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अदम्य साहसी नागा रेजिमेंट Vs चीन के बहकावे वाला NSCN-IM: स्थानीय करेंगे 3000 हिंसक समर्थकों की चाल बेकार

लम्बे समय से भारत सरकार के समक्ष नागालैंड के स्वयम्भू प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड (NSCN-IM) को किसी भी तरह से नागालैंड का एक मात्र प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। NSCN-IM वस्तुतः विदेशी शक्ति द्वारा नियंत्रित एक ऐसा संगठन है, जिसमें सभी नागाओं के स्थान पर तांगखुल नागाओं को विशेष प्रभावकारी महत्व दिया गया है।

समस्त नागा जनसमूह का प्रतिनिधित्व करने का छद्म दावा करने वाला यह तांगखुल समूह मुख्यतः मणिपुर की पहाड़ियों तक सीमित है और मणिपुर के अंदर भी इनका प्रभाव केवल सेनापति, उखरुल, चंदेल और तमेंगलोंग चार जिलों तक ही सीमित है।

1966 से ही नागालैंड के पृथकतावादी नेतृत्व और चीन के मध्य स्थित दुरभि-संधि के साक्ष्य देखने को मिलते हैं। मुइवाह के नेतृत्व काल से ही चीन के दक्षिण-पश्चिम स्थित युन्नान प्रान्त में नागा अलगाववादियों को शुरू से ही प्रशिक्षण दिया जाता रहा है।

NSCN-IM के शीर्ष नेतृत्व की चीन की तीन से अधिक यात्राओं के उदाहरण किसी से छुपे नहीं हैं। चीन की बद्लिंग की दीवार पर खिंची गई, इनकी छवि आज भी चीन के साथ इनके प्रगाढ़ संबंधों को स्पष्ट करती है।

चीन आरंभ से ही अलगाववादी नागा गुटों का प्रणेता रहा है। चीन पाकिस्तान के विपरीत, जो जम्मू कश्मीर के अलगाववादियों को प्रत्यक्ष सहायता देता है, पिछले पाँच दशकों से पूर्वोत्तर भारत में, भारत के विरुद्ध पूर्वोत्तर स्थित विभिन्न जन समूहों के मध्य असंतोष को षड्यंत्रकारी रूप से उभार कर, भारत में अव्यवस्था उत्पन्न करने की रणनीति पर कार्य कर रहा है। इस सन्दर्भ में असम, मणिपुर और नागालैंड सदैव से उसके प्रिय लक्ष्य रहे हैं।

भारत के पूर्वोत्तर के अलगाववादी गुट उपरी म्यांमार के प्राचीन पारम्परिक व्यापारी मार्ग का उपयोग चीन तक जाने के लिए करते रहे हैं। अपनी विस्तारवादी नीति का अनुसरण करने के लिए चीन किसी भी सीमा तक जा सकता है। इसका उदाहरण म्यांमार के सन्दर्भ में देखने को मिलता है।

लम्बे समय तक म्यांमार के संसाधनों का दोहन करने के बाद भी चीन, म्यांमार के इस क्षेत्र में दक्षिण कोरिया और भारत के प्रभाव को नियंत्रित करने के उद्देश्य से, अराकान आर्मी जैसे पृथकतावादी समूह को तकनीकी और सैन्य सहायता प्रदान करने की दुर्नीति पर अग्रसर है। चीन ने NSCN-IM की स्थापना के साथ ही उसे सैन्य रूप से सुसज्जित करने में सक्रिय रूप से सहायता की।

चाइना ऑर्डिनेंस इंडस्ट्रीज ग्रुप कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा नागालैंड के इस चरमपंथी अलगाववादी समूह को नियमित रूप से पिछली शताब्दी के सातवें दशक से ही मशीन-गन, मोर्टार और अन्य स्वचालित शास्त्रों की आपूर्ति की जाती रही है।

आज भी चीन द्वारा इस समूह को हथियारों की आपूर्ति की सूचना है। इस समूह के अनेक नेताओं और कैडरों को चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के पश्चिमी कमान द्वारा हथियारों की आपूर्ति के साथ-साथ चीन में सुरक्षित आश्रय और गुप्त सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की पुष्ट सूचना है।

1980 में नागा नेशनल काउंसिल से अलग होने साथ साथ मुइवाह ने अपने नए संगठन का नामकरण नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड किया। इस नाम में सोशलिस्ट प्रत्यय के संयोजन के परोक्ष भी चीन का प्रभाव स्पष्ट है।

चीन का NSCN-IM पर प्रभाव केवल नामकरण में परिवर्तन तक ही सीमित नहीं है, वरना इसके कई और भी आयाम परिलक्षित किए जा सकते हैं। चीन की सरकार के “सत्ता की बागडोर बन्दूक की नली से निकलती है” के आदर्श वाक्य को इस समूह की कार्यप्रणाली में स्पष्टतः अनुभव किया जा सकता है।

NSCN-IM सदैव से हिंसा के बल पर जनप्रतिनिधित्व का छद्म-दावा करने वाला संगठन रहा है। अपने प्रभाव की स्थापना के लिए इस संगठन द्वारा टी सखरी और डॉ इम्कोंग्लिबा आओ जैसे शांतिप्रिय नागा नेताओं की हत्या करवाए जाने के दृष्टान्त किसी से छुपे नहीं हैं।

इस संगठन द्वारा कुग्हतो सुखाई, कैटो सुखाई और स्काटो स्वू जैसे नेताओं को नागा वार्ता-परिदृश्य से बलपूर्वक बाहर किए जाने के उदाहरण भी हैं। यह समूह चीन की किसी भी विषय के शांतिप्रिय समाधान को होने न देने की रणनीति का अनुसरण करता है। यह इसी रणनीति का परिणाम है कि वह आज भारत सरकार को हिंसा के नए दौर का आरंभ होने की गीदड़-भभकी दे रहा है।

भारतीय सन्दर्भ में विदेशी दखलंदाजी को कई घटनाओं द्वारा और सहजता से समझा जा सकता है। फरवरी 2000 में NSCN-IM के शीर्ष नेता को बैंकॉक हवाई अड्डे पर कोरिया के फर्जी पासपोर्ट पर यात्रा करते हुए पकड़ा गया। इस सन्दर्भ में यह देखने को मिला कि इस नेता द्वारा इस यात्रा का आरंभिक बिंदु पाकिस्तान स्थित कराची था। जनवरी 2011 में वांग किंग नामक एक चीनी टीवी पत्रकार को जासूसी के आरोप में दीमापुर से गिरफ्तार किया गया।

विस्तृत जाँच के बाद यह तथ्य सामने आया कि इस पत्रकार का सम्बन्ध चीन की पीपल्स सिक्यूरिटी ब्यूरो से था और उसने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड के मुख्यालय में बंद कमरे में चार घंटे से भी अधिक तक गुप्त वार्ता की। NSCN-IM के शीर्ष नेता शिम्राई ने स्वयं माना है कि उन्हें गुट के शीर्षस्थ नेता ने खोलोसे स्वू सुमी को चीन में सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड के स्थाई प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त करने के लिए पत्र लिखने का आदेश दिया था।

