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सुपर कम्युनिस्ट शास्त्री: बेटी इंदिरा के हाथ में देश सौंपने के लिए नेहरू ने मृत्यु से पहले ही कर लिए थे पूरे इंतजाम

‘Who After Nehru’ यानी, ‘नेहरू के बाद कौन?’ मई 27, 1964 को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्नों पर यही प्रमुख शीर्षक था।

1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाला। जिस तरह से ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल को ‘वॉर टाइम प्राइम मिनिस्टर’ कहा जाता है, उसी तरह से यदि लाल बहादुर शास्त्री को भी एक ऐसे समय में चुने गए प्रधानमंत्री की संज्ञा दी जाए, जब भारत हर तरफ से संकट से घिरा हुआ था तो इसमें कुछ भी गलत नहीं होगा।

प्रधानमंत्री बनने के लिए शास्त्री जी का जनादेश आसान नहीं था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद राष्ट्र का नेतृत्व करने की उनकी क्षमता को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर एक खंडित सहमति थी। वहीं, 1962 की हार और एक गंभीर खाद्य संकट से जूझने के बाद भारत का मनोबल गिर गया था। 1965 में पाकिस्तान इस ‘कमजोर नेतृत्व’ का फायदा उठाना चाहता था। उम्मीदों के विपरीत, शास्त्री जी ने शुरू से ही संसद में भाषणों के माध्यम से सीमा पर पाकिस्तानी उकसावे का जवाब दिया, जिससे भारत की सीमाएँ और भावना स्पष्ट हो गईं। वह पकिस्तान के राष्ट्रपति खान को यह कठोर संदेश दे चुके थे कि दृढ़ संकल्पित राष्ट्र भारत की इच्छा नहीं है कि पाकिस्तानी क्षेत्र के एक वर्ग इंच का भी अधिग्रहण करे लेकिन कभी भी कश्मीर, जो कि भारत का अभिन्न अंग है, में पाकिस्तान द्वारा किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा।

भारत तब किन हालातों से गुजर रहा था इसका अंदाजा नेहरू की मौत के बाद सी राजगोपालाचारी द्वारा कही गई बातों से लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा था,

“अब भारत के सामने सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित कर पाने में असमर्थता या फिर इस महत्वपूर्ण मुद्दे की उपेक्षा है। कम्म्युनिस्ट आक्रामकता भारत और पाकिस्तान के सभी समझदार लोगों की पहली चिंता होनी चाहिए। मुझे यह भी लगता है कि आर्थिक धरातल पर अब सबसे बड़ा खतरा महंगे टैक्सेशन की नीति और अब तक की योजनाबद्ध सोवियत शैली की योजना भी महँगाई की ओर ले जा रही है। जनसंख्या का महत्वपूर्ण तत्व, जिस पर लोकतंत्र निर्भर करता है, मुद्रास्फीति और कराधान के बीच कुचल दिया जाता है। सामान्य शब्दों में कहें, तो सबसे बड़ा खतरा अब नई सरकार के लिए चली आ रही नीतियों में बदलाव का है।”

नेहरू की मौत के बाद प्रधानमंत्री का चुनाव

नेहरू की मौत के बाद शुरु हुई अगले प्रधानमंत्री की खोज और ये जिम्मेदारी दी गई उस वक्त कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के कामराज को दिया गया। वर्तमान समय में कई लोग, खासकर कॉन्ग्रेस के ही कुछ कद्दावर नेता यह तर्क देते हुए कि कॉन्ग्रेस में गैर-गाँधी/नेहरू परिवार से पहले प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ही थे। जाहिर सी बात है कि कॉन्ग्रेस के समर्थकों द्वारा दिए जाने वाले यह कुतर्क सिर्फ इस राजनीतिक दल में व्याप्त ‘डायनेस्टी पॉलिटिक्स’ के सत्य पर पर्दा डालने के लिए ही इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।

नेहरू की मृत्यु के बाद तत्कालीन कॉन्ग्रेस जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई और इंदिरा गाँधी के खेमें में बँट चुकी थी। लेकिन एक ओर जहाँ मोरारजी देसाई किसी भी सूरत में मानने को राजी नहीं थे तो वहीं के कामराज खुद मोरारजी देसाई को देश की बागडोर नहीं सौंपना चाहते थे।

लेकिन क्या लाल बहादुर शास्त्री ही तब कॉन्ग्रेस की पहली पसंद थे या यह बस इंदिरा गाँधी को सत्ता तक लाने का एक जरिया मात्र था? वास्तव में, इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की जो रणनीति जवाहरलाल नेहरू ने बनाई थी, उसे धरातल तक लाने का काम के कामराज ने ही किया था। वह जानते थे कि अगर मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बनते हैं, तो आगे चलकर इंदिरा गाँधी की राजनीति की राह कठिन हो जाएगी।

यही वो समय था जब कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के कामराज ने अप्रत्याशित तरीके से लाल बहादुर शास्त्री का नाम प्रधानमंत्री पद के लिये प्रस्तावित किया और सारे बड़े नाम धराशाई हो गए।

जवाहरलाल नेहरू के मन में अपने उत्तराधिकारी के तौर पर हमेशा से ही उनकी बेटी इंदिरा गाँधी थी। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि खुद लाल बहादुर शास्त्री ने दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैय्यर से कही थी। इसका जिक्र कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में किया है।

कुलदीप नैय्यर ने लिखा, ”एक बार मैंने शास्त्री का मन टटोलते हुए पूछा था कि नेहरू का उत्तराधिकारी कौन होगा? तो शास्त्री ने कहा था कि उनके (नेहरू) दिल में तो उनकी सुपूत्री (इंदिरा गाँधी) हैं। लेकिन ये आसान नहीं होगा।”

कुलदीप नैय्यर ने अपनी इस पुस्तक में इस बात का भी खुलासा किया कि लाल बहादुर शास्त्री नेहरू के दिमाग में अपने उत्तराधिकारी के लिए पहले विकल्प नहीं हैं। इन सभी घटनाक्रमों का भविष्य में क्या प्रभाव पड़ा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंदिरा गाँधी लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद दिल्ली में उनकी समाधि बनाने के पक्ष में नहीं थी।

कुलदीप नैय्यर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने जब आमरण अनशन की धमकी दी तो मामले की गंभीरता को समझते हुए इंदिरा को फैसला बदलना पड़ा और दिल्ली में शास्त्री जी की समाधि बनवानी पड़ी।

इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने की क्रोनोलॉजी

जवाहरलाल नेहरू ने इंदिरा गाँधी को सिर्फ 42 साल की उम्र में कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष बनने में मदद की। कॉन्ग्रेस में वंशवाद की राजनीति का पहला चरण यही था। नेहरू की मृत्यु के बाद, इंदिरा गाँधी को राज्यसभा भेजा गया और शास्त्री सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। लाल बहादुर शास्त्री जी के देहांत के तुरंत बाद इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री बन गई थी।

