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महिला CPI-M कैडर ने की आत्महत्या: सुसाइड नोट में लगाया दो माकपा कार्यकर्ताओं पर उत्पीड़न का आरोप

केरल में 41 वर्षीय महिला CPI-M कैडर ने पार्टी कार्यालय के अंदर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मृत माकपा कार्यकर्ता का नाम आशा बताया जा रहा है। पुलिस ने मौके पर से आशा द्वारा लिखा गया सुसाइड नोट बरामद किया है। इसमें आशा ने दो सीपीआई (एम) सदस्यों पर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। इसके साथ ही आशा ने सुसाइड नोट में पार्टी को उसकी शिकायत पर ध्यान नहीं देने के लिए दोषी ठहराया है।

आशा के परिवार वालों का कहना है कि वो आशा कार्यकर्ता के रूप में काम करने के साथ ही माकपा की सदस्य भी थीं। उसने कुछ दिन पहले भी पार्टी की एक समिति की बैठक में हिस्सा लिया था। हालाँकि, पार्टी ने आशा के सदस्य होने की बात से इनकार किया है। फिलहाल पुलिस यह पुष्टि नहीं कर पा रही है कि वह पार्टी की सदस्य थी या फिर सिर्फ समर्थक।

गुरुवार (सितंबर 10, 2020) को वह कभी वापस न आने की बात कहकर पार्टी ऑफिस के लिए निकली थी। इससे चिंतित परिजन जब आशा की खोज में पार्टी ऑफिस पहुँचे तो वहाँ उसे फाँसी के फंदे से लटकते पाया। 

बरामद किए गए सुसाइड नोट में, आशा ने उल्लेख किया कि पार्टी के दो नेता – स्थानीय समिति के सदस्य कोट्टमन राजन और शाखा सचिव अनाथारविलाकम जॉय, उसे लंबे समय से उसे मानसिक रूप से परेशान कर रहा था, जिसके कारण वह डिप्रेशन का शिकार हो गई। सुसाइड नोट में यह भी कहा गया है कि उसने इस मामले को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने कई बार उठाया, मगर हर बार उसे अनसुना कर दिया गया।

आशा की मौत से खलबली मच गई। आशा के परिजनों ने शव लेने से इनकार कर दिया और कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। बाद में, पुलिस ने उन्हें शांत करा दिया और शव को पोस्टमार्टम के लिए तिरुवंतपुरम मेडिकल कॉलेज भेज दिया।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने कहा कि सीपीआई-एम पार्टी में महिलाएँ सुक्षित नहीं है। उन्होंने डीजीपी से निष्पक्ष जाँच के लिए कहा है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि जब महिला ने राजन और जॉय द्वारा प्रताड़ित किए जाने का मामला उठाया गया था, तो ‘वरिष्ठ कॉमरेड’ कार्रवाई करने में विफल क्यों हैं। बता दें कि राजन और जॉय के खिलाफ अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

पुलिस प्रथम दृष्टया मानती है कि यह आत्महत्या का मामला है। सीनियर इंस्पेक्टर रतीश कुमार ने TNM से कहा कि राजन और जॉय के खिलाफ अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है। उन्होंने कहा, “सुसाइड नोट के आधार पर उनके खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। हम जाँच कर रहे हैं कि क्या आत्महत्या में उनकी कोई भूमिका थी। अगर ऐसा पाया जाता है तो उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जाएगा।”

‘काफिर काफिर शिया काफिर’: कराची में सिपाह सहाबा से जुड़े कट्टरपंथी सुन्नियों ने निकाला शिया विरोधी रैली, की पत्थरबाजी

शुक्रवार को हज़ारों की तादाद में सुन्नी कट्टरपंथी समूहों ने कराची की सड़कों पर शिया विरोधी आन्दोलन किया। इस्लाम के दो वर्गों के बीच इतने बड़े पैमाने पर तनाव पैदा होने पर हिंसा की घटनाओं का ख़तरा भी बढ़ गया था। हाल ही पाकिस्तानी शिया नेता ने कथित तौर पर मुहर्रम जुलूस के सीधे प्रसारण के दौरान ऐतिहासिक इस्लामिक चेहरों पर अनैतिक टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी के चलते उस शिया नेता पर ईशनिंदा का आरोप लगा था जिसके विरोध में सुन्नी समुदाय के हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे थे। 

विरोध प्रदर्शन मोहम्मद अली जिन्नाह की मज़ार ‘मज़ार-ए -कायद’ के पास शुरू हुआ था। इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले कट्टरपंथी सुन्नी तमाम शिया विरोधी समूहों से जुड़े हुए थे। इसमें सिपाह-ए-सहाबा और तहरीक लब्बाइक पाकिस्तान मुख्य थे। यह सभी समूह शिया समुदाय के लोगों को काफ़िर मानते हैं। ख़बरों की मानें तो सिपाह-ए-सहाबा ने पिछले कुछ समय में पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों शिया समुदाय वालों की हत्या की है। 

सुन्नियों का नारा काफ़िर काफ़िर शिया काफ़िर 

इन विरोध प्रदर्शनों के तमाम वीडियो भी सामने आए हैं जिसमें हज़ारों की भीड़ देखी जा सकती है। ऐसे ही एक वीडियो में सुन्नी कट्टरपंथी बसों को रोकते हुए, झंडे फहराते हुए और शिया विरोधी नारे लगाते हुए देखे जा सकते हैं। लगाए गए तमाम नारों में एक नारा था ‘काफ़िर काफ़िर शिया काफ़िर।’ सैय्यद हुसैन मुजतबा रिज़वी नाम के ट्विटर यूज़र ने विरोध प्रदर्शन का वीडियो साझा करते हुए लिखा, “तो अब यह सब भी शुरू हो चुका है। सिपाह सहाबा और तहरीक लब्बाइक पाकिस्तान कराची में काफ़िर काफ़िर शिया काफ़िर के नारे लगा रहे हैं। इमाम बरगाह इमामिया पर तमाम गुंडों ने हमला भी किया है और कुछ ने तो पत्थर भी चलाए।” 

