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32 लाख से ₹353 लाख… सिर्फ 10 साल में: वो MLA जिसकी सदस्यता खुद नीतीश ने करवाई थी रद्द, अभी भी हैं विधायक

बिहार में बाहुबल का इतिहास काफी पुराना है। इसकी धमक सूबे के बाहर भी सुनी जाती रही है। एक वक्त था जब बाहुबलियों ने बिहार में अपनी समानांतर सरकारें भी चलाईं। धन और बाहुबल के जरिए इन्होंने सरकार बनाने से लेकर बिगाड़ने तक का खेल खेला। कभी राजनेताओं की जीत पक्की करने वाले बाहुबलियों को अपने दमखम पर इतना भरोसा हो गया कि उन्होंने खुद चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाना शुरू कर दिया। 

अभी एक बार फिर से बाहुबलियों की चर्चा जोरों पर है। वजह है चुनाव का सिर पर होना। बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है। 3 चरणों में राज्य में चुनाव होने हैं, जिसमें राजनीतिक पार्टियों के साथ ही बाहुबलियों ने भी जोर आजमाइश शुरू कर दी है। उत्तर पूर्व बिहार के कोसी क्षेत्र की राजनीति की बात हो तो यह बाहुबली नेता नीरज कुमार सिंह बबलू के बिना पूरी नहीं हो सकती। नीरज कुमार सिंह वर्तमान में सुपौल के छातापुर विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक हैं।

अभिनेता सुशांत के चचेरे भाई हैं नीरज कुमार

खास बात यह है कि देश के सबसे हॉट टॉपिक्स में से एक बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह की संदिग्ध मौत मामले के बाद नीरज कुमार सुर्खियों में बने हुए हैं। बताया जाता है कि सुशांत इनके चचेरे भाई थे। संदिग्ध स्थिति में सुशांत की मौत को लेकर इन्होंने शुरुआती समय में ही कहा था कि उन्होंने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी हत्या की गई है।

बीजेपी विधायक नीरज बबलू ने सुशांत सिंह राजपूत मौत मामले में काफी मुखरता से आवाज उठाई थी। उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से व्यक्तिगत रूप से इस मामले की जाँच सीबीआई से करवाने की माँग की थी। वे सुशांत सिंह राजपूत के अंतिम संस्कार में शामिल होने मुंबई भी गए थे।

अपराधों से गहरा नाता

2005 से ही सुपौल के छातापुर विधानसभा सीट से विधायक रहे नीरज कुमार सिंह बबलू के नाम पर पुलिस थानों में कई केस दर्ज हैं। सुपौल में हुए दोहरे हत्याकांड में नाम सामने आने के बाद नीरज कुमार चर्चा में आ गए थे। तब पुलिस ने रेत के ढेर के नीचे से दो लाशें बरामद की थीं। मारे गए युवकों के परिजनों ने नीरज कुमार पर हत्या करवाने का आरोप लगाया था। इस मामले में जब विधायक नीरज बबलू से बात की गई तो उन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा था कि बेटों के बिछड़ने के गम में परिजनों को मानसिक आघात लगा है, इस कारण उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

नीरज सुपौल के बड़े दबंग के तौर पर जाने जाते हैं और उनके खिलाफ कई संगीन मामले पुलिस थानों में दर्ज हैं। उन पर चोरी से संबंधित 3 (आईपीसी धारा -379), आपराधिक धमकी से संबंधित 1 (आईपीसी धारा -506), हत्या की धमकी से संबंधित 2 (आईपीसी धारा -386) अपहरण से संबंधित 1, चोट पहुँचाना, मारपीट (आईपीसी की धारा -452) से संबंधित 1, हत्या से संबंधित आरोप (IPC धारा -307), घर को नष्ट करने के इरादे से आग या विस्फोटक पदार्थ के इस्तेमाल से संबंधित (आईपीसी धारा -436) जैसे कई केस दर्ज हैं

2005 में उनके खिलाफ 15, 2010 में 6 और साल 2015 में 8 आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे। हालाँकि इनमें से किसी भी मामले में उन पर आरोप साबित नहीं हुआ है और उन्हें किसी भी मामले में सजा नहीं मिली है।

राजनीतिक करियर

छातापुर विधासभा सीट से 2015 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत कर नीरज चौथी बार विधानसभा पहुँचे थे। बीते चुनाव में कोसी क्षेत्र में बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था लेकिन नीरज ने काँटे की टक्कर देकर आरजेडी प्रत्याशी जहूर आलम को हराकर शानदार जीत दर्ज की थी।

नीरज ने करीब 11 हजार वोटों के अंतर से तत्कालीन जदयू-आरजेडी महागठबंधन के उम्मीदवार जहूर आलम को शिकस्त दी थी। नीरज कुमार सिंह साल 2005 से ही लगातार छातापुर विधानसभा सीट से चुनाव जीतते रहे हैं। बीजेपी में शामिल होने से पहले नीरज कुमार सिंह बबलू नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का भी हिस्सा रह चुके हैं।

नीरज कुमार बबलू JDU के टिकट पर 3 बार विधायक रह चुके हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा से इनकी सदस्यता खत्म करवा दी थी, लेकिन कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया था। जिसके बाद बबलू ने नीतीश से बगावत कर BJP का दामन थाम ‌लिया। अब विधानसभा चुनाव में ये BJP के टिकट पर छातापुर से उम्‍मीदवार हैं। RJD ने यहाँ से इनके मुकाबले मोहम्मद जफूर आलम को अपना उम्मीदवार बनाया है। नीरज कुमार सिंह को कोसी क्षेत्र में बीजेपी का बड़ा चेहरा माना जाता है।

साल 2017 में छातापुर के भाजपा विधायक नीरज कुमार बबलू ने कहा था कि उनसे कजाकिस्तान से फोन कर पाँच करोड़ रुपए रंगदारी माँगी गई है और नहीं देने पर गोली से छलनी कर देने की धमकी दी गई है।

राज्य के हाईवे प्रोजेक्ट को डील करने वाली कंपनी Gammon-India Ltd ने रंगदारी मामले में जनवरी 2008 में इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। इसमें बबलू के खिलाफ 9 लाख रुपए की रंगदारी माँगने की शिकायत की गई थी। बबलू कभी बिहार के एक दूसरे बाहुबली और राजपूतों के नेता आनंद मोहन के करीबी के रूप में जाने जाते थे।

कितनी है नीरज कुमार की संपत्ति

ADR की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव में जो उन्होंने हलफनामा दिया था, उसके आधार पर साल 2005 में उनकी संपत्ति 32,41,534 रुपए थी। 2010 के चुनाव में उनकी संपत्ति बढ़कर 1,07,11,894 रुपए हो गई। वहीं साल 2015 के हलफनामे के मुताबिक अभी उनकी संपत्ति 3,53,73,770 रुपए है। उन पर अभी करीब 8 लाख रुपए की देनदारी है। उनके पास कृषि योग्य भूमि भी है।

उत्तर बिहार में भारी पड़ते रहे हैं बाहुबली

उत्तर बिहार में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बाहुबली बंदूक के बल पर वोट बटोरते रहे हैं। बूथों पर बंदूकबाजों की चलती थी और लाशें भी गिरतीं थीं। एक वह भी दौर था, जब बिहार में होने वाले अधिकतर चुनाव रक्तरंजित होते थे। जब तक ईवीएम से मतदान आरंभ नहीं हुआ था, बाहुबली और उनके गुर्गे बूथों पर कब्जा जमाते थे। कई दशकों तक चुनाव में वीरेंद्र सिंह मोहबिया जैसे बाहुबलियों का बोलबाला रहा। 

गोपालगंज में काली पांडेय, सीवान में मोहम्मद शहाबुद्दीन, शिवहर में आनंद मोहन और मुजफ्फरपुर-वैशाली में कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला जैसे बाहुबलियों की उम्मीदवारी से चुनावी बाजियाँ पलटती रहीं। चंपारण की धरती पर भी कई बाहुबलियों का आमना-सामना हुआ, जिसमें कई अब दिवंगत हो चुके हैं। चंपारण के जंगलों में भी दस्यु समूहों का काफी प्रभाव था, जो येन-केन-प्रकारेण चुनावी राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करते थे।

