फ्रांस में अपने छात्रों को अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब समझाने के कारण एक शिक्षक का सिर कलम कर दिया गया और अब मुस्लिम देश इस घटना की निंदा करने की बजाय फ्रांस के ही उत्पादों का बहिष्कार करने में लगे हैं। इस बीच एनडीटीवी ने भी एक मजहबी हत्यारे द्वारा शिक्षक का गला काटने और कट्टरपंथी मानसिकता के बजाय शिक्षक द्वारा दिखाए गए पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून को ही इस बहिष्कार के लिए जिम्मेदार बताया है।
खबर के मुताबिक, मुस्लिम देश फ्रांस के उत्पादों का बहिष्कार करने के लिए मुहीम चला रहे हैं। सऊदी अरब में रविवार (अक्टूबर 25, 2020) को फ्रेंच सुपरमार्केट के विक्रेता कैरेफोर (Carrefour) के बहिष्कार का ट्रेंड चलता रहा। फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने इस संबंध में बताया कि मध्य पूर्वी देशों में फ्रांसीसी उत्पादों, विशेष रूप से खाद्य उत्पादों का बहिष्कार करने की बात सामने आई है।
मंत्रालय ने कहा कि बहिष्कार के लिए किया गया आह्वान बिलकुल निराधार है और इसे जल्द से जल्द रोका जाना चाहिए, क्योंकि सारे हमले हमारे देश के ख़िलाफ़ हैं जिन्हें कट्टरपंथी अल्पसंख्यक द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है। मंत्रालय ने अधिकारियों से भी इस बहिष्कार के ख़िलाफ़ बोलने को कहा है जिससे फ्रांसीसी कंपनियों की मदद हो सके और फ्रांसीसी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
गौरतलब है कि कुवैत में उपभोक्ता सहकारी समितियों के गैर सरकारी संघ ने भी फ्रेंच प्रोडक्ट्स के बहिष्कार के निर्देश अक्टूबर में जारी किए थे। ऐसे में रॉयटर ने जब कई सहकारी समितियों को संपर्क किया तो उन्होंने बताया कि उन लोगों ने अपनी शेल्फ से फ्रेंच कंपनियों के बाल संबंधी व ब्यूटी संबंधी उत्पादों को हटवा दिया है। यूनियन प्रमुख फद अल किश्ती ने बताया कि पैगंबर के लगातार अपमान की प्रतिक्रिया में फ्रांस उत्पादों को हटाया गया है।
बता दें कि इससे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इस्लाम पर बयान जारी किया था। उन्होंने कहा था कि इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिससे आज पूरी दुनिया संकट में है। उनके इस बयान के बाद से ट्विटर पर हैशटैग #BoycottFrenchProducts, #BoycottFrance Products, #boycottfrance #boycott_French_products #ProphetMuhammad ट्रेंड करने लगा। इसके अलावा कई देशों के यूजर्स ने ट्विटर व फेसबुक पर ‘मोहम्मद- मैसेंजर ऑफ अल्लाह’ के साथ अपनी फ्रोफाइल तस्वीरें बदल दीं।
बहिष्कार की यह खबर के आने के बाद भी कई लोगों ने इस पर ट्वीट किया। सरफराज अहमद रजवी ने खबर शेयर करते हुए लिखा- “जानी नहीं तो माली तौर पर तो नुकसान किया ही जा सकता है फ्रांस का आर्थिक नुकसान कीजिए।”
कुछ ट्विटर यूजर्स ने जब इस बहिष्कार पर टिप्पणी की कि ऐसा करके यह देश उस फ्रेंच टीचर की हत्या का समर्थन कर रहे हैं तो कट्टरपंथियों का जवाब आया, “बिलकुल, आप कैसे 1.8 मिलियन मुस्लिमों की भावनाओं को आहत कर सकते हैं। ये ही वह चीज है जिसे वह डिजर्व करता था।”
ट्विटर के माध्यम से लोगों की मदद करने की ख़बरों के कारण लॉकडाउन में अभिनेता सोनू सूद की खूब चर्चा हुई थी। दावा किया गया था कि उन्होंने कई मजदूरों को घर पहुँचाया। हालाँकि, अब मदद को लेकर किए गए कुछ ट्वीट्स में हुई गड़बड़ियों के कारण वो फिर से विवादों का विषय बन रहे हैं। सोनू सूद से मदद माँगने वाले ट्विटर अकाउंट या तो गायब हो चुके हैं, या फिर उनमें झोल नजर आ रहा है, जिन्हें लेकर अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
ट्विटर हैंडल ‘@SnehalMisal8 ने अक्टूबर 20 को ट्वीट कर के अपने बेटे की ओपन हार्ट सर्जरी के लिए सोनू सूद से मदद की गुहार लगाई थी। उक्त ट्विटर यूजर ने बताया कि उसके बेटे का शरीर 100% ऑक्सीजन लेवल पर नहीं जा पाता है और 30% तक गिर जाता है।
इस ट्वीट के 5 दिन बाद अभिनेता सोनू सूद ने रिप्लाई करते हुए लिखा कि कल आपके बेटे को मुंबई के SRCC अस्पताल में एडमिट कराया जाएगा और इसी सप्ताह सर्जरी के लिए समय भी तय कर दिया जाएगा। लेकिन, ट्विटर पर कुछ लोगों ने इस ट्वीट को पीआर स्टंट करार दिया।
बिना टैग किए सोनू सूद ने खोज लिटा ट्वीट
ऋषि बागरी नामक ट्विटर यूजर ने लिखा कि जिस हैंडल से ट्वीट किया गया, वो एक नया ट्विटर हैंडल है, जिसके मात्र 2-3 फॉलोवर्स हैं और एक ही ट्वीट है। उन्होंने कहा कि इस ट्वीट में सोनू सूद को टैग तक नहीं किया गया था और न ही लोकेशन का जिक्र है, साथ ही कॉन्टैक्ट या ईमेल के डिटेल्स भी नहीं साझा किए गए हैं। उन्होंने आश्चर्य जताया कि फिर भी अभिनेता ने इस ट्वीट को खोज लिया और मदद के लिए हाथ बढ़ा दिया।
उन्होंने दावा किया कि सोनू सूद से मदद माँगने वाले कई ट्विटर हैंडल्स ने अपनी उन ट्वीट्स को डिलीट कर लिया है, जो बताता है कि ये सब पीआर मशीनरी का काम है और महज पब्लिसिटी के लिए किया गया है। कई लोगों ने कहा कि राजनेताओं और बॉलीवुड की हस्तियों द्वारा समाज सेवा के नाम पर पब्लिसिटी करने का पुराना चलन रहा है और सोनू सूद इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। सोनू सूद ने ऋषि के ट्वीट को कोट कर सफाई भी दी।
उन्होंने लिखा कि सबसे अच्छी बात ये है कि ज़रूरतमंद लोग उन्हें खोज लेते हैं और वो भी किसी तरह ऐसे लोगों को ढूँढ लेते हैं। उन्होंने लिखा कि ये सब कुछ ‘इरादों’ से तय होता है, जो आपको समझ में नहीं आएगा। उन्होंने तंज कसते हुए लिखा, “मरीज को अस्पताल में भर्ती कराया जाएगा। आप भी योगदान दें और कुछ फल उन्हें भेज दें। 2-3 फॉलोवर्स वाला कोई व्यक्ति खुश होगा।“
इसके साथ ही, सोनू सूद ने मरीज के नाम और ऑपरेशन की तारीख व समय के साथ एक्सेल शीट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया।
इस एक्सेल शीट के शीर्षक में ही लिख दिया गया था कि ये उन लोगों की लिस्ट है, जिनकी हार्ट सर्जरी हुई या होनी है। साथ ही, एक्सेल शीट के शीर्षक में ‘सोनू सूद’ लिखा भी प्रतीत हो रहा है, जिसे ब्लर कर दिया गया था। इसमें सितम्बर 25, 2020 की तारीख दर्ज है, जबकि ट्वीट लगभग एक महीने बाद का है। लोगों ने इसका अर्थ लगाया कि स्वप्निल और सोनू सूद एक महीने पहले से संपर्क में थे, फिर ट्वीट इतने दिनों बाद क्यों किया गया?