जो लोग यह दावा करते हैं कि नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बनने की रेस में इंदिरा गाँधी का नाम तक नहीं लिया गया था उन्हें ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की उस खबर का हवाला दिया जाना चाहिए जिसमें नेहरू की मृत्यु से ठीक 5 महीने पहले ही जनवरी 09, 1964 को नेहरू के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में इंदिरा गाँधी का उल्लेख किया गया था।

नेहरू और शास्त्री की मौत के बाद सत्ता परिवर्तन का गवाह बने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता डीपी मिश्रा, नेहरू के इस पूरे खेल की योजना बताते हुए कहते हैं –

“नेहरू द्वारा विकसित की गई रणनीति के अनुसार, अपनी बेटी को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार किया जाना था, फिर मोरारजी देसाई और जगजीवन राम – दो महत्वाकांक्षी, सक्षम और प्रभावशाली प्रतिद्वंद्वियों को हटाना, और अंत में सरकार और कॉन्ग्रेस, दोनों को ऐसे पुरुष के हाथों में देना होगा जिसे उनकी बेटी द्वारा आसानी से हटाया जा सकता हो।”

“कामराज योजना के माध्यम से, उन्होंने अपनी सरकार से देसाई और जगजीवन राम को हटा दिया। कामराज को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुना गया और सरकार को गुलजारीलाल नंदा, टीटी कृष्णामाचारी और लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में छोड़ दिया।”

‘सुपर कम्युनिस्ट लाल बहादुर शास्त्री’

शास्त्री जी को रूस में ‘सुपर कम्युनिस्ट’ बुलाए जाने की घटना से शायद ही बहुत लोग वाकिफ हों। दरअसल, जनवरी 03, 1966 में ताशकंद के दौर पर गए लाल बहादुर शस्त्री ने तत्कालीन सोवियत संघ के अपने समकक्ष अलेक्सी कोशिगिन (Alexei Kosygin) द्वारा उपहार में दिए गए कोट को अपने साथ गए एक स्टाफ को दे दिया था। इससे प्रेरित होकर रूसी प्रधानमंत्री कोशिगिन ने उन्हें ‘सुपर कम्युनिस्ट’ कहा था।

जब शास्त्री जी रूस पहुँचे तो उनके शरीर पर उन्हें ठंड से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े तक नहीं थे। यह देखकर कोशिगिन ने शास्त्री जी को एक ओवरकोट उपहार में दिया था। उनका कहना था कि ‘मैंने इसे अपने एक स्टाफ को दे दिया, जो कड़ाके की ठंड में पहनने के लिए अच्छा ऊनी कोट नहीं लाया था।’

इस पर कोशिगिन ने शास्त्री और जनरल अयुब खान के सम्मान में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में इस घटना का जिक्र करते हुए कहा, “हम बस नाम के कम्युनिस्ट हैं, लेकिन शास्त्री सुपर कम्युनिस्ट हैं।”

शास्त्री जी के जीवन मूल्य और उनके जीवन से जुड़े कई ऐसी पहलू हैं, जो उन्हें किसी भी समय और काल के राजनेता से कहीं ऊपर साबित करते हैं लेकिन शास्त्री जी के व्यक्तित्व को समेट पाना इतना भी आसान नहीं है।

इस चित्र में शास्त्री जी के निधन के 3 महीने बाद उनकी पत्नी ललिता शास्त्री इस फसल को काट रही हैं। शास्त्री जी ने 10 जनपथ पर यह फसल खाद्य संकट के दौरान देशवासियों को प्रेरित करने के लिए उगाई थी।

चाहे कर्ज लेकर फ़िएट कार खरीदने की घटना हो, अकाल के समय अपने घर पर खेती कर देशवासियों को संदेश देने का उदाहरण या फिर सादे जीवनशीली के कारण रूस में ‘सुपर कॉमरेड’ कहलाए जाने की घटना हो, शास्त्री जी के रूप में इस देश को अकस्मात् ही सही लेकिन एक विराट व्यक्तित्व मिला था, जिसे कि दुर्भाग्यवश हमने शायद बहुत ही कम समय में खो भी दिया।

लाल बहादुर शास्त्री ने मात्र अपने 18 महीने के कार्यकाल में ही ‘नेहरू के बाद कौन?’ जैसे सवालों का बेहद सटीक जवाब दे दिया था। बेहद आम, सरल स्वभाव के शास्त्री जी ने महज 18 महीनों में नेहरू को कद के सामने एक ऐसी और कहीं अधिक मजबूत तस्वीर पेश कर डाली थी, जिसका एकमात्र ध्येय भारत निर्माण था। और ऐसा उन्होंने समकालीन नेताओं की तरह अंतरराष्ट्रीय पत्राचार, सैद्धांतिक भाषण या फोटोग्राफ से नहीं बल्कि अपने द्वारा किए गए कार्यों से कर के दिखाया। एमके गाँधी जिस परिवर्तन की बात करते थे, शास्त्री जी वो परिवर्तन स्वयं बने।

प्राइम टाइम में अर्नब का डंका, 77% दर्शक देखते हैं रिपब्लिक; राजदीप और NDTV के शो दर्शकों के लिए तरसे

अर्नब गोस्वामी ने जब से अपना न्यूज चैनल रिपब्लिक टीवी लॉन्च किया है तभी से उनके इस चैनल ने समाचार जगत में टॉप पोजिशन बनाई हुई है। अपने आरंभ के साथ ही इंग्लिश न्यूज सेक्टर में शीर्ष स्थान बना लेने वाले इस मीडिया नेटवर्क के हिंदी चैनल ‘रिपब्लिक भारत’ ने भी व्यूअरशिप डेटा में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया है।

रिपब्लिक टीवी का यह हिंदी चैनल दशकों से चले आ रहे इंडिया टीवी, आजतक, एनडीटीवी इंडिया को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ा है। इसकी जानकारी ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ऑफ इंडिया (BARC) ने जारी की है।

हालाँकि, इन आँकड़ों के साथ ही अब जब रिपब्लिक नेटवर्क के दोनों चैनल प्रतिस्पर्धा में आगे निकल गए हैं, प्राइम टाइम में अर्नब गोस्वामी और अन्य शीर्ष एंकर के बीच का अंतर और भी व्यापक हो गया है।

BARC के ताजा आँकड़ो के अनुसार, रात 9 बजे का स्लॉट, जो प्राइम टाइम का होता है और जिसे समाचार चैनलों के शीर्ष एंकर होस्ट करते हैं, उसमें भी रिपब्लिक टीवी की व्यूअरशिप अन्य अंग्रेजी समाचार चैनलों की तुलना में बहुत अधिक है।

इंग्लिश चैनल का 19 से 25 सितंबर तक का BARC डेटा
हिंदी चैनल का 19 से 25 सितंबर तक का BARC डेटा

गौरतलब है कि अर्नब गोस्वामी रिपब्लिक टीवी पर “द डिबेट विद अर्नब गोस्वामी एट 9” शो होस्ट करते हैं। उसी समय पत्रकार राजदीप सरदेसाई इंडिया टुडे पर न्यूज़ टुडे को होस्ट करते हैं और नविका कुमार टाइम्स नाउ पर न्यूजऑवर को होस्ट करती हैं। टाइम्स नाउ में रहते अर्नब गोस्वामी इस शो को होस्ट करते थे।

