होगा, इसका फैसला संबंधित राज्य की सरकार करती है। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति और वोटबैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारें आमतौर पर वक्त बोर्ड और ट्रिब्यूनल में मुस्लिमों को ही शामिल करती हैं, ताकि वो खुद को मुस्लिम हितैषी दिखा सके।