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बीजेपी MLA को उड़ाने की घटना में 33 माओवादी थे शामिल, NIA ने दाखिल की चार्जशीट; 6 गिरफ्तार-22 फरार

छत्तीसगढ़ में पिछले साल नक्सली हमले में मारे गए बीजेपी विधायक भीमा मंडावी की हत्या के मामले में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के 33 कैडरों के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी है। आईपीसी, यूएपीए, आर्म्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की कई धाराओं के तहत जगदलपुर की एक विशेष एनआईए अदालत में आरोप-पत्र दायर किया गया।

एनआईए के प्रवक्ता के अनुसार, 33 में से छह आरोपित- मडका राम ताती, भीम राम ताती, लिंगे ताती, लक्ष्मण जायसवाल, रमेश कुमार कश्यप और हरिपाल सिंह चौहान छत्तीसगढ़ दंतेवाड़ा के रहने वाले हैं, जिन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। 5 आरोपितों की मौत हो चुकी है। शेष 22 फरार हैं। गिरफ्तार किए गए छह आरोपितों ने कथित रूप से नक्सलियों को आश्रय, भोजन, लॉजिस्टिक सहायता, बिजली के तार और स्टील के कंटेनर प्रदान किए थे।

पिछले साल अप्रैल 2019 में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) के चार सुरक्षाकर्मियों के साथ भाजपा विधायक मांडवी की आईईडी विस्फोट में हत्या कर दी थी। इसके अलावा हमलावरों ने बलिदानी सीएएफ कर्मियों के हथियार और गोला-बारूद भी लूट लिए थे। इस घटना को लेकर एनआईए द्वारा 17 मई 2019 को मामला दर्ज किया गया था। लेकिन छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा उठाए गए कुछ कानूनी मुद्दों के कारण 17 मार्च 2020 से पहले इसकी जाँच शुरू नहीं हो पाई थी।

एनआईए के एक अधिकारी के मुताबिक, मंडावी की हत्या का फैसला दिसंबर 2018 में पश्चिम बस्तर में दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) की स्तर की बैठक में लिया गया था। दूसरी बार DKSZC के सदस्य और दर्भा डिवीजन के प्रभारी गिरी रेड्डी की अध्यक्षता में दक्षिण बस्तर के गोदरदास वन क्षेत्र में फरवरी 2019 के अंत में आयोजित एक अन्य बैठक में मांडवी के साथ-साथ अन्य राजनीतिक नेताओं और पुलिसकर्मियों की हत्या का निर्णय लिया गया। यह साजिश चुनावों को बाधित करने के उद्देश्य से टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन (TCOC) के तहत रचा गया था।

दर्भा डिवीजन समिति के सचिव बड़ा देव को TCOC के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रभारी नियुक्त किया गया था। श्यामगिरि गाँव में वार्षिक मेले के अवसर को हमले के लिए चुना गया था, क्योंकि माओवादी नेताओं को पता था कि कि प्रमुख राजनीतिक नेता इसमें भाग लेंगे।

सीपीआई (माओवादी) के कैडर ने श्यामगिरी गाँव के पास नकुलनार-बचेली मार्ग पर आईईडी लगाया। एनआईए अधिकारी के अनुसार, इस साजिश में उनके महासचिव नामबाला केशव राव सहित सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी थी।

‘कहीं मत जाना, अब प्रियंका गाँधी आएँगी’: हाथरस केस में कुछ और ऑडियो आए सामने, ₹25 लाख पर भी बात

हाथरस मामले में लीक हुई ऑडियो ने मीडिया और कई राजनेताओं की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर कोई इस केस के बहाने सिर्फ़ अपनी छवि चमकाने में जुटा है। इससे पहले हमने इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री पांडे और मृतका के भाई संदीप के बीच बातचीत की लीक ऑडियो पर रिपोर्ट की थी। अब कुछ और ऑडियो सामने आए हैं।

इस ऑडियो में एक अज्ञात व्यक्ति संदीप से बात कर रहा है। वह उनसे कह रहा है कि वो घर से कहीं न जाएँ, क्योंकि कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गाँधी उनके घर आने वाली हैं।

इस बातचीत में व्यक्ति यह भी कहते सुना जा सकता है:

“अगर कोई भी तुम्हें कहीं भी लेकर जाता है, तो तुम्हें कहीं नहीं जाना है, अब प्रियंका गाँधी घर आएँगी। कोई कहता है कि तुम्हें हाथरस जाना है, यहाँ जाना है -वहाँ जाना है, तुम्हें कहीं नहीं जाना है। उन्हें (प्रियंका गाँधी को) बताना है- पुलिस प्रशासन दबाव बना रहा है। मीडिया को आने नहीं दे रहा। रिश्तेदारों को आने नहीं दे रहा । कहना है ये हमारे प्रोटेक्शन में लगा रखे हैं या ठाकुरों के प्रोटेक्शन में। ठीक है, ये सब उनको बताना है।”

बातचीत की शुरुआत में ही संदीप इस व्यक्ति को कहता है कि एसआईटी उनके घर आई हुई और कोई ‘संजय भैया’, संदीप के पिता और दो अन्य लोग कुछ कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ उनके पास बैठे हैं। फिर वह आदमी संदीप से कहता है, “ठीक है, कहीं मत जाना। अब प्रियंका गाँधी आएँगी और उन्हें बताना कि तुम पर दबाव बनाया गया है और तुम इसका वीडियो बनाना चाहते हो।”

इस मामले में एक अन्य बातचीत की रिकॉर्डिंग भी इस बीच सामने आई है। यह ऑडियो किसी ग्रामीण महिला और संदीप के बीच की है। इसमें मृतका के भाई को समझाया जा रहा है कि वह 25 लाख रुपए के मुआवजे पर किसी कीमत पर फैसला न करे और 50 लाख तक के मुआवजे पर निष्कर्ष तक पहुँचे। ऑडियो में सुना जा सकता है कि महिला कहती है कि कुछ राजनेता इस मामले में फैसला न करने के लिए कह रहे हैं। बातचीत के दौरान किसी ‘राहुल’, मनीष सिसोदिया और बरखा दत्त का नाम भी सामने आता है।