महाराष्ट्र में CBI की जाँच पर रोक: उद्धव सरकार ने 1946 के एक्ट का लिया सहारा, जारी किया लेटर

ऐसे समय में जब सीबीआई महाराष्ट्र में कई हाई प्रोफाइल मामलों में जाँच कर रही है, सीएम उद्धव ठाकरे ने राज्य में सीबीआई जाँच पर सीधे रोक लगा दी है। बुधवार (21 अक्टूबर 2020) को महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसमें उन्होंने सहमति से राज्य में सीबीआई जाँच को प्रतिबंधित कर दिया। 

क़ानून और दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी राज्य में सीबीआई जाँच जारी रखने के लिए राज्य सरकार की अनुमति अनिवार्य है। बिना राज्य सरकार की अनुमति के सीबीआई उस राज्य से संबंधित किसी भी मामले की जाँच नहीं कर सकती है। इस तरह के घटनाक्रम में अनुमति की ज़रूरत से बचने के लिए उद्धव सरकार ने इन मामलों के संबंध में आदेश जारी कर दिया, जिनकी जाँच सीबीआई कर रही है।

उद्धव सरकार ने इस तरह मामलों को वापस ले लिया है। इसका मतलब यह हुआ कि सीबीआई को किसी भी मामले में जाँच करने के लिए राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी। यह कदम उस घटना के ठीक एक दिन बाद उठाया गया है, जब टीआरपी घोटाला मामले में सीबीआई ने मामला दर्ज किया था। इस मामले में मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क पर खूब निशाना बनाया और इंडिया टुडे का बराबर बचाव किया। 

मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह और रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ़ अर्नब गोस्वामी के बीच जारी इस विवाद में, परमबीर सिंह ने आरोप लगाया था कि यह समाचार चैनल उन घर के लोगों को रिश्वत दे रहा है, जिनके घरों में बार्क (BARC) के मीटर्स लगे हैं। परमबीर सिंह के मुताबिक़ ऐसा इसलिए किया गया, जिससे रिपब्लिक टीवी की व्यूअरशिप बढ़े। इसके बाद रिपब्लिक टीवी ने इस एफ़आईआर से जुड़ी जानकारी इकट्ठा की और वह शिकायत भी, जिसके आधार पर एफ़आईआर दर्ज की गई थी। इसके बाद पता चला कि उस एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम कहीं नहीं दर्ज है बल्कि इंडिया टुडे का नाम दर्ज है। 

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा टीआरपी घोटाला मामले में सीबीआई जाँच की माँग उठाने के बाद सीबीआई ने मामला दर्ज किया क्योंकि यह प्रकरण पहले से ही काफी चर्चा में था। यह प्रकरण चर्चा में तब आया, जब मुंबई पुलिस के वकील ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में कहा कि एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम कहीं भी दर्ज नहीं है और यह बात पुलिस द्वारा किए गए दावों से कहीं अलग है। यह तथ्य अपने आप में कई तरह से सवाल खड़े करता है। 

सुशांत सिंह राजपूत मामले की जाँच भी सीबीआई ही कर रही है। बिहार पुलिस द्वारा दिए गए सुझाव के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत ने इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी। इसके अलावा ऐसे कई और मामले हैं, जिनकी जाँच सीबीआई को सौंपने की माँग काफी ज्यादा उठ रही है। इसमें पालघर साधुओं की लिंचिंग और दिशा सालियान मुख्य हैं। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि इन मामलों में पुलिस ने सिर्फ और सिर्फ खानापूर्ति की है।       

BJP कार्यकर्ताओं पर लाठी-डंडों से हमला, कई बुरी तरह घायल: बंगाल में नहीं थम रहा TMC का गुंडा राज

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विसंगतियों के हालात छिपे नहीं हैं, आए दिन वहाँ उपद्रव, हिंसा और हत्या की घटनाएँ सामने आती हैं। निशाने पर होते हैं भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता और भूमिका में होते हैं तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे। इसी कड़ी में एक और घटना सामने आई है। पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में ‘रैली’ निकाल रहे भाजपा कार्यकर्ताओं पर तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने अचानक हमला कर दिया। इस सुनियोजित घटना में भाजपा के कई कार्यकर्ता बुरी तरह घायल हुए हैं। 

दरअसल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बुधवार (21 अक्टूबर 2020) को पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले स्थित पुरबस्थली में एक रैली निकाली। यह रैली केंद्र की मोदी सरकार द्वारा हाल ही पारित किए गए कृषि कानूनों (Farm Laws) के समर्थन में निकाली जा रही थी। रैली के दौरान अचानक तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने भारी संख्या में आकर भाजपा कार्यकर्ताओं पर धावा बोल दिया। 

इस घटना में भाजपा के कई कार्यकर्ता बुरी तरह घायल हो गए। घटना का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें साफ़ देखा जा सकता है कि लाठी और डंडों से हमला किया जा रहा है। हमले में भाजपा के राज्य तफ्सीली मोर्चा के बिपुल दास समेत कई अन्य नेता और कार्यकर्ता बुरी तरह घायल हुए हैं। हमले की जानकारी मिलते ही पुलिस ने मौके पर पहुँच कर हालात नियंत्रित किए। इसके अलावा घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। 

यह पहली ऐसी घटना नहीं है, जब तृणमूल गुंडों की अराजकता की घटना सामने आई हो। कुछ दिन पहले भाजपा के नवान्न अभियान के दौरान बंगाल पुलिस की गुंडागर्दी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। इसमें बंगाल के एक पुलिस अधिकारी को एक ऑन-ड्यूटी सिख सुरक्षाकर्मी की पगड़ी खींचते हुए और उनकी बेरहमी से पिटाई करते हुए देखा जा सकता था। भाजपा नेता प्रियांगु पांडेय के सुरक्षा गार्ड बलविंदर सिंह पर उस समय हमला हुआ था, जब पश्चिम बंगाल पुलिस ने गुरुवार को कोलकाता की सड़कों पर भाजपा कार्यकर्ताओं को बेरहमी से पीटा और बड़े पैमाने पर लाठीचार्ज किया।

इसी तरह अक्टूबर महीने की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं ने कृषि विधेयक के समर्थन में रैली निकाली थी। इस दौरान उन पर तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने धावा बोल दिया था। उनके द्वारा किए गए हमले में भाजपा के कई कार्यकर्ता बुरी तरह घायल भी हो गए थे, घटना के कई वीडियो ट्विटर पर साझा किए गए थे। 

पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले स्थित नोडाखली गाँव में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कृषि क़ानून के समर्थन में शनिवार (3 अक्टूबर 2020) को रैली निकाली थी। तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला किया था। घटना के वीडियो में साफ़ देखा गया था कि उनके हाथ में पत्थर और डंडे थे यानी वह इस घटना को अंजाम देने के लिए पूरी तैयारी के साथ आए थे। हमले की इस घटना के मामले में कुल 7 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। 

पैगंबर मोहम्मद के ढेर सारे कार्टून… वो भी सरकारी बिल्डिंग पर: फ्रांस में टीचर के गला काटने के बाद फूटा लोगों का गुस्सा

फ्रांस के पेरिस में एक शिक्षक थे सैम्युएल पैटी। इतिहास पढ़ाते थे। पढ़ाते-पढ़ाते उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद के उन कार्टूनों को दिखा कर अपने छात्रों से चर्चा की, जिसे लेकर कट्टरपंथी इस्लामियों ने साल 2015 में शार्ली हेब्दो के कर्मचारियों का नरसंहार किया था। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनका गला काट दिया जाएगा।

इस घटना के बाद फ्रांस सहित पूरी दुनिया में शिक्षक सैम्युएल पैटी और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए समर्थन शुरू हो गया। यह समर्थन लेखों और संपादकीय से निकल कर सड़कों तक भी पहुँच गया। लोगों ने मुखर होकर कट्टरपंथी इस्लामी सोच के विरुद्ध आवाज उठाई। फ्रांस में यह आवाज और तेज उठी है।