9 बजे के स्लॉट के लिए रिपब्लिक टीवी का मार्किट शेयर 77.18% है, जिसका मतलब है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल देखने वाले हर पाँच में से चार दर्शक ने रात 9 बजे अर्नब गोस्वामी के मशहूर डिबेट डिस्कशन को देखा है।

इस कड़ी में 7.56% के साथ अगला नंबर CNN News18 है। इसके बाद 7.02% के साथ तीसरे स्थान पर इंडिया टीवी है। CNN News18 के शो ब्रास ट्रैक को ज़क्का जोकोब द्वारा होस्ट किया जाता है, वहीं इंडिया टुडे के कार्यक्रम को राजदीप सरदेसाई होस्ट करते हैं।

वहीं NDTV के आँकड़ों को जान कर आप चौक जाएँगे। उसके 9PM डिबेट शो का डेटा मात्र 1.30% है। NDTV के रात 9 बजे का शो विष्णु सोम होस्ट करते हैं।

उल्लेखनीय है कि रिपब्लिक भारत भी 9 बजे के स्लॉट में सबसे टॉप स्थान पर है। हालाँकि यहाँ कंपीटिशन में अंतर अंग्रेजी चैनलों के विपरीत है। चैनल का रात 9 बजे के स्लॉट का शेयर 15.8% है। वहीं ज़ी न्यूज़ का 14.28%, आजतक का 14.06%, न्यूज़ 18 इंडिया का 12.22% और इंडिया टीवी के 11.58% शेयर डेटा सामने आया है।

अर्नब गोस्वामी का चैनल उन मुद्दों पर आवाज उठाने की वजह से चर्चा में आया है, जिन मुद्दों पर इंडिया टुडे और एनडीटीवी जैसे चैनलों ने चुप्पी साध ली थी या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे थे। जैसे हाल ही का सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में लगातार कवरेज। आँकड़ों से पता चलता है कि उनके कार्यक्रमों को दर्शकों द्वारा पसंद किया जाता है। 75% से अधिक दर्शक उनके शो को देखते हैं। दूसरी और जो चैनल अर्नब की खिंचाई करने में पीछे नहीं रहते, उनके 9 बजे के स्लॉट के आँकड़े मार्किट में एक डिजिट से भी कम है।

लॉकडाउन, मास्क, एंटीजन टेस्ट… कोरोना को रोकने के लिए भारत ने समय पर लिए फैसले, दुनिया ने किया अनुकरण

भारत में कोरोना संक्रमण के मामले अब धीरे-धीरे 63 लाख का आँकड़ा पार कर चुके हैं। पिछले 24 घंटों की यदि बात करें तो पॉजिटिव केसों की संख्या 86 हजार से अधिक आई है। इसी के साथ भारत हर दिन सबसे अधिक नए कोरोना केस और मौतें रिकॉर्ड करने वाला देश बन गया है।

ऐसे में कई लोगों को लगता है कि भारत ने कोरोना संक्रमण को रोकने के नाम पर अपनी प्रतिक्रिया का केवल प्रचार ही किया है और उचित कदम नहीं उठाए हैं। इन दावों की पड़ताल करते हुए ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) के सीनियर फेलो और हेल्थ इनिशिएटिव के हेड ओसी कुरियन ने इस पर अपनी बात रखी है। उन्होंने ट्वीट थ्रेड में एंटीजन, मास्क और लॉकडाउन सब पर चर्चा की है।

वह लॉकडाउन से बात शुरू करते हैं और बताते हैं कि लॉकडाउन को एक आपदा कहना फैशन हो गया है, जबकि लॉकडाउन का मकसद कोरोना के प्रसार पर रोक लगाना था। साथ ही लॉकडाउन से हेल्थ सिस्टम को अच्छे से तैयारी करने का मौका भी मिला।

आगे वह कहते हैं कि यह बहस हो सकती कि लॉकडाउन को कैसे लंबे समय तक के लिए लागू किया गया था। लेकिन उसी दौरान, ये ध्यान में रखना होगा कि लॉकडाउन एकमात्र साधन था जिससे हम महामारी से होने वाले नुकसान को कम कर सकते थे और इससे निपटने के लिए थोड़ा समय ले सकते थे। आज मृत्यु दर के आँकड़े देखकर हम इस बात की शिकायत नहीं कर सकते कि इससे संक्रमण पर फर्क नहीं पड़ा।

इसके बाद वह भारत के उन निर्णय पर गौर करवाते हुए कहते हैं कि जब सरकार ने रैपिड एंटीजन टेस्ट को बढ़ावा दिया था, तब भारतीय विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया था। मगर अब WHO ही रैपिड टेस्ट का विज्ञापन पूरी दुनिया में कर रहा है। ध्यान रखने वाली बात हैं कि भारत ने रैपिड टेस्टिंग का फैसला लॉकडाउन रहते ही ले लिया था।

आगे वह बताते हैं कि जून तक भी WHO इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं था कि जनता को मास्क पहनने से फायदा होगा या नहीं। मगर, 130 करोड़ जनसंख्या वाले भारत में बड़े भागों में इसे अप्रैल से पहले ही कंपल्सरी कर दिया गया। अमेरिका में मास्क अनिवार्य 5 जुलाई किया गया था।

वह लिखते हैं कि भारत एक जटिल देश हैं और निश्चित रूप से उसके लिए महामारी से निपटना बड़ी चुनौती है। प्रणालीगत कमजोरियों को देखते हुए, भारत के राज्य और केंद्र, संक्रमण की बढ़ती संख्या के बावजूद मृत्यु दर को कम रखने और उसमें गिरावट को लेकर, एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य को कर रहे हैं। हम विफल नहीं हुए हैं।

UP: भदोही में 14 साल की दलित बच्ची की सिर कुचलकर हत्या, बिना कपड़ों के शव खेत में मिला

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक दलित नाबालिग किशोरी का शव खेत से बरामद किया गया है। 14 साल की किशोरी की सिर कुचलकर हत्या की गई है। परिजनों ने बलात्कार की आशंका भी जताई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना भदोही के गोपीगंज कोतवाली क्षेत्र की है। 14 वर्षीय दलित नाबालिग दोपहर के वक़्त शौच के लिए खेत की तरफ गई थी। काफी देर तक वह नहीं लौटी तो परिजनों ने खेत की तरफ जाकर उसे खोजा। वहाँ उसकी खून से सनी लाश पड़ी थी। उसका सिर कुचल दिया गया था।

नाबालिग लड़की को तुरंत पास के अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। उसका सर किसी बड़े पत्थर की कुचला गया था। उसके शरीर पर कपड़े भी नहीं थे।

घटना की जानकारी प्राप्त होते ही पुलिस मौके पर पहुँच गई। शव को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। परिजनों ने आशंका जताई है कि उनकी बेटी को रेप के बाद मारा गया है। पुलिस ने वारदात स्थल की जाँच पड़ताल की साथ ही फोरेंसिक एक्सपर्ट और क्राइम ब्रांच की टीम को भी मौके पर जाँच के लिए बुलाया गया।

भदोही पुलिस ने इस मामले में ट्विटर पर जानकारी देते हुए बताया कि 14 वर्ष की किशोरी की हत्या अज्ञात व्यक्तियों द्वारा ईंट-पत्थर से मारकर हत्या कर दी गई है। थाना गोपीगंज पुलिस द्वारा घटना के सम्बन्ध में हत्या का अभियोग पंजीकृत किया गया है।

वहीं मामले में पुलिस अधीक्षक ने बताया उसके साथ दुष्कर्म हुआ है या नहीं, ये पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चल सकेगा। फिलहाल मौके पर जिले के आला अधिकारी के साथ भारी पुलिस बल तैनात है। पुलिस अधीक्षक के मुताबिक अपराधियों की खोजबीन की जा रही है।

इंडिया टुडे के राहुल कँवल, हिन्दी नहीं आती कि दिमाग में अजेंडा का कीचड़ भरा हुआ है?

