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‘हत्यारे’ कंडक्टर की #मीडिया_लिंचिंग: जिसे फाँसी से बचाया उस माँ-बाप ने, जिनका 7 साल का बच्चा मारा गया था

प्रद्युम्न ठाकुर का नाम सुना है? कुछ वर्ष पहले सुना होगा, बस अचानक पूछ लेने पर आपको याद नहीं आया है। दिल्ली के पास गुरुग्राम में ये रयान इंटरनेशनल स्कूल का छात्र था। ये सात साल का बच्चा एक दिन (8 सितम्बर 2017) स्कूल में ही एक वाशरूम के पास मिला। उस वक्त उसके गले और शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे। अफरातफरी में उसी स्कूल के एक बस कंडक्टर पर बच्चे की हत्या करने का अभियोग लगा।

पुलिस ने प्रारंभिक जाँच के बाद उसी बस कंडक्टर को हत्या के अभियोग में गिरफ्तार कर लिया। बच्चे की मौत हो चुकी थी, वो गवाही देने की स्थिति में नहीं था और सोशल मीडिया पर अपना क्षोभ व्यक्त कर रहे कई लोगों का मानना था कि ये हत्या चरसी कंडक्टर ने ही की है।

हरियाणा पुलिस की जाँच सीसीटीवी कैमरे पर आधारित थी। उसमें नजर आ रहा था कि प्रद्युम्न के गले से खून बह रहा है और वो जैसे-तैसे वॉशरूम से बाहर आने की कोशिश कर रहा है। वो लम्बे गलियारे में गिर पड़ा। स्कूल के कर्मचारी वहाँ पहुँच गए थे और उन्होंने अशोक कुमार नाम के कंडक्टर को मदद के लिए कहा। अशोक ने ही प्रद्युम्न को उठाकर कार में डाला था, जिससे उसे अस्पताल ले जाया गया।

एक नामी-गिरामी स्कूल में हुई बच्चे की हत्या की खबर से सारा देश हिल गया। हरियाणा पुलिस ने दस लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की और कपड़ों पर लगे खून और उँगलियों के निशान के आधार पर अशोक कुमार को कातिल घोषित कर दिया। ये निशान संभवतः बच्चे को कार तक पहुँचाने में अशोक कुमार के कपड़ों पर लग गए होंगे।

उस वक्त के डीसीपी सुमित कुमार ने बताया कि बस के टूल किट में वो सब्जी काटने वाला चाकू था, जिससे हत्या हुई। कहा गया कि उसे धोने के लिए कंडक्टर अशोक स्कूल के बाथरूम में ले गया था, जहाँ प्रद्युम्न पहले से मौजूद था। अशोक ने बच्चे का यौन शोषण करने की कोशिश की और बच्चे के विरोध करने पर उसने चाकू चला दिया जिससे बच्चे की जान चली गई। पुलिस ने यह भी कहा कि इस हत्या में केवल कंडक्टर अशोक ही शामिल था, उसका कोई साथी नहीं था।

एक गरीब बस कंडक्टर, वो भी पुलिस के मुताबिक नशेड़ी, ऊपर से बच्चे का यौन शोषण करने की कोशिश में उसकी हत्या कर दे! ऐसे किसी को कोई मदद क्यों मिलनी चाहिए? हरियाणा बार एसोसिएशन के वकीलों ने भी साफ़ कह दिया कि इस गरीब, नशेड़ी कंडक्टर का मुकदमा उनमें से कोई नहीं लड़ने वाला। बात भी सही थी, आखिर एक गरीब बेकसूर भी हो सकता है, ऐसा सोचा भी क्यों जाए?

मगर समस्या यह थी कि प्रद्युम्न ठाकुर के परिवार वाले ये मानने को तैयार नहीं थे कि अशोक नाम के उस बस कंडक्टर ने उनके बच्चे की हत्या की है। इस वक्त तक हरियाणा पुलिस अपने तरीकों से अशोक से अपराध भी कबूल करवा चुकी थी। इन सबके बावजूद प्रद्युम्न के माता-पिता मान नहीं रहे थे कि ये हत्या अशोक नाम के कंडक्टर ने की है। संभवतः पूरे मामले में इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ कर सिर्फ वही थे, जो गरीब कंडक्टर को फाँसी पर टाँगने को तैयार नहीं थे।

आखिरकार बच्चे के माता-पिता के दबाव पर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मामले की जाँच का काम सीबीआई को दे दिया। जाँच जब ढंग से शुरू हुई तो मामले में नए खुलासे होने लगे। जिस बस में कंडक्टर अशोक काम करता था, उसके ड्राइवर सौरभ ने बताया कि चाकू बस के टूल किट में था, ऐसा कहने के लिए उसे पुलिस ने कहा था।

प्रद्युम्न के शव की फॉरेंसिक जाँच में पता चल चुका था कि यौन शोषण का कोई मामला नहीं था। स्कूल के माली हरपाल सिंह ने बताया कि पहले अशोक के कपड़ों पर खून के कोई दाग नहीं थे। वो निशान बच्चे को कार तक पहुँचाने में ही लगे होंगे।

थोड़े ही समय के बाद सीबीआई की जाँच रयान इंटरनेशनल स्कूल के ही ग्यारहवीं कक्षा के एक छात्र तक पहुँच गई। सोलह वर्षीय इस छात्र ने प्रद्युम्न की हत्या इसलिए की थी ताकि स्कूल की पैरेंट-टीचर मीटिंग ना हो और परीक्षाएँ कुछ दिनों के लिए टाल दी जाएँ।

जैसा रायन इंटरनेशनल स्कूल है, ये कहना नहीं होगा कि हत्या करने वाला ये “बच्चा” किस किस्म के आर्थिक परिवेश से आता था। स्कूल प्रबंधन में लापरवाही बरतने के लिए रयान इंटरनेशनल स्कूल के तीन ट्रस्टी भी बाद में गिरफ्तार हुए थे। उन्हें कुछ समय बाद जमानत मिल गई।

इस मामले के खुलने के बाद हरियाणा की सरकार ने स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा बढ़ाए जाने के लिए कई नीतिगत सुधार भी किए थे। जनभावनाओं का अंदाजा लगाना हो तो बता दें कि इस मामले में जनता से शांति बनाए रखने के लिए, मृत बच्चे के पिता, वरुण ठाकुर को जनता से अपील करनी पड़ी थी।