फ्रांस के ऑसिटैन क्षेत्र (Occitanie region) के दो टाउन हॉल मोंटपेलियर (Montpellier) और टूलूज़ (Toulouse) के बाहर शिक्षक सैम्युएल पैटी को याद करते हुए और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने के लिए पैगम्बर मोहम्मद के उन कार्टूनों का 4 घंटे तक प्रदर्शन किया गया, जिनको लेकर शार्ली हेब्दो के कर्मचारियों का 2015 में नरसंहार किया गया था। सबसे पहले इन कार्टूनों का प्रकाशन शार्ली हेब्दो पत्रिका में ही किया गया था।

स्थानीय सरकारी इमारतों पर शार्ली एब्दो के विवादित कार्टून (पैगंबर मोहम्मद के कार्टून) के प्रदर्शन के कारण दंगे-फसाद से बचने के लिए हथियारों से लैस पुलिस अधिकारियों ने सुरक्षा की। जगह-जगह लोगों ने शिक्षक सैम्युएल पैटी को याद करते हुए उनके बड़े-बड़े पोस्टर भी लगाए थे। जहाँ-जहाँ उनके पोस्टर लगे हुए थे, वहाँ भी फ्रेंच पुलिस को हथियारों के साथ गस्त करते देखा गया।

आपको बता दें कि इस्लामी कट्टरपंथी द्वारा शिक्षक का गला काटने की घटना के बाद फ्रांस ने इस तरह की समस्याओं का सामना करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। फ्रांस 231 विदेशी कट्टरपंथी नागरिकों को बाहर निकालने की तैयारी कर रहा है। फ्रांस सरकार की तरफ से होने वाली यह कार्रवाई कट्टरपंथ और आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में एक अहम कदम माना जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने इस घटना पर रोष जताते हुए कहा था:

“यह एक इस्लामी आतंकवादी हमला है। देश के हर नागरिक को इस चरमपंथ के विरोध में एक साथ आगे आना होगा। इसे किसी भी हालत में रोकना ही होगा क्योंकि यह हमारे देश के लिए बड़ा ख़तरा साबित हो सकता है।”

मुनव्वर राणा की बेटी उरूसा ने थामा कॉन्ग्रेस का हाथ, CAA विरोध प्रदर्शन से आई थी चर्चा में

मशहूर विवादित शायर मुनव्वर राणा की बेटी उरूसा राणा ने कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया है। उन्हें पार्टी ने लखनऊ से कॉन्ग्रेस महिला समिति की नई उपाध्यक्ष बनाया है। कॉन्ग्रेस महिला समिति की अध्यक्ष ममता चौधरी ने लखनऊ पार्टी मुख्यालय में उरूसा राणा को पद भार ग्रहण कराया।

कॉन्ग्रेस में शामिल होने के बाद उरुषा ने संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने कॉन्ग्रेस को हमेशा एक परिवार समझा है। उनके मुताबिक़ कॉन्ग्रेस अब पूरी तरह से मैदान में आ चुकी है और दूसरी कोई और पार्टी दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है। चाहे वह समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी।

इस दौरान उन्होंने कहा कि वह कॉन्ग्रेस आला कमान को यकीन दिलाती हैं कि वह पार्टी के लिए पूरी ताकत से काम करेंगी। उन्होंने कहा कि महिलाओं के सम्मान के लिए पहले खुद के घर से शुरुआत करनी होगी, फिर समाज में महिलाओं के लिए लड़ाई लड़ती रहूँगी।

महिला कॉन्ग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष ममता चौधरी ने उरूसा राणा को पत्र लिखकर मनोनयन की जानकारी दी है। ममता चौधरी ने कहा कि लॉकडाउन में उरुषा राणा की कार्यशैली अच्छी रही है। इन्होंने श्रमिकों और खासतौर पर महिलाओं के लिए अलग हट कर काम किए हैं। इसे देखते हुए उन्हें महिला कॉन्ग्रेस में प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है।

आपको बता दें कि मुनव्वर राणा की एक और बेटी फौजिया राणा भी कुछ दिनों पहले बिहार कॉन्ग्रेस में शामिल हुई थीं। मुनव्वर राणा की बेटी फौजिया राणा भी 2 अक्टूबर को कॉन्ग्रेस में शामिल हो चुकी हैं। उन्होंने पटना में कॉन्ग्रेस की सदस्यता हासिल की थी। तब फौजिया ने चुनाव लड़ने के सवाल पर कहा था कि अगर पार्टी उन्हें निर्देश देगी तो वो चुनाव मैदान में उतरेंगी।

शायर मुनव्वर राणा की बेटियाँ फौजिया, सुमैया और उरूसा ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। तब से ये तीनों चर्चा में आई थीं। फौजिया राणा तो शाहीन बाग भी पहुँची थीं, जो सीएए विरोध का प्रमुख केंद्र रहा। फौजिया ने लखनऊ में भी घंटाघर पर सीएए के विरोध में धरना दिया था। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

उरूसा राणा ने अपनी बहन सुमैय्या और फौजिया राणा का खुलकर समर्थन किया था। साथ ही, पीएम मोदी और यूपी की योगी सरकार को खुली चुनौती देते हुए घंटाघर पर कई दिनों तक सरकार के खिलाफ चले महिलाओं के प्रर्दशन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी।

गौरतलब है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में चल रहे सीएए, एनआरसी के विरोध प्रदर्शन के दौरान मुनव्वर राणा की बेटी सुमैया राणा ने कहा था, “हमें ध्यान रखना है कि हमें इतना भी न्यूट्रल (तटस्थ) नहीं होना है कि हमारी पहचान ही खत्म हो जाए। पहले हम मुस्लिम हैं और उसके बाद कुछ और हैं। हमारे अंदर का जो दीन है, जो इमान है, वह जिंदा रहना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम अल्लाह को भी मुँह दिखाने लायक न रह जाएँ।”

यूथ कॉन्ग्रेस प्रमुख ने मोदी सरकार के बिहार पैकेज पर फैलाई फर्जी सूचना, BJP अध्यक्ष के बयान में घुसाई अपनी गणित

बिहार चुनाव से पहले, कॉन्ग्रेस पार्टी ने एनडीए सरकार को निशाना बनाने के लिए फर्जी खबर और गलत सूचनाओं का सहारा लेना शुरू कर दिया है। ऐसा लगता है जैसे चुनावों में भारी नजर आ रही भाजपा के खिलाफ महागठबंधन के पास किसी तरह की कोई राजनीतिक बयानबाजी न होने के कारण उनके पास तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना ही आखिरी विकल्प रह गया है।

बुधवार (अक्टूबर 21, 2020) को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बिहार के मोतिहारी में एक जनसभा को संबोधित किया। अपने 30 मिनट के लंबे भाषण के दौरान, जेपी नड्डा ने मोदी सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों के दौरान स्वीकृत पैकेज पर प्रकाश डाला। जेपी नड्डा के इस भाषण पर यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी ने निशाना साधा

यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने फर्जी खबरों के साथ भाजपा पर निशाना साधा

उन्होंने भाजपा के आधिकारिक हैंडल से एक ट्वीट को रीट्वीट किया, जिसमें जेपी नड्डा के भाषण के सिर्फ एक छोटे हिस्से पर प्रकाश डाला गया था। बीजेपी ने ट्वीट किया था, ‘5 साल पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि बिहार राज्य में कुल 1,25,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे। उस समय लालू यादव (राजद सुप्रीमो) ने इसे चुनावी जुमला करार दिया था। पिछले 5 वर्षों में पीएम मोदी ने किसानों के लिए 3,904 करोड़ रुपए, शिक्षा के लिए 1,000 करोड़ रुपए और स्वास्थ्य के लिए 600 करोड़ रुपए भेजे थे।”

इस धारणा के तहत कि बिहार में मोदी सरकार द्वारा किया गया यह एकमात्र खर्च था, यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी ने यह आरोप लगाने की कोशिश की कि भाजपा ने लोगों से किए गए वादों में से एक चौथाई धन भी खर्च नहीं किया है। उन्होंने दावा किया, “लगता है शाखा में पढ़ाई गई गणित के हिसाब से 3,904 करोड़ रुपए+ 1,000 करोड़ रुपए+ 600 करोड़ = 1, 25,000 करोड़ रुपए होता है। जैसा चौपट राजा (पीएम मोदी) वैसा ही सेनापति।”

Screengrab of the tweet by Srinivas BV

सच क्या है?

