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स्वतंत्रता के मायने: एक भारतीय को चाहिए ‘आजादी’ इन 8 तरह के लोगों से…

आजादी का मतलब हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। आज के संदर्भ में यह शब्द अपने आप में एक अलग स्तर की व्यापकता लिए चलता है। वामपंथी गैंग के लिए इसके मायने बिलकुल ही अलग हैं, और गैर-वामपंथियों के लिए अलग। ‘हिन्दुओं से आजादी’ भी इसी एक शब्द में समेट दी गई है, जो बार-बार, रूप बदल कर हमारे कानों तक पहुँचती है। साथ ही, ‘केरल माँगे आजादी’ जैसे संदर्भ भी इसी शब्द में सिमटे हुए हैं। इसे इतनी बार गलत तरीके से समझाने की कोशिशें हुई हैं कि लोग भूल जाते हैं कि पंद्रह अगस्त का दिन क्या है, और स्वतंत्रता दिवस के मायने क्या हैं।

यूँ तो भारतीय राष्ट्र को मिली आजादी एक ‘ट्रांसफर ऑफ पावर’ कही जाती है, क्योंकि यहाँ तमाम संघर्षों के बाद भी देश को बाँट कर एक ऐसी स्थिति बना दी गई जो स्मृति में नासूर की तरह रिसता रहा है। मैं भी, व्यक्तिगत तौर पर, कॉन्ग्रेस की अंग्रेजियत का प्रखर विरोधी रहा हूँ कि आजादी के बाद भी हमने औपनिवेशिक प्रतीकों को ध्वस्त करने की जगह उसी में गौरव क्यों महसूस किया? आजादी के बाद भी जॉर्ज पंचम की मूर्ति दिल्ली में, या क्वीन विक्टोरिया के नाम पर इमारत कोलकाता में क्यों है?

आखिर ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ को ध्वस्त क्यों नहीं किया गया? क्या संसद भवन जैसी इमारतों को डायनामाइट से उड़ा नहीं देना चाहिए था? क्या इनकी दीवारों से गुलामी की बदबू नहीं आती होगी कॉन्ग्रेस के नेताओं को? अंग्रेजों की छाप की हर वैसी चीज को मिटा देना था, जो हम आने वाले समय में बना सकते थे। सड़कें और रेल हमारे काम की हैं, इसलिए उनको रखते, लेकिन मूर्तियों, इमारतों और नामों को ढोने के पीछे ‘श्वेत चमड़ी’ के आकर्षण के अलावा क्या कारण रहे होंगे? क्या कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र अपने आपको गुलाम रखने वाली, हत्यारिन सरकारों की मूर्तियाँ ढोता है?

खैर, जो हो गया, वो तो हो ही चुका है लेकिन पिछले कुछ सालों में स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार राष्ट्रवाद को ले कर एक जागरुकता आई है, वो मुझे आशान्वित रखती है। मुझे यह संतुष्टि मिलती है कि अब युवा वर्ग सवाल करने लगा है, दुरात्माओं के मुँह बंद करने लगा है, और वाकई में राष्ट्र को ले कर प्रतिबद्ध दिखता है।

आजादी किसी जंजीर से मुक्त होना भर नहीं, आजादी एक सोच है जो हमें मुक्त करती है। आज़ाद होना, स्वतंत्र होना कोई छूने की बात नहीं है, वो महसूस करने की बात है। इसका मतलब है कि आप वैचारिक रूप से आज़ाद हैं कि आप खुले दिमाग से सोच सकते हैं, आपकी सोच पर पहरा नहीं है। आप अगर ये कह पा रहे हैं कि आपकी सोच पर पहरा है, और वो सुना जा रहा है, तो फिर आपकी सोच स्वतंत्र है।

आज़ाद आप होते हैं, किए नहीं जा सकते। आप अपनी आज़ादी के लिए प्रयत्न करते हैं। वैयक्तिक आज़ादी की भावना सामाजिक आज़ादी की नींव है। आज़ादी एक तरह के सुरक्षा की भावना देता है। आज़ादी का मतलब है बोलने की आज़ादी, सोचने की आज़ादी, आलोचना की आज़ादी, अपने लिए एक बेहतर जीवन के प्रयासरत रहने की आज़ादी। ये आपको दी नहीं जा सकती, ये आप महसूस करते हैं। दी इसलिए नहीं जा सकती क्योंकि वो सैंतालीस में दे दी गई थी। अब आपके ऊपर है कि आप इसको कैसे देखते हैं।

हाँ, सबकी परिभाषाएँ अलग हैं आज़ादी को लेकर। आज़ादी आखिर है क्या? एक सामान्य आदमी के लिए इसके क्या मायने हैं? सबसे निचले तबके के सबसे निरीह भारतीय के लिए आज़ादी का क्या मतलब है? क्या सबसे अमीर और सबसे ग़रीब, सबसे अनपढ़ और सबसे बड़े विश्वविद्यालय से पढ़े नवयुवक, सबसे अनभिज्ञ और सबसे समझदार, एक पुरुष और एक स्त्री, एक भ्रूण और अस्सी-सौ साल के बुज़ुर्ग, के लिए आज़ादी के मायने एक हैं?