इधर लद्दाख क्षेत्र में भारत-चीन सीमा विवाद के बढ़ने के बाद NSCN-IM ने एक अलग प्रकार का हठधर्मी रूख अपना लिया है। इस गुट का मुखिया अन्थोनी शिम्राई, हेब्रोन स्थित मुख्यालय से लापता है और यह सूचना है कि वह भारत-म्यांमार सीमा पर 3000 समर्थकों के साथ चीन के प्रभाव में पुनः हिंसक गतिविधियों को आरंभ करने के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है। अरुणाचल प्रदेश के भारत-म्यांमार सीमावर्ती, लॉन्गडिंग जिले में छः नागा चरमपंथियों का मारा जाना भी इसी ओर संकेत करता है।

NSCN-IM के बृहद नगालिम की कल्पना में अरुणाचल प्रदेश के तिराप ,चांगलांग तथा लोंगडिंग जिले हैं। भारत का एक राज्य ,अरुणाचल प्रदेश जिसे चीन विवादित मानता है और इसके उस पार चीनी सेना का सघन जमावड़ा है। किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष संघर्ष में न जाकर, अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भ में पाकिस्तान और आतंरिक सन्दर्भ में पूर्वोत्तर भारत के अलगाववादियों को सैन्य समर्थन देना, चीन की सुपरिचित नीति रही है, जिसमें चीन के अपने जान-माल का कम से कम नुकसान होता है।

नागालैंड के निवासियों ने NSCN-IM की चीन के साथ गुप्त-संधि और हिंसा के दुष्प्रभावों को समझा है और वे भारत सरकार के साथ शांति समझौते के होने की तन्मयता से प्रतीक्षा कर रहे हैं। नागालैंड स्थित सभी गुटों में भारत सरकार के प्रति विश्वास और आशा की भावना जगी है।

इन गुटों में विभिन्न समूह हैं, उदाहरणस्वरूप, नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप (एनएनपीजी), ये 7 सशस्त्र गुटों का समूह है, जो भारत सरकार के साथ संधि कर चुके हैं। दूसरा गुट नागालैंड गाँव बूढ़ा फेडरेशन है, जो 1585 गाँवों के गाँव बुढ़ाओं का संघटन है, जिसके सदस्य नागालैंड के गाँवों के मुखिया हैं। ये NSCN-IM द्वारा अपने किसी भी विरोध को नागा विरोधी घोषित करने और इसकी आड़ में हिंसा को बढ़ावा देने की चिरपरिचित शैली का खुल कर विरोध कर रहे हैं।

तीसरा गुट नागालैंड के 14 जनजातियों की शीर्षस्थ संस्था (होहो) है। चौथा गुट नागा ट्राइबल काउंसिल है। इसी एकता को देखते हुए ही, NSCN-IM ने अलग संविधान और ध्वज जैसी रूढ़िवादी माँगों के प्रति दुराग्रह दिखाना शुरू कर दिया है, जिसे वह पहले छोड़ चुका था।

यह गुट संप्रभुता के जिस विषय से भारत सरकार के हट जाने की बात करता है, वह भारत के संविधान में अन्तर्निहित संघवाद में पहले से ही उपस्थित है। इस गुट का यह कहना कि नागालैंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान रही है, तथ्यों से मेल नहीं खाता।

गुट का यह कहना कि वह भारत के साथ मिलकर तो रहेगा लेकिन विलय पर एकमत नहीं होगा, वार्ता के प्रति उनकी दुर्भावना और उनके द्वारा उत्तरदायित्व से पलायन करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। चीन के प्रोत्साहन से नागा शांति वार्ता को अपने आयाम तक न पहुँचने देने के पीछे इस गुट के अपने निहितार्थ हैं।

इस क्षेत्र में भारी फिरौती की वसूली, नागा समाज में अपना वर्चस्व, विदेश यात्राएँ और महानगरों में उपलब्ध महँगी संपत्तियों की सहज उपलब्धता का लोभ और चीनी प्रश्रय, इस गुट को शांति-वार्ता के मार्ग में अवरोध को प्रेरित करने के लिए बाध्य कर रहा है।

आज चीन के उकसावे में, एक अलग झंडे और संविधान की आड़ में वार्ता को भंग करने की इस संगठन की मंशा का पूरे नागालैंड में विरोध हो रहा है। NSCN-IM की जबरदस्ती उगाही और अन्य अवैध गतिविधियों पर लगाई गई रोक और संगठन के एकमात्र स्वयंभू होने के दावे को नागालैंड में चुनौती मिल रही है।

नागालैंड के निवासियों का अलगाववाद में कभी विश्वास नहीं था, इसके साक्ष्य हमें काफी पहले से मिलते हैं। नागा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) के सचिव द्वारा 4 दिसंबर 1948 को तत्कालीन प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में माँग की गई थी कि नागा हिल जिले को केंद्रीय प्रशासित प्रदेश घोषित किया जाए तथा इसे नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया नेफा के नाम से जाना जाए।

भारत की स्वाधीनता के ठीक बाद 1948 में लन्दन ओलंपिक खेल में भारत के धवज को थामने का श्रेय डॉ टालिमेरेन आओ को जाता है, जिन्होंने इस स्पर्धा में भारतीय फुटबाल प्रतिस्पर्धा में भारतीय टीम की कप्तानी भी की थी।

फिजो द्वारा सशस्त्र आतंकवाद का विरोध करने वाले नागा समाज के प्रबुद्ध लोगों ने ही नागा पीपल्स कन्वेंशन (एनपीसी) के द्वारा अपने अथक परिश्रम से वर्त्तमान नागालैंड राज्य की संरचना की है। कुछ शांतिप्रिय नागा नेताओं को अपनी जान भी गँवानी पड़ी।

नागालैंड के बारे में NSCN-IM ने, चीन जैसी विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर नागालैंड के निवासियों की मिथ्या रूप से हिंसक छवि बनाने में सक्रिय योगदान दिया है। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि नागालैंड के निवासियों का भारतीय लोकतंत्र में गहरा विश्वास है। यही कारण है कि 2014 के आम चुनावों में इस राज्य का मत प्रतिशत 87.82% था, जो देश में किए गए सर्वाधिक मतदान में से एक था।

नागालैंड के ही लोकप्रिय नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री एससी ज़मीर (एनपीसी) के सचिव रहे हैं। वो विभिन्न मंत्रिपदों पर रहते हुए चार अलग-अलग प्रान्तों के राज्यपाल रहे। भारत सरकार ने भी उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 2020 में भारत के तृतीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म-भूषण से सम्मानित किया। अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए नागालैंड के एक अन्य स्वतंत्रता सेनानी को पद्मभूषण तथा 10 प्रबुद्ध जनों को भी भारत के चतुर्थ सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया जा चुका है।

आज अनेक नागा युवक भारतीय सिविल सेवा में अपना सक्रिय और उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। गत दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को उनके देश के पिछले सात दशकों से आतंकवाद, जनसंहार, धार्मिक कट्टरपंथ और परमाणु तस्करी का स्मरण दिलाने का श्रेय मिजिटो विनिटो (स्थाई मिशन में प्रथम सचिव) नाम के जिस भारतीय राजनयिक को जाता है, वह नागालैंड के सुमि जनजाति से हैं।