गौरतलब है कि मंगलवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हाथरस पीड़िता के दम तोड़ने के बाद से यह पूरा मामला गरमाया हुआ है। दरअसल, मृतका के साथ कथित तौर पर दो हफ्ते पहले बलात्कार हुआ था। इसके बाद उसके साथ घटना के वक्त हुई मारपीट में कई गंभीर चोटें आई और इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। फिर उसके अंतिम संस्कार को लेकर यूपी पुलिस पर सवाल उठे। हालाँकि बाद में यह साफ किया गया कि दाह संस्कार के समय मृतका के पिता वहाँ मौजूद थे। 

एएनआई से बात करते हुए, एडीजी प्रशांत कुमार ने बताया था कि जिन फोरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था, वे भी प्राप्त हो गई हैं। एडीजी ने कहा था कि एफएसएल रिपोर्ट में ‘बलात्कार’ का कोई सबूत नहीं मिला। उन्होंने निष्कर्ष पर बात करते हुए कहा था मृतका पर कोई यौन हमला नहीं हुआ था, और मौत का कारण गला घोंटने और रीढ़ की चोट थी।

बता दें कि एक ओर जहाँ पूरा देश इस मामले पर इंसाफ की गुहार लगा रहा है, वहीं इस केस में अब भी कई पहलुओं से राज उठना बाकी है। मगर कुछ राजनेता इस केस के जरिए अपनी राजनीति करने में जुटे हैं। इसी दौरान सोशल मीडिया पर भी मुख्यधारा मीडिया अपना अजेंडा चलाने के लिए कई झूठ फैला रहा है। एसआईटी को पूरे मामले की जाँच भी सौंप दी गई है।

केरल मॉडल पर किताब लिखने वाले ध्रुव राठी और चालीसा पढ़ने वाले रवीश अब क्या कहेंगे जब 144 लग गया है?

सोशल मीडिया के हर कोने में एक ऐसी पढ़ी-लिखी लिबरल जमात मौजूद है जो नतीजों के पहले दावे ठोंक देती है। जिन दावों में न तो तथ्य और होते हैं और न ही तर्क। सिर्फ समझ होती है जिसका दायरा जनता की कल्पना से कहीं ज़्यादा है। यहाँ तक कि कोरोना वायरस जैसे गंभीर मुद्दे भी इन लिबरल्स की लिबिर-लिबिर से अछूते नहीं रहे हैं।

ध्रुव राठी और रवीश कुमार के दावों का पुलिंदा हमेशा भारी रहता है। कोरोना पर भी यही दिखा। सिर्फ इन्हीं दोनों ने नहीं, स्वीडन के महामारी विशेषज्ञ (epidemiologist) एंडर्स टेंगेल ने भी कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन को लेकर कुछ विचित्र दावे किए थे। 

यूट्यूब के स्वघोषित ‘हर विषय के विशेषज्ञ’ ध्रुव लाठी (सॉरी राठी) ने केरल में कोरोना वायरस के हालात को लेकर एक वीडियो बनाया था। 14 मई 2020 को साझा किए गए इस वीडियो में 13 मिनट तक केरल की तारीफों के पुल बाँधे और उसी पुल पर खुद ही दौड़ भी लगाई। इसे वीडियो का शीर्षक था- How Kerala defeated Coronavirus। यानी कैसे केरल ने कोरोना वायरस को हराया? राठी जैसे सार्वभौमिक जानकार इतने पर ही थमे नहीं और केरल के कोरोना वायरस मॉडल पर एक किताब तक लिख डाली। 

इस अतुलनीय पुस्तक का शीर्षक भी वही था जो ऊपर अंग्रेज़ी भाषा में लिखा है। लेकिन यह बात 5 महीने पुरानी हैं। केरल में अभी के हालात पूरी तरह अलग हैं। कोरोना वायरस पर काबू पाने के लिए राज्य में धारा 144 लगा दी गई है। गुरुवार को केरल में 8135 मरीज सामने आए और इसके साथ वहाँ कुल मरीजों की संख्या लगभग 2 लाख हो चुकी है। मुख्यमंत्री पी. विजयन ने खुद इस बात की जानकारी दी है कि वहाँ स्वास्थ्यकर्मी बड़ी संख्या में प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन इस तरह के तमाम तथ्यों और तर्कों के इतर ध्रुव लाठी (सॉरी राठी) ने पहले ही किताब लिख दी थी। 

पत्रकारों के तथाकथित महानायक राजा रबिश कुमार (सॉरी रवीश) ने भी केरल की प्रशंसा में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। भले-मानुष का कहना था कि केरल ने ऐसा मॉडल पेश किया है, जिससे देश के अन्य राज्यों को ही नहीं, बल्कि दुनिया को भी सीखने की ज़रूरत है। रवीश कुमार केरल के कोरोना वायरस मॉडल पर इतने भावुक हुए कि आधे घंटे तक उस पर बकते रहे, बिना यह सोचे कि आने वाले समय में उनका आकलन और उनके दावे किस कदर फुर्र हो जाएँगे।

रवीश कुमार का अनुमान केवल केरल तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने न्यूज़ीलैंड और स्वीडन को लेकर भी दावे किए थे। उनके मुताबिक़ दुनिया के हर देश को इन दो देशों से सीखना चाहिए, लेकिन कुछ ही समय में हालात बदल गए। एक बार फिर रवीश कुमार की बातें ‘बकैती मात्र’ सिद्ध हुई। जैसे ही उन्होंने न्यूज़ीलैंड पर प्राइम टाइम किया उसके बाद से अब तक न्यूज़ीलैंड को 2 बार लॉकडाउन करना पड़ा है। स्वीडन ने भी शुरुआत में लॉकडाउन को लेकर गंभीर रवैया न रखने को लेकर आगामी महीनों में महँगी कीमत चुकाई।  

