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कोरोना के बीच बेरोजगारी पर सरकारों को घेरना कितना उचित?

जुलाई के CMIE आँकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर 7.43% है, जो कि जून में 10.99% थी। इसी प्राइवेट थिंक टैंक के अनुसार जुलाई में 50 लाख सैलरी वाले लोगों की नौकरी जाने का अंदाजा लगाया गया है, जो कि पूरे कोविड (कोरोना) आपदा के दौरान दो करोड़ तक कही जा रही है। ये आँकड़े अच्छे नहीं हैं। न ही इसे किसी भी तर्क से सही कहा जा सकता है।

इसके साथ ही दूसरा आँकड़ा यह भी है कि अव्यवस्थित सेक्टर में नौकरियाँ बढ़ने से नौकरी वाले लोगों की संख्या में सुधार तो है, लेकिन यह सुधार सही नहीं है। वह इसलिए कि सैलरी वाले लोगों की नौकरी के जाने का मतलब है कि जो ज्यादा पैसा कमाने और खर्च करने वाले लोग हैं, उनकी संख्या लगातार घट रही है।

अब समस्या यह है कि कई लोग सरकारों को कोस रहे हैं कि सरकार तैयार नहीं है, इस विकट स्थिति का समाधान नहीं है उसके पास। सोशल मीडिया पर यह भी लिखा जा रहा है कि अगर सरकार उपलब्धियों का श्रेय लेती है तो उन्हें बेरोजगारी पर भी गाली सुनने को तैयार होना चाहिए। ठीक है, आप गाली दीजिए लेकिन, आप सुशिक्षित हैं, ये तो बताइए कि समाधान क्या है? क्या आपके पास एक सुझाव है इसको लेकर? या फिर आप बस लिखे जा रहे हैं कि सरकारों को तैयार रहना चाहिए?

आप आर्थिक मंदी का उदाहरण देने लगते हैं, कहने लगते हैं कि फिर तो सरकार को गंदे शहरों के लिए भी नहीं कोसना चाहिए, बाढ़ आने पर भी हमें ये कहना चाहिए कि पानी तेज था, बाँध बह गया…

लेकिन क्या कोरोना की समस्या किसी शहर के गंदा होने, अर्थव्यवस्था की मंदी (जबकि सारे व्यापार-संस्थान आदि चालू रहते हैं) या फिर बाढ़ जैसी आपदा की तरह है क्या? क्या हम इन उदाहरणों के आधार पर सरकार को इस आपदा के लिए या इस आपदाजनित बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार ठहरा सकते हैं?

संक्षेप में देखा जाए कि ‘क्या सरकार की तैयारी नहीं थी’, तो हम पाते हैं कि सरकार ने हर वो कार्य किया जो वो कर सकती थी। फरवरी से एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग से ले कर, मार्च के लॉकडाउन तक, और फिर बिगड़ती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पैकेज की घोषणा तक, सरकार ने लगातार कदम उठाए। लॉकडाउन हुआ तो सब-कुछ थम गया, व्यापारों और प्रतिष्ठानों के पैसे खत्म होने लगे, लोग कहने लगे कि ढील दी जाए। अनलॉक शुरू हुआ तो फिर संक्रमण के मामले बढ़ने लगे। ये आपदा दोधारी तलवार की तरह राष्ट्रों पर टूट पड़ी। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए, जिसकी अर्थव्यवस्था सुधार की ओर जा रही थी, ये रीढ़ टूटने जैसी साबित हुई है। यहाँ समस्या कई हैं, समाधान बिलकुल नगण्य।

मंदी के लिए सरकारें तैयार रहती हैं, क्योंकि वो एक अपेक्षित स्थिति है। ऐसा कई बार होता है। आपदा भी जब आती है तो वो देश के किसी छोटे हिस्से को प्रभावित करती हैं। बाढ़ के लिए सरकार जिम्मेदार होती है, क्योंकि सरकार को पता होता है कि बाढ़ कब आएगी, कितना डैमेज करेगी, सरकार उसकी योजना पहले साल नहीं तो पाँचवें साल तक तो बना ले।

देश की गंदगी दूर करने के लिए नगरनिगम होते हैं, वही उनका काम है। उसी के लिए पैसे दिए जाते हैं हमारे टैक्स के।

उपलब्धियों का श्रेय लेंगे और पॉलिसी लेवल की असफलता का भी। लेकिन एक ऐसी आपदा जिसने दो तरफ से नुकसान किया है, उसके लिए आप चाह बहुत कुछ सकते हैं, कर नहीं सकते।

कोरोना को ले कर तीन मुख्य समस्याएँ हैं;

  • अर्थव्यवस्था मंद नहीं, लगभग ठप्प है और वैश्विक परिदृश्य में भी कोई सुधार नहीं। न ही आपका बफर उस तरह का है कि आप दो ट्रिलियन का पैकेज दे कर बेरोजगारी भत्ता दे दें।
  • आर्थिक तौर पर देश में सब कुछ बंद होने के कारण सरकार के पास पैसा आने की जगह, पैकेज देने में ही जा रहा है। ऐसे में करेंसी छाप कर लोगों को पैसा देने का मतलब है कि चार साल बाद आप मंदी और महँगाई के दैत्य को निमंत्रण दे रहे हैं।
  • बेरोजगारी बढ़ेगी, क्योंकि ऐसे समय में दुर्भाग्य से वही सत्य है। आपकी नौकरी गई, वो एक सत्य है। लेकिन आपको सरकार वो सैलरी अब दे, या आपको रोजगार दे दे, ये मूर्खतापूर्ण दुराग्रह है। सरकारी लोगों की नौकरी सुरक्षित है। वहाँ भी कई सेक्टर में काम पहले जैसा नहीं हो रहा, लेकिन उन्हें निकाला नहीं गया।