कारगिल युद्ध में अदम्य साहस और शौर्य के लिए नागा रेजिमेंट पूरे देश में आदर से जानी जाती है। अपनी स्थापना के बाद से इसे 1 महावीर चक्र, 8 वीर चक्र, 6 शौर्य चक्र, 1 युद्ध सेवा पदक, 1 विश्व सेवा पदक और 48 सेना पदकों से सम्मानित किया जा चुका है।

आज अधिकाधिक नागावासियों को इस बात का आभास है कि उन्हें भारत के अन्य हिस्सों में रहने वाले अपने नागरिक भाइयों के साथ संवाद और सम्बन्ध स्थापित करने की आवश्यकता है। वे मानते हैं कि किसी भी तरह की हिंसा के परित्याग द्वारा ही इस क्षेत्र का सर्वंगीण विकास संभव है।

आज नागालैंड के निवासियों में निश्चित ही यह भावना बलवती हुई है कि भारत सरकार और उनके मध्य विश्वास और सहयोग को बनाकर ही इस क्षेत्र का समन्वित विकास किया जा सकता है। इस के साथ ही वे अपने देश के विकास और प्रगति में भी अपना योगदान देना चाहते हैं।

आज साधारण नागा यह मानता है कि किसी एक गुट के स्थान पर सभी नागाओं को अपनी बात कहने का समान रूप से अधिकार है। अब यह NSCN-IM जैसे गुट पर निर्भर है कि वह चीन जैसे विस्तारवादी राष्ट्र के हाथों में खेले या फिर पूर्ण नागा जनमानस की अपेक्षाओं के अनुरूप नागा शांति वार्ता को साकार करने में अपना उल्लेखनीय योगदान दे।

(लेखिका दीपिका सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनैतिक शास्त्र की सह अध्यापक हैं तथा सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज से जुड़ी हुई हैं)

बलरामपुर गैंगरेप: गाल, छाती, जाँघ, कोहनी, घुटना… हैवानियत के वक्त दरिंदों ने हर जगह दिए निशान

हाथरस केस की मीडिया से लेकर राजनीति के गलियारों तक खूब चर्चा है। लेकिन उत्तर प्रदेश के ही बलरामपुर में दलित छात्रा के साथ गैंगरेप के मामले को लेकर वैसा आक्रोश नहीं दिख रहा है। बलरामपुर के गैसड़ी थाना स्थित मझौली गाँव में जिस तरह से दलित छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ और फिर उसकी मौत हुई, वह राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय नहीं बन पाई।

इस मामले में शाहिद और साहिल की गिरफ्तारी हो चुकी है। हैवानियत के वक्त छात्रा के साथ किस तरह दरिंदगी की गई उसका पता पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से चलता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में गैंगरेप की शिकार छात्रा के शरीर पर चोट के 10 निशान मिलने की बात कही गई है। गाल, छाती, जाँघ, कोहनी और घुटने पर निशान मिले हैं।

हाथरस को लेकर चल रहे हंगामे के बीच बलरामपुर की घटना को लेकर उतनी चर्चा न होने से इस मामले में न्याय की माँग कमजोर न हो जाए, ऐसा कई लोगों को डर है। ये घटना मंगलवार (सितम्बर 29, 2020) की है। 22 वर्षीय पीड़िता लक्ष्मी (बदला हुआ नाम) के परिवार के सभी लोग शिल्पकार का कार्य करते हैं। ये लोग देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ बनाने के साथ-साथ पत्थर के सिलबट्टे इत्यादि बनाते थे।

उत्तर प्रदेश में शिल्पकार वर्ग एससी-एसटी समुदाय के अंदर आता है। कुछ स्थानीय लोगों ने पीड़िता के नाबालिग होने की बात भी कही है। हमने इस पूरे मामले की जानकारी के लिए बजरंग दल के अवध प्रान्त सह-संयोजक महेश तिवारी से बातचीत की, जिन्होंने बताया कि कॉलेज से लौटने के दौरान ही छात्रा का अपहरण कर लिया गया और उनमें से एक के कमरे पर पीड़िता को ले जाया गया।

वहाँ गैंगरेप के बाद जब पीड़िता की हालत बिगड़ने लगी तो आरोपितों ने एक डॉक्टर को बुला कर उसका इलाज कराना चाहा, लेकिन उसकी स्थिति देख कर डॉक्टर ने इलाज करने से इनकार कर दिया। महेश तिवारी ने बताया, “एक स्थानीय मेडिकल प्रैक्टिशनर को बुला कर पीड़िता के इलाज के लिए लाया गया। उसने देखा कि कमरे में कोई महिला नहीं है जो पीड़िता पर ध्यान दे सके, तो उसे वहाँ की गतिविधियाँ संदिग्ध लगीं।“

इसके बाद किसी अन्य डॉक्टर को बुला कर पीड़िता के इलाज की कोशिश की गई। इस दौरान पीड़िता को इंजेक्शन भी लगाया गया था, जिसके बारे में साफ़ नहीं था कि ये डॉक्टर ने लगाया या फिर आरोपितों ने। महेश तिवारी ने बताया, “पीड़िता को कुछ ऐसा रसायन इंजेक्ट कर दिया गया कि उसका नीचे का पूरा शरीर ही सुन्न हो गया और वो चलने-फिरने में अक्षम हो गई। फिर उसे ई-रिक्शा पर बिठा कर घर भेज दिया गया।“

आरोपितों ने ही ई-रिक्शा की व्यवस्था कर पीड़िता को उसके घर भेजा। चूँकि उसके शरीर का निचला हिस्सा काम नहीं कर रहा था, इसीलिए उसके घर पर पहुँचने पर परिजनों ने ही उसे उतारा। इसके बाद पीड़िता के पिता की तरफ से थाने में तहरीर दी गई, जिसेक आधार पर एफआईआर दर्ज हुई। तत्पश्चात शाहिद और साहिल नामक दो आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, जिसकी पुष्टि पुलिस ने भी की है।

मृतका का निवास स्थान गैसड़ी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मझौली गाँव में पड़ता है। मृतका के पिता हनुमान शिल्पकार (बदला हुआ नाम) पत्थरों से शिल्पकारी व संरचनाएँ बनाने का कार्य करते हैं। महेश तिवारी ने बताया कि उनके संगठन के कई कार्यकर्ताओं ने भी पीड़ित परिवार से मिल कर उनका हाल जाना है और साथ ही उनका दुःख बाँटा।

बजरंग दल के जिला संयोजक चन्दन मिश्र ने बताया कि उन्होंने परिजनों से संपर्क किया, जिन्होंने बताया कि उक्त छात्रा ‘विमला विक्रम विद्यालय’ में पढ़ती थी। वो वहीं से परीक्षा का फॉर्म भर कर लौट रही थी, तभी उसके साथ ये घटना हुई। चन्दन मिश्र ने बताया, “मुझे पीड़ित परिजनों ने जानकारी दी कि छात्रा जब लौटी तो उसने अपने शरीर पर चोट के कई निशान दिखाए। उसे काफी बुरी तरह मारा-पीटा गया था।”