जाहिर है कि हरियाणा एक भाजपा शासित राज्य था तो “बनाना रिपब्लिक” की तर्ज पर किसी को पकड़ कर फाँसी पर टाँग देने के लिए कई गिरोह लालायित थे। जनभावनाओं का उन्होंने जम कर दोहन भी किया और बेक़सूर गरीब बस कंडक्टर अशोक कुमार की #मीडिया_लिंचिंग तो लगभग कर ही डाली थी। शुक्र है कि प्रद्युम्न के माता-पिता नहीं माने और उन्होंने मामले की पूरी जाँच करवा डाली।

पुरानी घटनाओं से सीखना हो तो सबसे पहले ये सीखिए कि अपराध के मामले हों तो जज्बात आपा को घर छोड़ आइए। जरा-जरा सी बात पर हर्ट होती सेंटिमेंट सिस्टर और हर मोड़ पर जिसे ठेस लग जाए, ऐसी जज्बात आपा का यहाँ कोई काम नहीं होता।

जघन्य अपराधों के मामले में मीडिया लिंचिंग नहीं तटस्थ भाव से जाँच की जरूरत होती है। बाकी राजनेताओं का क्या है? आज गिद्ध की तरह हाथरस में मंडरा रहे हैं तो कल कहीं और होंगे। जज्बात आपा को घर छोड़ कर ना आने की वजह से किसी बेक़सूर की मीडिया लिंचिंग में आप शामिल होना चाहते हैं, या बेगुनाह के क़त्ल का पाप अपने सर नहीं लेना, ये तो आपको सोचना है।

हाथरस केस के बहाने दंगा भड़काना चाहता है विपक्ष: CM योगी ने बताया- क्यों रची जा रही साजिश

हाथरस मामले को कॉन्ग्रेस, टीएमसी और अन्य विपक्षी दल अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए इस्तेमाल कर रहे है। इधर इस मामले पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि विपक्ष राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश कर रहा है।

हत्या और कथित बलात्कार के मामले में विपक्ष द्वारा जारी विरोध-प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सीएम ने कहा, “जिसे विकास अच्छा नहीं लग रहा, वे लोग देश में और प्रदेश में भी जातीय दंगा, सांप्रदायिक दंगा भड़काना चाहते हैं। इस दंगे की आड़ में विकास रुकेगा। इस दंगे की आड़ में उनकी रोटियाँ सेंकने के लिए उनको अवसर मिलेगा, इसलिए नए-नए षड्यंत्र करते रहते हैं।”

उल्लेखनीय है कि घटना की आड़ में राज्य में आपराधिक साजिश रचने वालों के खिलाफ यूपी पुलिस द्वारा आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज करने के बाद बिना किसी का नाम लिए यूपी सीएम की यह टिप्पणी सामने आई है।

खबरों के मुताबिक, पुलिस को संदेह है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) दंगे भड़काने की कोशिश कर रहे हैं।

इन संगठनों द्वारा हाथरस मामले का इस्तेमाल कर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा और अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की जा रही है। इसके अलावा योगी सरकार द्वारा माफिया समूह से वसूली कराए जाने और घरों की कुर्की कराने जाने की सख्त कार्रवाइयों से परेशान तत्वों ने प्रशासन से बदला लेने के लिए इस अवसर का उपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस को पता चला है कि जो तत्व एंटी-सीएए दंगों के पीछे थे, वह भी एक और दंगा यूपी में कराने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस सोशल मीडिया और मीडिया पर फर्जी समाचार और तस्वीरें फैलाकर हिंसा भड़काने में समन्वित प्रयास की ओर इशारा कर रही है, जिसके जरिए लोगों को उकसाया जा रहा है।

यूपी पुलिस के अनुसार, हाथरस मामले से जुड़ी कई झूठी खबरें- जैसे जीभ काट दी गई, आँखें फोड़ दी गई, गैंग-रेप जैसे तमाम अफवाहें उड़ा कर नफरत की आग भड़काने की कोशिश की गई थी। वहीं फर्जी तस्वीर को भी हाथरस मामले की पीड़िता बताते हुए वायरल किया गया था। जिन लोगों ने भी इस तरह के भड़काने और उकसाने वाली बातें और फोटो वायरल की है, वह सभी अब पुलिस की निगरानी में हैं।

इसके अलावा पुलिस ने पीड़ित के परिवार को विशेष बयान देने और लालच देकर मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश करने वाले मीडिया हाउसों को भी संदर्भित किया है। पीड़ित परिवार और पत्रकारों के बीच बातचीत के लीक ऑडियो से पता चला था कि परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काऊ बयान देने का लालच दिया जा रहा था।

बता दें कि प्रदेश में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। खुफिया रिपोर्ट में योगी सरकार को बदनाम करने के लिए 100 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। यूपी सरकार को भेजी गई खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

बिग बॉस और राधे माँ: स्वयंभू हिन्दुवादी चेहरों को पेश कर धर्म का उपहास करने की एक और स्क्रिप्ट क्यों?

इस बात पर बहस का कोई अंत नहीं है कि एक धर्म का बुनियादी ढाँचा बिगाड़ने के कितने प्रयास हुए थे और लगातार हो रहे हैं। इस स्वभाव के प्रयासों में अच्छी-भली आबादी शामिल है। राजनीति से लेकर मनोरंजन तक और छोटे परदे से लेकर बड़े परदे तक, सारा द्वेष सिर्फ एक शब्द से है ‘हिन्दू’। कहीं इस शब्द को कट्टरता का प्रतीक बताया जाता है तो कहीं इस शब्द की धुरी पर दोयम दर्जे के उदाहरण पेश किए जाते हैं। उदाहरण पेश करने वालों की लंबी सूची का मोटा नाम है ‘बिग बॉस’।

यह तर्क बहुत से लोगों के लिए विचित्र होगा कि आखिर एक मनोरंजन परोसने वाला रियलिटी शो हिन्दू शब्द का मज़ाक कैसे बना सकता है? इसका प्रश्न का जवाब असल में उतना कठिन भी नहीं है, जितना पहली बार में नज़र आता है। यह प्रयास दशकों पुराने भी नहीं है जो कालान्तर में भुला दिए गए हों, सबसे बड़ी समस्या यही है कि सारे उपक्रम हाल फ़िलहाल के हैं।

टीवी की दुनिया के सबसे चर्चित कार्यक्रमों में एक बिग बॉस के पिछले कुछ सीज़न पर गौर करिए। हिन्दू धर्म के ऐसे नुमाइंदे ही बुलाए गए जिन्होंने लाखों-करोड़ों लोगों के सामने धर्म की ऐसी तस्वीर पेश की जिस पर एक आम इंसान खीझने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता है। 