आलोचना कीजिए लेकिन उसका सटीक कारण होना चाहिए। आपके पास कोई समाधान नहीं है, तो आप आलोचना इस तरह से मत कीजिए कि सरकार तो सबकुछ होती है, उसे ही कुछ करना चाहिए। ये ‘कुछ’ क्या है? पैसे बाँटे सरकार? पैसे हैं कहाँ?

सरकार ने रोजगार शुरू करने के लिए लोन की व्यवस्था की है। जो गरीब थे, जिनकी कोई सेविंग नहीं थी, उनको नवंबर तक भोजन की व्यवस्था की है। सरकार की प्राथमिकता आप नहीं हैं, क्योंकि आप इस धक्के को सरकार को गाली दे कर भी सह लेंगे।

सरकार की प्राथमिकता हमेशा वो होंगे जिनकी जान चली जाने के कगार पर है। वहाँ पाँच किलो चावल और गेहूँ से लोग जिंदा हैं वरना महामारी से कम, भुखमरी से ज्यादा लोग मर जाते।

आप पूछ रहे हैं कि चीजें कब सामान्य होंगी। ये क्या भूकम्प आ कर चला गया है कि हमने नाप लिया कितनी तबाही फैली और फिर योजना बना ली? ये आपदा अभी चल रही है, आप सुनामी के बीच में हैं और जब ज्वार बढ़ ही रहा है, तब आपको जानना है कि चीजें कब सामान्य होंगी।

मैं किसी एक सरकार का पक्ष नहीं ले रहा। और पढ़ने वाले ये भी जान लें कि सरकार कॉन्ग्रेस की भी होती तो भी मैं यही कहता कि सरकार असामान्य परिस्थिति में जो कर रही है, वो सराहनीय है। मैंने देश के किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री की आलोचना नहीं की है इस पूरे समय में। मेरे पास भी खबरें आती हैं कि फलाँ राज्य में टेस्टिंग कम हो रही है, कोई मृत्यु के आँकड़े आधा दे रहा है, कहीं हॉस्पिटल में व्यवस्था नहीं है… स्वास्थ्य और रोजगार, दोनों ही, केन्द्र और राज्य के विषय हैं। फिर भी, चूँकि मेरे पास ऐसी आपदा का समाधान नहीं, न ही मैं तार्किक विश्लेषण कर बता सकता हूँ कि ये कब जाएगा, न ही मुझे ये दिख रहा है कि सरकार कोताही कर रही है, इसलिए मैं समाधानहीन आलोचना से बचता हूँ।

सरकार वैसी विपदा का स्कोप ले कर नहीं चल सकती जो लोकल की जगह ग्लोबल है, क्योंकि वर्तमान जनसंख्या के किसी भी व्यक्ति ने ऐसी आपदा अपने जीवनकाल में ही नहीं देखी। न ही, हम एक विकसित राष्ट्र हैं कि बफर से पैसे निकाल कर बाँट दें या जो बेरोजगार हैं उनको भत्ता देने लगें। हमें ऐसे समय का इंतजार करना चाहिए जब हमारी अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो जाए कि देश से गरीबी चली जाए, और 135 करोड़ लोगों को घर बिठा कर उनकी आशाओं के हिसाब से पैसे दिए जा सकें।

जब आपके पास समाधान तो छोड़िए, कोई आकलन भी नहीं है, किसी ऐसी अर्थव्यवस्था का उदाहरण भी नहीं जिसकी जनसंख्या और आर्थिक क्षमता आपके स्तर की है, जिसने कोरोना से पार पा लिया हो, तब तक आपके पास देखने और समझने का मौका है।

आलोचना का क्या है, वो तो हम कभी भी कर सकते हैं। आपको बीस हजार प्रति महीने सरकार देने लगे तो आप कहेंगे कि मेरी सैलरी तो एक लाख थी, मैं तो दिल्ली में रहता हूँ, इतना तो मेरे कैब का खर्चा है। इसलिए, अभी बात जिंदा रहने की है। जिंदा रहने के लिए दस किलो अनाज आवश्यक हैं, सर पर एक छत जरूरी है और कोरोना से बचने के प्रावधानों का पालन आवश्यक है।

मेरी नौकरी चली जाएगी तो मैं गाँव जाऊँगा। वहाँ सरकारी गेहूँ और चावल खा कर जीवित रहने का उपाय करूँगा। फिर चुनाव आएँगे तब ये देखूँगा कि ये सरकार तो जो कर रही थी किया, लेकिन क्या किसी और चेहरे में बेहतर करने की मंशा होती? फिर जो समझ में आएगा उसको वोट दूँगा। मैं नौकरी जाने को भी अभी प्राकृतिक आपदा ही मान रहा हूँ, ये कृत्रिम नहीं है।