ऑपइंडिया के पास इस मामले की एफआईआर कॉपी भी है। इसमें लिखा है, “लक्ष्मी (बदला हुआ नाम) को जब ई-रिक्शा से घर भेजा गया, तब उसके साथ 10 साल का एक लड़का भी था, जो उसे उतार कर चला गया। मेरी बहन के हाथ में वीगो लगा हुआ था। जब उसकी हालत बहुत खराब हो गई, तब हम दवा के लिए उसे अस्पताल ले जा रहे थे, रास्ते में उसकी मौत हो गई।“

चन्दन मिश्र ने बताया, “जब घरवाले पीड़िता की गंभीर स्थिति को देखते हुए वहाँ से अस्पताल ले जाने लगे, तभी उसकी मौत हो गई।” उन्होंने कहा कि उनका संगठन इस घड़ी में परिवार के साथ है और उन पर कोई प्रशासनिक दबाव वगैरह नहीं हो, इसे सुनिश्चित करने में लगा हुआ है। वहीं विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने इस प्रकरण पर ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए कहा,

“छात्रा को जिस तरह से दिन-दहाड़े बाइक पर बिठा कर ले जाया गया, ये लव-जिहाद, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या – इन तीनों का मामला है। पीड़िता दलित है लेकिन चूँकि हमलावर मुस्लिम हैं, इसीलिए ‘सेलेक्टिव सेकुलरिज्म’ के कारण बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के झंडाबरदार वहाँ नहीं जा रहे हैं लेकिन हाथरस में गिरने का नाटक कर रहे हैं। लोगों की सहानुभूति के लिए ऐसा किया गया। यही लोग महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं लेकिन सब एकतरफा।”

पुलिस ने भी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद प्रथम दृष्टया पाया है कि छात्रा के साथ बलात्कार हुआ था। परिजनों ने ये भी कहा है कि उन्हें इस घटना पर राजनीति नहीं चाहिए।

बलरामपुर पुलिस ने भी इस घटना को सांप्रदायिक रंग न देने को कहा है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पुलिस ने गाँव में बैरेकेडिंग भी कर रखी है, जिससे लोगों को पीड़ित परिवार से मिलने में परेशानी हो रही है। हमने कई नंबरों पर कॉल कर के पुलिस का बयान लेना चाहा, लेकिन पुलिस से हमारा संपर्क नहीं हो पाया। रविवार को राज्य के अपर मुख्य सचिव सहित कई आला अधिकारी बलरामपुर पहुँचे और पीड़ित परिवार से मुलाकात कर स्थिति की समीक्षा की।

यह भी सामने आया है कि बलरामपुर स्थित गैसड़ी में दलित छात्रा से गैंगरेप मामले में आरोपितों में से दो चाचा-भतीजा ही हैं। पीड़िता का अंतिम संस्कार भी पुलिस की निगरानी में हुआ और परिजनों ने भी इससे सहमति जताई। हालाँकि, अंतिम संस्कार के बाद मृतका के घर के आसपास सुरक्षा-व्यवस्था ज़रूर कड़ी कर दी गई है। मृतका बीकॉम प्रथम वर्ष की छात्रा थी। परिजनों को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी दे दिया गया है। दोनों आरोपितों को जेल भेज दिया गया है।

टाइम्स ग्रुप के टैबलॉयड अहमदाबाद मिरर का कमाल! बिना बात किए ही छाप दिया गुजरात बीजेपी अध्यक्ष का 2 पन्नों का इंटरव्यू

टाइम्स ग्रुप अहमदाबाद मिरर नाम से एक टैबलॉयड प्रकाशित करता है। इस टैबलॉयड में शनिवार (3 अक्टूबर 2020) को गुजरात बीजेपी अध्यक्ष सीआर पाटिल का ‘इंटरव्यू’ प्रकाशित हुआ। वह भी छोटा-मोटा नहीं। बकायदा दो पन्नों का इंटरव्यू। कदाचित यह ‘इंटरव्यू‘ अहमदाबाद मिरर की संपादक दीपल त्रिवेदी ने किया है। पर दिलचस्प यह है कि ऐसा कोई इंटरव्यू कभी किया ही नहीं गया।

पाटिल ने ट्विटर पर इस काल्पनिक इंटरव्यू को साझा किया है। बताया है कि कॉन्ग्रेस के प्रति सद्भावना रखने वाली संपादिका इसकी लेखक हैं। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “कैसा समय आ गया है जिसमें समाचार पत्र काल्पनिक लेखकों को पैसे दे रहे हैं। मुझे अपना साक्षात्कार देख कर हैरानी हो रही है। मैंने ऐसी कोई बातचीत की ही नहीं।”

इस ‘इंटरव्यू’ में पाटिल के हवाले से दावा किया गया है किया गया है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी 182 में से 175 सीटें जीतेगी। यदि सभी 182 सीटें भी जीत ले तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

लेकिन, दीपल त्रिवेदी ने ट्वीट कर कहा है कि यह इंटरव्यू 1 सितंबर को सर्किट हाउस में हुआ था। हालाँकि इसे 3 अक्टूबर को प्रकाशित किया गया। उनका दावा है कि यह ‘इंटरव्यू’ गुजराती और अंग्रेजी दोनों में हुआ था।

साथ ही यह भी बताया है कि इस ‘इंटरव्यू’ के ठीक बाद पाटिल कोरोना वायरस संक्रमित हो गए थे। दिलचस्प यह है कि 3 अक्टूबर को प्रकाशित इंटरव्यू का एक सवाल पाटिल की प्रतिक्रिया को लेकर है जिसमें उन पर कोरोनों संक्रमण फैलाने का आरोप था। सोचने योग्य बात है कि जब इंटरव्यू पाटिल को कोरोना होने से पहले किया गया था तो वह सवाल कैसे पूछ लिया गया जो आरोप उन पर संक्रमण के बाद लगा था।

इसके अलावा त्रिवेदी ने ‘इंटरव्यू’ की पाँच सेकंड की एक क्लिप भी साझा की है। साथ ही कहा है कि अहमदाबाद मिरर पर फेक इंटरव्यू का आरोप लगाने के लिए पाटिल माँफी माँगे।

मिरर की संपादक के ट्वीट के बाद पाटिल ने ट्वीट कर कहा है कि जो क्लिप साझा की है वह एक महीने पहले की है और जब उन्होंने 2 अक्टूबर को एक साक्षात्कार के लिए उनसे संपर्क किया था, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से मना कर दिया था।

2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के वक्त त्रिवेदी ने पाटीदारों के बारे में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का फर्जी कोट शेयर किया था। दीपल त्रिवेदी द्वारा साझा किए गए इस फर्जी बयान से पाटीदार समुदाय आक्रोशित हो सकता था और हिंसा के हालात बन सकते थे। इस ट्वीट के लिए आलोचना होने पर त्रिवेदी ने दावा किया था कि उन्होंने यह बताने के लिए कि यह तस्वीर कितनी ‘खतरनाक’ है हार्दिक और अमित शाह को टैग कर दिया था। इसी तरह साल 2018 में वे भाजपा नेता तेजिंदर बग्गा की मौत की कामना करते पकड़ी गई थी। 

