Home Blog Page 4577

जब ट्रेन की सीट के नीचे छिप गए थे सिद्धू और सभी सिख खिलाड़ी… चेतन चौहान ने दंगाई भीड़ से बचाई थी जान

उत्तर प्रदेश के मंत्री और पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान का कोरोना वायरस के कारण रविवार (अगस्त 16, 2020) को निधन हो गया। वो अमरोहा से 2 बार सांसद रहे थे और 2017 में विधायक बनने के बाद उन्हें योगी सरकार में मंत्री बनाया गया था। वो NIFT के अध्यक्ष भी रहे थे। आज हम उन्हें लेकर ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं, जब उन्होंने सिख दंगों के दौरान नवजोत सिंह सिद्धू समेत सिख खिलाड़ियों को दंगाइयों से बचाया था।

चेतन चौहान टूटे हुए जबड़ों के साथ रणजी ट्रॉफी में शतक लगाने के लिए जाने जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में तो उन्होंने डेनिस लिली और जेफ़ थॉमसन को उनके घर में ही टूटे अंगूठे के साथ खेला था। ये जाँबाज खिलाड़ी न सिर्फ क्रिकेट पिच पर बल्कि बाहर भी बहादुर था। 73 साल की उम्र में कोरोना के कारण हुई बीमारियों से उनका निधन हो गया। वो 4 दशक से भी अधिक समय से राजनीति में सक्रिय थे।

अक्टूबर 31, 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या हुई और उसके बाद पूरे देश में कॉन्ग्रेस नेताओं ने सिख दंगों को भड़काया, जिसमें कई बड़े नेताओं पर भी आरोप लगे। जहाँ जगदीश टाइटलर और सज्जन सिंह जैसों ने इसके लिए जेल की हवा खाई, वहीं कमलनाथ जैसे लोगों पर अभी भी आरोप लगते हैं कि वो जेल में क्यों नहीं हैं। ये कहानी उसी सिख दंगों के दौरान की है, जब नवजोत सिंह सिद्धू, राजिंदर सिंह और योगराज सिंह जैसे क्रिकेटर ट्रेन से जा रहे थे।

ये तीनों ही सिख हैं। जहाँ योगराज सिंह लोकप्रिय ऑलराउंडर युवराज सिंह के पिता हैं, वहीं नवजोत सिंह सिद्धू वही हैं, जिन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पाँव छुए थे और पंजाब में पार्टी की सरकार बनने पर मंत्री बने।

कहानी तब की है, मतलब 1984 की। उस समय दिलीप ट्रॉफी का सेमीफइनल पुणे में हुआ था। इसके बाद सेंट्रल और नॉर्थ जोन के खिलाड़ी झेलम एक्सप्रेस से लौट रहे थे। मैच 30 अक्टूबर को ख़त्म हुआ और अगले दिन जब वो लोग ट्रेन के लिए तैयार हो रहे थे तो उन्हें सुबह इंदिरा गाँधी की हत्या समाचार प्राप्त हुआ।

हरियाणा के पूर्व ऑफ स्पिनर सरकार तलवार ने इस घटना के सम्बन्ध में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के प्रत्यूष राज से बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि टीम मैनेजर प्रेम भाटिया ने उन सबके लिए झेलम एक्सप्रेस के फर्स्ट क्लास की टिकट कराई थी। उन्होंने कहा कि वो डरावनी यात्रा थी, जिसमें उन्हें दिल्ली पहुँचने में 4 दिन लग गए थे। एक स्टेशन पर जैसे ही ट्रेन रुकी, 40-50 लोग सिखों को ढूँढ़ते हुए ट्रेन में घुस गए।

नवजोत सिंह सिद्धू, राजिंदर घई और योगराज सिंह- उस समय ये तीन सिख क्रिकेटर उन लोगों के साथ ही थे। सरकार तलवार ने TOI को बताया कि चेतन चौहान ने आगे बढ़ कर दंगाई भीड़ के साथ बहस की और उन्हें समझाया। जब उन्हें पता चला कि ये भारतीय क्रिकेटरों की टीम है तो दंगाई वहाँ से चले गए। इस दौरान यशपाल राणा भी उनके साथ थे, जो आगे आए। सभी खिलाड़ी काफी डरे हुए थे।

नवजोत सिंह सिद्धू और राजिंदर घई तो ट्रेन कम्पार्टमेंट की सबसे निचली सीट के नीचे बैग के पीछे छिपे हुए थे। योगराज सिंह ने सिद्धू से कहा कि वो अपने बाल कटवा लें, जिससे दंगाई भीड़ उन्हें सिख न समझे। योगराज सिंह बताते हैं कि सिद्धू ने तब ये कह कर बाल कटवाने से इनकार कर दिया था कि वो एक सरदार पैदा हुए हैं और सरदार ही मरेंगे। योगराज ने उस घटना की तुलना ‘बर्निंग ट्रेन’ से करते हुए बताया कि चेतन चौहान और यशपाल ने दंगाइयों से बहस की थी।

एक दंगाई ने चेतन चौहान पर चिल्लाते हुए कहा कि वो लोग यहाँ सिर्फ सरदारों को खोजने के लिए आए हैं और उन्हें कुछ भी नहीं किया जाएगा। इस पर चेतन चौहान ने पलट कर जवाब देते हुए कहा था कि ये सभी उनके भाई हैं और कोई भी दंगाई उन्हें छू भी नहीं सकता। योगराज सिंह ने कहा कि चेतन चौहान जिस तरह से दंगाइयों से निपटे थे, वो काबिले तारीफ था। दूसरे कम्पार्टमेंट में रहे गुरशरण सिंह को भी ये घटना याद है।

उनका तो यहाँ तक कहना है कि अगर उस दिन चेतन चौहान नहीं होते तो उनमें से एक भी सरदार शायद ज़िंदा नहीं बचता। उन्होंने बताया कि वो और उत्तर प्रदेश के लेग स्पिनर राजिंदर हंस दूसरी बोगी में थे और उन्हें जब इस घटना के बारे में पता चला तो सभी काफी डर गए थे। इसके बाद चेतन चौहान उनकी बोगी में आए और उन्होंने खिलाड़ियों को आश्वासन दिया कि वो सब सुरक्षित हैं और उन लोगों को दंगाई भीड़ कुछ नहीं करेगी।

पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन से ED ने की पूछताछ: फर्जी कम्पनियों के जरिए जुटाया था दिल्ली दंगों के लिए फंड

पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन, जो इस साल की शुरुआत में राष्ट्रीय राजधानी में हुए भीषण हिंदू-विरोधी दंगों के प्रमुख अभियुक्त हैं, से प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूछताछ की है। टाइम्स नाउ द्वारा प्रकाशित एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ताहिर हुसैन से दिल्ली हिंसा की फंडिंग को लेकर पूछताछ की जा रही है। इसके साथ ही, निजामुद्दीन मरकज और दिल्ली दंगों के बीच सम्बन्ध की भी अब जाँच की जा रही हैं।

दिल्ली दंगों में प्रमुख अभियुक्त निकल आने पर ताहिर हुसैन को आम आदमी पार्टी से निलंबित कर दिया गया था और वर्तमान में वह दिल्ली पुलिस की न्यायिक हिरासत में हैं। इससे पहले, प्रवर्तन निदेशालय यह जाँच कर रहा था कि ताहिर और उसके सहयोगियों द्वारा नियंत्रित की जाने वाली कंपनियाँ किस तरह से सीएए प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों को फंड प्रदान करती थीं। ईडी ने जनवरी में लेनदेन को ट्रैक करने के लिए हुसैन के बैंक खातों की भी जाँच की है।

प्रवर्तन निदेशालय ने ताहिर हुसैन के खिलाफ दिल्ली दंगों में शामिल होने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में ईडी के सूत्रों का हवाला दिया गया है कि हुसैन ने दिसंबर, 2019 से फरवरी, 2020 तक दंगा करने वालों और दंगाइयों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वालों को 1.02 करोड़ रुपए ट्रांसफर करने के लिए कई शेल कंपनियाँ बनाई थीं।

इससे पहले, प्रवर्तन निदेशालय ने AAP के पूर्व पार्षद हुसैन के खिलाफ प्रोडक्शन वारंट जारी करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले ताहिर हुसैन के ठिकानों और अड्डों पर भी छापा मारा था। हुसैन के अलावा, दिल्ली दंगों का एक अन्य आरोपित फैजल फारूक भी प्रवर्तन निदेशालय की जाँच के दायरे में हैं। एजेंसी को संदेह है कि वह फरवरी, 2020 में दिल्ली में कई लोगों के लिए सक्रिय रूप से दंगों के लिए फंडिंग का मोर्चा संभाले हुए था।

दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की भूमिका

इस साल की शुरुआत में 24 फरवरी से 25 फरवरी तक, राजधानी दिल्ली शायद अब तक के सबसे वीभत्स हिंदू विरोधी दंगों में से एक की शिकार बनी। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा मास्टरमाइंडस के योजनाबद्ध तरीके के साथ संगठित और सटीक रूपरेखा से किए गए दंगों में 53 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए।

इस भयावह कहानी के मुख्य आरोपितों में से एक AAP नेता ताहिर हुसैन है, जिसने कि दिल्ली दंगों को अंजाम दिया था। इन दंगों में आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा की संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी और कई हिन्दुओं की संपत्तियों को जलाकर राख कर दिया गया था। ताहिर हुसैन और दिल्ली दंगों में उनकी भूमिका के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है।

इससे पहले, ताहिर हुसैन ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया था कि वह फरवरी 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड है। दिल्ली पुलिस को दिए अपने बयान में उसने कहा कि जब वह 2017 में आम आदमी पार्टी का पार्षद बना, तो वह चाहता था कि अपनी राजनीतिक पहुँच और धन का उपयोग हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए करेगा।

पुलिस का दावा है कि सरकारी क़बूलनामे में ताहिर हुसैन ने यह बात मानी है कि उनके एक सहयोगी ख़ालिद सैफ़ी और पीएफ़आई ने भी इस हिंसा को अंजाम देने में उनकी मदद की थी। ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ अख़बार के अनुसार, ताहिर हुसैन ने पुलिस को बताया कि वो 08 जनवरी को जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद से शाहीनबाग़ स्थित पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) के दफ़्तर में मिला था।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के लिए काँच की बोतलें, पेट्रोल, तेज़ाब, पत्थर समेत कुछ अन्य सामग्री जमा करने के काम ताहिर हुसैन को सौंपा गया था, जो उसने अपने घर की छत पर जमा किए थे।

पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन ने कहा, “04 फ़रवरी को यह तय हुआ कि सीएए विरोधी प्रदर्शन में आने के लिए लोगों को भड़काना होगा। ख़ालिद सैफ़ी का काम लोगों को भड़का कर सड़कों पर उतारने का था। ख़ालिद सैफ़ी ने कहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे (फ़रवरी 17, 2020) के समय कुछ तो बड़ा करना होगा, ताकि मौजूदा सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया जा सके।”

‘डॉक्टर से ज्यादा जानते हैं कंपाउंडर’ – संजय राउत का बयान, IMA ने की इस्तीफे की माँग, लिखा CM ठाकरे को पत्र

शिवसेना नेता संजय राउत ने कुछ दिन पहले एक मराठी न्यूज चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि डॉक्टरों से बेहतर कंपाउंडर होते हैं। इसलिए वह कंपाउंडर से ही दवा लेते हैं। अपने इस बयान को उन्होंने WHO की आलोचना करते हुए दिया था।

अब उनके इसी बयान पर बवाल मचा है। जिससे उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी है। IMA ने तो इस संबंध में महाराष्ट्र मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है। साथ ही शिवसेना नेता से माफी माँगने को भी कहा है।

ठाणे के एसोसिएसन अध्यक्ष की ओर से लिखे गए पत्र में राउत की निंदा करते हुए कहा गया है कि स्वास्थ्यकर्मी अपने बीवी, बच्चे, बूढ़े माता-पिता को छोड़कर, अपनी जान को खतरे में डालकर काम कर रहे हैं। ऐसे समय में संजय राउत जैसे वरिष्ठ राजनेताओं के मुख से ये सुनना कि कंपाउंडर को डॉक्टर से ज्यादा मालूम है- ये बेहद हैरान करने वाला है।