हाथरस मामले में जिस तरह से मीडिया गिरोह के लोगों ने अपने प्रोपेगेंडा को भुनाया है, उसे देख कर यही लगता है मानो उन्हें किसी ऐसी ही घटना के होने का इंतजार था। हर एंगल को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। पीड़ित परिवार का दुख तो मानो ऐसे लोगों से कोसो दूर है। ताजा कारनामा इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कँवल ने कर दिखाया है। 

राहुल कँवल ने योगी सरकार से घृणा व्यक्त करने और यूपी प्रशासन की छवि खराब करने के लिए अपने सोशल मीडिया फॉलोवर्स को बरगलाने की कोशिश की है। उन्होंने ट्विटर पर मृतका के पिता और जिलाधिकारी के बीच बातचीच का एक वीडियो शेयर किया है।

इसमें साफ सुना जा सकता है कि जिलाधिकारी मृतका के पिता को समझा रहे हैं कि मीडिया वाले ज्यादा दिन वहाँ नहीं रहने वाले। कुछ अभी चले गए हैं और कुछ कल चले जाएँगे। ऐसे में उनके साथ सिर्फ़ वही (प्रशासन) खड़े रहेंगे। इसलिए वह बार-बार अपने बयान न बदलें।

वे कहते हैं, “आप अपनी विश्वसनीयता खत्म मत करिए। ये मीडिया वाले, मैं आपको बता दूँ, आज अभी आधे चले गए, कल सुबह तक आधे और निकल जाएँगे, दो-चार बचेंगे कल शाम तक। हम आपके साथ खड़े हैं। अब आपकी इच्छा है कि आपको बार बार बयान बदलना है कि नहीं बदलना है।”

जिलाधिकारी के उक्त बयान से साफ पता चल रहा है कि वे पीड़िता परिवार के साथ खड़े होने की बात कर रहे हैं। मगर अब राहुल कँवल जिलाधिकारी की इसी बात को ऐसे लिखते हैं जैसे जिलाधिकारी किसी कोने में ले जाकर मृतका के पिता से बात कर रहे हों और किसी ने चुपचाप उनका स्टिंग कर लिया।

राहुल लिखते हैं, “हाथरस के जिलाधिकारी  कैमरे पर पीड़ित परिवार को भयभीत करते पकड़े गए।” राहुल का दावा है कि जिलाधिकारी कह रहे हैं, “आधा मीडिया चला गया है। आधा जल्दी चला जाएगा। हम ही यहाँ बचेंगे।”

गौर करिए कि एक ओर जहाँ वीडियो में जिलाधिकारी स्पष्ट तौर पर कह रहे हैं कि वही लोग उनके साथ खड़े रहेंगे। उसमें राहुल चंद शब्दों के फेर बदल से कैसे उसे अपने अजेंडा के लिए तैयार कर रहे हैं। राहुल आगे पूछते हैं कि अगर वरिष्ठ अधिकारियों का ही यह बर्ताव होगा तो निष्पक्ष जाँच कैसे हो पाएगी। 

राहुल के ट्वीट और जिलाधिकारी की ऑडियो सुनकर विचार करने वाली बात ये है कि आखिर क्या इंडिया टुडे ने ऐसे पत्रकारों को अपने संस्थान का बड़ा चेहरा बनाया हुआ जिन्हें भावानुवाद की इतनी भारी समस्या है कि वो भाषा बदलने भर से सारी बातचीत का भाव ही बदल दें? या फिर ये राहुल कँवल के खुद के अजेंडे का हिस्सा है कि सब कुछ जानने-सुनने-समझने के बाद भी वह केवल आदतों से बाज नहीं आना चाहते।

प्रियंका गाँधी ने भी शेयर की थी वीडियो, पीछे से आ रही थी आवाज

गौरतलब है कि इससे पहले एक वीडियो कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी ने पोस्ट की थी। इस वीडियो में मृतका के पिता आरोप लगा रहे थे कि उन पर दबाव बनाया गया। हालाँकि, वीडियो में यह स्पष्ट सुनाई पड़ रहा था कि कोई उन्हें बैकग्राउंड से वैसी बात कहने को बोल रहा है। इस वीडियो में सीबीआई जाँच की माँग कर रहे थे।

कठुआ कांड की तरह ही मीडिया लिंचिंग की साजिश तो नहीं? 31 साल पहले भी 4 नौजवानों ने इसे भोगा था

शहर एक नए किस्म के अपराधियों से परेशान था। ये लड़कों के छोटे-छोटे समूहों में होते थे और लोगों पर हमला कर उनके साथ मारपीट और लूटपाट किया करते थे। ‘वाइल्डिंग’ नाम के ऐसे समूह 1989 के दौर में अमेरिका के न्यूयॉर्क में खासे कुख्यात थे।

न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में वसंत की एक शाम 1989 में ऐसे ही एक ‘वाइल्डिंग’ गिरोह के हमले की खबर आई। इसे ‘सेंट्रल पार्क जॉग्गर केस’ बुलाया जाता है। तृषा मिली नाम की 28 साल की एक युवती जो शाम के वक्त जॉगिंग करने गई थी, उस पर हमला कर उसे बेहोश कर दिया गया और फिर उसके साथ बलात्कार किया गया था।

उस शाम ये इकलौता हमला नहीं था। उस शाम ‘वाइल्डिंग’ गिरोहों ने सेंट्रल पार्क में ही 8 दूसरे हमले किए थे। कई लोगों को चोटें आई थीं, और लूटपाट भी हुई थी। इस बलात्कार की घटना पर हंगामा मच गया। न्यूयॉर्क पुलिस डिपार्टमेंट के साथ-साथ फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) पर भी इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाने का दबाव था। अमेरिका के लिए 80-90 के दशक नारीवादी आंदोलनों और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के बढ़ते मामलों का दौर था तो सभी नारीवादियों ने इस मामले पर जमकर लिखा-बोला।

