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‘ट्रेनों में मोदी सरकार का गुणगान करेंगे 3000 भिखारी’: झूठा है दावा, AIR ने बताई हकीकत

पूरे देश ने शनिवार को 74वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाया। लेकिन मोदी घृणा में कुछ मीडिया हाउस इस दिन भी झूठी खबर फैलाने से बाज नहीं आए। कुछ मीडिया हाउस ने खबर चलाई कि अब मोदी सरकार का गुणगान करने के लिए तीन हजार भिखारियों को भर्ती किया जाएगा।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय एक ऐसी योजना बना रही है जिसमें तीन हजार भिखारी चुने जाएँगे। इनका काम विभिन्न रेलगाड़ियों में यात्रियों के सामने मोदी सरकार की सफलताओं के गीत गाना होगा।

हालाँकि ऑल इंडिया रेडियो और पीआईबी ने इस दावे को खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि ये दावा झूठा है और सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना नहीं बनाई जा रही है।

बता दें कि मीडिया हाउस ने दैनिक भास्कर के जयप्रकाश चौकसे का संदर्भ देते हुए खबर चलाई। हालाँकि यह खबर दैनिक भास्कर में 5 साल पहले यानी 2015 में छपी थी। 2015 में इकॉनॉमिक्स टाइम्स में भी ये खबर छापी थी, जिसे अभी सर्कुलेट किया जा रहा है। हालाँकि सरकार की तरफ से साफ कर दिया गया है कि यह दावा निराधार है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी पीआईबी के इस ट्वीट को रिट्वीट करके बात साफ कर दिया है।

मोदी घृणा से ओतप्रोत कुछ मीडिया हाउस सरकार को घेरने और नीचा दिखाने के लिए इतने उतावले रहते हैं कि पाँच साल पुरानी इस खबर को लेकर प्रकाश जावड़ेकर को खत लिखा है। इसमें तंज कसा गया है कि न्यूज चैनल कम पड़ गए हैं क्या जो अब मंत्रालय मोदी का गुणगान करने के लिए भिखारियों की भर्ती कर रहा है।

बहरहाल, इनकी उत्सुकता को देखकर तो यही लगता है कि कहीं इनके लिए न्यूज तो नहीं कम पड़ गए तो इन्हें पाँच साल पुरानी खबर को लेकर सरकार को खत लिखना पड़ा।

इस ऑर्टिकल में प्रधानमंत्री के हिंदुत्ववादी छवि को लेकर भी निशाना बनाया गया है और ये दिखाने की कोशिश की गई कि पीएम संप्रदाय विशेष और अल्लाह के खिलाफ हैं। आर्टिकल लिखने वाले ने खुद को ‘प्राउड हिंदू’ बताया है।

इसके अलावा आत्मनिर्भर भारत अभियान का भी माखौल उड़ाया गया है। बता दें कि जब से कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ा है, पीएम मोदी ने आत्मनिर्भर भारत अभियान पर जोर दिया है। इसके साथ ही कई सारी फालतू और अनर्गल दलील दी गई। बता दें कि इस आर्टिकल को ‘विमर्श’ की कैटेगरी में रखा गया है, तो हो सकता है कि यह मीडिया हाउस की संपादकीय नीति के तहत आता है।

खैर, इतना लंबा चौड़ा खत लिखने से पहले अगर मीडिया हाउस ने सच जानने की और खबर को सत्यापित करने की थोड़ी सी भी मशक्कत की होती, तो शायद सच से महरुम नहीं रहती। मगर एक सच्चाई यह भी है कि नैरेटिव को भी पकड़े रहने की मजबूरी है।

5 महीने बाद फिर शुरू हुई वैष्णो देवी यात्रा, रोजाना 2000 श्रद्धालुओं को होगी दर्शन की इजाजत

वैष्णो देवी यात्रा रविवार (16 अगस्त 2020) से शुरू हो गई है। करीब पॉंच महीने से पवित्र गुफा की यात्रा बंद थी। कोरोना संक्रमण के मद्देनजर 18 मार्च को यात्रा बीच में ही रोक दी गई थी।

कोरोना को देखते हुए फिलहाल केवल 2000 श्रद्धालुओं को रोजाना दर्शन की इजाजत होगी। इस दौरान श्रद्धालुओं की जगह-जगह थर्मल स्क्रीनिंग की जाएगी। उन्हें फोन पर आरोग्य सेतु ऐप भी डाउनलोड करनी होगी।

लंबे अंतराल के बाद शुरू की गई यात्रा में कई बदलाव किए गए हैं। पहले की तरह श्रद्धालु पंजीकरण केंद्रों पर रजिस्ट्रेशन नहीं करवा सकेंगे। इस बार केवल ऑनलाइन पंजीयन होगा और उसके बाद ही यात्रा में शामिल होने की अनुमति मिलेगी। फेस मास्क और फेस कवर पहनना अनिवार्य होगा।

यात्रा के शुरुआती बिंदुओं और अहम पड़ावों पर थर्मल स्कैनर भी लगा होगा। 10 साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को यात्रा से बचने की सलाह दी गई है। जम्मू-कश्मीर के रेड जोन इलाकों और राज्य के बाहर के श्रद्धालुओं को कोविड नेगेटिव रिपोर्ट भी दिखानी होगी।    

राज्य के भीतर रेड ज़ोन से आए तीर्थ यात्रियों को कोविड परीक्षण की नकारात्मक रिपोर्ट हेलीपैड, प्रवेश बिंदु, बाण गंगा और कतरा में दिखानी होगी। अपनी नेगेटिव रिपोर्ट साथ रखने वालों को ही आगे बढ़ने की अनुमति दी जाएगी। प्रशासन का यह भी कहना है कि घोड़ा, पिट्ठू और पालकिस को इजाज़त नहीं होगी।    

