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कहानी भारत के पहले फुटबॉल कप्तान टीएओ की, जिनके सम्मान में इंदिरा गाँधी का नाम हटा दिया गया

क्या आपने टी. एओ का नाम सुना है? नागालैंड में जन सामान्य में इंदिरा गांधी स्टेडियम का नाम बदलकर टी. एओ स्टेडियम करने के विचार ने जन्म लिया । आखिर कौन हैं टी. एओ? क्यों उनके नाम पर स्टेडियम बनाने की बात हुई ? क्या महज इसलिए, क्योंकि इंदिरा गांधी का नाम हटाना है? क्या यह कोई विरोधी प्रतिक्रिया है? बिल्कुल नहीं। इस परिवर्तन का ऐसा कारण है, जिससे शायद ही कोई असहमत हो।

“एओ-दा” के नाम से हर गली के लोकरंजक टीएओ का पूरा नाम डॉक्टर तालिमेरेन एओ है। चिकित्सीय क्षेत्र में सिद्धता के साथ-साथ खेल जगत में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा है। उनका जन्म 28 जनवरी, 1918 को अविभाजित असम राज्य के तत्कालीन जिला नागा हिल्स के नागाओं के प्रसिद्द “एओ” जनसमुदाय के चांगकी नामक गाँव में हुआ था।

उस समय वह 6 या 7 साल के थे, जब एक बैपटिस्ट ने उनके परिवार को चांगली से इंपुर में बसा दिया था। वे इस परिवार को मिशनरी काम में लगाना चाहते थे। 12 बच्चों में तालिमेरेन चौथे नंबर पर थे। तालिमेरेन का अर्थ  होता है बहुत शक्तिशाली। अपने नाम के अनुसार तालिमेरेन बाल्यवस्था से ही साहसी, उत्साहित, कुशाग्र बुद्धि तथा खेल-प्रिय व्यक्तित्व के धनी रहे।

उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा इंपुर से ही प्राप्त की थी। अपने स्कूल की साऱी ही परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहाँ मिशन कंपाउंड में उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया। उन दिनों में कोई फुटबॉल नहीं होती थी इसलिए वे अपने कुछ मित्रों के साथ पुराने कपड़ों, फूल-पत्ते, घास-फूस आदि से बॉल बनाकर तथा पोमेलोस नाम के फल को ही फुटबॉल बनाकर खेलते थे।

कहा जाता है कि वो दोनों पाँवों से खेलते थे और यहीं उन्होंने अपने जीवन की प्रसिद्धि का प्रथम सोपान चढ़ी की और आगे वो स्कूल टीम के कप्तान बने। जब उनकी क्लास छः इंपुर में पूरी हो गई तो हाई-स्कूल की पढ़ाई करने के लिए वे 1933 में वो जोरहाट गए। वहाँ अपने बहनोई के घर में रहते हुए उन्होंने पढ़ाई की तथा फुटबॉल और वॉलीबॉल में खिलाड़ियों के बीच बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1937 में उन्होंने इंटर हाई-स्कूल टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी की ट्रॉफी जीती।

उल्लेखनीय है कि उनके पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बनें और इसके लिए वो उनको प्रेरित किया करते थे। जब वह 17 वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। पिता को दिए वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने कॉटन कॉलेज गुवाहाटी में 1942 में प्रवेश लिया अपनी इंटरमीडिएट साइंस और कारमाइकल मेडिकल कॉलेज (अब RG Kar Medical) से एमबीबीएस पूरा किया। इस प्रकार चिकित्सिकीय अध्ययन क्षेत्र में कोलकाता से 1950 में यह सर्वोच्च उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम नागा बने।

वर्ष 1953 में डॉ. टीएओ ने डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज में रजिस्ट्रार के रूप में कार्यभार सँभाला और फिर सहायक सर्जन के पद पर उनका कोहिमा में स्थानांतरण हो गया। नागालैंड ने 1963 में एक राज्य का दर्जा प्राप्त किया तो डॉ. टीएओ स्वास्थ्य सेवा के पहले नागा निदेशक बने और 1978 में सेवानिवृत्ति तक इस पद पर रहे। सेवा में होते हुए भी उनका खेलों के प्रति उत्साह कम नहीं हुआ। उन्होंने स्थानीय फुटबॉल के अच्छी प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया और चिकित्सीय फुटबॉल टीम का आयोजन किया और स्थानीय प्रतिभाओं में बहुत ही रुचि ली।

बचपन से ही डॉ. टीएओ का खेल और एथलेटिक गतिविधियों के प्रति एक मजबूत झुकाव रहा। उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई, बल्कि फुटबॉल और अन्य खेलों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 1937 में उनको इंटर हाई-स्कूल टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ स्पोर्ट्सपर्सन ट्रॉफी जोरहाट में मिली थी। 1942 तक कॉटन कॉलेज और गुवाहाटी के प्रतिष्ठित महाराणा क्लब के लिए खेले। 1943 में वे कलकत्ता के प्रसिद्ध मोहन बागान क्लब में शामिल हुए और 9 साल (1943-51) तक क्लब के लिए खेले। 2 साल तक इसकी कप्तानी की।

फुटबॉल के एक स्थापित सितारे के नाते डॉ. टीएओ को भारतीय और भारत इलेवन टीमों में यूरोपियन टीमों के खिलाफ खेलने के लिए चुना गया था। उन्होंने हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर, कुआलालंपुर, बैंकॉक और डक्का में प्रदर्शनी मैच खेलने के लिए सुदूर-पूर्व में भारतीय फुटबॉल टीम का नेतृत्व भी किया। उनके टीम में होते हुए बंगाल ने प्रांतीय संतोष ट्रॉफी को बॉम्बे में 1945 में जीता। 1946 और 1947 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के एथलेटिक्स में व्यक्तिगत चैम्पियनशिप जीती। 

डॉ. टीएओ लंदन ओलंपिक में पहली स्वतंत्र भारतीय फुटबॉल टीम के 1948 में कप्तान बने। 29 जुलाई, 1948 को हुई उद्घाटन समारोह में वेम्ब्ली स्टेडियम, लंदन में टीएओ को भारतीय समूह के लिए ध्वज धारण का अवसर मिला। फुटबॉल के मैदान में बूट नहीं होने के कारण नंगे पैर ही खेलते थे। यहाँ तक कि 1948 ओलिंपिक में एक ब्रिटिश पत्रकार ने तालिमेरेन से पूछा था कि उनकी टीम नंगे पाँव क्यों खेलती है, तो बहुत ही सकारात्मकता और जोश के साथ उत्तर दिया– खेल का नाम फुटबॉल है, बूटबॉल नहीं।

बंगाल के फुटबॉल में डॉ. टीएओ ने पूर्णतः अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। उनका वर्चस्व इस तरह का था कि स्थानीय बंगाली कहने लगे कि मोहन बागान भारत का गौरव है और मोहन बागान का गौरव टीएओ है। उनके सरल एवं विनयशीलता के कारण सभी बहुत प्रेम करते थे और प्रेम से उनको “एओ-दा” कहते थे।

वह केवल कलकत्ता में फुटबॉल के खिलाडी के रूप में ही सीमित नहीं रहे। अपितु उन्होंने कई प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया। वे 100 मीटर, 200 मीटर, हाई जंप, ब्रॉड जंप, हॉप-स्टेप-एंड-जंप, जैवलिन, चर्चा, शॉट-पुट और 110 मीटर बाधा दौड़ में हमेशा आगे रहते थे। 1946 और 1947 में हुई तेहरवीं और चौदवी प्रांतीय एथलेटिक चैम्पियनशिप लगातार दो साल व्यक्तिगत चैम्पियनशिप जीती।