सोनू द्वारा शेयर की गई शीट में सितम्बर की तारीख
‘प्लाकार्ड्स’ के लिए मशहूर मधुर ने लिखा कि सोनू सूद ने 1 महीने पहले ही एक्सेल शीट तैयार कर ली थी, क्या वो अंतर्यामी हैं? वहीं कुछ लोगों ने अभिनेता से पूछा कि क्या वो एक महीने पीछे चल रहे हैं? पिछली बार भी कुछ लोगों ने डिलीट हुए ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट्स शेयर कर दावा किया था कि सोनू सूद ने जिन-जिन की ट्विटर पर मदद का दावा किया, उनमें से अधिकतर के ट्वीट्स डिलीट किए जा चुके थे।
इससे पहले इन्हीं गायब अकाउंट्स का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कुछ लोगों ने ट्विटर पर सोनू सूद की दरियादिली को प्रोपेगेंडा करार दे दिया था। NationFirst#SAFFRON नामक ट्विटर हैंडल से सोनू सूद के कई ट्वीट के स्क्रीनशॉट शेयर हुए थे। साथ ही ट्वीट में लिखा गया था, “प्रोपेगेंडा चल रहा था सोशल मीडिया पर। सभी मदद माँगने वाले ट्वीट गायब हो गए है और यहाँ तक कि उनके ट्विटर अकाउंट भी गायब हैं।”
कक्षा में पैगम्बर का चित्र दिखाने पर एक मजहबी छात्र द्वारा पेरिस में एक प्रोफेसर की हत्या के बाद फ्रांस की सरकार और वहाँ की जनता ने कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया है और इसे इस्लामी आतंकवाद का नाम भी दिया। ऐसे में, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को कट्टर बताते हुए उन पर इस्लाम पर हमला करने का आरोप लगाया है।
उन्होंने पैंगबर के चित्र पर जारी विवाद के मद्देनजर कहा कि मैक्रों ने इस्लाम की जानकारी न होने के बावजूद समुदाय के लोगों पर हमला किया व इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दिया। पाक पीएम ने अपने ट्वीट में यह भी कहा कि यह समय संयम से काम लेने का था।
Hallmark of a leader is he unites human beings, as Mandela did, rather than dividing them. This is a time when Pres Macron could have put healing touch & denied space to extremists rather than creating further polarisation & marginalisation that inevitably leads to radicalisation
इमरान खान ने अपने ट्वीट में फ्रांसीसी राष्ट्रपति पर निशाना साधते हुए कल लिखा, “एक नेता की पहचान होती है कि वह इंसानों को एकजुट करता है, जैसा कि मंडेला ने लोगों को विभाजित करने की बजाय उन्हें एक करने पर जोर दिया। लेकिन एक आज का समय है, जब राष्ट्रपति मैक्रों देश से रेसिज्म, ध्रुवीकरण हटाने की बजाय अतिवादियों को हीलिंग टच और अस्वीकृत स्थान देने में लगे हैं, जो निश्चित रूप से उनकी कट्टरवादी सोच को दिखाता है।”
It is unfortunate that he has chosen to encourage Islamophobia by attacking Islam rather than the terrorists who carry out violence, be it Muslims, White Supremacists or Nazi ideologists. Sadly, President Macron has chosen to deliberately provoke Muslims, incl his own citizens,
इमरान खान ने ट्वीट में यह भी लिखा, “यह दुखद है कि राष्ट्रपति मैक्रों ने विवादित कार्टून को बढ़ावा देते हुए जानबूझकर लोगों को भड़काने की कोशिश की है।”
पाक पीएम ने कहा कि इस समय फ्रांस राष्ट्रपति को संयम से काम लेते हुए कट्टरपंथियों को दरकिनार करने की रणनीति अपनानी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने इस्लाम की जानकारी न होने के बावजूद समुदाय पर हमला करते हुए इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देना चुना, जबकि उन्हें आतंक पर हमला करना चाहिए था।
इमरान खान के अनुसार, फ्रांस राष्ट्रपति ने यूरोप समेत पूरे विश्व के सैकड़ों लोगों की भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने आखिरी में लिखा, “आखिरी चीज जिसे दुनिया चाहती है या जरूरत है, वह है कि दुनिया को ध्रुवीकरण और अज्ञानता की वजह से इस्लामोफोबिया पर सार्वजनिक बयान से बचना चाहिए, क्योंकि इससे उग्रवादियों के मन में और भी नफरत पैदा हो जाएगी।”
The last thing the world wants or needs is further polarisation. Public statements based on ignorance will create more hate, Islamophobia & space for extremists.