पत्र में लिखा गया है कि वह इस तरह के बर्ताव की निंदा करते हैं और संजय राउत की इस्तीफे की माँग करते हैं। उनका यह भी कहना है कि डॉक्टर इस तरह के अपमानजनक व नकारात्मक कमेंट्स के साथ अच्छे से काम नहीं कर पाएँगे। इससे डॉक्टरों का मनोबल गिरा है और इसलिए वह इस मामले पर कड़ी कार्रवाई चाहते हैं।

आईएमए, ठाणे के अध्यक्ष डॉ. संतोष कदम ने कहा, “इस समय जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस जैसी महामारी से लड़ रही है, खासतौर पर उस समय हम मेडिकल टीम और डॉक्टरों के प्रति सकारात्मक नजरिया अपनाए जाने को देखते हैं। इस वजह से हमने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखा है।”

इसी प्रकार डॉक्टरों के दूसरे संगठन मार्ड ने भी सोमवार को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या वह भी मानते हैं कि डॉक्टरों को कुछ नहीं आता और उनसे ज्यादा ज्ञान कंपाउंडर्स को होता है? 

इस बीच भाजपा ने भी शिवसेना नेता पर निशाना साधा है और उनसे माफी की माँग की है। भाजपा के मुताबिक संजय राउत ने डॉक्टर्स का अपमान किया है, जो इस महामारी में अहम रोल निभा रहे हैं।

बता दें कि स्थानीय चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में , शिवसेना नेता ने कहा था, “WHO लोगों का एक समूह है। तो डॉक्टर भी उसका हिस्सा हैं। सच्चाई ये है कि एक कंपाउंडर भी डॉक्टर से ज्यादा जानता है। मैं हमेशा डॉक्टर की जगह कंपाउंडर से दवाई लेता हूँ।” उन्होंने आगे यह भी कहा कि लोगों को WHO पर यकीन नहीं करना चाहिए क्योंकि कोरोना उन्हीं के कारण फैला है।

50 रुपए में प्लेटफॉर्म टिकट: दिग्विजय सिंह फैला रहे थे झूठ, रेलवे ने बताया असली कारण

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मंगलवार (अगस्त 18, 2020) को ट्विटर पर रेलवे की प्लेटफॉर्म टिकट को लेकर खुलेआम झूठ फैलाया। अपने ट्वीट में उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस काल में प्लेटफॉर्म टिकट की दर 3 रुपए हुआ करती थी लेकिन भाजपा काल मे ये टिकट 50 रुपए हो गई है।

कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट तौर पर अपने ट्वीट से यह बताने का प्रयास किया कि भाजपा काल में इन टिकट दरों में 15 गुना बढ़ोतरी हुई है।

हैरानी की बात है कॉन्ग्रेस नेता का ये ट्वीट ऐसे समय में आया, जब भारतीय रेलवे प्रवक्ता पहले ही इस पर स्थिति को साफ कर चुके हैं। अपने एक ट्वीट में भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने कल ही स्पष्ट किया था कि आखिर क्यों रेलवे ने प्लेटफॉर्म टिकट में बढ़ोतरी की है।

उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के चलते ये फैसला लिया गया ताकि स्टेशन पर भीड़ इकट्ठा न हो और सामाजिक दूरी वाले नियम का भी पालन हो सके। भारतीय रेलवे प्रवक्ता ने यह सफाई कथित पत्रकार प्रशांत कनौजिया के ट्वीट के रिप्लाई में दी थी। जिसमें प्रशांत रेलवे पर झूठी खबर फैलाने की कोशिश कर रहे थे। भारतीय रेलवे ने बताया कि टिकट दरों में बढ़ोतरी कोरोना महामारी की शुरुआत में ही कर दी गई थी।

इतना ही नहीं, रेलवे स्टेशन पर अधिक भीड़ को रोकने के लिए यह फैसला मार्च में ही ले लिया गया था। जिसके अनुसार 200 स्टेशन पर प्लेटफार्म टिकट 10 रुपए से 50 रुपए कर दी गई। ऑपइंडिया से बात करते हुए रेलवे अधिकारी ने बताया कि प्लेटफॉर्म टिकट का दाम 50 रुपए करने का उद्देश्य केवल ये था कि यात्री के अलावा कोई भी ग़ैरजरूरी इंसान वहाँ न आए ताकि सोशल डिस्टेंसिंग बनी रहे।

उन्होंने बताया, “इससे प्रवेशकों को स्टेशन तक सीमित रखने और सामाजिक दूरी बनाए रखने में सुविधा हुई। अन्य डीआरएम से भी अनुरोध किया गया है कि वे प्लेटफॉर्म टिकटों की बिक्री को 50 रुपए करने की अनुमति दें, जैसा कि लॉकडाउन से ठीक पहले किया जा रहा था। लेकिन अब तक IRSDC द्वारा प्रबंधित किए जा रहे अन्य स्टेशनों पर पीएफ टिकटों की बिक्री शुरू नहीं हुई है।”

आगे उन्होंने ये भी बताया कि टिकट दरों में यह बढ़ोतरी अस्थायी है। जैसे ही महामारी का प्रकोप कम होगा, दोबारा सब कुछ सामान्य कर दिया जाएगा।

बता दें कि अभी हाल में पुणे में कोरोना का प्रकोप बहुत तेजी से बढ़ता दिखा। महाराष्ट्र अब भी पूरे देश में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बना हुआ है। केवल पुणे में कोरोना के 1, 32, 481 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से 39424 अब भी सक्रिय हैं।

साहिल कुमार बन कर शौकत अली ने फँसाया, शादी भी कर ली… फिर कुल्हाड़ी से हमला कर घर से भगाया

ग्वालियर की एक युवा महिला ने आरोप लगाया है कि जम्मू कश्मीर के एक व्यक्ति शौकत अली ने पहचान छिपा कर उससे शादी कर ली और फिर धोखा दिया। आरोप है कि उस व्यक्ति ने पहले तो महिला के साथ अपनी छद्म हिन्दू पहचान के साथ शादी की और बाद में उसे अपने घर से निकाल बाहर किया। ये मामला रविवार (अगस्त 16, 2020) को सामने आया, जब ग्वालियर की उस महिला का वीडियो वायरल हुआ।