वैसे भी स्वीडन की आबादी सिर्फ 1.2 करोड़ है। उसकी तुलना कई गुना ज्यादा आबादी वाले भारत से करना यह बताता कि रिपोर्ट रचयिता किस कदर एजेंडाग्रस्त है। स्वीडन ही नहीं बल्कि न्यूज़ीलैंड की ही बात करें तो दोनों देशों के बुनियादी ढाँचे में ज़मीन-आसमान का फर्क है। आम जनता से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं तक और नीतियों से लेकर अर्थव्यवस्था तक, भारत और न्यूज़ीलैंड के हालातों में तुलना के आधार खोजने पर भी नहीं मिलते हैं।

व्यावहारिकता को ज़रा भी समझने वाला व्यक्ति ऐसी कल्पना करने से हज़ार दफा सोचेगा। लेकिन रवीश कुमार कई पुरस्कार जीत चुके हैं। उनकी बात अलग है इसलिए उनके दावे आसमान से गिरते हैं, जिसे उनके प्रशंसक दौड़ कर कैच कर लेते हैं।

स्वीडन के महामारी विशेषज्ञ (epidemiologist) एंडर्स टेंगेल ने भी इतने संवेदनशील मुद्दे पर अपने अद्भुत तर्कशास्त्र का प्रदर्शन किया था। जब कोरोना वायरस से भय के चलते दुनिया के तमाम देशों ने लॉकडाउन का फैसला लिया तब उन्होंने एक बयान दिया था। अपने बयान में उन्होंने कहा था, “हालात देख कर ऐसा लगता है कि दुनिया पागल हो चुकी है और हमने जितने मुद्दों पर बात की थी वह सब कुछ भुलाया जा चुका है।” एंडर्स के मुताबिक़ दुनिया के जितने देशों ने लॉकडाउन लागू किया है वह सब के सब पगला चुके हैं। एंडर्स यहीं नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने कहा कि जैसे दवाओं के साइडइफेक्ट्स होते हैं, वैसे ही लॉकडाउन के भी नकारात्मक परिणाम होंगे।

कुछ समय बाद जब स्वीडन में हालात बदतर हुए तब उन्हें अपने दावे में गंभीरता का स्तर नज़र आ गया (थी ही नहीं तो नज़र कैसे आती)। तब उन्होंने कहा कि स्वीडन को कोरोना वायरस का सामना दूसरी रणनीतियों के आधार पर करना था। उन्होंने स्वीकार किया कि देश में बहुत से लोगों की मौत हुई है और इससे पता लगता है, स्वीडन कोरोना वायरस से लड़ाई में सफल साबित नहीं हुआ।

यह तो कुछ नाम हैं, ऐसे कई और नाम हैं जिन्होंने जज्बातों में आकर दावों का लंबा बिल फाड़ा था और अंत में गाल बजाते मिले। बुद्धिजीवियों के साथ यह समस्या हमेशा से रही है और न जाने कब तक रहेगी, उन्हें अपने दावे परम सत्य लगते हैं, लेकिन जनता ऐसी बातों को सुनती और पेट पकड़कर हँसती है।

गोवा का स्पेशल विला: शूटिंग के नाम पर बुकिंग, बॉलीवुड स्टार करते हैं डिटॉक्स ताकि ड्रग्स का पता न चले

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच शुरू होने के बाद बॉलीवुड का जो ड्रग्स कनेक्शन सामने आया है उसके तार अब गोवा से भी जुड़ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बॉलीवुड के कई ए ग्रेड सितारे गोवा डिटॉक्स के लिए जाते हैं, ताकि जाँच होने पर ड्रग्स सेवन का पता नहीं चले।

रिपब्लिक टीवी की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि बॉलीवुड स्टार्स शूटिंग या छुट्टियों के नाम पर गोवा में स्पेशल विला बुक करते हैं। लेकिन असल में वहाँ वे डिटॉक्स करते हैं। रिपब्लिक टीवी को ऐसे ही एक ‘स्पेशल विला’ के केयरटेकर ने बताया, “सेलिब्रिटीज एजेंट के साथ आते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि ये सुरक्षित रहेगा और उन्हें ज्यादा पर्सनल स्पेस मिलेगा।”

गौरतलब है कि इससे पहले बॉलीवुड इनसाइडर के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दीपिका पादुकोण बॉडी डिटॉक्स करने गोवा गईं थी। इस इनसाइडर ने रिपब्लिक टीवी से कहा था, “मैं कुछ दिन पहले गोवा में पार्टी में थी। मुझे पता चला कि दीपिका भी वहाँ पहुँची है और उसे एक होटल में क्वारंटाइन के लिए ले जाया गया। मेरे एक करीबी दोस्त ने बाद में खुलासा किया कि अभिनेत्री होटल में वास्तव में ‘बॉडी डिटॉक्स’ कर रही थी।”

साथ ही इनसाइडर यह भी कहा था कि बांद्रा में रहने वाले एक ‘बड़े’ निर्देशक और निर्माता अक्सर इन ड्रग पार्टियों के आयोजन के लिए अपना मुंबई विला देते हैं। राजनेता भी इन पार्टियों में शामिल होते हैं और वहाँ ड्रग्स सप्लाइ के लिए एम्बुलेंस का इस्तेमाल किया जाता है।

गौरतलब है कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ड्र्रग्स से जुड़े मामले में दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर, सारा अली खान और रकुल प्रीत सिंह जैसी अभिनेत्रियों से पूछताछ कर चुकी हैं। रिया चकवर्ती सहित कई गिरफ्तार भी किए गए हैं। यह भी कहा जा रहा है कि बॉलीवुड के कई बड़े अभिनेता भी एजेंसी की रडार पर हैं।

दूसरी ओर, अब करणी सेना के नेता सुरजीत सिंह राठौर ने भी मौत से एक दिन पहले सुशांत और रिया के साथ होने का दावा किया है। सुरजीत ने कहा, “जब मैं 15 जून को कूपर अस्पताल गया था, तो सूरज सिंह ने मुझे बताया था कि रिया चक्रवर्ती 13 जून की रात सुशांत के आवास पर थी और शायद किसी लड़ाई की वजह से तभी चली गई थी। सूरज सिंह सब कुछ कोऑर्डिनेट कर रहे थे और उन्होंने रिया को बुलाया था और मुझे उनसे और संदीप से मिलवाया था। मैं उनमें से किसी को भी नहीं जानता।”

