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‘काफिर, काफिर, शिया काफिर’: पाकिस्तान में शिया दुकानदार को सरेआम मारी गोली, Video वायरल

सुन्नी बहुल पाकिस्तान में शिया-विरोधी हमलों में काफी वृद्धि हुई है। 6 सितंबर को पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के कोहाट शहर में एक दुकानदार को अज्ञात बदमाश ने सरेआम गोली मार दी।

मृतक की पहचान क़ैसर अब्बास के रूप में की गई है। वह शिया समुदाय से था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए सीसीटीवी फुटेज में एक हमलावर दुकान में घुसता है और अब्बास पर पॉइंट-ब्लैंक रेंज के बंदूक से फायर करता है। गोली लगने से वह अपनी कुर्सी से गिर जाता है। वहीं दुकान के बाहर मौजूद ग्राहक भागते हुए दिखाई दे रहे है।

बता दें, अभी तक किसी भी समूह ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली है। हत्या के पीछे स्थानीय देवबंदी प्रायोजित आतंकवादी संगठनों की भूमिका संदिग्ध है। मृतक की तस्वीर सामने आई है। जिसमें उसका शव स्ट्रेचर पर खून से लथपथ दिखाई दे रहा है। इंटरनेट पर यह तस्वीर काफी वायरल भी हो रही है।

मृतक क़ैसर अब्बास (फ़ोटो साभार: Twitter/ Hanif Abbas)

गौरतलब है कि शुक्रवार को हज़ारों की तादाद में सुन्नी कट्टरपंथी समूहों ने कराची की सड़कों पर शिया विरोधी आन्दोलन किया। इस्लाम के दो वर्गों के बीच इतने बड़े पैमाने पर तनाव पैदा होने पर हिंसा की घटनाओं का ख़तरा भी बढ़ गया था। हाल ही पाकिस्तानी शिया नेता ने कथित तौर पर मुहर्रम जुलूस के सीधे प्रसारण के दौरान ऐतिहासिक इस्लामिक चेहरों पर अनैतिक टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी के चलते उस शिया नेता पर ईशनिंदा का आरोप लगा था जिसके विरोध में सुन्नी समुदाय के हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे थे।

विरोध प्रदर्शन मोहम्मद अली जिन्नाह की मज़ार ‘मज़ार-ए -कायद’ के पास शुरू हुआ था। इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले कट्टरपंथी सुन्नी तमाम शिया विरोधी समूहों से जुड़े हुए थे। इसमें सिपाह-ए-सहाबा और तहरीक लब्बाइक पाकिस्तान मुख्य थे। यह सभी समूह शिया समुदाय के लोगों को काफ़िर मानते हैं। ख़बरों की मानें तो सिपाह-ए-सहाबा ने पिछले कुछ समय में पाकिस्तान के भीतर सैकड़ों शिया समुदाय वालों की हत्या की थी।

इन विरोध प्रदर्शनों के तमाम वीडियो भी सामने आए हैं। ऐसे ही एक वीडियो में सुन्नी कट्टरपंथी बसों को रोकते हुए, झंडे फहराते हुए और शिया विरोधी नारे लगाते हुए देखे जा सकते हैं। लगाए गए तमाम नारों में एक नारा था ‘काफ़िर काफ़िर शिया काफ़िर।’

7 साल पहले आज ही के दिन BJP ने लिया था वह फैसला, जिसने कॉन्ग्रेस के अस्तित्व को हिला कर रख दिया

2014 लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले (13 सितंबर, 2013) भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनके साथ गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे।

प्रेस वार्ता में यह घोषणा की गई कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनावों में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का चेहरा होंगे। कयास लगाए जा रहे थे कि फिर से लालकृष्ण आडवाणी पीएम का चेहरा होंगे। बहुतों ने यह भी सोचा था कि सुषमा स्वराज या अरुण जेटली भी पीएम का चेहरा हो सकते है, क्योंकि मोदी को मीडिया ने 2002 के गुजरात दंगों की अगुवाई करने वाले व्यक्ति के तौर पर पेश किया था। जबकि इस तथ्य पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के 12 वर्षों में गुजरात काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा था।

मैंने उस वक्त के ट्वीट्स को देखा जिसमें राणा अय्यूब और राजदीप सरदेसाई ने भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को पीएम चेहरे के लिए चुनने पर जमकर हमला किया था। उस दौरान वे नरेंद्र मोदी को काफी हल्के में ले रहे थे।

उन लोगों ने उनके US वीजा स्टेटस का मजाक भी उड़ाया।

आप देखें, किसी ने वास्तव में नहीं सोचा था कि साबरमती के किनारे से यह आदमी भाजपा का यह सपना पूरा करेगा। मीडिया की धारणा उनके खिलाफ थी। विपक्षी नेताओं द्वारा उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा जाता था। उनके अपने सहयोगी इस बात से बहुत खुश नहीं थे और उन्होंने इसे बहुतायत स्पष्ट भी कर दिया था। जून 2013 में जब मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने की चर्चाएँ तेज हो रही थीं, तब जदयू के नीतीश कुमार ने 17 साल पुराने एनडीए गठबंधन को तोड़ दिया था।

उन्होंने पीएम मोदी के लिए अपनी ‘नापसंदगी’ को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था। नीतीश कुमार ने 2010 में मोदी सहित कई भाजपा नेताओं के लिए एक पूर्व निर्धारित रात के भोजन के कार्यक्रम को भी रद्द कर दिया था। वहीं दो साल पहले 2008 में, उन्होंने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात सरकार द्वारा दिए गए 5 करोड़ रुपए को भी लौटा दिया था जो बिहार को बाढ़ राहत के लिए मिला था। उन्होंने इसे ब्याज के साथ वापस किया था।