मात्र नगालैंड में नहीं अपितु समस्त भारत देश में खेल जगत के क्षेत्र में उनका एक विशिष्ट स्थान है। शून्य सुविधाएँ के रहते हुए डॉ. टीएओ ने संघर्ष करते हुए एक ऐसा उज्जवल मार्ग प्रशस्त किया जिसका आने वाली पीढ़ियाँ अनुसरण कर सके। आज उनके इस महनीय, आदर्शमय प्रेरणादायक व्यक्तित्व के सम्मान में उनको देश नमन करता है। उनकी प्रतिभा और सफलता के कारण उनको 1968-1969 में अखिल भारतीय ओलंपिक फुटबॉल चयन समिति के सदस्य के रूप में तथा 1972 में अखिल भारतीय खेल परिषद का सदस्य चुना गया था।

1977 में उनको असम सरकार द्वारा एक राइनो (असम का राज्य पशु) की एक छोटी, सुंदर और प्यारी मूर्ति प्रस्तुत करके उनका सम्मान किया गया। 1998 में 80 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वर्ष 2001 में मोहन बागान एथलेटिक क्लब ने डॉ. टीएओ को मोहारी राम पुरस्कार से सम्मानित किया।

असम ने उनको कालाबोर में एक आउटडोर-स्टेडियम का नाम देकर सम्मानित किया, जो कि जाबलबन्धा के पास है। उनके पुराने कॉलेज, कॉटन कॉलेज, ने उनके नाम पर अपने परिसर में एक इनडोर-स्टेडियम का नाम रखा। एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को उनके नाम से नामित करके मेघालय ने उन्हें सम्मानित किया। उनको सम्मान देते हुए उनके नाम पर उनकी जन्म शताब्दी 28 जनवरी 2018 को एक डाक टिकट का विमोचन किया गया।

पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को पुनः प्रकाशित करने पर अल-कायदा ने शार्ली एब्दो को दी 2015 जैसे नरसंहार की धमकी

इस्लामी आतंकी संगठन अल-कायदा ने फ्रेंच व्यंग्य साप्ताहिक मैगजिन शार्ली (Charlie Hebdo) एब्दो को 2015 जैसे नरसंहार की धमकी दी है। बता दें कि शार्ली एब्दो के पैगम्बर मुहम्मद पर पुनः प्रकाशित किए जाने वाले कार्टून के फैसले को लेकर लगातार धमकियाँ मिल रही हैं। पाकिस्तान और ईरान जैसे इस्लाम बहुल देशों की चेतावनी के बाद अब अल-कायदा ने मैगजीन को  पैगम्बर मुहम्मद पर पुनः प्रकाशित किए जाने वाले कार्टून के फैसले को लेकर फिर से विचार करने की धमकी दी है।

गौरतलब है कि 2015 में इस्लामी आतंकवादियों के हमले का शिकार होने के बाद फ्रेंच व्यंग्य साप्ताहिक शार्ली एब्दो ने मंगलवार (सितम्बर 01, 2020) को कहा था कि वह एक बार फिर पैगम्बर मुहम्मद पर कार्टून प्रकाशित करेगा।

बता दें कि फ्रांस के पेरिस में जनवरी 7, 2015 में अल-कायदा से संबंधित आतंकियों ने राइफल और अन्य हथियारों से व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ के दफ्तर पर हमला बोल दिया था। इस हमले में कम से कम 12 लोगों के मरने की खबर आई थी जबकि काफी लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। पत्रिका के संपादक स्टीफन चारबोनियर की भी हमले में मौत हो गई थी। बंदूकधारी हमलावर इस मैगजीन में छपे पैगंबर मुहम्मद के कार्टून से नाराज थे। पत्रिका काफी समय अपने कथित ‘इस्लाम विरोधी’ सामग्री की वजह से कट्टरपंथियों के निशाने पर थी।

फ्रांस, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, ईरान, चेचन्या, यमन और पाकिस्तान जैसे कई इस्लामी या इस्लाम बहुल देशों ने पैगंबर मुहम्मद को चित्रित करने वाले कार्टून के खिलाफ आंदोलन करने के लिए सड़कों पर निकल आए। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने मंगलवार (सितंबर 8, 2020) को इसे “अक्षम्य गुनाह” कहा।

अपने गुस्से को व्यक्त करते हुए खामेनेई ने कहा कि इस्लामिक राष्ट्रों – विशेष रूप से पश्चिम एशियाई देशों में -इस्लाम और संप्रदाय विशेष के खिलाफ पश्चिमी राजनेताओं और नेताओं की शत्रुता को कभी नहीं भूलना चाहिए।

इस घोषणा ने पेरिस कार्यालय में 2015 के आतंकवादी हमले को भी प्रेरित किया, जिससे दुनिया भर में व्यापक विरोध हुआ, पाकिस्तान ने भी शुक्रवार (सितंबर 4, 2020) को कट्टरपंथी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान पार्टी के नेतृत्व में हजारों समुदाय विशेष के लोगों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया।

प्रदर्शनकारियों ने फ्रांसीसी उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान के लिए “डेथ टू फ़्रांस” का आह्वान किया। विरोध प्रदर्शन के दौरान पढ़े गए एक बिलबोर्ड पर लिखा गया था, ”ईशनिंदा करने वालों की सजा कत्ल है।” प्रदर्शनकारियों ने माँग की कि फ्रांसीसी राजदूत को निष्कासित कर दिया जाए।

उल्लेखनीय है कि फ्रांस के प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों ने फ्रेंच व्यंग्य साप्ताहिक मैगजिन शार्ली एब्दो के पैगम्बर मुहम्मद पर पुनः प्रकाशित किए जाने वाले कार्टून के फैसले को लेकर किसी भी प्रकार की निंदा नहीं की।

फ्रांस के प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बल देते हुए कहा था कि कोई भी प्रेसिडेंट पत्रकार या न्यूज़ रूम के संपादकीय की पसंद को लेकर कोई जजमेंट पास नहीं कर सकता। क्योंकि देश (फ्रांस) में प्रेस की स्वतंत्रता है।

उन्होंने कहा था, “फ्रांस में ईशनिंदा की आज़ादी अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़ी है। मैं इन सभी आज़ादी की रक्षा करने के लिए यहाँ हूँ। फ्रांस में कोई भी राष्ट्रपति, राज्यपाल, ईशनिंदा की आलोचना कर सकता है।”

बांग्लादेश: गाजीपुर के काली मंदिर पर रात में हमला, देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ा गया, उनके सिर जमीन पर पड़े मिले

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, गाजीपुर, ढाका, बांग्लादेश के दक्खिन सलाना इलाके में स्थित काली मंदिर में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को शुक्रवार (11 सितंबर, 2020) को खंडित कर दिया गया। उन्हें तोड़ दिया गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस नफ़रत पूर्ण कृत्य पर गाजीपुर सदर पुलिस स्टेशन के ओसी आलमगीर हुसैन भुइयाँ ने बताया कि अज्ञात बदमाशों ने रात के समय मंदिर में घुसकर चार हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित कर दिया। जिसके अगले दिन हिंदू उपासकों को मूर्तियों के सिर जमीन पर पड़े मिले। पुलिस ने बताया कि मामले की जाँच शुरू कर दी गई है लेकिन अब तक किसी भी आरोपित को गिरफ्तार नहीं किया गया है। उच्च अधिकारियों ने अपराध स्थल का दौरा भी किया था।

मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रदीप चंद्रा ने ट्विटर पर खंडित मूर्तियों की तस्वीरें पोस्ट कीं। उन्होंने लिखा, “गाजीपुर ढाका बांग्लादेश में एक हिंदू मंदिर पर हमला और सभी देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ तोड़फोड़।”

मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष नरेश राय के अनुसार, कई ‘प्रभावशाली स्थानीय लोग’ मंदिर की जमीन को हड़पने के लिए घाट लगाए बैठे हैं। उन्होंने कहा, “गुरुवार को भी उन लोगों ने मंदिर को खाली कराने की कोशिश की थी। हालाँकि, कुछ स्थानीय लोगों के विरोध के कारण वे ऐसा नहीं कर पाएँ। उसी घटना की वजह से, उन्होंने रात में मंदिर में तोड़फोड़ की।”