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब फर्जी इंटरव्यू प्रकाशित करने का आरोप किसी पत्रकार पर लगा हो। गालीबाज ट्रोल पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी पर भी पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस का फेक इंटरव्यू करने के आरोप लग चुके हैं। मामला सामने आने के बाद यह इंटरव्यू रहस्यमय तरीके से गायब हो गया था।    

‘यही मौका है’: हाथरस पर पॉलिटिक्स को लेकर शशि थरूर बोले- क्या लोकतंत्र में राजनीति करना मना है

हाथरस कांड को लेकर राजनीति अपने चरम पर है। एक तरफ जहाँ हाथरस मामले को लेकर देश में लोगों का गुस्सा देखने को मिल रहा है। वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी इस मामले पर राजनीति करने से बाज नहीं आ रही है। इस क्रम में शनिवार (सितंबर 3, 2020) को कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी पूरे लाव-लश्कर के साथ दिल्ली से हाथरस पहुँचे। हाथरस पहुँचे राहुल की कार खुद बहन प्रियंका गाँधी चला रही थीं। 

राहुल और प्रियंका गाँधी अपने साथ दो नेताओं को लेकर पहुँचे। जिसमें से एक थे- पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर। शशि थरूर का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस के हाथरस जाने के पीछे की सच्चाई सबके सामने ला दी है। 

दरअसल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में शशि थरूर हाथरस कांड की सच्चाई सबको बता रहे हैं। उनसे जब एक पत्रकार ने हाथरस को लेकर सवाल पूछा कि ऐसा आरोप लग रहा है कि आप इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं, तो शशि थरूर ने इसका जवाब देते हुए कहा, “क्या अभी एक लोकतंत्र में राजनीति करना मना है। लोकतंत्र में लोग कैसे जानेंगे कि कौन किसके साथ है। यही मौका है।”

शशि थरूर के इस बयान ने हाथरस कांड को लेकर कॉन्ग्रेस के सच्चाई की पोल खोल दी है कि आखिरकार कॉन्ग्रेस पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिकरण कर रही है। वह इस मुद्दे का फायदा उठाना चाहती है। शशि थरूर का यह बयान कॉन्ग्रेस के एजेंडे की हवा निकाल सकती है।

जब पत्रकार ने थरूर को याद दिलाया कि महामारी अधिनियम लागू है और उनकी पार्टी के नेता महामारी संबंधी दिशा-निर्देशों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं, तो कॉन्ग्रेस नेता इस सवाल का जवाब देने से बचते हैं। थरूर का कहना था कि एक लोकतांत्रिक देश में लोग कभी भी जाने और संवेदना व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं।

इसी दौरान शशि थरूर बोलते हैं कि उनकी पार्टी हाथरस के पीड़ितों पर अत्याचार से बेहद परेशान है और पीड़ित परिवार के साथ अपनी संवेदना व्यक्त करना चाहता है। इससे पहले राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का कार से हाथरस जाते हुए वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह ठहाके लगाते हुए दिख रहे हैं। जिस पर लोगों ने सवाल भी उठाए थे कि ऐसे वक़्त पर राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी इस तरह संवेदनहीन होकर हँसी-मजाक करते हुए कैसे जा यात्रा कर सकते हैं?

‘मुझमें और हाथरस की बेटी में क्या फर्क? राहुल गाँधी मेरे पास क्यों नहीं आ सकते?’ – बारां की रेप पीड़िता के चुभते सवाल

उत्तर प्रदेश के हाथरस की घटना को लेकर पूरे देश में विरोध हुआ। सभी ने इस घटना पर जम कर विरोध और बहस की लेकिन इस बीच कुछ कुछ घटनाएँ पीछे छूट गईं। ऐसी ही एक घटना हुई थी राजस्थान के बारां जिले में, जहाँ एक महिला को बंधक बना कर उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया गया।

इस बीच पीड़िता ने राहुल गाँधी से सवाल पूछा है कि वह यहाँ (बारां) क्यों नहीं आते हैं? पिछले कुछ समय से राजस्थान में महिलाओं के साथ ज़्यादती के कई मामले सामने आए हैं, लेकिन वहाँ की घटनाओं पर सभी ने मौन धारण कर रखा है। 

न्यूज़ नेशन में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ पीड़िता ने राहुल गाँधी को संबोधित करते हुए कई बातें कहीं। पीड़िता ने पूछा:

“राहुल गाँधी बारां क्यों नहीं आ सकते हैं? राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तक दूसरे राज्य में घटनाएँ होने पर वहाँ जाते हैं, लेकिन अपने ही प्रदेश में स्थित बारां नहीं आते हैं। मुझमें और हाथरस की बेटी में क्या फर्क है, अन्याय तो मेरे साथ भी हुआ है। मैं भी हाथरस की बेटी जैसी हूँ। मैं चाहती हूँ कि मेरे साथ भी न्याय हो, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी यहाँ (बारां) आएँ। मेरे मामले पर भी सुनवाई हो और मुझे भी न्याय मिलना चाहिए।”  

इसके बाद पीड़िता ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि 1 जुलाई 2020 को दो लोग आए और कहा कि उनके माता-पिता ने खेत पर बुलाया है। इसके बाद आरोपित पीड़िता को उसके घर वालों के पास लेकर जाने के बदले डरा-धमका कर श्योपुर ले गए।

वहाँ उन्होंने पीड़िता को महीनों तक एक कमरे में बंद कर दिया और उसके साथ बलात्कार किया। पीड़िता ने यह भी बताया कि आरोपितों ने उसके साथ जबरदस्ती करके शादी के कागज़ पर हस्ताक्षर भी करा लिए थे। इसके अलावा आरोपित रात के वक्त पीड़िता के साथ मारपीट भी करते थे।

तमाम कोशिशों के बाद पीड़िता उनके चंगुल से छूट कर बाहर आई, तब उसने 7 अगस्त को सीसवाली थाना क्षेत्र में इस मामले की शिकायत दर्ज कराई थी। इस मामले में पुलिस का रवैया भी बेहद लापरवाही भरा है और अभी तक एक भी आरोपित गिरफ्तार नहीं किया गया है। पीड़िता ने इस मामले में पुलिस अधीक्षक से भी मदद की गुहार लगाई थी। 

वहीं पुलिस ने शनिवार को इस मामले पर बयान देते हुए कहा था कि पीड़िता 1 जुलाई से लापता थी। वह 7 अगस्त को पुलिस थाने आई थी और उसने बलात्कार व अपहरण की शिकायत दर्ज कराई थी। फ़िलहाल इस मामले में जाँच जारी है, आरोपित अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। अधिकारियों का अपने बचाव में कहना था कि कोरोना वायरस महामारी के चलते जाँच में समय लगा।

इस दौरान पुलिस अधीक्षक ने जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी का स्थानांतरण भी कर दिया था। पीड़िता ने बताया कि बलात्कार करने वाले आरोपित उसे और उसके परिवार वालों को लगातार धमकी दे रहे हैं। जिसके चलते उसे और उसके पूरे परिवार को अपना घर तक छोड़ना पड़ गया। पिछले 2 महीने से पीड़िता और उसका परिवार अपने रिश्तेदार के घर रह रहा है और आरोपित बेख़ौफ़ होकर घूम रहे हैं।