आप सवाल उठाइए। वो आपका मौलिक अधिकार है। आप प्रदर्शन कीजिए। आप हंगामा कीजिए। सब कुछ कीजिए जो संविधानसम्मत हैं। लेकिन संविधान की हर बात पर गौर कीजिए। उसका एक हिस्सा अपने हिसाब से प्रयोग में मत लाइए। वही संविधान आपको अपने देश की बेहतरी में योगदान माँगता है। वही संविधान कुछ प्रतीकों का सम्मान खोजता है, क्योंकि उसको लिखने वालों ने वो दौर देखा था जब सोलह साल का खुदी राम बोस फाँसी पर लटका दिया गया था। संविधान निर्माताओं ने बंगाल का अकाल भी देखा जो चर्चिल ने होने दिया, क्योंकि यहाँ का अनाज अंग्रेज़ी जनता के लिए आने वाले दिनों के बफर स्टॉक के रूप में रखवा दिया गया था। उन्होंने लाखों बंगालवासियों को चीलों द्वारा खा जाए जाने की ख़बरें सुनी होंगी। उन्होंने जलियाँवाला बाग देखा होगा, विभाजन में रेलों में भरे आते-जाते डिब्बों से बाहर लटकते हाथ और सर देखे होंगे।

इतनी जल्दी देश नहीं बदलता। आशाएँ बहुत जल्दी बदलती हैं, देश को बनने में समय लगता है। देश को बनने दीजिए। इस आज़ादी के दिन का सम्मान कीजिए। अपने सवालों में विचार लाइए। सवाल पूछने से पहले अपनी ज़मीन तलाश लीजिए कि क्या आप अपना सवाल पूछ रहे हैं, या किसी ‘वाद’ या विचारधारा का।

आजादी को ले कर पिछले सालों में ‘हमको चाहिए आजादी’ की डफली खूब पीटी गई। ऐसी आजादी के केन्द्र में कभी भी भारतीय हिन्दू नहीं रहा। इस पूरी मुहिम का एकमात्र लक्ष्य हिन्दुओं को नीचा दिखाना, या उनके प्रतीकों पर आक्रमण था। इसलिए, मैं नीचे एक लिस्ट देने जा रहा हूँ कि एक भारतीय के तौर पर मुझे किस-किस से आजादी चाहिए।

वामपंथियों से आजादी

वामपंथी इस राष्ट्र का ही नहीं, विश्व के लिए एक कोढ़ के समान है। हर बीमारी की जड़ में यही वामपंथ या ऐसी ही विषैली सोच है जो आतंकियों, नक्सलियों, अपराधियों और आपाराधिक प्रवृत्ति के लोगों और संस्थाओं को प्रश्रय देती है। देशविरोधी ताकतों के ये वामपंथी बचाते हैं, और हर संभव कोशिश करते हैं कि भारत विखंडित हो कर बिखर जाए। इसलिए, इस विचारधारा की जड़ों में कन्सन्ट्रेटेड हायड्रोक्लोरिक अम्ल डालने की आवश्यकता है। इस विचारधारा का खात्मा विश्व कल्याण के लिए अत्यावश्यक है। हमें वामपंथियों से आजादी मिलनी चाहिए।

मीडिया गिरोह से आजादी

मीडिया का एक गिरोह जिस तरह से देश में चल रही हर योजना, हर बात में नकारात्मकता सिर्फ इसलिए खोज लेता है, क्योंकि सरकार उसके मतलब की नहीं है, ऐसे गिरोह से राष्ट्र को आजादी मिलनी चाहिए। दंगाइयों को ‘कवर फायर’ देने से ले कर ‘आपातकाल’ जैसे शब्दों को आवारा सांड के खेत में घुसने जैसा आम बनाने तक इस गिरोह ने जनता को कुछ भी बेहतर नहीं दिया। यह गिरोह सदैव वामपंथियों को एक प्लेटफ़ॉर्म देता रहा है, जहाँ से वो अपने जहर की बिक्री करते रहें। यही मीडिया गिरोह कई संदर्भों में दंगों को भड़काने में अहम भूमिका निभाता रहा है। एक समुदाय के भीतर ‘तुम्हें देश से भगाने की तैयारी हो रही है’ जैसी भावनाएँ डालने वाले लोग इसी गिरोह के हैं।