गौरतलब है कि भाजपा पूरे पाँच साल के लिए सिर्फ एक बार ही सत्ता में आई थी। वहीं मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में प्रचारित कर भाजपा एक बहुत ही बड़ा जोखिम मोल ले रही थी, जब उनकी खुद की पार्टी के सहयोगी इस बात से नाराज चल रहे थे। इसके अलावा वे कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को भी चुनौती दे रहे थे जिसके पास तीसरी बार सत्ता में आने के लिए पूरा इकोसिस्टम साथ खड़ा था।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, नरेंद्र मोदी ने वाइब्रेंट गुजरात नामक द्विवार्षिक शिखर सम्मेलन शुरू किया था। एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार मुझसे कहा था कि 2002 के दंगों के ठीक बाद मोदी ने गुजरात में परिवर्तन लाने का फैसला किया था। उन्होंने मन बना लिया था कि जब लोग गुजरात के बारे में सोचेंगे तो वे प्रगति के बारे में सोचेंगे। पहला वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन नवरात्रि के दौरान 2003 में आयोजित किया गया था, जो नौ-रात्रि लंबा नृत्य महोत्सव था।

उससे पहले मोदी ने विभिन्न मीडिया हाउस के संपादकों और पत्रकारों को बुलाया और उन्हें अपने विजन पर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन दिया। एक पत्रकार ने मुझे बताया 2002 के दंगों के दौरान भड़काऊ खबरों को प्रसारित करने वाले गुजरात समाचार संपादक श्रेयांश शाह भी उसमें मौजूद थे। उन्होंने मुझे बताया कि शाह प्रस्तुति के बीच में ही बाहर चले गए थे। जाहिर तौर पर उन्हें वो सब पसंद नहीं आया होगा। इसके बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें खुद रोका और वापस आने के लिए कहा। लेकिन शाह फिर भी नहीं माने।

यह तब था जब मोदी ने यह परवाह करना छोड़ दिया था कि मीडिया उनके बारे में क्या कहती है। उन्होंने इस बात का फैसला किया था कि उनके द्वारा किए गए काम को बोलने दो।

अगला शिखर सम्मेलन जनवरी 2015 के लिए निर्धारित किया गया था। नरेंद्र मोदी ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने हरित ऊर्जा, स्वच्छ तकनीक, शिक्षा, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न विषयों पर ‘वाइब्रेंट गुजरात प्री-इवेंट समिट्स’ की एक श्रृंखला की।

जिन लोगों ने 2003 में शिखर सम्मेलन को खारिज कर दिया था। वहीं लोग उसके शुरुआत से पहले ही उसको फ्रंट पेज पर प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने न केवल देश को यह बताया कि एक सीएम होते हुए उन्होंने सबसे उद्यमी राज्य में क्या-क्या किया। बल्कि यह भी कि जो वादा उन्होंने किया उसे पूरा भी किया। वह जानते थे कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था नीतिगत पक्षाघात के कारण फँस गई है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर कोई इसके बारे में जाने।

लेकिन इस बात की उम्मीद कम थी कि बीजेपी के पास वास्तव में एक मौका हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चरम पर था। लोग कॉन्ग्रेस से नाराज थे। लेकिन क्या उनकी नाराजगी भाजपा को बहुमत देने देने के लिए पर्याप्त थे? क्या लोग 2002 के दंगों के बाद मोदी को वोट देने के लिए घटनाओं और मनगढ़ंत कहानियों को नजरअंदाज करने के इच्छुक थे? क्या भाजपा के लिए तर्कसंगत नेता को पीएम चेहरे के रूप में चुनना बुद्धिमानी होगी? क्या ‘त्रिशंकु संसद’ होगी और भाजपा को 5 साल की स्थिर सरकार के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा? सच कहूँ, तो मुझे यकीन नहीं था।

14 मई, 2014 में मोदी के साथ राजनाथ सिंह, अरुण जेटली और नितिन गडकरी

यह तस्वीर मतगणना से 2 दिन पहले की है। भारत ने तय किया था। मोदी की बॉडी लैंग्वेज से यह लगता कि उन्हें यकीन था कि वह दिल्ली आ रहे हैं।

भाजपा ने रिस्क लिया। मोदी जीते और कैसे। सिर्फ एक बार नहीं। उन्होंने न केवल इतिहास दोहराया, बल्कि 2019 में मजबूत जनादेश के साथ वापसी करते हुए सत्ता में अपनी पकड़ को स्थापित किया।

राजनाथ सिंह की उस घोषणा ने पार्टी के इतिहास को बदल दिया। पार्टी को मजबूती के साथ हर वर्ष एक नई उम्मीद और पहचान बनाने का मौका दिया।

शिवसेना के ‘अन्यायपूर्ण व्यवहार’ के बारे में राज्यपाल को बताकर कंगना ने कहा- लड़कियों को न्याय मिलेगा तो व्यवस्था में यकीन होगा

बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने रविवार (सितम्बर 13, 2020) को महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर उन्हें राज्य की सत्ताधारी शिवसेना द्वारा अपने साथ किए ‘अन्यायपूर्ण व्यवहार’ के बारे में बताया। कंगना रनौत ने अपनी बहन रंगोली चंदेल के साथ महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से राजभवन में मुलाकात की।

कंगना रनौत ने इस मुलाकात के बाद कहा, “मैंने उनसे अपने साथ हुए अन्यायपूर्ण व्यवहार के बारे में बताया। मुझे उम्मीद है कि मुझे न्याय मिलेगा, ताकि युवा लड़कियों सहित सभी नागरिकों का विश्वास व्यवस्था में बहाल हो। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि राज्यपाल ने अपनी बेटी की तरह मेरी बात सुनी।”

इससे पहले, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भी बीएमसी की कार्रवाई पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने इसे लेकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के प्रमुख एडवाइजर अजॉय मेहता को तलब कर सीएम के इस ‘बेतुके सलूक’ पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

33 वर्षीय अभिनेत्री ने आरोप लगाया है कि दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जाँच के संबंध में उनके एक ट्वीट में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के साथ मुंबई की तुलना करने के बाद शिवसेना नेताओं से धमकी मिली, जिसके बाद उन्हें वाई प्लस सुरक्षा प्रदान की गई।

कंगना रनौत और शिवसेना के बीच चली इस बहस के बाद मुंबई के पाली हिल में स्थित कंगना रनौत के ऑफिस को अवैध तरीके से बना हुआ बताकर बीएमसी ने बीते बुधवार को तोड़फोड़ की थी।

हालाँकि, कंगना ने तोड़फोड़ रोकने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट से स्टे ले लिया, लेकिन बीएमसी इससे पहले ही उनका काफी नुकसान कर चुकी थी। बॉम्बे हाईकोर्ट भी बीएमसी की इस कार्रवाई को गलत तरीके से की गई कार्रवाई बता चुकी है।