उस वीडियो में अपने साथ हुए अत्याचार को बयान करते हुए महिला ने मदद की अपील की। ग्वालियर की पुलिस ने बताया है कि महिला का वीडियो जब वायरल हुआ, उससे 2 दिन पहले ही वो वहाँ स्थित अपने घर पहुँची थी। एक महिला सब-इंस्पेक्टर ने पीड़िता से संपर्क किया है। महिला ने फेसबुक पर पोस्ट किए गए वीडियो में बताया है कि वो जम्मू कश्मीर के पूँछ स्थित सुरनकोट में थी, जहाँ उसके पति और पति के परिवार वालों ने उसे घर से निकाल दिया।

पीड़िता ने कहा कि स्थानीय पुलिस से उसे कोई मदद नहीं मिली। साथ ही अपने पति और उसके परिवार पर उसकी हत्या का इरादा रखने का भी आरोप लगाया। उसने बताया कि वापस घर पहुँचने में पुलिस ने उसकी कोई मदद नहीं की। महिला ने बताया कि उसके पति का असली नाम शौकत अली है, जो पिछले 6 महीने से आर्थिक और शारीरिक रूप से उसका शोषण कर रहा था। साथ ही वो उसकी जम कर पिटाई भी करता था।

महिला ने बताया कि शौकत अली ने छद्म हिन्दू नाम के साथ उसे अपने प्रेम जाल में फँसाया और फिर उससे शादी कर ली। जब वो उसके घर पहुँची और अपने ससुराल वालों से मिली, तब उसे उसके मजहब का भान हुआ। इसके कुछ दिनों बाद शौकत अली और उसके परिवार वालों ने कुल्हाड़ी से उस पर हमला किया और पीट-पीट कर घर से बाहर निकाल दिया। वीडियो में महिला ने अपने शरीर पर घाव के निशान भी दिखाए।

ऊपर वाला ट्वीट तब का है, जब लोगों को लग रहा था कि महिला जम्मू कश्मीर में ही फँसी हुई है। जैसे ही ये वीडियो वायरल हुआ, हिन्दू संगठनों ने जम्मू कश्मीर के अधिकारियों से संपर्क कर महिला की व्यथा के बारे में बताया और ग्वालियर वापसी के बारे में बातें की। ग्वालियर पुलिस ने बताया कि इस मामले में शौकत अली और 4 अन्य आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। ग्वालियर के एसपी अमित संघी ने कहा कि अगर महिला अपनी शिकायत के साथ पुलिस के पास आती है तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।

पीड़िता एक इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी में काम करती है। वो इस साल की शुरुआत में जयपुर गई थी, जहाँ उसकी मुलाकात शौकत अली से हुई। शौकत ने उस समय खुद को हिन्दू बताया। उसने साहिल कुमार के छद्म नाम से महिला के साथ दोस्ती बढ़ाई और उसे अपने जाल में फँसाया। महिला ने आरोपित के दावों को सही समझ कर उसके साथ शादी कर ली। हिन्दू संगठनों ने महिला को पुलिस से संपर्क कराने से लेकर ग्वालियर उसके घर आकर भी उसकी मदद की।

पैगंबर मुहम्मद पर आपत्तिजनक वीडियो, बेंगलुरु के बाद J&K में भड़का माहौल: दोषी को फाँसी की माँग, 3 गिरफ्तार

बेंगलुरु के बाद अब एक सोशल मीडिया पोस्ट के कारण जम्मू-कश्मीर का माहौल गरमा गया है। खबर है कि कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक युवक ने धर्म विशेष पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए वीडियो पोस्ट की। इसके बाद ही मामले ने तूल पकड़ा और समुदाय विशेष के लोग सड़कों पर आ गए।

उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के सोगम लोलब इलाके में सोमवार (अगस्त 17, 2020) को भी सैकड़ों लोगों ने लोलब यूथ ऑर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष मुदस्सिर अहमद के नेतृत्व में धरना प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में बड़े-बुजुर्गों से लेकर बच्चे भी शामिल रहे। इनकी माँग ये थी कि प्रशासन ऐसे पोस्ट करने वालों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई करे ताकि सांप्रदायिक घृणा फैलाने वाले लोगों को सख्त संदेश मिल सके।

इस प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने कई नारे लगाए। ग्रेटर कश्मीर के अनुसार, इस बीच वहाँ, “ढोंगी बाबा हाय-बाय, गुस्ताखी न मंजूर, गुस्ताख को फाँसी दो” जैसे लगाए गए।

एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “इस्लाम के पैगंबर के ख़िलाफ़ ऐसी कोई भी अभद्र टिप्पणी इस्लाम को मानने वाले दुनिया के किसी के लिए भीअस्वीकार्य है और इस पर आवाज उठाना हर इस्लामी के लिए, उसके दीन का सवाल है।”

इसी तरह एक अन्य यूजर कहता है, “हमारे पैगंबर हमारा गर्व और सम्मान हैं। हम इस पर समझौता नहीं कर सकते।” स्थानीय लोगों की माँग है कि जिसने भी अपमानजनक कृत्य किया है, उसके ख़िलाफ़ सख्त सजा हो, वरना वे लोग दोबारा से सड़कों पर उतर आएँगे। प्रदर्शन कर रहे लोगों ने गुनहगारों को फाँसी देने की माँग प्रशासन से की है।

गौरतलब है कि सोगम के अलावा पुलवामा के शहर में भी विरोध प्रदर्शन होता देखने को मिला। सबने प्रशासन पर आरोपितों पर कार्रवाई का दबाव बनाया। इसी बीच पुलिस ने खबर दी कि उन्होंने सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील वीडियो को शेयर करने के आरोप में तीसरे आरोपित को भी गिरफ्तार कर लिया है। इसकी पहचान रोहित शर्मा के रूप में हुई है। ये पक्का डंगा इलाके का निवासी है।