POK से तनवीर अहमद ने हटा दिया पाकिस्तान का झंडा, एजेंसियों ने अगवा कर किया टॉर्चर

तनवीर अहमद नाम के सामाजिक कार्यकर्ता ने शुक्रवार (21 अगस्त 2020) को पीओके में एक सार्वजनिक जगह से पाकिस्तान का झंडा हटा दिया। इसके बाद पाकिस्तानी एजेंसियों ने उन्हें अगवा कर प्रताड़ित किया। इससे पहले अहमद ने जान से मारने की धमकी मिलने की बात कही थी।  

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ तनवीर अहमद पिछले कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे थे। उनकी माँग थी कि पीओके स्थित दादयाल से पाकिस्तान का झंडा हटा दिया जाए। लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई पहल नहीं होने पर उन्होंने खुद झंडा हटा दिया।

मकबूल शहीद स्क्वायर से झंडा हटाते हुए उनकी तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं। इसके बाद दीवार पर चढ़े और चौराहे के नज़दीक मौजूद दूसरा पाकिस्तानी झंडा भी हटा दिया। झंडा हटाए जाने के बाद अहमद ने कहा था कि पाकिस्तानी एजेंसी के लोग उनका पीछा कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक़ इस घटना के बाद पाकिस्तानी एजेंसी के लोगों ने उनके साथ धक्का-मुक्की और ज़्यादती की।         

पीओके में पाकिस्तानी ज्यादती का अरसे से विरोध हो रहा है। स्थानीय लोग इलाके में चीनी दखल से भी नाराज हैं।इसके पहले भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थानीय लोगों के बीच चीन के ख़िलाफ़ बढ़ते रोष को लेकर ख़बरें सामने आई थीं। कुछ ही समय पहले नीलम-झेलम नदी पर बाँध निर्माण के विरोध में पीओके के मुजफ्फराबाद शहर में लोगों ने विशाल मशाल रैली निकाल कर अपना विरोध दर्ज कराया था।

नसीरुद्दीन शाह, हाफ-एजुकेटेड तुम हो, कंगना नहीं! | Ajeet Bharti Video on Naseeruddin Shah’s misogynist remarks on Kangna

नसीरुद्दीन शाह ने कंगना रनौत को ‘हाफ एजुकेटेड स्टारलेट’ कह कर सम्बोधित किया है और सुशांत सिंह राजपूत के न्याय के लिए चल रहे अभियान को घृणास्पद करार दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों के क्या विचार हैं, इसमें किसी को भी रुचि नहीं है और कुछ लोगों ने सुशांत सिंह राजपूत मामले में ये सब करने का बीड़ा उठा रखा है। नसीरुद्दीन शाह ने क़ानून में विश्वास रखने की बात भी कही।

कंगना रनौत पर निशाना साधते हुए नसीरुद्दीन शाह ने इनसाइडर-आउटसाइडर पर हो रही चर्चा को ही बेहूदा करार दिया और कहा कि इस मामले में काफी बकवास किया जा रहा है और लोगों को इस ‘बेहूदगी’ को ख़त्म करना चाहिए। उन्होंने कंगना के आरोपों को नकारते हुए बॉलीवुड में मूवी माफिया के अस्तित्व को ही नकार दिया और कहा कि जो लोग ऐसी बातें कर रहे हैं, वो फ़्रस्ट्रेशन निकाल रहे हैं।

बॉलीवुड अभिनेत्री को उन्होंने ‘स्टारलेट’ कह कर संबोधित किया, यानी उनकी नजर में वो स्टार तक नहीं हैं, जबकि ये लोग सैफ अली खान से लेकर सलमान खान तक को सुपरस्टार कह कर गर्व से पुकारते हैं, क्योंकि नेपोटिज्म इनकी रग-रग में दौड़ता है। कंगना रनौत मुंबई से काफी दूर एक पहाड़ी राज्य से आई हैं। उनके माता-पिता किसी बड़े फिल्मी खानदान से नहीं आते, इसीलिए वो उन्हें कुछ भी कह सकते हैं।

नसीरुद्दीन शाह द्वारा कंगना रनौत के खिलाफ की गई टिप्पणी पर अजीत भारती का विश्लेषण इस यूट्यूब लिंक पर जाकर देख सकते हैं।

मस्जिद में बैठ कर बना रहे थे बम, अचानक हुआ धमाका; जरीफ़, अब्दुल, अबू और हबीब मौके पर ही ढेर

अफगानिस्तान के एक मस्जिद में बम बना रहे कई तालिबानी आतंकियों में तब कोहराम मच गया, जब अचानक से विस्फोट हो गया। इसमें कई तालिबानी आतंकियों के मारे जाने और घायल होने की खबर है, जिसका कोई स्पष्ट आँकड़ा सामने नहीं आया है। ये सभी आतंकी ‘Improvised Explosive Device (IED) बना रहे थे। विस्फोट से मस्जिद को भी खासा नुकसान पहुँचा है।