हालाँकि जेपी नड्डा ने केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत बिहार पैकेज के पूरे ब्रेकडाउन को सूचीबद्ध किया था, मगर यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने भाषण के केवल एक छोटे से हिस्से का इस्तेमाल करते हुए उन्हें और भाजपा को निशाना बनाने की कोशिश की। भाजपा द्वारा पोस्ट किए गए बाद के ट्वीट में बिहार के कल्याण के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गए अन्य खर्चों को इंगित किया गया था।

ट्वीट में कहा गया था, “बिजली के लिए 16,130 करोड़ रुपए, सड़कों के लिए 13,820 करोड़ रुपए, हाइवे पर 54,713 करोड़ रुपए, एयरपोर्ट के लिए 2,700 करोड़ रुपए, पेट्रोलियम और गैस लाइन के लिए 21, 476 करोड़ रुपए और अमृत की 22 जगहों के लिए 1,400 करोड़ रुपए दिए हैं।”

भाजपा के ट्विटर हैंडल ने बिहार पैकेज के प्रत्येक विवरण को सूचीबद्ध किया है। ट्विटर पर कैरेक्टर लिमिटेशन होने की वजह से इसका विवरण कई ट्वीट्स में दिया गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पेट्रोलियम, बिजली, सड़क और राजमार्ग निर्माण आदि पर खर्च की गई राशि को जोड़ने पर कुल खर्च 1,25,000 करोड़ के करीब है।

हालाँकि, यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष ने मोदी सरकार द्वारा स्वीकृत कुल पैकेज के रूप में स्वास्थ्य, शिक्षा और किसानों पर होने वाले खर्च को झूठा मानते हुए आरएसएस की शाखाओं पर कटाक्ष करने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि भाजपा में गणित की समझ का अभाव है, इससे स्पष्ट होता है कि श्रीनिवास बीवी में निश्चित रूप से गणित और अन्य विषयों की मूलभूत समझ की कमी है।

कपटी वामपंथियो, इस्लामी कट्टरपंथियो! हिन्दू त्योहार तुम्हारी कैम्पेनिंग का खलिहान नहीं है! बता रहे हैं, सुधर जाओ!

कुकुरमुत्तों में दो गुण होते हैं, पहला है कहीं भी उगे तो ऐसे उगेंगे कि नियंत्रित करना दुष्कर हो जाता है। दूसरा गुण, वस्तुतः अवगुण, इसमें से कई जहरीले भी होते हैं। दिखने में वैसे ही लगते हैं जैसे आम गोबरछत्ता या कुकुरमुत्ता होता है। बिहार के मिथिला क्षेत्र में इन्हें ‘गोबरछत्ता’ बोला जाता है क्योंकि ये गोबर पर ‘छाते’ की शक्ल में उगते हैं। कुकुरमुत्ता इसलिए नहीं बोलते क्योंकि ‘कुकुर’ हमारी तरफ कुत्तों को बोला जाता है, और ‘मुत्ता’ का संबंध लघुशंका निवारण में निकले अपशिष्ट तरल से होता है।

ऐसी ही एक प्रजाति मनुष्यों में भी पाई जाती है जो जहाँ भी जाती है, कुकुरमुत्तों की तरह फैलती है, और उसकी सोच जहरीली होती है। इसके संसर्ग में जो भी आता है, अगर इनकी मात्रा अधिक हो, तो वो बच नहीं पाता। पूरे विश्व में इस प्रजाति को एक दूसरी तरह की प्रजाति संरक्षण देती है। ये उन्हीं के सड़न से अपना पोषण पाते हैं। वो जितना सड़ेंगे, गलेंगे, दुर्गंध फेंकेंगे, पहले वाले उतने ही ज्यादा सुपोषित हो कर लड़ने को तैयार मिलेंगे। जहरीले कुकुरमुत्तों के अनूठे प्रयोग पर पॉल थॉमस एंडरसन द्वारा निर्देशित, और डेनियल डे लुइस अभिनीत एक हॉलीवुड फिल्म ‘फैंटम थ्रेड’ भी आई थी।

खैर, यह तो हो गई जीव विज्ञान से संबंधित जानकारी, जिसका इस लेख से कोई खास मतलब है नहीं। शुरु में अगर आप ऐसी वैज्ञानिक बातें लिख देते हैं तो लोगों को लगता है कि आदमी जानकार है। तो, अब मुद्दा यह है कि भारत में हिन्दुओं के हर त्योहार के पहले वामपंथियों, जकातियों, इस्लामी कट्टरपंथियों का एक गिरोह अचानक से सक्रिय हो जाता है। वो हर त्योहार में आपको ज्ञान देने लगता है कि कहाँ क्या गलत है।

इनके ऐसा करने का बस एक ही उद्देश्य होता है: गाली सुनना और फिर विक्टिम कार्ड निकालना कि ‘देखो, हमको गाली पड़ रही है’। अरे, पतिता! जब काम ही गाली सुनने वाले करोगी, तो क्या तुमको प्रणय आलिंगन का निमंत्रण देंगे लोग? महिला होने का मतलब ये नहीं है कि बेहूदगी करते रहो, और सामने वाला सहता रहे कि अरे ये पापिनी तो महिला है, इसे कैसे जवाब दें! सीधी बात है कि लैंगिक असमानता एक पाप है, और शठे शाठ्यम् समाचरेत् की तर्ज पर, जैसे को तैसा मिलता रहेगा।

हाल ही में, कठुआ मामले से कुख्याति पाने वाली दीपिका नामक वकील ने किसी लपड़झंडू द्वारा बनाए एक कार्टून को शेयर किया जिसमें नवरात्रि को ले कर एक भद्दा से चित्रण था। दो चित्र थे, एक तरफ लिखा था ‘अन्य दिन’ जिसमें एक पुरुष स्त्री के पैर को जकड़े हुए था और (संभवतः) दुराचार करने का प्रयास कर रहा था। दूसरी तरफ ‘नवरात्र’ लिखा हुआ था, और वहाँ वही पुरुष देवी की पूजा कर रहा था।

कई लोग भ्रम की स्थिति में थे कि दीपिका सिंह राजावत ने अपने परिवार की तस्वीर तो नहीं लगा दी। लोग सहानुभूति जताने लगे कि ‘ओह! दीपिका जी, आपके साथ आपके घर में ऐसा होता है’। दीपिका ने स्पष्ट रूप से लिखा नहीं था कि वो अपनी व्यथा कह रही हैं या कुछ और। अगर उनके घर में ये सब होता है तो मेरी सहानुभूति उनके साथ है, अगर नहीं तो फिर उन्हें पूरे समाज के बारे में ऐसी बेहूदगी दिखाने की आवश्यकता नहीं।

हम में से कई यह प्रश्न उठा सकते हैं कि क्या हमारे समाज में स्त्रियों की हालत खराब नहीं है, और मैं इस तथ्य से मुँह मोड़ रहा हूँ। प्रश्न सही है, लेकिन मूर्खतापूर्ण है। पहली बात तो यह है कि इससे इनकार नहीं है कि इस देश में हर पंद्रह मिनट पर बलात्कार की एक घटना घटती है। लेकिन, यह एक समाज की सामान्य सोच को परिलक्षित नहीं करता। आप अपवाद को उदाहरण नहीं बना सकते कि जो दिन में रेप करता है, वो शाम में आरती उतार रहा है।

नहीं, अगर आपको प्रतिशत जानना है तो पूरी जनसंख्या का 0.002 प्रतिशत ही बलात्कारी है। आपको जनसंख्या का संदर्भ लेना ही होगा क्योंकि आप अपवाद को उदाहरण की तरह बता रहे हैं जैसे कि हर पुरुष जो पूजा करता है, वो बाकी समय बलात्कार करता रहता है। ऐसा न तो है, न ही यह संभव है क्योंकि इस तरह की मानसिक विकृति हमारे समाज में नहीं है। कुछ-एक समाज में ऐसी विकृतियाँ हैं जहाँ उनके मजहब से बाहर के लोगों का बलात्कार करना उनके मजहबी शिक्षण संस्थानों में सिखाया जाता है। वह एक समस्या है। इसलिए दो चीजों को मिलाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।

इसका दूसरा हिस्सा यह है कि तुम्हें ये सब फालतू ज्ञान देने के लिए हिन्दुओं के ही त्योहार क्यों मिलते हैं? हमारे ही त्योहारों के समय देवी दुर्गा के आभूषण और सज्जा के साथ चेहरे पर अत्याचार के निशान वाली तस्वीरें इंटरनेट पर क्यों डालते हो? ये ईद पर क्यों नहीं दिखता? क्रिसमस पर क्यों नहीं दिखता? नमाज पढ़ती तस्वीरें एक तरफ लगा कर क्यों नहीं पूछते कि एक तरह तो ये कर रहे हो, दूसरी तरफ कोई मुस्तफा किसी राधिका को प्रेम का लोभ दे कर रेप करने के बाद मार डालता है?