इस बार बिग बॉस के सीज़न 14 का प्रसारण शुरू होने ही वाला है। इस सीज़न की शुरुआत सुखविंदर कौर उर्फ़ ‘राधे माँ’ नज़र आने वाली हैं। यह कौन हैं इस बारे में लगभग सभी जानते हैं और यह क्या करती हैं यह फ़िलहाल चर्चा का विषय नहीं है। इनके नाम ही स्पष्ट है कि यह अपना चित्रण किस तरह करती हैं, इनके तमाम साक्षात्कारों के वीडियो मौजूद हैं। 

जिन वीडियो में वह खुद को देवी तुल्य बताती हैं और अक्सर अपने तथाकथित भक्तों के साथ नृत्य भी करती हैं। राधे माँ की धार्मिक और सात्विक मौलिकता कितनी है इस बारे में एक बहुत बेहतर उदाहरण है। साल 2017 में आखाड़ा परिषद ने नकली धर्म गुरुओं और बाबाओं की सूची तैयार की थी, जिसमें सुखविंदर कौर उर्फ़ राधे माँ का नाम भी शामिल था।       

सीज़न 10 को याद कीजिए। स्वामी ओम, खुद ही सोचिए कि 2016 के पहले इस नाम से कितने लोग परिचित थे। एक ऐसा व्यक्ति जिसके गले में रुद्राक्ष की मालाएँ हैं, जिसने टीका लगा रखा है, वह खुद को धर्म का विशेषज्ञ बताता है और धर्म को लेकर ऐसे दावे करता है, जिन्हें सुन कर एक आम इंसान का धर्म से विश्वास उठ जाए। सभी जानते हैं कि बिग बॉस देखने वालों की संख्या लाखों में है। 

ऐसे में कल्पना करिए एक स्वघोषित हिन्दू धर्म के नुमाइंदे ने हिन्दू शब्द के इर्द-गिर्द किस तरह की लकीर खींची। बिग बॉस के बाद भी स्वामी ओम ने मूर्खता भरी हरकतों का साथ नहीं छोड़ा। सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो सामने आए जिसमें लोग उसे बुरी तरह पीट रहे हैं या खुद उसकी बातों का मज़ाक बना रहे हैं। यह तो केवल एक उदाहरण है। ऐसे कई और नमूने हैं। 

बिग बॉस का सीज़न 11, जिसमें शिवानी दुर्गा नाम की तथाकथित महिला तांत्रिक आई थीं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ इन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय से पीएचडी की है और उसके बाद अघोर तंत्र की दीक्षा ली। उज्जैन के सिंहस्थ के दौरान उनका नाम विवादों से जुड़ा था। वह बिग बॉस में बहुत समय तक नही थीं, लेकिन जितने समय थीं उस दौरान इन्होंने कोई ऐसी नज़ीर नहीं पेश की जो धर्म के हित में होती। उल्टा बिग बॉस में रहते हुए इनके क्रियाकलापों के तमाम वीडियो चर्चा का कारण बने रहे। 

इस बात को लेकर अक्सर दावे होते रहते हैं कि बिग बॉस तय स्क्रिप्ट पर चलने वाला शो है। अगर इस दावे में ज़रा भी सच्चाई है तो उसका मतलब यही है कि धर्म के तथाकथित नुमाइंदे जितनी भी बातें करते हैं सब पहले से तय होती हैं। इस प्रक्रिया में एक बात की परवाह कतई नहीं की जाती है कि धर्म जैसे अहम विषय पर कही जाने वाली बातों में कितनी गंभीरता है। या उस बात से धर्म की छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

बेशक किसी धर्म का प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों के माथे नहीं हो सकता है। लेकिन देखने वालों के बीच धर्म को लेकर निराधार और हास्यास्पद संदेश ही जाता है। यह भी कितना विकट संयोग है कि इस शो में कभी किसी मज़हब विशेष का स्वघोषित विशेषज्ञ नहीं नज़र आता है। धर्म के नाम पर जितना कुछ नज़र आता है वह सिर्फ हिन्दू है, चाहे कितना ही हास्यास्पद और मिथ्या क्यों न हो। इसके बावजूद इस धर्म की सहिष्णुता पर अक्सर सवाल खड़े किए जाते हैं।    

हाथरस केस में वायर का प्रोपेगेंडा, पीड़िता के बयान को डॉक्टर की रिपोर्ट बताकर पेश किया

उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित लड़की की हत्या और कथित सामूहिक बलात्कार का मामला विपक्षी दलों के लिए भाजपा सरकार पर हमला करने का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। मामले में बलात्कार के बारे में अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। 

उत्तर प्रदेश पुलिस ने फोरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि लड़की के साथ रेप नहीं हुआ था, मगर इस दावे के विपरीत आज (अक्टूबर 4, 2020) वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ ने एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट पब्लिश की। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल द्वारा तैयार किए गए मामले पर एक मेडिको-लीगल एग्जामिनेशन रिपोर्ट पुलिस वर्जन को गलत ठहराती है।

द वायर ने 54 पन्नों की रिपोर्ट को एक्सेस किया है और इसके आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि पीड़िता के साथ बलात्कार किया गया था। लेकिन हम आपको बता दे, पोर्टल द्वारा एक्सेस की गई रिपोर्ट में तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया है। मेडिकल रिपोर्ट के कई दूसरे हिस्सों को अनदेखा किया गया है, जिसमें किसी भी यौन हमले का उल्लेख नहीं है।

द वायर ने लिखा, “JNMCH द्वारा किए गए पीड़िता की MLC रिपोर्ट के सेक्शन 16 में डॉक्टर के रिकॉर्ड के अनुसार, घटना के दौरान पीड़ित की योनि के अंदर पेनिस गया था। अगले कॉलम में, डॉक्टरों ने कहा कि पेनिट्रेशन ‘पूरा’ था।” लेकिन यह तथ्य लोगों को गुमराह करने के अलावा और कुछ भी नहीं है, क्योंकि सेक्शन 16 में जिस कंटेंट के बारे में कहा गया है, इसमें डॉक्टरों द्वारा किए गए किसी भी मेडिकल परीक्षण का उल्लेख नहीं है। इसमें केवल पीड़ित द्वारा दिए गए बयानों का ही उल्लेख है।

बता दें यह सेक्शन ‘Details provided by the survivor’ के अंतर्गत आता है और सेक्शन 16 को “Details of the Act” टाइटल दिया गया है। इसलिए इसमें केवल वही बातें रिकॉर्ड की जाती है जो पीड़ित द्वारा घटना के बारे में बताया जाता है। द वायर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ये बातें डॉक्टर की तरफ से कही गई है, मगर ऐसा नहीं है।