पूजा उदजपं परिषद (गाजीपुर) द्वारा इस घटना की निंदा की गई। साथ ही मंदिर पर हमला करने में शामिल दोषियों की गिरफ्तारी की माँग की गई।

अर्थव्यवस्था, राष्ट्रवाद, नौकरशाही जैसे मसलों पर लापरवाह थे नेहरू: जेआरडी टाटा का दुर्लभ Video

जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा जिन्हें हम जेआरडी टाटा के नाम से भी जानते हैं किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्हें हवाई क्षेत्र का पिता भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने देश की पहली अंतरराष्ट्रीय विमान सेवा ‘एयर इंडिया’ की नींव रखी थी। इसके अलावा वह सबसे लंबे समय तक टाटा समूह के चेयरमैन भी रहे। 

नब्बे के दशक में पत्रकार राजीव मल्होत्रा ने उनका एक साक्षात्कार किया था। यह साक्षात्कार एक शृंखला के तहत किया गया था जिसका प्रसारण दूरदर्शन पर हुआ था। टाटा समूह की वेबसाइट के मुताबिक़ यह साक्षात्कार साल 1987 में वसंत के दौरान हुआ था। ऐसा बताया जाता है कि यह जेआरडी टाटा का इकलौता साक्षात्कार है। इस बातचीत के दौरान उन्होंने विविध विषयों पर चर्चा की, उनके पेशेवर जीवन से लेकर राजनीतिक प्रभाव और योजनाओं – नीतियों तक। इस बातचीत में उन्होंने एक और मुद्दे पर विस्तार से अपने विचार रखे और वह था पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की सरकार में आर्थिक विकास की रफ़्तार कम होना। बाद में यह प्रक्रिया कॉन्ग्रेस के शासन में भी जारी रही। 

जेआरडी टाटा की विनम्रता 

इस साक्षात्कार का एक हिस्सा इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब साझा किया जा रहा है। जेआरडी टाटा की अगुवाई में ही टाटा समूह की कुल संपत्ति 101 मिलियन डॉलर से 5 बिलियन डॉलर तक पहुँच गई थी। जेआरडी ने कहा कि एयर इंडिया के अलावा ऐसा कुछ नहीं था जिसे उन्होंने टुकड़ों से उठा कर तैयार किया हो या कुछ नया तैयार किया हो। उनके मुताबिक़ काफी हालात ऐसे थे जो उन्हें पहले से ही मिले थे। जब 1926 में उनके पिता रतनजी दादाभाई टाटा का निधन हुआ 

तब भी टाटा समूह की अगुवाई ऐसे लोगों का समूह कर रहा था जो अपने कार्य में कुशल थे। उनका काम सिर्फ कार्य कुशल लोगों के समूह को प्रेरणा और बढ़ावा देना था। कम उम्र में प्राप्त की गई उपलब्धियों को सरलता से बताते हुए फिलांथ्रोपिस्ट (जन हितैषी) जेआरडी टाटा ने इस पर मज़ाक किया। माजाक करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे समय से पहले 34 साल की उम्र में टाटा समूह का चेयरमैन बना दिया गया था। यह मेरे लिए किसी मानसिक झटके से कम नहीं था।”

कैसे मोरारजी देसाई ने जेआरडी टाटा से छीनी एयर इंडिया की चैयरमैनशिप 

बातचीत के दौरान एयर इंडिया के लिए उनका जुनून साफ़ तौर पर नज़र आ रहा था। उन्होंने कहा, “मुझे ऐसा लगता है एयर इंडिया इकलौती ऐसी चीज़ है जिसके लिए मैं पूरी तरह ज़िम्मेदार हूँ।” इसके बाद उन्होंने यह बताया कि कैसे वह 1978 तक एयर इंडिया की चेयरमैनशिप संभाल रहे थे। जब तक तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने फरवरी में उन्हें सेवाओं से मुक्त नहीं कर दिया था। जेआरडीटाटा ने इस संबंध में कहा, “उन्होंने (मोरारजी देसाई) 8-10 दिन तक मुझे इस बारे में सूचित नहीं किया था। अंत में एक दिन मुझे पत्र मिला जिसमें मुझे मेरी सेवाओं के लिए धन्यवाद दिया गया था।” 

प्रधानमंत्री से अपने उतार चढ़ाव भरे रिश्तों को मद्देनज़र रखते हुए जेआरडी टाटा का यह मानना कि उनके लिए यह पूर्णतः अप्रत्याशित था। इसके अलावा उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री मोरारजी उनके बहुत अच्छे मित्र थे फिर भी वह एक जटिल व्यक्ति थे। मेरे लिए उनका यह कदम निराशाजनक था और जिस तरह से उन्होंने कार्रवाई की वह सही नहीं था। साल 1978 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने जेआरडी टाटा को एयर इंडिया की चेयरमैनशिप से मुक्त किया और इंडियन एयरलाइंस के निदेशक पद से भी मुक्त कर दिया। इसके ठीक एक साल पहले उन्हें परमाणु ऊर्जा आयोग के बोर्ड से भी निकाला गया था जबकि वह 1948 से इस बोर्ड का हिस्सा थे। उन्हें अपने निष्कासन की सूचना रेडियो के ज़रिए मिली और उस वक्त वह जमशेदपुर में थे।” 

9 फरवरी को जेआरडी टाटा को प्रधानमंत्री द्वारा भेजा गया एक पत्र मिला। यह पत्र 4 फरवरी को लिखा गया था और 6 फरवरी को राजधानी दिल्ली से भेजा गया था। इसके बाद 11 फरवरी को समाचार समूहों ने इस बात की आधिकारिक सूचना जारी की कि 1 फरवरी को उन्हें अपनी सेवाओं से मुक्त कर दिया गया था। जेआरडी टाटा ने इस कार्रवाई से बहुत ज़्यादा निराश हुए थे क्योंकि उन्होंने कई दशकों तक एयर इंडिया की कमान संभाली थी। 

इसके बावजूद बिना किसी पारिश्रमिक के उन्हें पद से मुक्त कर दिया गया था। इस मुद्दे पर बयान देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा, “मुझे इस बात की पूरी उम्मीद थी लेकिन मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरे इस अनुमान को आप घमंड नहीं समझेंगे। मैंने लगभग 45 सालों तक भारतीय विमान क्षेत्र को अपनी सेवाएँ दी हैं इसलिए मुझे इस बात की सूचना सार्वजनिक तौर पर मिलनी चाहिए।”

एयर इंडिया के संबंध में हुए इतने बड़े बदलाव से विमान सेवा के क्रू से लेकर आम जनता तक सभी में इस बात को लेकर बहुत गुस्सा था। एयर इंडिया की सफलता और विकास का पूरा श्रेय जे आरडी टाटा को ही दिया जाता था। मोरारजी देसाई का यह निर्णय उनकी छवि के लिए बेहद नकारात्मक साबित हुआ। इतना ही नहीं उनके इस फैसले को बतौर प्रधानमंत्री सबसे अनुचित निर्णयों में से एक माना जाता है। 

इतना मूर्ख था कि एक पड़ाव पर कॉन्ग्रेस में शामिल होने की सोचता था – जेआरडी टाटा  

साक्षात्कार में उनसे यह पूछा गया कि क्या उन्हें कभी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनने की इच्छा हुई थी। इस पर जेआरडी टाटा ने कहा, “मैं इतना मूर्ख था कि कभी कभी ऐसा सोचता था कि कारोबार छोड़ कर कॉन्ग्रेस पार्टी का हिस्सा बन जाऊँ। बेशक मैं जवाहर लाल नेहरु से बहुत प्रभावित था लेकिन फिर धीरे-धीरे समझ आया कि इसका मतलब होगा गिरफ्तार होकर जेल जाना। जबकि मैंने ऐसा कुछ किया भी नहीं होगा जिसके लिए मुझे जेल जाना पड़ता। यह एक बड़ा कारण था कि वीर सावरकर ने अंग्रेज़ों को पत्र लिखा। उन्हें पता था कि जेल के भीतर रह कर देश के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है।”