तुम्हारा ये ज्ञान रेहान बेग द्वारा मुर्गी के बलात्कार पर क्यों नहीं निकलता कि मजहबी जश्न के दिन बिरयानी खाते हो, बाकी दिन मुर्गी का रेप करते हो? मेवात का हारून और जफ्फार जब गर्भवती बकरी का बलात्कार देता है तब क्यों नहीं लिखते उनके त्योहारों की तस्वीरें लगा कर अन्य दिन बकरी का बलात्कार और खास दिन मटन कोरमा? मध्य प्रदेश में जब छोटे खान पायजामा उतार कर गाय का रेप कर रहा होता है, तब तो तुम नहीं लिखते ऐसी बातें!

लड़कियों के बलात्कार की बातें तो छोड़ ही दो, प्रेम के नाम पर बहलाना-फुसलाना और हर बार हिन्दू लड़की का ऐसे मामलों में बलात्कार के बाद हत्या करना क्या बताता है? वहाँ ये कविता कृष्णन जैसी धूर्त वामपंथनें क्यों चुप हो जाती हैं? चाहे वो बदरुद्दीन हो, कमर अली हो, वसीम, सावेज, अखलाख, आरिफ, आमिर हो, रहमान हो, अजमल हो या खालिद… इन्होंने न सिर्फ हिन्दू लड़कियों को अपना शिकार बनाया बल्कि अपने बाप के साथ, चाचा के साथ, भाई के साथ, दोस्तों के साथ नाबालिग बच्चियों तक का रेप करवाया और अंत में मार कर फेंक दिया।

गूगल पर ‘मौलवी ने किया रेप’ लिख कर सर्च करो तो हजारों घटनाएँ मिल जाएँगी। लेकिन यही वामपंथी कभी भी ये ज्ञानवर्धक कार्टून ईद-बकरीद पर तो नहीं दिखाते। तब तो इनकी अम्मा मर जाती है, उँगलियों में कोढ़ हो जाता है और नीचे बवासीर कि बैठता हूँ तो दर्द उठता है, दर्द उठता है बैठ जाता हूँ! ऐसी क्या शारीरिक व्याधि हो जाती है कि ये सारी घटनाएँ कभी दिखती ही नहीं इन आँख के अंधों को?

होली, दिवाली, नवरात्रि… जितने त्योहार उतना ज्ञान

ईद पर जानवरों के कटने से खून बहने से लाल हुई सड़कें और नालियाँ नहीं दिखती, और इनके द्वारा समर्थित संस्थाएँ रक्षाबंधन पर गाय की फोटो के साथ ‘चमड़ा मुक्त’ बनने के संदेश देती है। वैसे ही, ये लोग घी के दिए जलाने पर आपत्ति जताते हैं और कहते हैं कि ‘वीगन घी’ का प्रयोग करो। ये सारा ज्ञान सिर्फ हिन्दुओं के त्योहार पर निकलता है।

दीवाली या दीपोत्सव पर लाखों दीपों की शोभा देखते ही बनती है लेकिन वामपंथियों के स्थान विशेष तक उसका ताप पहुँच ही जाता है जब वो ज्ञान देने लगते हैं कि इतने घी के दिए जलाने की बजाय अगर गरीबों को भोजन दिया जाता तो असली दीवाली वही होती। जैसे कि गरीबों के लिए जो लाल और पीला कार्ड वाली योजनाएँ हैं, जो तीन रूपए किलो चावल और गेहूँ मिलता है, उसी के बजट से दीपोत्सव के घी का खर्चा निकाला गया है।

ये बकैत यह भूल जाते हैं कि अगर दस लाख मिट्टी के दीप जलाए गए हैं, और उसमें देसी घी डाली गई है, रूई की बत्ती बनाई गई है, दियासलाई से उसको जलाया गया है, और श्रमिकों ने उसे पूरे घाट पर लगाया है, तो ऐसा तो है नहीं कि दीपक किसी धनाढ्य उद्योगपति ने बाजार से दस गुणा दाम पर दिए, घी अमेरिका से आयातित हो कर आया, बत्ती भाजपा के मंत्री की कम्पनी ने दिए, दीप शलाका चीन से आया और श्रमिकों को लगाने के पैसे नहीं दिए गए।

उन लाखों दीपकों के जलने का सीधा मतलब है कि सैकड़ों घरों में उस दिन दीपक जले होंगे, रसोई पर भोजन बना होगा, वो हर्षित होंगे। दीपक बनाने वाले कुम्हार हों, या दूध से घी बनाने वाले गौपालक, कपास उगाने वाला किसान हो या माचिस बनाने वाला छोटा उद्योगपति, ये हमारे ही लोग हैं, उन्हें ही काम मिला और उनको ही समुचित लाभ पहुँचाने के बाद ये खरीदारी संभव हुई है। लेकिन इनको तो अगले दिन दीपकों से तेल इकट्ठा करती एक बच्ची की तस्वीर लगा देनी है और भावुक हो जाना है कि ये भूखी है, इसको भोजन नहीं मिला।

उस बच्ची को भोजन न मिलने का कारण अगर दीपोत्सव है तो आग लगे ऐसे हर दीपोत्सव को। भारत की गरीबी का कारण अगर चंद्रयान है तो बंद कर दो इसरो को। नई सड़क बन रही हो, और वहीं पास में जमीन पर कोई दाल-चावल खाता गरीब दिख जाए तो इन दोनों घटनाओं का अन्योन्याश्रय संबंध नहीं होता, दोनों ही स्वतंत्र घटनाएँ हैं। ऐसा नहीं है कि गरीबी मिटाने के लिए, लोगों तक भोजन पहुँचाने के लिए बनी योजनाओं के पैसे से सड़क बन रही है, और रॉकेट छोड़ा जा रहा है।

सुबह उठ कर तीन बार फ्लश करने, और ब्रश करते हुए पाँच लीटर पानी हर रोज बहाने वाली वामपंथनों को होली के दिन पानी की बर्बादी याद आती है। कहीं किसी इलाके में एक छेड़-छाड़ की घटना हो जाती है, तो वही घटना होली को परिभाषित करती है कि देखो, भारत में तो होली यही है। कभी गुब्बारे में वीर्य भर कर फेंकने की झूठी खबर फैलाई जाती है, तो कभी यह लिखा जाता है कि होली में तो लड़कों को लड़कियाँ छेड़ने का लाइसेंस मिल जाता है। ऐसा है जिहादनों, और वामपंथनों, कि तुम्हारे भाई और बाप ऐसी हरकतें करते होंगे, हर हिन्दू यही सब नहीं करता।

यही नौटंकी प्रदूषण के नाम पर दिवाली में होती है। जिनके घरों के हर कमरे में एसी हो, कार में एसी हो, डीजल इस्तेमाल करते हों, दो दरवाजों वाला फ्रिज रखते हों, और दिन रात बिजली जला कर रहते हों, वो प्रदूषण पर ज्ञान देते हैं तो उच्च कोटि के क्यूटिए लगते हैं। दिवाली में एक दिन धुँआ और शोर होता है, लेकिन तुम जो हर दिन ग्लोबल वॉर्मिंग में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हो, सड़कों पर धुँआ छोड़ रहे हो, बिजली का अत्यधिक इस्तेमाल कर रहे हो जो कि किसी कोयले से चलने वाले पावर प्लांट से आता है, तो तुम तो ज्ञान न दिया करो ऐसे दिनों पर।

दूसरी बात, प्रदूषण होगा तब भी मनाएँगे। पानी सूख जाएगा तब भी होली खेलेंगे। हिन्दू हैं, देश हिन्दुओं का है, त्योहार हिन्दुओं का है, बहुसंख्यक हैं, हमारी ही चलेगी। चार क्यूटियों के पोस्टर से हिन्दू जीना बंद नहीं करेगा। मेरा तो यह मानना है कि हर पाँच अगस्त को एक और दीवाली मनाई जाए, और हर साल 9 नवम्बर को होली भी खेली जाए। बाकियों की आस्था जब राजनैतिक हो चुकी है, तो हम भी ऐसे सामाजिक उल्लास के दिनों पर दीप प्रज्ज्वलित कर राम के अयोध्या में आगमन पर दीवाली क्यों नहीं मनाएँगे? साथ ही, 9 नवंबर जैसे यादगार दिन पर, जिस दिन हमने वामी-इस्लामी कट्टरपंथी गिरोह पर कानूनी जीत हासिल की तो उस दिन होली मना कर उनको क्यों न याद दिलाएँ उनके पापी मंसूबों के गलने का?