Victim’s statement included in the MLC report

रिपोर्ट में आगे ‘Orifice penetrated’ के बारे में कहा गया है कि यह पूरी तरह से हुआ था और पेनिस के माध्यम से हुआ था। हालाँकि आगे के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया गया, क्योंकि पीड़िता को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था, वह बेहोश हो गई थी।

इसका उल्लेख रिपोर्ट में ही किया गया है, जिसे वायर ने अपनी रिपोर्ट में शामिल किया है। अब सवाल उठता है कि यदि ये डॉक्टरों द्वारा किए गए अवलोकन थे, तो उन सवालों के जवाब भी होने चाहिए। मगर ऐसा नहीं है। इससे यह साफ होता है कि सेक्शन 16 में घटना को लेकर केवल पीड़िता का ही बयान है। इसमें उन डॉक्टरों की राय नहीं है जिन्होंने पीड़िता का इलाज किया था। वायर ने पीड़िता के बयानों को डॉक्टरों का बयान बताते हुए लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की।

गौरतलब है कि घटना के कुछ दिनों बाद सामने आए एक वीडियो में भी पीड़िता की माँ ने सिर्फ हमले का जिक्र किया था। उस समय माँ ने भी किसी भी तरह के बलात्कार का आरोप नहीं लगाया था।

हालाँकि बलात्कार की पुष्टि करने वाली पीड़िता का बयान मामले के संदर्भ में बहुत ही सांकेतिक है, लेकिन रिपोर्ट इसकी पुष्टि नहीं करती है, जैसा कि वायर ने दावा किया है। रिपोर्ट के कई अन्य बिंदु भी ध्यान देने योग्य हैं, जिससे पता चलता है कि रिपोर्ट बलात्कार के आरोप के बारे में निर्णायक नहीं है, और जब तक जाँच पूरी नहीं हो जाती, निष्कर्ष पर आने से बेहतर है कि इंतजार कर लिया जाए। रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं जिनके बारे में वायर ने अपने पूरी रिपोर्ट में कहीं भी उल्लेख नहीं किया है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तहत जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की शुरुआत में कहा गया है कि मरीज को 14 सितंबर को एडमिट किया गया था। इसमें कहा गया, “मुखबिर द्वारा आरोप लगाया गया था कि जब मरीज खेत में कुछ काम कर रही थी तो एक अज्ञात शख्स ने गर्दन में दुपट्टा फँसा कर उसे पीछे से घसीटा था।”

मुखबिर लड़की के पिता ओम प्रकाश थे। इससे पता चलता है कि इस घटना के पहले आधिकारिक रिकॉर्ड में बलात्कार का उल्लेख नहीं था। इसमें कहा गया कि लड़की पर एक शख्स ने हमला किया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लड़की को तब होश आया जब उसे अस्पताल लाया गया था।

Statement of father of Hathras victim on 14 September

रिपोर्ट में दर्ज की गई पीड़िता की फिजिकल कंडीशन का विस्तृत अवलोकन गर्दन पर चोट के निशान का उल्लेख करता है, जो पिता के बयान से मेल खाता है कि उसका गला घोंटा गया था। रिपोर्ट में इस सेक्शन में किसी भी यौन हमले का उल्लेख नहीं किया गया है।

22 सितंबर को जब पीड़िता की हालत काफी नाजुक हो गई थी तो अस्पताल ने एक मजिस्ट्रेट से उसका बयान रिकॉर्ड करने के लिए कहा। इसी समय पहली बार बलात्कार का आरोप लगाया था और साथ ही एक से अधिक हमलावरों की भी बात कही गई थी। 22 सितंबर को दर्ज की गई रिपोर्ट में उसके पिता का बयान है, जिसमें लिखा गया है, “मुखबिर द्वारा कथित रूप से, पीड़िता के साथ उसी गाँव के चार ज्ञात व्यक्तियों द्वारा यौन उत्पीड़न किया गया था, जब वह 14 सितंबर 2020 को सुबह 9:00 बजे बुलगढ़ी गाँव के खेतों में कुछ काम कर रही थी। 

Statement of father of Hathras victim on 22 September

इस तरह एक हफ्ते में ही पिता का बयान “एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा गला घोंटना” से चार ज्ञात व्यक्तियों द्वारा यौन उत्पीड़न” में बदल गया। यह काफी महत्वपूर्ण बदलाव है।

नए आरोप लगाए जाने के बाद, यौन उत्पीड़न के लिए एक फोरेंसिक एग्जामिनेशन की गई, जिसके डिटेल्स रिपोर्ट में है। फॉरेंसिक जाँच के ‘Details provided by the survivor’ सेक्शन के रिपोर्ट में हमलावरों के रूप में उसी गाँव के संदीप, रामू, लवकुश और रवि का नाम है। इसके अलावा वायर की रिपोर्ट के मुताबिक इसमें पेनिस द्वारा वेजाइनल पेनिट्रेशन (vaginal penetration) का भी उल्लेख है। हालाँकि इसमें इस बात का जिक्र नहीं है कि चारों बलात्कार में शामिल थे या नहीं।

बलात्कार के मामलों को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक अल्ट्रा वायलेट लाइट के तहत पीड़ित के शरीर की जाँच है। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्ट्रा वायलेट लाइट के तहत जाँच नहीं की गई थी, क्योंकि शरीर को कई बार साफ कर दिया गया था। रेप का आरोप एक सप्ताह बाद लगाया गया था। अगर यह आरोप सच है तो इस तरह से मामले में अहम सबूत खो चुका है।

रिपोर्ट में पीठ और नितंबों पर चार चोट के निशान का उल्लेख है, लेकिन जननांग में कोई चोट नहीं बताई गई है। फोरेंसिक परीक्षा में लेबिया मेजा, लेबिया मिनोरा, मूत्रमार्ग, हाइमन, योनि, चौकोर और पेरिनेम में कोई चोट नहीं पाई गई, जैसा कि द वायर की रिपोर्ट में दावा किया गया है।

रिपोर्ट में शामिल स्पेकुलम परीक्षण का कहना है कि ‘कोई भी असामान्यता का पता नहीं चला है, गर्भाशय ग्रीवा और योनि स्वस्थ है।’