पुलिस ने इससे पहले सतपाल शर्मा और उसके साथी दीपक को इस केस में गिरफ्तार किया था। इनके ख़िलाफ़ पुलिस ने आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत पक्का डंगा पुलिस थाने में केस दर्ज किया है।

जम्मू कश्मीर के इंस्पेक्टर जनरल ने भी मामले पर संज्ञान लिया और लोगों को यह वीडियो शेयर करने से मना किया। उन्होंने चेतावनी दी कि दोषी पाए गए व्यक्ति को सख्त सजा दी जाएगी। उन्होंने अपील करते हुए कहा, “मेरी अपील है कि ऐसी किसी वीडियो को न फैलाएँ, जो आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुँचाए। ये हमारे लिए उचित नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा, “यदि हमने किसी को भी ऐसी वीडियो आगे शेयर करते हुए पाया तो उसके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई होगी।”

इस घटना के बाद कश्मीर के इलाकों में शांति बनाए रखने के लिए कई जरूरी कदम उठाए गए हैं। तनावपूर्ण माहौल देखकर पुलिस की तैनाती की गई है। कई इलाकों में कर्फ्यू लगाया गया है। लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वह सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वालों के झाँसे में न आएँ और आपसी प्रेम व शांति को बरकरार रखें।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वहाँ कुछ लोगों ने बंद का ऐलान भी किया था। हालाँकि पुलिस ने इस बात के मद्देनजर कर्फ्यू लगा दिया। रात को ही पूरे शहर के अंदर चौक-चौराहों और गलियों में कंटीले तार लगाकर बंद करके पुलिस व सीआरपीएफ के जवानों को तैनात कर दिया। सुबह जब लोग अपने घरों से बाहर निकले तो उन्हें पता चला कि बाहर क‌र्फ्यू लगाया गया है। किसी को भी चलने फिरने की इजाजत नहीं है। सारा दिन सुरक्षा बल गश्त करते रहे। किसी को भी बेवजह घरों से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी गई।

इसी दौरान किश्तवाड़ में हिंसा की आशंका के चलते भी प्रशासन ने कर्फ्यू लगा दिया है। अधिकारियों के मुताबिक, स्थिति तनावपूर्ण पर नियंत्रण में है। जम्मू कश्मीर के ग्रांड मुफ्ती मुफ्ती नसीर उल इस्लाम ने शुक्रवार को नमाज के बाद शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया है।

यहाँ बता दें कि 15 अगस्त यानी शनिवार को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जम्मू शहर के मुबारक मंडी में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस दौरान जिला रियासी में हुए एक घटना पर फेसबुक पर सतपाल शर्मा ने धर्म विशेष के विरुद्ध कोई आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। जिसके वायरल होने के बाद प्रदर्शन शुरू हुए।

‘₹#डी भी नहीं बिकती जितने में, उतने में रंजन गोगोई बिके’ – ‘माँ’ वाले मुनव्वर राना ने राम मंदिर पर उगला जहर

हाल ही में भारत के मशहूर शायर राहत इंदौरी की मौत हो गई। उनके साथ सैकड़ों बार मंच साझा कर चुके मुनव्वर राना अक्सर अपने विवादित बोल की वजह से सुर्खियों में रहते हैं। अब उन्होंने एक बार फिर राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवम्बर 2019 में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उन्होंने कहा, “भारत के पूर्व CJI रंजन गोगोई जितने कम दाम में बिके, उतने में हिंदुस्तान की एक ₹#डी भी नहीं बिकती है।“

साथ ही उन्होंने रंगन गोगोई को राज्यसभा सदस्य बनाए जाने पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि राम मंदिर पर उनका फैसला अच्छा था या बुरा, उन्हें राज्यसभा की सदस्यता नहीं दी जानी चाहिए थी। इसके बाद उन्होंने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि राम मंदिर मामले में न्याय नहीं हुआ बल्कि धोखाधड़ी हुई। उन्होंने कहा कि वो ये सब कुछ आरोप नहीं लगा रहे हैं बल्कि फैक्ट कह रहे हैं, ये सच्चाई है।

‘न्यूज़ नेशन’ से बातचीत करते हुए मुनव्वर राना ने इस्लाम की अच्छाइयाँ बताते हुए कहा कि अगर आप किसी मौलवी से ताबीज लिखवाते हैं तो वो रुपए नहीं लेता है, एक कप चाय तक नहीं पीता है। इसकी तुलना उन्होंने रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा की सदस्यता लेने से करते हुए पूछा कि इसका क्या मतलब हुआ साहब? साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले में 2 लोगों ने मिल कर फैसला कर दिया, सब गलत हुआ और सब कुछ अपनी मर्जी से कर दिया गया।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर पर ऐतिसासिक सुनवाई के लिए 5 सदस्यीय पीठ का गठन किया था, जिसने गहन सुनवाई के बाद इस पर फैसला किया। लेकिन इन सब के बावजूद मुनव्वर राना ने इसे भारत का आंतरिक मामला मानने से भी इंकार कर दिया और कहा कि पूरी दुनिया जानती है कि क्या हुआ लेकिन कहने के लिए कोई भी मुल्क कह दे कि फलाँ मेरा अंदरूनी मामला है। उन्होंने कहा कि दिलों में जो नफ़रतें होती हैं, उसका क्या?