अमेरिकी (और इसाई) लोगों पर जो रंगभेद के आरोप लगते हैं, उसने भी अपनी भूमिका निभाई। पीड़िता गोरी थी और 5 लड़के जो इस मामले में पकड़े गए थे, वे सभी अश्वेत थे। गिरफ्तार लड़कों में से सिर्फ कोरी वाइज ही 16 साल का था। बाकी चारों कम उम्र के थे इसलिए उन्हें जुविनाइल होम में सजा काटने भेजा गया। कोरी वाइज को जेल में डाल दिया गया। इन लोगों को 5 से 15 वर्ष तक की सजा हुई थी। अपराधियों ने अपना जुर्म स्वीकार लिया था, सजा हो गईं, लेकिन वो डीएनए टेस्टिंग का दौर नहीं था। बलात्कार एक ने किया था या सभी ने ये भी पता नहीं चला।

कई वर्ष बीत गए और 2001 में एक दिन मटियास रीज़ ने स्वीकार किया कि 29 अप्रैल 1989 की शाम इन लड़कों ने नहीं, बल्कि उसने अकेले ही तृषा मिली का बलात्कार किया था! इस बयान के आधार पर मामले की जब दोबारा जाँच हुई तो पता चला कि सचमुच ऐसा ही था।

गिरफ्तार करके सजा भुगतने वाले पाँचों लड़कों के सभी रिकॉर्ड से उनके जेल जाने और बलात्कार के अपराधी होने को मिटाया गया। इन्हें जो 41 मिलियन डॉलर का मुआवजा मिला, वो न्यूयॉर्क शहर के इतिहास में सबसे ज्यादा था। ओपरा विनफ्रे ने हाल ही में इन लड़कों की कहानी पर एक डॉक्यूमेंट्री श्रृंखला “व्हेन दे सी अस” बनाई है जो कि खासी चर्चित भी रही।

भारत के लिहाज से ऐसी घटनाओं को देखें तो फिल्मों के जरिए जो नैरेटिव गढ़ा जाता है उसका ठाकुर अत्याचारी, लाला पैसे चुराने वाला कपटी और ब्राह्मण धूर्त ही दिखाते हैं। ऐसे में जब शोषित समाज के वंचित कहे जाने वाले तबकों से हो और आरोपित तथाकथित ऊँची मानी जाने वाली जातियों से, तो मीडिया लिंचिंग के लिए एक बढ़िया मौका तैयार हो जाता है।

खुद को नारीवादी घोषित करते बुद्धिपिशाच मामले में जाति का एंगल घुसेड़ते हैं। परंपरागत रूप से हिन्दू समाज में होने वाले तथाकथित शोषण का तड़का और ‘बेटियाँ बचेंगी क्या?’ के सवाल का छौंका लगाते हैं। अपराध के अनुसंधान से पहले ही मामले में आरोपित को अपराधी घोषित कर दिया जाता है।

वैसे देखा जाए तो इसमें कानूनों का दोष भी कम नहीं है। आम अपराधों की तरह बलात्कार में ‘अपराध सिद्ध होने तक निर्दोष (Innocent until proven guilty)’ के सिद्धांत पर नहीं, बल्कि ‘स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने तक अपराधी (Guilty until proven otherwise)’ के सिद्धांत पर मुकदमा चलता है।

हाथरस कांड के आरोपितों में से एक, रामकुमार के पिता बताते हैं कि रामकुमार 14 सितंबर को हर रोज की तरह सुबह 7 बजे फैक्ट्री के लिए निकला था। वहाँ के सीसीटीवी और हाजिरी के रजिस्टर की जाँच होगी।

क्या कठुआ की तरह बुद्धि-पिशाचों ने फिर एक बेक़सूर की मीडिया लिंचिंग की तैयारी की है? जब तक मामला अदालत की सुनवाई तक नहीं पहुँचता, तब तक बुद्धिपिशाचों के नोंचने के लिए कुछ नौजवान तो हैं। फिर अदालत से बरी हुए भी तो क्या, उसे ये “इंसाफ की हत्या” कह देंगे!

1000 साल लगे, बाबरी मस्जिद वहीं बनेगी: SDPI नेता तस्लीम रहमानी ने कहा- अयोध्या पर गलत था SC का फैसला

सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव तस्लीम रहमानी ने अयोध्या में फिर से बाबरी मस्जिद बनाने की धमकी दी है। यह भड़काऊ टिप्पणी उन्होंने ज़ी न्यूज़ पर कृष्ण जन्मभूमि मुद्दे पर चल रही डिबेट के दौरान अपने सह-पैनेलिस्ट के धमकी देते हुए की। रहमानी ने कहा कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद फिर से बनाई जाएगी, भले ही 1000 साल लगें।

एक तरफ जहाँ रहमानी ने कहा कि वह संविधान और सर्वोच्च न्यायालय में विश्वास रखते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर सवाल भी खड़ा कर दिया। तस्लीम रहमानी ने कहा, मस्जिद वहाँ थी, वहाँ है और वहीं रहेगी।” उसने कहा, “एक हजार साल भी अगर लग गया तो भी वहीं मस्जिद बनेगी। मैं फिर दोहरा रहा हूँ। मस्जिद थी, मस्जिद है, मस्जिद रहेगी।”

जब एंकर ने रहमानी को दोहरे मापदंड रखने के लिए लताड़ा तो उन्होंने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट में विश्वास रखते हैं, इसलिए उसके गलत फैसले को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा,” सुप्रीम कोर्ट को मानते हैं इसलिए तो गलत फैसले पर भी सब्र किया।”

बेंगलुरु दंगे में SDPI की भूमिका

गौरतलब है कि एसडीपीआई पर अगस्त में बेंगलुरु में हुए भयावह दंगों में शामिल होने का आरोप है।था। दंगों की जाँच कर रही राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने भीड़ को उकसाने के लिए बेंगलुरु की सड़कों पर हिंसा भड़काने के लिए एसडीपीआई नेता मुज़म्मिल पाशा को गिरफ्तार किया था।

मिलिए, छत्तीसगढ़ के 12वीं पास ‘डॉक्टर’ निहार मलिक से; दवाखाना की आड़ में नर्सिंग होम चला करता था इलाज

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में 12वीं पास युवक द्वारा चलाए जा रहे फर्जी नर्सिंग होम का पर्दाफाश हुआ है। फर्जी डॉक्टर बन निहार मलिक नर्सिंग होम चला रहा था। बलरामपुर जिले के वाड्रफ नगर विकास खंड के बरतीकला गाँव से आने वाले मरीजों का इलाज भी करता था।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार मामले में खुलासा तब हुआ जब छत्तीसगढ़ में लागू नर्सिंग होम एक्ट के सफल संचालन और तय मानकों के अनुरूप सुविधाएँ उपलब्ध कराने की मंशा से टीम बलरामपुर इलाके में पहुँची। बता दें इन दिनों बलरामपुर में जाँच अभियान चलाया जा रहा है। खबरों के अनुसार, एसडीएम विशाल महाराणा के नेतृत्व में स्वास्थ्य और राजस्व विभाग की एक टीम ने कई शिकायतें मिलने के बाद बरतीकला में दीप मेडिकल स्टोर पर छापा मारा।