तीर्थ यात्रियों को असुविधा से बचाने के लिए बैटरी वाले वाहन, हेलिकॉप्टर और यात्री रोपवे चलाया जाएगा। यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि समाजिक दूरी का पूरा पालन हो। किसी भी तरह की भीड़ इकट्ठा न हो इसके लिए कई इंतज़ाम किए गए हैं। सामूहिक समारोहों से बचने के लिए अटका आरती क्षेत्र में तीर्थ यात्रियों की बुकिंग और विशेष पूजा पर अगले आदेश तक रोक लगाई गई है।

कोरोना का हवाला दे बलात्कार आरोपित इब्राहिम ने पाई जमानत, जेल से निकलते ही पीड़िता को मार डाला

अमेरिका के वर्जीनिया से एक ऐसा मामला सामने आया है, जहाँ बलात्कार आरोपित जमानत पर निकला और उसने पीड़िता को ही मार डाला। ब्यूटी क्वीन कार्ला एलिज़ाबेथ डोमिंगेज गोंजालेज से बलात्कार करने के आरोपित इब्राहिम ऐल्काहलील बौआइची ने ही उसकी हत्या कर दी। बाद में वो फरार भी हो गया, जिसके बाद पुलिस को मिडिल-ईस्ट मूल के 6 फ़ीट 2 इंच लम्बे इस आरोपित को ढूँढने में खासी मशक्कत करनी पड़ी।

दिसंबर 2019 में अलेक्जेंडेरिया डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में कार्ला ने बताया था कि इब्राहिम ने उसके साथ बलात्कार किया और अक्टूबर में हुई इस घटना में सहमति नाम की कोई चीज नहीं थी। साथ ही उसने इब्राहिम पर बलात्कार, गला घोंटने और अपहरण के आरोप लगाए थे। आरोपित को पकड़ के जेल में डाल दिया गया था।

इसके बाद पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का कहर फैसले लगा। अमेरिका में इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ी और इब्राहिम के वकील को इस मामले में मौक़ा मिल गया। उसने कोर्ट में दावा किया कि महामारी के इस दौर में आरोपित को जेल में रखना न सिर्फ उसके और उसके साथ रहने वाले कैदियों बल्कि अटॉर्नी लोगों के लिए भी ठीक नहीं है। दलील दी गई कि ट्रायल पूरी होने तक उसे रिहा कर दिया जाए। हालाँकि, पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ने इसका विरोध किया।

उससे 25,000 डॉलर का बॉन्ड भरवा कर रिहा किया गया। भारतीय रुपयों में ये रकम 18,71,367 होती है। साथ ही शर्त रखी गई थी कि वो अपने मैरीलैंड वाले घर से तभी निकलेगा जब उसे अपने वकीलों से मिलना हो या फिर सुनवाई से जुड़े अधिकारियों से। लेकिन, उसके इरादे कुछ और ही थे। जुलाई 29 को वो अलेक्जेंडेरिया लौटा और उसने शहर के पश्चिमी छोर पर स्थित कार्ला के अपार्टमेंट के बाहर ही उसे मार डाला।

इसके बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। जनता की मदद लेनी पड़ी। पुलिस ने उसका एक वीडियो फुटेज जारी कर उसे हथियारबंद और खतरनाक करार दिया। साथ ही कहा कि उसे जहाँ भी देखें, लोग उसके बारे में सूचना दें। बुधवार (अगस्त 5, 2020) को फ़ेडरल मार्शल्स और एलेक्जेंडरिया पुलिस ने इब्राहिम को प्रिंस जॉर्ज काउंटी में आत्मसमर्पण करने को कहा।

लेकिन, ब्यूटी क्वीन रही कार्ला की हत्या कर भागते फिर रहे इब्राहिम ने पुलिस की एक न सुनी और इसी दौरान उसकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। जब पुलिस उसके पास पहुँची तो पाया कि उसने खुद को गोली मार ली थी। अब जब अमेरिका में सिविल लिबर्टी एक्टिविस्ट्स कोरोना आपदा के बीच कैदियों को संक्रमित होने से बचाने के लिए उन्हें रिहा करने की माँग कर रहे हैं, ये घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।

वकीलों ने इब्राहिम के मामले में भी यही दलील दी थी कि जेल में रहते सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना असंभव हो सकता है और इससे संक्रमण का ख़तरा और बढ़ जाएगा। ताज़ा खबर ये है कि अस्पताल में भर्ती कराए जाने के 3 दिनों बाद इब्राहिम की भी मौत हो गई। पुलिस ने बताया कि कार्ला एलिज़ाबेथ के बलात्कार व हत्या मामले में उसे कस्टडी में लेने का प्रयास किया गया, लेकिन उसने खुद को गोली मार ली और उससे ही उसकी मौत हुई।

‘लोकतंत्र की हत्या करने वाले कूड़ेदान में…’ – आपातकाल के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का रामलीला मैदान वाला भाषण

1975 से लेकर 1977 के बीच देश की जनता ने लोकतंत्र का सबसे भयावह दौर देखा। जब देश की मर्ज़ी के खिलाफ़ देश के लोगों पर आपातकाल थोप दिया गया था। भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी और तमाम नेताओं व समाजसेवियों को जेल में ढूँस दिया गया था। फिर जनता ने ‘आपातकाली’ इंदिरा सरकार को हटा कर नई सरकार चुनी।

तब राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों लोगों की जनसभा हुई थी। उसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने आपातकाल लगाने वाली सरकार की खुल कर आलोचना की थी। अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि जनता अनुशासन थोपने वाली सरकार नहीं चाहती है। इसके अलावा उन्होंने अपने भाषण में कई उल्लेखनीय बातें भी कही थीं।  