इसके बाद उन्होंने भारत के इतिहास के बारे में बोलना शुरू कर दिया और कहा कि हिंदुस्तान एक ऐसा देश हुआ है, जहाँ हर शताब्दी में कोई न कोई महात्मा पैदा हुए हैं, कोई साधु-संत या सूफी-फ़क़ीर पैदा हुआ है। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा की जो सीट 1 करोड़ या 50 लाख रुपए में बिकती थी, उसके लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेईमानी कर दी। साथ ही उन्होंने रंजन गोगोई की तुलना तानाशाह हिटलर और मुसोलोनी से की।

मुनव्वर राना ने इस पूरी बहस में रामायण को भी घुसाते हुए कहा कि जहाँ भगवान राम ने वचन के पालन के लिए अपनी गद्दी तक छोड़ दी थी, वहीं रंजन गोगोई ने अपने पद की भी प्रतिष्ठा नहीं रखी। मुनव्वर राना ने अपने बयानों पर माफ़ी माँगने से इंकार करते हुए कहा कि उन्होंने कुछ गलत कहा ही नहीं है। उन्होंने कहा कि माफ़ी माँगने का अर्थ है कि हम भी बिक गए और थक-हार कर बैठ गए।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने मुनव्वर राना के इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि ताउम्र ‘माँ’ के नाम पर संवेदनाओं की भरपूर कमाई खाने वाले एक शायर की खाल में छुपा रंगा सियार देखिए, एक नारी और देश की सर्वोच्च अदालत के लिए इनकी ज़ुबान देखिए, फिर ग़द्दार कहो तो कुंठित आत्माएँ तड़प उठेंगी। बता दें कि मुनव्वर राना ‘माँ’ पर अक्सर शायरी करते रहे हैं।

इससे पहले मुनव्वर राना ने माँग की थी कि अयोध्या के धन्नीपुर गाँव में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद के लिए जो 5 एकड़ ज़मीन मिली है, वहाँ भगवान राम के पिता राजा दशरथ के नाम पर अस्पताल बनवाया जाए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर उक्त माँग की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार द्वारा दी गई या जबरदस्ती हासिल की गई ज़मीन पर मस्जिद नहीं बनता। साथ ही मस्जिद के लिए रायबरेली में अपनी 5 एकड़ की ज़मीन ऑफर की।

कहानी खूनी मिंजर की: संप्रदाय विशेष के स्थानीय लोगों ने आतंकियों को दी थी शरण… और चम्बा में मार डाले गए थे 35 हिन्दू

भारत में हिन्दुओं के कई नरसंहार ऐसे हैं, जिनके बारे में हमें ही कुछ भी पता नहीं है। ऐसी ही एक घटना हिमाचल प्रदेश के चम्बा में हुई थी, जब हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकियों ने 35 हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया था। जो कहते हैं कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता, उनके मुँह पर इन आतंकियों ने बार-बार तमाचा मारा है – हिन्दुओं को निशाना बना कर। हिमाचल के चम्बा में भी ऐसा ही कुछ हुआ था।

चम्बा जिले की सीमा जम्मू के डोडा से लगती थी। वहाँ अधिकतर हिन्दू ही थे, ऐसे में आतंकियों ने उस जगह को जानबूझ कर निशाना बनाया था। इस घटना में 11 लोग घायल भी हुए थे। सबसे बड़ी बात कि इस नरसंहार में मारे गए लोगों में अधिकतर गरीब मजदूर थे। लेकिन, उनका कसूर बस इतना था कि वो हिन्दू थे। गरीबों के हितों का दावा करने वाले एक्टिविस्ट्स और राजनीतिक दल इस पर बात नहीं करते।

आइए, शुरू से जानते हैं कि उस सोमवार (अगस्त 3, 1998) को हुआ क्या था। वो ऐसा समय था जब जम्मू कश्मीर में अशान्ति फैली रहती थी। सत्ता के ठेकेदार दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक मलाई चापते रहते थे और जनता मरती रहती थी। आतंकियों के मंसूबे आसमान पर हुआ करते थे। लेकिन, हिमाचल प्रदेश शांत था। वहाँ इस तरह की ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी। लेकिन अगस्त 1998 के पहले हफ्ते में ही सब बदल गया।

आतंकियों ने उस दिन चम्बा जिले के दो अलग-अलग जगहों को निशाना बनाया था। दूसरा हमला रात के डेढ़ बजे सतरुंडी में हुआ रहा, जहाँ 6 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और 3 घायल हुए। इससे पहले कालाबान में आतंकियों ने धावा बोला था। यहाँ 26 लोग गोलियों से भून डाले गए थे और 8 घायल हुए। दूसरी घटना भी एकदम तड़के हुई। सुबह जब हिमचाल के लोग सोकर उठे तो उनकी नींद इस खूनी खबर के साथ खुली।

आतंकियों ने ऐसी हिमाकत कैसे की, इसे समझने के लिए पहले हमें हिमाचल प्रदेश के चम्बा का भूगोल समझने की ज़रूरत है। ये वही जिला है, जहाँ ऐतिहासिक मिंजर और मणिमहेश मेला लगता आ रहा है। हमेशा मेले के समय आतंकी हमलों का खतरा बना रहता था और आतंकियों से निपटने के लिए विशेष व्यवस्था करनी होती थी। इस जिले की खासियत ये है कि इसके कुछ हिस्सों से जम्मू कश्मीर और पंजाब, दोनों राज्यों में पैदल ही पहुँचा जा सकता है।

मिंजर मेले का प्रभाव प्रदेश स्तरीय है, जबकि मणिमहेश इतना लोकप्रिय है कि इसमें देशभर से तीर्थ यात्री चंबा का रुख करते हैं। चम्बा-पठानकोट हाईवे पर तुन्नूहट्टी में सुरक्षा व्यवस्था का विशेष ध्यान रखना पड़ता है और वहाँ अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है। अब आते हैं वापस 1998 के नरसंहार पर। दरअसल, जब हिमाचल के चम्बा में उस वक्त हिन्दुओं का नरसंहार हुआ था, तब वहाँ मिंजर मेला ही लगा हुआ था।

चम्बा में जब आतंकियों ने मचाया कोहराम (साभार: जम्मू कश्मीर नाउ)

इसे आज भी लोग ‘खूनी मिंजर’ के नाम से जानते हैं। आज भी जब ये मेला लगता है तो लोग उस पल को याद कर ज़रूर काँप उठते हैं। मिंजर मेले में हमला करने वाले आतंकियों ने न सिर्फ हिन्दुओं को मारा और उन्हें घायल किया था, बल्कि कइयों को वो बँधक बना कर भी ले गए थे। कालाबान में भी ये आतंकी जम्मू कश्मीर के डोडा से ही घुसे थे। उनके पास ऑटोमेटिक हथियार थे। आतंकियों ने जैसे ही गरीब हिन्दू मजदूरों को सोते हुए देखा, फायरिंग शुरू कर दी।