 नीति और योजनाओं से जुड़े फैसलों में नेहरु ने भयावह गलतियाँ की 

खुद को गैर राजनीतिक करार देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा, “जब मैंने कॉन्ग्रेस की नीतियों को समझना शुरू किया तब महसूस हुआ कि इसका विरोध किया जाना चाहिए। बशर्ते मैं जय प्रकाश नारायण और नेहरु का प्रशंसक था लेकिन खासकर जवाहर लाल नेहरु ने कई बड़ी राजनीतिक त्रुटियाँ की। नेहरु के समाजवाद को जितना मैं समझ पाया वह समाजवाद का सही स्वरूप नहीं था बल्कि वह नौकरशाहीवाद था।”

इसके बाद जेआरडी टाटा ने कहा कि वह कभी किसी लॉबी का हिस्सा नहीं रहे। वह आलोचना करने की बजाय एक मुद्दे पर आवाज़ ऊँची करना बेहतर समझते थे। ख़ासकर उन नीतियों को लेकर जिन्हें लागू किया जाना चाहिए था लेकिन कॉन्ग्रेस ने उन्हें लागू नहीं किया। 

टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन के मुताबिक़ अंग्रेज़ों से प्रेरित होकर कॉन्ग्रेस ने जिस तरह की लोकतांत्रिक शासन लागू किया था वह असल मायनों में भारत के लिए सही नहीं था। उन्होंने कहा, “मैं भारत में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली लागू किए जाने से बहुत ज़्यादा चिंतित था। मैं इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त था कि यह भारत में कारगर नहीं साबित होगा। मैं अक्सर यह सोचता था अगर नियति ने जवाहर लाल नेहरु की जगह सरदार वल्लभ भाई पटेल को चुना होता तो आज भारत अलग मुकाम पर होता। इतना ही नहीं भारत की आर्थिक स्थिति बहुत मज़बूत होती। जवाहर लाल नेहरु समाजवाद और अर्थव्यवस्था के बारे बहुत कम जानते थे और उनमें नए विचारों को लेकर स्वीकार्यता नहीं थी। सच्चाई यह थी कि बिना आम जनता की आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित किए समाजवाद स्थापित किया जा सकता था। लेकिन अफ़सोस जवाहर लाल नेहरु ऐसी अहम बातें सुनने में रूचि ही नहीं रखते थे।”     

इसके बाद कुछ पल के लिए ठहर कर उन्होंने कहा कि इस बात ध्यान रखना होगा कि मैं क्या और कितना बोल रहा हूँ। ऐसा कहते हुए उन्होंने इशारा किया कि कॉन्ग्रेस के शासन में नौकरशाहों और उद्योगपतियों में डर का माहौल था। इसके बाद जेआरडी टाटा ने कहा, “अर्थव्यवस्था, राष्ट्रवाद, नौकरशाही जैसे मुद्दों पर वह (नेहरु) लापरवाह तो थे ही इसके अलावा इन पर बात भी नहीं करते थे। मैंने जितनी बार इन मुद्दों पर चर्चा शुरू करने का प्रयास किया वह खिड़की की ओर देखने लगते थे। फिर मैं समझ जाता था कि वह इन मसलों पर बात करने के इच्छुक नहीं हैं।” 

इंदिरा गाँधी भी अपने पिता की तरह लापरवाह थीं 

जेआरडी टाटा ने इस बात का भी खुलासा किया कि इंदिरा गाँधी भी इन मामलों में अपने पिता जैसी थीं। वह समाजवाद के विरोध में कुछ भी सुनना नहीं पसंद करती थीं लेकिन उनका बातें टालने का तरीका नेहरु से थोड़ा अलग था। जैसे ही कोई इंदिरा गाँधी से असहमत होता या उनके सामने तर्क रखने का प्रयास करता वह मेज पर रखे लिफ़ाफ़े और कागज़ उठाने लगतीं। जिससे ऐसा लगे कि उनके पास करने के लिए और भी ज़रूरी काम हैं। कुल मिला कर जेआरडी टाटा का यह कहना था कि नेहरु और इंदिरा दोनों को देश के आर्थिक विकास की कोई चिंता नहीं थी। यह बात सोचने लायक है अगर जेआरडी टाटा जैसे उद्योगपतियों को सरकार की तरफ से बढ़ावा मिला होता तो देश के लिए कितना कुछ कर सकते थे। 

पहले ही जताई थी राजनैतिक अस्थिरता की सम्भावना 

क्योंकि यह साक्षात्कार चुनाव के साल में किया गया था इसलिए उनसे कई राजनीतिक प्रश्न भी पूछे गए थे। राजनीतिक प्रश्नों का उत्तर देते हुए जेआरडी टाटा ने कहा अगर विपक्षी दलों ने राजीव गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी को बेदख़ल कर दिया होता तो ठीक ऐसे हालात बनते जैसे जनता पार्टी के छोटे कार्यकाल के दौरान बने थे। जेआरडी टाटा ने पहले ही इस बात का अनुमान लगा लिया था कि कॉन्ग्रेस की हार के चलते राजनीतिक अस्थिरता के हालत बनेंगे। राजीव गाँधी की सरकार गिरने के बाद तमाम छोटे दलों से बनी सरकार के साथ यही हुआ। चाहे इन सरकारों के मुखिया वीपी सिंह रहे हों, चौधरी चरण सिंह रहे हों या चंद्रशेखर रहे हों। सभी विफल सिद्ध हुए। 

इसके बाद टाटा समूह के पूर्व मुखिया ने कहा देश की कमान जिसके भी हाथ में हो। आम नागरिक यही उम्मीद करता है कि सरकार रोज़गार, कृषि, औद्योगीकरण और जनसंख्या नियंत्रण जैसे अहम मुद्दों पर काम करे। लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार ने इनमें से बहुत कम मुद्दों पर काम किया है।  

लाइसेंस राज – ‘मेक इन इंडिया’ की राजनीतिक अव्यवस्था

देश के औद्योगिक विकास और आधुनिकरण पर अपने विचार रखते हुए जेआरडी टाटा ने कहा, आधुनिक उपकरणों की मदद से उत्पादन किफ़ायती और आकर्षक बनाया जा सकता है। लेकिन इसके साथ सबसे बड़ी परेशानी थी कि मजदूर संघ आधुनिकरण के विरोध में था। तमाम राजनीतिक दल ऐसे मजदूर संघों का समर्थन भी करते थे। फिर जेआरडी टाटा ने कहा कि लाइसेंस परमिट राज की वजह से उस दौर में औद्योगीकरण बुरी तरह प्रभावित हुआ था। देश की कई इकाइयों पर इसका बेहद नकारात्मक प्रभाव पड़ा।  

व्यावसायिक समूहों को कुछ भी करने के लिए लाइसेंस की ज़रूरत पड़ती थी। कोई सरकारी होटल होता तो उसमें कुर्सी एक जगह से दूसरी जगह रखने के लिए भी अनुमति लेना अनिवार्य था। इतना ही नहीं उस दौर में व्यावसायिक समूह बिना अनुमति अपना दायरा नहीं बढ़ा सकते थे, तमाम क्षेत्रों में नए व्यावसायिक समूहों पर पाबंदी थी। इसके अलावा मौजूदा समूहों को नए बदलावों के लिए आर्थिक मदद तक नहीं मिलती थी। लाइसेंस राज ‘मेक इन इंडिया’ के लिए एक नौकरशाही प्रतिरोध की तरह था।      