इससे पहले मुंबई बीजेपी के महासचिव विवेकानंद गुप्ता ने रिपब्लिक टीवी को दिए एक इंटरव्यू में दावा किया था, “13 जून की देर रात को एक पार्टी के बाद सुशांत रिया को छोड़ने उनके अपार्टमेंट में आए थे। इसकी जानकारी उन्हें एक चश्मदीद ने दी है।” उन्होंने चश्मदीद की बातों का जिक्र करते हुए बताया 13 और 14 की दरम्यानी रात की यह घटना है। सुशांत सिंह राजपूत रात के 2 या 3 बजे के आसपास रिया को छोड़ने उसके फ्लैट तक गए थे। फिर 14 की सुबह वे मृत मिले। इसलिए यह कहना कि 8 जून को छोड़ दिया था, यह गुमराह करने की बात है क्योंकि चश्मदीद ने उन्हें साथ में देखा है।”

हाथरस के राजनीतिक अखाड़े में राहुल की तरह TMC नेता भी जमीन पर सुरक्षित लुढ़कते हुए आए नजर, लगाया- धक्का मुक्की का आरोप

हाथरस मामले में राजनीति तेज हो चुकी है। ज्यादातर विपक्षी इस मामले में अपनी राजनीति को चमकाने के लिए कूद रहे है। जहाँ एक तरफ धारा 144 लागू होने के बावजूद राहुल गाँधी जबरदस्ती कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के काफिले के साथ पीड़िता के परिवार से मिलने निकले, और इस कवायद में वह गिर भी गए। वहीं इस घटना के एक दिन बाद टीएमसी नेता डेरेक ओ ब्रायन ने भी राहुल की हरकतों को अपने अंदाज में दोहराया।

दरअसल, डेरेक भी आज मृतक हाथरस पीड़िता के परिवार से मिलने के लिए जा रहे थे। जिस दौरान पुलिस ने उन्हें जब आगे बढ़ने से रोका तो वह खुद ही गिरते नजर आए।

सोशल मीडिया पर इस वक़्त 29 सेकंड का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे न्यूज़ एजेंसी एएनआइ द्वारा साझा किया गया है। इस वायरल वीडियो में आप देख सकते है कि किस तरह टीएमसी महिला नेता और अधिकारी के बीच हो रही बहस में डेरेक ओ ब्रायन महिला को हटाते हुए बीच में खुद घुसते है और अधिकारियों से बहस करते-करते खुद ही लुढ़कते-लुढ़कते गिर जाते है।

गौरतलब है कि धारा 144 अभी भी लागू होने के बावजूद, राहुल और प्रियंका गाँधी से प्रेरणा लेते हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल पार्टी के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ ब्रायन के नेतृत्व में शुक्रवार को हाथरस पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे जिस दौरान उन्हें यूपी पुलिस द्वारा रोका गया।

इस मामले में ANI ने प्रतिनिधिमंडल में शामिल एक अन्य TMC नेता काकोली घोष दस्तीदार के हवाले से कहा, “उन्हें जमीन पर धकेल दिया गया। शायद वह घायल भी है। उन पर हमला किया गया। वे यह कैसे कर सकते हैं?”

टीएमसी ने अपने बयान में कहा, “दिल्ली से करीब 200 किलोमीटर की यात्रा करने वाले तृणमूल सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल को उप्र पुलिस ने हाथरस में प्रवेश करने से रोक दिया है।” टीएमसी ने बयान में आगे कहा, “वे पीड़िता के परिवार के साथ एकजुटता व्यक्त करने और अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए अलग-अलग यात्रा कर रहे थे। इस समय हम हाथरस में पीड़िता के घर से सिर्फ 1.5 किलोमीटर दूर हैं।”

उल्लेखनीय है कि इसी तरह कल कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी भी गिरते हुए नजर आए थे। वायरल वीडियो में यह साफतौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह अपने आप ही राहुल गाँधी पलटते हुए नीचे गिरते है, जिसके बाद वहाँ मौजूद पुलिसकर्मी उन्हें उठाते हुए नजर आते है।

हालाँकि, राहुल गाँधी के वायरल वीडियो को देखते वक्त ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह सुरक्षित जगह देखने के बाद घास के ऊपर खुद ही गिर गए थे। वहीं इस वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूज़र्स ने भी उनके जमकर मजे लिए। यहाँ तक कि राहुल गाँधी को लेकर तरह- तरह के मिम्स भी कल से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे है।

हाथरस केस: इंडिया टुडे की पत्रकार का लम्बा ऑडियो लीक, पीड़िता के भाई से कहलवाना चाहती है ‘प्रशासन डाल रही दबाव’

हाथरस की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। हालाँकि इस मामले में अब भी कई पहलुओं से राज उठना बाकी है। मगर कुछ राजनेता इस केस के जरिए अपनी राजनीति करने में जुटे हैं। इसी दौरान सोशल मीडिया पर भी मुख्यधारा मीडिया अपना अजेंडा चलाने के लिए कई झूठ फैला रहा है और इसी बीच एसआईटी को पूरे मामले की जाँच भी सौंप दी गई हैं।

अब, ताजा जानकारी के अनुसार, इंडिया टुडे की पत्रकार और मृतका के भाई की फोन पर बातचीत वायरल हुई है। इस ऑडियो को ऑपइंडिया ने भी एक्सेस किया। इसमें सुना जा रहा है कि इंडिया टुडे पत्रकार तनुश्री मृतका के भाई संदीप को ऐसा स्टेटमेंट देने के लिए बोल रही हैं, जिसमें लड़की के पिता आरोप लगाए कि उनके ऊपर प्रशासन की ओर से बहुत दबाव था।

बातचीत को सुनकर यह साफ पता चलता है कि तनुश्री पीड़िता के भाई से एक निश्चित बयान दिलवाने का प्रयास कर रही हैं और संदीप की दबी आवाज सुनकर लग रहा है जैसे वह ऐसा नहीं करना चाहते। संदीप इस ऑडियो में पहले दबाव की बात कहते हैं। मगर बाद में कहते हैं कि उनके पिता इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं है कि उन पर दबाव बनाया गया या नहीं।