सुन्नी कट्टरपंथियों ने चलाए इमामबारगाह पर पत्थर

इसी तरह के एक और वीडियो में सिपाह सबाहा से सम्बंधित सुन्नी कट्टरपंथी इमाम बरगाह (शिया समुदाय के लोगों का एकत्रित होने का स्थान) पर पत्थर फेंकते हुए देखे जा सकते हैं। इस वीडियो में भी भीड़ शिया विरोधी नारे लगाते हुए सुनी जा सकती है और यह सब कुछ प्रदर्शन के दौरान ही हो रहा था। 

हाल ही में जमात उलेमा-ए-इस्लाम नाम के राजनैतिक संगठन के नेता करी उस्मान ने एक भाषण दिया था। अपने भाषण में उसने कहा था, “हम किसी भी तरह का अपमान और मानहानि नहीं सहेंगे। शिया जो पाकिस्तान की आबादी का सिर्फ 20 फ़ीसदी हैं, उन्हें मुहर्रम के जुलूस के दौरान निशाना बनाया गया। साल 2013 के बाद से शिया विरोधी हिंसा में सामान्य गिरावट भले आई है लेकिन वर्ग के आधार पर होने वाले हमले देश के तमाम इलाकों में अभी तक जारी हैं।” 

पाकिस्तान में ईशनिंदा 

पाकिस्तान में ईशनिंदा एक अपराध है और कुछ मामलों में इसके लिए मृत्यु दंड का भी प्रावधान है। इससे सम्बंधित क़ानून का इस्तेमाल अक्सर अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित वर्ग के लोगों पर अत्याचार करने के लिए किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति पर ईशनिंदा के आरोप साबित नहीं होते तो इस्लामी भीड़ उसकी लिंचिंग (पीट-पीट कर हत्या) कर देती है। ईशनिंदा का क़ानून यह कहता है कोई भी इंसान अगर अपने शब्दों से (लिखित या मौखिक), चित्रण के सहारे, आरोप या कटाक्ष के ज़रिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पैगंबर मोहम्मद का अपमान करता है। उस इंसान को जुर्माना, आजीवन कारावास या कुछ मामलों में मृत्यु दंड तक सुनाया जा सकता है। 

जब सुन्नी समुदाय ने कोरोना वायरस को कहा शिया वायरस   

हाल ही में तमाम पाकिस्तानी लोगों ने शिया समुदाय के लोगों की आलोचना की थी। दरअसल शिया समुदाय के लोग ईरान स्थित अपने धार्मिक स्थल से वापस लौटे थे जिसकी वजह से पाकिस्तान के लोगों का कहना था कि सारे शिया अपने साथ कोरोना वायरस लेकर आए हैं। कुछ कट्टरपंथियों ने तो यहाँ तक कहा कि इस वायरस के लिए चीन से ज़्यादा शिया लोग ज़िम्मेदार हैं इसलिए इस वायरस का नाम ‘शिया वायरस’ होना चाहिए। कुछ लोगों ने कहा कि शिया समुदाय के लोग जानबूझ कर पाकिस्तान में कोरोना वायरस लेकर आए। और कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि शिया समुदाय के लोग इस्लाम के असली दुश्मन हैं।                

नीरव मोदी को ‘बलि का बकरा’ बनाया गया, भारत में नहीं मिलेगा निष्पक्ष सुनवाई का मौका: मार्कंडेय काटजू ने किया बचाव

लंदन के वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट में बचाव पक्ष के गवाह के तौर पर शुक्रवार को पेश हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा कि नीरव मोदी को भारत में निष्पक्ष ट्रायल नहीं मिल पाएगा। बैंक से करोड़ों की धोखाधड़ी कर लंदन भागे नीरव मोदी मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई के दौरान पूर्व जस्टिस काटजू ने कहा कि अगर हीरा कारोबारी नीरव मोदी का भारत में प्रत्यर्पण किया जाता है तो भारत में निष्पक्ष ट्रायल नहीं मिल पाएगा

नई दिल्ली से 130 मिनट के अपने बयान में काटजू ने आरोप लगाया कि भारत में न्यायिक व्यवस्था चौपट हो गई है। उन्होंने दावा किया कि जाँच एजेंसियाँ जैसे- सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय राजनीतिक गुरुओं के इशारों पर काम कर रही हैं।

भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी पर पंजाब नैशनल बैंक को दो अरब अमेरिकी डॉलर का चूना लगाने और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। काटजू ने नीरव मोदी के बचाव में लिखित और मौखिक दावों में कहा कि भारत में न्यायपालिका का अधिकांश हिस्सा भ्रष्ट है और जाँच एजेंसियाँ सरकार की ओर झुकाव रखती हैं। लिहाजा नीरव मोदी को भारत में निष्पक्ष सुनवाई का मौका नहीं मिलेगा।

कोर्ट में पाँच-दिवसीय सुनवाई नीरव मोदी के प्रत्यर्पण ट्रायल का हिस्सा है, जिसमें जजों को यह तय करने की आवश्यकता है कि क्या भारत सरकार द्वारा पेश साक्ष्य के आधार पर भारत में उसके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला है- सजा या अपराध के निर्णय तक नहीं पहुँचने के लिए।