पीड़िता के चाचा का कहना था कि पुलिस बिलकुल सहयोग नहीं कर रही है। जब उन्होंने पीड़िता की मेडिकल जाँच के लिए निवेदन किया तब थानाध्यक्ष ने कहा, “क्या मैं तुम्हारा नौकर हूँ? क्या मैं इस लड़की का मिट्टी का पुतला बना कर थाने में लगवा दूँ।”

सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने इस मामले में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। आरोपितों ने डरा-धमका कर शादी के लिए साइन तक करा लिया है और लगातार धमकियाँ दे रहे हैं।

60 लाख से 15 लाख हो गए मंगोलियाई, 5 लाख की निर्मम हत्या: इनर मंगोलिया में चीन की कम्युनिस्ट सरकार का दमन

चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शिनजियांग में उइगरों का नरसंहार छिपा नहीं है। अब इसी तरह के तथ्य इनर मंगोलिया को लेकर सामने आए हैं। यहॉं भी बड़े पैमाने पर जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किया जा रहा है। ग्लोबल कैंपेन फॉर डेमोक्रेटिक चाइना: यूनाइटिंग अगेंस्ट चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी रिप्रेसिव रिजीम नामक वेबिनार [पीडीएफ] में साउर्दन मंगोलियन ह्यूमन राइट्स इन्फोर्मेशन सेंटर के डायरेक्टर एंगबेतु तोगोचोग (Enghebatu Togochog) ने बताया कि किस तरह सीमाई इलाकों में चीन ने लाखों लोगों का उत्पीड़न किया है। इस वेबिनार का आयोजन भारतीय थिंक टैंक लॉ ऐंड सोसायटी अलायंस की ओर से एक अक्टूबर को किया गया था।

दक्षिणी मंगोलिया, जिसे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी इनर मंगोलिया भी कहती है में मंगोलियाई लोगों की आबादी करीब 60 लाख थी। तोगोचोग के अनुसार चीनी शासन करीब 5 लाख मंगोलियाई लोगों की निर्मम हत्या कर चुका है। आज उनकी आबादी 60 लाख से घटकर 15 लाख रह गई है।

CCP की सांस्कृतिक दमननीति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, “चीन ने 1980 के दशक में सांस्कृतिक समावेश शुरू किया और लाखों दक्षिणी मंगोलियाई किसानों को यातनाएँ दी गई। इसके अलावा उन्हें अधिकारहीन कर दिया गया।” उन्होंने कहा कि स्थानीय निवासियों को पिछले 2 दशकों से बड़े पैमाने पर खेती के लिए भूमि का उपयोग करने से प्रतिबंधित किया गया है। तोगोचोग ने बताया,”चीन ने यह पूरे मंगोलियाई आबादी पर लागू किया है। घास के मैदानों पर रहना अपराध माना जाता है। अपनी ज़मीन पर काम करने वाले चरवाहों को कैद कर लिया जाता है या सताया जाता है। साथ ही चीन ने सीमावर्ती क्षेत्रों में लाखों खानाबदोश आबादी को भी मिटा दिया है।”

उन्होंने बताया कि कैसे चीन अपनी भाषाई नीति के द्वारा जातीय संस्कृति को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय भाषा मंदारिन को मंगोलियाई नागरिकों पर थोपा जा रहा है और कैसे अब यह स्कूल पाठ्यपुस्तकों में शिक्षा की भाषा बनने जा रही है।

उन्होंने कहा, “मंगोलियाई संस्कृति पर इस अंतिम प्रहार को लेकर पूरे दक्षिणी मंगोलियाई लोग एकजुट होकर इसके खिलाफ खड़े हो गए हैं। किंडरगार्टन से लेकर मिडिल स्कूल के छात्र, संगीतकार से लेकर टैक्सी ड्राइवर, सरकारी अफसर से लेकर पार्टी के सदस्य तक, सभी चीनी अधिकारियों के सांस्कृतिक नरसंहार के नए प्रयासों के खिलाफ उठ चुके हैं। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ और लोगों का गायब हो जाना आम चलन बन गया है। पिछले महीने ही लगभग 4000-5000 दक्षिणी मंगोलियाई लोगों को हिरासत में लिया गया या उन्हें गायब कर दिया गया है।”

इतना ही नहीं एंगबेतु तोगोचोग ने चीनी कम्युनिस्ट शासन के हाथों मंगोलियों के उत्पीड़न के अन्य रूपों की ओर भी संकेत किया। उन्होंने बताया, “लोगों को नौकरी से निकाल देना, सामाजिक लाभ उठाने वालों को निलंबित करना, बैंक ऋण तक पहुँच से वंचित करना, संपत्तियों को जब्त करना, छात्रों को डिग्री से वंचित करना यह सब अप्रत्यक्ष यातना के कुछ उदाहरण हैं। ये यातनाएँ सीसीपी को स्थानीय आबादी पर नियंत्रण करने में सक्षम बनाता है।”

मंदारिन थोपने का हो रहा विरोध

जबरन अपनी भाषा थोपने का निर्णय इनर मंगोलिया में रहने वाले लोगों के खिलाफ था। इनर मंगोलिया के लोगों की पारंपरिक वर्णमाला है। वे रूस के प्रभाव में सिरिलिक लिपि का उपयोग करते हैं। ऐसे में मंदारिन थोपने के चीनी शासन के प्रयासों का विरोध हो रहा है।

भाषा को लेकर 3,00,000 छात्रों के साथ उनके माता-पिता द्वारा सत्तावादी कम्युनिस्ट पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए इसका विरोध किया गया है। जैसे, इस महीने में स्कूल खुलने पर केवल 40 मंगोलियाई छात्रों ने ही अगले सत्र के लिए खुद को रजिस्टर्ड किया, जबकि पहले दिन केवल 10 ही छात्र स्कूल पहुँचे। बता दें मंगोलियाई बच्चों के माता-पिता ने पहले ही घोषणा की थी कि वे शिक्षा की नई भाषा को स्वीकार करने के बजाय अपने बच्चें को घर में रखेंगे।

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स्वरा भास्कर और दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक कर दी हाथरस पीड़िता की पहचान, NCW भेजेगा नोटिस

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा है कि न सिर्फ भाजपा आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय, बल्कि अभिनेत्री स्वरा भास्कर और कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह जैसे कइयों ने भी जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान हाथरस की पीड़िता की पहचान जाहिर कर दी। उन्होंने कहा कि इस मामले में बलात्कार सम्बन्धी बात अभी रिपोर्ट्स में स्पष्ट नहीं हैं और न ही कोर्ट ने मामले में स्वतः संज्ञान लिया है।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा कि जब हाथरस मामले में बलात्कार पर चीजें स्पष्ट हो जाएँगी, तब NCW इस मामले में पीड़िता की पहचान जाहिर करने वाले सभी लोगों को नोटिस देगा। उन्होंने कहा कि जिन भी लोगों ने सोशल मीडिया में या फिर विरोध प्रदर्शनों के दौरान उत्तर प्रदेश के हाथरस की पीड़िता की तस्वीरों का इस्तेमाल किया है, उन सभी के डिटेल्स उनके पास हैं।