इसके बाद तनुश्री, संदीप से कहती हैं कि उसे कहीं से पता चला है कि परिवार पर ही बहन की मौत का इल्जाम लगाने का प्रयास किया जा रहा है। ये इस बातचीत का ऐसा हिस्सा है जिसे सुन कर लगता है कि ये सवाल खुद ही गढ़े गए, क्योंकि अभी तक कहीं भी मीडिया में ऐसी बात निकल कर सामने नहीं आई है। इससे पता चलता है कि पॉलिटिकल अजेंडा चलाने के लिए कैसे परिवार की स्थिति का फायदा उठाया गया।

कुल मिलाकर इस बातचीत का मकसद सिर्फ़ मृतका के पिता का वीडियो निकलवाना था, जिसमें पिता किसी भी तरह बस यही बोल दें कि उनपर दबाव बनवाकर बयान दिलवाया गया कि वह संतुष्ट हैं।

उन्हें ऑडियो में कहते सुना जा सकता है, “संदीप, प्लीज मेरे लिए एक चीज कर दो। मैं तुमसे वादा करती हूँ कि जब तक तुम्हारे परिवार को इंसाफ नहीं मिल जाता मैं यहाँ से हिलूँगी भी नहीं… संदीप एक वीडियो अपने पिता की बनाओ जिसमें वो कहें- हाँ, मुझ पर ऐसा बयान जारी करने का बहुत प्रेशर था कि मैं संतुष्ट हूँ। मैं जाँच चाहता हूँ क्योंकि हमारी बेटी मरी है और हमें न उसे देखने का मौका मिला और न उसके अंतिम संस्कार का।”

वे आगे कहती हैं, ”सिर्फ 5 मिनट लगेंगे। जल्दी से वीडियो बनाओ और सिर्फ़ मुझे भेज दो।” इस बातचीत में तनुश्री बार-बार संदीप को एसआईटी के ख़िलाफ़ भड़काती है। मगर, लड़की का भाई कहता है कि जाँच टीम सिर्फ़ उसे जरूरी सवाल कर रही थी और फिर वह चली गई।

पूरी बातचीत को सुनिए। मृतका का भाई वीडियो बनाने में अनिच्छुक नजर आता है और हिचकिचाता है। मगर तनुश्री उसे यह कहकर समझाती हैं कि वो भी उनकी बहन हैं।

इस मामले में एक अन्य ऑडियो भी सामने आई है। यह ग्रामीणों और संदीप के बीच की है। इसमें मृतका के भाई को सलाह दी जाती है कि उसे 25 लाख रुपए नहीं स्वीकारने चाहिए। इस बातचीत में महिला का कहना है कि कुछ राजनेता कह रहे हैं कि ‘फैसला’ नहीं होना चाहिए। बता दें कि इस बातचीत में, किसी राहुल, मनीष सिसोदिया और बरखा दत्त का नाम भी आता है।

उल्लेखनीय है कि यह पहली बार नहीं है जब तनुश्री का नाम ऐसे किसी मामले में सामने आया हो। सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान, उन्होंने जेएनयू में एक वामपंथी छात्र के साथ कान में फुसफुसाकर बातचीत करते देखा गया था। उस वीडियो को देखककर ऐसा लग रहा था जैसे वह उसे कैमरे पर बोलने की कोचिंग दे रही हैं। वीडियो में, पत्रकार को स्पष्ट रूप से छात्र से चर्चा करते देखा गया था। हालाँकि फुसफुसाने के कारण उनकी बात कैमरे व माइक में सुनाई नहीं पड़ी थी।

बता दें कि हाथरस मामले से जुड़े ऑडियो को लेकर हमने तनुश्री से बात करने की कोशिश की। मगर उनका जवाब आना अभी बाकी है।

बिहार चुनाव: जब 6% के लिए ब्राह्मण-सवर्ण का मुद्दा उछल सकता है तो 15% SC वोटर के लिए क्या कुछ नहीं हो सकता

बिहार में होने वाले चुनावों की आँच से क्या-क्या जल सकता है? बिहार के चुनावी आग की गर्मी इतनी तेज होती है कि बिहार से दिल्ली तक कुछ भी सुलग सकता है। अगर संभावनाओं की बात करें तो इससे किसी ‘दलित’ का झोंपड़ा जल सकता है और इलाके के तथाकथित सवर्णों पर आग लगाने का इल्जाम भी थोपा जा सकता है।

हाँ, ऐसी घटनाओं की जाँच होगी, अदालतें सच-झूठ का फैसला भी करेंगी, लेकिन तबतक तो चुनाव भी बीत गए होंगे, और चुनावों को कई साल भी हो गए होंगे। एक अदद नैरेटिव गढ़ने के लिए 3-4 वर्ष तो काफी हैं।

चुनावों पर नजर रखने वाले खुलकर स्वीकारने से हिचकिचाएँगे, लेकिन अगर राजनीति की प्रयोगशाला की बात चली ही है तो आइए देखें कि बिहार में जाति की राजनीति करने के लिए कैसे-कैसे प्रपंच रचाए जा सकते हैं।

बिहार में जाति की राजनीति इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहाँ ओबीसी और अनुसूचित जातियों/जनजातियों का मत प्रतिशत काफी ज्यादा है। अलग-अलग जातियों के मत-प्रतिशत के अनुमान के लिए टेबल देखें –

जाति आबादी (%) ध्यान देने योग्य:

  • ओबीसी/ईबीसी 46%
  • यादव 12%
  • कुर्मी 4%
  • कुशवाहा (कोएरी) 7%
  • (आर्थिक रूप से पिछड़े 28% जिसमें 3.2% तेली भी आएँगे)
  • महादलित* / दलित (अनुसूचित जातियाँ) 15% इस श्रेणी में चमार 5%, दुसाध/पासवान 5%, और मुसहर 1.8% समुदाय आते हैं।
  • मुस्लिम 16.9% (इसमें सुरजापूरी, अंसारी, पसमांदा, अहमदिया जैसे कई समुदाय आते हैं, लेकिन टिकट अधिकतर शेखों को मिलते रहे हैं।)
  • तथाकथित अगड़ी जातियाँ 19%
  • भूमिहार 6%
  • ब्राह्मण 5.5%
  • राजपूत 5.5%
  • कायस्थ 2%
  • अनुसूचित जनजातियाँ 1.3%
  • अन्य 0.4% सिक्ख, जैन, और इसाई इत्यादि