अफगानिस्तान नेशनल आर्मी के 209 शाहीन कॉर्प्स ने जानकारी दी है कि घटना उत्तरी अफगानिस्तान बल्ख के चाहबर बोलाक जिले में हुई। बताया गया है कि 8 तालिबानी आतंकी मस्जिद में बम बनाने के काम में सक्रिय थे, जिनका इस्तेमाल वे अक्सर इलाक़े में दहशत फैलाने के लिए करते हैं। सिकंदर खेल गाँव में स्थित मस्जिद को उन्होंने अपना अड्डा बनाया हुआ था। तभी बम बनाने में हुई गड़बड़ी के कारण वहाँ विस्फोट हो गया।

अफगानिस्तान की फ़ौज ने बताया है कि संभावित आँकड़ों के अनुसार, इस धमाके में जहाँ 4 तालिबानी आतंकियों की मौत हो गई, वहीं बाकी 4 भी गंभीर रूप से घायल हुए। इस घटना में जरीफ़, अब्दुल बशीर, अबू बकर और हबीब की मौत हुई। इस धमाके में तालिबान के विस्फोटक बर्बाद हो गए हैं और इनमें खरतरनाक IED भी शामिल है। अब तक इस घटना पर तालिबान की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। गाँव के लोग अभी भी दहशत में हैं।

हाल ही में पश्चिम बंगाल से भी ऐसी ही घटना सामने आई जहाँ मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज में तृणमूल कॉन्ग्रेस का कार्यकर्ता हुमायूँ कबीर शनिवार (अगस्त 15, 2020) की रात अपने घर की छत पर बैठ कर बम बना रहा था। इसी दौरान बम फट गया और वह मौके पर ही मारा गया। उसका 10 साल का बेटा भी विस्फोट की जद में आकर घायल हो गया था। हुमायूँ कबीर अपने घर की छत पर बैठ कर क्रूड बम बना रहा था।

ऑटोप्सी रिपोर्ट में सुशांत की मौत का समय नहीं, जाँच के लिए एम्स ने बनाई 5 फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम

सुशांत सिंह राजपूत की ऑटोप्सी रिपोर्ट सामने आने से नए सवाल खड़े हो गए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस रिपोर्ट में सुशांत की मौत के समय का जिक्र नहीं है। इधर, एम्स ने पॉंच फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम का गठन किया है। इस टीम का गठन सीबीआई की ओर से सहयोग मॉंगे जाने के बाद किया गया है।

एम्स की टीम सुशांत के शरीर पर मौजूद चोटों के पैटर्न की जाँच करेगी। ऑटोप्सी रिपोर्ट में मौत की समय का जिक्र नहीं होने से फॉरेंसिक विशेषज्ञ भी हैरान हैं।

एम्स द्वारा गठित टीम के मुखिया सुधीर गुप्ता ने कहा, “सीबीआई सुशांत सिंह मामले में अब तक जितनी रिपोर्ट तैयार हुई है वह इकट्ठा कर रही है। जल्द ही वह सारी रिपोर्ट हमें दे देंगे। हम उन सबूतों का भी विश्लेषण करेंगे जो सुशांत सिंह के शरीर की जाँच के दौरान मिले थे।” 

सीबीआई ने इस मामले में एम्स से मेडिको लीगल ओपिनियन माँगी है। सुधीर गुप्ता ने बताया कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले हमें इस तरह के सभी पहलुओं को नज़दीक से समझना होगा। इसके पहले सुधीर गुप्ता की अगुवाई में फॉरेंसिक टीम ने कई बड़े मामलों में मेडिको लीगल ओपिनियन दिया है। इसमें शीना बोरा और सुनंदा पुष्कर का मामला मुख्य है।      

ऑटोप्सी रिपोर्ट में सामने आई कई बातें हैरान कर देने वाली हैं। दरअसल इंसान की मृत्यु का समय भी एक अहम सबूत माना जाता है, लेकिन सुशांत सिंह का मामले में इसका कोई उल्लेख ही नहीं है। 7 पन्नों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि सुशांत सिंह के शरीर पर बाहरी चोट के कोई निशान नहीं थे। इसके अलावा सुशांत के गले के पिछले हिस्से में भी कोई निशान नहीं मिले थे। फॉरेंसिक विशेषज्ञ दिनेश राव ने टाइम्स नाउ से बात करते हुए कहा कि रिपोर्ट मौत के तरीके पर जानकारी देती है। सुशांत सिंह के शरीर पर कोई बाहरी चोट के निशान नहीं थे, इसका यह मतलब है कि यह किसी ने दबाव बना कर नहीं किया है। 

इससे पहले मीडिया रिपोर्टों से यह बात सामने आई थी कि सुशांत की मौत के बाद रिया चकवर्ती अपने माता-पिता और भाई के साथ कूपर हॉस्पिटल भी पहुॅंची थी। वह हॉस्पिटल में करीब 45 मिनट रहीं। इतना ही नहीं कथित तौर पर वह मॉर्चरी में भी गुपचुप तरीके से घुसी थीं। यह बात सामने आने के बाद सुशांत के पारिवारिक वकील केके सिंह ने पूछा था कि रिया को किस हैसियत से मॉर्चरी में प्रवेश दिया गया था।

असल में मुर्दाघर में पारिवारिक सदस्यों के अलावा किसी और को प्रवेश की अनुमति नहीं होती है। चश्मदीद ने बताया था कि रिया चक्रवर्ती पाँच से सात मिनट तक शव गृह में रही। इस दौरान रिया ने सुशांत के सीने पर हाथ रखकर ‘सॉरी बाबू’ कहा था।