जब टीम के सदस्य वहाँ पहुँचे तो उन्होंने संचालक निहार से दवा दुकान संचालन को लेकर दस्तावेज प्रस्तुत करने का आदेश दिया, जिस पर वह हड़बड़ा गया। उसके पास फार्मासिस्ट का लाइसेंस नहीं था। अधिकारियों के कहने पर फर्जी डॉक्टर ने दस्तावेज के नाम पर खुद का 12वीं का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत किया, जिसमें गलत तरीके से डॉक्टर भी लिखा हुआ था।

इसके बाद एसडीएम विशाल महाराणा, नायब तहसीलदार विनीत सिंह और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की टीम मेडिकल स्टोर के पीछे एक चार बेड वाला नर्सिंग होम देख अवाक रह गई। मलिक के फर्जी नर्सिंग होम में उस वक्त बुखार से पीड़ित एक महिला भी भर्ती थी, जिसका वह इलाज कर रहा था।

वहीं जब महिला मरीज के बारे में टीम ने मलिक से पूछताछ की तो पता चला कि महिला को केवल बुखार था, लेकिन टाइफाइड के लिए उसका इलाज किया जा रहा था। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, क्लीनिक में कई ऐसी दवाइयाँ भी मौजूद थी, जिन्हें विशेषज्ञ डॉक्टर भी इस्तेमाल करने से बचते हैं। यह जानकारी भी सामने आई है कि इलाज के लिए हाई एंटीबायोटिक सहित अन्य साइड इफेक्ट वाली दवाओं का भी उपयोग किया जा रहा था।

गौरतलब है कि नियमों का उल्लंघन करने पर मेडिकल स्टोर और क्लीनिक को सील कर दिया गया है। मलिक को अधिकारियों द्वारा दस्तावेजों पेश करने का मौका दिया गया है। एसडीएम विशाल महाराणा ने बताया कि टीम उचित कार्रवाई करने से पहले अधिकारियों और विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श कर रही है।

‘हर कोई डिम्पलधारी को गिरने से रोकता रहा, लेकिन बाबा ने डिसाइड कर लिया था कि घास में तैरना है तो कूद गया’

उत्तर प्रदेश के हाथरस केस को लेकर कॉन्ग्रेस लगातार योगी सरकार को घेरने की कोशिश में लगी है। ऐसे में आज पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की एक वी़डियो सोशल मीडिया पर आई। इस वीडियो के सामने आने के बाद ट्विटर पर ‘एक्ट लाइक पप्पू’ ट्रेंड करने लगा। इस ट्रेंड में लोग क्या पोस्ट कर रहे हैं और राहुल गाँधी की वीडियो में क्या है, आइए जानते हैं।

दरअसल, आज राहुल गाँधी अपने काफिले के साथ हाथरस में पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे। तभी यूपी पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। इस दौरान पुलिस के साथ उनकी नोंकझोंक भी हुई। मगर वह आगे बढ़ते रहे और पुलिस उन्हें रोकने का प्रयास करती रही। इसी बीच वह थोड़ी दूर जाकर झाड़ियों में गिर गए और यह पूरी घटना वीडियो में कैद हो गई।

क्लोज इनफ!

इसके बाद राहुल ने बयान में कहा, “देखो, पुलिस ने कैसे मुझे धक्का दिया, मुझ पर लाठीचार्ज किया और जमीन पर गिरा दिया। मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या इस देश में सिर्फ मोदी जी ही घूम सकते हैं? क्या आम आदमी कहीं आ-जा नहीं सकता?” उन्होंने आगे कहा, “हमारी गाड़ी रोक दी गई, इसलिए हम पैदल चलने लगे।”

अब एक ओर जहाँ इस घटना में राहुल गाँधी के चोटिल होने का दावा कॉन्ग्रेस की ओर से किया जा रहा है, वहीं राहुल गाँधी का यह वीडियो देखते वक्त यह प्रतीत हो रहा है कि वह सुरक्षित जगह देखने के बाद घास के ऊपर खुद ही गिर गए थे।

इसीलिए सोशल मीडिया पर इस घटना की वीडियो देखकर लोग राहुल गाँधी की चुटकी ले रहे हैं और तरह-तरह के मीम्स शेयर करके ये कहना चाह रहे हैं कि राहुल गाँधी को धक्का देकर नहीं गिराया गया। वह जमीन पर खुद गिर गए। अपनी इसी बात को सारे यूजर्स #ActLikePappu के अंतर्गत रख रहे हैं।

घटना की वीडियो शेयर करके लिखा जा रहा है,”यही राहुल गाँधी की प्रतिबद्धता है। हर कोई उन्हें गिरने से रोकता रहा। लेकिन बंदे ने डिसाइड कर लिया था कि गिरेगा तो गिरके ही माना।”

यूजर्स एक बच्चे की वीडियो पर राहुल का मीम बनाकर भी ट्विटर पर शेयर कर रहे हैं। इसमें देखा जा सकता है कि एक झूले पर जाकर हल्के से हाथ मारता है और जब झूला वापस उसके पेट से टच होचा है तो वह खुद ही जमीन पर गिरकर छटपटाने लगा है। लोगों का इस वीडियो पर कहना है कि आज राहुल गाँधी ने नोएडा एक्सप्रेस हाईवे पर यही मेलोड्रामा किया।

एक डेलीसोप की वीडियो भी आज की स्थिति के साथ जोड़ कर शेयर की जा रही है और पूछा जा रहा है ओवरएक्टिंग किसने अच्छी की। एक तरफ राहुल की वीडियोज हैं और दूसरी तरह डेली सोप का सीन, जिसमें धक्का मिलने पर लड़की पर्दा पकड़ती है और सीन ऐसे शूट होता है जैसे खुले पर्दे में उसका गला फँस गया।

बता दें, अधिकांश लोग जहाँ मीम्स को लेकर राहुल की चुटकी ले रहे हैं। वहीं कुछ लोग गंभीर रूप बाते भी कर रहे हैं। एक अकाउंट से लिखा गया है, “साफ़ दिख रहा है पुलिस वाला राहुल गाँधी को गिरने से बचाने की कोशिश कर रहा है, जब अचानक कोई गिरने लगता है तो बचाने वाला ये नहीं देखता की मैं क्या पकड़ रहा हूँ, लेकिन जिनकी मानसिकता ही घटिया हो उनकी सोच कोई बदल नहीं सकता।”

इस हैशटैग में राहुल गाँधी को लोग ड्रामेबाज और नेमार जूनियर से जोड़ कह रहे हैं। इसके अलावा उनके पुराने वीडियोज शेयर करके सवाल पूछ रहे हैं कि इलेक्शन में गिरने के बाद और कितना गिरोगे।

कुछ का कहना है कि राहुल गाँधी पुश और पुल के बीच फर्क करना भी नहीं जानते हैं, क्योंकि तस्वीर में साफ दिख रहा है पुलिस उन्हें खींच रही है और वह नीचे गिर रहे हैं।

राहुल गाँधी के गिरने की यह वीडियो इतनी वायरल हो रही है कि भाजपा नता गिरिराज सिंह भी बॉलीवुड का गाना शेयर करके कहते हैं, “अरे ये तो गिर पड़े।”