राजनीति की प्रयोगशाला में 12 अक्टूबर से 5 नवंबर 2015 के बीच मतदान होने थे। बाद के चरण ऐसे इलाकों के थे, जहाँ पर सेक्युलर वोट (जय मीम + जय भीम) महत्वपूर्ण हो जाते। 5वें चरण में (5 नवंबर) अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार जैसे वो इलाके थे जिसपर से इस बार भी ओवैसी की पार्टी उतरने वाली है। यहाँ अनुसूचित जातियों के समुदायों का वोट करना बहुत महत्वपूर्ण होता।

ऐसे ही दौर में 21 अक्टूबर को दिल्ली से 40 किलोमीटर दूर फरीदाबाद से एक दिल दहला देने वाली खबर आने लगी। अनुसूचित जातियों के समुदायों ने सड़क जाम कर रखा था। फरीदाबाद के पुलिस कमिश्नर ने कहा कि ये गाँवों में जारी जातियों के आपसी वैमनस्य का मामला लगता है जिसमें पिछले वर्ष भी तीन लोगों की जान गई थी।

जितेन्द्र नाम के जिस व्यक्ति के घर में आग लगी थी, उसने बताना शुरू किया कि उसे पहले भी गाँव ना लौटने की धमकियाँ मिली थीं। उस रात उसे पेट्रोल की बू आई तो उसने अपनी पत्नी को जगाने की कोशिश की। जबतक पति-पत्नी समझ पाते कि क्या हो रहा है, घर में आग लगा दी गई थी। पति-पत्नी तो जैसे तैसे निकले मगर उनके दो छोटे बच्चे उसी आग में जलकर मर गए। 2 वर्ष की बच्ची और 9 महीने के बच्चे को जलाकर मार देने की इस घटना पर देश भर में हंगामा मचा दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चाएँ हुईं और कहा गया कि कैसे भारत में हिन्दुओं की अगड़ी जातियाँ हाशिए पर के वर्ग यानि दलितों के खून की प्यासी हैं। बड़े नेता जितेन्द्र से मिलने पहुँचे, मुआवजों की घोषणा हुई। बिहार में उस दौर में मतदान जारी था, तो जाहिर है कि उसपर भी इसका असर हुआ ही होगा।

चुनावों के बीतने के बाद किसी ने इस घटना का जिक्र करने की जरुरत नहीं समझी। मगर मामला अदालत में था तो चल ही रहा था। इस मामले की सीबीआई जाँच भी हुई थी और करनाल, दिल्ली और हैदराबाद की अलग अलग फॉरेंसिक लेबोरेटरी से साक्ष्यों की जाँच भी की गई।

पता चला कि घर पर बाहर से पेट्रोल डालकर आग लगाईं ही नहीं गई थी! आग घर के अन्दर से लगी थी। किसी आपसी विवाद में पति-पत्नी में आपस में धक्का-मुक्की हुई और घर में आग लग गई जिसका इल्जाम उन्होंने पड़ोस के राजपूतों पर ये कहते हुए लगा दिया था कि उन्होंने अक्टूबर 2014 में हुई तीन राजपूतों की हत्या का बदला लिया है।

जाहिर है जब ये हुआ तो उसे उतनी शिद्दत से पहले पन्ने पर जगह देने की अख़बारों को या मीडिया को कोई जरूरत नहीं लगी। खबर दलितों का घर जलाया जाना था, उनके मासूम बच्चों की मौत थी! पूरी कहानी फर्जी थी और उसके लिए 11 बेक़सूर लोगों को जेल में फेंक दिया गया था, ये खबर क्यों होती? चुनाव को बीते काफी समय हो चुका था, इसलिए किसी ने छोटे अख़बारों में आई 2019 की इस खबर पर ध्यान भी नहीं दिया। इस मामले का फैसला आने से अब तक में एक साल बीत चुका है और हरियाणा में ही नहीं बल्कि यूपी में भी भाजपा की सरकार है।

जातिवाद को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में उत्तर प्रदेश के एक कुख्यात को पुलिस द्वारा मार गिराए जाने पर ब्राह्मण बनाम राजपूत कार्ड भी खेला गया है। अब जैसे-जैसे हाथरस मामले में फोरेंसिक और मेडिकल प्रमाण सामने आने लगे हैं, वैसे-वैसे इस मामले में भी पता चलने लगा है कि जिसे ये लोग सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या का मामला बता रहे थे, उसमें कोई बलत्कार तो हुआ ही नहीं था! जिन लोगों पर मिलकर हत्या करने का अभियोग लगाया जा रहा था और एफआईआर भी करवा दी गई, वो मौके पर मौजूद भी नहीं थे। लेकिन इस पूरे वाकए में ये जरूर हुआ है कि जाति की राजनीति चमकाने वालों को मौका मिल गया है।

बाकी अगर राजनीति की प्रयोगशाला में चुनाव छोटी बात लगती हो तो देखिए कि करीब 6% ब्राह्मण-राजपूत वोट के लिए यूपी के गैंगस्टर और सुशांत सिंह राजपूत का मामला कैसे उछाला जाता है। अब अंदाजा लगाइए कि करीब 15% अनुसूचित जातियों के वोट के लिए कैसी आग लगाईं जा सकती है!