काला धन 

जेआरडी टाटा ने इस मुद्दे पर कहा, “जब मैंने व्यवसाय शुरू किया था तब हमारे क्षेत्र में काला धन नहीं था और न ही किसी तरह का भ्रष्टाचार था। आखिर भ्रष्टाचार होता भी कैसे? जब हमारे पास सरकारी नियंत्रण के लिए कोई तंत्र नहीं था तब हमें अनुमति लेने के लिए कहाँ जाना पड़ता। शुरूआती दिनों में टैक्स की दरें भी बहुत कम थी। जब तक ज़्यादा टैक्स लगाया जाएगा और नियंत्रण (सरकारी) को बढ़ावा दिया जाएगा तब तक काला धन रहेगा।

जहाँगीर रतनजी दादाभाई 29 जुलाई साल 1904 को पैदा हुए थे। उन्हें देश के दो सबसे बड़े पुरस्कार मिले थे पद्म विभूषण और भारत रत्न। जेआरडी टाटा बेहतर उद्योगपति ही नहीं बल्कि उनका योगदान उड्डयन क्षेत्र में भी अविस्मरणीय था। वह 34 साल की उम्र में टाटा समूह के चेयरमैन बने। टाटा समूह को देश के सबसे विश्वसनीय ब्रांड के तौर पर स्थापित करने में भी उनकी भूमिका सबसे अहम रही। उनकी अगुवाई में टाटा एयरलाइंस की शुरुआत हुई और बाद में यह एयर इंडिया बनी।            

मध्य प्रदेश: 1.75 लाख परिवारों का हुआ ‘गृह प्रवेश’, PM मोदी ने बताया- 125 की जगह 45-60 दिनों में ही घर तैयार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (सितम्बर 12, 2020) को ‘प्रधानमंत्री आवास योजना- ग्रामीण’ के तहत मध्य प्रदेश में बने 1.75 लाख घरों का उद्घाटन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया। इस दौरान पीएम मोदी ने इस योजना के लाभार्थियों के साथ संवाद भी किया। राज्य के अलग-अलग लाभार्थियों से चर्चा के बाद पीएम मोदी ने कार्यक्रम को सम्बोधित भी किया और इस आवास योजना से आए बदलावों की चर्चा की।

पीएम मोदी ने कहा कि जिन लोगों को सपनों का घर मिला है, उन सभी की इस बार दिवाली और अन्य त्योहारों की खुशियाँ कुछ और ही होंगी। उन्होंने आवास योजना के लाभार्थियों से कहा कि कोरोना काल नहीं होता तो आज आपके जीवन की इतनी बड़ी खुशी में शामिल होने के लिए, आपके घर का एक सदस्य, आपका प्रधानसेवक आपके बीच होता। पीएम ने पौने 2 लाख परिवारों को उनके ‘गृह प्रवेश’ के लिए बधाई दी।

उन्होंने कहा कि आज का ये दिन करोड़ों देशवासियों के उस विश्वास को भी मज़बूत करता है कि सही नीयत से बनाई गई सरकारी योजनाएँ साकार भी होती हैं और लाभार्थियों तक पहुँचती भी हैं। उन्होंने कहा कि जिन साथियों को आज अपना घर मिला है, उनके भीतर के संतोष, उनके आत्मविश्वास को वो अनुभव कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस तेज़ी में बहुत बड़ा योगदान रहा शहरों से लौटे हमारे श्रमिक साथियों का।

पीएम मोदी ने जानकारी दी कि सामान्य तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर बनाने में औसतन 125 दिन का समय लगता है, लेकिन कोरोना के इस काल में पीएम आवास योजना के तहत घरों को सिर्फ 45 से 60 दिन में ही बनाकर तैयार कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि आपदा को अवसर में बदलने का ये बहुत ही उत्तम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि श्रमिकों ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोज़गार अभियान का पूरा लाभ उठाते हुए अपने परिवार को सँभाला और अपने गरीब भाई-बहनों के लिए घर भी तैयार करके दे दिया। पीएम मोदी ने कहा:

मुझे संतोष है कि पीएम गरीब कल्याण अभियान से मध्य प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में करीब 23 हज़ार करोड़ रुपए के काम पूरे किए जा चुके हैं। पीएम गरीब कल्याण अभियान के तहत घर तो बन ही रहे हैं, हर घर जल पहुँचाने का काम हो, आँगनबाड़ी और पंचायत के भवनों का निर्माण हो, पशुओं के लिए शेड बनाना हो, तालाब और कुएँ बनाना हो, ग्रामीण सड़कों का काम हो, गाँव के विकास से जुड़े ऐसे अनेक काम तेज़ी से किए गए हैं। 2014 में पुराने अनुभवों का अध्ययन करके, पहले पुरानी योजना में सुधार किया गया और फिर प्रधानमंत्री आवास योजना के रूप में बिल्कुल नई सोच के साथ योजना लागू की गई। इसमें लाभार्थी के चयन से लेकर गृह प्रवेश तक पारदर्शिता को प्राथमिकता दी गई।

पीएम मोदी ने कहा कि पहले गरीब सरकार के पीछे दौड़ता था, अब सरकार लोगों के पास जा रही है। उन्होंने दावा किया कि अब किसी की इच्छा के अनुसार लिस्ट में नाम जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता। चयन से लेकर निर्माण तक वैज्ञानिक और पारदर्शी तरीका अपनाया जा रहा है। बकौल पीएम, मटीरियल से लेकर निर्माण तक, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध और उपयोग होने वाले सामानों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

उन्होंने जानकारी दी कि घर के डिजाइन भी स्थानीय ज़रूरतों के मुताबिक तैयार और स्वीकार किए जा रहे हैं। साथ पूरी पारदर्शिता के साथ हर चरण की पूरी मॉनीटरिंग के साथ लाभार्थी खुद अपना घर बनाता है। पीएम ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना हो या स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनने वाले शौचालय हों, इनसे गरीब को सुविधा तो मिल ही रही है, बल्कि ये रोज़गार और सशक्तिकरण का भी बड़ा माध्यम हैं।

उन्होंने कहा कि विशेष तौर पर हमारी ग्रामीण बहनों के जीवन को बदलने में भी ये योजनाएँ अहम भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने इसी साल 15 अगस्त को दिए अपने सम्बोधन को याद करते हुए कहा कि 1 हज़ार दिनों में देश के करीब 6 लाख गाँवों में ऑप्टिकल फाइबर बिछाने का काम पूरा किया जाएगा। पहले देश की ढाई लाख पंचायतों तक फाइबर पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया था, अब इसको गाँव-गाँव तक पहुँचाने का संकल्प लिया गया है।

प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि जब गाँव में भी जगह-जगह बेहतर और तेज़ इंटरनेट आएगा, जगह-जगह WiFI हॉटस्पॉट बनेंगे, तो गाँव के बच्चों को पढ़ाई और युवाओं को कमाई के बेहतर अवसर मिलेंगे। उन्होंने आश्वस्त किया कि गाँव अब सिर्फ WiFi के ही हॉटस्पॉट से नहीं जुड़ेंगे, बल्कि आधुनिक गतिविधियों के, व्यापार-कारोबार के भी हॉटस्पॉट बनेंगे। इस दौरान मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान भी वीडियो के जरिए कार्यक्रम से जुड़े हुए थे।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे मध्य प्रदेश के विभिन्न इलाक़ों के रेहड़ी-पटरी वालों (स्ट्रीट वेंडर्स) के साथ ‘स्वनिधि संवाद’ में हिस्सा लिया था। सिर्फ 2 महीने में मध्य प्रदेश में 1 लाख से ज्यादा स्ट्रीट वेंडर्स, रेहड़ी-पटरी वालों को स्वनिधि योजना का लाभ सुनिश्चित हुआ है। इस योजना का मकसद है कि वो लोग नई शुरुआत कर सकें, अपना काम फिर शुरू कर सकें, इसके लिए उन्हें आसानी से पूँजी मिले।

