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हाथरस केस: फोन टैपिंग और नार्को टेस्ट के संदर्भ में कुछ बातें

जिन-जिन को लगता है कि सरकार फोन टेप नहीं करवा सकती, वे कानून की जानकारी ले लें। सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए गृह सचिव की अनुमति के साथ ऐसा किया जा सकता है। कई अन्य मामलों में भी, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा आदि के लिए ऐसा करने की अनुमति है। हाथरस मामले में लीक हुए ऑडियो और उसके बाद उपजे विवाद के बीच इसके बारे में पूरा विस्तार से पढ़ना हो तो नीचे के ट्वीट को पढ़ लीजिए:

अब बात करते हैं कि हाथरस मामले में पत्रकार या पीड़ित परिवार के ‘ऑडियो’ को लीक क्यों किया गया। पहले तो आप यह तय कीजिए कि आपको मतलब किस बात से है? पत्रकार/पीड़ित के फोन रिकॉर्ड होने से, या इस बात से कि वहाँ दंगा न फैले, पीड़ित परिवार को न्याय मिले? इस ऑडियो के लीक होने से कौन सी सामाजिक अशांति फैली या पीड़िता को न्याय मिलने पर आँच आ गई? अपराध ऑडियो लीक होना नहीं है, अपराध किसी भी व्यक्ति को मीडिया द्वारा अपने हिसाब के जवाब देने या वीडियो बनवाने के लिए कोचिंग देना है कि ऐसा करने से न्याय मिल जाएगा तुमको।

भिन्न-भिन्न स्रोतों से आ रही खबरों से हम बखूबी जानते हैं कि सामाजिक शांति भंग करने के उद्देश्य से गिद्धों का एक झुंड उस एक ‘ट्रिगर’ प्वाइंट की प्रतीक्षा में बैठा है, जो लोगों में असंतोष भर दे। पहले ही कई फेक न्यूज चलाए जा चुके हैं कि आरोपित संदीप का पिता योगी का सहयोगी और जानकार है। ऐसे में एक प्रशासनिक असावधानी बहुत बड़ी भूल बन सकती है। हाथरस मामले में लीक हुए ऑडियो में पत्रकार को पीड़ित परिवार से मनपंसद बयान दिलवाने की कोशिश करते हुए सुना जा सकता है।

वो वीडियो न्याय दिलाने के लिए नहीं, टीआरपी के लिए होता है। न्याय वीडियो से कैसे मिलेगा? कोर्ट में इंडिया टुडे के वीडियो दिखाए जाएँगे? फिर तो वीडियो कई घूम रहे हैं, उसके आधार पर न्याय कर दो! पत्रकार का काम रिपोर्ट करना होता है। जो है, वो दिखाओ, जो नहीं है, उसके संभावित कारण तार्किक तरीके से बताओ। जो जटिल बात है उसको सरल बनाकर समझाओ।

पत्रकार का काम है जो वीडियो मिले उसकी विवेचना करना, न कि मनपसंद वीडियो बनवा लेना। फोन कर के आप जानकारी लेते हैं, न कि कस्टम-मेड इन्फ़ॉर्मेशन तैयार करके भेजते हैं ताकि आपके चैनल का फायदा हो। पत्रकार जब ऐसा करते हैं, तो कम से कम उसी ऑडियो में ये तो न क्लेम करें कि ‘मैं तुम्हारी बहन हूँ, मैं न्याय दिलवाऊँगी’। पत्रकार को यह कहना चाहिए कि ‘तुम जो वीडियो दोगे, उससे हमारा चैनल चमक जाएगा, तुम्हारी बहन को न्याय मिलेगा कि नहीं, ये नहीं पता।’

पत्रकार की बातचीत यह होनी चाहिए कि ‘तुम्हारे पास जो भी जानकारी है, वो हमें दो ताकि हम उसे पब्लिक में रखें और वहाँ से प्रशासन पर एक दबाव बनेगा’। आप पीड़ित को दिलासा दीजिए, दिलासा देते-देते एक्सप्लॉइट मत कीजिए। एक और बात चल रही है कि नार्को/पॉलीग्राफ़ टेस्ट ‘स्वेच्छा’ से दिए जाते हैं, सरकार किसी को मजबूर नहीं कर सकती। ये तो सही बात है, कानून भी यही कहता है।

लेकिन, जिस व्यक्ति को न्याय की दरकार है, वो तो किसी भी हद तक जाएगा, कुछ भी करेगा ताकि वो परिवार और समाज की नजरों में सम्मानित बना रहे। परिवार के लोग पॉलीग्राफ़ न लें और चार आरोपित ले लें, तो आप ही बताइए कि नजारा कैसा होगा? चार में से तीन आरोपित जिनके नाम बाद में जोड़े गए, अगर वो टेस्ट में पास हो गए, तब पीड़ित परिवार क्या करेगा? फिर आप बताइए कि सत्य को सामने लाने की कोशिश कौन सा पक्ष करता दिखेगा?

जब एक अपराध, पारिवारिक और ग्रामीण स्तर से उठ कर राष्ट्रीय बन जाता है, तब उसके हर पहलू पर हर व्यक्ति की नजर होती है। जब अपने पिता की बेटी, ‘हाथरस की बेटी’ और ‘भारत की बेटी’ बन जाती है, तब हर व्यक्ति चाहता है सत्य अपने मूल स्वरूप में आए, ‘चाहे जो भी करना पड़े’। अभी हर उस व्यक्ति की नजर इस बात पर होगी कि पीड़ित परिवार अगर गैंगरेप की बात को सही मानता है, तो वो टेस्ट देने से पीछे क्यों हटेगा?