26 साल में छोटन शुक्ला पर 20 मिनट तक गोलियाँ बरसाने वाले नहीं मिले, रिएक्शन में DM की हुई थी लिंचिंग

बिहार में 26 साल पहले हुए कौशलेन्द्र शुक्ला उर्फ़ छोटन शुक्ला हत्याकांड की जाँच पुलिस ने बंद कर दी है। शुक्ला के साथ उनके चार और समर्थक भी मारे गए थे। सीजेएम कोर्ट में दाखिल फाइनल रिपोर्ट में पुलिस ने कहा है कि अब तक की जॉंच से यह बात सामने आई है कि छोटन शुक्ला की गोली मारकर हत्या की गई थी। लेकिन, हत्या करने वालों के विरुद्ध साक्ष्य नहीं मिला है। ऐसे में वरीय अधिकारियों के निर्देश पर मामले की जाँच बंद करने का फैसला किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि भविष्य में सबूत मिलने पर दोबारा जाँच शुरू की जा सकती है।

छोटन शुक्ला समेत 5 लोगों की हत्या 4 दिसंबर 1994 की रात मुजफ्फरपुर में कर दी गई थी। इसकी प्रतिक्रिया में उनकी शवयात्रा में शामिल भीड़ ने एक युवा डीएम की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। यहाँ तक कि जिस बृज बिहारी प्रसाद पर छोटन शुक्ला की हत्या करवाने का आरोप लगा था, कुछ साल बाद उनकी भी हत्या कर दी गई। लेकिन, उन शूटरों का पुलिस पता नहीं लगा सकी जिन्होंने पुलिस की वर्दी में छोटन शुक्ला की गाड़ी पर गोलियाँ बरसाई थी। इस मामले में उस वक्त भी पुलिस पर मिलीभगत के आरोप लगे थे।

माना जाता है कि छोटन शुक्ला की हत्या लालू यादव और आनंद मोहन के बीच छिड़ी जंग की वजह से हुई थी। बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर, जो उस समय राज्य के चर्चित क्राइम रिपोर्टर हुआ करते थे, ने लाइव सिटीज के एक वीडियो में सिलसिलेवार तरीके से बताया है कि इस हत्याकांड की बिसात कैसे बिछी थी।

बकौल ज्ञानेश्वर, 1995 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे। आनंद मोहन की बिहार पीपुल्स पार्टी (बीपीपा) ने छोटन शुक्ला को के​सरिया से चुनाव लड़ाने का ऐलान कर दिया था। शुक्ला भी प्रचार में लगे थे। 4 दिसंबर 1994 की रात भी शुक्ला के​सरिया से ही लौट रहे थे, जब उन्हें उनके घर के करीब ही गोलियों से भून दिया गया था।

ज्ञानेश्वर के मुताबिक छोटन शुक्ला खुली जीप में घूमा करते थे। उस दिन केसरिया से लौटते वक्त उन्होंने अपनी जीप बीपीपा के ही एक नेता के घर पर छोड़ दी और उनके एंबेसडर से मुजफ्फरपुर अपने घर लौट रहे थे। रात के करीब 9 बजे जैसे ही गाड़ी संजय सिनेमा के पास पहुँची, पुलिस की वर्दी में खड़े अपराधियों ने कार को रोका। इससे पहले कि छोटन शुक्ला बाहर निकलते या कुछ पूछ पाते उन अपराधियों ने एके-47 से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। करीब 20 मिनट तक गोलियाँ बरसाई गई।

बताया जाता है कि उसके बाद जब स्थानीय पुलिस मौके पर पहुँची तो कार में सवार लोगों को तत्काल अस्पताल नहीं ले जाया गया। जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। कार में छोटन शुक्ला के साथ अन्य जो भी लोग सवार थे उनका कोई आपराधिक अतीत नहीं था। वे बीपीपा के सामान्य कार्यकर्ता थे।

छोटन शुक्ला की हत्या के अगले दिन 5 दिसंबर को उनकी शव यात्रा निकली। इसमें उनका समर्थकों का भारी जुटान था। खुद आनंद मोहन भी पहुँचे थे। इसी दौरान गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया भीड़ में फँस गए। भीड़ ने कृष्णैया को गाड़ी से खींच कर बाहर निकाला और पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया। तब के अखबारों में छपा कि भीड़ को इशारा करने वाले कोई और नहीं, बल्कि आनंद मोहन ही थे।

इस मामले में आनंद मोहन को मृत्युदंड भी सुनाई गई थी, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। यह भी कहा जाता है कि हमला सुनियोजित नहीं था। भीड़ प्रशासन के रवैए से आक्रोशित थी और कृष्णैया का दुर्भाग्य था कि वे उसमें फँस गए। जबकि इस मामले से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था।

छोटन शुक्ला की हत्या के पीछे बाहुबली नेता बृज बिहारी प्रसाद का नाम आया था, जिन्हें लालू की सरपरस्ती भी हासिल थी। 13 जून 1998 को बृज बिहारी प्रसाद भी पटना के IGIMS में भून दिए गए।

बाद के वक्त में छोटन शुक्ला की जगह उसके भाई मुन्ना शुक्ला ने ली। छोटन शुक्ला भले विधायक बनने से पहले मार डाले गए थे पर मुन्ना शुक्ला और उनकी पत्नी, दोनों विधानसभा पहुँचे। लेकिन, यह सब कुछ जिस छोटन शुक्ला की हत्या से शुरू हुआ, उसके ही हत्यारों का पुलिस सुराग तक नहीं लगा पाई!

योगी सरकार ने दी दुर्गा पूजा पंडाल सजाने की अनुमति, होंगे धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम: कोरोना गाइडलाइंस जारी

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने कोविड-19 प्रोटोकॉल के अनुपालन के साथ दुर्गा पूजा आयोजन की अनुमति दे दी है। दुर्गा पूजा पंडाल अब खुले में धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, बशर्ते उन्हें कोविड के सभी दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा, जैसे सामाजिक दूरी का पालन करना और मास्क पहनना अनिवार्य होगा।

यूपी के अपर मुख्य सचिव गृह व सूचना अवनीश कुमार अवस्थी ने बताया कि 15 अक्टूबर से सभी धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनुमति दे दी गई है और इसमें 100 तक की संख्या का प्रतिबंध भी हटाया गया है। हालाँकि, इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग और बचाव के प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करना होगा। अगर दुर्गा पूजा बंद स्थान, हाल या कमरे में है तो उसकी कुल क्षमता के 50% जो कि अधिकतम 200 व्यक्तियों तक हो सकते हैं। पूजा के दौरान पंडाल में लोगों को कोरोना से बचाव के लिए फेस मास्क लगाना, सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना, थर्मल स्कैनिंग और सैनिटाइजर साथ में रखना बेहद जरूरी है।