रिपोर्ट में जिन डॉक्टरों द्वारा परीक्षण की बात कही गई है, उनका कहना है, “परीक्षण के आधार पर मेरी राय है कि बलपूर्वक संभोग के संबंध में बल के संकेत हैं लेकिन FLS की रिपोर्ट आनी अभी बाकी हैं।” इन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि रिपोर्ट ने बलात्कार के आरोप के संबंध में राय सुरक्षित रखी है, इसकी पुष्टि नहीं की है, जैसा कि झूठा दावा ‘द वायर’ कर रहा है। राय में ‘बल के संकेत’ का जिक्र लड़की पर होने वाले शारीरिक हमले को संदर्भित करते हैं, क्योंकि रिपोर्ट में किसी भी यौन हमले का उल्लेख नहीं है, और इसमें जननांगों पर कोई चोट नहीं पाई गई है।

यह उल्लेखनीय है कि योनि और पेरिनेल स्वैब को मानक अभ्यास के अनुसार कई अन्य अंगों से स्वैब के अलावा, फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए एकत्र किया गया था। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, FSL रिपोर्ट भी आ गई है, जिसमें बलात्कार के आरोपों से इनकार किया गया है। 

टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार अरविंद चौहान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग से एक फाइनल ओपिनियन रिपोर्ट पोस्ट की है, जिसमें कहा गया है कि वेजाइनल/एनल इंटरकोर्स का कोई संकेत नहीं है। रिपोर्ट यह भी कहता है कि शारीरिक हमले के सबूत हैं और गर्दन एवं पीठ पर चोट के निशान हैं, जो जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल द्वारा तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट से मेल खाता है।

इस तरह से मामले में बलात्कार का एकमात्र सबूत पीड़िता का बयान ही है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मृत्यु से पहले पीड़िता द्वारा दिया गया बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य है, और अदालतें किसी भी अन्य साक्ष्य के अभाव में, सिर्फ इस आधार पर भी अभियुक्तों को दोषी ठहरा सकती हैं। लेकिन तथ्य यह है कि किसी भी मेडिकल या फोरेंसिक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि नहीं हो रही है, जैसा कि द वायर दावा कर रहा है।

JNMCH द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट बलात्कार की पुष्टि नहीं करती है, इसमें केवल पीड़िता का बयान और उसके पिता द्वारा बलात्कार का उल्लेख करने वाला दूसरा बयान शामिल है। द वायर द्वारा कथित तौर पर बलात्कार की पुष्टि करने वाले किसी भी डॉक्टर या किसी भी मेडिकल जाँच रिपोर्ट द्वारा कोई टिप्पणी नहीं की गई है।

हाथरस केस: पीड़ित परिवार ने फिर बदला स्टैंड, अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जाँच की डिमांड

उत्तर प्रदेश और केंद्र की सरकार को बदनाम करने और अपनी राजनीति चमकाने को लेकर कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए हाथरस मामला मुख्य मुद्दा बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के हाथरस में चार लोगों द्वारा कथित रूप से यौन उत्पीड़न और गला घोंटने के बाद एक 19 वर्षीय लड़की की मौत हो गई थी। इस मामले की जाँच उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा गठित एक एसआईटी द्वारा की जा रही थी। मामले की गंभीरता और पूरे देश मे फैले आक्रोश को देखते हुए योगी सरकार ने अब इसकी जाँच सीबीआई से कराने का फैसला किया है।

मामले में मृतक लड़की के परिजन लगातार अपने बदलते बयान और स्थिति को लेकर शक के दायरे में हैं। शुरुआत में पीड़ित परिवार ने केवल हमले का आरोप लगाया था। फिर मामले में एक हफ्ते बाद बलात्कार का आरोप जोड़ा गया था। इस बयान से मामले में काफी भ्रम पैदा हो गया है, क्योंकि घटना में सामने आए चिकित्सा और फोरेंसिक सबूत बलात्कार के आरोप का समर्थन नहीं करते हैं। इसी तरह मामले की जाँच को लेकर भी परिवार का रुख बदलता दिख रहा है। खासकर इस मामले में मृतका के भाई की स्थिति समझ के परे है।

जहाँ एक तरफ उत्तरप्रदेश योगी सरकार ने मामले की गंभीरता समझते हुए मामले को सीबीआई को सौंपने का फैसला किया है, वहीं इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए मृतका के भाई ने कहा कि इसकी जरूरत नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार, मृतका के भाई ने कहा कि उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग नहीं की, क्योंकि एसआईटी जाँच पहले से ही चल रही है। अब परिवार सुप्रीम कोर्ट के तहत न्यायिक जाँच की माँग कर रहा है।

वहीं कल पीड़िता की माँ ने भी यही कहा था। यहीं नहीं परिवार ने मामले से जुड़े सभी पक्षों का नार्को टेस्ट कराने के फैसले का का भी विरोध किया था। बता दें विशेष जाँच दल ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में नार्को टेस्ट की सिफारिश की थी। पीड़िता की माँ ने कहा कि उसका परिवार नार्को टेस्ट नहीं करवाएगा। हालाँकि परिवार ने पहले एसआईटी जाँच पर नाराजगी व्यक्त की थी और अदालत की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की थी।

गौरतलब है कि 1 अक्टूबर को कई समाचार एजेंसियों ने बताया था कि पीड़ित के भाई ने कहा है कि वह चल रही जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। इंडिया टुडे से बात करते हुए पीड़ित के छोटे भाई ने कहा, “हम जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। हम इस मामले में सीबीआई जाँच चाहते हैं। मेरी बहन की मौत हो गई है। प्रशासन ने उसका चेहरा दिखाए बिना ही उसकी लाश को जला दिया। उन्हें कैसे लगता है कि हम संतुष्ट होंगे?”