लिब्रांडुओं से आजादी

लिबरल ब्रीड ने जिस तरह से ‘लिबरल’ शब्द का गलत फायदा उठाया है, उसके कारण से इस शब्द को गाली की तरह देखा जाने लगा है। वैचारिक रूप से सबसे ज्यादा अनुदार लोग आज लिबरल कहे जाते हैं, जिनके लिए ‘मैं ही सही हूँ, पूरी दुनिया गलत है’ एक ध्येय वाक्य बन चुका है। इन लोगों से बोलने पर प्रतिबंध लगना चाहिए, क्योंकि ये कभी भी ढंग की बात नहीं कहते।

दंगाइयों से आजादी

दंगा करना कई लोगों का मजहबी कर्तव्य बन चुका है। छोटी-सी बात को अपने मन से ही आधार बना कर लोग सड़कों पर उतर आते हैं। पुलिस मजबूर सी दिखती है, क्योंकि उन्हें नेताओं के आदेशों से चलना पड़ता है। नेताओं को वोटबैंक से चलना होता है। दंगाइयों के कारण बंगाल में दो दिन में रेलवे की ₹250 करोड़ की संपत्ति जला दी गई, दिल्ली में कितने करोड़ गए, गिनती नहीं और लाशों की तो बात ही न की जाए। वही काम बेंगलुरु में उसी शैली में हुआ। इस पर सरकारों को सोचना होगा कि एक समुदाय के दंगों को कब तक ‘आहत होने’ के नाम पर झेला जाता रहेगा।

इस्लामी कट्टरपंथियों से आजादी

इस्लामी कट्टरपंथियों ने कई बार देश और दुनिया को धमाकों से ही नहीं, अपने विचारों से भी दहलाया है। छोटे बच्चों में दूसरे मजहब के खिलाफ घृणा भरी जाती है, पत्थर थमा दिए जाते हैं और सड़कों पर पैदल सैनिकों के रूप में उतारा जाता है। इस कट्टरपंथी सोच ने भारत में लाखों जानें ली हैं और सैकड़ों करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान किया है। ऐसी मजहबी संस्थाएँ चिह्नित की जानी चाहिए और उन्हें बंद किया जाना चाहिए ताकि भविष्य में देश जलने से भी बचे और पुलिस/सेना को छर्रों से उन पर फायरिंग न करनी पड़े।

छद्मसेकुलर लोगों से आजादी

सेकुलर शब्द को गाली बनाने वाले लोगों ने हर हिन्दूफोबिक बात को ही सेकुलर बना दिया है। हिन्दुओं की देवी-देवताओं पर पोस्टर, चुटकुले, सोशल मीडिया पोस्ट आदि बनाए जाते हैं, जो कि काफी घटिया स्तर के और अपमानजनक होते हैं। इसे ‘मतभिन्नता’ या ‘अभिव्यक्ति’ का नाम दे कर यही सेकुलर बचाने की कोशिश करते हैं। हालाँकि, हिन्दू या जुड़े हुए धर्मों के अलावा किसी और पर किसी ने अलग संदर्भ में भी कुछ कह दिया तो उसके गर्दन उतारने की बात को भी टीवी पर उचित ठहराया जाता है। तब यही सेकुलर गैंग ऐसी हिंसा को उचित ठहराता है कि ‘लिखना नहीं चाहिए था’। ये हर बार बताते हैं कि हिन्दुओं के खिलाफ नीचता चलेगी लेकिन इस्लाम पर एक टिप्पणी भी बर्दाश्त नहीं होगी। ऐसे सेकुलरों ने शब्द की परिभाषा बदल दी है। हमें इनसे आजादी चाहिए ताकि समाज में समान रूप से विचारों पर सामूहिक सहमति या असहमति बन सके।

टुटपुँजिया कॉमेडियन्स से आजादी

कॉमेडी के नाम पर जो अश्लीलता और हिन्दूघृणा परोसी जा रही है, वो सस्ती लोकप्रियता के लिए भले ही अच्छी हो, पर समाज के लिए नहीं है। भाषा की मर्यादा जैसी कोई चीज वैसे भी नहीं रही ऐसी जगहों पर, क्योंकि सुनने वाले भी कुंठित या अनभिज्ञ लोग होते हैं और सुनाने वालों को लगता है कि लोग उसके चुटकुलों पर हँस रहे हैं। वैसे, होता इसके उलट है कि लोग चुटकुलों पर नहीं, चुटकुलेबाजों द्वारा भरी सभा में माँ-बहन की गालियाँ दे सकने की बात पर हँसते हैं। इसके अलावा देवी-देवताओं और हिन्दू ग्रंथों पर बनते चुटकुलों का कोई ओर-अंत ही नहीं, क्योंकि हिन्दू सहिष्णु होता है और इन बातों को इग्नोर करता रहता है। ऐसे लोगों पर प्रतिबंध लगना चाहिए जिन्होंने हिन्दुओं की आस्था को उपहास का पात्र समझ लिया है। क्योंकि एक दिन हिन्दुओं का धैर्य टूट जाएगा और फिर कुछ ऐसा होगा जो उनकी कल्पना के परे होगी। वैसे कई बार ऐसे नकली चुटकुलेबाज राह चलते पीटे जा चुके हैं।