अटल बिहारी वाजपेयी ने भीड़ को संबोधित करते हुए अपना भाषण शुरू किया था। उन्होंने भाषण में कहा कि अनेक वर्षों से हमने एक सपना पाला था। अपने हृदय में एक अरमान जगाया था। उस सपने को सत्य में बदलने के लिए हम लगातार जूझते रहे, संघर्ष करते रहे। अब जाकर वह सपना साकार होता दिखाई दे रहा है। देश में जो कुछ हुआ, उसे केवल चुनाव नहीं कह सकते हैं। एक शांतिपूर्ण क्रांति हुई है, लोक शक्ति की लहर ने लोकतंत्र की हत्या करने वालों को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया है।    

इसके बाद अटल जी ने कहा जिनके मन में लोकतंत्र के लिए अटूट निष्ठा है, जो सामाजिक समता और आर्थिक बराबरी में विश्वास करते हैं, उन्हें जनता ने सेवा का मौक़ा दिया है। हम दिल्ली की जनता के आभारी हैं, जिसने दिल्ली की सारी सीटें कॉन्ग्रेस के हाथों से छीन कर जनता पार्टी को सौंप दी हैं। देश के और भागों में भी जनता ने असंदिग्ध निर्णय दिया है। याद है आपको, मैं चुनावों की सभा में कहा करता था कि सत्तारुढ़ दल के लोग पूछते हैं हमारा प्रधानमंत्री कौन होगा।    

फिर अटल जी ने कहा कि सत्ताधारी दल के लोग कहते हैं कि उन्होंने अपना प्रधानमंत्री चुन लिया है। वह कोई और नहीं बल्कि इंदिरा गाँधी होंगी। मैं पूछा करता था अगर श्रीमती इंदिरा गाँधी रायबरेली से हार गईं तो क्या होगा? अंततः वह हार गईं और हमने अपना प्रधानमंत्री निर्वाचित कर लिया।

लेकिन जैसा हमने पहले स्पष्ट किया था कि हमारी लड़ाई कुर्सी की लड़ाई नहीं है। हमारे लिए यह शुरू से ही सिद्धांतों की लड़ाई रही है और हमने इसे वैसे ही लड़ा है। हमें प्रसन्नता है कि जनता ने इस संघर्ष की गंभीरता को पहचाना और दो टूक फैसला दिया। जनता ने हमें बड़ी ज़िम्मेदारी दी है, हम प्रार्थना करते हैं कि वह हमें शक्ति दें और हम अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकें।    

इसके बाद अटल जी ने कहा जनता ने सिर्फ हमें ही ज़िम्मेदारी नहीं दी है। बल्कि अपने ऊपर भी ज़िम्मेदारी ले ली है। वोट देकर काम ख़त्म नहीं होता है बल्कि एक नया काम शुरू होता है। जिन्होंने अनुशासन के नाम पर ज़्यादती की थी उनका तो सफ़ाया हो गया। पर अनुशासन की ज़रूरत अभी भी बनी हुई है।

अंतर केवल इतना है कि हमारा अनुशासन ऊपर से थोपा नहीं जाएगा, आत्मानुशासन होगा। जनता ने जो जागरूकता चुनाव में दिखाई है, वही उसे दिन प्रतिदिन के जीवन में दिखानी होगी। समाज का कोई वर्ग इस आँधी से अछूता नहीं रहा है। देश के हर वर्ग, समुदाय और समूह के लोगों ने हमारा साथ दिया है।        

लिबरल गिरोह डिलीट कर रहे अपना फेसबुक एकाउंट: वजह बेंगलुरु दंगा, पैगंबर मोहम्मद या हेट स्पीच?

बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की उग्र भीड़ ने 11 अगस्त 2020 को दलित कॉन्ग्रेस विधायक के घर तोड़-फोड़ की और सामान लूटे। पुलिस थाने और पुलिसकर्मी भी हिंसा और दंगों का शिकार हुए। दंगाइयों ने 250 गाड़ियाँ फूँक दीं और लगभग 60 पुलिसकर्मी घायल हुए। इन सबके पीछे की वजह पैगंबर मोहम्मद के संबंध में कथित फेसबुक टिप्पणी रही। अब फेसबुक पर ही इस घटना की प्रतिक्रिया भी नज़र आ रही है। लिबरल्स का एक बड़ा समूह फेसबुक को अलविदा कह रहा है।    

बेंगलुरु में हुए दंगों के बाद कई लिबरल्स ने ऐलान किया है कि वह अपना फेसबुक एकाउंट बंद कर देंगे। इस कड़ी में एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार निधि राजदान ने अपना फेसबुक एकाउंट बंद करने का ऐलान किया। निधि ऐसा करने वाले शुरुआती लोगों में एक हैं।    

वहीं स्वाति चतुर्वेदी ने ट्वीट करते हुए इस बात की जानकारी दी कि उन्होंने सालों पहले फेसबुक एकाउंट बंद कर दिया था।    

आम तौर पर ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि लिबरल्स ने यह कदम बेंगलुरु में हुई हिंसा के बाद उठाया है। लेकिन अफ़सोस ऐसा नहीं है! लिबरल्स ने अपना फेसबुक एकाउंट इस वजह से नहीं बंद किया। बल्कि लिबरल्स ने अपना एकाउंट इसलिए बंद किया क्योंकि वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में कुछ दावा किया था। दावे के मुताबिक़ फेसबुक के एक (बेनाम) शीर्ष अधिकारी ने ऐसा कहा कि एंटी मुस्लिम (मुस्लिम विरोधी) पोस्ट को ‘हेट स्पीच’ के दायरे में नहीं रखा जाएगा।    