विरोध प्रदर्शन की वायरल तस्वीरों में स्वरा भास्कर भाषण देती हुई दिख रही हैं और उनके पीछे समर्थकगण हाथरस की पीड़िता का पोस्टर लहरा रहे हैं। इन तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वरा भास्कर ने लिखा है, “हमारी लड़ाई है, हम सबको साथ लड़ना होगा। आज चुप रहना मतलब इस दरिंदगी में शामिल होना।” उन्होंने जिस तस्वीर को कोट कर के ट्विटर पर ये बात लिखी, उसमें पीड़िता का चेहरा स्पष्ट दिख रहा है।

साथ ही स्वरा भास्कर ने जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन का वीडियो भी शेयर किया, जिसमें कई लोग हाथरस की पीड़िता की तस्वीरों वाले पोस्टर-बैनर लहरा रहे हैं। अभिनेत्री ने दावा किया कि ये सभी चिंतित नागरिक हैं, जो न्याय के लिए खड़े हैं। कॉन्ग्रेस समर्थक साकेत गोखले ने कंगना रनौत मामले में टिप्पणी पर NCW द्वारा संज्ञान लेने की खबर की चर्चा करते हुए रेखा शर्मा को घेरा, जिसके बाद उन्होंने जवाब दिया कि इस मामले में भी संज्ञान लिया गया है – वो ये सब कह के समाज को न बाँटें।

बता दें कि कई लिबरल वामपंथी इस बात से नाराज़ हैं कि अभिनेत्री कंगना रनौत के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ महिला आयोग ने संज्ञान क्यों लिया। साथ ही हाथरस मामले में महिला आयोग द्वारा सक्रियता दिखाए जाने के बावजूद ये अध्यक्ष रेखा शर्मा को घेर रहे हैं, जबकि खुद पीड़िता की पहचान जाहिर कर रहे। ऐसे ही कठुआ की मासूम पीड़िता की पहचान भी जाहिर कर दी गई थी।

दिग्विजय सिंह ने फैलाया फेक न्यूज़

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो हाथरस के पीड़िता की जगह चंडीगढ़ की एक अन्य युवती की तस्वीर लगा दी, जिसकी दो वर्ष पहले ही बीमारी से मौत हो गई थी। इस तस्वीर के वायरल होने से उस युवती के परिजन भी दुःखी हैं। ये तस्वीर मदद की अपील के लिए तब डाली गई थी, जब पीड़िता अस्पताल में थी। दिग्विजय सिंह ने अस्पताल में हाथरस की पीड़िता की तस्वीर के साथ इसे भी शेयर कर दिया।

‘हाथरस दरिंदों के जो भी सिर काट कर लाएगा…’ – कॉन्ग्रेसी नेता निजाम मलिक का बयान, खुद हो गए गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना पर प्रतिक्रियाओं का दौर अभी तक जारी है। ताज़ा मामले में कॉन्ग्रेस नेता निजाम मलिक ने विवादित बयान दिया है। उन्होंने हाथरस की घटना पर कहा है कि जो व्यक्ति आरोपितों का सिर कलम करेगा, उसे उनका समुदाय 1 करोड़ रुपए का इनाम देगा। इस बयान के चर्चा में आने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज करके कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार कर लिया है।

निजाम मलिक कॉन्ग्रेस पार्टी के जिला उपाध्यक्ष हैं। सचिन गुप्ता नाम के यूज़र द्वारा ट्विटर पर साझा किए गए इस वीडियो में निजाम मलिक का बयान साफ़ तौर पर सुना जा सकता है। बयान देते हुए निजाम मलिक ने कहा, “जिन दरिंदों ने बलात्कार किया है, मैं अपने समाज और खुद की तरफ से माँग करता हूँ कि उन्हें फाँसी की सज़ा होनी चाहिए। जो लोग उन अपराधियों का सिर काट कर लाएँगे उन्हें हमारा समाज 1 करोड़ रुपए का इनाम देगा।” 

बयान विवादित होने की वजह से बहुत जल्द सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। जिसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस तुरंत हरकत में आई और निजाम मलिक को मुंडाखेड़ा चौराहे से गिरफ्तार किया। बुलंदशहर पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट करके इस गिरफ्तारी की पुष्टि की। बुलंदशहर पुलिस के ट्वीट में लिखा था, “उक्त संबंध में तत्काल थाना खुर्जानगर पर समुचित धाराओं में अभियोग पंजीकृत कर अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया है।”    

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाथरस मामले की सीबीआई जाँच के आदेश दे चुके हैं। यह फैसला इस मामले की सीबीआई जाँच की माँग के बाद आया था। पीड़िता के पिता ने सीबीआई जाँच की माँग की थी, जिसे यूपी के सीएम ने मान लिया है।

यूपी सीएम दफ्तर की ओर से ट्वीट कर सीबीआई जाँच की जानकारी दी गई थी। यूपी सीएम दफ्तर की ओर से ट्वीट किया गया, “मुख्यमंत्री श्री योगी जी ने सम्पूर्ण हाथरस प्रकरण की जाँच सीबीआई से कराए जाने के आदेश दिए हैं।” इससे पहले, उन्होंने अपराध की जाँच के लिए एक एसआईटी गठित करने का आदेश दिया था।

कॉन्ग्रेसी मंत्री के लिए रेप भी बड़ी और छोटी, कहा- हाथरस में बड़ी घटना हुई, बलरामपुर में छोटी

क्या रेप भी छोटी या बड़ी होती है? यह सवाल हम इसलिए पूछ रहे क्योंकि छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्री शिव डहरिया का ऐसा कहना है। डहरिया के अनुसार हाथरस में बड़ी घटना हुई और उनके राज्य के बलरामपुर में हुई गैंगरेप की घटना छोटी है।

उन्होंने कहा, “हाथरस में बड़ी घटना हुई, रमन सिंह ट्वीट क्यों नहीं कर रहे हैं? बलरामपुर में छोटी सी घटना घटी। छत्तीसगढ़ की आलोचना करने के अलावा उन्होंने कुछ नहीं किया।”

बता दें कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने बलरामपुर गैंगरेप को लेकर सरकार की आलोचना की थी और साथ ही सवाल किया था कि क्या राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी पीड़िता के लिए न्याय की माँग करेंगे।

इसके जवाब में डहरिया ने दुष्कर्म को छोटी घटना बताया है। उनका एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो सामने आया है। इस दौरान उनसे एक पत्रकार ने बलरामपुर में नाबालिग से दुष्कर्म मामले को लेकर प्रश्न कर दिया। जवाब में वह कहते हैं, “हमारे यहाँ जो घटना हुई, वो हाथरस जैसी घटना नहीं है। हाथरस में इतनी बड़ी घटना हुई है, रमन सिंह ट्वीट क्यों नहीं कर रहे हैं। रमन सिंह की जुबान क्यों बंद है। उनको ये जवाब देना चाहिए कि हाथरस में जो घटना हुई, क्या वो अच्छा हुआ है। उसके लिए वो ट्वीट नहीं कर रहे हैं। बलरामपुर में एक छोटी घटना हो गई तो वह ट्वीट कर रहे हैं। वो सिर्फ छत्तीसगढ़ सरकार की आलोचना के सिवा कोई दूसरा काम नहीं कर रहे हैं।”

रमन सिंह का ट्वीट

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 2 अक्टूबर को घटना के बारे में ट्वीट करते हुए लिखा था, “छग के बलरामपुर में नाबालिग के साथ हैवानों ने दरिंदगी की, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार न्याय दिलाने की जगह मामले को दबाने में लग गई। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी में यदि संवेदनाएँ हो तो इस बेटी को भी न्याय दिलाने छग आएँ। भूपेश बघेल से जवाब माँगे। प्रदेश की बेटी को कब मिलेगा न्याय?”