वामी-इस्लामी कट्टरपंथी गिरोह ऐसे नहीं मानेगा

समय यह है कि न सिर्फ इनकी भर्त्सना की जाए बल्कि हिन्दू चित्रकारों, कार्टूनिस्टों को आक्रामक रवैया अपनाते हुए, ऐसे ही सामाजिक संदेश हर मजहबी और ईसाई त्योहारों पर देते रहना चाहिए। तुम्हारी संख्या भी ज्यादा है, देवी सरस्वती की कृपा तुम पर भी है, उँगलियाँ सलामत हैं, फिर तुम्हारी रचनात्मकता क्यों नहीं दिखती? जो गैरकानूनी है, वैसा मत करो, लेकिन समाज में जागरूकता होनी चाहिए कि नहीं?

हम जिस समाज में रहते हैं, अगर वहाँ ‘रेप जिहाद’ चल रहा है, जानवरों को सामूहिक रूप से काटा जाता है, सड़कों को घेर कर आस्था का नग्न प्रदर्शन होता है, तब हमारे हिन्दू चित्रकार क्या करते हैं? तुम्हें ये विसंगतियाँ नहीं दिखतीं? क्या तुम भारत के एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर यह नहीं देखते कि बकरों के जीवन का मोल है? क्या भारत के नागरिक के तौर पर तुम्हें यह नहीं दिखता कि सड़क किसी की निजी संपत्ति नहीं है चाहे वो शुक्रवार हो या और दिन? क्या तुम्हें यह नहीं दिखता कि नाबालिग बच्चियों को मौलवी अपनी हवस का शिकार बनाते हैं? फिर तुम्हारे कार्टून क्यों नहीं दिखते?

कब तक ये गलतबयानी सहते रहोगे? कब तक हिन्दुओं को नीचा दिखाया जाता रहेगा और तुम सरस्वती की पूजा भी करोगे, और तुम्हारे हाथ एक कार्टून तक न बना पाएँगे। यह भीरुता ही हिन्दुओं को खोखला करती है। यही कारण है कि मुट्ठी भर के वामपंथी, और इस्लामी कट्टरपंथियों का समूह तुम्हारे देवी-देवताओं पर कार्टून बनाता है, और तुम चुप रह जाते हो।

क्यों कमलेश तिवारी की हत्या पर दस लाख लोग इंडिया गेट पर या परिवर्तन चौक पर नहीं जुटते? तुमने कब ऐसी भीड़ बन कर किसी अंकित शर्मा, ध्रुव त्यागी, रविन्द्र, प्रशांत, भारत यादव या डॉ नारंग के लिए न्याय माँगने की कोशिश की और अंतरराष्ट्रीय खबर बने?

मेरा काम लिखना और बोलना है, किसी का काम कार्टून बनाना है, किसी का काम संगठित हो कर संविधान के दायरे में भीड़ के रूप में न्याय की माँग करना है। एक तरफ एक विचारधारा है जो तीन महीने तक पूरी दिल्ली को बंधक बना लेती है, दंगे करती हैं, हिन्दुओं के नरसंहार की योजना बनाती है, और उसके बाद अपराधियों को ‘विद्यार्थी’ कह कर पूरा नरसंहार हिन्दुओं को ही ऊपर फेंकती है, और दूसरी तरफ हम हैं जो बस ये पूछते हैं कि ‘लिबरल चुप क्यों हैं?’

ऐसे न तो वैचारिक लड़ाई लड़ी जाती है, न ही जीती जाती है। हर व्यक्ति, जो भी जिस कार्य में दक्ष हो, वहीं से इन पर प्रहार करे। कार्टून बनाने वाले इतने कार्टून बनाओ कि वामपंथनें बिलबिला जाएँ। इनके व्यभिचार पर कार्टून बनाओ, इनके बलात्कारी प्रवृत्ति पर कार्टून बनाओ, इनके गाँजा पीने, नशेड़ीपने पर कार्टून बनाओ। इनको हर उस गलत कार्य में संलिप्त दिखाओ जो ये अपनी पीएचडी की डिग्री और ट्विचर के ब्लू टिक में छुपाते हैं। इनके अपवादों को उदाहरण बना कर चीनियों की तरह इतने पोस्टर बना कर इंटरनेट पर डाल दो कि ये इंटरनेट पर आना बंद कर दें।

जो लिख और बोल सकते हैं, इनकी इन्हीं नीच प्रवृत्तियों पर लिखें और बोलें। स्वयं को डिफेंड मत करो कि ‘हाँ, ये बात तो सही है कि बलात्कार तो होता है’, बल्कि इन कूढमगजों से यह पूछो कि लिंग लहराने वाले कन्हैया से ले कर सीडी दिखाने के बहाने रूम पर बुला कर बलात्कार करने वाले अनमोल रतन तक तो इन्हीं की पार्टियों के हैं, उस पर क्या विचार है। इनसे पूछो कि तुम्हारे वैचारिक बापों के भाई तो चुनाव लड़ रहे हैं जिनके ऊपर सेक्स रैकेट चलाने का मुकदमा चला और उसमें न्याय नहीं मिला, पीड़िता से ‘सैटलमेंट’ करवाया गया।

ये सब तुम्हारे लेखों, ट्वीट, फेसबुक पोस्ट, वीडियो क्लिप्स, कार्टून का विषय होना चाहिए। डरते किससे हो? अभिव्यक्ति की आजादी है ये, संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है। किसी का नाम लिए बगैर, विचारधारा को बोल्ड अक्षरों में लिख कर अपनी बात रखो, कोई केस कर के जीत नहीं पाएगा। तकनीक का इस्तेमाल करो, वीपीएन का प्रयोग करो, भारत में बैठ कर किसी अफ्रीकी देश के सर्वर से अकाउंट चलाओ। बहत्तर तरीके हैं अगर सुरक्षा का एक और कवच पहनना चाहते हो तो।

ऐसे समय में तटस्थ व्यक्ति निवीर्य होता है

ये धर्मयुद्ध ही मान कर चलो। इसमें तटस्थता की जगह नहीं है, वीर्यहीन ही तटस्थ रह कर युद्ध देखते हैं। जिस स्तर का युद्ध है, उसी स्तर से लड़ो। जो रचना कर सकते हैं, वो रचना करें, जो पढ़ सकते हैं वो पढ़ें और आगे बढ़ाएँ, जो दूसरों को जागरूक कर सकते हैं, वो जागरूक करें। ये वामपंथियों की हरामखोरी धीमे जहर की तरह है, जो अगर तुम सहते रहे तो एक दिन हिलने योग्य भी नहीं रहोगे। इसके दृष्टिगोचर होते ही आक्रमण करो।

अपनी सहिष्णुता को अपनी कमजोरी मत बनाओ। सहिष्णुता की सीमा होती है, पागल कुत्ते के साथ शयन नहीं किया जा सकता, भले ही तुम कितने ही बड़े पशुप्रेमी क्यों न हो। रैबीज वाली लार छोड़ते, जगह-जगह विष्ठा खाते इन मतिभ्रष्ट श्वानों, कीचड़ में लोटने वाले इन शूकरों से ‘इंगेज’ मत करिए स्वयं को, इनको दूर से ही दुत्कारिए।