काटजू ने अपने आरोपों के समर्थन में कई केस और मुद्दों को रखा, जिनमें 2019 में पूर्व जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच की तरफ से अयोध्या पर दिया गया फैसला शामिल हैं, जिन्हें बाद में राज्यसभा का सदस्य नियुक्त किया गया। इसके साथ ही, उन्होंने रिटायरमेंट के बाद जजों की नियुक्ति, मीडिया ट्रायल और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी रखा।

रविशंकर प्रसाद की तरफ से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नीरव मोदी को “अपराधी” कहने पर सवाल उठाते हुए काटजू ने कहा, “भारत सरकार ने अपने दिमाग में बिठा लिया है कि नीरव मोदी एक अपराधी है। क्या रविशंकर प्रसाद जज हैं? किस तरह के वह कानून मंत्री हैं? कैसे हम निष्पक्ष ट्रायल की उम्मीद करेंगे? ”

काटजू के इन दावों पर भारत सरकार की ओर से मुकदमा लड़ रही ब्रिटेन की क्राउन प्रोसिक्यूशन सर्विस (सीपीएस) ने पलटवार किया।

बैरिस्टर हेलेन मैल्कम ने सवाल किया, ”क्या ऐसा संभव है। आप स्वघोषित गवाह हैं, जो कुछ भी बयान दे सकते हैं।” इस पर काटजू ने जवाब दिया, ”आप अपने विचार रखने के हकदार हैं।”  

मैल्कम ने इस विचाराधीन मामले में ब्रिटेन की अदालत में पेश किए जाने वाले सबूतों के संबंध में इस सप्ताह की शुरुआत में भारत में मीडिया को साक्षात्कार देने के काटजू के फैसले के बारे में भी सवाल किया, जिस पर काटजू ने कहा कि वह केवल पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहे थे और ”राष्ट्रीय महत्व” के मामलों पर बोलना उनका कर्तव्य है।

बता दें कि 5 दिन की सुनवाई के अंतिम दिन जस्टिस सैमुअल गूजी ने काटजू की विस्तृत गवाही सुनने के बाद मामले की सुनवाई 3 नवंबर तक स्थगित कर दी। तीन नवंबर को वह भारतीय अधिकारियों की तरफ से पेश किए गए सबूतों की स्वीकार्यता से जुड़े तथ्यों पर सुनवाई करेंगे।

मुनव्वर फारूखी के खिलाफ दर्ज शिकायत को FIR में बदलने में 3-4 महीने लगेंगे या 1 साल: शिकायतकर्ता ने किया प्रशासन से सवाल

स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर हिंदू देवी देवताओं के ख़िलाफ़ अभद्र टिप्पणी करने वाले मुनव्वर फारूकी पर पिछले महीने दिल्ली में एक शिकायत दर्ज हुई थी। यह शिकायत पेन ऑफ धर्म के एडमिन शिवम रावत ने की थी। उन्होंने शिकायत में फारूकी की कई ‘आपत्तिजनक’ वायरल वीडियोज का हवाला देकर उसके खिलाफ कार्रवाई की अपील की थी। हालाँकि, ताजा सूचना के अनुसार, इस शिकायत को लगभग एक महीने बीत जाने के बाद भी इस पर कोई सुनवाई नहीं है। यहाँ तक कि अभी इस मामले में एफआईआर भी दर्ज नहीं हुई है।

शिवम रावत बताते हैं कि वह शिकायत कराने के बाद से इस मामले पर एसएचओ से फॉलोअप ले रहे थे। पर कुछ दिन पहले उन्हें बोला गया कि ये मामला बेहद संवेदनशील है। इसलिए इसे डीसीपी देखेंगे।

शिवम के अनुसार, डीसीपी के पास इस केस को पहुँचे करीब 10 दिन हो चुके हैं। आज उनसे कहा गया है कि ऐसे मामलों में समय लगता है। ऑपइंडिया से बात करते हुए वे कहते हैं, “मैं समझ सकता हूँ इन चीजों में टाइम लगता है। पर, अब करीब 4 हफ्ते बीत चुके हैं। मेरी शिकायत वायरल वीडियोज के आधार पर हैं। जो 3-4 महीने पहले ट्विटर पर ट्रेंड भी हो चुकी हैं। इसलिए ये केस एकतरफा नहीं है या मैं कोई प्रोपगेंडा नहीं फैला रहा। मगर, बावजूद इसके एफ़आईआर होने में समय लग रहा है।”

शिवम बताते हैं कि वह जब भी इस केस के बारे में जानना चाहते हैं तो उनसे यही कहा जाता है कि पड़ताल चल रही हैं। उन्हें ये नहीं बताया जा रहा कि प्राथमिकी दर्ज होने में कितना समय लगेगा। उनका सवाल है कि आखिर इसके लिए उन्हें 3-4 महीने तक रुकना है या फिर एक साल तक?

पेन ऑफ धर्म के एडमिन कहते हैं, “मैं मानता हूँ कि FIR होना इतना आसान बात नहीं हैं। लेकिन मुझे इतना भी पता है कि आमतौर पर FIR होने में इतना समय नहीं लगता। क्योंकि इसके बाद ही किसी की शिकायत पर असली जाँच शुरू होती है। उससे पहले शिकायत सिर्फ़ एक जरिया होती है कि केस अब आगे बढ़ेगा।”

यहाँ बता दें कि ऑपइंडिया ने शिवम की शिकायत और सवालों के मद्देनजर किशनगढ़ थाने में संपर्क किया था। लेकिन उन्होंने इस केस में कोई भी जानकारी साझा करने से मना कर दिया। इसके बाद ऑपइंडिया ने क्षेत्र के डीसीपी से बात करने की भी कोशिश की। लेकिन उनसे हमारा संपर्क नहीं हो पाया। शिवम लगातार इस मामले पर एफआईआर की माँग कर रहे हैं, ताकि फारूकी को उसके किए की सजा मिल सके।