गौरतलब है कि कंगना रनौत गत 9 सितंबर को मुंबई पहुँची, जिस दिन बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने शहर में उनके कार्यालय के कथित अवैध रूप से बनाए गए हिस्सों को तोड़ दिया था। कंगना रनौत 14 सितंबर को अपने गृह नगर मनाली, हिमाचल प्रदेश के लिए रवाना होंगी।

‘तलवार बाबा’ बन लड़कियों पर अत्याचार करता था महबूब कुरैशी, वीडियो वायरल होने के बाद से फरार

जहाजपुर, भीलवाड़ा से सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें सर पर टोपी और माथे पर लाल रंग की पट्टी बाँधे दिख रहा एक व्यक्ति लोगों को भूत-प्रेत और पिशाचों से मुक्त करने का दावा कर रहा है। इस वीडियो में भूत-प्रेत उतारने के नाम पर ये व्यक्ति हाथ में तलवार लेकर लड़की को घसीटता हुआ नजर आ रहा है।

‘तलवार बाबा’ नाम का यह व्यक्ति लड़की के माता-पिता के ही सामने तलवार लिए कभी उसे पाँव से कुचलता है तो कभी बालों को खींचकर घसीटकर कमरे के अंदर-बाहर ले जाता है। जबकि, इस दौरान पूरे वीडियो में लड़की दर्द से चिल्ला रही है। यह सब उसे भूत-प्रेत से मुक्ति दिलाने के नाम पर किया जा रहा है।

इस वीडियो में सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि ‘तलवार बाबा’ नाम का यह व्यक्ति एक हिन्दू ओझा या तांत्रिक है। जबकि, तरह-तरह की यातनाएँ देने वाला ‘तलवार बाबा’ वास्तव में समुदाय विशेष का एक व्यक्ति है और इसका असली नाम महबूब कुरैशी है। ये पाँच मिनट का दिल दहलाने वाला वीडियो भ्रामक तथ्यों के साथ सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

जहाजपुर पुलिस थाना प्रभारी हरीश सांखला ने बताया कि क्षेत्र में सोशल मीडिया पर तेजी से एक वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में एक बाबा भूत-प्रेत भागने के नाम पर किशोरी के साथ अमानवीय घटनाओं को अंजाम देता हुआ नजर आ रहा था।

यह घटना जहाजपुर कस्बे में चमन चौराहे की बताई जा रही है। इस वीडियो के वायरल होने के बाद प्रशासन हरकत में दिखाई दे रहा है और महबूब कुरैशी की तलाश में जुटा है। पुलिस जाँच में सामने आया कि वीडियो में जिस शख्स के दिखाई देने का दावा किया जा रहा है वो जहाजपुर छोड़ के भीलवाड़ा शहर की कावाखेड़ा कच्ची बस्ती में किराए के मकान में रह रहा है। बताया जा रहा है कि महबूब कुरैशी पिछले 3 दिनों से फरार है और उसका मोबाइल फोन भी बन्द आ रहा है। पुलिस द्वारा उसे गिरफ्तार करने के लिए टीम भेज दी गई हैं।

@BefittingFacts नाम के ट्विटर अकाउंट ने ट्विटर पर इसका वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “महबूब कुरैशी उर्फ़ तलवार बाबा, भूत भगाने के बहाने लड़कियों को पैर से कुचलता था और बाल पकड़ के घसीटता था।”

अन्ना हजारे RSS की साजिश, कश्मीर में हो जनमत-संग्रह (Pak भी यही चाहता है): भूषण बाप-बेटे संग राजदीप सरदेसाई का इंटरव्यू

शनिवार 12 सितंबर 2020 को प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण ने इंडिया टुडे को एक साक्षात्कार दिया। साक्षात्कार में उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर कई विचार रखे। इसके अलावा इंडिया अगेंस्ट करप्शन, इंदिरा गाँधी, नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल के संबंध में कई बातें कही। 

बात करते हुए प्रशांत भूषण ने कहा,

“मुझे एक बात का सबसे ज्यादा अफ़सोस है कि मैं अरविन्द केजरीवाल का चरित्र नहीं समझ पाया। समय बीतने के बाद समझ आया कि हमने एक भयावह राजनीतिक दैत्य तैयार किया है, जबकि एक ज़माने में मैं अरविन्द का प्रशंसक हुआ करता था। अरविन्द केजरीवाल की हरकतों के लिए मेरा रवैया कभी आलोचनात्मक नहीं रहा। लोकसभा चुनावों के बाद पूरी तस्वीर साफ़ हो गई। वह केवल बेशर्म और तानाशाह ही नहीं है बल्कि अपने दल की नीतियों पर भी खरा नहीं उतरता है।” 

प्रशांत भूषण ने यह जानकारी दी कि कुल 36 जानकारों की समिति ने पार्टी के लिए नीतियाँ तैयार की थीं। अरविन्द केजरीवाल की तैयारी थी कि उन सारी नीतियों को एक बार में ख़त्म कर दिया जाए। अरविन्द केजरीवाल ने हमेशा जितने भी निर्णय लिए, सिद्धांतों के आधार पर नहीं लिए बल्कि अपनी सुविधा के अनुसार लिए। इतना ही नहीं, अरविन्द केजरीवाल ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का साथ भी दिया था। 

इसके बाद राजदीप सरदेसाई ने कश्मीर मुद्दे पर सवाल किया। इस सवाल का जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण (प्रशांत भूषण के पिता) ने कहा कि उनके विचार प्रशांत जैसे ही हैं। उनका मानना है कि यह तय करना एक क्षेत्र के लोगों का अधिकार है कि वह किस तरह के प्रशासन या सरकार की अपेक्षा रखते हैं। इस तर्क के आधार पर यही अधिकार कश्मीर के लोगों का भी है। 

ब्रेक्सिट के लिए किए गए यूके के जनमत संग्रह का हवाला देते हुए शांति भूषण ने एक हैरान कर देने वाला दावा किया। अपने दावे में उन्होंने कहा:

“उन लोगों ने अलग होने के बावजूद जनमत संग्रह किया। जैसा कि पाकिस्तानी सरकार ने भी हमेशा अलग होने की बात पर ज़ोर दिया है। यह अधिकार कश्मीर के लोगों को भी दिया जाना चाहिए, अगर वह भारत की सीमा से अलग होने की इच्छा रखते हैं।” 

इसके बाद पिता पुत्र ने भारत की न्यायपालिका पर भी आरोप लगाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा। राजदीप ने कोर्टरूम की प्रैक्टिस में रियायत बरतने पर सवाल किया। इसका जवाब देते हुए शांति भूषण ने कहा, “मेरे समय में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ईमानदार हुआ करते थे। इस बात पर भरोसा करना बहुत कठिन था कि शायद ही कोई भ्रष्टाचार में शामिल मिलता था। जब मैंने अपना वकालत का जीवन शुरू किया था, तब कुछ ऐसे हालात थे। आज ऐसे हालात हैं कि हमें पहले इस बात की पहचान करनी होती है कि न्यायाधीश भ्रष्ट है या ईमानदार।”

प्रशांत भूषण ने चर्चा में शामिल होते हुए कहा कि काफी न्यायाधीश ईमानदार तो हैं लेकिन वह सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाने में बहुत कमज़ोर हैं। यह बेहद साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि जो मुद्दे राजनीतिक दृष्टिकोण से संवेदनशील होते हैं, उसमें सर्वोच्च न्यायालय सरकार के विरुद्ध नहीं हो सकता।

इसके बाद शांति भूषण ने बेटे की बात पर जोर देते हुए कहा कि अगर कोई सरकार ताकतवर है तो वह आसानी से न्यायपालिका को कमज़ोर कर सकती है। शक्तिशाली सरकारें ऐसा करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाती है। जैसे न्यायाधीशों के नज़दीकियों को धमकी देना, उन्हें लालच देना और उनकी बात न मानने पर नतीजों के लिए तैयार रहने की धमकी देना। 

भूषण पिता-पुत्र ने साक्षात्कार के दौरान यह दावा किया कि वह भाजपा या सरकार विरोधी नहीं हैं। लेकिन सच तभी सामने आ जाता है जब शांति भूषण ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जवाहर लाल नेहरू पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि नेहरू लोकतंत्र में भरोसा करते थे जबकि नरेन्द्र मोदी तानाशाही में भरोसा करते हैं। शांति भूषण का यह तर्क पूर्वग्रहों पर आधारित है, मनगढ़ंत भी है। यही कारण है कि उन्होंने इंदिरा गाँधी को क्लीन चिट दे दी। 

शांति भूषण के अनुसार इंदिरा गाँधी की तुलना में नरेन्द्र मोदी से संवाद करना कहीं ज़्यादा कठिन है। इसके ठीक बाद प्रशांत भूषण ने भी कहा कि इंदिरा गाँधी फासीवादी नहीं थीं लेकिन नरेन्द्र मोदी हैं। पिता-पुत्र ने इस तरह के दावे तब किए, जब इंदिरा गाँधी ने अपने राज में विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में बंद कर दिया था। इसके अलावा असहिष्णुता और फासीवाद जैसे मुद्दों पर बोलते हुए अपने पूर्वग्रहों के आधार पर पिता-पुत्र ने कई तरह के अनर्गल आरोप लगाए।          

सचिन बन अली ने फँसाया, गौमांस खिला इस्लाम कबूलने को किया मजबूर: कानपुर की हिंदू पीड़िता

पहचान छिपाकर हिंदू लड़कियों को फॅंसाने की घटनाएँ लगातार उत्तरप्रदेश के कानपुर से सामने आ रही है। इसी तरह के एक मामले में शीबू अली ने सचिन बनकर एक लड़की को पहले प्रेमजाल में फॅंसाया। फिर अश्लील वीडियो बनाकर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव डाला। उसे गौमांस खिलाया। मौलवी संग शारिरिक संबंध बनाने का दबाव डाला। जब लड़की ने विरोध किया तो चाकू से उस पर हमला किया।

रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता ने खुद मीडिया के सामने आपबीती बयॉं की। उसने बताया कि शीबू अली नाम के लड़के में उससे सचिन बनकर दोस्ती की थी। बातचीत के दौरान उसने मुझे अपनी बातों में फँसा लिया और हमारा अफेयर शुरू हो गया। बाद में उसकी हरकतों को देखने के बाद पता चला कि वह हिंदू नहीं मुस्लिम है।

पीड़ित ने बयाँ किया दर्द (साभार: न्यूज़ ट्रैक)

पीड़िता ने बताया, “शीबू मुझ पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा। मेरे साथ मारपीट करता रहा। एक दिन तो एक मौलवी को साथ लेकर आया और मुझसे कहने लगा कि तुम्हें इससे संबंध बनाना पड़ेगा। मैंने इसका विरोध किया। जब मैंने धर्म परिवर्तन करने से इनकार कर दिया तो उसने मुझ पर चाकू से हमला कर दिया।”

पीड़िता ने कहा, “शीबू अली ने सचिन बनकर मुझसे दोस्ती की थी। उससे मेरा 2013 में अफेयर शुरू हुआ था। इसके बाद बहला-फुसलाकर वो मुझे 2014 में नोएडा ले गया। सेक्टर-63 में उसने मुझे रखा। जिस एरिया में उसने मुझे रखा था वह पूरा मुस्लिम इलाका था। शुरुआत में उसने अपना नाम सचिन शर्मा बताया था। लेकिन धीरे-धीरे मुझे उसकी ऐक्टिविटी देखकर शक होने लगा। एक दिन मैंने उसे मस्जिद में जाते हुए देखा। इसके बारे में पूछा तो उसने मेरे साथ मारपीट की। उसने मेरे साथ कुछ वीडियो बनाए थे। जिसको लेकर वो मुझे ब्लैकमेल करता था। वीडियो वायरल करने की धमकी देता था और कहता था बदनाम कर दूँगा। मुझे किसी से बातचीत नहीं करने देता था, और कमरे में बंद करके रखता था।”