कुछ राहुल गाँधी के प्रशंसक भी हैं जो इस हैशटैग का इस्तेमाल करके उन्हें ‘पप्पू’ बोले जाने पर सवाल उठा रहे हैं। आकाश नाम का यूजर कहता है, “हम भले ही उन्हें उनके भाषणों के लिए पप्पू बोल लें। लेकिन सच है कि वही एक नेता है जिसने रेप पीड़िता के घरवालों का समर्थन किया।”

दिल्ली दंगों की चार्जशीट में कपिल मिश्रा ‘व्हिसल ब्लोअर’ नहीं: साजिश से ध्यान हटाने के लिए मीडिया ने गढ़ा झूठा नैरेटिव

दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में चल रही जाँच हर दिन तूल पकड़ती जा रही है। इसमें अभी तक 700 एफआईआर और कई चार्जशीट फाइल हो चुकी हैं। इसके साथ ही उमर खालिद, ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, पिंजड़ा तोड़ के सदस्य, कॉन्ग्रेस नेता इशरत जहाँ जैसे लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। अब दिल्ली पुलिस ने पहला ऐसा आरोप-पत्र दायर किया है, जिसमें दिल्ली को जलाने के लिए रची गई साजिश की सारी डिटेल हैं।

एफआईआर नंबर 59/200 में दायर आरोप पत्र बताता है कि साजिश 5 दिसंबर 2019 से रची जानी शुरू हो चुकी थी और मास्टरमाइंड शर्जील इमाम, उमर खालिद व अन्य ने लोगों को उकसाना शुरू कर दिया था। इसके अलावा इस आरोप-पत्र में योगेंद्र यादव जैसे लोगों की भूमिका का भी जिक्र है, जिन्हें अभी तक हिरासत में नहीं लिया गया है। योगेंद्र यादव का नाम चार्जशीट की शुरुआत में ही है। उन्होंने 8 दिसंबर को शर्जील इमाम, उमर खालिद व अन्य के साथ गुप्त बैठक की थी।

8 दिसंबर को दायर हुई चार्जशीट

एफआईआर संख्या 59/2020 में दायर हुई चार्जशीट, जिसमें पूरी साजिश का विवरण है, लगभग 17,000 पृष्ठों की है। मगर मीडिया इसमें से कोई छोटी सी जानकारी उठाकर झूठ फैलाता है और केवल आधा सच बताकर अपना नैरेटिव चलाता है।

हाल में एक ऐसा झूठ कपिल मिश्रा के नाम पर सामने आया था। मीडिया ने फैलाया कि चार्जशीट में पुलिस ने कपिल मिश्रा को ‘whistleblower’ कहा है।

बाद में इस झूठ को कई मीडिया संस्थानों ने चलाया और एनडीटीवी से लेकर बार एंड बेंच और प्रोपेगेंडा वेबसाइट द क्विंट के पत्रकारों ने भी इसे फैलाया।

एनडीटीवी ने कपिल मिश्रा को ‘घृणा फैलाने वाला नेता’ बताया और दावा किया कि दिल्ली पुलिस ने उन्हें चार्जशीट में  ‘whistleblower’ कहा है। फिर इंडिया टुडे ने भी इसका अनुकरण किया और अपने आर्टिकल का शीर्षक दिया, “दिल्ली दंगे: क्या कपिल मिश्रा एक ‘whistleblower है? पुलिस चार्जशीट यही इशारा करती है।”

चार्जशीट के ऊपर इंडिया टुडे का आर्टिकल

इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया “दिल्ली पुलिस यह कहती दिख रही है कि साजिशकर्ता खुद को बचाने के लिए ‘झूठी कहानी’ बना रहे थे। इसके अलावा यह ये संकेत भी देती है कि भाजपा नेता कपिल मिश्रा दिल्ली के दंगों के मामले में “व्हिसल ब्लोअर” में से एक हो सकते हैं।”

द क्विंट ने भी चार्जशीट का हवाला देकर लिखा, “चैट से पुष्टि होती है कि साजिशकर्ताओं को पर्दाफाश होने का डर था। इसलिए उन्होंने झूठी कहानी बनाकर दोष खुद को बेगुनहाह बताने की कोशिश की और व्हिसल ब्लोअर्स को धमकाया भी।” अपनी रिपोर्ट में उन्होंने इस ओर इशारा किया कि हो सकता है ये whistleblower कपिल मिश्रा ही हो, जिसका आरोप-पत्र में जिक्र है।

इसके बाद कानूनी मामलों पर सबसे प्रमाणिक जानकारी के लिए एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में पहचाना जाने वाला बार एंड बेंच ने भी दुर्भावनापूर्ण तरीके से इस झूठ को आगे बढ़ाया।

बार एंड बेंच का आर्टिकल

कॉन्ग्रेस नेताओं और उनके ट्रोलर्स के हाथों में ये बात पहुँचने के बाद इस झूठ को और रफ्तार मिली। कई ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने मीडिया के फर्जी दावे को आगे फैलाया।

सच्चाई क्या है? क्या दिल्ली दंगे मामले में दायर चार्जशीट में कपिल मिश्रा को वाकई  ‘whistleblower’ कहा गया है।

हर मीडिया रिपोर्ट, जिसमें दावा किया गया कि दिल्ली दंगों की चार्जशीट में कपिल मिश्रा को ही  ‘whistleblower’ कहा गया है, उसने अपनी बातों को सिद्ध करने के लिए कुछ स्क्रीनशॉट का इस्तेमाल किया।

चार्जशीट की स्क्रीनशॉट जिसे मीडिया ने भुनाया

यह तस्वीर बार एंड बेंच की है। इसी को इंडिया टुडे ने भी इस्तेमाल किया है ये बताने के लिए कि चार्जशीट में कपिल मिश्रा को  ‘whistleblower’ कहा गया।

हालाँकि ऐसे दावे करते हुए इन सभी मीडिया चैनलों ने एक सच को बड़ी चालाकी से दरकिनार कर दिया। दरअसल, चार्जशीट में पहले कहा गया, “चैट से पुष्टि होती है कि साजिशकर्ताओं को पर्दाफाश होने का डर था। इसलिए उन्होंने झूठी कहानी बनाकर दोष खुद को बेगुनाह बताने की कोशिश की और व्हिसल ब्लोअर्स को धमकाया भी।” मगर आगे यह आरोप-पत्र यह भी कहता है कि इसकी पुष्टि संरक्षित गवाहों (protected witnesses) से की गई है।

अब यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि आखिर कैसे मीडिया ने तस्वीर को क्रॉप करके उसका इस्तेमाल किया और सबसे महत्तवपूर्ण भाग को रिपोर्ट्स में शामिल करना जरूरी भी नहीं समझा कि आखिर कैसे ‘whistleblowers’ को डराया गया।

सबसे पहले किसी को भी ध्यान देना होगा कि पुलिस कहती है, “फर्जी नैरेटिव बनाकर और whistleblower को धमका कर।” इसमें दो बातें निकलतीं है। पहली फर्जी नैरेटिव गढ़ना और दूसरा whistleblowers को धमकाना।