उन्होंने 21 अगस्त को अपने ट्विटर पर भी इस संबंध में ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने कई पत्रकारों समेत दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, गृहमंत्री अमित शाह एवं डीसीपी को टैग करके एफआईआर की गुहार लगाई थी।

16 अगस्त को हुई थी फारूकी के खिलाफ़ शिकायत दर्ज

गौरतलब है कि 16 अगस्त को दिल्ली के किशनगढ़ थाने में पेन ऑफ धर्म के एडमिन शिवम रावत ने फारूकी के खिलाफ़ शिकायत दर्ज करवाते हुए फारूकी समेत मुंबई स्थित ‘द हैबीटेट- कॉमेडी एंड म्यूजिक कैफे’ पर भी एफआईआर दर्ज करने की अपील की थी।

उनका कहना था कि कुछ समय पहले जब फारूकी की वीडियोज वायरल होना शुरू हुईं थी, तब कई एक्टिविस्टों ने इस मामले को उठाया था। चारों ओर से आलोचना और निंदा को देखते हुए उस वीडियो से विवादित पार्ट को हटा दिया गया और यूट्यूब पर वीडियो मौजूद रही।

कई शिकायतों के बाद भी जब फारूकी पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो उसकी हिम्मत और बढ़ गई। नतीजतन ये दोबारा यूट्यूब पर आया और इस बार एक नए अंदाज में उन लोगों का मजाक बनाया जो उसके ख़िलाफ़ थे। उसने इस वीडियो में उन लोगों (मुख्यत: हिंदुओं) को ‘भेड़ों की नस्ल’ बताया। साथ ही कहा कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आगे वो आगे नेटफ्लिक्स पर भी आएगा। लोगों ने उसके ख़िलाफ़ शिकायत करके बस उसे फेमस किया है।

चीन ने अरुणाचल से लापता पाँच लोगों को भारतीय सेना को सौंपा, पहले भी अनजाने में कई युवाओं ने पार किया है LAC

सीमा पर भारत और चीन के बढ़ते तनाव के बीच चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने अरुणाचल प्रदेश से लापता पाँच युवाओं को शनिवार को रिहा कर दिया है। भारतीय सेना ने एक प्रेस रिलीज जारी कर यह जानकारी दी है।

भारतीय सेना के बयान के अनुसार, सभी औपचारिकाताएँ पूरी करने के बाद सभी पाँचों लोगों को किबितू सीमा के पास वाचा में रिसीव किया गया है। वापस आए सभी लोगों को कोरोना वायरस प्रोटोकॉल के अनुसार 14 दिनों के लिए क्वारंटाइन किया जाएगा और उसके बाद ही उनके परिवार को सौंपा जाएगा।

गौरतलब है शुरू में यह रिपोर्ट किया गया था कि चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों को पकड़ लिया है। वहीं इस अफवाह के बाद भारतीय सेना ने एक बयान जारी कर बताया था कि पकड़े गए लोग अरुणाचल प्रदेश के रहने वाले शिकारी थे। जो शिकार के दौरान अनजाने में एलएसी की दूसरी तरफ भटक गए थे।

बयान में आगे कहा गया कि, LAC को गलती से पार करने की ऐसी घटनाएँ अतीत में बहुत बार हुई हैं और भारतीय सेना लगातार खोए हुए स्थानीय लोगों का पता लगाने और उनको वापस घर लौटाने का काम किया है। इस तरह की लगभग तीन घटनाएँ इस साल हुई है। जिनमें ऊपरी सबनसिरी जिला और पश्चिम सियांग जिला शामिल है। सभी भटके हुए व्यक्तियों को भारतीय सेना द्वारा लगातार प्रयासों और समन्वय के माध्यम से घर वापस लाया गया।

सेना ने बताया, “हालिया ऊपरी सुबनसिरी जिले के पाँच व्यक्तियों ने भी अनजाने में हाल ही में एलएसी पार कर लिया था। भारतीय सेना ने उन्हें ट्रेस किया और वापस करने के लिए हॉटलाइन पर PLA से संपर्क किया। 8 सितंबर को, हॉटलाइन पर प्रतिक्रिया की पुष्टि हुई कि लापता व्यक्तियों का पता लगाया गया था।”

कश्मीर के रघुनाथ मंदिर में जल्द होगा श्री राम का जयघोष: 31 साल पहले आतंकियों ने मूर्तियों को झेलम में फेंक जला दिया था टेम्पल

अयोध्या में भगवान राम मंदिर के निर्माण कार्य से प्रोत्साहित होकर श्रीनगर शहर के बीचोंबीच रघुनाथ मंदिर का मरम्मत कार्य भी शुरू हो गया है। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद  370 के निरस्त होने के बाद रघुनाथ मंदिर ऐसा पहला मंदिर है, जहाँ मरम्मत कार्य शुरू हुआ है।

करीब 30 साल से बंद पड़े रघुनाथ मंदिर की हालत जर्जर हो गई थी। कश्मीरी पंड़ितों के वर्ष 1989 में पलायन के बाद से मंदिर में कोई नहीं गया। मंदिर 1989 से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया था। उसकी मरम्मत नहीं हो पाई थी। मंदिर का गुबंद भी टूट गया था। 

बता दें कि कश्मीर में जब आतंकवाद चरम पर था, तब अनेक नए-पुराने मंदिरों को तहस-नहस कर दिया गया। कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने के साथ बड़ी संख्या में मंदिरों और मठों को नुकसान पहुँचाया गया। उन पर कब्जे भी कर लिए गए। मंदिर जीर्णोद्धार की खबर आते ही हिंदू समुदाय में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। वर्ष 1989 में आतंकियों की धमकियों के बावजूद कश्मीर से पलायन न करने वाले कुछ पंडितों ने कहा कि अब फिर उम्मीद बँधी है कि यहाँ मंदिरों के बंद किवाड़ खुलेंगे, मंदिर भी उसी तरह आजाद होंगे जिस तरह से हम लोग अनुच्छेद 370 से आजाद हुए हैं।