गौरतलब है कि 16 अक्टूबर को पेरिस में इतिहास के शिक्षक सैमुअल पैटी की कट्टरपंथी हमले में हत्या कर दी गई थी। उन्होंने अपनी कक्षा में छात्रों को पैगंबर का विवादित कैरिकेचर दिखाया था। इसके बाद ही एक 18 साल के युवक ने उन पर हमला बोल दिया और उनका सिर कलम कर दिया। इस घटना की निंदा करते हुए फ्रांस समेत पूरी दुनिया में शिक्षक के समर्थन में आवाजें उठने लगीं।
फ्रांस ने इस्लाम के सामने घुटने न टेकने का ऐलान किया। फ्रांस के ऑसिटैन क्षेत्र (Occitanie region) के दो टाउन हॉल मोंटपेलियर (Montpellier) और टूलूज़ (Toulouse) के बाहर शिक्षक सैम्युएल पैटी को याद करते हुए और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने के लिए पैगम्बर मोहम्मद के उन कार्टूनों का 4 घंटे तक प्रदर्शन किया गया, जिनको लेकर शार्ली एब्दो के कर्मचारियों का 2015 में नरसंहार किया गया था। सबसे पहले इन कार्टूनों का प्रकाशन शार्ली हेब्दो पत्रिका में ही किया गया था।
बढ़ते ‘इस्लामोफ़ोबिया’ को रोकने के लिए इमरान ने लिखा फेसबुक को पत्र
यहाँ बता दें कि इमरान खान ने इस्लामोफोबिया के मद्देनजर फेसबुक सीईओ को भी पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने इस्लामोफोबिया को फेसबुक पर बैन करने की माँग की है। अपने पत्र में उन्होंने भारत और फ्रांस का हवाला देते हुए कहा है कि इन देशों में इस्लाम को निशाना बनाया जा रहा है।
My letter to CEO Facebook Mark Zuckerberg to ban Islamophobia just as Facebook has banned questioning or criticising the holocaust. pic.twitter.com/mCMnz9kxcj
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने कहा है कि भारत न सिर्फ अपनी मिट्टी पर लड़ेगा, बल्कि अगर कोई विदेशी जमीन हमारे लिए सुरक्षा सम्बन्धी खतरे पैदा करता है तो वहाँ भी लड़ेगा। कई लोग इसे ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ पर भारत-चीन तनाव से जोड़ कर देख रहे हैं, लेकिन ‘नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सिस्टम (NSCS)’ ने इस बात से इनकार किया है। बता दें कि भारत-चीन सेनाएँ सीमा पर कई महीनों से आमने-सामने हैं।
ऋषिकेश में ‘परमार्थ निकेतन आश्रम’ को सम्बोधित करते हुए अजीत डोभाल ने कहा कि भारत ने कभी भी किसी पर पहले हमला नहीं किया, लेकिन नए रणनीतिक समीकरणों के बाद शायद हमें पूरी तरह सक्रियता के साथ सुरक्षा सम्बन्धी खतरों को हटाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि ये ज़रूरी नहीं है कि आप जहाँ चाहते हैं, भारत वहीं लड़े। उन्होंने कहा कि भारत युद्ध को वहाँ तक ले जा सकता है, जहाँ से खतरा पैदा हो रहा है।
NSA अजीत डोभाल ने इसे ‘नए भारत’ की रणनीति करार दिया। अधिकारियों का कहना है कि डोभाल वर्तमान स्थिति को लेकर नहीं बोल रहे थे, बल्कि वो सामान्य परिस्थितियों की बात कर रहे थे। अजीत डोभाल ने कहा कि हमने कभी भी अपने व्यक्तिगत हितों की पूर्ति के लिए आक्रामक रवैया नहीं अपनाया। उन्होंने कहा कि हम अपनी और विदेशी मिट्टी पर भी लड़ेंगे, लेकिन व्यक्तिगत हितों के लिए नहीं।
उन्होंने कहा कि भारत ‘परमार्थ आध्यात्मिकता’ के लिए युद्ध लड़ेगा। उन्होंने कहा कि हमारा सभ्यताओं वाला राष्ट्र रहा है, जो किसी खास धर्म, भाषा या फिर समुदाय पर आधारित नहीं है। उन्होंने कहा कि जिसे देखा भी नहीं जा सकता है, वही इस राष्ट्र का आधार है, और वो है – हमारे देश की संस्कृति। उधर कोरियन युद्ध की बरसी पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी कहा कि चीन कभी भी अपनी सम्प्रभुता, सुरक्षा और विकास हितों को खतरा पहुँचाने की अनुमति नहीं देगा।
उन्होंने कहा कि उनकी ‘पवित्र मातृभूमि’ के क्षेत्रों को बाँटने या फिर अतिक्रमित करने वालों की करतूतों को बैठ कर देखता नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि जब भी ऐसी स्थिति आएगी, चीनी लोग उसका जम कर सामना करेंगे। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी दशहरा ‘शस्त्र पूजा’ के बाद कहा कि भारत मौजूदा तनाव को ख़त्म कर शांति चाहता है, कुछ कुटिल घटनाएँ होती रही हैं, बावजूद इसके हमारी सेना किइस को हमारी एक इंच जमीन पर भी कब्ज़ा नहीं करने देगी।
Sharing some more pictures from ‘Shastra Pooja’ at 33 Corps Headquarters in Sukna. pic.twitter.com/e1JWaOzqjp
राजनाथ ने कहा कि वो इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि भारत-चीन तनाव की हालिया घटनाओं के बीच हमारी सेना ने जो पराक्रम दिखाया, उसे इतिहासकारों द्वारा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी चीन को कोरोना को लेकर ‘संदिग्ध’ करतूतों वाला देश करार देते हुए उसे साम्राज्यवादी बताया और कहा कि भारत ने उसे जो प्रतिक्रिया दी, उससे वो हैरान हो गया। उन्होंने कहा कि भारत अपने पड़ोसियों से अच्छे सम्बन्ध बना चीन से बड़ी ताकत बनेगा।
इसी बीच ट्विटर पर एक हैशटैग ट्रेंड कर रहा है #MoveTheGames और लोग इसके तहत आयोजकों से माँग कर रहे हैं कि 2022 में होने वाले ओलम्पिक का स्थान बदल दिया जाए, उसे चीन की जगह कहीं और आयोजित कराया जाए। 6 अक्टूबर को ब्रिटेन ने इस बात का ऐलान किया कि अगर इस बात के और सबूत सामने आते हैं कि चीन में उइगरों के मानवाधिकारों का हनन होता है तो वह 2022 के विंटर ओलम्पिक का बहिष्कार कर सकता है।
26 अक्टूबर 1947- इतिहास के पन्नों की वह तारीख जिसने आजाद भारत के मानचित्र में धड़ जोड़कर उसे सम्पूर्ण बनाया। इसी दिन जम्मू कश्मीर के आखिरी शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत को भारत के साथ मिलाने का फैसला किया था। इसी दिन इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन (Instrument of accession) पर अपने हस्ताक्षर किए थे। इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसेशन एक ऐसा दस्तावेज था जिसे भारत सरकार ने 1947 में रियासतों के अधिमिलन पत्र के रूप में तैयार किया था।