दोनों जगह मरने वाले हिन्दुओं में अधिकतर मजदूर ही थे। कई ख़बरों में तो ऐसा भी बताया गया था कि आतंकियों ने उन हिन्दुओं को मारने से पहले उन्हें पेड़ से बाँध दिया था, उसके बाद उन्हें एक-एक कर गोलियों से भून डाला गया। सबसे बड़ी बात तो ये कि इतना सब कुछ हो गया और पुलिस-प्रशासन सोता रहा, सरकार सोती रही। इस घटना के 6 घंटे बाद पुलिस को इसके बारे में पता चला, जब दो घायल किसी तरह 8 किलोमीटर पहाड़ ट्रेक कर के मनसा पुलिस स्टेशन पहुँचे।

असल में आतंकियों के गुस्से का कारण वहाँ हो रहे कंस्ट्रक्शन के काम थे। आतंकी नहीं चाहते थे कि क्षेत्र का विकास हो, क्योंकि इससे दूरदराज के क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही आसान हो जाती। वो लोग बैरागढ़-सतरुंडी रोड के निर्माण के कारण खफा थे, इसीलिए उन्होने इस नरसंहार को अंजाम दिया। आतंकियों ने उस क्षेत्र को एक तरह से अपना अड्डा ही बना रखा था और पंजाब व जम्मू कश्मीर में दबाव के कारण वो बर्फ पिघलते ही वहाँ जम जाते थे।

जब ये घटना हुई, तब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे फ़ारूक़ अब्दुल्ला और हिमाचल प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही थी। जैसे ही ये घटना हुई, धूमल ने अपने समकक्ष अब्दुल्ला से बातचीत की और जॉइंट ऑपरेशन के जरिए आतंकियों के सफाए का ऑफर दिया। हालाँकि, अब्दुल्ला परिवार शुरू से आतंकियों और अलगाववादियों को लेकर नरम रुख दिखाता रहा है।

इसके बाद डोडा के भदरवाह में कैम्प कर रहे राष्ट्रीय राइफल्स के जवानों को आनन-फानन में हिमाचल प्रदेश पुलिस की मदद के लिए उन दुर्गम इलाक़ों में भेजा गया। राष्ट्रपति केआर नारायणन और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस घटना की निंदा की थी। राष्ट्रपति ने अपने शोक सन्देश में उम्मीद जताई थी कि प्रशासन इस निर्दयी नरसंहार को रोकने में सक्षम होगा और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए दोषियों को गिरफ्तार करेगा।

वहीं पीएम वाजपेयी ने भी सरकार व अधिकारियों को इस हमले के गुनहगारों से कठोरतम तरीके से निपटने का निर्देश जारी किया। इससे कुछ दिनों पहले ही अब हिमाचल प्रदेश के कुछ लोग बगल के डोडा जिले में जड़ी-बूटियों के लिए गए थे तो आतंकियों ने उनमें से 4 को मौत के घाट उतार दिया था। एक गुज्जर ने उनके मृत शरीर को देखा, जो वहीं पड़े हुए थे। इसके बाद पुलिस को सूचित किया गया था।

असल में दिक्कत ये थी कि जैसे ही बर्फ पिघलनी शुरू होती थी, चम्बा के लोग वहाँ से उतर कर मैदानी इलाक़ों में काम-धाम के लिए निकलते थे और उनके घर खाली रहते थे। जब पूरे क्षेत्र में अधिकतर घर खाली हो जाते थे तो जम्मू कश्मीर में केंद्रीय बलों से बचने के लिए आतंकी उन्हें अपना ठिकाना बना कर वहीं रहने लगते थे। जम्मू कश्मीर के आतंकी उन घरों को अपने ‘हाईडआउट्स’ के रूप में इस्तेमाल करते थे, ऐसा सीएम धूमल ने भी ध्यान दिलाया था।

इतिहास और भूगोल के बाद अब जरा वहाँ के समाज को समझ लेते हैं। दरअसल, इस नरसंहार के बाद गुज्जरों और गद्दियों में संघर्ष शरू हो गया था। उनमें तनाव पसर गया था क्योंकि गुज्जर संप्रदाय विशेष के थे और गद्दी हिन्दू। सरकार ने मजबूर होकर गुज्जरों को मैदानी इलाकों में पर उतारा, ताकि वहाँ शांति बनी रहे। उन्हें अपने जानवरों सहित नीचे उतारा गया। इसके एक साल बाद गुज्जर वापस चम्बा के ऊँचे इलाक़ों में लौटे थे।

वर्तमान में ‘नेटवर्क 18’के ग्रुप कंसल्टिंग एडिटर प्रवीण स्वामी ने तब ‘फ्रंटलाइन’ में इस तनाव पर लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया था कि हिन्दुओं ने कभी गुज्जरों (संप्रदाय विशेष) के खिलाफ हिंसा नहीं की लेकिन उनका आरोप था कि ये गुज्जर आतंकी हरकतों में भागीदार हैं और आतंकियों की मदद करते हैं। वो आतंकियों को अपने घर देते थे और भोजन-पानी की भी व्यवस्था करते थे। हिमाचल स्थित चम्बा में हिन्दुओं के नरसंहार मामले में जिन 6 लोगों को आतंकियों की मदद के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, वो सभी गुज्जर (संप्रदाय विशेष) थे।

इस घटना की चर्चा 17 सालों बाद कोर्ट में तब हुई थी, जब एक समाजिक कार्यकर्ता संगत सिंह चौहान ने संप्रदाय विशेष के सारे लोगों को पाकिस्तान भेजने के लिए याचिका दायर की थी और कुछ मजबूत पॉइंट्स भी दिए थे। उस दौरान इसकी चर्चा हुई थी कि किस तरह हिमाचल के चम्बा में हिंदुओं का नरसंहार करने वाले संप्रदाय विशेष के ही थे और वो हिन्दू मंदिरों को भी अक्सर निशान बनाते रहते हैं। हालाँकि, जस्टिस रोहिंटन ने इसे नकारते हुए पूछा था कि क्या वो सचमुच इसे लेकर गंभीरता से दलीलें पेश करना चाहते हैं?