जानकारी के मुताबिक 1989 में पहली बार उग्र इस्लामिक कट्टरपंथियों की भीड़ ने मंदिर पर हमला बोला था। इसके बाद 24 फरवरी 1990, 13 अप्रैल 1991 और फिर 8 मई 1992 को इस मंदिर पर हमले हुए। इस्लामिक कट्टरपंथियों ने मंदिर में से भगवान श्री राम और माता सीता की प्रतिमाओं को खंडित कर झेलम में फेंक दिया गया। यज्ञशाला बर्बाद कर दी गई और लाइब्रेरी भी जला दी गई। मंदिर के पास हिंदुओं के सात मकानों को भी आतंकियों ने ध्वस्त कर दिया। इसके बाद मंदिर वीरान हो गया और परिसंपत्तियों पर भूमाफिया की नजर पड़ गई।

कश्मीर से पलायन न करने वालों में शामिल चुन्नी लाल हिंदू वेलफेयर सोसायटी के सचिव हैं। उन्होंने कहा, “आज जब मैंने टीवी पर खबर सुनी कि कश्मीर में टूटे मंदिरों का सर्वे होगा तो मैं खुद को रोक नहीं पाया और यहाँ चला आया। यहाँ मूर्तियाँ थीं, जिन्हें आतंकियों ने झेलम दरिया में फेंक दिया। सैकड़ों धार्मिक पांडुलिपियाँ थीं, जो जला दीं। आज तो मंदिर में आने का रास्ता तक आसानी से नजर नहीं आता।”

स्थानीय कश्मीरी पंडित चुन्नी लाल कौल ने कहा कि श्रीनगर में करफियाली मुहल्ले में रघुनाथ मंदिर में 30 साल पहले दिन में नहीं, बल्कि रात को चहल-पहल होती थी। यह मंदिर जम्मू के रघुनाथ मंदिर से ज्यादा भव्य था। खैर, आज फिर उम्मीद बँधी है कि यहाँ जल्द जय श्रीराम का जयघोष होगा।

गौरतलब है कि कश्मीर में धर्म के अंधे जिहादी तत्व जब भी मौका मिलता रहा है, मंदिरों को निशाना बनाते रहे हैं। पाकिस्तान में भुट्टो को फाँसी हुई हो या फिर जिया उल हक की मौत, पाक समर्थक तत्वों ने मंदिरों को तोड़ा। वर्ष 1986 में कश्मीर में कई मंदिरों को जलाया गया। वर्ष 1989 में जब आतंकवाद ने कश्मीर में पाँव जमाए तो जिहादी तत्व और कट्टरपंथियों की भीड़ हमेशा मंदिर में घुसकर लूटपाट करती। अधिकांश मंदिरों की जमीन पर कब्जा हो गया।

मैं उसे अच्छे से जानती हूँ… वह किसी के साथ न्याय नहीं कर सकता: मुंबई के CP परम बीर सिंह पर साध्वी प्रज्ञा

सुशांत सिंह राजपूत के मौत के मामले में विवादों में घिरे मुंबई के पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह पर भोपाल से बीजेपी की सांसद साध्वी सिंह ने भी हिरासत के दौरान प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। साथ ही कंगना रनौत का समर्थन करते हुए कहा है कि महाराष्ट्र सरकार उन्हें जान-बूझकर परेशान कर रही। साध्वी ने इसे कॉन्ग्रेस की साजिश करार दिया।

सांसद साध्वी प्रज्ञा ने कहा, “जब मेरे ऊपर पुलिस ने अत्याचार किए थे तो परम बीर सिंह वरिष्ठ अधिकारी थे। उसने मुझ पर न जाने कितने अत्याचार किए और मुझे प्रताड़ित किया था। मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि उस पर लगाए गए आरोप गलत नहीं हो सकते हैं। मैं परम बीर सिंह को बहुत अच्छे से जानती हूँ। उसने जिस तरह मुझे पर अत्याचार किया था, वह किसी के साथ न्याय नहीं कर सकता।”

उन्होंने कंगना रनौत के दफ्तर में तोड़फोड़ को बदले की भावना से की गई कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि इस पूरी साज़िश के पीछे कॉन्ग्रेस का हाथ है। कॉन्ग्रेस की भूमिका महाराष्ट्र सरकार में भी अहम है इसलिए वह एक महिला का अपमान कर रहे हैं। किसी पर भी बिना अपराध किए कार्रवाई करना नाइंसाफी है, ऐसा नहीं होना चाहिए। 

भाजपा सांसद ने शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की सराहना भी की और कहा कि साल 2008 के आस-पास मेरे संघर्ष के दिनों में बाल ठाकरे ने मेरी बहुत मदद की थी। मेरा मानना है कि भारत में किसी नारी का अपमान नहीं होना चाहिए, एक नारी का सम्मान भारत की संस्कृति है। शिवसेना भी इस संस्कृति में भरोसा रखती थी, लेकिन कॉन्ग्रेस के प्रभाव में उसका नज़रिया बदला है। 

जी न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने आरोप लगाया था कि कथित ‘भगवा आतंक मामले’ में भूमिका जबरदस्ती कबूल करने के लिए मुंबई एटीएस द्वारा उन पर काफी अत्याचार किया गया था। मुंबई एटीएस के सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए साध्वी प्रज्ञा ने खुलासा किया था कि परम बीर सिंह सहित एटीएस अधिकारियों ने उन्हें अवैध हिरासत में रखा था और 13 दिनों तक उन्हें प्रताड़ित किया था।