अभी उनके हर एक मूवमेंट पर लोगों के सवाल होंगे कि अगर किसी की बहन मार दी गई है, कथित तौर पर गैंगरेप हुआ है, तो फिर परिवार उसी सत्य को दोहराने से क्यों हिचक रहा है? ये लॉजिक देना कि ‘वो पहले ही बहुत ह्यूमिलिएट (अपमानित) हो चुके हैं, नार्को टेस्ट और भी परेशान करेगा उनको’, ये कुतर्क है, जिसका उस संदर्भ में कोई मायने नहीं रह जाता, जबकि आप पल-पल की खबर वीडियो और न्यूज बाइट के रूप में हर चैनल पर देने की कोशिश कर रहे हैं।

ये भी अगर न्याय पाने के लिए जद्दोजहद है, तो पॉलीग्राफ़ भी उसी तरफ एक कदम है। संवेदनहीनता यह नहीं है कि ‘न्यायिक प्रक्रिया में जो भी संभव है, वो किया जाए ताकि सत्य सामने आए’। संवेदनहीनता यह है कि आप काम अपने चैनल और ‘अपनी’ खबर के लिए कर रही हैं, और रंग-रोगन ‘मैं तुम्हारी बहन हूँ, न्याय दिलाऊँगी’ वाला कर रही हैं! पत्रकारिता न्याय दिलवाने में सहायक हो सकती है, कई मामले में हुई भी है, लेकिन सत्य को ‘मैनुफ़ैक्चर’ करवाने वाली पत्रकारिता न्याय नहीं दिलाती, संभव है कि उसके कारण अन्याय ही हो जाए। इसलिए आप जो पढ़ते, सुनते, देखते, लिखते और बोलते हैं, उस पर थोड़ा ध्यान दीजिए।

PM मोदी ने किया दुनिया के सबसे लम्बे राजमार्ग टनल का उद्घाटन, 10000 फीट की ऊँचाई पर है स्थित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) को प्रातः 10 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से रोहतांग में 9.02 किलोमीटर लम्बे ‘अटल टनल’ का उद्घाटन किया। इससे मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर घट गई है, अर्थात 4-5 घंटे कम हो गई है। ये दुनिया की सबसे लम्बी राजमार्ग टनल है, जो पूरे साल मनाली कोलाहौल-स्पीति घाटी को जोड़ कर रखेगी। इससे पहले ठंड में बर्फबारी के कारण ये घाटियाँ अलग-थलग हो जाती थीं।

ये टनल हिमालय की पीर पंजाल श्रृंखला में औसत समुद्र तल (MSL) से 3000 मीटर (10,000 फीट) की ऊँचाई पर अत्याधुनिक तकनीक और संरचनाओं के साथ बनाई गई है। अटल टनल का दक्षिण पोर्टल (SP) मनाली से 25 किलोमीटर दूर 3060 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जबकि इसका उत्तर पोर्टल (NP) लाहौल घाटी में तेलिंगसिस्सुगाँव के पास 3071 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

यह घोड़े की नाल के आकार में 8 मीटर सड़क मार्ग के साथ सिंगल ट्यूब और डबल लेन वाली टनल है। इसकी ओवरहेड निकासी 5.525 मीटर है। यह 10.5 मीटर चौड़ी है और इसमें 3.6 * 2.25 मीटर फायर प्रूफ आपातकालीन निकास टनल भी है, जिसे मुख्य टनल में ही बनाया गया है। ‘अटल टनल’ को अधिकतम 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के साथ प्रतिदिन 3000 कारों और 1500 ट्रकों के यातायात को सहने की क्षमता के लिए डिजाइन किया गया है।

यह टनल ‘सेमी ट्रांसवर्स वेंटिलेशन सिस्टम’, एससीएडीए नियंत्रित अग्निशमन और निगरानी प्रणाली सहित अति-आधुनिक इलेक्‍ट्रो-मैकेनिकल प्रणाली से युक्‍त है। इसके दोनों पोर्टल पर टनल प्रवेश बैरियर दिया गया है और आपातकालीन संचार के लिए प्रत्येक 150 मीटर दूरी पर टेलीफोन कनेक्शन की व्यवस्था है। प्रत्येक 60 मीटर दूरी पर फायर हाइड्रेंट तंत्र और हर 250 मीटर की दूरी पर सीसीटीवी कैमरों से युक्‍त स्‍वत: किसी घटना का पता लगाने वाला सिस्टम लगाया गया है।

‘अटल टनल’ की खासियत है कि प्रत्येक किलोमीटर पर वायु गुणवत्ता निगरानी लगाई गई है और हर 25 मीटर पर निकासी प्रकाश/निकासी इंडिकेटर लगा हुआ है। पूरी टनल में प्रसारण प्रणाली और प्रत्‍येक 50 मीटर दूरी पर फायर रेटिड डैम्पर्स व हर 60 मीटर दूरी पर लगे कैमरे इसे ख़ास बनाते हैं। इस टनल के बनने के बाद न सिर्फ पर्यटकों बल्कि स्थानीय लोगों को भी आवागमन में सुविधा होगी।

अटल बिहारी वाजपेयी जब देश के प्रधानमंत्री थे तब 3 जून 2000 को रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक टनल के निर्माण का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया था। टनल के दक्षिण पोर्टल की पहुँच रोड की आधारशिला 26 मई 2002 को रखी गई थी। केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल की 24 दिसम्‍बर 2019 को हुई बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मान देते हुए इस टनल का नामकरण उनके नाम पर करने का निर्णय लिया गया। अब पीएम मोदी ने इस ‘अटल टनल’ का उद्घाटन किया है।

कट्टरपंथ से लड़ने के लिए फ्रांस ने बनाया प्लान, राष्ट्रपति ने कहा- इस्लाम को विदेशी प्रभाव से मुक्ति पाना होगा