ड्रग्स स्कैंडल: करन जौहर की पार्टी भी जाँच के दायरे में, 25 बॉलीवुड सितारों को तलब करने की तैयारी में NCB

सुशांत मामले की जाँच में एक नया मोड़ आया है। रिया चक्रवर्ती ने NCB के सामने बॉलीवुड के ऐसे नामों का खुलासा किया है जो कथित तौर पर ड्रग्स लेते हैं और दूसरों को यह मुहैया कराते हैं।

ख़बरों की मानें तो रिया चक्रवर्ती ने पूछताछ में कहा लगभग 80 फीसदी बॉलीवुड कलाकार ऐसे हैं जो ड्रग्स का सेवन करते हैं। रिया ने जिन नामों का खुलासा किया है उनमें से कई बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता, प्रोड्यूसर और निर्देशक भी हैं। अपने बयान में रिया चक्रवर्ती ने सुशांत सिंह राजपूत को ड्रग्स उपलब्ध कराने की बात भी स्वीकार की है।

हैरान कर देने वाले खुलासे में रिया चक्रवर्ती ने बताया कि सारा अली खान, रकुल प्रीत सिंह और डिज़ाइनर सिमोन खम्मबट्टा मादक पदार्थों का सेवन करती हैं। पूछताछ के दौरान रिया ने सुशांत सिंह की दोस्त रोहिणी अय्यर और फिल्म निर्माता मुकेश छाबड़ा पर भी ड्रग्स लेने का आरोप लगाया है।

सारा अली खान मशहूर अभिनेत्री अमृता सिंह और अभिनेता सैफ अली खान की बेटी हैं। सारा ने साल 2018 में आई ‘केदारनाथ’ फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत के साथ अभिनय किया था। रिया ने यह भी बताया कि सारा अली खान सुशांत सिंह और उनके दोस्तों के साथ थाइलैंड भी गई थीं।

इस तरह की तमाम बातों के सामने आने के बाद नार्कोटिक्स कण्ट्रोल ब्यूरो (NCB) ने बॉलीवुड के कुल 25 लोगों को समन भेजने की तैयारी पूरी कर ली है। इस सूची में कई बी ग्रेड अभिनेता और अभिनेत्री भी शामिल हैं जिन पर मादक पदार्थों के सेवन का आरोप है। ख़बरों की मानें तो एनसीबी ने ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और मोबाइल डाटा एकत्रित किया है, जिसके आधार पर यह साबित होता है कि बॉलीवुड के तमाम लोग ड्रग्स का सेवन करते थे। इतना ही नहीं उनके ड्रग कार्टेल से बराबर सम्बन्ध भी थे। एनसीबी ने ऐसे नामों की सूची तैयार कर ली है और आने वाले समय में इन सभी को समन भेजा जाएगा। 

30 जुलाई 2019 को करण जौहर के घर एक ड्रग्स हाउस पार्टी हुई थी। एनसीबी बहुत जल्द इस मामले में भी जाँच शुरू कर सकती है। करण जौहर के घर पर हुई इस पार्टी का वीडियो इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ था। अकाली दल के नेता मजिंदर सिंह ने इस वीडियो को ट्वीट करते हुए आरोप लगाया कि इसमें शामिल लगभग सारे लोग ड्रग्स के नशे में थे। 

वीडियो में रनबीर कपूर, अयान मुखर्जी, विकी कौशल, दीपिका पादुकोण, अर्जुन कपूर, मलाइका अरोड़ा, शाहिद कपूर, वरुण धवन समेत कई कलाकार नज़र आते हैं। हालाँकि करण जौहर, विकी कौशल समेत कई कलाकारों ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया था। हाल ही में बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने आरोप लगाया था कि बॉलीवुड के तमाम लोग हैं जो मादक पदार्थों का सेवन करते हैं। 

इसके अलावा कुछ तो ऐसे हैं जिन्हें कोकीन की बुरी लत है। कंगना ने सरकार से यह माँग भी उठाई थी कि जितने अभिनेताओं और निर्देशकों पर इस तरह के आरोप लगाए हैं उन सभी के खून की जाँच होनी चाहिए। कंगना ने अपने आरोप में यहाँ तक कहा था कि रणवीर सिंह, रणबीर कपूर, विकी कौशिक और निदेशक अयान मुखर्जी को कोकीन की आदत है।  

पूर्व नौसेना अधिकारी पर हमला करने वाले शिवसैनिकों को 12 घंटे में ही बेल, पीड़ित परिवार ने खुद को बताया असुरक्षित

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का कार्टून फॉरवर्ड करने पर मुंबई में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने पूर्व नौसेना अधिकारी मदन शर्मा पर हमला किया था। इस सिलसिले में गिरफ्तार 6 शिवसैनिकों को 12 घंटे के भीतर ही थाने से जमानत दे दी गई।

गिरफ्तार किए गए शिवसैनिकों में पार्टी का शाखा प्रमुख कमलेश कदम के अलावा 5 और कार्यकर्ता थे। पूर्व नौसेना अधिकारी शर्मा की शिकायत के बाद मुंबई की समता नगर पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार किया था।

शर्मा के परिवार ने कहा है कि वे अब खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे। पूर्व नौसेना अधिकारी के बेटे सनी शर्मा ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मॉंग की है।

वहीं आरोपित शिवसैनिकों को जमानत मिलने पर पूर्व नेवी ऑफिसर की बेटी शीला शर्मा ने कहा, “एक वरिष्ठ नागरिक पर हमला किया गया है। पुलिस को पता होना चाहिए कि आरोपियों को किन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। उन्हें हत्या की कोशिश के आरोप के तहत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार की जमानत नहीं मिलनी चाहिए थी।”

बता दें मदन शर्मा सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी पर शुक्रवार को मुंबई में हमला हुआ था। इस हमले को लेकर उन्होंने सरकार से माँग करते हुए कहा, “हमारे देश में, हर व्यक्ति स्वतंत्रत है। वाट्सऐप जुड़े रहने और जानकारी साझा करने का एक माध्यम है। सरकार को किसी संदेश के स्रोत की पहचान करने के लिए उपाय करना चाहिए जहाँ से यह उत्पन्न होता है।”

एफआईआर को लेकर पूर्व नेवी ऑफिसर की बेटी शीला शर्मा ने बताया था कि, “उनके पास मैसेज फॉरवर्ड करने के बाद धमकी भरी कॉल्स आईं। शिवसेना के कई कार्यकर्ताओं ने उनकी (पिता) बुरी तरह से पिटाई की। उसके बाद पुलिस हमारे घर आई और हमारे पिता को अपने साथ लेकर गई। हमने एक एफआईआर दर्ज कराई है।”

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का कार्टून शुक्रवार को सोशल मीडिया में फॉरवर्ड करने पर मुंबई में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने सेवानिवृत्त नेवी ऑफिसर मदन शर्मा पर हमला बोल दिया था। इस हमले में पूर्व नेवी अधिकारी की आँख बुरी तरह जख्मी हो गई थी।

घटना को लेकर पीड़ित पूर्व नौसेना अधिकारी ने भी मीडिया को बताया था कि उन्हें मैसेज फॉरवर्ड करने के बाद से ही कॉल आ रहे थे और बार-बार उनसे नीचे उतर कर आने को कहा जा रहा था। उनके मुताबिक, जैसे ही वो नीचे उतरे, लोगों ने उन्हें मारना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि बाद में पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई थी। मगर वह अपने घर से बाहर ही नहीं निकले। वरना आरोपितों की जगह वो जेल में होते।

‘पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर’: कंगना को शिवसेना ने इशारों में धमकाया, आठवले को बताया आंबेडकर का नकली अनुयायी