लिबरल्स इस बात से निराश हैं कि फेसबुक की शीर्ष अधिकारी अंखी दास कथित तौर पर भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करती हैं। इसलिए लिबरल्स का मानना है कि फेसबुक संप्रदाय विशेष विरोधी पोस्ट को हेट स्पीच के दायरे में नहीं रखता है।

कुल मिला कर लिबरल्स ने बेनामी ‘पूर्व या वर्तमान’ फेसबुक कर्मचारी के आधार पर ऐसा अनुमान लगा लिया। साथ ही घोषित भी कर दिया कि अंखी दास मोदी समर्थक हो सकती हैं। वहीं दूसरी तरफ संप्रदाय विशेष की भीड़ ने जिस तरह शहर में दंगा भड़काया और आम लोगों को नुकसान पहुँचाया, वह कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे को कोसने का एक सटीक ज़रिया बन गया। वह जिसके कथित फेसबुक पोस्ट या कॉमेंट के कारण बेंगलुरु को दंगा देखना पड़ा।  

इसके बाद भाजपा विधायक टी राजा सिंह को भी निशाने पर लिया गया, जिन्होंने रोहिंग्या और संप्रदाय विशेष पर पोस्ट किया था। वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में इसका ज़िक्र है। रिपोर्ट में फेसबुक के एक कर्मचारी ने टी राजा को खतरनाक व्यक्ति बताया।

यह भी कहा गया कि अंखी दास ने टी राजा के संप्रदाय विशेष विरोधी पोस्ट हेट स्पीच के दायरे में रखने का विरोध किया। क्योंकि ऐसा करने से भारत में फेसबुक का व्यावसायिक प्रभाव कम होगा। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि ऐसा सिर्फ टी राजा ही नहीं बल्कि 3 और हिंदूवादी नेताओं के मामले में किया गया है। उनके भड़काऊ भाषणों को हेट स्पीच के दायरे में नहीं रखा गया है।    

वॉल स्ट्रीट की रिपोर्ट में इसके अलावा भी कई और दावे किए गए हैं। फेसबुक की कम्युनिकेशन एग्जीक्यूटिव एंडी स्टोन ने बताया कि अंखी दास ने सिर्फ अपने डर के आधार पर टी राजा का एकाउंट बंद नहीं किया। इसके अलावा फेसबुक ने ऐसे कई कदम उठाए हैं, जो कथित तौर पर भाजपा के हित में हैं।

फेसबुक ने 2019 के आम चुनावों के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी के तमाम पेज भी निष्क्रिय कर दिए थे। इसके अलावा फेसबुक पर यह आरोप भी लगाया गया कि समूह ने भाजपा विरोधी ख़बरों को प्रतिबंधित कर दिया था।    

हैरानी की बात यह कि जब संप्रदाय विशेष के एक व्यक्ति ने सितंबर में एक दलित लड़की के साथ बलात्कार किया था, तब फेसबुक ने उल्टा उस संप्रदाय विशेष के व्यक्ति का बचाव किया था तब इनमें से किसी लिबरल ने अपना फेसबुक एकाउंट नहीं डिलीट किया था। बल्कि फेसबुक ने इस घटना से जुड़े लेख और ख़बरें ही हटा दी थीं।

फेसबुक ने ऐसे व्यक्ति को अब्यूजिव ट्रोल एज़ पॉलिसी हेड नियुक्त किया था, जो पहले प्रशांत किशोर के लिए काम करता था। इतना ही नहीं बेंगलुरु दंगों के मामले में भी लिबरल मीडिया ने भुक्तभोगी को ही आरोपित बना कर दिखाया। लिबरल मीडिया उन्हें ही भीड़ के सामने रख देना चाहता था, जिन्होंने इस घटना की सबसे महँगी कीमत चुकाई। यहाँ तक कि फेसबुक पर भी तमाम लोगों ने उनके (कॉन्ग्रेस विधायक और उसके भतीजे) को धमकियाँ दी। लेकिन फेसबुक ने इसे हेट स्पीच के दायरे में नहीं रखा।    

संप्रदाय विशेष के तमाम लोगों ने कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे को फेसबुक पर जान से मारने की धमकी तक दी। इस बात पर लिबरल्स ने गुस्सा नहीं जताया लेकिन एक ‘बेनाम फेसबुक कर्मचारी’ ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को कई बातें बताई, जिसके आधार पर उन्होंने फेसबुक पर भाजपा का समर्थन करने का आरोप लगा दिया। इससे लिबरल्स में गुस्सा और आक्रोश भर गया। जबकि फेसबुक पर खुद न जाने कितनी ऐसी ख़बरें और लेख मौजूद हैं, जो सीधे शब्दों में भाजपा की आलोचना करते हैं।    

इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने पर भी ऐसी ही बातें सामने आई थीं। जैसे ही दोनों चुनाव जीत कर आए थे उन पर तैयार की गई रिपोर्ट ऐसी नज़र आ रही थी जैसे लोगों के घावों पर नमक छिड़क दिया गया हो। अब उन्हें एक नियंत्रण के लिए कुछ कारणों की ज़रूरत पड़ सकती है।

इससे पहले आकार पटेल ने भी ब्राह्मणों पर होने वाली हिंसा को सामान्य बताया था। उनके हिसाब से यह बुद्धिजीवी है। लेकिन जैसे ही ब्राह्मण शब्द की जगह संप्रदाय विशेष शब्द का इस्तेमाल होता है वैसे ही यह हेट स्पीच बन जाती है। यहाँ किसी भी तरह के सिद्धांत काम नहीं करते हैं।  

हसन और यमन ने कुत्ते का कान काट कर उसके सामने रख दिया’ – सोशल मीडिया पर वायरल हो गई तस्वीर का फैक्ट चेक