दुनिया में फैलते इस्लामी कट्टरपंथ को रोकने के अनेक देश लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़ी में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि फ्रांस अपनी धर्म निरपेक्षता को ध्यान में रखते हुए कट्टरपंथी इस्लामियों का सामना करेगा। इसके पहले भी इमैनुएल इस्लाम को कट्टरता और नफरत फैलाने वाला मज़हब बता चुके हैं। 

विदेशी इमामों के प्रवेश पर प्रतिबंध का फ्रांस पहले ही ऐलान कर चुका है। मैक्रों ने इस साल की शुरुआत में कहा था, “हमने 2020 के बाद अपने देश में किसी भी अन्य देश से इमामों के आने पर रोक लगा दी है।” उन्होंने कहा था कि इस फैसले से फ्रांस में आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगेगी।

अब मैक्रों ने कहा है कि उनकी सरकार दिसंबर में एक विधेयक (बिल) लेकर आएगी जो साल 1905 के एक क़ानून को और मज़बूत करेगा। यह क़ानून चर्च और स्टेट को अलग करता है जिससे देश में धर्म के प्रति उदासीनता बनी रहे। उन्होंने अपने भाषण में यहाँ तक कहा कि आगामी कुछ समय में इस बात को सुनिश्चित किया जाएगा कि मज़हब, फ्रांस की शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) से दूर रहे। मैक्रों के मुताबिक़ यह सभी निर्णय कट्टरपंथ और अलगाववाद को रोकने के लिए लिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं फ्रांस के इमामों को फ्रांसीसी भाषा भी सीखनी होगी। उन्होंने कहा कि इस्लाम को विदेशी प्रभाव से मुक्ति पानी होगी।

मैक्रों ने कहा, “इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जिस पर पूरी दुनिया में संकट है, ऐसा सिर्फ हम अपने देश में नहीं देख रहे हैं।” इसके बाद उन्होंने युवाओं की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया जिससे उन्हें धर्मनिरपेक्ष आदर्शों वाला बनाया जा सके। इसकी शिक्षा बच्चों को शुरूआती स्तर से या उनके स्कूल के समय से ही देनी होगी। उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि फ्रांस इस्लाम को विदेशियों के प्रभाव से भी आज़ाद करेगा, इसके लिए मस्जिदों को मिलने वाली फंडिंग में सुधार किया जाएगा। इसके अलावा ऐसे स्कूल और संगठन जो समुदायों के लिए काम करते हैं उन पर भी बराबर नज़र रखी जाएगी। 

राष्ट्रपति मैक्रों ने यह बातें उस घटना के ठीक कुछ दिन बाद कही हैं जिसमें एक आदमी ने धारदार हथियार से दो लोगों पर हमला कर दिया था। घटना ठीक उस जगह पर हुई थी जहाँ कट्टरपंथी इस्लामियों ने साल 2015 में शार्ली हेब्दो के कर्मचारियों का नरसंहार किया था। फ्रांस की सरकार ने इस हरकत को भी इस्लामी आतंकवाद का नतीजा बताया था। साल 2015 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने शार्ली हेब्दो के कार्यालय पर आतंकवादी हमला किया था जिसमें कई मशहूर कार्टूनिस्ट समेत कुल 12 लोगों की मौत हो गई थी।    

हाथरस केस: इंडिया टुडे ने कबूला लीक ऑडियो तनुश्री का ही, मृतका के भाई से कहलवाना चाहती थी ‘दबाव’ की बात

हाथरस केस में हमने कल (2 अक्टूबर 2020) को कुछ लीक ऑडियो पर रिपोर्ट की थी। इसमें से एक ऑडियो में इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री पांडेय मृतका के भाई संदीप से बातचीत कर रही थीं। इसमें संदीप से तनुश्री ऐसा स्टेटमेंट देने के लिए बोल रही थीं, जिसमें मृतका के पिता आरोप लगाए कि उनके ऊपर प्रशासन की ओर से बहुत दबाव था।

इंडिया टुडे ने इस पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए इसे ‘अवैध फोन टैपिंग’ का मामला करार दिया है। ‘इंडिया टुडे’ ने अपने बयान में कहा है कि उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन ने मीडियाकर्मियों को हाथरस में घुसने से रोक रखा है और पीड़िता के परिवार को मीडिया से बात नहीं करने दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर ‘इंडिया टुडे’ की पत्रकार तनुश्री पांडेय और हाथरस मामले की मृतका के भाई संदीप के बीच हुई बातचीत के लीक हुए फ़ोन ऑडियो के विषय में चैनल ने पूछा है कि सबसे पहला सवाल तो ये है कि हाथरस मामले को कवर कर रहीं उसके पत्रकार का फोन टैप क्यों किया जा रहा है? चैनल ने आशंका जताई है कि अगर मृतका के शोक-संतप्त परिजनों का फोन सर्विलांस पर है या टैप किया जा रहा है तो इसके लिए सरकार को जवाब देना पड़ेगा।

अपनी किरकिरी होने के बाद चैनल ने बयान जारी करते हुए कहा है कि जिस टेलीफोन कॉल को ‘अवैध तरीके से’ लीक कर दिया गया, उसमें उसकी पत्रकार तनुश्री पांडेय मृतका के भाई से ‘दृढ़ता से’ कह रही हैं कि वो पीड़ित पिता का वीडियो शूट करें और उन्हें भेजें। चैनल ने दावा किया है कि इस ऑडियो को बदनीयत से लीक किया गया है। अपनी सफाई में चैनल ने आगे कहा:

“मृतका के पीड़ित परिजनों को सरकार द्वारा मिल रही धमकियों और दबाव के बीच अपनी आवाज़ उठाने के लिए तैयार करना उसी प्रक्रिया का एक भाग है, जो एक पत्रकार को करना ही करना चाहिए। ‘इंडिया टुडे’ चैनल इस मामले में अपने पत्रकार के साथ खड़ा है। हम यूपी सरकार से भी माँग करते हैं कि सारे प्रतिबन्ध हटाए जाएँ और और बिना ‘डर या एहसान’ के पत्रकारों को हाथरस मामले की ग्राउंड रिपोर्टिंग करने दिया जाए।”

सोशल मीडिया पर कई अन्य लिबरल गैंग के पत्रकार भी तनुश्री पांडेय के समर्थन में उतर आए हैं। ‘ऑल्टन्यूज़’ के प्रतीक सिन्हा ने दावा किया है कि वो बस अपना काम कर रही थीं और उन्होंने वही चीजें कहीं, जो पहले से ही ‘सार्वजनिक’ हैं। वहीं ‘इंडिया टुडे’ की कई अन्य पत्रकारों ने इसे प्राइवेसी पर हमला बताते हुए फोन टैपिंग का आरोप लगाया। हालाँकि, किसी ने भी पत्रकार द्वारा पीड़ित परिवार को उनके हिचकिचाहट के बावजूद मनपसंद बयान दिलवाने के पत्रकार के प्रयासों की निंदा नहीं की।

बातचीत को सुनकर यह साफ पता चलता है कि तनुश्री पीड़िता के भाई से एक निश्चित बयान दिलवाने का प्रयास कर रही हैं और संदीप की दबी आवाज सुनकर लग रहा है जैसे वह ऐसा नहीं करना चाहते। संदीप इस ऑडियो में पहले दबाव की बात कहते हैं। मगर बाद में कहते हैं कि उनके पिता इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं है कि उन पर दबाव बनाया गया या नहीं। इसके बाद तनुश्री, संदीप से कहती हैं कि उसे कहीं से पता चला है कि परिवार पर ही बहन की मौत का इल्जाम लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्हें ऑडियो में कहते सुना जा सकता है, “संदीप, प्लीज मेरे लिए एक चीज कर दो। मैं तुमसे वादा करती हूँ कि जब तक तुम्हारे परिवार को इंसाफ नहीं मिल जाता मैं यहाँ से हिलूँगी भी नहीं… संदीप एक वीडियो अपने पिता की बनाओ जिसमें वो कहें- हाँ, मुझ पर ऐसा बयान जारी करने का बहुत प्रेशर था कि मैं संतुष्ट हूँ। मैं जाँच चाहता हूँ क्योंकि हमारी बेटी मरी है और हमें न उसे देखने का मौका मिला और न उसके अंतिम संस्कार का।

वे आगे कहती हैं, ”सिर्फ 5 मिनट लगेंगे। जल्दी से वीडियो बनाओ और सिर्फ़ मुझे भेज दो।” इस बातचीत में तनुश्री बार-बार संदीप को एसआईटी के ख़िलाफ़ भड़काती है। मगर, लड़की का भाई कहता है कि जाँच टीम सिर्फ़ उसे जरूरी सवाल कर रही थी और फिर वह चली गई।

UNSC में भारत की दावेदारी: जिस स्थायी सीट के ऑफर को नेहरू ने ठुकराया, उसके लिए PM मोदी चला रहे मुहिम

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) उस संस्था का नाम है, जिसका गठन 1945 में ‘अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा’ बनाए रखने के लिए हुआ था। संयुक्त राष्ट्र की छः प्रमुख अंगों में से एक सुरक्षा परिषद (UNSC) में फ़िलहाल 15 देश हैं। इनमें पाँच सदस्य स्थायी होते हैं। 130 करोड़ की जनसंख्या वाला भारत इसमें शामिल नहीं है।

UNSC का कहना है कि उसका उद्देश्य ‘शांति पर खतरों अथवा आक्रामक कृत्यों’ की पहचान करने में नेतृत्व करना है। साथ ही ये दो पक्षों के बीच शांति से मामले को निपटाने पर जोर देता है और इसके तरीके निकालता है। इसे संयुक्त राष्ट्र की तरफ से बलपूर्वक शांति-स्थापना के लिए प्रतिबन्ध लगाने के भी अधिकार प्राप्त हैं। 15 देशों में से 5 स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, यूके, चीन, रूस और फ़्रांस। अब जब इसमें सुधार की माँग हो रही है, भारत की दावेदारी सबसे तेज़ी से उभरी है।

भारत और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC)

24 अक्टूबर 1945 में अस्तित्व में आए इस संस्था की स्थायी सदस्यता के लिए भारत ने औपचारिक तौर पर दावा 3 अक्टूबर 1994 को पेश किया था। लेकिन जब बात भारत की विदेश नीति बात की आती है तो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई बड़ी गलतियों को उसमें न जोड़ा जाए, तो वो अधूरी है। कॉन्ग्रेस के ही नेता और वर्षों तक यूएन में सेवा देने के बाद भारत के विदेश राज्यमंत्री रहे शशि थरूर अपनी पुस्तक ‘Nehru: The Invention of India’ में यूएन के भारतीय अधिकारियों के द्वारा देखी गई फाइलों के हवाले से लिखा है कि जब जब नेहरू को अमेरिका ने भारत के UNSC में स्थायी सदस्य बनने का ऑफर दिया, तो उन्होंने कहा कि ये सीट चीन को दे दी जाए।