पीड़ित के भाई ने 3 अक्टूबर को फिर से कहा कि वे चल रही जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, “हम चल रहे जाँच से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि हमें अब तक हमारे सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। खुले तौर पर हमें धमकी देने वाले डीएम को अभी तक निलंबित नहीं किया गया है।” वहीं सीएम योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट के बाद एसपी, डीएसपी, इंस्पेक्टर और कुछ अन्य अधिकारियों के निलंबन आदेश दिए थे।

उल्लेखनीय है कि अब यानी 4 अक्टूबर को परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में न्यायिक जाँच की माँग की है, क्योंकि उन्हें राज्य सरकार के साथ-साथ SIT और CBI सहित किसी भी जाँच एजेंसी पर भरोसा नहीं है। इसके अलावा पीड़िता के भाई ने हाथरस जिलाधिकारी को निलंबित करने की भी माँग की।

मीडिया ट्रायल और पॉलिटिकल ड्रामा

स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर विपक्षी दल उक्त मामले में अपनी सारी ताकत को झोंकने में तुले हैं। राज्य सरकार द्वारा मीडिया और राजनेताओं को पीड़ित परिवार से मिलने की अनुमति देने के बाद राजनेताओं और मीडिया कर्मियों का गाँव के आसपास के क्षेत्र में जमावड़ा है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल और प्रियंका गाँधी परिवार से मिलने गए थे। हालाँकि परिवार से मिलने से पहले सोशल मीडिया पर उनकी एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें वह हाथरस की यात्रा के दौरान जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए नजर आए।

वहीं अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सदस्य भी 4 अक्टूबर को परिवार से मिले। उन्होंने पहले परिवार के नार्को टेस्ट औए एसआईटी की सिफारिश पर सवाल उठाए थे और कहा था कि यह परीक्षण केवल पुलिस अधिकारियों का होना चाहिए, परिवार वालों का नहीं।

हाल ही में ऑपइंडिया ने कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग शेयर की थी। जिसमें इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री को पीड़ित के भाई को वीडियो बनाने और उसे भेजने के लिए मार्गदर्शन करते हुए सुना गया। वहीं कई अन्य समाचार एजेंसियों के रिपोर्टर को पुलिसकर्मियों को डराने की कोशिश करते हुए भी देखा गया था, जिनको जाँच की वजह से गाँव मे जाने से रोक दिया गया था।

हाथरस मामला

गौरतलब है कि दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हाथरस की कथित सामूहिक बलात्कार पीड़िता की मौत हो गई थी। जिसके बाद से ही मामले में सभी विपक्षी पार्टियों को अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का मौका मिल गया। खबरों के अनुसार, उसके साथ दो सप्ताह पहले कथित तौर पर बलात्कार किया गया था। वहीं लोगों का गुस्सा तब और भड़क गया जब सोशल मीडिया पर यह भ्रामक चलाई गई कि हाथरस पुलिस ने परिवार के सदस्यों की सहमति के बिना लड़की का जबरन अंतिम संस्कार कर दिया। हालाँकि पुलिस ने बाद में खबरों को खरिज करते हुए कहा था कि दाह संस्कार के दौरान मृतका के पिता मौजूद थे।

एडीजी प्रशांत कुमार ने एएनआई से बात करते हुए बताया था कि फोरेंसिक रिपोर्ट के मुताबिक़ लड़की के साथ बलात्कार की घटना नहीं हुई थी। पीड़िता के साथ किसी भी तरह का यौन शोषण नहीं हुआ। मौत का कारण गला दबाना और रीढ़ की हड्डी में लगी चोटें थी।

डूब कर मर गया जयप्रकाश, जिंदा है सोनकलिया, दोनों को दादी ने छला; हाथरस में वही हाथ दिखा रहे पोता-पोती

वैसे तो अभी राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाले बिहार में चुनाव हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस के वादों की राजनीति फ़िलहाल उत्तर प्रदेश में चल रही है। ऐसा नहीं है कि राहुल-प्रियंका ने जो शुरू किया है, वो कोई पहली घटना है। ऐसी परंपरा कॉन्ग्रेसी परिवार में राहुल-प्रियंका की दादी के दौर से ही चलती आ रही है।

इसे याद करना हो तो इंदिरा गाँधी के दौर यानी 1980 के वक्त की यूपी की राजनीति को याद करना होगा। उस समय वहाँ जनता पार्टी की सरकार थी और मुख्यमंत्री बनारसी दास हुआ करते थे।

कुशीनगर जनपद, देवरिया जिले का हिस्सा था और यहीं नारायणपुर गाँव में बसकाली नाम की एक स्त्री अपने 8 साल के पोते जयप्रकाश और 6 साल की पोती सोनकलिया के साथ रहती थी। इन बच्चों के पिता की मृत्यु हो चुकी थी और इनकी माता बच्चों को दादी के पास छोड़कर जा चुकी थी।

जैसे-तैसे गरीबी में जीवनयापन करते इस परिवार का दुर्भाग्य ने अभी पीछा नहीं छोड़ा था। एक दिन बस से कुचले जाने से बसकाली की मौत हो गई और दोनों बच्चे अनाथ रह गए। ग्रामीणों ने जब परिवार की ऐसी दुर्दशा देखी तो कम से कम सरकार से कुछ मुआवजा ही मिल जाए, इस माँग के साथ हाटा-कप्तानपुर मार्ग को जाम करके बैठ गए। 

जाम हटवाने के लिए ग्रामीणों पर लाठी चार्ज हुआ और गाँव में पीएससी तैनात कर दी गई। कॉन्ग्रेस के लिए ये अच्छा अवसर था। ग्रामीणों पर हुई बर्बरता के लिए अख़बारों के पन्ने रंगे जाने लगे। नारायणपुर काण्ड के नाम से विख्यात हुई ये घटना चुनावी मुद्दा बन गई। इसके असर से बनारसी दास की सरकार 17 फ़रवरी 1980 को बर्खास्त कर दी गई। इसी हलचल के दौरान इंदिरा गाँधी नारायणपुर पहुँच गई। 

ग्रामीणों को सांत्वना देते हुए उन्होंने वादा किया कि अनाथ हो चुके बच्चों को वो गोद लेंगी और उनकी शिक्षा इत्यादि का इंतजाम किया जाएगा। खूब तालियाँ बजीं। कुल 113 दिनों के राष्ट्रपति शासन के बाद राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी और राजा मांडा, यानी वीपी सिंह मुख्यमंत्री हुए। बोफोर्स घोटालों का आरोप राजीव गाँधी पर लगाने से पहले वो कॉन्ग्रेसी ही थे।

सरकार बनने के बाद कॉन्ग्रेसी सरकार बहादुर को वादे कहाँ याद रहते? इंदिरा गाँधी भी अपना वादा भूल गई। अनाथ बच्चे जैसे-तैसे पलते रहे। उनकी जमीनें लोगों ने हथिया ली। थोड़े साल बाद दोनों बच्चों में से एक जयप्रकाश की डूबने से मौत हो गई।

सोनकलिया अभी भी जीवित है। वो अपने परिवार के साथ एक झोपड़े में, गरीबी में ही जीवन बिताती है। इंदिरा गाँधी या उसके बाद के कॉन्ग्रेसी नेताओं में से किसी ने जीतने के बाद उसे मुआवजा दिलवाने या उसकी कोई मदद करना जरूरी नहीं समझा। गिद्धों के झुण्ड की तरह वो लाश नोंचने के बाद अगले शिकार की तलाश में उड़ चुके थे।

हाल का हाथरस कांड देखकर भी नेताओं के वादे और उनका टूटना याद आता है। जनभावनाओं को सुलगाने और दूसरी सभी ऐसी घटनाएँ (जिनमें से कुछ तो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में हुई हैं) उन्हें भुलाकर, किसी एक घटना को राष्ट्रीय स्तर की बहस और विपक्ष की सरकार द्वारा जनता का शोषण बताना कॉन्ग्रेस की पुरानी परंपरा रही है। बाकी उनके किए वादे कितनी जल्दी टूटते हैं, ये तो बिहार चुनावों के बीतने तक दिख ही जाएगा!