पीड़िता ने जबरन संबंध बनाने वाली घटना के बारे में बताते हुए कहा, “एक दिन वो मस्जिद के मौलवी को लेकर आया और कहने लगा कि मौलवी को तुम्हे खुश करना है। मैने उसकी इस हरकत का विरोध किया। उसने मुझे मौलवी के सामने ही जमकर पीटा। लगातार मुझपर धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाता था। कहता था कि तुम्हें मुस्लिम बनकर रहना है, मैं भी मुस्लिम हूँ। उसकी इन बातों से मुझे काफी शॉक लगा। फिर जैसे-तैसे करके किसी तरह से मैं वापस कानपुर आ गई और अपनी फैमली के साथ रहने लगी।”

पीड़िता ने आगे बताया, “डेढ़ से दो साल बाद फिर से मेरे संपर्क में आया और कहने लगा कि मुझसे गलतियाँ हुई है। तुम जैसे रहना चाहती हो वैसे रहो। तुम पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालूँगा। उसकी बातों से मेरा दिल पिघल गया। एक बार फिर से मैं उसकी बातों में आ गई और साथ रहने लगी। शुरुआत में तो सब सही था। लेकिन फिर इसने अपने घर के पास एक किराए का कमरा लेकर मुझे रखा। जिस इलाके में इसने कमरा लिया वहाँ भी सारे मुस्लिम रहते थे।”

ससुरालवालों के रवैये को लेकर हिंदू युवती ने बताया,” शीबू के परिजन आते थे। वो मुझपर दबाव डालते थे कि तुम्हे धर्म परिवर्तन करना पड़ेगा। तुम्हे मुस्लिम बनकर रहना पड़ेगा, नॉनवेज खाना पड़ेगा, नकाब पहनना पड़ेगा। जब मैं इनका विरोध करती थी तो ये लोग मिलकर मेरे साथ मारपीट करते थे। मुझसे कई बार कहा गया किब तुम जब धर्म परिवर्तन करोगी तभी तुम्हें ठीक से रखा जाएगा। वरना तुम्हारे साथ यहीं होगा।”

पीड़िता ने बताया, “मौका पाकर मैं वापस अपने घर पर वापस आ गई। इसके फिर डेढ़ से दो साल बाद शीबू ने मुझसे बातचीत करने का प्रयास किया, और बहलाने फुसलाने की कोशिश की कि मैं फिर से इसके साथ रहने लगूँ, लेकिन मैं नहीं मानी। फिर इसने कई बार ये बोला अच्छा ठीक है मुझे तुमसे बात करनी है सिर्फ बात कर लो आकर, फिर कभी तुमको परेशान नहीं करूँगा। मैंने काफी बार मना कर दिया फिर सोचा चलो सुन लेते है इसे क्या कहना है।”

हमले के बारे में बताते हुए लड़की ने बताया, “बीते 14 अगस्त 2020 को इसने मुझे बातचीत करने के बुलाया, शीबू और इसका भाई इरशाद वहाँ पहले से ही मौजूद थे। मुझ पर साथ में रहने का दबाव बना रहा था, जब मैंने उसकी बात नहीं मानी तो, शीबू के भाई ने मुझे पीछे से पकड़ लिया और शीबू ने मेरे ऊपर चाकू से हमला कर दिया। जिस दौरान वहाँ से जा रहे दो लड़कों को मैंने मदद के लिए बुलाया, जिसको देखते ही शीबू अली का भाई भाग गया लेकिन ये नहीं भाग पाया।”

पीड़िता की माँ ने बताया कि हत्या के आरोप में शीबू अली को जेल भेज दिया गया है। वहीं एसपी साउथ ने मामले की जानकारी देते हुए कहा कि मामले में पीड़िता से पूछताछ की जाएगी। साथ ही मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जाँच एसआईटी से करवाई जाएगी।

कानपुर के जूही इलाका धीरे धीरे बन रहा लव जिहाद का अड्डा

गौरतलब है कि कानुपर की जूही कॉलनी शालिनी यादव मामले के बाद से खबरों की चर्चा में आया था। लेकिन स्थानीय लोग इसके बारे में पहले से बात करते आ रहे हैं। 20 जून को जब शालिनी लापता हुईं तो उनके पिता ने जूही कॉलनी के युवक सहित सात लोगों पर अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया था। लेकिन इस अपराध के बाद पूरी कॉलनी चर्चा में बनी हुई है। क्योंकि सिर्फ शालिनी ही नहीं जूही कॉलोनी से ऐसे दर्जनों मामले सामने आए जिसमें हिंदू लड़कियों को मुस्लिम युवकों द्वारा लव जिहाद का शिकार बनाया गया है।

‘दिल्ली के युवा नेता भी लेते हैं ड्रग्स’, कहने के बाद रिया (एंड्रिया डिसूजा) को कॉन्ग्रेस से देना पड़ा इस्तीफा

दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा से ट्रोल होकर चर्चा में आने वाली रिया उर्फ़ एंड्रिया डिसूजा ने कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। रिया ने ट्विटर पर जानकारी दी है कि उन्होंने भविष्य में बेहतर संभावनाओं के लिए ‘ऑल इंडिया प्रोफेशनल्स कॉन्ग्रेस’ को अलविदा कह दिया है। उन्होंने सलमान अनीस, संजीव बत्रा और शशि थरूर को टैग करते हुए कहा कि इनलोगों के साथ काम करना काफी अच्छा अनुभव रहा।

रिया का इस्तीफा ऐसे वक्त में सामने आया है जब वे बॉलीवुड और ड्रग्स के बीच कनेक्शन बताने को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने बॉलीवुड पार्टियों में कई लोगों को ड्रग्स लेते देखने का दावा किया है। साथ ही ये भी कहा था कि दिल्ली के युवा नेता भी ड्रग्स लेते हैं।

अपने इस्तीफे की जानकारी देते हुए रिया ने कॉन्ग्रेस के साथियों को ‘शानदार जर्नी’ के लिए धन्यवाद दिया है। रिया (एंड्रिया डिसूजा) ने कहा कि वो एक बड़े और बेहतर प्लेटफॉर्म का रुख कर रही हैं, इसीलिए उन्होंने कॉन्ग्रेस का दामन छोड़ा है। तजिंदर बग्गा यहाँ भी तंज कसने से नहीं चूके और उन्होंने दावा किया कि 1 दिन पहले एक टीवी डिबेट के दौरान शहजाद पूनावाला से एक्सपोज होने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने रिया को इस्तीफा देने के लिए कहा है।