दिल्ली पुलिस ने एनकाउंटर के बाद ISIS आतंकी अबू युसूफ को दबोचा, IED और हथियार भी जब्त

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ISIS के एक आतंकी को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। राष्ट्रीय राजधानी के रिंग रोड में हुए एक मुठभेड़ के बाद खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन ISIS के आतंकी अबू युसूफ खान को शुक्रवार (अगस्त 21, 2020) को गिरफ्तार किया गया। उसके पास से खतरनाक ‘Improvised Explosive Devices (IEDs)’ भी जब्त किए गए हैं। अबू यूसुफ से पूछताछ जारी है।

ISIS आतंकी अबू युसूफ खान को दिल्ली के करोलबाग और धौलाकुआँ के बीच रिज रोड इलाके से गिरफ्तार किया गया। उसने पुलिस पर फायरिंग भी की थी। पुलिस ने उस पिस्टल को जब्त कर लिया है, जिसका इस्तेमाल कर उसने गोली चलाई थी। गिरफ्तार करने से पहले पुलिस और आतंकी के बीच कुछ देर तक शूटआउट भी चला। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इसकी पुष्टि की है।

डिप्टी कमिश्नर प्रमोद कुशवाहा ने इस बात की जानकारी दी। आतंकी अबू युसूफ खान उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। उसे आधी रात को 12 बजे के करीब गिरफ्तार किया गया। उसके पास से विस्फोटक और पिस्टल जब्त होने से आशंका जताई जा रही है कि वो किसी बड़े हमले की फिराक में थे। बता दें कि राम मंदिर भूमिपूजन के बाद से ही कई राज्य अलर्ट पर हैं।

इससे पहले बेंगलुरु में खूँखार आतंकी संगठन ISIS के लिए काम करने वाले एक Ophthalmologist (नेत्र चिकित्सक) को गिरफ्तार किया गया था। उसे इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रोविंस से जुड़ाव के लिए गिरफ्तार किया गया गया था। गिरफ्तार किए गए डॉक्टर का नाम अब्दुर रहमान (Abdur Rahman है, जो सफेद कॉलर में आतंकी बन कर बैठा हुआ था। वो बेंगलुरु के बसवनगुण्डी का रहने वाला है।

ताहिर पर देशद्रोह का केस चलाने की दिल्ली सरकार ने अब तक नहीं दी है मंजूरी, कोर्ट ने माना- दंगा भड़काने के पर्याप्त सबूत हैं

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में इस साल फरवरी में भड़के हिन्दू विरोधी दंगों के मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ताहिर हुसैन के भड़काने पर ही संप्रदाय विशेष के लोग उग्र हुए और हिन्दू समुदाय के लोगों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। कोर्ट ने शुक्रवार (अगस्त 21, 2020) को आईबी में कार्यरत रहे अंकित शर्मा की हत्या के मामले में दायर की गई चार्जशीट को संज्ञान में लेते हुए उक्त टिप्पणी की।

हालाँकि, कोर्ट को ये भी सूचित किया गया कि दिल्ली पुलिस अब तक ताहिर हुसैन के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाने के लिए सम्बंधित प्राधिकरण से मंजूरी नहीं ले सकी है। यही हाल दिल्ली दंगों के अन्य आरोपितों के मामले में भी है। बता दें कि देशद्रोह का मामला चलाने के लिए दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है। अभी तक आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस मामले में मंजूरी नहीं दी है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की अक्सर उनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति और संप्रदाय विशेष के आरोपितों के प्रति नरम रुख रखने के कारण आलोचना होती रही है। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम पाठक ने कहा कि दिल्ली सरकार से मंजूरी लेने के लिए कोई निश्चित समयावधि का प्रावधान नहीं है। हालाँकि, वो ये कहने से भी नहीं चूके कि इस मामले की सुनवाई में होने वाली किसी भी प्रकार की देरी उस उद्देश्य को ही गैर-ज़रूरी रूप से ख़त्म कर देगी, जिसके लिए स्पेशल कोर्ट का गठन हुआ।

बता दें कि दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट का गठन किया गया था। स्पेशल कोर्ट को दिल्ली दंगों से जुड़े सभी मामलों को संज्ञान में लेने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने कहा कि आरोपित के खिलाफ पर्याप्त सबूत और साक्ष्य हैं, जिससे आरोपितों के खिलाफ ट्रायल (देशद्रोह का) चलाने के लिए अनुमति ली जा सके। जाँच अधिकारी ने कोर्ट को बताया है कि 22 जून को ही इस मामले में अनुमति के लिए पत्र भेज दिया गया है।

कोर्ट ने कहा कि मंजूरी मिलने में कितना समय लगेगा, इस सम्बन्ध में कुछ भी स्पष्ट नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इन दंगों की तैयारी योजनाबद्ध तरीके से की गई और फिर एक बड़ी साजिश के तहत अंजाम दिया गया। साथ ही ताहिर हुसैन को दंगाई भीड़ का नेता भी करार दिया, जिसके इशारों पर भीड़ ने दंगे किए। कोर्ट ने कहा कि ताहिर हुसैन के भड़काने पर ही संप्रदाय विशेष के लोगों ने हिन्दुओं के घरों में आगजनी की और उनके प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया।