₹100 करोड़ की फंडिंग, जातीय दंगों की साजिश: हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने की बड़ी साजिश का खुलासा

हाथरस मामले में योगी सरकार को भेजी गई खुफिया जाँच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। जाँच एजेंसियों को योगी सरकार के खिलाफ खतरनाक साजिश के अहम सुराग मिले हैं। हाथरस के बहाने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए बड़ी साजिश रचने की बात सामने आ रही है। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की साजिश भी रची गई थी। इसके लिए बकायदा फंडिंग की बात भी सामने आई है। यूपी सरकार को भेजी गई खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए हाथरस के बहाने उत्तर प्रदेश में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

दंगे भड़काने के लिए अफवाहों और फर्जी सूचनाओं का सहारा लिया जा रहा। साजिश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और सरकार के निशाने पर रहे माफियाओं की मिलीभगत के ठोस सबूत मिले हैं। प्रदेश में अराजकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की बात भी सामने आ रही है। इस रिपोर्ट में योगी सरकार को बदनाम करने के लिए 100 करोड़ रुपए की फंडिंग की बात भी सामने आ रही है।

बताया जा रहा है कि पीड़ित लड़की की जीभ काटे जाने, अंग-भंग करने और गैंगरेप से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर नफरत की आग भड़काने की कोशिश की गई। वहीं अफवाह फैलाने के लिए ढेरों वेरिफाइड सोशल मीडिया अकाउंट का भी इस्तेमाल किया गया। जाँच एजेसियाँ वेरिफाइड अकाउंट्स का ब्योरा तैयार करने में जुटी हैं।

बताया गया कि हाथरस साजिश में CAA को लेकर हुए उपद्रव में शामिल रहे संगठनों की भूमिका के भी सबूत मिले हैं। उपद्रवियों के पोस्टर लगाए जाने, उपद्रवियों से वसूली कराए जाने और घरों की कुर्की कराने जाने की सीएम योगी की कार्रवाइयों से परेशान तत्वों ने बड़ी साजिश रची। इस दौरान कथित गैंगरेप पीड़ित लड़की से जुड़ी तमाम अफवाहें उड़ा कर मामले को तूल दिया गया।

इसके साथ ही हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश का भी पर्दाफाश हुआ है, जिसके सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे है। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

ऑडियो टेप से खुलासा हुआ है कि सीएम से पीड़ित परिवार की बातचीत के तुरंत बाद एक महिला पत्रकार ने उन्हें भड़काया। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि अगर सीएम की बात मान ली तो पुलिस म्हें ही अपराधी साबित कर देगी। इस बातचीत के बाद परिवार दहशत में आ गई।

ऑडियो टेप की फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट आते ही भड़काने वालों का पॉलीग्राफ और नार्को की तैयारी में जाँच एजेंसियाँ जुटी हैं। पीड़ित परिवार द्वारा नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट और सीबीआई जाँच से मना करने पर रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि आरोपित पक्ष हर तरह की जाँच के लिए तैयार है।

राजस्थान: 6 दिन में अगवा नाबालिग का सुराग नहीं लगा पाई पुलिस, गुलफाम और उसके साथियों पर आरोप

राजस्थान के धौलपुर जिले के बाड़ी उप खंड में 17 वर्षीय नाबालिग लड़की के अपहरण का मामला सामने आया है। बीते 6 दिनों से लड़की घर से लापता है। परिजन लगातार पुलिस थाने के चक्कर काट रहे है। फिलहाल पुलिस को अभी तक मामले में किसी भी प्रकार का सबूत नहीं मिला है। वहीं स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गुलफाम, अलीम, सिराज और रिजवान द्वारा पीड़िता का अपहरण किया गया है।

एनबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, 26-27 सितंबर की देर रात बाड़ी निवासी 17 वर्षीय नाबालिग का अपहरण कर लिया गया। परिजनों का आरोप है कि 4 युवक बहला-फुसलाकर उसे उठा ले गए। परिजनों ने पुत्री की जान खतरे में बताते हुए कहा कि बेटी को लापता हुए 6 दिन बीत गए हैं, लेकिन अभी तक पुलिस ने मामले में कोई सख्त कदम नहीं उठाया है।

पीड़ित परिवार के अनुसार 26 सितंबर को लड़की घर पर ही थी। लेकिन सुबह जब परिजनों ने आँखें खोली तब वह घर से लापता थी। परिवारवालों ने उसे खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन जब वह नहीं मिली तब उन्होंने थाने जा कर तहरीर दी। परिजनों ने बताया कि पास में रहने वाले लोगों ने उन्हें जानकारी दी है कि उन्होंने गुलफाम, अलीम, सिराज और रिजवान के साथ सुबह उनकी बेटी को देखा था। बताया गया है कि सभी लोग बाइकों पर सवार थे ।

वहीं पुलिस ने पीड़ित परिजनों की शिकायत पर आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 363, 366 व 17-18 पोक्सो एक्ट में मामला दर्ज कर किया है। लेकिन आज 6 दिन बाद भी पुलिस आरोपितों के ठिकानों तक नहीं पहुँच पाई है और ना ही उनके हाथ नाबालिग का कोई सुराग लगा है।

गौरतलब है कि इसी तरह का एक मामला राजस्थान के भरतपुर जिले के कैथवाड़ा थाना क्षेत्र से 2 दिन पहले आया था। जहाँ एक 8 वर्षीय नाबालिग बच्ची का अपहरण कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। पुलिस ने मामले में आरोपित सुबेदीन उर्फ इन्नस पुत्र काला खां को गिरफ्तार किया था।