वैसे तो उस दौरान भारत में करीब 565 रियासते थीं मगर, विभाजन के बाद जम्मू कश्मीर का भारत में अधिमिलन इसलिए भी यादगार है क्योंकि बहुसंख्यक आबादी और भौगोलिक परिस्थितियों के प्रतिकूल होने के बावजूद महाराजा ने हिंदुस्तान के साथ आने का फैसला किया था।
इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसेशन
इससे पहले सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के आजाद होने से पूर्व 3 जुलाई 1947 को ही कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक और महाराजा को अलग-अलग पत्र लिख चुके थे। इन पत्रों में सरदार पटेल ने यह स्पष्ट किया था कि जम्मू कश्मीर का फायदा बिना कोई देरी किए भारत से जुड़ने में ही है। हालाँकि, महाराजा हरि सिंह तब भी सोच विचार में थे। उधर, मोहम्मद अली जिन्ना ये मानकर बैठ चुके थे कि पाकिस्तान के लिए जम्मू कश्मीर को हथियाना कोई मुश्किल काम नहीं है क्योंकि एक तो उस रियासत में आबादी मुस्लिम बहुसंख्यको की थी और दूसरा इसके कई क्षेत्र पाकिस्तान के प्रांतो से जुड़ रहे थे।
समाचार पत्रों में जम्मू कश्मीर के अधिमिलनकी खबर
ऐसी स्थिति में एक ओर जहाँ विभाजन का ऐलान 1947 के जून महीने में हो चुका था और देश आजाद शब्द के मायने समझने को तैयार था, महाराजा हरि सिंह इस उधेड़बुन में थे कि आखिर क्या किया जाए। तभी, कुछ दिनों बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने महाराजा से मुलाकात कर उनको सलाह दी कि उन्हें भारत या पाकिस्तान में से किसी के साथ जुड़ जाना चाहिए।
कहा जाता है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने जब महाराजा के सामने अपना सुझाव रखा, तब उनका झुकाव पाकिस्तान की ओर ज्यादा था। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर जम्मू कश्मीर पाकिस्तान में शामिल होता है तो भारत इसमें कोई भी परेशानी उत्पन्न नहीं करेगा। लेकिन, महाराजा हरि सिंह को यहाँ पाकिस्तान के साथ जुड़ने में दो समस्याएँ थीं।
पहली- यदि वह पाकिस्तान के साथ विलय करते तो यह स्पष्ट रूप से साम्प्रदायिक राष्ट्र के का हिस्सा होना था और दूसरा, मुस्लिम बहुल राष्ट्र के साथ जुड़ते हुए उन्हें अपने रियासत के अल्पसंख्यकों की चिंता थी। इनमें लद्दाख के बौद्ध, जम्मू के कश्मीरी पंडित और कश्मीर घाटी के हिंदू शामिल थे।
100 साल से ज्यादा पुराना था जम्मू कश्मीर में डोगरा वंश का इतिहास
महाराजा हरि सिंह मुस्लिम बहुल आबादी के बीच शासन गद्दी संभालने वाले हिंदू राजा थे। आमतौर पर ऐसी स्थिति बहुत कम देखने को मिलती थी कि मुस्लिम बहुल आबादी वाले इलाकों में किसी हिंदू राजा को राज करने का मौका मिला हो, मगर हरि सिंह जिस डोगरा वंश से आते थे उसका इतिहास जम्मू में 100 साल से भी अधिक पुराना था।
1822 में महाराजा गुलाब सिंह के गद्दी संभालने से लेकर यहाँ चार डोगरा वंश के राजाओं ने राज किया। इनमें पहले महाराजा गुलाब सिंह थे और आखिरी महाराजा हरि सिंह थे।
जम्मू में डोगरा समुदाय का संक्षेप विवरण यही है कि इसकी नींव के पीछे महाराजा रणजीत सिंह का हाथ था। महाराजा रणजीत ने 1819 में कश्मीर में सिख राज की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने पंजाब को भी जम्मू में मिलाया व इसकी जिम्मेदारी सौंपी अपने ही सेना के एक सैनिक गुलाब सिंह को।
1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद व सिख समुदाय को बिखरता देख, गुलाब सिंह ने कश्मीर को स्वतंत्र घोषित किया। फिर 1822 से 1856 उन्होंने वहाँ राज किया। इसके बाद रणबीर सिंह ने 1856 से 1885 तक। महाराजा प्रताप सिंह ने 1885 से 1925 तक और आखिर में महाराजा हरि सिंह ने 1925 से 1947 तक।
भारत विभाजन की बातें शुरू हुई तो रियासतों के विलय की बात का महाराजा हरि सिंह को भी मालूम पड़ा। मगर अपनी रियासत को लेकर आखिरी फैसला उन्होंने तब तक नहीं लिया जब तक उन्हें नेहरू व कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला की मंशा का पता नहीं चला और पाकिस्तान के आतंकी चेहरे से उनके साक्षात्कार नहीं हुए।
जैसे ही प्रदेश में कबाइलियों का हमला हुआ और महाराजा को एहसास हुआ कि उनकी सेना उन्हें रोकने में असमर्थ हैं, उन्होंने भारत के साथ होने का फैसला ले लिया। इस बीच पाकिस्तान लगातार उन्हें तरह तरह के प्रलोभन दे रहा था लेकिन अपने मनसूबों में असफल होता देख 22 अक्टूबर उसने आतंक का आगाज किया जिससे महाराजा सकपका गए। उन्होंने पाया कि हथियारों से लैस सैंकड़ों कबाइली उनकी सीमा की ओर बढ़े आ रहे थे और जमकर जमकर कत्लेआम कर रहे थे
नतीजतन, कुछ समय पहले तक कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला और नेहरू के बीच का स्नेह देखकर भारत के साथ अपनी रियासत के अधिमिलन के लिए हिचकिचाने वाले हरि सिंह फौरन इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर करने को तैयार हो गए।
क्या थी जवाहरलाल नेहरू से महाराजा हरि सिंह की नाराजगी?
शुरुआत में महाराजा हरि सिंह को जवाहरलाल नेहरू का नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता शेख अब्दुल्ला के साथ मैत्रीपूर्ण बर्ताव बिलकुल नहीं पसंद था। दरअसल शेख अब्दुल्ला वही शख्स था जिसने महाराजा के ख़िलाफ़ ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो’ नाम से आंदोलन छेड़ा था। जब इसी तरह के कारनामों के लिए शेख को गिरफ्तार किया गया व उन्हें 3 साल की सजा हुई, तब भी जवाहरलाल नेहरू उनके प्रति अपनी सहानुभूति दिखाते रहे और राज्य सरकार द्वारा उनका प्रवेश निषेध कर दिए जाने पर भी अब्दुल्ला को प्रोत्साहित करने वहाँ गए, जिस कारण उनकी गिरफ्तारी भी हुई। नेहरू के इस कदम से कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी समेत सरदार वल्लभ भाई सब नाराज थे।