सोशल मीडिया पर एक भयावह तस्वीर वायरल हो रही है, जिसमें एक निरीह जानवर के साथ बर्बरता होती हुई देखी जा सकती है। तस्वीरों के साथ दिए गए सन्देश में कहा जा रहा है कि ये तस्वीरें तुर्की की हैं, जहाँ संप्रदाय विशेष के दो लड़कों ने बेरहमी दिखाते हुए एक कुत्ते के कान काट लिए। साथ ही बताया गया है कि बेख़ौफ़ आरोपितों ने अपनी इस घृणास्पद करतूत पर गर्व करते हुए इसे फेसबुक पर भी शेयर किया।

दावा किया जा रहा है कि फेसबुक पर दोनों आरोपित ने लिखा कि घरेलू कुत्ते काफी गंदे होते हैं और इस्लाम मानने वालों को उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए। इस खबर को सोशल मीडिया पर पिछले कुछ महीनों में अलग-अलग अंतराल पर कई बार शेयर किया गया। दोनों आरोपित इसमें युवा ही दिख रहे हैं और वो धारदार हथियारों से कुत्ते के दोनों कान काट कर उसे अपने हाथ में लेकर हँसते हुए दिखा रहे हैं।

हमने जब इस खबर की पड़ताल की तो पाया कि ये तुर्की की खबर है। तुर्किश मीडिया के अनुसार, इन दोनों ने मिल कर कुत्ते के दोनों कान काट लिए, जिसके बाद उन पर प्रशासन द्वारा 950 यूरो का फाइन लगाया गया। यानी, उन्हें बस 93,000 रुपए का आर्थिक दंड देकर छोड़ दिया गया। लेकिन, पेंच ये है कि ये खबर फ़रवरी 2017 की है, यानी 3 साल पुरानी। इसी खबर को आज भी शेयर किया जा रहा है।

दरअसल, तुर्की के उक्त दोनों युवक डॉग फाइटिंग में मशगूल थे और वो कुत्तों की लड़ाई करा कर अपना मनोरंजन किया करते थे और रुपए भी कमाते थे। जिस कुत्ते का उन्होंने दोनों कान काट लिए, उसे भी उन्होंने अपनी तरफ से फाइटिंग में लगाया था। लेकिन, वो कुत्ता हार गया और उन दरिंदों ने उसके कान काट कर उसे इसकी ‘सज़ा’ दी। ये घटना दक्षिणी-पश्चिमी तुर्की के इस्पार्टा सिटी की है।

इसके बाद उनकी तस्वीरें वायरल हो गई थीं, जिसमें खून से लथपथ कुत्ते को देखा जा सकता है। दोनों आरोपितों के नाम हसन कुजू और नेसेट यमन है, जिन्हें सजा के नाम पर सिर्फ आर्थिक जुर्माना भर देना पड़ा। एक फोटोग्राफ तो इतना भयावह है कि उसमें कुत्ते के काटे हुए कान को जमीन पर रख कर उसे उसकी ओर देखने के लिए विवश किया जा रहा है। इसके बाद दुनिया भर के पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया था।

स्थानीय मीडिया का कहना था कि उनके इस कृत्य में एक तीसरा आदमी भी शामिल था, जिसने ये तस्वीरें क्लिक की और साथ ही उनका वीडियो भी बनाया। बाद में विरोध होने पर पर उन्होंने सोशल मीडिया से इन तस्वीरों को हटा दिया। पशु क्रूरता के मामले में तुर्की में नियम-कानून काफी मामूली हैं, जिन्हें सख्त बनाने की माँग समय-समय पर होती रही है। इस तरह से ये खबर तो सच्ची है लेकिन 3 साल पुरानी है।

रिलीज हो गई है लेकिन स्ट्रीमिंग पर रोक लगाई जाए और माफ़ी भी माँगें: ‘गुंजन सक्सेना’ को लेकर NCW सख्त

जाह्नवी कपूर अभिनीत फिल्म ‘गुंजन सक्सेना’ नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है लेकिन इसे नित नए विवादों का सामना करना पड़ रहा है। अब राष्ट्रीय महिला आयोग ने फिल्म पर आपत्ति जताई है। इससे पहले भारतीय वायुसेना ने फिल्म पर अपनी खराब छवि दिखाने का आरोप लगाते हुए इसे प्रतिबंधित करने की माँग की थी। राष्ट्रीय महिला आयोग ने अब निर्माताओं से कहा है कि ‘गुंजन सक्सेना’ की स्ट्रीमिंग पर रोक लगाई जाए।

साथ ही राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा है कि ‘गुंजन सक्सेना’ ने भारतीय वायुसेना की जिस तरह से नकारात्मक छवि दिखाई है, उसके लिए इसके निर्माताओं को माफ़ी माँगनी चाहिए। आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने लिखा कि असली गुंजन सक्सेना को सामने आकर इसका खुलासा करना चाहिए कि लिंग के आधार पर वायुसेना में उनके साथ भेदभाव हुआ या नहीं। क्या फिल्म में जो दिखाया जा रहा है वो सही है?