24-25 फ़रवरी को चाँद बाग़ पुलिया के नजदीक स्थित मस्जिद के पास से ताहिर हुसैन दंगाई भीड़ का नेतृत्व कर रहा था और अपने छत पर भी दंगाइयों को सामग्रियाँ उपलब्ध कराई, जिससे दूसरे समुदाय की संपत्ति और जान-माल को खासा नुकसान पहुँचा। इस दौरान हसी, नाजिम, कासिफ, समीर, अनस, फिरोज, जाएद, गुलफाम और शोएब जैसे दंगाई उसके साथ शामिल थे। साथ ही भीड़ ने खतरनाक हथियारों से अंकित शर्मा की हत्या कर सबूत मिटाने के उद्देश्य से उनकी लाश को फेंक दिया।

50 पेज की चार्जशीट में ताहिर हुसैन को मुख्य आरोपित बनाया गया है। बताया गया है कि ताहिर हुसैन के भड़काने पर उनकी पीट-पीट कर हत्या की गई थी। उस पर दंगा, अपराध के समय भड़काते हुए उपस्थित रहने, आगजनी की सामग्रियाँ इस्तेमाल करने, सबूत मिटाने और आपराधिक षड्यंत्र सहित कई मामले दर्ज किए हैं। कहा गया कि ताहिर हुसैन ने वहाँ के निवासियों के मन में डर का माहौल बनाया।

इसी साल फ़रवरी में खबर आई थी कि जेएनयू में 2016 में देश विरोधी नारे लगाने के मामले में तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाने की अनुमति दिल्ली सरकार नहीं दे रही है। इस संबंध में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने केजरीवाल सरकार के गृह मंत्रालय को पत्र लिखा था। पत्र दिल्ली की एक अदालत द्वारा इस संबंध में राज्य सरकार को रिमाइंडर भेजने का निर्देश दिए जाने के बाद लिखी गई थी। हालॉंकि बाद में दिल्ली सरकार ने इजाजत दे दी थी।

10 साल में 5000 बार रेप, 139 आरोपित; 25 साल की पीड़िता ने हैदराबाद में दर्ज कराई 42 पन्नों की FIR

भारत में रोजाना औसतन 90 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज किए जाते हैं। पर इस तरह का मामला शायद ही कभी सामने आया हो। हैदराबाद के पंजागुट्टा थाने में 25 साल की पीड़िता ने खुद के साथ करीब 5000 बार रेप किए जाने की शिकायत गुरुवार (20 अगस्त 2020) को दर्ज कराई।

42 पन्नों की एफआईआर में 139 आरोपितों का जिक्र है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह संख्या 143 बताई गई है। इनमें से 138 आरोपित नामजद और 5 अज्ञात हैं। कुछ म​हिलाओं के भी नाम हैं। आरोपितों में वामपंथी छात्र संगठन के नेता, मीडिया और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग, कारोबारी और पीड़िता के पूर्व पति के कुछ रिश्तेदार भी हैं।

पीड़िता की शादी काफी कम उम्र में जून 2009 में ही हो गई थी। शादी के करीब तीन महीने बाद ही ससुराल वाले उसे यौन और शारीरिक प्रताड़ना देने लगे। इससे तंग आकर दिसंबर 2010 में उसने तलाक ले लिया। इसके बाद वह अपने पिता के घर चली गई और पढ़ाई शुरू की।

प्रभासाक्षी की रिपोर्ट के अनुसार मायके में एक व्यक्ति से धोखा खाने के बाद पीड़िता हैदराबाद आ गई। यहॉं अलग-अलग इलाकों में उसके साथ रेप किया गया।

यौन शोषण के दौरान कुछ लोगों ने आपत्तिजनक स्थिति में उसका वीडियो बनाकर पोर्नोग्राफी के लिए इस्तेमाल किया। इस दौरान उसे प्रताड़ित करते हुए मारने की धमकी भी दी गई। यहॉं तक कि एसिड अटैक और पेट्रोल डालकर जलाने की धमकी भी दी गई।

पीड़िता के मुताबिक, “ये लोग ऑनलाइन सेक्स रैकेट चलाते हैं। उसकी तरह ही कई लड़कियॉं इनके द्वारा प्रताड़ित की गई हैं।” डेक्कन हेराल्ड ने पंजागुट्टा थाने के एसएचओ के हवाले से बताया है कि पीड़िता का बयान दर्ज कर मेडिकल जॉंच करवाया गया। उसके दावों की पुष्टि के लिए जॉंच जारी है।

पीड़िता के अनुसार कई बार उसके साथ गैंगरेप भी किया गया। उसे गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। ड्रग्स दिया गया। नग्न नाचने को विवश किया गया और उसके शरीर को सिगरेट से दाग दिया गया। इनकार करने पर आरोपितों ने हथियारों से भी उसे धमकाया।

पीड़िता का दावा है कि डर की वजह से वह शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। उसने अपनी आपबीती एक गैर सरकारी संगठन (NGO) को बताई। इसके बाद उनकी मदद से पुलिस से शिकायत की।