गौरतलब है कि आजाद भारत में रियासतों के विलय का जिम्मा सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा गया था। उन्होंने हैदराबाद, जूनागढ़ जैसी पेचीदा रियासतों को भी बड़ी सरलता से भारत में विलय करवाया था और सबका यही मानना था कि अगर जम्मू कश्मीर का मसला उनके हाथों होता तो वह उसका भी समाधान कर लेते। लेकिन, नहीं! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पूरा मसला अपने हाथ ले लिया।
शेख अब्दुल्ला से उनका स्नेह साफ बता रहा था कि वह राज्य को उसे सौंपने की मंशा बनाए बैठे हैं। इसी साजिश का पता जब महाराजा हरि सिंह को चल गया तो इसके बाद वह न महात्मा गाँधी के कहने पर माने और न वल्लभ भाई पटले के।
हैरानी की बात थी जिन वल्लभ भाई पटेल ने हैदराबाद में निजाम का शासन होने के बाद भी उसको भारत में शामिल करवा लिया था वही वल्लभ भाई पटेल एक हिंदू शासक को नहीं समझा पा रहे थे।
अंतत: महाराजा हरिसिंह को आश्वस्त करने का काम किया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने, जिनको श्री गुरुजी भी कहा जाता था। तत्कालीन गृहमंत्री के सन्देश पर उन्होंने अविलंब महाराज को मनाने के लिए उनके साथ बैठक की। यह बैठक हुई प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन और पंडित प्रेमनाथ डोगरा की मध्यस्ता में।
सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर और राजा हरि सिंह
26 अक्टूबर 1947 को अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए गए। यह अधिमिलन पत्र बिलकुल वैसा ही पत्र था जैसे पत्र पर बाकी रियासतों ने हस्ताक्षर किए थे और भारत के साथ आने की सहमति दी थी। इसके बाद 27 अक्टूबर को भारत के गवर्नर जनरल ने इसे स्वीकार किया और भारत के मानचित्र पर मुकुट की तरह हमेशा के लिए विराज गया जम्मू-कश्मीर।
महाराजा हरि सिंह के अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर के साथ माँग थी कि उन्हें सैन्य मदद दी जाए इसलिए राज्य में विमान और सैनिक बिना किसी देरी के भिजवाए गए। सरदार वल्लभभाई की प्रतिबद्धता ने लगातार भारतीय सेना में उत्साह भरे रखा।
कुछ समय बाद स्वयंसेवकों की सहायता से और अपने अदम्य साहस से भारतीय सेना की जीत हुई और उन्होंने पाकिस्तानियों को मार भगाया। मगर हाँ, इस बीच कुछ हिस्सों पर पाकिस्तान ने अपने पैर कश्मीर राजधानी मुजफ्फराबाद में जमा लिए थे जिसको आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। PoK को पाकिस्तान ने दो हिस्से में बाँटा है एक को वह आजाद कश्मीर कहता है और दूसरा गिलगित बाल्टिस्तान है।
इसके बाद कश्मीर में विवादित अनुच्छेध 370 लाया गया और उनके पास अपना अलग झंडा व संविधान रखने का अधिकार हो गया। हमने ऊपर आपको बताया कि महाराजा हरि सिंह ने जिस अधिमिलन पत्र पर अपने हस्ताक्षर किए थे वह बिलकुल वैसा ही था जैसे अन्य रियासतों का विलय पत्र था। मगर, जम्मू कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा देने का काम कॉन्ग्रेस ने 1950 में किया और भारत के अधिकार वहाँ बेहद सीमित कर दिए।
भारत के साथ जुड़ने के बाद भी कश्मीर में 90 का दशक
महाराजा हरि सिंह का भारत के साथ आने का फैसलो में सबसे बड़ी चिंता वहाँ की अल्पसंख्यक जनता की सुरक्षा थी। उन्हें डर था कि यदि वह एक ऐसे राज्य से जुड़े जिसकी नींव मजहब आधारित है तो अल्पसंख्यकों का क्या होगा। हालाँकि, तब उनके इस डर ने उन्हें भारत के साथ लाकर जोड़ दिया लेकिन यदि वह यहाँ नहीं शामिल होते तो अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो सकता था इसका उत्तर मिला 90 के दशक में।
1989- वही साल जब कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का काला पन्ना इतिहास के साथ जोड़ दिया गया और जिसकी टीस आज भी हर कश्मीरी पंडित के दिल में है। 90 के दशक में पाकिस्तानी ताकतों के बढ़ते प्रभाव ने कश्मीर में आतंक का बोल बाला कर दिया था।
अलगाववादी खुलेआम धमकियाँ दे रहे थीे। मस्जिदों से पंडितों के सफाए के नारे लगने लगे थे। आवाजें सुनाई पड़ने लगी थीं कि कश्मीर में हिंदू औरतें चाहिए लेकिन बिना किसी हिंदू मर्द के। घाटी में कट्टरपंथ ने इतनी तबाही मचाई कि कुछ को इस्लामी आतंकियों ने अपना शिकार बना लिया और कुछ लोग उनकी बर्बरता से बचने के लिए खुद ही अपनों के हाथों मारे गए।
साल 1996 में शेख अब्दुल्ला का बेटा व नेशनल कॉन्प्रेंस का नया चेहरा फारूख अब्दुल्ला सत्ता में आया। इसके बाद साल 2002 में पीडीपी के साथ वहाँ कॉन्ग्रेस पहुँची। फिर पीडीपी के साथ भाजपा का भी गठबंधन हुआ, लेकिन वह ज्यादा समय नहीं चला और राज्य में राज्यपाल शासन लागू करना पड़ा।
नरेंद्र मोदी सरकार ने क्या किए बदलाव
पिछले साल 5 अगस्त 2019 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने राज्य से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को निरस्त किया तो कई विरोधी तिलमिला गए। मगर कश्मीरी पंडितों के लिए मोदी सरकार के फैसले ने एक मरहम की तरह काम किया जिस पर लंबे समय से पूर्ववर्ती सरकार नमक छिड़कने का काम करती थी
ये सच जरूर है कि जिन्होंने उस कट्टरपंथ की आग में अपनों को जलते-कटते-मरते देखा उनके दर्द सिर्फ़ मोदी सरकार के प्रयासों से नहीं भर जाएँगे। इसलिए सोचिए! क्या अनुच्छेद 370 हटने के बाद भी कश्मीरी पंडित भूल जाएँगे कि देश की तात्कालीन सरकार ने अपने स्वार्थ के लिए किस आग में जलाया कि उन्हें अपने अधिकार वापस पाने के लिए 30 साल तक इंतजार करना पड़ा। इस बीच आखिर उनकी क्यों कोई सुनवाई नहीं हुई? क्यों किसी सरकार ने उनकी माँग को तवज्जो नहीं दी। विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी क्या मोदी सरकार से पहले किसी सरकार को जरूरी मुद्दा नहीं लगी?