इसके जवाब देते हुए रिया ने तजिंदर बग्गा को मूर्ख करार दिया और कहा कि अगर उन्हें बड़े और बेहतर प्लेटफॉर्म का मतलब नहीं पता है तो उन्हें डिक्शनरी में इसका अर्थ खोजना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि वो जल्द ही बड़ा हमला करने वाली हैं। रिया आजकल सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद चल रहे विवाद में कंगना रनौत का विरोध और शिवसेना का समर्थन करने में लगी हैं। वो संजय राउत के विवादित बयानों का भी समर्थन करती रही हैं।

रिया ने कहा है कि वो एक सप्ताह में चीजें अच्छी तरह से स्पष्ट करेंगी। साथ ही कहा कि कुछ ही दिनों में सभी को इस बारे में पता चल जाएगा। रिया (एंड्रिया डिसूजा) कॉन्ग्रेस में रहते हुए पार्टी पर आरोप लगाने वालों से सोशल मीडिया पर बहस कर के खुद को व्यस्त रखा करती थीं। वो अक्सर दूसरों को ट्रोल करने के चक्कर में खुद बेइज्जत होने के कारण सुर्ख़ियों में रहती हैं। अब उन्होंने कॉन्ग्रेस को अलविदा कह दिया है।

रिया ने हाल ही में बताया कि टेलीविजन और फिल्म इंडस्ट्री के अधिकांश लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं। सुशांत सिंह राजपूत की बहन श्वेता सिंह के पोस्ट का जवाब देते हुए रिया ने कहा यह बात कम ही लोग जानते हैं। यह सच्चाई है कि बॉलीवुड और टीवी के तमाम ज़्यादातर कलाकार मादक पदार्थों का सेवन करते थे और सुशांत सिंह उनमें से ही एक था। बकौल रिया, पूरी इंडस्ट्री के लोग ड्रग्स लेते थे, लेकिन फिटनेस का भी ध्यान रखते थे।

बता दें कि एक बार रिया 500 रुपए लेकर ट्वीट करने के लिए तैयार हो गई थी। बग्गा ने एक नंबर से मैसेज कर के रिया को फ्लिटकार्ट सेल के बारे में ट्वीट करने के लिए कहा था। इसमें कहा गया था कि 24 सितंबर को फ्लिपकार्ट का स्थापना दिवस है और इस दिन से सेल शुरू हो रहा है। जबकि सच्चाई ये थी कि 24 सितंबर को फ्लिपकार्ट का स्थापना दिवस नहीं, बल्कि बग्गा का जन्मदिन था। रिया के ट्वीट करने के बाद बग्गा ने इसका खुलासा किया।

​आतंकियों के जिस एनकाउंटर पर रोईं सोनिया, उसमें सिब्बल के सामने हुई थी पुलिस की पेशी

बाटला हाउस एनकाउंटर (सितंबर 19, 2008) पर पूर्व आईपीएस अधिकारी करनाल सिंह ने एक किताब लिखी है। नाम है- बाटला हाउस: एन एनकाउंटर दैट शुक द नेशन। इस एनकाउंटर के वक्त सिंह दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त थे और इस ऑपरेशन को लीड किया है।

उनकी पुस्तक ने इस एनकाउंटर को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने एनकाउंटर को तुष्टिकरण, वोट बैंक की राजनीति, मीडिया टीआरपी और षड्यंत्र के लिए प्रभावित किया था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को समझाना पड़ा था कि बाटला हाउस एनकाउंटर वास्तविक था।’

गृह मंत्रालय ने दिए थे मीडिया से बात ना करने के आदेश

अपनी पुस्तक ‘Batla House: An Encounter That Shook the Nation’ में करनाल सिंह ने बताया है कि दिल्ली पुलिस ने बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसके बाद गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया था कि जाँच की प्रगति के बारे में मीडिया को और जानकारी न दी जाए।

1984 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी करनाल सिंह वर्ष 2018 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। करनाल सिंह ने वर्ष 2008 में दिल्ली में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों की जाँच की थी। उन्होंने लिखा है कि आतंकवाद से निपटने के लिए एक राजनीतिक सहमति की कमी ने इसे निपटने के लिए कठोर नीतियाँ बनाना मुश्किल बना दिया था।

सितंबर 19, 2008 को दिल्ली के जामिया नगर में हुई मुठभेड़ के बारे में कई अन्य जानकारियाँ शामिल की है। बाटला हाउस एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के दो आतंकवादी मारे गए थे। इसके साथ ही, बाटला हाउस इलाके में पुलिस की कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा ने भी इस ऑपरेशन के दौरान अपनी जान गँवाई थी।

करनाल सिंह ने अपनी पुस्तक में खुलासा किया है कि पुलिस द्वारा मीडिया को एक-दो बार ब्रीफ करने के बाद, उन्हें, जो कि उस समय स्पेशल सेल में संयुक्त पुलिस आयुक्त थे, को पुलिस आयुक्त से एक कॉल आई कि गृह मंत्रालय नहीं चाहता कि आगे से वह इस जाँच की कोई भी जानकारी मीडिया ब्रीफिंग में दें।

UPA सरकार को अल्पसंख्यकों की नाराजगी का था डर

करनाल सिंह ने किताब में एनकाउंटर के जुड़े पहलुओं की आँखों देखी जानकारी दी है। वे लिखते हैं, “राजनीतिक गलियारों के कुछ वर्ग अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित आतंकवादियों के खिलाफ सामने आ रहे तथ्यों से परेशान थे। मैंने तर्क दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और पुलिस अधिकारियों के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम अपने विश्वास के बावजूद आतंकवादियों का नेतृत्व करें और उन्हें गिरफ्तार करें।”

करनाल सिंह के अनुसार, मीडिया जानकारी माँग रही थी, लेकिन उनके साथ जाँच की जानकारी ना देने के सख्त आदेश थे। उन्होंने लिखा है कि वहाँ अराजकता थी और दिल्ली पुलिस ‘परसेप्शन’ की लड़ाई हार रही थी। उन्होंने लिखा है कि बाटला हाउस मुठभेड़ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक ऐतिहासिक घटना बन गई।