इस भाग में दिल्ली पुलिस ने पहले  “Delhi Protest Support Group” (DPSG) ग्रुप के स्क्रीनशॉट शेयर किए, जहाँ खालिद सैफी, राहुल रॉय और अन्य कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ एफआईआर करवाने की बात कर रहे थे।

इसमें नोटिस करने वाली बात यह है कि दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप में हुई यह चैट 24 फरवरी रात 1 बजे की है। वही समय जब हिंसा शुरू हो चुकी थी। मगर, मीडिया ने बड़े सलीके से आगे 700 से अधिक पृष्ठों को दरकिनार कर दिया, जिसमें इस बात पर गौर करवाया गया है कि पूरी साजिश 5 दिसंबर से होनी शुरू हुई।

चार्जशीट में आगे पुलिस ने जब कपिल मिश्रा से संबंधित चैट का हवाला दिया, जिससे यह संकेत मिल रहा था कि कैसे दंगे करवाने वालों ने सारी साजिश में अपनी भूमिका कबूल की और खालिद सैफी जैसे ने ध्यान भटकाने के लिए कपिल मिश्रा को फँसाने की कोशिश की और झूठा नैरेटिव गढ़ा।

इन चैट्स जिनमें whistleblower को धमकाने की बात सामने आती है, उसी से साफ हो जाता है कि कपिल मिश्रा का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यहाँ यह शब्द उनके लिए है, जिन्हें धमकाया गया।

यह वो तस्वीर है जिसे मीडिया ने क्रॉप कर दिया।

मीडिया ने चार्जशीट में क्या छोड़ दिया

देखिए। इस चैट में, दंगे के पूरे एक दिन बाद, राहुल रॉय लोगों को ग्रुप से मैसेज लीक करने पर धमकाता है। इसके अलावा इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि ग्रुप में स्वीकार किया गया है कि दंगे मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों और डीएसपीजी ग्रुप के लोगों ने भड़काए। बता दें पूरी चैट 25 फरवरी की है। 

इन चैट्स से पता चलता है कि इसके बाद राहुल राय और कुछ लोगों में बहस शुरू हो गई थी, जिन्होंने पिंजरा तोड़ और अन्य मास्टरमाइंड पर आरोप लगाया था कि उनके कारण आम लोगों का जीवन खतरे में आ गया है। इसी के बाद राहुल रॉय ने 25 फरवरी को लोगों को धमकी दी।

यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि दिल्ली पुलिस के पास कई ऐसे गवाह हैं जिन्होंने ग्रुप में विरोध किया था और हिंसा पर आपत्ति जताने पर उन्हें धमकाया और चुप रहने को कहा जा रहा था।

तो इस प्रकार, इस मामले में मीडिया ने जो कुछ भी किया है, उसे 3000-पृष्ठ की अंतिम रिपोर्ट में से लिया गया है और केवल उस हिस्से को उजागर किया गया है जहाँ चार्जशीट में कपिल मिश्रा का उल्लेख है। इतने में भी उसे बिना किसी संदर्भ के कोट किया गया ताकि राहुल द्वारा भेजी गई चैट को छिपाया जा सके। यह सब लगभग वैसा ही है, जैसे कि मीडिया ने सीधे तौर पर “कपिल मिश्रा” शब्द खोजा और पूरी चार्जशीट को पढ़े बिना ही उसमें से एक झूठी कहानी लिख दी, जबकि रिपोर्ट बहुत विस्तृत है।

बता दें कि राहुल रॉय और उनकी पत्नी सबा दीवान को कुछ समय पहले दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों के कनेक्शन और मास्टरमाइंड होने के लिए समन जारी किया था। शॉर्ट फिल्म मेकर राहुल रॉय ने ही DSPG समूह की शुरुआत की थी और उन्हें दंगों के प्रमुख साजिशकर्ताओं में से एक के रूप में देखा जा रहा है।

सबा दीवान और राहुल रॉय

कपिल मिश्रा को चार्जशीट में नहीं कहा गया ‘व्हिसल ब्लोअर’, दिल्ली पुलिस ने खुद की पुष्टि

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले कपिल मिश्रा को लेकर उपजे विवाद पर दिल्ली पुलिस ने एनडीटीवी की पत्रकार को बयान जारी करके लताड़ लगाई थी। दिल्ली पुलिस ने अपने ऊपर लगे आरोपों के ख़िलाफ़ बयान जारी करते हुए बताया था कि एनडीटीवी की एंकर जिस तरह से अपने शो में दावा कर रही हैं कि पुलिस ने कपिल मिश्रा को ‘व्हिसल ब्लोअर’ कहा, वह दावा सत्य से कोसों दूर हैं। दिल्ली पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि पुलिस ने कहीं भी कपिल मिश्रा को व्हिसल ब्लोअर नहीं कहा है और न उन्होंने ऐसा कुछ कहीं लिखा है।

बयान में आगे लिखा गया, “शायद एंकर का नैरेटिव तब पूरा होता यदि दिल्ली पुलिस ने कपिल मिश्रा का विस्तृत बयान न लिया होता। परंतु अन्वेषण, स्टूडियो और कैमरा के सामने नहीं होता। कपिल मिश्रा का विस्तृत बयान रिकॉर्ड पर आ जाने से आहत एंकर ने सच्चे व्हिसल ब्लोअर को नजरअंदाज करते हुए दर्शकों को गुमराह करने का प्रयास किया है।”

इस बयान में आगे बताया गया था कि एंकर ने अपने शो में दूसरा कौन सा मुद्दा उठाया। बयान के मुताबिक:

“रिपोर्ट में दूसरा मुद्दा यह उठाया गया कि कपिल मिश्रा के मौजपुर में रहते ही पत्थरबाजी शुरू हो गई थी। दिल्ली पुलिस ने तमाम अन्वेषण के बाद पाया कि दंगे और पत्थरबाजी 23 फरवरी को चाँद बाग के दंगाइयों ने सोची-समझी साजिश के तहत, लगभग 11 बजे सुबह से ही शुरू कर दी थी और प्रथम घायल पीड़ित की एमएलसी 12;15 बजे, दिन को अस्पताल में बनी थी, जबकि कपिल मिश्रा 23 तारीख को 3:30 बजे दोपहर मौजपुर आए थे। इससे स्पष्ट है कि पुलिस और पब्लिक पर सीएए विरोधियों द्वारा हमला 23 फरवरी की सुबह ही शुरू हो गया था।”

दिल्ली पुलिस का दावा था कि एनडीटीवी एंकर ने इन सभी तथ्यों को छिपाते हुए एक कहानी रचने की शरारतपूर्ण कोशिश की है। परंतु NDTV के अपनी ही रिपोर्टर की यह टिप्पणी कि डीएसपी Anti riot gear पहने हुए थे और आसपास पत्थर भी दिखाई पड़ रहे थे, से पुलिस की चार्जशीट में लिखी इस बात की जाने-अनजाने में पुष्टि होती है कि पथराव लगभग 11 बजे सुबह से ही शुरू हो गया था।

(नुपूर जे शर्मा द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई यह रिपोर्ट यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)