तो एक तरह से जवाहरलाल नेहरू ने एक बड़ा मौका गँवा दिया और उसके बाद से भारत कभी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य नहीं बन सका। अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व भर में भारत का डंका बजाया है तो भारत की UNSC में स्थायी दावेदारी कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी प्रमुख माँगों में से एक रही है। उनका कहना है कि भारत के बिना ऐसी किसी संस्था का कामकाज कैसे चल सकता है?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा कि बदलते घटनाक्रम और आज की परिस्थितियों को देखते हुए यूएन में सुधर की सख्त ज़रूरत है। उन्होंने पूछा कि आपदा के इस वक़्त में यूएन कहाँ है? साथ ही उन्होंने UNSC में भारत के लिए स्थानीय सदस्यता की माँग दोहराई। उन्होंने कहा कि दुनिया के हित के लिए ‘संतुलन और सशक्तिकरण’- दोनों आवश्यक है।

भारत की बढ़ती शक्ति का ही नतीजा है कि जून 2020 में हमारा देश 8वीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का अस्थायी सदस्य चुना गया। इससे पहले 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-12 में भारत UNSC का अस्थायी सदस्य रहा है। ताज़ा चुनाव में भारत को 184 मत (95.8%) मिले। इससे ज्यादा सिर्फ 2011-12 में भारत को 187 वोट मिले थे।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में भी भारत की UNSC में स्थायी सदस्यता की माँग की धमक सुनाई पड़ रही है। अमेरिका के पूर्व डिप्लोमेट रिचर्ड वर्मा ने कहा कि डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन अपनी जीत के बाद संयुक्त राष्ट्र में सुधारों को आगे बढ़ाएँगे और भारत जैसे देश को UNSC में स्थायी सदस्यता दिलाने में मदद करेंगे, इसमें कोई दो राय नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके काल में भारत-अमेरिका सबसे करीबी दो देश होंगे।

2015 में यूएन की जनरल असेम्ब्ली में भी भारत ने साफ़ कर दिया था कि संयुक्त राष्ट्र में कोई भी सुधार तब तक अपूर्ण रहेगा, जब तक भारत को UNSC का स्थायी हिस्सा न बनाया जाए, क्योंकि ऐसा न किया जाना 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप नहीं होगा। भारत की माँग है कि न सिर्फ स्थायी, बल्कि UNSC की अस्थायी सदस्यों की संख्या भी बढ़ाई जाए। भारत ने 1994 में पहली बार UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद से बदल रहा है परिदृश्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब बोलते हैं तो पूरी दुनिया उन्हें सुनती है। इसका कारण है कि वो न सिर्फ वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देते हुए रोचक उपाय सुझाते हैं, बल्कि पक्षपात के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को उनकी गलतियाँ याद दिलाने से भी नहीं चूकते। जब यूएन का गठन हुआ था, तभी महात्मा गाँधी का मानना था कि भारत को UNSC में वीटो पावर रखने वाला सदस्य होना चाहिए।

चाहे दुबई हो या फिर अमेरिका का न्यूयॉर्क, नरेंद्र मोदी जहाँ भी गए- उन्होंने वहाँ रह रहे भारतीयों में एकता की अलख जगाई। उन्हें एहसास दिलाया कि वो एक हैं और एक होकर आवाज़ उठाएँगे तो किसी भी देश को सुनना पड़ेगा। भारत ने UNSC में अपनी अनौपचारिक दावेदारी तो इसके गठन के बाद से ही शुरू कर दी थी, लेकिन पीएम मोदी के आने के बाद जिस तरह से कई छोटे-बड़े देशों ने इसका समर्थन किया है, उससे भारत का मनोबल बढ़ा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से G-4 (भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी) को नई ऊँचाइयाँ देते हुए यूएन में एकता दिखाई है और सितम्बर 2015 में जिस ऐतिहासिक ‘टेक्स्ट बेस्ड नेगोशिएशन्स’ की यूएन में शुरुआत हुई, उसके पीछे भारत का बड़ा रोल था। यूएन में भारत ने अपनी धमक ऐसी बढ़ा ली है कि UNSC में स्थायी सदस्यता मिलना बस अब समय की बात है। चीन के साथ तनाव को देखते हुए चीन-विरोधी देशों को भी लग रहा होगा कि भारत को इसमें होना चाहिए।

हालाँकि, अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि G-4 देशों को यूएन सुरक्षा परिषद के चुनावों में वोट का ही बहिष्कार कर देना चाहिए और जब परमाणु बम रखने के आधार पर या अन्य मामलों में किसी देश को प्रतिबंधित करने की बात आए तो इसका विरोध करना चाहिए। पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। यहाँ एक उदाहरण देखना ज़रूरी है।

यूएनएससी ने सूडान के खिलाफ ‘इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट’ के साथ सहयोग न करने का आरोप लगा कर प्रस्ताव पारित किया। लेकिन, भारत ने 2015 में निर्भयतापूर्वक वहाँ के राष्ट्रपति उमर हसन अल-बशीरस का इंडो-अफ्रीकन समिट के दौरान स्वगात किया। सूडानी राष्ट्रपति ने भी UNSC में भारत की दावेआरी का स्वागत किया और साथ ही समझाया कि कैसे यूएन में अफ्रीका का प्रतिनिधत्व काफी कम है।

UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) में भारत की स्थायी सदस्यता: अब आगे क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार पेरिस में भारतीय समुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा था कि भारत एक ऐसा देश है जो हमेशा शांति के लिए खड़ा रहता है और विश्व में शांति की स्थापना में मदद करता है- फिर भी UNSC में एक स्थायी सीट के लिए हमें संघर्ष करना पड़ रहा है। अब जब प्रथम विश्वयुद्ध के 100 वर्ष हो चुके हैं, पीएम ने कहा था कि महात्मा गाँधी और बुद्ध की भूमि को उसका ‘हक़’ मिलना चाहिए।