जिन्हें ये ट्रोल कह कर ललकारते हैं, इनका मनोबल सबसे ज्यादा वही गिराते हैं। किसी भी व्यक्ति को, जो इनके विचारों के विरोध में हो, इनसे सवाल पूछे, उसे ट्रोल के विशेषण से अलंकृत किया जाता है। मैं तो कहता हूँ कि नाम चाहे जो भी दे दिया जाए, लेकिन इस वैचारिक लड़ाई में सबसे ज्यादा लॉयल तो यही लोग हैं जो बिना मान-अपमान से परे, हर दिन, हर वामपंथी को उनकी जगह दिखाते रहते हैं। ‘युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्व होता है’, कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने कहा है।

ये तो ‘जय’ बोलने से कहीं आगे, वामपंथियों को ललकार कर उनसे टकराते हैं। कोई कृष्ण को बलात्कारी कह दे तो आप लेख थोड़े लिखेंगे, बल्कि जिसने लिखा है उसको उसी भाषा, शैली, शब्दावली और व्यवहारिक व्याकरण के साथ समुचित जवाब वहीं देंगे। ये काम तो यही कथित ‘ट्रोल’ कर रहे हैं। इनका उत्साहवर्धन कीजिए क्योंकि आप कीचड़ में उतरना नहीं चाहते, और जो उतर रहा है उसको आप ज्ञान तीन पसेरी दे देते हैं।

ध्यान रहे कि हमारे त्योहार इन दोगले विचार वालों के खेलने के मैदान नहीं हैं। जो वकील हैं, वो हमारी आस्था पर लगातार हो रहे हमले का मुद्दा बना कर इन पर कानूनी केस करें। अगर कोई आपकी लड़ाई लड़ रहा है तो वैसे लोगों को पाँच-दस रुपया दे-दे कर सहयोग कीजिए। यही पाँच और दस रुपया सीएए समर्थन में रॉड से मार दिए जाने वाले किसी मूर्तिकार नीरज प्रजापति के परिवार तक करीब पैंतीस लाख बन कर पहुँच जाता है।

इन पर कोर्ट में केस हो, इनके त्योहारों के समय (और हर दो-चार सप्ताह में एक बार) एक जागरुकता अभियान के तहत पशुओं को प्रति हिंसा, लव जिहाद, रेप जिहाद, लैंड जिहाद, हिन्दुओं को घर छोड़ने पर मजबूर करने को ले कर पोस्टर, कार्टून, वीडियो आदि बनाइए। इनके हर अपराध पर कार्टून बनाइए, ताकि अपराध ही नहीं, उसके पीछे की मजहबी घृणा सबको देखने को मिले। ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि हिन्दुओं में भी कुछ अधम और पतित हिन्दू हैं जो ज्ञान की धारा बहाने लगते हैं, जिन्हें दूसरों के अपराध दिखते नहीं।

हर अपराध की कवरेज हम करेंगे, हर अपराध को व्यापक स्तर पर ले जाना आपका कार्य है। कोई भारत यादव किसी मजहबी भीड़ द्वारा लिंच किया जाए तो संगठित हो कर लाखों की संख्या में धरना दीजिए। हिंसा मत कीजिए, क्योंकि आप वामपंथी नहीं हैं, ये उनका क्षेत्र है। आग लगाना, किसी को प्रदर्शन के नाम पर गोली मार देना आदि मूलतः भीम-मीम और वामपंथियों का काम है। आप सिर्फ संख्या बल दिखाइए, बाकी हर कार्य स्वतः हो जाएगा। मीडिया स्वयं पहुँचेगी, कवरेज स्वतः होने लगेगा।

एक लम्बे समय तक हमने सहा है, हमारी सहिष्णुता का उपहास हमें ‘इन्टॉलरेंट’ कह कर किया गया। अब ये लोग हमें गौरक्षक की जगह गौभक्षक बताने लगे हैं। हमारे द्वारा स्त्री शक्ति की पूजा को ये बलात्कार से जोड़ कर दिखाते हैं। ये हमारी आस्था पर सीधा प्रहार है। अगर हम यही सोच कर चुप रहे कि एक कार्टून से क्या होता है, तो आप यह भूल रहे हैं कि शार्ली एब्दो वालों ने भी कार्टून ही बनाया था, उस फ्रांसिसी शिक्षक ने एक कार्टून ही दिखाया था। मैं आपको एक कट्टरपंथी में बदलने को नहीं कह रहा, मैं आपको अपनी रीढ़ सीधी करने को कह रहा हूँ।

खून पर खून और खून के बदले खून: बिहार में जातीय नरसंहार के बूते लालू ने कुछ यूँ खड़ी की थी ‘सामाजिक न्याय’ की इमारत

बिहार में लालू यादव के जंगलराज के दौरान जातीय हिंसा एक आम बात थी। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ये तुलना करने में लगा रहता है कि इन 15 सालों में बिहार में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए और गुजरात में खूब हुए। लेकिन, बिहार में लालू के राज में हुई जातीय नरसंहार की घटनाओं पर बात नहीं होती। सब जातियाँ ही आपस में लड़ रही थीं तो भला वो एकजुट कैसे होतीं? ये बिहार का वो ‘सामाजिक न्याय’ था, जिसकी बात लालू परिवार करता रहा है।

वो लालू यादव का ही राज था, जब बिहार में माओवादियों ने अपना सिर उठाया। कथित ऊँची-जाति के लोगों के नरसंहार होने लगे। इसके बाद सवर्णों की तरफ से भी संगठन खड़े हो गए और इस तरह से ‘खून के बदले खून’ की नीति पर काम होने लगा। बिहार में पूरा नब्बे का दशक जातीय नरसंहार की घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनमें से प्रमुख की हम यहाँ चर्चा करेंगे। इससे हमें समझने में मदद मिलेगी कि कैसे लालू राज में क़ानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज थी ही नहीं

1999: जब जहानाबाद में होता था मौत का तांडव

ये वो समय था, जब जहानाबाद में सीपीआई (माओवादी) और रणवीर सेना आमने-सामने थे। जहाँ एक तरफ खूँखार माओवादी संगठन बेरहमी से सवर्णों की हत्या कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ रणवीर सेना भी ‘बदला’ लेने के लिए उतारू थी और इस दौरान कई वारदातें हो रही थीं। 1999 में जहानाबाद में साल के पहले 10 सप्ताह में ही 80 लाशें गिर चुकी थीं। सेनारी का नरसंहार आज भी लोगों के जेहन में है।

तब अप्रैल 5, 1955 को आई ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन में प्रकाशित ग्राउंड रिपोर्ट में अभय किशोर नाम के एक ग्रामीण का जिक्र था, जिनके भाई और भतीजे को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था। उन्होंने कहा था, “क्या सोनिया गाँधी यहाँ तभी आएँगी, जब दलितों की हत्या होगी?” रवींद्र चौधरी नामक एक ‘भूमिहार’ जाति के व्यक्ति ने कहा था, “हम गाँधी की तरह बैठ कर तमाशा नहीं देख सकते, इसीलिए हम सब ने सुभाष चंद्र बोस बनने का फैसला किया है।

वहीं, दलित भी इस आशंका से घिरे रहते थे कि जब माओवादी नरसंहार का बदला लेने वाले लोग आकर उनका काम तमाम कर दें। तब विपक्ष के नेता रहे सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि ये राजद वाले ही दिन में राजनीति करते हैं और राज होते ही वो माओवादी बन जाते हैं। यह भी कहा जाता था कि राजद और MCC (प्रतिबंधित माओवादी संगठन) का आपस में अप्रत्यक्ष गठबंधन था। पुलिस तक इस संगठन से डरती थी।

पुलिस का कहना था कि माओवादी उन्हें सुनसान इलाकों में देखते ही घेर लेते हैं और उनका हथियार छीन लेते हैं। जो छोटे जमींदार थे, उनमें भी माओवादियों के कारण भय का माहौल था। जमीन होने पर भी कई लोगों ने उसे छोड़ रखा था और खेती नहीं करते थे, ताकि माओवादियों की नजर न पड़े। पुलिस की निष्क्रियता की परिणीति ही ‘रणवीर सेना’ के रूप में हुई और दोनों प्रतिबंधित संगठनों के बीच हिंसक संघर्ष चला।