गौरतलब है कि 28 नवंबर 2019 की सुबह हैदराबाद के बाहरी इलाके से एक महिला वेटनरी डॉक्टर की जली हुई लाश मिली थी। स्कूटी खराब होने पर मदद के नाम पर चार लोगों ने गैंगरेप के बाद उन्हें जला दिया था। बाद में पुलिस ने आरोपितों को एक मुठभेड़ में मार गिराया था।

हाल ही में इजरायल से भी रेप की एक खौफनाक घटना सामने आई थी। यहॉं के इलट (Eilat) शहर स्थित एक होटल में 30 लोगों ने लाइन लगाकर एक 16 साल की लड़की का रेप किया और वीडियो बना ली। आरोपित एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे और लड़की की मदद के बहाने उसके साथ रेप किया। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया था।

भारत के कानून को भूल जाओ, सिर्फ़ शरिया को मानो: फरियाद लेकर थाने पहुँची तीन तलाक पीड़िता से दारोगा मंसूर अहमद

उत्तर प्रदेश के कानपुर में हिना परवीन को उसके शौहर नूरजादे ने सऊदी अरब जाकर मोबाइल से तीन तलाक दे दिया। ससुराल वालों ने पीट-पीटकर घर से भगा दिया। देवर ने ‘छपाक-2’ बनाने की धमकी दी। जब न्याय की गुहार लगाई तो इंसाफ की जगह उसे शरीयत मानने की सलाह दी गई।

कार्रवाई के बदले थाने के दारोगा मंसूर अहमद ने उसे बताया कि तीन तलाक कानून कुछ नहीं होता। शरीयत के हिसाब से उसका तलाक हो गया है। अब वह उसी को माने। दरोगा ने महिला के विरोध पर यह भी कहा कि उसके जैसी लड़कियों के कारण ही लोग संप्रदाय विशेष के मामले में हस्तक्षेप करते हैं।

दारोगा ने महिला से यह भी कहा, “तुम पहली लड़की नहीं हो, जिसे तीन तलाक मिला। ये शरिया कानून के तहत होता आया है, जिसे तुम्हें मानना चाहिए, भारत के कानून को भूल जाओ, सिर्फ़ शरिया को मानो।”

पूरा मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कानपुर के सुजातगंज निवासी हिना परवीन का निकाह पिछले साल 5 जुलाई को अजीतगंज के नूरजादे उर्फ इशान से हुआ था। निकाह के तीन माह बाद ही नूरजादे सऊदी अरब चला गया। 27 अक्टूबर को उसने परवीन को मोबाइल के जरिए तीन तलाक दिया। ससुराल ने भी तलाक की जानकारी पाते ही उसे पीट-पीटकर घर से निकाल दिया।

इसके बाद हिना ने पति नूरजादे, सास-ससुर, देवर, नंद, बहनोई समेत 8 लोगों के ख़िलाफ़ 4 नवंबर को बाबूपुरवा थाने में एफआईआर दर्ज करवाई। हिना ने आरोप लगाया कि निकाह के बाद उसके ससुराल वाले 5 लाख रुपए की माँग कर रहे थे। लेकिन उसके पिता ये बड़ी रकम देने असमर्थ थे। इसलिए साजिश के चलते उसका तलाक करवाया गया।

महिला के मुताबिक जब उसे ससुराल वालों के ख़िलाफ़ एफआईआर करवाई तो उसके देवर फैसल ने एसिड अटैक करके छपाक-2 बनाने की धमकी दी। इसके बाद महिला ने इसी साल जनवरी में वीडियो बनाकर मदद माँगी थी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, हिना परवीन को डर था कि उनके मामले की जाँच में बाधा आ जाएगी, क्योंकि उनके ससुराल वाले बाबू पुरवा थाने में पुलिस को प्रभावित कर सकते हैं। इसकी वजह से, उसने अधिकारियों से उसका मामला रेल बाजार पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित करने की माँग की। फिर उसका केस रेल बाजार में स्थांतरित करवाया गया। वहाँ मंसूर अहमद को जाँच सौंपी गई। लेकिन उन्होंने मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। फिर ये केस पवन दुबे को दिया गया।

कानपुर तीन तलाक पीड़िता के मामले पर पुलिस ने दिखाई निष्क्रियता

11 अगस्त को इस मामले में इंस्पेक्टर पवन दुबे ने हिना के पति नूरजादे को गिरफ्तार करके जेल भेजा। हैरानी की बात ये है कि एफआईआर से नूरजादे को छोड़कर सभी का नाम हटा दिया गया है। हिना ने इसके लिए पुलिस की निष्क्रियता को आरोप लगाया। उसने कहा कि उसे अपने शौहर और उसके परिवार के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवाए 9 महीने हो गए हैं। लेकिन उनके खि़लाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

हिना का यह भी कहना है कि उसके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि उसके पति ने पुलिस को 50 हजार की घूस दी ताकि उसके परिवार वालों का नाम एफआईआर से हटा दिया जाए। फोन रिकॉर्डिंग का हवाला देते हुए हिना ने बताया कि उससे साफ पता चल रहा है कि उसके शौहर ने अपने परिवार के साथ मिल कर कर उसके ख़िलाफ़ साजिश रची। उसने उस रिकॉर्डिंग में माना है कि उसने हिना से निकाह भी पैसों के लिए किया था।