पीएम मोदी कहते हैं कि अब वो समय चला गया जब भारत मदद के लिए कहता था, अब ऐसा समय है जब देश सिर्फ अपना अधिकार माँग रहा है, कोई एहसान करने नहीं बोल रहा। क्लाइमेट चेंज के विषय में भारत पूरी दुनिया के नेतृत्व की ओर आगे बढ़ रहा है। सोलर अलायन्स ओर एक बड़ा कदम था। पेरिस में क्लाइमेट चेंज पर हुए समिट में भारत की धमक पूरी दुनिया ने काफी अच्छी तरह देखी।

भरतपुर: 8 साल की बच्ची को अगवा कर सुबेदीन ने साथियों संग किया रेप

राजस्थान के भरतपुर जिले के कैथवाड़ा थाना क्षेत्र में एक 8 वर्षीय नाबालिग बच्ची के अपहरण और सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया है। पुलिस ने मामले में आरोपित सुबेदीन उर्फ इन्नस पुत्र काला खां को गिरफ्तार कर लिया है। फिलहाल, अन्य आरोपित फरार हैं।

जाँच अधिकारी डीएसपी मदनलाल जैफ के अनुसार पीड़िता के पिता ने 30 सितंबर को कैथवाड़ा थाने पर इस मामले में शिकायत दर्ज करवाई थी। पिता ने अपनी तहरीर में गाँव बांसोली निवासी सुबेदिन और उसके 3-4 साथियों पर अपनी बच्ची के अपहरण और गैंगरेप का आरोप लगाया था।

इसके बाद पुलिस ने मामले को संज्ञान में लेते हुए अपनी जाँच पड़ताल शुरू की व मुख्य आरोपित सुबेदीन को गिरफ्तार कर लिया। वहीं बाकी फरार आरोपितों के धर पकड़ के लिए पुलिस टीमें दबिश दे रही हैं।

पिता द्वारा दर्ज शिकायत के अनुसार, आरोपितों ने उनकी लड़की के साथ दुष्कर्म किया फिर घायल अवस्था में घर के पास छोड़कर भाग गए।

गौरतलब है कि इससे पहले राजस्थान के बारां (Baran) जिले में दो नाबालिग लड़कियों से गैंगरेप का मामला सामने आया था। इसमें पीड़िताओं के पिता ने पुलिस से अपनी बच्चियों के साथ हुए अपराध को लेकर न्याय की माँग की थी। अगवा की गई लड़कियों से जब पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ की तो पुलिस के सामने ही उन्हें जान से मारने की धमकी दे दी गई। इस वजह से वह अपने ऊपर हुए जुर्म के बारे में नहीं बता सकी थीं।

नाबालिग लड़कियों के पिता ने पुलिस को बताया था कि दो नाबालिग आरोपित 18 सितंबर की रात को बहला फुसला कर उनकी बेटियों को भगा ले गए थे। पिता के आरोप के अनुसार, अगवा करने के बाद उन्हें अजमेर, कोटा और जयपुर ले जाकर तीन दिनों तक लगातार उनका बलात्कार किया गया। दोनों लड़कियों को 21 सितंबर को कोटा से बरामद किया गया था।

एक तरह जहाँ दोनों नाबालिगों ने कैमरे पर नशीला पदार्थ पिलाकर सामूहिक बलात्कार करने की बात स्वीकार की। वहीं इस मामले में पुलिस और सीएम अशोक गहलोत का दावा है कि नाबालिग लड़कियों ने अपने बयान में बलात्कार के आरोपों से इनकार किया है।

राजस्थान में हर दिन 16 रेप, लक्षद्वीप में 0; 94% मामलों में जान-पहचान के ही होते हैं बलात्कार आरोपित

हाथरस मामले के बाद महिला सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कई मामले इस बीच अन्य प्रदेशों से भी सामने आए हैं। हालाँकि, देश में इस घृणित अपराध पर वास्तविक स्थिति क्या है? इसे बिना आँकड़ों के नहीं समझा जा सकता और न ही एक मामले से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौन सी सरकार महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में सबसे ज्यादा विफल है।

हाल ही में राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (NCRB) ने अपनी वेबसाइट ncrb.gov.in पर आँकड़ों सहित ‘भारत में अपराध’ शीर्षक के साथ रिपोर्ट जारी की है। इसमें महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों को राज्यवार कई श्रेणियों में बाँटा गया है।

आइए NCRB के आँकड़ों से समझने की कोशिश करें कि पिछले साल किन राज्यों में सबसे अधिक रेप की घटनाएँ हुईं। NCRB द्वारा जारी की गई सूची बताती है कि साल 2019 में भारत में रेप के 30,641 मामले दर्ज किए गए थे। इनमें रेप पीड़िताओं की संख्या 30868 है। रिपोर्ट बताती है कि 94% केसों में पीड़िता के साथ बलात्कार करने के आरोपित उनके जान-पहचान के थे।

सूची के मुताबिक सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएँ राजस्थान में सामने आई थीं। वहाँ पिछले साल 5997 मामले दर्ज किए गए। यानी प्रतिदिन का औसत देखा जाए तो प्रदेश में हर दिन 16 रेप की घटना हुईं। सूची, रेप पीड़िताओं की संख्या भी प्रदेश में 6051 बताती है। इतना ही नहीं प्रदेश में प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध की दर 15.9 है।

वहीं हाथरस, बलरामपुर आदि मामलों के बाद से चर्चा में आ रहे उत्तर प्रदेश में 2019 में 3065 मामले दर्ज किए गए और पीड़िताओं की संख्या 3131 रही। यानी प्रतिदिन औसत वहाँ करीब 8 मामले रिकॉर्ड हुए। हालाँकि प्रदेश में प्रति लाख जनसंख्या पर यदि अपराध के आँकड़े देखें तो दर 2.8 है। साथ ही सूची में उत्तर प्रदेश का स्थान कुल 36 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में 24वाँ है।