रेखा शर्मा ने कहा कि वो कभी सोच भी नहीं सकती कि भारत के रक्षा अधिकारी गुंडों की तरह व्यवहार करें। रेखा शर्मा ने कहा कि चाहे वो महिला अधिकारी हों या कोई और महिला, उन्हें सुरक्षा बलों में उचित सम्मान मिलता है। बता दें कि रेखा शर्मा खुद एक सैन्य परिवार से सम्बन्ध रखती हैं और उन्होंने इस मुद्दे को भावनात्मक रूप से लिया है। अभी तक निर्माता करण जौहर ने माफ़ी नहीं माँगी है।

बाद में रेखा शर्मा ने गुंजन सक्सेना के ताजा बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि अगर सच्चाई फिल्म में जो दिखाया गया, उसके उलट है तो निर्माताओ को जरूर माफी माँगनी चाहिए। उन्होंने फिल्म की स्क्रीनिंग भी रोकने को कहा। रेखा शर्मा ने पूछा कि अपने ही सुरक्षा बलों की गलत छवि दिखाने वाली फिल्म पर रोक क्यों नहीं लगनी चाहिए, वो भी तब, जब ये सब गलत हो। वायुसेना पहले ही इस पर आपत्ति जता चुका है।

इंडियन एयर फोर्स ने सेंसर बोर्ड को लिखे अपने पत्र में बातें साफ-साफ समझाई थी। IAF के अनुसार, “नेटफ्लिक्स और धर्मा प्रोडक्शंस ने भारतीय वायु सेना का प्रतिनिधित्व प्रामाणिकता के साथ करने की सहमति व्यक्त की थी ताकि यह फिल्म अगली पीढ़ी को वायु सेना में जॉइन करने के लिए प्रेरित करने में मदद करती।” IAF के अनुसार जब फिल्म का ट्रेलर हाल ही में जारी किया गया, तो यह देखा गया कि इसमें भारतीय वायुसेना को अनुचित ढंग से नकारात्मक तरह से दिखाया गया है।

वहीं गुंजन सक्सेना ने फिल्म में दिखाई गई बातों से इतर भेदभाव की बातों को नकार दिया था। उन्होंने बताया कि भारतीय सशस्त्र बल की सभी शाखाओं की सभी महिला अधिकारी जिन्होंने संगठन में रहकर देश की सेवा की है या कर रही हैं, वह सभी वायुसेना के मजबूत मूल्यों और समृद्ध सांस्कृतिक लोकाचार से प्रेरित हैं। उन्होंने बताया कि  मेरे लिए दरवाजों खोले गए और कई अवसर दिए गए।

सिर्फ घर नहीं जलाया, 3 करोड़ रुपए के सोने-चाँदी भी लूटे: बेंगलुरु कॉन्ग्रेस MLA ने उस रात की बताई हर बात

बेंगलुरु में हुई दंगों की घटनाओं मे हर दिन नए तथ्य सामने आ रहे हैं। अभी तक सामने आई जानकारी के मुताबिक़ 11 अगस्त 2020 के दिन हुए दंगों में पुलिस की गाड़ियाँ जलाई गई थीं। कॉन्ग्रेस विधायक के घर तोड़-फोड़ हुई और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। लेकिन बेंगलुरु पुलिस ने कुछ और बड़े खुलासे किए हैं। बेंगलुरु पुलिस के मुताबिक़ उस दिन भीड़ ने लगभग 3 करोड़ के सामान भी लूटे।    

बेंगलुरु पुलिस की जाँच में एक और हैरान कर देने वाली बात सामने आ रही है। दंगों के संबंध में 12 अगस्त को सैयद नदीम नाम के युवक को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था। इसके बाद पुलिस ने उसे आगे की पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था। कुछ समय बाद नदीम ने सीने और पेट में दर्द की बात कही। जिसके बाद उसे बोरिंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था।    

इस दौरान नदीम पर लगातार निगरानी रखी जा रही थी। शनिवार के दिन नदीम की मृत्यु हो गई। कुछ ही समय बाद उसकी कोरोना जाँच की रिपोर्ट भी सामने आई। जिसमें यह पता चला कि वह कोरोना पॉजिटिव था। क्षेत्र के अतिरिक्त मंडलायुक्त हेमंत निम्बलकर ने भी इस घटना के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सैयद नदीम को कई तरह की परेशानियाँ थी, जब उसकी हालत पर संदेह हुआ, तब उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहाँ कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।    

घटना के संबंध में कॉन्ग्रेस विधायक ने भी प्राथमिकी दर्ज कराई, जिसमें दंगों से जुड़ी कई अहम बातें आई हैं। बेंगलुरु पुलिस के मुताबिक़ कॉन्ग्रेस विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर में लगभग 3 हज़ार लोगों ने तोड़-फोड़ मचाई और गाड़ियों को आग के हवाले किया। इतना ही नहीं घर में मौजूद सोना, चाँदी और नकदी मिला कर लगभग 3 करोड़ का सामान भी लूटा गया। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच कर रही है और अभी तक कुल 206 लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है।        

इसके पहले कॉन्ग्रेस विधायक इस घटना पर अपना पक्ष रख चुके हैं। कॉन्ग्रेस विधायक आर अखंड श्रीनिवास मूर्ति ने पत्रकारों से बात करते हुए दुखी मन से कहा था, “मैं इस्लाम मानने वालों को अपना भाई मानता था। कम से कम 25 साल से हम मिल-जुलकर रह रहे थे। फिर भी आज मैंने अपना 50 साल पुराना घर खो दिया।”

दिल दहला देने वाली घटना को याद करते हुए कॉन्ग्रेस विधायक ने कहा कि उनके घर पर संप्रदाय विशेष के 2000-3000 लोगों की भीड़ पहुँची, पथराव किया, पेट्रोल डाला, टायर जलाए और घर में आग लगा दी। उन्होंने बताया कि उग्र दंगाइयों ने तलवार, कुल्हाड़ी, लाठी से हमला किया और उनके आवास पर पेट्रोल बम भी फेंके। इसके अलावा कॉन्ग्रेस MLA ने कहा, “सवाल यह उठता है कि अगर कानून बनाने वाले को यह भुगतना पड़े तो मैं आम नागरिकों की सुरक्षा कैसे कर सकता हूँ?”

उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से अपने परिवार को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने की अपील की है। साथ ही मामले की जाँच सीबीआई या सीआईडी ​​को सौंपने की अपील की है। उन्होंने कहा, “एक विधायक होने और कर्नाटक में सबसे बड़े मार्जिन से जीतने के बावजूद आज मेरी यह हालत है। अन्य विधायकों की क्या स्थिति हो सकती है?”