इसके अलावा हाल ही में राजस्थान के बारां (Baran) जिले में दो नाबालिग लड़कियों से गैंगरेप का मामला सामने आया था। रिपोर्ट के अनुसार, आरोपितों ने पहले बारां से दो नाबालिग लड़कियों का अपहरण किया। अपहरण के बाद आरोपित दोनों लड़कियों को कोटा, जयपुर और अजमेर ले गए। कथिततौर पर तीन दिनों तक उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।

बिहार: जिसने कहा टिकट के बदले तेजस्वी यादव ने माँगे ₹50 लाख, उस RJD नेता की गोली मारकर हत्या

बिहार के पूर्णिया में रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को राजद नेता शक्ति मलिक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। शक्ति मलिक वही नेता हैं, जिन्होंने कुछ दिन पहले तेजस्वी यादव पर टिकट के बदले 50 लाख रुपए माँगने और जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप लगाया था। वह आरजेडी के अनुसूचित जाति और जनजाति प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव थे।

डीएसपी आनंद पांडे ने बताया कि आज सुबह शक्ति मलिक के निवास पर तीन लोगों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। मामला दर्ज कर लिया गया है और आगे की जाँच चल रही है। 

शक्ति मलिक ने तेजस्वी यादव पर जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप भी लगाया था। शक्ति मलिक का नेता प्रतिपक्ष पर आरोपों के बाद वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो में वो तेजस्वी यादव पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए दिखाई दिए थे।

शक्ति मलिक ने आरोप लगाया था कि जब वो अपने प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल साधु के साथ तेजस्वी यादव से मिलने पहुँचे तो उन्होंने पहले तो रकम की माँग की और जब कहा कि विचार करेंगे तब उन्हें जातिसूचक गाली देकर कहा कि तुमको विधानसभा नहीं जाने देंगे और वहाँ से भगा दिया।

वीडियो में आरोप लगाते हुए शक्ति मलिक ने कहा था कि पार्टी में टिकट की माँग करने पर तेजस्वी यादव ने 50 लाख रुपए चंदा माँगा था और जब कहा कि ठीक है सोच कर बताते हैं, तब उन्हें जातिसूचक गाली देकर भगा दिया।

शक्ति मलिक की पत्नी और परिजनों ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और अनिल साधु पर हत्या करवाने का आरोप लगाया गया है। इसके अलावा उन्होंने अररिया के राजद नेता कालो पासवान और सुनीता देवी पर भी शक जताया है।

घटना की सूचना मिलते ही सदर एसडीपीओ आनन्द कुमार पांडेय सदर अस्पताल पहुँचे। उन्होंने शक्ति के परिजन से बात की। परिजनों ने घटना के संबंध में बात करते हुए सीधे तौर पर तेजस्वी यादव और अनिल साधु का नाम लिया है। परिजनों का आरोप है कि शक्ति को जान से मारने की धमकी दी जा रही थी।

बता दें कि बिहार में जब से विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ तब से हत्या की यह कोई पहली वारदात नहीं है। कुछ दिनों पहले भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष राजेश कुमार झा उर्फ राजा बाबू की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। राजेश कुमार झा की पटना में हत्या हुई थी। वह बेउर थाना क्षेत्र के अंतर्गत तेज प्रताप नगर में अपने घर के नज़दीक टहलने के लिए निकले थे, तभी दो पहिया वाहन सवार नकाबपोश अपराधी उनके नज़दीक आए और उनकी कनपटी पर गोली मार दी। 

हाथरस केस: सपा और RLD के कार्यकर्ताओं ने महिला पुलिसकर्मियों से बदसलूकी की, UP पुलिस ने खदेड़ा

उत्तर प्रदेश के हाथरस केस में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती जा रही है। आज (सितंबर 4, 2020) सुबह सबसे पहले एसआईटी की टीम मृतका के घर फिर से पहुँची। पिता के बयान दर्ज किए। मृतका के परिजनों से मिलने के लिए नेताओं का आना जारी है। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी शनिवार (सितंबर 3, 2020) को मृतका के परिवार से मिलने के लिए बुलगढ़ी गाँव पहुँचे थे। 

रविवार को समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के नेता पहुँचे। इस दौरान समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल कार्यकर्ताओं का पुलिस के साथ टकराव हो गया। बताया जा रहा है कि नारेबाजी कर रहे सपा कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठियाँ भाँजी।

हाथरस सदर के एसडीएम प्रेम प्रकाश मीणा ने लाठीचार्ज के बारे में बताते हुए कहा, “गाँव में अभी 5 से अधिक लोगों के प्रतिनिधिमंडल को जाने की इजाजत नहीं है। हमें समाजवादी पार्टी और RLD के 5 लोगों के नाम मिले थे। हमने उन्हें जाने की इजाजत दे दी। तभी उनके कार्यकर्ताओं ने महिला पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया और बैरिकेडिंग तोड़ डाली। पत्थरबाजी भी की गई। हमारे एक CO घायल हुए हैं। भीड़ को नियंत्रण में लेने के लिए हमें लाठीचार्ज करना पड़ा। अभी हालात सामान्य हैं।”

बताया जा रहा है कि काफी संख्या में पहुँचे कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया और बैरिकेडिंग तोड़ दी। इसके बाद पुलिस ने दौड़ाकर लाठियाँ भाँजनी शुरू कर दी। गौरतलब है कि एक दिन पहले ही कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने भारी हंगामे के बीच पीड़ित परिजन से मुलाकात की।

रविवार दोपहर को समाजवादी पार्टी के नेता धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव, सपा विधायक संजय लठार और जयवीर ने पीड़िता के परिवार से मुलाकात की। मामले में पुलिस और प्रशासन की लापरवाही के खिलाफ सपा कार्यकर्ताओं ने इस दौरान यूपी सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। पुलिस ने कार्यकर्ताओं को हटाने के लिए बल का प्रयोग करते हुए लाठीचार्ज किया। 

गौरतलब है कि इससे पहले हाथरस मामले पर विवादित बयान देते हुए कॉन्ग्रेस नेता निजाम मलिक ने कहा था कि जो व्यक्ति आरोपितों का सिर कलम करेगा, उसे उनका समुदाय 1 करोड़ रुपए का इनाम देगा। इस बयान के चर्चा में आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार कर लिया।

बयान देते हुए निजाम मलिक ने कहा था, “जिन दरिंदों ने बलात्कार किया है, मैं अपने समाज और खुद की तरफ से माँग करता हूँ कि उन्हें फाँसी की सज़ा होनी चाहिए। जो लोग उन अपराधियों का सिर काट कर लाएँगे उन्हें हमारा समाज 1 करोड़ रुपए का इनाम देगा।”