सिंह ने लिखा, “इसने आईएम को एक महत्वपूर्ण झटका दिया, क्योंकि इसमें उनके प्रमुख सदस्य मारे गए और भारत में उनके नेटवर्क की रीढ़ टूट गई। हमने सबसे बुद्धिमान और बहादुर अधिकारियों में से एक को खो दिया, जिसके निष्कर्षों ने हमें मुख्य आईएम सदस्यों तक पहुँचाया था।”

उन्होंने कहा कि इस मामले ने एक राजनीतिक तूफान ला दिया, स्पेशल सेल अधिकारियों के खिलाफ एक ‘व्हिच हंटिंग’ जारी की गई। जनता की अलग-अलग राय और मीडिया ने इसे हमेशा के लिए एक विवादास्पद विषय बना दिया, जो आज तक जारी है।

इस पुस्तक में लिखा गया है कि बाटला हाउस मुठभेड़ के बाद सभी मोर्चों से सरकार पर दबाव बढ़ रहा था। दिल्ली में सीरियल ब्लास्ट हुए थे और सरकार पर आरोप लगाया जा रहा था कि वह आतंकवाद के प्रति नरम है।

‘मजहब के खिलाफ साजिश’

करनाल सिंह लिखते हैं, “इसके बाद 14 अक्टूबर को एनकाउंटर को एक नया आयाम दिया गया जब भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के कुछ वरिष्ठ राजनेताओं ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। एनकाउंटर को ‘समुदाय विशेष के साथ अन्याय’ बताते हुए इसकी न्यायिक जाँच की माँग की गई।”

इसके बाद करनाल सिंह को दिल्ली के तत्कालीन लेफ्टिनेन्ट गवर्नर तेजेंद्र खन्ना का फोन आया और उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल, जो कि एक केंद्रीय मंत्री थे, मुठभेड़ से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना चाहते थे। खन्ना ने सिंह को ‘तैयार होकर आने’ की सलाह दी थी।

करनाल सिंह लिखते हैं कि सिब्बल ने उन्हें मीडिया सहित कई विभिन्न मुद्दों के बारे में बताने के लिए कहा और उन्होंने हर मुद्दे पर जवाब दिया और पुलिस के पास उपलब्ध सभी सूचनाओं को सिब्बल से शेयर किया।

करनाल सिंह के अनुसार, दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल के घर पर कैबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल को एनकाउंटर के सारे तथ्य दिखाए गए। इन तथ्यों से तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह को भी अवगत कराया गया। बाद में एक मुलाकात में मनमोहन सिंह ने खुद उन्हें बेहतरीन जाँच के लिए बधाई दी।

जामिया के किसी भी गवाह को नहीं थी जानकारी, तब भी दी गवाही

सिंह कहते हैं कि बाटला हाउस मुठभेड़ को एक सार्वजनिक मुकदमे में रखा गया था। पुस्तक के अनुसार, अक्टूबर 12, 2008 को जामिया मिलिया इस्लामिया के शिक्षकों के एक समूह ने एक जन सुनवाई की। जूरी में राजनेता और कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश, मानवाधिकार राजनीतिक कार्यकर्ता जॉन दयाल और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तृप्ता वाही, विजय सिंह और निर्मलंगशु मुखर्जी शामिल थे। करनाल सिंह आगे लिखते हैं कि जामिया के दर्जनों निवासियों ने उस बैठक में गवाही दी। बाद में जूरी ने अपने निष्कर्ष दिए, जो बात पहले से ही मीडिया के कुछ हिस्सों में कही जा रही थी। हमारे विभाग द्वारा पहले से ही इन बातों के जवाब दे दिए गए थे।

वह लिखते हैं कि जन सुनवाई के निष्कर्ष बेकार थे। जिन लोगों को इसमें शामिल किया गया था, उनमें से किसी को भी घटना की जानकारी नहीं थी। यही कारण है कि उनमें से कोई भी बाद में इन गवाही को शेयर करने के लिए आगे नहीं आया या उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में कोई हलफनामा नहीं दिया।

बाटला हाउस एनकाउंटर पर रोई थीं सोनिया गाँधी

फरवरी 2012 में आजमगढ़ में एक रैली को संबोधित करते वक्त कॉन्ग्रेस नेता और तत्‍कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने दिल्ली के बाटला हाउस एनकाउंटर का जिक्र करते हुए कहा था कि जब उन्होंने इसकी तस्वीरें सोनिया गाँधी को दिखाई, तब उनकी आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने पीएम से बात करने की सलाह दी थी।

फरवरी 2020 में दिल्ली की एक चुनावी रैली को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने भी कहा था कि जो लोग बाटला हाउस के आतंकवादियों के लिए रोते हैं, वो दिल्ली का विकास नहीं कर सकते।

अक्टूबर, 2008 को तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी कहा था कि यह एक फर्जी एनकाउंटर था। ममता ने यहाँ तक कहा था कि अगर वो गलत साबित हुई तो राजनीति छोड़ देंगी।

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह शुरू से ही बटला हाउस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते रहे। वास्तव में, इस मुद्दे की राजनीतिकरण की शुरुआत उन्होंने ही की थी।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी की बीवी आलिया ने दर्ज कराया बयान, शौहर के भाई पर लगाए थे छेड़छाड़ और गंदे क्लिप दिखाने के आरोप

फिल्म अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी आलिया ने शनिवार को यूपी के बुढ़ाना कोतवाली पहुॅंचकर अपना बयान दर्ज कराया। उन्होंने मुंबई के वर्सोवा थाने में नवाजुद्दीन और उनके परिजनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। इसमें मारपीट और प्रताड़ना का आरोप लगाया था।

आलिया ने मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना कोतवाली में अपने पति और ससुरालवालों के खिलाफ कई आरोप लगाते हुए बयान दर्ज करवाया। बुढ़ाना इंस्पेक्टर कुशलपाल सिंह ने बताया कि मुकदमे के संबंध में आलिया ने महिला पुलिस की मौजूदगी में एफआईआर के अनुसार ही अपना बयान दिया है।