वास्तविकता तो यह है कि मोदी सरकार ने साल 2014 में सत्ता संभालने के साथ ही यह साबित कर दिया था कि कश्मीर में शांति बहाल करना उनके प्रमुख एजेंडो में से एक हैं। अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीर के 18 दौरे किए थे। इनमें से 9 दौरे तो साल 2014 में ही किए गए थे।
उनकी सख्तियों का परिणाम था कि जो पत्थरबाज पहले सड़कों पर बेखौफ सेना पर हमले करते थे उन पर सेना ने नकेल कसनी शुरू कर दी थी। पिछले साल तक के आँकड़े बताते हैं कि साल 2004 से 2014 तक के बीच में जहाँ कश्मीर में हर वर्ष 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएँ सामने आती थी, वहीं मोदी कार्यकाल में इनकी गिनती कम होकर 300 के आस पास रह गई।
मोदी सरकार ने सेना को खुली छूट दी। पड़ोसी मुल्क की नापाक हरकतों को जवाब देने का मौका दिया। उन्होंने ऑपरेशन ऑलआउट चलवाया ताकि आतंकियों का सफाया हो सके।
बता दें कि बीते दिनों आईएएनएस द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि जम्मू कश्मीर में विशेष दर्ज खत्म किए जाने के बाद से स्थानीयों और सुरक्षाबलों के साथ हुई झड़पों में साल 2016 के मुकाबले 2019 में 94 प्रतिशत कम हुई। वहीं पत्थरबाजी भी 70 प्रतिशत कम हुई।
यदि मोदी कार्यकाल के 5 सालों की बात की जाए और यूपीए सरकार से उनकी तुलना की जाए तो पता चलता है कि सुधार किस हद्द तक हुआ है। साल 2004 से 2014 तक 9,739 आतंकी घटनाएँ हुईं। यानी हर साल औसतन 900 से ज्यादा आतंकी घटनाएँ हुईं। इनमें 4000 आतंकी मारे गए, लेकिन 2000 आम जन की मौत हुई और 1000 से ज्यादा जवान वीरगति को प्राप्त हो गए।
वहीं, 2014 से 2019 के बीच 1708 आतंकी घटनाएँ हुईं। इनमें 838 आतंकी मारे गए, लेकिन 138 आम नागरिकों की मौत हुई और 339 जवान शहीद हो गए। पिछले साल तक हर साल औसतन 300 से ज्यादा घटनाएँ हुईं जो पिछले 10 वर्ष के सालाना औसत आँकड़े की तुलना में 1/3 है।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद के काफिले पर हमले की खबर के साथ ही बुलन्दशहर उपचुनाव में AIMIM के सदर विधानसभा प्रत्याशी दिलशाद अहमद पर भी जानलेवा हमले की खबर सामने आई हैं।
जहाँ एक ओर भीम आर्मी के काफिले पर हमले की जानकारी भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने अपने ट्विटर अकाउंट पर दी है तो वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, AIMIM प्रत्याशी दिलशाद अहमद ने आज़ाद समाज पार्टी के प्रत्याशी हाजी यामीन के समर्थकों पर उन पर जानलेवा हमला करने का आरोप लगाया है। हालाँकि बुलंदशहर पुलिस ने चंद्रशेखर आजाद के इस दावे को झूठ बताया है कि आजाद समाज पार्टी के काफिले पर फायरिंग की गई।
एआईएमआईएम और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच झगड़े की सूचना थी जिस पर थाना प्रभारी कोतवाली नगर मय फोर्स के मौके पर पहुँचे। फायरिंग की घटना असत्य है। जांच कर आवाश्यक कार्यवाही की जाएगी।
गौरतलब है कि भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने रविवार (अक्टूबर 25, 2020) को बुलंदशहर में अपने उम्मीदवार हाजी यामीन के समर्थन में एक रैली को संबोधित करके आगामी उत्तर प्रदेश उपचुनावों के लिए अपना अभियान शुरू किया।
चंद्रशेखर आजाद का दावा है कि रविवार शाम बुलंदशहर में उनकी पार्टी के काफिले पर गोलियाँ चलाई गईं। आजाद ने ट्वीट में लिखा, “बुलंदशहर चुनावों में विपक्षी दलों ने हमारे उम्मीदवार को भयभीत किया और आज की रैली ने उन्हें चिंतित कर दिया, जिसके कारण मेरे काफिले को निकाल दिया गया। ये चाहते है कि माहौल खराब हो लेकिन हम ऐसा नही होने देंगे।”
बुलन्दशहर के चुनाव में हमारे प्रत्याशी उतारने से विपक्षी पार्टीयां घबरा गई है और आज की रैली ने इनकी नींद उड़ा दी है जिसकी वजह से अभी कायरतापूर्ण तरीके से मेरे काफिले पर गोलियां चलाई गई है। यह इनकी हार की हताशा को दिखाता है ये चाहते है कि माहौल खराब हो लेकिन हम ऐसा नही होने देंगे।
बुलंदशहर पुलिस ने इस पर बयान जारी करते हुए कहा है कि आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी और चंद्रशेखर आजाद के काफिले पर फायरिंग और हमले की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन AIMIM प्रत्याशी दिलशाद और आजाद समाज पार्टी प्रत्याशी हाजी यामीन के कार्यकर्ताओं के बीच बुलंदशहर में आपस में गाली-गलौज की सूचना उन्हें मिली थी। पुलिस ने कहा कि पुलिस के मौके पर पहुँचने पर बात संभाल ली गई थी और दोनों पक्ष वहाँ से हट गई थी।
उल्लेखनीय है कि यह उपचुनाव सात सीटों के लिए 3 नवंबर को होने वाले हैं। चंद्रशेखर ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी आजाद समाज पार्टी के नाम के साथ राजनीति में उतरेगी, जबकि भीम आर्मी संगठन के रूप में काम करना जारी रखेगी।
हमारे मुल्क में एक पंथ, एक समुदाय, एक संस्कृति या एक ही धर्म पर प्रयोग करना एक तरह की परंपरा बन गई। त्यौहारों के मौसम में इस परंपरा का आकार दोगुना हो जाता है और संयोग देखिए मात्र एक ही धर्म से जुड़े पहलुओं के साथ ही ऐसा होता है।
नवरात्र में रचनात्मकता की आड़ लेकर हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करने का और करोड़ों लोगों की आस्था को ठेस पहुँचाने का इससे बेहतर अवसर क्या होगा। इसी कड़ी में केरल की एक फोटोग्राफर ने एक पोर्ट्रेट तैयार किया और उसके हाथ में शराब की बोतल और गाँजा थमा दिया। मामला जब गरमाया तो क्षमा माँग कर तस्वीरें डिलीट कर दी… जैसे बात खत्म!
शुरुआत में डिया जॉन नाम की फोटोग्राफर ने लाल साड़ी में एक महिला की तस्वीर साझा की। तस्वीर में महिला गाँजा और शराब का सेवन कर रही है। तस्वीर में उसके पास शंख और त्रिशूल भी है। इसके अलावा एक कमल का फूल भी है, यानी इस पोर्ट्रेट में उस महिला को देवी के रूप में दिखाने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, इस तस्वीर के साथ काफी अपमानजनक शब्दों का ‘कैप्शन’ लिखा हुआ था।
इस मुद्दे पर टाइम्स नाउ से बात करते हुए केरल स्थित फोटोग्राफर ने कहा कि वह अपने सहयोगी और दोस्त (अथिरा, जैकब अनिल, ज़ोहेब ज़ई और अक्षय रजनिथ) के साथ महिला और आज़ादी के विषय पर खोजबीन कर रही थी। इसके बाद उसने कहा कि हमारे समाज में आम तौर पर ऐसी मान्यता है कि महिलाएँ आज्ञाकारी होती हैं और उन्हें आज़ादी नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन उनके भी सपने होते हैं और उन्हें भी आज़ादी मिलनी चाहिए।
इसके बाद फोटोग्राफर डिया ने कहा, “महिलाओं को देवी का तमगा मिला हुआ है, हम इसे पलटना चाहते थे। हमने अपनी तस्वीर या पोस्ट में किसी देवी का नाम नहीं लिखा और न ही किसी धर्म के पहलू का कोई उल्लेख किया।” (सही बात है! इन मासूमों को कैसे पता होगा कि त्रिशूल और शंख किस धर्म के लिए प्रतीकात्मक हो सकते हैं!)