वहीं पंडाल सजाने की अनुमति मिलने पर जानकीपुरम इलाके में एक दुर्गा पूजा समिति के सदस्य आनंद बनर्जी ने कहा, “हमने गुरुवार की पूरी रात दुर्गा पूजा समारोहों की योजना तैयार करने में बिताई, क्योंकि हमारे पास 15 दिनों से भी कम समय है। हम दुर्गा पूजा समारोह आयोजित करने की अनुमति देने के लिए मुख्यमंत्री के आभारी हैं।” यहीं नहीं और भी कई दुर्गा पूजा पंडाल कमेटी ने योगी सरकार को धन्यवाद दिया है।

गौरतलब है कि अनलॉक 5 में सरकार की तरफ से कई प्रकार की छूट दी गई है। कंटेनमेंट जोन के बाहर सभी सामाजिक, शैक्षिक, खेल, मनोरंजन, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक कार्यक्रमों एवं अन्य सामूहिक गतिविधियों को अधिकतम 100 व्यक्तियों के लिए शुरू किए जाने की अनुमति पूर्व में ही दी जा चुकी है।

गृह मंत्रालय की गाइडलाइन

सिनेमा/थिएटर/मल्टीप्लेक्स में उनकी बैठक क्षमता से 50% तक दर्शक को आने की अनुमति होगी। इसके लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय एसओपी जारी करेगा।

बिजनेस टू बिजनेस (बी 2 बी) एग्जिबिशंस लगाई जा सकेंगी। इनके लिए वाणिज्य विभाग एसओपी जारी करेगा। खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए उपयोग होने वाले स्विमिंग पूल को खोलने की अनुमति होगी, जिनके लिए खेल मंत्रालय एसओपी जारी करेगा।

अम्‍यूजमेंट पार्क और इसी तरह के स्थानों को खोलने की भी अनुमति होगी और इन सभी के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय एसओपी जारी करेगा।

स्कूल, कॉलेज, शिक्षा संस्थान और कोचिंग संस्थान को चरणबद्ध तरीके से खोलने के लिए राज्य/केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों को फ्लेक्जिबिलिटी दी गई है और वे स्थितियों को देखते हुए 15 अक्टूबर 2020 के बाद इन्‍हें फिर से खोलने के लिए निर्णय ले सकेंगे। हालाँकि, इसके लिए सरकारें स्कूलों/संस्थान प्रबंधनों के साथ परामर्श करेंगी और दी गई शर्तों का पालन करेंगी।

ऑनलाइन एजुकेशन/डिस्टेंस लर्निंग जारी रहेगा और इसे लगातार प्रोत्साहित किया जाएगा।

जो स्कूल ऑनलाइन क्‍लासेस चला रहे हैं और उनके कुछ छात्र शारीरिक रूप से स्‍कूल में उपस्थित होने के बजाय ऑनलाइन ही पढ़ना चाहते हैं तो उन्‍हें ऐसा करने की अनुमति दी जाएगी।

छात्रों की स्‍कूलों में उपस्थिति अभिभावकों की लिखित सहमति से ही लागू होगी। इनके लिए भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी की जाने वाली SOP के आधार पर स्‍थानीय जरूरतों को ध्‍यान में रखते हुए राज्‍य/केंद्र शासित प्रदेश अपनी-अपनी SOP तैयार करेंगे।

राजस्थान: अस्पताल में लड़की का नग्न शव, कॉन्ग्रेस MLA बोले- प्रेम प्रसंग का मामला; परिजनों का रेप का आरोप

कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। प्रदेश के बांसवाड़ा जिले के खमेरा थानांतर्गत एक अस्पताल में नग्न अवस्था में एक लड़की का शव मिला है। इसकी जानकारी टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में दी गई है।

पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 302(हत्या), 366 (अपहरण) और 372 (वेश्यावृत्ति के लिए नाबालिग बच्चों को बेचना) में मामला दर्ज किया है। परिवार के बार-बार अपील करने के बावजूद कथित तौर पर अभी तक मृतका का पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ है। टाइम्स नाऊ के अनुसार, घटनास्थल से फरार होने से पहले आरोपित ने पीड़िता को अस्पताल में छोड़ा था।

परिवार का दावा है कि उनकी लड़की का बलात्कार किया गया और जहर देकर मारा गया। लेकिन, तब भी पुलिस ने इस मामले में आरोपित के ख़िलाफ़ रेप की धारा नहीं लगाई। इसी बीच घटोल के कॉन्ग्रेस एमएलए हरेंद्र निनामा ने लड़की पर हुए अत्याचारों को तुच्छ बताने के प्रयास में पूरे घटनाक्रम को प्रेम-प्रसंग से जोड़ दिया।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है कि किसी कॉन्ग्रेस नेता ने रेप के मामले को ‘छोटा’ बताने का प्रयास किया हो। इससे पहले जब दो नाबालिग लड़कियों की खबर बारां से सामने आई थी, जिन्हें कोटा,जयपुर, अजमेर ले जाकर 3 दिनों तक रेप किया गया, तब भी प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्विटर पर यह दावा कर दिया था कि नाबालिगों के साथ जबरदस्ती नहीं हुई और वह अपनी मर्जी से लड़कों के पास गई थी।

राजस्थान के सीएम ने ट्वीट कर बताया था कि लड़कियों ने सीआरपीसी सेक्शन 164 के बयान में मजिस्ट्रेट के सामने खुद स्वीकार किया है कि उन्हें लड़कों द्वारा मजबूर नहीं किया गया था। इसके अलावा सीएम ने उन लड़कों के भी नाबालिग होने का दावा अपने ट्वीट में किया।

बता दें कि प्रदेश सीएम का बयान ऐसे मामले में सामने आया था, जहाँ दोनों पीड़ित बहनों ने कथित तौर पर कैमरे पर स्वीकार किया था कि दोनों लड़कों ने उनका अपहरण कर लिया था और उन्हें नशीली दवा देकर उनका कई दिनों तक बलात्कार किया।