तीसरे नंबर पर मध्यप्रदेश है। यहाँ कुल 2485 मामले रिकॉर्ड किए गए। पीड़िताओं की संख्या 2490 दर्ज की गई और प्रति लाख जनसंख्या के हिसाब से अपराध की दर 11.1 रही। प्रतिदिन औसत प्रदेश में 6.8 थी।

महाराष्ट्र 2299 रेप के मामलों के साथ चौथे नंबर पर आता है। यहाँ रेप पीड़िताओं की संख्या 2305 है। प्रतिदिन औसतन 6 रेप हुए और प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध का दर 3.9 रहा।

इसके बाद सूची के अनुसार केरल में 2023 मामले आए। इसी तरह असम में  1773, हरियाणा में 1480, झारखंड में 1416 और ओडिशा में 1382 मामले सामने आए। देश की राजधानी दिल्ली में 1253 रेप के मामले दर्ज किए गए। सिक्किम में यह संख्या 11, पुडुचेरी में 10, नागालैंड में 8 और दादर नगर हवेली तथा लक्षद्वीप में 0 मामले सामने आए।

हाथरस केस: CM योगी ने SP सहित क​ई अफसरों को किया सस्पेंड; पुलिस सहित सबका होगा नॉर्को और पॉलीग्राफ टेस्ट

हाथरस मामले में योगी सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए एसपी, डीएसपी, इंस्पेक्टर समेत कई अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। योगी सरकार ने यह कार्रवाई प्राथमिक जाँच के आधार पर की है।

एएनआई ने मुख्यमंत्री कार्यालय के हवाले से बताया है, “हाथरस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसपी, डीएसपी, इंस्पेक्टर समेत अन्य अधिकारियों को प्राथमिक जाँच रिपोर्ट के आधार पर सस्पेंड करने के निर्देश दिए हैं।”

यह भी बताया गया है कि इस मामले से जुड़े कई लोगों का नॉर्को और पॉलीग्राफ टेस्ट भी करवाया जाएगा। इनमें शिकायतकर्ता, आरोपित और पुलिसकर्मी शामिल हैं।

गौरतलब है कि हाथरस मामले में लगातार योगी सरकार की मंशा को लेकर विपक्ष सवाल खड़ा कर रहा था। हालाँकि, इस कार्रवाई से पहले सीएम योगी ने पीड़ित परिवार के साथ अपनी संवेदना प्रकट करते हुए उनको 25 लाख रुपए का मुआवजा और सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया था।

बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाथरस में बीते दिन के पूरे घटनाक्रम की रिपोर्ट तलब की है। जिला व पुलिस प्रशासन की भूमिका के बारे में पूरा ब्योरा माँगा गया है।

इस बीच हाथरस कांड पर सीएम योगी ने शुक्रवार ने ट्वीट करके कहा, “उत्तर प्रदेश में माताओं-बहनों के सम्मान-स्वाभिमान को क्षति पहुँचाने का विचार मात्र रखने वालों का समूल नाश सुनिश्चित है। इन्हें ऐसा दंड मिलेगा जो भविष्य में उदाहरण प्रस्तुत करेगा। यह हमारा संकल्प है-वचन है।”

गौरतलब है कि मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हाथरस पीड़िता के दम तोड़ने के बाद से यह पूरा मामला गरमाया हुआ है। विपक्ष भी इस मौके का फायदा उठाकर अपनी राजनीति कर रहा है। कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी समेत कई विरोधी दल इस केस को लेकर योगी सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं

बता दें कि हाथरस मामले में मृतका के साथ कथित तौर पर दो हफ्ते पहले बलात्कार हुआ था। इसके बाद उसके साथ घटना के वक्त हुई मारपीट में कई गंभीर चोटें आई और इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। फिर उसके अंतिम संस्कार को लेकर यूपी पुलिस पर सवाल उठे। हालाँकि बाद में यह साफ किया गया कि दाह संस्कार के समय मृतका के पिता वहाँ मौजूद थे। 

उत्तर प्रदेश: राजकुमार बन आसिफ ने नेहा से की शादी, सच्चाई उजागर होने पर मारी गोली

उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले की हिंदू लड़की नेहा की 25 सितंबर (शुक्रवार) को उसके पति आसिफ ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। नेहा की हत्या ने परिवार वालों को गहरे सदमे में छोड़ दिया है। छोटी बहन की मौत ने भाई को अंदर ही अंदर तोड़ दिया है। वहीं घर वालों के खिलाफ जा कर शादी करने की वजह से नाराज भाई ने कहा, “नेहा मेरे लिए उस दिन मर गई थी जब वह उस लड़के से शादी करने के लिए हमारी मर्जी के खिलाफ गई थी, देखो उसने (आसिफ) क्या किया, उसने उसे मार डाला।”

मृतक के भाई से मिलने वाले एक बजरंग दल के कार्यकर्ता ने ऑपइंडिया को बताया कि नेहा का परिवार उसकी मौत से बेहद दुखी है। पूरा घर निराशा में डूब हुआ है। एक्टिविस्ट विवेक मिश्रा ने हमें बताया कि नेहा के भाई ने इस मामले में मीडिया से बात करने से भी इनकार कर दिया है। वह सिर्फ यही कहते हैं कि, “मैंने उसके साथ सभी संबंध तोड़ दिए थे, मैं उसके बारे में बात नहीं करना चाहता।” विवेक मिश्रा ने पुष्टि की कि नेहा के माता-पिता की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी और उसके आशीष और राज दो भाई हैं।