साध्वी प्रज्ञा ने आरोप लगाया था कि खानविलकर, परम बीर सिंह और (दिवंगत) हेमंत करकरे, सभी ने उन्हें प्रताड़ित किया। साध्वी ने 2008 में एक न्यायाधीश के समक्ष बताया था, “धमाके में शामिल होने की बात कबूल नहीं करने पर एटीएस के अधिकारियों ने मुझे कपड़ा उतारने और उल्टा लटकाने की धमकी दी।”

हाल ही में मुंबई पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह पिछले कुछ हफ्तों में सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर आलोचना का केंद्र बिंदु बन गए थे। इसकी एक बड़ी वजह सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में की गई जाँच को लेकर मुंबई पुलिस का ढुलमुल रवैया रहा है। यह विवाद मुंबई पुलिस प्रमुख परम बीर सिंह द्वारा किए गए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शुरू हुआ। 

परम बीर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा था कि मुंबई पुलिस के संज्ञान में आया है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित थे और इसका इलाज चल रहा था। मुंबई पुलिस कमिश्नर ने दावा किया था कि सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी मौत से पहले ‘दर्द रहित मौत’, ‘सिज़ोफ्रेनिया’ (schizophrenia) और ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ जैसे शब्द सर्च किए थे। हालाँकि परम बीर सिंह के दावों को जल्द ही पलट दिया गया। टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट में बताया गया कि अभिनेता ने अपनी मौत से पहले हिमाचल प्रदेश, केरल और कूर्ग में संपत्ति, फॉर्म आदि सर्च किया था, जो कि परम बीर सिंह के दावों के विपरीत था।

कंगना-रिया और टीवी मीडिया सर्कस बनाम सत्ता का नंगा नाच: अजीत भारती का वीडियो | Ajeet Bharti on Riya-Kangana case, TV media vs crazy State

सुशांत, रिया और कंगना के मुद्दे को लेकर जिस तरह की रिपोर्टिंग हुई है, उस पर काफी लोगों ने हैरानी जताई। कुछ लोगों ने कटाक्ष लिखे और कुछ लोगों ने ट्रोल किया। जिनका चैनल खुद यही काम कर रहा है, उन लोगों ने भी मजाक उड़ाने की कोशिश की कि यह सड़क छाप एटीट्यूड है। यह कुछ भी हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता नहीं। यहाँ पर राहुल कंवल की बात हो रही है।

कुछ लोगों का कहना है कि मीडिया ट्रायल हो रहा है। कुछ हद तक कहा भी जा सकता है, लेकिन यदि मीडिया में इस तरह से आवाज नहीं उठाई जाती तो सुशांत का केस आत्महत्या का केस बनकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता, क्योंकि 60 दिनों तक FIR भी नहीं लिखी गई थी। जनमानस के दवाब के बाद ही केस सीबीआई को दिया गया और नए-नए एंगल सामने आ रहे हैं।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें

2 घंटे सड़क पर खड़े रहे विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी: पालघर पर आवाज़ उठाने की सज़ा, बताया क्या होता है ‘फासिज्म’

‘चॉकलेट’ और ‘द ताशकंद फाइल्स’ सहित कई फ़िल्में बना चुके निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने मुंबई में पूर्व नौसेना अधिकारी की शिवसेना के गुंडों द्वारा पिटाई किए जाने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए अपना अनुभव शेयर किया है। पूर्व नौसेना अधिकारी मदन शर्मा की ज़ख़्मी आँख की तस्वीर शेयर करते हुए विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि अप्रैल 2020 में जब पूर्ण रूप से लॉकडाउन लगा हुआ था, तब सरकार के खिलाफ लिखने पर मुंबई में उनके साथ क्या हुआ था।

उन्होंने बताया कि ये वो समय था, जब न तो किसी को घर से बाहर निकलने की अनुमति थी और न ही सब्जियाँ उपलब्ध थीं। उन्होंने बताया कि कैसे सरकार ने उनके घर पर उन्हें डराने-धमकाने के लिए पुलिस भेजी। उन्होंने कहा कि वो चाहते थे कि मैं सरकार के खिलाफ न लिखूँ और अपना मुँह बंद रखूँ। दरअसल, विवेक अग्निहोत्री ने पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा हत्या और बढ़ते कोरोना के मामलों को लेकर आवाज़ उठाई थी।

‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ और ‘ज़िद’ के निर्देशक ने बताया कि उस समय सरकार बॉलीवुड के लोगों को अपने चीयरलीडर के रूप में इस्तेमाल करने में व्यस्त थी और ये उन्हें अस्वीकार्य था कि फिल्म इंडस्ट्री से कोई उनकी इस तरह से आलोचना करे। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें चुप कराने के लिए उच्च पदाधिकारियों का इस्तेमाल किया गया। विवेक ने बताया कि डिप्टी कमिश्नर अर्बन नक्सलियों के खिलाफ उनके अभियान के कारण उनका सम्मान करते थे और परेशान थे लेकिन फिर भी उन्हें मजबूर किया गया।

विवेक अग्निहोत्री ने आरोप लगाया कि डिप्टी कमिश्नर पर सरकार द्वारा दबाव बनाया गया। उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ ऐसे हथकंडे अपनाए जा रहे थे कि उन्हें 2 घंटों तक अपने घर से बाहर निकल कर सड़क पर खड़ा रहना पड़ा, वो भी ऐसे समय में जब कोरोना का प्रसार तेजी से बढ़ रहा था। उन्होंने कहा कि ये दिखाता है कि उनके जैसे ‘सांस्कृतिक योद्धाओं’ को सरकार कैसे चुप कराने में लगी हुई है। उन्होंने कहा कि सोचिए, 66 वर्षीय मदन शर्मा के साथ क्या हुआ होगा।