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में एक बार फिर से बिना नाम लिए कंगना रनौत पर निशाना साधा गया है। ‘सामना’ में कपूर, रौशन, दत्त और शांताराम जैसे खानदानों की बात कर ऐसा दिखाया गया है जैसे मुंबई चंद मुट्ठी भर लोगों की बपौती है और जैसे संगीत में घराना होता है, ऐसे ही यहाँ भी होता है। नेपोटिज्म का बचाव करने के अलावा शिवसेना की ‘सामना’ में लिखा गया है कि यहाँ औरंगजेब और अफजल खान को सम्मान देते हुए उनकी कब्रें बनाई गईं।

शिवसेना की ‘सामना’ में प्रकाशित संपादकीय में राजेश खन्ना, धर्मेंद्र और जीतेन्द्र के आउटसाइडर होने और उनके बेटे-बेटियों के यहाँ स्थापित होने का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि इनमें से हर किसी ने मुंबई को अपनी कर्मभूमि माना और मुंबई को बनाने-सँवारने में योगदान दिया। साथ ही कंगना रनौत का नाम लिए बिना इशारों में लिखा गया है कि पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया या खुद कांच के घर में रहकर दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंका।

साथ ही कंगना रनौत द्वारा मुंबई को POK कहे जाने की बात करते हुए शिवसेना के ‘सामना’ में दावा किया गया कि मुंबई के हिस्से अक्सर ये विवाद आता रहता है और जिसने इसे शुरू किया, उसे ये विवाद मुबारक। इस बयान की तुलना महाभारत के एक प्रसंग से करते हुए लिखा गया कि कौरव जब दरबार में द्रौपदी का चीरहरण कर रहे थे, उस समय सारे पांडव अपना सिर झुकाए बैठे थे। साथ ही पूछा कि राष्ट्रीय एकता का ये तुनतुना हमेशा मुंबई-महाराष्ट्र के बारे में ही क्यों बजाया जाता है?

इस लेख में बड़ी चालाकी से कंगना रनौत के दफ्तर तोड़े जाने या फिर संजय राउत द्वारा उनके लिए ‘हरामखोर’ जैसे आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किए जाने को लेकर कुछ नहीं कहा गया और उलटा कंगना की तुलना दुर्योधन और मुंबई की तुलना द्रौपदी से कर दी गई। अगर वे थोड़ा और आगे बढ़ते तो उद्धव ठाकरे को श्रीकृष्ण भी लिखा जा सकता था। साथ ही इसमें मराठी दलित नेता रामदास आठवले पर भी निशाना साधा गया।

ज्ञात हो कि ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले कंगना रनौत से मिलने उनके घर पहुँचे थे और साथ ही उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एयरपोर्ट पर पहुँच कर भी शिवसेना कार्यकर्ताओं से लोहा लिया था और कंगना रनौत का समर्थन किया था। इससे भड़की शिवसेना के गुस्से को ‘सामना’ के इस संपादकीय से समझा जा सकता है, जिसमें उन पर महाराष्ट्र-द्वेषियों के साथ कुर्सी गर्म कर बाबा साहब आंबेडकर का अपमान करने का आरोप लगाया गया है। 

इसमें लिखा गया है कि जिनका डॉ. आंबेडकर के विचारों से कौड़ी का भी लेना-देना नहीं है, ऐसे दिखावटी अनुयायी हवाई अड्डे पर महाराष्ट्र-द्वेषियों का स्वागत करने के लिए नीले रंग का झंडा लेकर हंगामा करते हैं। साथ ही बॉलीवुड को लेकर याद दिलाया गया है कि सिने जगत की नींव दादासाहेब फालके नामक एक मराठी माणुस ने ही रखी थी। ‘सामना’ के इस संपादकीय में इस विवाद को लेकर आगे लिखा है:

“किसी का नसीब चमक जाने पर इसी मुंबई के जुहू, मलबार हिल और पाली हिल जैसे क्षेत्रों में महल खड़ा करते हैं। इतना तो है कि ये लोग हमेशा मुंबई-महाराष्ट्र के प्रति कृतज्ञ ही रहे। मुंबई की माटी से उन्होंने कभी बेईमानी नहीं की। दादासाहेब फालके को कभी ‘भारत रत्न’ के खिताब से सम्मानित नहीं किया गया। लेकिन उनके द्वारा बनाई गई माया नगरी के कई लोगों को ‘भारत रत्न’ ही नहीं, बल्कि ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ तक का खिताब मिला। मधुबाला, मीना कुमारी, दिलीप कुमार और संजय खान जैसे दिग्गज कलाकारों ने पर्दे पर अपना ‘हिंदू’ नाम ही रखा क्योंकि उस समय यहाँ धर्म नहीं घुसा था।”

दादासाहब फाल्के को ‘मराठी मानुष’ बता कर इसे भुनाते हुए लिखा गया है कि मुंबई को कम आँकना मतलब खुद-ही-खुद के लिए गड्ढा खोदने जैसा है और महाराष्ट्र संतों-महात्माओं और क्रांतिकारों की भूमि है। ज्ञात हो कि कंगना प्रकरण के बाद बॉलीवुड में खामोशी छाई हुई है, जबकि रिया की गिरफ्तारी के बाद उसके समर्थन में ये लोग मुखर थे। सामना के संपादकीय में अप्रत्यक्ष रूप से कहा गया है कि जब यहाँ के स्थापित बड़े-बड़े नाम अपना मुँह नहीं खोल पाए तो कंगना क्या चीज है?

बता दें कि कंगना रनौत के ऑफिस में की गई तोड़फोड़ के ठीक अगली सुबह शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ अखबार की बड़ी खबर का शीर्षक था– ‘उखाड़ दिया।’ शिवसेना ने इस शीर्षक के साथ ही स्पष्ट कर दिया था कि कंगना रनौत के टि्वर पर शिवसेना को दी गई चुनौती का ही नतीजा था कि उसकी सरकार ने अभिनेत्री का ऑफिस तोड़ डाला। दिलचस्प तो यह देखना है कि कंगना के खिलाफ इस खुली गुंडागर्दी के दौरान भी देश के वाम-उदारवादी वर्ग एकदम मौन हैं।

TRP भक्षी गिद्ध राजदीप की संबित पात्रा ने कह कर बैंड बजा दी, अपने ही चैनल पर बगलें झाँकने लगा TRP खोर सरदेसाई

जब से अर्नब गोस्वामी की ‘R भारत’ ने TRP के मामले में सारे हिंदी चैनलों को पछाड़ा है और सालों से नंबर-1 पर बैठे ‘आजतक’ को पीछे छोड़ दिया, तब से कई पत्रकार मीडिया की नैतिकता का हवाला देते हुए ज्ञान दे रहे हैं। अंग्रेजी में भी ‘रिपब्लिक भारत’ ने ‘इंडिया टुडे’ सहित सभी चैनलों को तभी से पीछे छोड़ रखा है। इसी बहस के बीच भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने राजदीप सरदेसाई की क्लास ले ली।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत की मीडिया कवरेज को लेकर हो रही बहस में ‘इंडिया टुडे’ पर संबित पात्रा ने कहा कि ये क्या ‘राजा-राजा-राजा’ लगा रखा है। संबित पात्रा ने कहा कि एक कॉन्ग्रेस नेता ने कहा है कि ‘राजा’ के इशारे पर ये सब हो रहा है। इसके बाद उन्होंने राजदीप सरदेसाई से पूछा कि आपको ‘राजा’ ने कब फोन कॉल कर के कहा कि आप रिया चक्रवर्ती के इंटरव्यू लो? क्या किसी भाजपा नेता या पीएम मोदी ने आपको रिया का इंटरव्यू लेने को कहा?