तस्वीर के कैप्शन में यह लिखा था, “महिलाओं को देवी माना जाता है लेकिन उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाता है? अक्सर उन्हें पवित्रता, निर्दोष और सहिष्णुता के पैमाने से होकर गुज़रना पड़ता है और उनके व्यक्तित्व को निर्वस्त्र किया जाता है। क्या यह सही समय नहीं, उनकी इंसानियत को स्वीकार करने का।”
इस मामले के प्रकाश में आने के बाद विवाद शुरू हुआ। इतना स्पष्ट था कि उस तस्वीर में देवी को प्रतीकात्मक रूप में शराब और गाँजे का सेवन करते हुए दिखाया गया। इसके बाद कोच्चि स्थित मंदिर मुक्कूतिल भगवती मंदिर ने शनिवार (24 अक्टूबर 2020) को मराडू पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत में उन्होंने फोटोग्राफर पर धार्मिक भावनाएँ और आस्था को ठेस पहुँचाने का आरोप लगाया। मुक्कूतिल भगवती मंदिर के सचिव और पेशे से अधिवक्ता मधू नारायण ने भी टाइम्स नाउ से बता करते हुए इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा, “मैंने इस प्रकरण में शिकायत दर्ज कराई है।”
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ शिकायत में ऐसा कहा गया है कि तस्वीर में देवी को अपमानजनक रूप में दिखाया गया है और उनकी तुलना वेश्याओं से की गई। तस्वीर में देवी को गाँजा तैयार करते हुए और त्रिशूल और शंख के साथ शराब की बोतल लिए हुए दिखाया गया है। इसके अलावा उस पोस्ट में नवरात्र की शुभकामनाएँ भी दी गई थीं, यानी इसका मतलब साफ़ था कि उन्होंने तस्वीर में मौजूद महिला को दुर्गा के रूप में दर्शाया था।
शिकायत में इस बात का भी ज़िक्र है कि यह सिर्फ और सिर्फ रचनात्मकता की आड़ लेकर हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाने का घटिया प्रयास के अलावा और कुछ नहीं था। नवरात्र के दौरान इस तरह की तस्वीरें साझा करने का मतलब स्पष्ट है कि लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बाँटा जा सके और समाज में अशांति फैलाई जाए।
अधिवक्ता मधू नारायण ने शिकायत के अंतिम हिस्से में लिखा, “जो पोस्ट की गई थी, उसमें से एक ठीक थी लेकिन दूसरी में देवी को शराब और गाँजे का सेवन करते हुए दिखाया गया था। हमें इस बात का इंतज़ार है कि पुलिस इस मामले में जल्द से जल्द जाँच शुरू करे, जल्द ही यह मामला साइबर सेल को भेजा जाएगा। इस मामले में कुछ दिनों के भीतर कानूनी कार्रवाई होगी।” इसके अलावा कई अन्य लोगों ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कराई है।
इतने विवाद के बाद डिया जॉन ने तस्वीर हटा कर पोस्ट डिलीट कर दी और अपनी इस हरकत के लिए माफ़ी भी माँगी।
फ़िलहाल उन विवादित तस्वीरों को डिलीट किया जा चुका है लेकिन फिर भी कई सवाल बचे रह जाते हैं। रचनात्मकता की आड़ लेकर एक धर्म से जुड़ी चीज़ों पर अपनी दोयम दर्जे की मानसिकता का प्रदर्शन करना कितना सही हो सकता है। इस तरह के प्रयास नए नहीं हैं, ख़ास कर जब भी कोई हिन्दू त्यौहार या आयोजन नज़दीक होता है, इस तरह के रचनाधर्मी सक्रिय हो जाते हैं।
इसे महिलाओं की आज़ादी और महिला सशक्तिकरण से जोड़ने वालों के लिए भी यह समझना न जाने कितना मुश्किल है कि केवल मादक पदार्थों को आगे रख देने का अर्थ महिलाओं को आज़ादी देना नहीं होता है। उसके तमाम तरीके हैं, किसी भी सूरत में शराब और गाँजे जैसी चीज़ों से कहीं बेहतर होंगे। महिलाओं के मुद्दे पर होने वाले विमर्शों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उन्हें स्वछंदता के नाम पर शराब और गाँजे तक सीमित कर दिया जाता है।
असम के स्वास्थ्य, वित्त, पीडब्ल्यूडी और शिक्षा मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कॉन्ग्रेस विधायक शेरमन अली की माँग पर सख्त प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि गुवाहाटी में श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में कोई मिया संग्रहालय स्थापित नहीं किया जाएगा। वरिष्ठ मंत्री ने माँग को खारिज करते हुए कहा कि असम में चार क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की कोई अलग-अलग पहचान और संस्कृति नहीं है।
बता दें कि गुवाहाटी में स्थित श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र एक सांस्कृतिक परिसर है, जिसमें असम के इतिहास और संस्कृति, पुस्तकालय, एक ओपन-एयर थियेटर, एक आर्टिस्ट विलेज, एक कला और सांस्कृतिक प्रदर्शनी और हेरिटेज पार्क आदि जैसी कई सुविधाएँ हैं।
हाल ही में कॉन्ग्रेस विधायक शेरमन अली अहमद ने माँग की थी कि असम सरकार को इस परिसर के अंदर एक मिया संग्रहालय स्थापित करना चाहिए। मिया शब्द का तात्पर्य राज्य में रहने वाले बांग्लादेशी प्रवासियों से है। वे बड़े पैमाने पर राज्य के चार क्षेत्रों में, ब्रह्मपुत्र नदी के सैंडबार्स और सहायक नदियों के पास रहते हैं।
दरअसल शेरमन अली अहमद ने कहा था,“मैंने असम के सैंडबार्स पर रहने वाले लोगों के लिए एक संग्रहालय प्रस्तावित किया है। संग्रहालय को कलाक्षेत्र में स्थापित किया जाना चाहिए। चूँकि इन क्षेत्रों की अधिकांश आबादी तथाकथित मिया समुदाय से है, इसलिए इसे मिया संग्रहालय का नाम दिया जाना चाहिए।”
बागबार के कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा था कि असम के चार-चापोरिस (सैंडबार्स) में रहने वाले मिया लोगों की संस्कृति और विरासत को दर्शाते हुए एक संग्रहालय की स्थापना श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र के परिसर में की जानी चाहिए। उन्होंने यह माँग राज्य सरकार के संग्रहालयों के निदेशक को भी लिखा था।
गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस विधायक की इस माँग पर सत्तारूढ़ भाजपा और कई अन्य संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसका विरोध किया। वहीं अहमद पर हमला बोलते हुए भाजपा नेता पाबित्रा मार्गेरिटा ने कहा, “राजीव भवन और AIUDF कार्यालय में मिया संग्रहालय स्थापित किया जाना चाहिए। हम कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ को चेतावनी देते हैं कि वे श्रीमंत शंकरदेव से जुड़े कार्यों और स्थानों से दूर रहें।”
वहीं राज्य सरकार द्वारा माँग को अस्वीकार करने के बाद हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को कहा, “असम सरकार स्पष्ट रूप से बताना चाहती है कि शंकरदेव कालक्षेत्र में कोई मिया संग्रहालय या कोई अन्य संग्रहालय स्थापित नहीं किया जाएगा। संग्रहालयों के प्रबंध विभाग किसी भी मिया संग्रहालय की स्थापना नहीं करेंगे।”
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले साल सीएए के विरोध प्रदर्शन के बाद से कलाक्षेत्र एक निश्चित वर्ग के निशाने पर रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि हिंसक विरोध के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा परिसर के गेट को किस प्रकार नष्ट कर दिया गया था। मंत्री सरमा ने कहा,“अब वही लोग कलाक्षेत्र पर नजर गड़ाए हुए हैं। अन्य संस्कृति और सभ्यता को दर्शाने वाली किसी भी चीज का संग्रहालय में कोई सवाल ही नहीं है।”
उल्लेखनीय है कि इससे पहले मंत्री ने शनिवार को यह कहते हुए ट्वीट किया था कि असम के चार क्षेत्रों में कोई अलग पहचान और संस्कृति नहीं है।
In my understanding, there is no separate identity-and culture in Char Anchal of Assam as most of the people had migrated from Bangladesh. Obviously, in Srimanta Sankardeva Kalakhetra, which is the epitome of Assamese culture, we will not allow any distortion. Sorry MLA Sahab pic.twitter.com/6a2urvTRg4
उन्होंने अहमद द्वारा संग्रहालय के निदेशक को लिखे गए पत्र को पोस्ट करते हुए आगे लिखा था,”जाहिर है, असमिया संस्कृति का प्रतीक श्रीमंत शंकरदेव कालक्षेत्र में हम किसी भी विकृति की अनुमति नहीं देंगे। क्षमा करें विधायक साहब!”