ऑडियो रिकॉर्डिंग में नूरजादे को पुलिस प्रशासन और प्रधानमंत्री को लेकर भी घटिया भाषा का प्रयोग करते सुना जा सकता है। ऐसे में हिना का सवाल है कि इतना पुख्ता सबूत होने के बाद भी पुलिस एक्शन क्यों नहीं ले रही।

हिना यह भी पुष्टि करती है कि वह बाबू पुरवा थाने के सीओ आलोक सिंह से मिली थी और यह पूछा था कि पुलिस ने आरोपितों का नाम एफआईआर से क्यों हटाया। आलोक सिंह ने कथित तौर पर हिना को आश्वासन दिया कि वह इस मामले में तेजी लाएँगे। उसने कहा कि आलोक सिंह के निर्देश पर, IO पवन दुबे ने उसे फोन किया और कॉन्फ्रेंस कॉल पर पूर्व IO मंसूर अहमद को ले लिया। हिना के मुताबिक, पहले पवन दुबे ने ही उसे बताया कि मॅंसूर अहमद ने मामले के अन्य आरोपितों के नाम हटा दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया।।

गौरतलब है कि हिना परवीन जो पिछले 9 महीनों से पर्याप्त सबूतों के आधार पर न्याय माँग रही हैं, उसकी अब भी यही माँग है कि पुलिस को सारे आरोपितों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए।

सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट से महाराष्ट्र सरकार को धनराशि के ट्रांसफर को चुनौती देने वाली याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने किया स्वीकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट से महाराष्ट्र सरकार को धनराशि के ट्रांसफर/प्रस्तावित ट्रांसफर को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने कहा है कि अदालत के निर्णय के अधीन ही धनराशि स्थानांतरित की जा सकती है।

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति रेवती मोहिते-डेरे की खंडपीठ द्वारा की गई है। पीठ ने महाराष्ट्र सरकार और श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर ट्रस्ट प्रबंधन समिति को याचिका के जवाब में इस साल 18 सितंबर तक एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया। अक्टूबर महीने में मामले की फिर से सुनवाई होगी।

सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट से महाराष्ट्र सरकार को धन हस्तांतरण के लिए चुनौती देने वाली याचिका भगवान गणेश की भक्त गोरेगाँव निवासी लीला रंगा द्वारा दायर की गई थी। रंगा नियमित रूप से सिद्धिविनायक मंदिर में जाती थी और दान करती थी। याचिका में राज्य सरकार द्वारा 5 करोड़ रुपये के फंड ट्रांसफर के संबंध में पारित दो प्रस्तावों को चुनौती देने की माँग की गई थी।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती और अधिवक्ता घनश्याम मिश्रा ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि ये दोनों फंड ट्रांसफर विशेष कानून के प्रावधानों के तहत ‘अवैध’ हैं, जो इस बात को नियंत्रित करने के लिए पारित किए गए थे कि मंदिर में एकत्रित धन का उपयोग कैसे किया जाएगा। संचेती ने यह भी कहा कि निधि के लिए महाराष्ट्र सरकार की ओर से पहल की गई है। ट्रस्ट ने इस मामले में शुरुआत नहीं की है। उन्होंने माँग की कि फंड ट्रांसफर को रोकने के लिए अंतरिम आदेश दिया जाए।

5 करोड़ रुपये का पहला हस्तांतरण ‘शिव भोज’ नामक सरकारी योजना के लिए किया गया था। यह योजना गरीबों और बेसहारा लोगों को 10 रुपये में भोजन प्रदान करता है। वहीं 5 करोड़ रुपये की अगली किश्त कोरोना वायरस महामारी के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में स्थानांतरित की गई थी।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दोनों में से कोई भी लेन-देन विशेष कानून के तहत कवर नहीं किया गया था। श्री सिद्धि विनायक गणपति मंदिर ट्रस्ट (प्रभुदेवी) अधिनियम, 1980 के प्रावधानों के तहत फंड का ट्रांसफर अवैध है। अधिनियम की धारा 18 के तहत ट्रस्ट का धन केवल बहुत ही विशिष्ट उद्देश्यों के लिए हस्तांतरण किया जा सकता है। इसके अलावा जो उद्देश्य मंदिर से जुड़े नहीं हैं और दान के लिए उपयोग किए जा सकते हैं, वे हैं – श्रद्धालुओं के लिए रेस्टहाउस, ट्रस्ट की संपत्तियों और शैक्षणिक संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों या डिस्पेंसरी के रखरखाव के लिए इस्तेमाल।

हालाँकि, यह भी केवल ट्रस्ट की समिति द्वारा अधिकृत होने पर ही किया जा सकता है। इसके अलावा अगर ट्रस्ट के पास दान के लिए अतिरिक्त धन इकट्ठा हो। वहीं ट्रस्ट 5 साल के भीतर ट्रस्ट एक साथ अधिक धन हस्तांतरित करने से रोकता भी है।

याचिकाकर्ता की ओर से बहस कर रहे वकीलों ने आरोप लगाया कि फंड ट्रांसफर और पिछले महीने राज्य सरकार द्वारा ट्रस्ट की प्रबंध समिति के अध्यक्ष को दिए गए विस्तार के बीच संभावित एक कनेक्शन हो सकता है।