बता दें कि आलिया सिद्दीकी ने 27 जुलाई को मुंबई के वर्सोवा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। यह रिपोर्ट नवाजुद्दीन, उनके भाई मिनाजुद्दीन, फैजुद्दीन, अयाजुद्दीन और माता मेहरूनिशा आदि के खिलाफ दर्ज कराई गई थी। मुंबई पुलिस ने घटनास्थल बुढ़ाना में होने के कारण विवेचना मुजफ्फरनगर स्थानांतरित कर दिया था। इसी मुकदमे में आलिया बयान देने बुढ़ाना पहुँची।

आलिया ने अभिनेता के भाई पर आरोप लगाया था कि उत्तर प्रदेश में नवाजुद्दीन के घर पर मिनहाजुद्दीन ने उनके साथ छेड़छाड़ की और अश्लील क्लिप दिखाया। उस समय नवाजुद्दीन मुंबई में थे। मुंबई लौटने पर आलिया ने जब नवाजुद्दीन को उनके भाई की करतूतों के बारे में बताया तो उन्होंने उसे मुँह बंद रखने के लिए कहा।

गौरतलब है कि इससे पहले नवाजुद्दीन की भतीजी ने भी उनके भाई पर यौन शोषण के आरोप लगाया था। वहीं उनकी पत्नी ने भी आरोप लगाया था कि नवाज के भाई अपने घर की औरतों के साथ मारपीट करते हैं और एक भाई ने उन्हें भी थप्पड़ मारा था।

आलिया ने एक इंटरव्यू के दौरान आरोप लगाया था कि, “नवाज के दो या तीन भाई हैं, जो पूरी तरह पागल हैं। उनके पास दिमाग नहीं है, वो इसी तरह के माहौल में बड़े हुए हैं इसलिए वो लोग ऐसे बन गए हैं। उनकी परिवार में महिलाओं की बिल्कुल इज्ज़त नहीं की जाती। उनका जब मन करता है वे अपने घर की औरतों को मारते हैं।”

उन्होंने यह भी कहा था, “हमारी शादी से पहले और शादी के बाद भी काफी लड़ाई होती थी। जब मैं प्रेग्नेंट थी तो मुझे चेकअप के लिए खुद ही ड्राइव करके जाना पड़ता था। मेरे डॉक्टर हमेशा मुझे कहते थे कि मैं पागल हूँ और मैं पहली ऐसी महिला हूँ, जो डिलीवरी के लिए अकेले आई है। मेरा लेबर पेन शुरू हुआ तो नवाज व उनके माता-पिता वहीं थे। लेकिन उस समय भी मेरे पति मेरे साथ नहीं थे। वह अपनी गर्लफ्रेंड से कॉल पर बात किया करते थे। मुझे इसका पता उनके फोन बिल्स से चला था।”

PM नरेंद्र मोदी फासिस्ट हैं, क्योंकि महाराष्ट्र से लेकर तेलंगाना और पश्चिम बंगाल तक में खौफ है ‘उनका’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़ासिस्ट (फासीवादी) हैं।

शिवसेना ने केबल ऑपरेटर को रिपब्लिक मीडिया चैनल को ब्लॉक करने की दी धमकी

महाराष्ट्र सरकार की सत्तारूढ़ पार्टी शिवसेना ने केबल ऑपरेटरों को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का अपमान करने के लिए रिपब्लिक भारत चैनल को गुरुवार (10 सितंबर, 2020) को बंद करने के लिए कहा। उन्होंने शिवसेना के सहयोगी शिव केबल सेना द्वारा एक पत्र के माध्यम से केबल ऑपरेटरों को इस बात का निर्देश दिया।

इतना ही नहीं शिवसेना ने केबल ऑपरेटरों को अर्णब गोस्वामी के नेतृत्व वाले मीडिया नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने या फिर परिणामों को भुगतने की खुली धमकी भी दी है। शिवसेना वर्तमान में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ महाराष्ट्र की सत्ता में है।

लेकिन, मोदी आलोचना नहीं कर सकते।

तेलंगाना सीएम ने केबल ऑपरेटर को धमकाया

वहीं तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने सितंबर 2014 में, तेलंगाना का अपमान करने के आरोपों पर केबल ऑपरेटरों को धमकी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर केबल ऑपरेटरों ने हाल ही में बने राज्य का अपमान करना जारी रखा तो वे उन्हें जमीन के 10 फीट नीचे गाड़ देंगे।

लेकिन लिबरल गिरोह की मानें तो जाहिर है, मोदी प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा रहे हैं।

ममता बनर्जी की आलोचना करने पर पश्चिम बंगाल सरकार ने बैन किया चैनल

पश्चिम बंगाल सरकार ने इस साल मई में राज्य सरकार पर सवाल उठाने के कारण केबल नेटवर्क पर एक समाचार चैनल का प्रसारण रोक दिया था। यह प्रसारण कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों में रोका गया था।

लेकिन नहीं… हम मोदी शासन के तहत अघोषित आपातकाल की स्थिति में रह रहे हैं।

आपातकाल से याद आया! क्यों न हम अब आपातकाल की बात करते हैं। आइए हम अपने इतिहास के बारे में जानते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 25 जून 1975 को, भारत में आपातकाल की स्थिति घोषित की थी। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 को वापस लिया गया था। यह कुल 21 महीने तक चला था।

इंदिरा गाँधी ने भारत में जब इमरजेंसी की घोषणा की थी

फ्रीडम ऑफ प्रेस सहित नागरिक स्वतंत्रता को तब निलंबित कर दिया गया था। इंदिरा गाँधी सरकार द्वारा पत्रकारों, विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। प्रिंटिंग प्रेसों पर छापे मारे गए और समाचार पत्रों को बंद करा दिया गया था।

मीडिया को अनुसरण करने के लिए ‘दिशा-निर्देश’ दिए गए थे। मुख्य प्रेस सलाहकार के अप्रूवल के बाद ही कोई खबर प्रकाशित की जाती थी। सरकार के खिलाफ खबरों को सेंसर कर दिया जाता था। सिर्फ देश ही नहीं विदेशी प्रकाशनों के पत्रकारों को निष्कासित कर दिया गया था। और धमकियाँ मिलने के बाद कुछ विदेशी अपने देश वापस लौट गए थे।

गृह मंत्रालय के अनुसार, 1976 के मई में लगभग 7,000 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को गिरफ्तार भी किया गया था।

लेकिन, इन सब के बावजूद मोदी फ़ासिस्ट (फासीवादी) हैं।