राघोपुर नरसंहार: लालू के बिहार में जातीय हिंसा का भयानक रूप

पटना के बिहटा में स्थित है पटुत, जहाँ के राघोपुर गाँव में अप्रैल 21, 1997 की रात मौत नाची थी। उससे पहले बिहार पुलिस की बात कर लेते हैं, जो नेताओं की सुरक्षा में लगी हुई थी और भ्रष्टाचार व जातिवाद के कारण अपना काम ही भूल गई थी। अंग्रेजों के जमाने के हथियार थे, सो अलग। जून 1996 में गया के टेकारी पुलिस थाने में माओवादी घुसे और आराम से 5 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार कर सारे हथियार लूट कर चलते बने।

उससे एक साल पहले देहरी-गया पैसेंजर ट्रेन में दिनदहाड़े 3 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई थी। स्थिति ये थी कि 1996 में संज्ञेय अपराधों की संख्या 1.31 लाख पहुँच चुकी थी। उससे एक साल पहले ये संख्या 1.2 लाख के आसपास थी। 1997 में ही जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर प्रसाद को मार डाला गया था। ये वो समय था, जब हर घंटे 16 लोग या तो मारे जा रहे थे, या फिर लूटे ये अपहृत किए जा रहे थे।

इसी बीच लालू के बिहार में जातीय नरसंहार का एक रूप राघोपुर में देखने को मिला, जहाँ हथियारबंद माओवादी गाँव में घुसे और उन्होंने ‘भूमिहार’ जाति के 6 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। तब विधायक रहे जनार्दन शर्मा के घर में बम फिट कर के उसमें 2 बार विस्फोट किया गया। माओवादियों की एक खासियत थी कि वो हमेशा 200-300 ये उससे भी अधिक की संख्या में आते थे। गाँव के आसपास रुक कर तैयारी करते थे, फिर हमला बोलते थे।

पवन सिंह नाम का एक व्यक्ति विधायक के घर में सो रहा था, जिसे खींच कर बाहर लाया गया और उसकी जाति की पहचान कर के उसे गोली मार दी गई। नक्सलियों ने गाँव को घेर कर कुछ लोगों को मौके पर ही मार डाला तो कुछ को लेकर वो जंगलों में गए। गाँव में फोन होने के कारण और लोगों की जानें बच गईं क्योंकि पुलिस से संपर्क कर के घटना का ब्यौरा दे दिया गया था। ये फोनलाइन भी नई-नई ही लगाई गई थी।

अब जब क्रिया हुई, तो प्रतिक्रिया भी हुई। राघोपुर में नरसंहार के बाद हैबसपुर में भी दलितों का खून बहा। 10 दलित मार डाले गए। इस घटना के 8 आरोपितों की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई थी, 13 फरार हो गए और अंत में 28 को बरी कर दिया गया। कहा जाता है कि ‘रणवीर सेना’ के लोग प्रतिशोध की ऐसी आग में जल रहे थे कि उन्होंने लौटते समय गाँव के कुएँ पर खून से संगठन का नाम लिख दिया था।

बारा: जब ‘भूमिहार’ जाति के 40 लोगों को सुला दिया गया मौत की नींद

अगस्त 12-13, 1992 का दिन। गया जिला का बारा गाँव। माओवादियों ने इलाके को घेरा और ‘भूमिहार’ जाति के 35 लोग घर से निकाले गए। पास में एक नहर के पास ले जाकर उनके हाथ बाँधे गए और सबका गला रेत कर मार डाला गया। इस मामले में सुनवाई लम्बी चली लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। न तो पुलिस उन अपराधियों को पकड़ पाई और न ही नक्सलियों ने पुलिस की समन को कोई तवज्जो दी।

जून 2001 में सेशन कोर्ट ने 9 लोगों को दोषी माना और इसके अगले साल सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बरक़रार रखा। इनमें से 3 को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। हालाँकि, जनवरी 2017 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इन सबकी फाँसी की सज़ा माफ़ कर दी। कहते हैं कि इस घटना के बाद भी ‘रणवीर सेना’ ने पलटवार किया था और हिंसक संगठन ने लक्ष्मणपुर-बाथे में 58 दलितों को मार डाला गया। इसकी सुनवाई भी लम्बी चली।

यूँ गिनाने को तो बाथे, बथानी टोला, नाढ़ी, इकवारी, सेनारी, राघोपुर, रामपुर चौरम, मियाँपुर जैसी कई नरसंहार की घटनाएँ हैं, जिन्होंने पटना के अलावा जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद और शाहाबाद में क़ानून-व्यवस्था का नामोंनिशान ही ख़त्म कर दिया था। लेकिन, ‘क्रिया’ और ‘प्रतिक्रिया’ का ये दौर यूँ ही चलता रहा। लालू यादव बिहार के इन जातीय नरसंहारों के बीच अपनी ‘सामाजिक न्याय’ की व्यवस्था चलाते हुए वोट बैंक की राजनीति करते रहे।

जातीय हिंसा से अछूती नहीं थी राजनीति

बिहार में ये वो दौर था, जब राजनीति में भी जातिवाद चरम पर था। जहाँ एक तरफ लालू यादव माई (मुस्लिम-यादव) समीकरण बना रहे थे, वहीं दूसरी तरफ लोगों में चर्चा थी कि वो ‘भूरा बाल साफ़ करो’ (भूमिहार-ब्राह्मण-राजपूत-लाला) की नीति पर काम कर रहे थे। जाति के आधार पर तो टिकट आज भी बाँटे जाते हैं, लेकिन जातिगत राजनीतिक दुश्मनी उस दौरान चुटकियों में यूँ हिंसा की वारदातों का रूप ले लेती थी।

पेरिस: ऐसे लोगों के लिए किसी भी सेकुलर देश में जगह नहीं होनी चाहिए | Ajeet Bharti on Paris beheading by Islamist

पेरिस में एक शिक्षक का सिर काटने की घटना दुनिया भर के कट्टरपंथी मुस्लिमों के लिए ‘ये तो होना ही था’ मोमेंट था। एक ऐसी विचित्र घटना जो आजकल हर किसी को सुनाई पड़ती है, भले ही उसके होने के कारण हमें अजीब और विचलित करने वाले लगते हैं। लेकिन वहाँ हाथ में छुरा लिए हुए, अल्लाह-हु-अकबर का नारा लगाते हुए मुस्लिम की उपस्थिति हमें सामान्य ही नहीं लगती, बल्कि हम प्रतीक्षा करते हैं कि अब तो उसकी जान जानी तय है।

आप यह समझिए कि जो व्यक्ति पैगंबर के बारे में गलत सुनने पर हत्या कर देता है, वही मुस्लिम नहीं है। और जो हर दिन इस्लाम के बताए हर नियम को तोड़ते हैं, वही ये सर्टिफिकेट जारी करते हैं कि कौन मुस्लिम है। जानकार कहते हैं कि असली इस्लाम तो वही है, जो कट्टरपंथी जीते, क्योंकि वो काफिरों को कत्ल के योग्य मानते हैं।

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गया से 7 बार से विधायक, कृषि मंत्री प्रेम कुमार से बातचीत| 7-time MLA Prem Kumar interview

बिहार की वैसी जगहों से ऑपइंडिया लगातार आप तक ग्राउंड रिपोर्ट्स ला रहा है, जो वहाँ की असली कहानी बताती है। इसी शृंखला में मैं आज गया जिले जाना हुआ जहाँ के भाजपा प्रत्याशी और 7 बार से विधायक, कृषि मंत्री प्रेम कुमार से बातचीत की।

हमने भाजपा प्रत्याशी प्रेम कुमार से जानने की कोशिश की कि 7 साल जीत मिलने के बाद वो 8वीं पर मैदान में किस मुद्दे और रणनीति को लेकर उतरे हैं। इसके साथ ही उनसे सड़कों पर लगे जाम की समस्या और गंदे शहर की छवि को तोड़ने को लेकर उनके एजेंडे के बारे में जानने का प्रयास किया।

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