डहरिया के बयान के बाद रमन सिंह ने एक और ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा, “छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस की विकृत मानसिकता देखिए! इन्हें छत्तीसगढ़ की बेटियों के साथ दरिंदगी की घटनाएँ छोटी लगती है। राहुल गाँधी जी बताएँ क्या छत्तीसगढ़ में घट रही दुष्कर्म की घटनाएँ आपके लिए भी छोटी हैं? ऐसी घटिया सोच वाले मंत्री को आप आज हटाएँगे या कल? आखिर कब होगा न्याय?”

मामले में कॉन्ग्रेस की किरकिरी के बाद शिवकुमार डहरिया ने सफाई देते हुए कहा, “मैंने दुष्कर्म के मामले को छोटा मामला नहीं बताया है। किसी भी महिला के साथ किया गया दुष्कर्म हमेशा बड़ा हादसा होता है। मैंने अपना बयान एक क्रम में हो रही घटनाओं को लेकर दिया है ना कि दुष्कर्म को लेकर।”

गौरतलब है कि 27 सितंबर को छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में एक 14 वर्षीय लड़की को नशीला पदार्थ पिलाया गया, उसका बलात्कार किया गया, गला घोंटा गया और फिर मरने के लिए उसे जंगल में छोड़ दिया गया। बलात्कार के बारे में खबर 2 अक्टूबर को सामने आई। 

नाबालिग से बलात्कार के आरोप में पुलिस ने 22 वर्षीय जयप्रकाश अगरिया को गिरफ्तार किया। बयान में, लड़की ने कहा कि वह एक पुरुष मित्र के साथ जंगल में मिट्टी इकट्ठा करने गई थी। अगरिया ने उसे वहीं पकड़ लिया और जबरन एक दवा खिला दी, जिससे वह आंशिक रूप से बेहोश हो गई। घनास्थल पर 19 वर्षीय घनश्याम गोंड भी मौजूद था, जिसने इस कृत्य में उसका साथ दिया। पीड़िता का पुरुष मित्र घटनास्थल से भाग गया था।

‘हिन्दू सुप्रीमेसिस्ट सरकार से डरकर रहते हैं दलित और मुस्लिम’: CM योगी की बर्खास्तगी के लिए कई NGO का UNHRC को पत्र

हाथरस मामले के नाम पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। अब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कई NGO ने मिल कर ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद’ (UNHRC) को पत्र लिख कर हाथरस मामले की अंतरराष्ट्रीय जाँच और सीएम योगी को बर्खास्त करने की माँग की है। इनमें से कई ऐसे हैं जो खुद को फेमिनिस्ट और दलित NGO बताते हैं। इस पत्र पर ब्रिटेन के कुछ सांसदों के अलावा ‘आंबेडकर इंटरनेशनल मिशन’ के कुछ समूह शामिल हैं।

ब्रिटेन के सांसदों जॉन मैक्डोनल, किम जॉनसन, बेल रिबेइरो-एडी और पॉला बेकर शामिल हैं। इन सभी ने मिल कर UNHRC के प्रमुख मिशेल बाचेलेत से कहा है कि वे हाथरस मामले में एक अन्तरराष्ट्रीय जाँच बिठाएँ और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद ‘महिलाओं, खासकर दलितों पर बढ़ रहे अत्याचार’ को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहें कि वो सीएम योगी को तुरंत बर्खास्त करें।

इन संस्थाओं ने UNHRC को लिखे पत्र में कहा है कि हाथरस मामले को एक अलग अपराध की तरह नहीं देखना चाहिए, बाकि इसे ‘दलितों और महिलाओं पर हो रहे क्रमबद्ध हमलों’ के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें भारतीय मीडिया के ही गिरोह विशेष के नैरेटिव को हवा देते हुए दावा किया गया है कि यूपी पुलिस ने जबरदस्ती पीड़िता के शव को रात में ही जला दिया, जबकि परिवार इसके विरुद्ध था।

साथ ही लिखा गया है कि हाथरस मामले के 24 घंटे के भीतर ही राज्य में बलात्कार के 3 बड़े मामले आए। हालाँकि, इसमें बलरामपुर वाली घटना की चर्चा नहीं है, जहाँ शाहिद और साहिल नामक दो आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। भदोही में एक 14 साल की लड़की के बलात्कार के बाद हत्या और आजमगढ़ में 8 साल के मासूम के बलात्कार की घटनाओं का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बर्खास्त करने की माँग की गई है।

इस पत्र को लिखने की पहल अमृत विल्सन ने की, जो मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हैं और लंदन में रहते हैं। वे ‘साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप (SASG)’ से जुड़े हुए हैं। इस काम में उनका साथ दिया है ‘कास्ट वाच यूके’ ने। अमृत विल्सन खुद को ब्रिटेन और दक्षिण एशिया में जाति व लैंगिक भेदभाव का विशेषज्ञ मानते हैं और ‘एक्टिविस्ट’ भी कहते हैं। इस वर्ष फ़रवरी में वो कोलकाता भी आए थे। SASC लगातार ट्विटर पर इसे लेकर प्रोपेगेंडा फैलाने में लगा है।

उन्होंने TOI से कहा कि हाथरस मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत शर्मसार हुआ है। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने जिस तरह से ‘हाथरस में इस भयावहता को अंजाम दिया है’, उससे दुनिया भर के दलित और महिला एक्टिविस्ट्स आक्रोशित हैं। उन्होंने शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) को कहा कि सीएम योगी को तो सत्ता से बेदखल होना ही चाहिए लेकिन अंततः मोदी सरकार ही है, जिसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

जब पूछा गया कि रेप तो अन्य राज्यों में भी हो रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि 2016 के बाद से सबसे ज्यादा बलात्कार की घटनाएँ उत्तर प्रदेश में हुई हैं, जो 16% हैं। उन्होंने योगी सरकार को ‘हिन्दू सुप्रीमेसिस्ट गवर्नमेंट’ करार देते हुए कहा कि उनके द्वारा फैलाई गई हिंसा के कारण मुस्लिम और दलित डर कर रहते हैं। लंदन की आर्किटेक्ट सोफ़िया करीम ने भी इस पर हस्ताक्षर किया है, जो भारत की सरकार को फासिस्ट कहती हैं।

हाथरस मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था, “दोषियों को सजा देना प्रशासन की ज़िम्मेदारी है।” सीएम ने कहा, “लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए पुलिस किसी भी हद तक जा सकती है और सरकार सजा देने के कानूनी तरीकों में भी बदलाव कर सकती है।” उन्होंने कहा कि एक तरफ, हमें दोषियों के साथ सख्त रहना पड़ता है तो दूसरी तरफ, हमें पीड़ितों के साथ नरमी बरतनी चाहिए।