बेंगलुरु के जीडे हल्ली इलाके में मंगलवार रात करीब 9.30 बजे उपद्रवियों ने कॉन्ग्रेस विधायक श्रीनिवास मूर्ति के घर को निशाना बनाया था। इस दौरान विधायक के घर का एक हिस्सा आग के हवाले कर दिया गया था। दरअसल, विधायक श्रीनिवास के भतीजे ने कथित तौर पर सोशल मीडिया पर पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ़ आपत्तिजनक पोस्ट किया था, जिसके बाद संप्रदाय विशेष के लोगों ने जमकर बवाल मचाया था। करीब 250 गाड़ियाँ फ़ूँक दी गई। वहीं हिंसा के दौरान हमले में एडिशनल पुलिस कमिश्नर समेत 60 पुलिसकर्मियों को चोटें आईं थीं।

‘राम’ है दुनिया की सबसे महँगी करेंसी, छपी है भगवान की फोटो भी: एक राम की कीमत 886.5 रुपए – फैक्ट चेक

सोशल मीडिया पर एक दावा शेयर हो रहा है कि दुनिया की सबसे मजबूत और महँगी करेंसी का नाम राम है। साथ ही बताया जा रहा है कि आज की तारीख में 1 राम की कीमत 10 यूरो के बराबर है। बता दें कि 1 यूरो फिलहाल 88.65 भारतीय रुपयों के बराबर होता है। इस तरह से दावे के मुताबिक़ एक राम की कीमत 886.5 रुपए हुए। कहा जा कि ये मुद्रा आज भी चलती है और इसे हॉलैंड की डच सरकार ने मान्यता दी हुई है।

सोशल मीडिया पर इस दावे को शेयर करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत पटेल उमराव ने लिखा कि महर्षि महेश योगी ने हॉलैंड में आज से लगभग बीस साल पहले “राम” नाम से करेंसी चलाई थी। साथ ही उन्होंने 1, 5 और 10 ‘राम’ का नोट भी शेयर किया, जिस पर भगवान राम की तस्वीर बनी हुई है और साथ हुई ‘विश्व शांति राष्ट्र’ अंकित किया हुआ है। इस पर ‘नीदरलैंड’ भी लिखा हुआ है।

कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इस दावे को आगे बढ़ाया और लिखा कि एक हमारे यहाँ के नेता हैं, जो राम नाम को ही सांप्रदायिक मानते हैं और राम मंदिर पर मोदी सरकार का समर्थन करने से दूर भागते हैं क्योंकि ये सब उनकी तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ है। लोगों ने लिखा कि जिस देश में राम का जन्म हुआ, उससे ज्यादा बाहर के लोग उन्हें मान-सम्मान दे रहे हैं और उनके नाम पर करेंसी भी है।

ऑपइंडिया ने जब सोशल मीडिया के इन दावों की पड़ताल की तो पाया कि राम नाम की करेंसी हॉलैंड में है और इसे वहाँ मान्यता भी मिली हुई है। इस दौरान हमें फ़रवरी 2003 की एक बीबीसी की खबर मिली, जिसमें बताया गया था कि डच सेन्ट्रल बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि महर्षि महेश योगी द्वारा जारी की गई ‘करेंसी’ राम उसके नियमों का उलंघन नहीं करती। साथ ही बताया गया था कि उस वक़्त हॉलैंड में 100 से अधिक दुकानें इसका लेनदेन करती हैं।

इसे अक्टूबर 2001 में ‘द ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस’ द्वारा लॉन्च किया गया था। कई शहरों और गाँवों में, यहाँ तक कि बड़े मॉल्स में भी इस करेंसी को स्वीकार किया जाता है। डच सेन्ट्रल बैंक ने कहा था कि ये सब कुछ नियमानुसार हो रहा है। महर्षि मूवमेंट के ‘वित्त मंत्री’ रहे बेंजमिल फेल्डमैन ने कहा था कि गरीबी से लड़ने में राम मददगार साबित हो सकता है और कृषि में इसके उपयोग को बढ़ावा मिलना चाहिए।

राम को ‘वर्ल्ड पीस बॉन्ड’ के नाम से भी जाना जाता है। महर्षि मूवमेंट का कहना है कि इससे विश्व शांति को मजबूती मिलेगी, अर्थव्यवस्था में संतुलन बनेगा और साथ ही गरीबी से लड़ाई में ये कारगर सिद्ध होगा। यूरोप में इसकी कीमत 10 यूरो के बराबर होती है, वहीं अमेरिका में ये 10 डॉलर के बराबर हो जाता है। राम के नोट सिर्फ 3 डेनोमिनाशन में आते हैं। इसका सर्कुलेशन काफी तेजी से बढ़ा था।

फ़िलहाल इसे आर्थिक विशेषज्ञ ‘बेयरर बॉन्ड’ या लोकल करेंसी कहते हैं। नीदरलैंड के 30 शहरों में इसका उपयोग किया जाता है। लोवा में स्थित महर्षि सिटी को इसकी राजधानी कहा जाता है। इसके द्वारा अमेरिका के विभिन्न शहरों में ‘पीस पैलेस’ बनाए जा रहे हैं। इस तरह से ये दवा सही है कि राम करेंसी को हॉलैंड में डच सरकार की मान्यता मिली हुई है और इसकी कीमत 10 यूरो है। लेकिन, बात ‘ लीगल टेंडर’ की हो तो इसे दुनिया की सबसे महँगी करेंसी नहीं कह सकते।

‘वहॉं नुकीले पत्थर निकले हैं… तो जमीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा’

आज एनआरसी, सीएए और एनपीआर पर जिस तरह भ्रम पैदा करने की कोशिश हो रही है। समुदाय विशेष को उकसाया जा रहा। विरोध के नाम पर हिंसा हो रही। हिंदुत्व की कब्र खुदेगी जैसे नारे लग रहे हैं। ऐसे वक्त में अटल ​बिहारी वाजपेयी होते तो कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों की साजिश को लेकर क्या कहते?