गुवाहाटी के पंजाबी इलाके में स्थित श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र 1985 में हस्ताक्षरित ऐतिहासिक असम समझौते का परिणाम है। यह समझौते के खंड 6 के अनुसार, असम के स्वदेशी लोगों की संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने के लिए स्थापित किया गया था, जिसमें श्रीमंत शंकरदेव द्वारा प्रचारित स्तरीय संस्कृति भी शामिल थी।
लुधियाना के टिब्बा रोड इलाके में एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। जहाँ कोरोना वायरस से बचाने की आड़ में गोदाम मालिक मोहम्मद मुक्तजीर ने मास्क में बेहोशी की दवा डाल कर नाबालिग के साथ बलात्कार किया। पीड़िता के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने आरोपित मोहम्मद मुक्तजीर को गिरफ्तार कर लिया है। पीड़िता इस घटना के बाद से ही सदमे में है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, नाबालिग पीड़िता की माँ मोहम्मद मुक्तजीर नामक व्यक्ति के गोदाम में वर्कर के रूप में काम करती थी। 19 अक्टूबर को अचानक से उसकी तबियत खराब हो गई, जिसकी वजह से उसने उस दिन अपनी नाबालिग 15 वर्षीय बेटी को काम पर अपनी जगह भेज दिया ताकि उसकी दिहाड़ी न कटे। लेकिन माँ को कहाँ पता था कि उसकी बेटी मोहम्मद मुक्तजीर की हैवानियत का शिकार हो जाएगी।
परिजनों द्वारा पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार, जब नाबालिग शाम को ड्यूटी खत्म होने के बाद घर वापस लौट रही थी, तब गोदाम मालिक ने लिफ्ट देने के बहाने उसे कार में बैठा लिया। जिसके बाद कोरोना का हवाला देते हुए उसे मास्क पहनने को दिया। लेकिन जैसे ही नाबालिग लड़की ने मास्क पहना, वह बेहोश हो गई। इसके बाद आरोपित उसे कार में बिठाकर सुनसान जगह ले गया, जहाँ उसके साथ दुष्कर्म किया। जिसके बाद स्वजनों ने इसकी तहरीर पुलिस में दी।
वहीं पीड़ित लड़की ने घटना का ब्यौरा देते हुए पुलिस को बताया कि मोहम्मद मुक्तजीर ने उससे कहा कि आजकल कोरोना चल रहा है, इसलिए वह मास्क पहन ले। आरोपित ने उसे मास्क पहनने के लिए दिया। जैसे ही उसने मास्क पहना, उसे बेहोशी सी छाने लगी। इसके बाद आरोपित कार को सुनसान जगह पर ले गया और उससे दुष्कर्म किया।
गौरतलब है कि मामले को संज्ञान में लेते हुए एएसआइ सुखदेव सिंह ने बताया कि घटना के बाद से ही पीड़िता सदमे में थी। इसके कारण उसके परिवार ने कोई कार्रवाई नहीं की। शनिवार वो लोग पुलिस के पास आए। जिसके बाद केस दर्ज कर लिया गया। सोमवार को पीड़िता का मेडिकल कराया जाएगा।
नवरात्रि के मौके पर महिलाओं के लिए आपत्तिजनक तस्वीर शेयर करके हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली अधिवक्ता दीपिका राजावत के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत पटेल उमरांव समेत कई लोगों ने इसकी जानकारी ट्विटर पर दी है।
सूचना के अनुसार, जम्मू कश्मीर पुलिस ने दीपिका ठुस्सु राजावत के ख़िलाफ़ जम्मू के गाँधी नगर पुलिस थाने में मुकदमा दर्ज किया है। उनके ख़िलाफ़ धारा 505 (बी)(2), 294 और 295 के तहत मामला दर्ज हुआ है।
Why do “educated” Hindus suffer from such severe inferiority Complex that they denigrate their own religion to look more EDUCATED, more SECULAR, more LIBERAL&ELITE? pic.twitter.com/XYywQAihQ6
गौरतलब है कि पिछले दिनों दीपिका राजावत ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पोस्ट की थी। इस पोस्ट में उन्होंने महिलाओं की दो स्थिति को दिखाया था। एक में पुरुष सामान्य दिन में महिला के साथ जबरदस्ती (बलात्कारी के रूप में) कर रहा था और दूसरे में उसी महिला की देवी के रूप में पूजा कर रहा था।
इस तस्वीर को शेयर करते हुए दीपिका ने “विडम्बना” शब्द का इस्तेमाल किया था। इस तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने दीपिका के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग उठाई थी और उनकी गिरफ्तारी के लिए ट्विटर पर हैशटेग भी ट्रेंड होने लगा था।
कुछ लोग दीपिका के ‘राजावत’ सरनेम को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। लोगों का कहना है कि दीपिका ने मेजर से शादी करके उनके सरनेम का इस्तेमाल किया और अलग होने के बाद भी उनके उपनाम का प्रयोग कर रही हैं व अपने बयानों से राजपूतों को बदनाम भी कर रही हैं।
दीपिका थुस्सू पर एक ओर मुकदमा दर्ज होना चाहिए । क्योंकि दीपिका तलाक़ होने के बाद भी उसके पुर्व पति के सरनेम का प्रयोग करके राजस्थान के वीर राजपुत नाम ” सिंह राजावत ” को बदनाम कर रही है। तलाक के बाद उसे राजावत शब्द प्रयोग करने का हक नही है
बता दें कि दीपिका ठुस्सु एक कश्मीरी वकील हैं और जनवरी साल 2018 में एक नाबालिग से रेप की घटना के बाद चर्चा में आई थीं। दीपिका पीड़ित पक्ष की वकील थीं, लेकिन परिवार ने बाद में उन्हें केस से हटा दिया था। पीड़िता के परिजनों ने आरोप लगाया था कि दीपिका इस मामले से सिर्फ पब्लिसिटी ले रही हैं और उनकी केस में कोई रूचि नहीं हैं, वह आदालत में भी नहीं आती हैं।