उन्होंने तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि ये आँख सरकार के अत्याचार का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि उन्हें कभी चुप नहीं कराया जा सकता। विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि कई लोग इस बात से आश्चर्य में थे कि उन्होंने उनलोगों को अचानक से क्यों अनफॉलो कर लिया। उन्होंने बताया कि ऐसा महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस के कारण हुआ। उन्होंने बताया कि उन पर नजर रखी जा रही थी और उनके करीबियों को बुला कर पूछताछ किया जा रहा था, इसीलिए उन्हें बचाने के लिए ऐसा करना पड़ा।

विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि अगर आप सरकार और पुलिस के अत्याचार को प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं तो आपको मुंबई में रहना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अब वो धीरे-धीरे लोगों को फॉलो कर रहे हैं। पहले इस पर भी नजर रखी जा रही थी कि वो किन-किन लोगों से बात कर रहे हैं। उन्होंने कुछ विश्वासपात्र लोगों को अपनी स्थिति के बारे में बताया भी था। उन्होंने कहा कि लिबरलों को देखना चाहिए कि फासिज्म कैसा दिखता है।

ज्ञात हो कि शिवसेना के स्थानीय ‘शाखा प्रमुख’ ने पूर्व नौसेना अधिकारी से संपर्क किया और उन्हें उनकी बिल्डिंग से नीचे आने को बोला। जैसे ही वो अपनी बिल्डिंग से नीचे उतरे, करीब 8 लोगों ने उन्हें सिर्फ़ इसलिए मारना शुरू कर दिया क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर उद्धव ठाकरे का कार्टून फॉरवर्ड किया था। इस हमले में पूर्व नेवी अधिकारी की आँख बुरी तरह जख्मी हो गई थी। हालाँकि, बॉलीवुड के लोग इस पर अभी तक चुप हैं।

कहानी भारत के पहले फुटबॉल कप्तान टीएओ की, जिनके सम्मान में इंदिरा गाँधी का नाम हटा दिया गया

क्या आपने टी. एओ का नाम सुना है? नागालैंड में जन सामान्य में इंदिरा गांधी स्टेडियम का नाम बदलकर टी. एओ स्टेडियम करने के विचार ने जन्म लिया । आखिर कौन हैं टी. एओ? क्यों उनके नाम पर स्टेडियम बनाने की बात हुई ? क्या महज इसलिए, क्योंकि इंदिरा गांधी का नाम हटाना है? क्या यह कोई विरोधी प्रतिक्रिया है? बिल्कुल नहीं। इस परिवर्तन का ऐसा कारण है, जिससे शायद ही कोई असहमत हो।

“एओ-दा” के नाम से हर गली के लोकरंजक टीएओ का पूरा नाम डॉक्टर तालिमेरेन एओ है। चिकित्सीय क्षेत्र में सिद्धता के साथ-साथ खेल जगत में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा है। उनका जन्म 28 जनवरी, 1918 को अविभाजित असम राज्य के तत्कालीन जिला नागा हिल्स के नागाओं के प्रसिद्द “एओ” जनसमुदाय के चांगकी नामक गाँव में हुआ था।

उस समय वह 6 या 7 साल के थे, जब एक बैपटिस्ट ने उनके परिवार को चांगली से इंपुर में बसा दिया था। वे इस परिवार को मिशनरी काम में लगाना चाहते थे। 12 बच्चों में तालिमेरेन चौथे नंबर पर थे। तालिमेरेन का अर्थ  होता है बहुत शक्तिशाली। अपने नाम के अनुसार तालिमेरेन बाल्यवस्था से ही साहसी, उत्साहित, कुशाग्र बुद्धि तथा खेल-प्रिय व्यक्तित्व के धनी रहे।

उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा इंपुर से ही प्राप्त की थी। अपने स्कूल की साऱी ही परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहाँ मिशन कंपाउंड में उन्होंने फुटबॉल खेलना शुरू किया। उन दिनों में कोई फुटबॉल नहीं होती थी इसलिए वे अपने कुछ मित्रों के साथ पुराने कपड़ों, फूल-पत्ते, घास-फूस आदि से बॉल बनाकर तथा पोमेलोस नाम के फल को ही फुटबॉल बनाकर खेलते थे।

कहा जाता है कि वो दोनों पाँवों से खेलते थे और यहीं उन्होंने अपने जीवन की प्रसिद्धि का प्रथम सोपान चढ़ी की और आगे वो स्कूल टीम के कप्तान बने। जब उनकी क्लास छः इंपुर में पूरी हो गई तो हाई-स्कूल की पढ़ाई करने के लिए वे 1933 में वो जोरहाट गए। वहाँ अपने बहनोई के घर में रहते हुए उन्होंने पढ़ाई की तथा फुटबॉल और वॉलीबॉल में खिलाड़ियों के बीच बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1937 में उन्होंने इंटर हाई-स्कूल टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी की ट्रॉफी जीती।

उल्लेखनीय है कि उनके पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बनें और इसके लिए वो उनको प्रेरित किया करते थे। जब वह 17 वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। पिता को दिए वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने कॉटन कॉलेज गुवाहाटी में 1942 में प्रवेश लिया अपनी इंटरमीडिएट साइंस और कारमाइकल मेडिकल कॉलेज (अब RG Kar Medical) से एमबीबीएस पूरा किया। इस प्रकार चिकित्सिकीय अध्ययन क्षेत्र में कोलकाता से 1950 में यह सर्वोच्च उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम नागा बने।