इसकी झलक राम मंदिर को लेकर संसद में दिए वाजपेयी के एक भाषण में मिलती है। अयोध्या में राम मंदिर को लेकर भी कभी आज के तरह ही साजिश रची गई थी। बीते साल 16 अगस्त को आखिरी सॉंस लेने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी ही साजिशों का जवाब देते हुआ सालों पहले बहुसंख्यक हिंदुओं की ओर से एक सपना देखा था। वह सपना था नैतिक विश्वास के बल पर अयोध्या में राम का मंदिर बनाने का। इसी साल सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस स्वप्न के पूरा होने का रास्ता साफ हुआ है।

हालॉंकि राम मंदिर आंदोलन को लेकर वाजपेयी का जिक्र अक्सर 5 दिसंबर 1992 को लखनऊ की रैली में दिए गए उनके भाषण को लेकर किया जाता है। अयोध्या में कारसेवा से ठीक एक दिन पहले हुई उस रैली में कहा था “वहॉं नुकीले पत्थर निकले हैं। उन पर तो कोई नहीं बैठ सकता तो जमीन को समतल करना पड़ेगा, बैठने लायक करना पड़ेगा।” इन पंक्तियों का हवाला देकर कुछ लोग वाजपेयी पर कारसेवकों को उकसाने का आरोप भी लगाते रहते हैं।


5 दिसंबर 1992 का वाजपेयी का संबोधन

ऐसा करने वाले वहीं हैं, जो हमेशा से भाजपा पर राम के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं। जो 6 दिसंबर 1992 को साजिश का हिस्सा बताते हैं। करीब 500 साल से कॉन्ग्रेसियों, वामपंथियों, लिबरलों, समाजवादियों और धर्मनिरपेक्षता के कथित ठेकेदारों का यही गिरोह अयोध्या में इस्लामी अक्रांताओं के गुनाह को महिमामंडित कर रहा था। जब से सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अयोध्या की विवादित जमीन ही रामजन्मभूमि स्थान है, यह गिरोह फिर से जान-बूझकर 6 दिसंबर को उभारने की कोशिश में लगा है।

अयोध्या में राम मंदिर को लेकर वाजपेयी की सोच क्या थी? बहुसंख्यक हिंदू समुदाय क्या सोचता था? इसकी झलक लोकसभा में 17 दिसंबर 1992 को वाजपेयी के संबोधन से मिलती है। अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान उन्होंने कहा था, “राम का मंदिर छल और छद्म से नहीं बनेगा। राम का मंदिर अगर बनेगा तो एक नैतिक विश्वास के बल पर बनेगा। अगर ढॉंचा तोड़ने का इरादा होता, तो ढॉंचा तोड़ने के लिए वहॉं इतने कारसेवक इकट्ठे करने की जरूरत नहीं थी। अयोध्या में तीन महीने में मेले होते हैं। अगर छुपकर काम करना था, अगर चोरी से काम करना था, अगर योजना बनाकर तोड़ना था तो इसके लिए कारसेवा की जरूरत नहीं थी।”

17 दिसंबर 1992 का वाजपेयी का पूरा भाषण पढ़ने के लिए क्लिक करें


वाजपेयी के संबोधन का अंश

उन्होंने यह भी कहा था, “हम यह भी कहते थे कि हम मस्जिद को तोड़ना नहीं चाहते। हम सम्मान के साथ उसे दूसरे स्थान पर ले जाना चाहते हैं, राम जन्मस्थान से अलग। थोड़ा दूर जाकर वहॉं मस्जिद बने। हम उसमें कारसेवा करने के लिए तैयार हैं। हम उसमें योगदान देने के लिए तैयार हैं, लेकिन यह नहीं हो सका।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसला भी इस भावना के अनुकूल है। सारे सबूत रामलला के पक्ष में थे। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकार उस जमीन पर अपने दावे के पक्ष में कोई सबूत पेश नहीं कर सके। बावजूद इसके शीर्ष अदालत ने उन्हें मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन सरकार को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

राम मंदिर आंदोलन तो भाजपा के एजेंडे में जून 1989 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में ​हुए पार्टी अधिवेशन में शामिल हुआ था। आंदोलन को लहर में बदलने वाली लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की प्रसिद्ध रथ यात्रा तो सितंबर 1990 में शुरू हुई। लेकिन, उससे भी करीब दो साल पहले मुंबई की एक जनसभा में वाजपेयी ने कहा था, “एक अच्छी भावना के साथ रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की पूरी जमीन हिंदुओं को दे देनी चाहिए और इस भावना के बदले में हिंदुओं को मौजूदा ढॉंचे के साथ बिना कोई छेड़छाड़ किए मंदिर बनाना चाहिए।” 1989 में वामपंथी नेता हिरेन मुखर्जी को लिखे पत्र में भी वाजपेयी ने इसका उल्लेख किया है। यह पत्र वाजपेयी ने अपने नाम 5 जून 1989 को लिखे गए हिरेन के खुले खत का उत्तर देते हुए लिखा था।

17 दिसंबर 1992 के भाषण में ही वाजपेयी ने कहा था, “अयोध्या ट्रेजेडी है। आप हम पर जितना दोषारोपण करेंगे हम उतना ही सुर्खरू होंगे।” राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बहुसंख्यक हिंदुओं की भावना और सुर्खरू हुई है। NRC के मामले में भी छल और छद्म परास्त होंगे, हम और सुर्खरू होंगे!

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