कथित तौर पर यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना उत्तर प्रदेश में चल रहे लव जिहाद रैकेट से जुड़ा है। बदायूँ पुलिस ने 27 सितंबर (रविवार) को आरोपित आसिफ को गिरफ्तार किया था। उसके अगले ही दिन पुलिस ने उसके साथी तौफीक उर्फ ​​बबलू को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

एसओ सुधाकर पांडे के मुताबिक, आसिफ ने अपने दोस्त तौफीक उर्फ ​​बबलू की हत्या की योजना बनाने में मदद ली थी। आसिफ ने अपना जुर्म कबूलते हुए बताया था कि अपनी पत्नी नेहा से छुटकारा पाने और साले को हत्या में फँसाने के लिए उसने यह षड्यंत्र रचा था।

गौरतलब है कि बदायूँ के सिविल लाइंस थाना क्षेत्र के निवासी आसिफ ने डेढ़ साल पहले दिल्ली में नेहा से मिला था। जहाँ वह काम करता था। उसने एक हिंदू के रूप में नेहा से अपना परिचय दिया था और अपना नाम राजकुमार बताया था। दोनों में प्यार हो गया और उन्होंने एक-दूसरे से शादी करने का फैसला किया। नेहा का भाई शादी के पक्ष में नहीं था, लेकिन नेहा ने अपने परिवार की इच्छाओं के खिलाफ आसिफ उर्फ ​​राजकुमार से शादी कर ली।

कुछ दिनों के बाद नेहा के सामने जब आसिफ की पहचान सामने आई तो दोनों के बीच विवाद होने लगे थे। इसके बाद आसिफ ने उसकी हत्या करने का मन बना लिया। इसके लिए बाकायदा उसने प्लानिंग भी की। प्लानिंग के तहत आसिफ पहले नेहा को अपने साथ बदायूँ ले गया और योजनानुसार मौका देखकर उसे गोली मार दी। नेहा को मौत के घाट उतारने के बाद उसे अस्पताल ले गया, जहाँ डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया।

पुलिस पूछताछ में उसने हत्या का पूरा आरोप नेहा के भाई पर लगा दिया। उसने पुलिस से कहा कि नेहा का भाई रवि उनकी शादी से खुश नहीं था, इसलिए उसने अपनी बहन की गोली मारकर हत्या कर दी।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में आए दिन लव जिहाद के मामले सामने आ रहे है। इसका मुख्य गढ़ कानपुर उभरकर सामने आया है। जहाँ लड़के हिंदू नाम रख कर भोली-भाली हिंदू लड़कियों को अपना शिकार बनाते है और फिर जबरन उनसे इस्लाम धर्म कबूल करवाते है। पिछले 2 महीनों में हमने लगभग ऐसे 20 मामलों की रिपोर्ट की है।

कानपुर पुलिस ने इन मामलों की जाँच के लिए 8 सदस्यीय विशेष दल का भी गठन किया है। हाल ही में SIT को इन सब के पीछे पाकिस्तानी संगठन का भी पता चला है जो मुस्लिम लड़कों को लव जिहाद के लिए फंड देने में मदद करते है।

दलित महिला के यौन उत्पीड़न में सपा जिलाध्यक्ष तनवीर खान पर मामला दर्ज, धर्म परिवर्तन के लिए डाल रहा था दबाव

उत्तरप्रदेश के शाहजहाँपुर में समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष तनवीर खान समेत 4 अन्य लोगों को लूटपाट और दलित महिला के यौन शोषण के मामले में मामला दर्ज किया गया है। सपा नेता समेत अन्य पर यह मामला हिंदू युवा वाहिनी के प्रदर्शन के बाद दर्ज किया गया। संगठन ने पुलिस थाने और एसएसपी दफ्तर के बाहर धरना दिया था।

पीड़िता के भाई के अनुसार, खान ने उनकी बहन पर अपने एक 38 वर्षीय रिश्तेदार से जबरन शादी करने और धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि इस मामले को आईपीसी की धारा 354, 379, 504, 506 के अलावा एससी/एसटी एक्ट की उपयुक्त धाराओं में दर्ज किया गया है। आरोपितों में दुर्गेश सक्सेना, कफील अहमद, वैशाली सक्सेना और तनवीर खान का नाम शामिल है।

गौरतलब है कि यह यौन उत्पीड़न का मामला उस समय सामने आया है जब विपक्ष लगातार हाथरस मामले पर राजनीति करने में लगा है। सपा नेता अखिलेश यादव भी अपनी राजनीति साधने के लिए इस पर लगातार बयान दे रहे हैं।

वह लगातार योगी सरकार और पुलिस प्रशासन की आलोचना करते हुए ट्वीट कर रहे हैं। उन्होंने हाल में उन सपा कार्यकर्ताओं पर पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किए जाने पर भी अपना गुस्सा व्यक्त किया था, जो हाथरस में धारा 144 लागू होने के बावजूद गाँव की ओर आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने कुछ दिन पहले हाथरस घटना पर अपना दुख जताते हुए ट्वीट में कहा था कि असंवेदनशील सत्ता से अब कोई उम्मीद नहीं बची है।

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ अखिलेश यादव लगातार हाथरस केस पर अपनी संवेदनशीलता प्रकट कर रहे हैं। वहीं तनवीर खान के मामले में उन्होंने अब तक कुछ नहीं कहा है। इन दोनों मामलों से ही अंदाजा लगा सकते हैं महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों पर अखिलेश यादव कितने चिंतित हैं। उनका यह दोहरा रवैया देखकर किसी को भी हैरानी होगी कि राजनैतिक जरूरतों के लिए कैसे कोई अपनी नैतिकता से समझौता कर लेता है।