उसी साल वंधामा में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। रविवार (जनवरी 25, 1998) की रात इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वंधामा (Wandhama Massacre) के 23 हिन्दू क़त्ल किए जा चुके थे। उन्हें बेरहमी से मारा गया था। कइयों के तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। लाशों को देख कर स्पष्ट पता चलता था कि ये कोई आम कत्लेआम नहीं है क्योंकि कातिलों के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी घृणा थी, जो क्षत-विक्षत लाशों को देख कर ही पता चल रहा था।

समीर खान ने बेगम आयशा को रॉड से पीट-पीटकर मार डाला, शव के 6 टुकड़े कर हाइवे पर फेंका

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में एक महिला का शव ट्रोली बैग में मिला था। पुलिस ने इस मामले की गुत्थी सुलझा ली है। मृतक महिला की पहचान आयशा के तौर पर हुई है। उसकी हत्या उसके शौहर समीर खान ने की थी।

ख़बरों के मुताबिक़ समीर खान नेपाल की और भागने की तैयारी में था। लेकिन पुलिस ने उसे समय रहते गिरफ्तार कर लिया।  

कुछ ही दिन पहले लखनऊ-अयोध्या राजमार्ग पर सफेदाबाद थाने के तहत आने वाले केवाड़ी मोड़ पर एक ट्रोली बैग और ब्रीफकेस मिला था। ट्रोली बैग में एक महिला का शव था। शव 6 टुकड़ों में था। पुलिस ने मामले में जाँच शुरू की तो पता चला कि महिला का नाम आएशा है। वह मुंबई के अंबेडकर नगर टाटा वहसत मार्ग, भारत नगर के रहने वाले बादशाह शेख की बेटी है। आएशा लखनऊ के इंदिरानगर में अपने पति समीर खान के साथ रहती थी। जिसने उसकी हत्या करके उसके 6 टुकड़े किए थे। पुलिस ने आरोपित पति को लखनऊ इंदिरानगर के मुंशी पुलिया से सर्विलांस के ज़रिये गिरफ्तार किया।  

ख़बरों के मुताबिक़ 5 जुलाई को आएशा और उसके पति समीर खान में कुछ विवाद हुआ। इसके बाद समीर ने रॉड से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी। समीर खान मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलरामपुर महाराजगंज थाना क्षेत्र के गुलरिहा का रहने वाला है। वह मुंबई के बांद्रा क्षेत्र की चिकन शॉप में काम करता था और लॉकडाउन की शुरुआत में लखनऊ वापस आ गया था।

आयशा की हत्या करने के बाद समीर खान ने बाजार से चापड़ और शव को पैक करने के लिए अन्य सामग्री खरीदकर लाया। हत्या की रात शव के छह टुकड़े कर ब्रीफकेस और बैग में भरकर अपने वाहन से ले जाकर हाइवे पर फेंक दिया था।  

इस मामले पर बाराबंकी पुलिस अधीक्षक ने बताया कि जिस ट्रोली बैग में महिला का शव मिला, उसमें ही पुलिस को दो सबसे अहम सुराग मिले थे। पहला सुराग था बिजली का बिल जिसमें कुछ नंबर थे। दूसरा सुराग था आरोपित पति की जींस जिसमें लखनऊ के एक पार्क के दो टिकट मिले थे। इन दो अहम सुरागों के आधार पर पुलिस ने इस मामले की जाँच शुरू की थी। बिजली का बिल एक महिला के नाम पर था। पुलिस जब उस महिला से पूछताछ करने पहुँची तो उसने बताया कि मकान समीर खान को बेच दिया है।  

महिला ने ही पुलिस को समीर खान का नंबर भी दिया। पुलिस ने नंबर को सर्विलांस पर रखा और उसकी कॉल डिटेल भी निकाली।  इन दोनों की मदद से पुलिस को आरोपित पति की लोकेशन का पता चला। हालाँकि तब तक समीर खान ने वह नंबर बंद भी कर दिया था। इसके बावजूद पुलिस ने सर्विलांस सेल की मदद से आरोपित की असल लोकेशन खोज ली। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने बताया कि वह नेपाल भागने की फ़िराक में था। 

‘कोर्ट ने बाबरी गिराने वालों को पुरस्कृत किया’: स्वरा भास्कर के खिलाफ अवमानना का मामला को लेकर याचिका

स्वरा भास्कर के खिलाफ आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही शुरू करने की माँग को लेकर भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के समक्ष एक याचिका दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि कथित विचारक ने माननीय न्यायालय के खिलाफ लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने के इरादे से बयान दिया था।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्वरा भास्कर ने 01 फरवरी 2020 को मुंबई में ‘सांप्रदायिकता के खिलाफ कलाकार’ (Artists against communalism) नामक एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए अयोध्या फैसले को लेकर कहा था कि अदालत तय नहीं कर पा रही है कि वो संविधान में यकीन करती है या नहीं।

याचिका के अनुसार, स्वरा भास्कर ने कहा था, “हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस गैरकानूनी था और उसी फैसले में मस्जिद को गिराने वाले लोगों को पुरस्कृत किया गया।”

याचिका में स्वरा भास्कर पर यह आरोप लगाया गया है कि उनका बयान न केवल सस्ती लोकप्रियता का स्टंट था, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ जनता को विद्रोह करने के लिए जान-बूझकर किया गया प्रयास भी था।

एडवोकेट अनुज सक्सेना, उषा शेट्टी, प्रकाश शर्मा और महेश माहेश्वरी की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि कथित विचारक के बयान माननीय न्यायालय की कार्यवाही और सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों की विश्वसनीयता के संबंध में जनता के बीच अविश्वास की भावना पैदा करने की क्षमता रखता है।

उल्लेखनीय है कि शीर्ष अदालत की 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने गत वर्ष 9 नवंबर को अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था और केंद्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ भूमि आवंटित करने का निर्देश दिया था। इस फैसले के बाद श्रीराम मंदिर निर्माण की प्रक्रियाओं ने जोर पकड़ा और इसी माह की 5 तारीख को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन किया।

स्वरा भास्कर के खिलाफ याचिका ऐसे समय में डाली गई है जब सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण को अवमानना मामला में दोषी करार दिया है।