वर्ष 1953 में डॉ. टीएओ ने डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज में रजिस्ट्रार के रूप में कार्यभार सँभाला और फिर सहायक सर्जन के पद पर उनका कोहिमा में स्थानांतरण हो गया। नागालैंड ने 1963 में एक राज्य का दर्जा प्राप्त किया तो डॉ. टीएओ स्वास्थ्य सेवा के पहले नागा निदेशक बने और 1978 में सेवानिवृत्ति तक इस पद पर रहे। सेवा में होते हुए भी उनका खेलों के प्रति उत्साह कम नहीं हुआ। उन्होंने स्थानीय फुटबॉल के अच्छी प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया और चिकित्सीय फुटबॉल टीम का आयोजन किया और स्थानीय प्रतिभाओं में बहुत ही रुचि ली।

बचपन से ही डॉ. टीएओ का खेल और एथलेटिक गतिविधियों के प्रति एक मजबूत झुकाव रहा। उन्होंने न केवल अपनी पढ़ाई, बल्कि फुटबॉल और अन्य खेलों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 1937 में उनको इंटर हाई-स्कूल टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ स्पोर्ट्सपर्सन ट्रॉफी जोरहाट में मिली थी। 1942 तक कॉटन कॉलेज और गुवाहाटी के प्रतिष्ठित महाराणा क्लब के लिए खेले। 1943 में वे कलकत्ता के प्रसिद्ध मोहन बागान क्लब में शामिल हुए और 9 साल (1943-51) तक क्लब के लिए खेले। 2 साल तक इसकी कप्तानी की।

फुटबॉल के एक स्थापित सितारे के नाते डॉ. टीएओ को भारतीय और भारत इलेवन टीमों में यूरोपियन टीमों के खिलाफ खेलने के लिए चुना गया था। उन्होंने हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर, कुआलालंपुर, बैंकॉक और डक्का में प्रदर्शनी मैच खेलने के लिए सुदूर-पूर्व में भारतीय फुटबॉल टीम का नेतृत्व भी किया। उनके टीम में होते हुए बंगाल ने प्रांतीय संतोष ट्रॉफी को बॉम्बे में 1945 में जीता। 1946 और 1947 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के एथलेटिक्स में व्यक्तिगत चैम्पियनशिप जीती। 

डॉ. टीएओ लंदन ओलंपिक में पहली स्वतंत्र भारतीय फुटबॉल टीम के 1948 में कप्तान बने। 29 जुलाई, 1948 को हुई उद्घाटन समारोह में वेम्ब्ली स्टेडियम, लंदन में टीएओ को भारतीय समूह के लिए ध्वज धारण का अवसर मिला। फुटबॉल के मैदान में बूट नहीं होने के कारण नंगे पैर ही खेलते थे। यहाँ तक कि 1948 ओलिंपिक में एक ब्रिटिश पत्रकार ने तालिमेरेन से पूछा था कि उनकी टीम नंगे पाँव क्यों खेलती है, तो बहुत ही सकारात्मकता और जोश के साथ उत्तर दिया– खेल का नाम फुटबॉल है, बूटबॉल नहीं।

बंगाल के फुटबॉल में डॉ. टीएओ ने पूर्णतः अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। उनका वर्चस्व इस तरह का था कि स्थानीय बंगाली कहने लगे कि मोहन बागान भारत का गौरव है और मोहन बागान का गौरव टीएओ है। उनके सरल एवं विनयशीलता के कारण सभी बहुत प्रेम करते थे और प्रेम से उनको “एओ-दा” कहते थे।

वह केवल कलकत्ता में फुटबॉल के खिलाडी के रूप में ही सीमित नहीं रहे। अपितु उन्होंने कई प्रकार की खेल प्रतियोगिताओं में भाग लिया। वे 100 मीटर, 200 मीटर, हाई जंप, ब्रॉड जंप, हॉप-स्टेप-एंड-जंप, जैवलिन, चर्चा, शॉट-पुट और 110 मीटर बाधा दौड़ में हमेशा आगे रहते थे। 1946 और 1947 में हुई तेहरवीं और चौदवी प्रांतीय एथलेटिक चैम्पियनशिप लगातार दो साल व्यक्तिगत चैम्पियनशिप जीती।

मात्र नगालैंड में नहीं अपितु समस्त भारत देश में खेल जगत के क्षेत्र में उनका एक विशिष्ट स्थान है। शून्य सुविधाएँ के रहते हुए डॉ. टीएओ ने संघर्ष करते हुए एक ऐसा उज्जवल मार्ग प्रशस्त किया जिसका आने वाली पीढ़ियाँ अनुसरण कर सके। आज उनके इस महनीय, आदर्शमय प्रेरणादायक व्यक्तित्व के सम्मान में उनको देश नमन करता है। उनकी प्रतिभा और सफलता के कारण उनको 1968-1969 में अखिल भारतीय ओलंपिक फुटबॉल चयन समिति के सदस्य के रूप में तथा 1972 में अखिल भारतीय खेल परिषद का सदस्य चुना गया था।

1977 में उनको असम सरकार द्वारा एक राइनो (असम का राज्य पशु) की एक छोटी, सुंदर और प्यारी मूर्ति प्रस्तुत करके उनका सम्मान किया गया। 1998 में 80 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। वर्ष 2001 में मोहन बागान एथलेटिक क्लब ने डॉ. टीएओ को मोहारी राम पुरस्कार से सम्मानित किया।

असम ने उनको कालाबोर में एक आउटडोर-स्टेडियम का नाम देकर सम्मानित किया, जो कि जाबलबन्धा के पास है। उनके पुराने कॉलेज, कॉटन कॉलेज, ने उनके नाम पर अपने परिसर में एक इनडोर-स्टेडियम का नाम रखा। एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को उनके नाम से नामित करके मेघालय ने उन्हें सम्मानित किया। उनको सम्मान देते हुए उनके नाम पर उनकी जन्म शताब्दी 28 जनवरी 2018 को एक डाक टिकट का विमोचन किया गया।