इसके बाद संबित पात्रा ने खुद जवाब देते हुए ये भी बताया कि आखिर राजदीप सरदेसाई ने रिया चक्रवर्ती का इंटरव्यू क्यों लिया। उन्होंने कहा कि ये सब इसीलिए किया गया, क्योंकि इसके पीछे एक खास एजेंडा था। उन्होंने कहा कि वो किसी का नाम नहीं लेंगे, लेकिन 13 दिसंबर 2001 को एक रिपोर्टर ने क्या किया था, वो ये बताना चाहेंगे। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार ने बताया था कि संसद में वो लोग माँस और शराब की पार्टी करने जा रहे थे।

बकौल संबित पात्रा, उस पत्रकार ने बताया था कि जैसे ही आतंकवादियों ने संसद भवन में घुसपैठ किया और चारों ओर कोलाहल फ़ैल गया, उसने गार्ड्स को कहा कि वो दरवाजों को बंद कर दे, ताकि कोई और पत्रकार अंदर घुस कर इस आतंकी हमले की कवरेज नहीं कर पाए। उस पत्रकार ने इसके बाद कहा कि वो अपने टीवी चैनल की टीआरपी बढ़ाना चाहता है, इसीलिए वो ऐसा कर रहा है। पात्रा ने कहा कि वो उस पत्रकार का नाम नहीं लेंगे।

संबित पात्रा ने कहा कि उस पत्रकार ने आगे बताया था कि आखिर में तो वो लोग गिद्ध की तरह ही हैं, जो हमेशा ज्यादा से ज्यादा खून और माँस के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि इससे उन्हें ‘व्यक्तिगत संतुष्टि’ मिलती है। साथ ही संबित पात्रा ने कहा कि उक्त पत्रकार ने संसद भवन पर हुए हमले को अपनी ज़िंदगी का ‘ग्रेट डे’ करार दिया था। इस दौरान राजदीप सरदेसाई बगलें झाँकते नज़र आए और कहने लगे कि इसका इस केस से कोई रिश्ता नहीं है।

इससे पहले सुशांत मामले पर राय देते हुए राजदीप सरदेसाई ने कहा था कि पुलिस को अब जाँच नहीं करनी चाहिए और सुशांत सिंह राजपूत के परिवार को ‘चैन से शोक मनाने’ देना चाहिए और साथ ही उनकी आत्मा की शांति को भंग नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि ट्विटर और इंस्टाग्राम में हो-हल्ला के कारण ये सब हो रहा है। तब एक IPS अधिकारी ने राजदीप को समझाया था कि क़ानून के अनुसार आत्महत्या से हुई हर मौत के बाद जाँच होनी ही होनी है।

‘घर के पास मँडरा रहे आतंकी’: जयपुर ब्लास्ट में सैफ, सरवर, सैफुर्रहमान और सलमान को फाँसी सुनाने वाले जज खतरे में

2008 के जयपुर सीरियल ब्लास्ट में चार को मौत की सजा सुनाने वाले जज अजय कुमार शर्मा ने अपनी जान को खतरा बताया है। रिटायर हो चुके जज शर्मा ने इस संबंध में राजस्थान के डीजीपी को पत्र लिखा है। पत्र में खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि उन्होंने जिन 4 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी वे आतंकी समूह से जुड़े थे। इनसे उन्हें और उनकी परिवार को खतरा है। इसे देखते हुए उनकी और उनके परिवार की सुरक्षा बढ़ा दी जाए।

बीते साल दिसंबर में विशेष कोर्ट के जज शर्मा ने जयपुर में साल 2008 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में मोहम्मद सैफ, मोहम्मद सरवर आजम, सैफुर्रहमान और मोहम्मद सलमान को मौत की सजा सुनाई थी। इन बम धमाकों में 71 लोगों की जान चली गई थी, वहीं 185 लोग घायल हो गए थे।

अजय कुमार शर्मा ने पत्र में कहा है, “अधिकारियों का कहना है कि मेरी सुरक्षा हटा दी गई है। मेरा निवेदन है कि मुझ पर मँडरा रहे ख़तरे को देखते हुए मेरी सुरक्षा जारी रखी जाए।” उन्होंने पत्र में दावा किया कि पिछले कई दिनों में उन पर शराब की खाली बोतलें फेकी गई हैं। इसके अलावा दो पहिया सवार अज्ञात लोग उनके घर के आस – पास मँडराते हुए नज़र आए हैं। उन्होंने पत्र में यह भी लिखा, “आतंकवादी समूह बहुत खतरनाक हैं और वह कुछ भी कर सकते हैं। तमाम लोग कई बार मेरे घर की तस्वीर लेते हुए भी नज़र आए हैं।” 

उन्होंने कहा है, “इस मामले पर फैसला सुनाने के बाद मुझे और मेरे परिवार को 4 सुरक्षाकर्मी और 2 निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) दिए गए थे। वह अभी तक मेरी सुरक्षा के लिए तैनात हैं। लेकिन मैंने सुना है कि उन्हें भी हटाया जा रहा है। मैं आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं हूँ कि निजी सुरक्षाकर्मी रख सकूँ। मेरी गलती सिर्फ इतनी है कि मैंने आतंकवादियों को मृत्युदंड दिया है। मुझे इस बात का डर है कि वह बदला लेने ज़रूर आएँगे। मुझे और मेरे परिवार वालों को इन आतंकवादियों से ख़तरा है, कृप्या इस मामले का संज्ञान लिया जाए।”

जयपुर के मंडलायुक्त आनंद श्रीवास्तव ने कहा है कि आईबी की तरफ से इस मुद्दे पर पत्र मिला है और हम पूर्व न्यायाधीश अजय कुमार शर्मा की सुरक्षा समीक्षा कर रहे हैं। हम जल्द ही इस मामले पर उचित कदम उठाएँगे।

खुद पर मॅंडरा रहे खतरे की गंभीरता का एहसास दिलाने के लिए जज शर्मा ने नीलकंठ गंजू का उल्लेख किया है। नीलकंठ गंजू कश्मीर के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे। साल 1984 में उन्होंने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के ख़ूँख़ार आतंकवादी मकबूल भट्ट को पुलिस इन्स्पेक्टर अमर चंद की  हत्या के मामले में सज़ा-ए-मौत सुनाई थी। 2 अक्टूबर 1989 को जेकेएलएफ़ के आतंकवादियों ने उन्हें जान से मार दिया था।

पूर्व न्यायाधीश शर्मा ने कहा है कि ये सभी आतंकवादी आईएसआई से जुड़े हुए हैं और वह संगठन के स्लीपर सेल के लिए सक्रिय रूप से काम करते थे। सभी आतंकवादी बेहद ख़ूँख़ार हैं और वह बदला ज़रूर लेंगे।

2008 जयपुर बम धमाके

13 मई 2008 को राजस्थान की राजधानी में 9 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन बम धमाकों में 71 लोगों की जान गई थी और 250 लोग घायल हुए थे। सारे बम अमोनियम नाइट्रेट से तैयार किए गए थे और कुल 20 मिनट के अंतराल में इनमें विस्फोट हुआ था। सभी बम साइकिल में बाँधे गए थे। इन सभी बमों में लोहे के बहुत सारे टुकड़े और बियरिंग डाली गई थी जिससे आबादी वाली क्षेत्र में इससे ज़्यादा नुकसान पहुँचे।  

बम धमाकों के ठीक दो दिन बाद आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी। दिसंबर 2008 में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई थी। लगभग 11 साल तक चली इस सुनवाई के बाद दिसंबर 2019 में विशेष न्यायाधीश अजय कुमार शर्मा ने इस मामले में 4 आतंकवादियों को मृत्युदंड का आदेश सुनाया था। इसमें मोहम्मद सैफ (34), मोहम्मद सरवर आजम (36), सैफुर्रहमान (36) और मोहम्मद सलमान (34) शामिल थे। इन पर आतंकवाद निरोधक दस्ता (ATS) ने भारतीय दंड संहिता की तमाम धाराओं समेत गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, विस्फोटक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।