बोनस: नकली फैक्टचेकरों से आजादी

ऑल्टन्यूज जैसी संस्थाओं ने फैक्टचेक के नाम पर सिर्फ अजेंडा चलाया है। खास मजहब से जुड़ी हर खबर की फैक्टचेक कर के नामोनुरूप ‘ऑल्टरनेट’ फैक्ट पैदा करना इनका पेशा है। जामिया के दंगाइयों के हाथ के पत्थर को वॉलेट कहना हो या तब्लीगी जमात के लोगों द्वारा कोरोना फैलाने और थूकने आदि की खबरें, ऑल्टन्यूज ने पुरजोर कोशिश की कि उनका सत्य सामने न आए। साथ ही, सरकार को घेरने के लिए ऐसी संस्थाएँ किसी मृतक के परिवार को अपने फैक्टचेक का हिस्सा बनाने के लिए कोचिंग तक देते देखे गए हैं। ये लोग फैक्टचेक के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथी अजेंडा और वामपंथी विचारों को समाज में डालते रहते हैं। और हाँ, जब कुछ करने को न हो तो ये लोग इंटरनेट पर घूम रहे मीम्स और चुटकुलों का भी फैक्टचेक करते हैं ताकि लोगों को लगे कि ये कुछ कर रहे हैं। ऐसे अजेंडाबाज लोगों से भी राष्ट्र को आजादी मिलनी चाहिए जो नाम में फैक्टचेक लिखते हैं, और कुकर्म से ऑल्टरनेट फैक्ट पैदा करने में व्यस्त रहते हैं।

‘सुशांत की डायरी के कुछ पन्ने फाड़ डाले’: मुंबई पुलिस पर सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप

सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या मामले में सबूतों से छेड़छाड़ को लेकर मुंबई पुलिस पर एक और आरोप लगा है। सुशांत के चचेरे भाई और विधायक नीरज सिंह बबलू ने मुंबई पुलिस पर डायरी के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि डायरी के कुछ पन्ने फाड़ दिए गए हैं।

बबलू का कहना है कि सुशांत की मौत के बाद उन्होंने ही उसकी डायरी पुलिस को सौंपी थी। उन्होंने कहा कि सुशांत लंबे समय से डायरी लिखा करते थे। इसमें सुशांत के करियर प्लानिंग को लेकर सब कुछ था। वो कैसे हॉलीवुड में एंट्री लेते और फिल्में करते, इस बारे में पूरी योजना थी। उन्होंने कहा कि सुशांत हॉलीवुड मे जाने में सक्षम थे और 100 गरीब बच्चों को NASA में भी भेजना चाहते थे।

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में अपने सबमिशन में स्पष्ट कर दिया है कि इस केस को मुंबई पुलिस को ट्रांसफर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि वहाँ अब कुछ भी पेंडिंग नहीं है। रिया चक्रवर्ती ने इसके लिए याचिका डाली हुई है। मुंबई पुलिस पर ये भी आरोप लगा है कि उसने न सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत के फोन बल्कि अन्य गैजेट्स को भी फोरेंसिक जाँच के लिए भेजने में देरी की।

अब जब उनकी मौत के 2 महीने हो चुके हैं, नित नए खुलासों से मुंबई पुलिस की पोल खुल रही है। उनके फैंस ने आज ‘ग्लोबल प्रेयर्स फॉर SSR’ का भी आयोजन किया। उधर उनकी पूर्व गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे ने इन आरोपों को नकारा है कि सुशांत सिंह राजपूत उनके फ्लैट की EMI भर रहे थे। उन्होंने अपना बैंक स्टैट्मन्ट शेयर कर के दिखाया है कि EMI उनके ही अकाउंट से कट रहा था।

वहीं रिया चक्रवर्ती की कॉल डिटेल्स भी सामने आई है। इससे पता चला है कि 13 जून 2020 की रात रिया ने 5 लोगों को कॉल्स किए थे। 13 जून की शाम रिया ने 7:50 में कास्टिंग डायरेक्टर निशा चिटालिया को कॉल किया था। इस दौरान दोनों के बीच 1 मिनट की बात हुई थी। इसके बाद 8:53 पर रिया ने फिर निशा से बात की और इस दौरान दोनों के बीच 57 सेकेंड बातचीत हुई थी। 

रिया ने 9 बजकर 21 मिनट पर रूपा चड्ढा नामक महिला से फोन पर बातचीत की थी और दोनों की 7 मिनट 8 सेकेंड लंबी बात हुई। अंतिम कॉल रिया ने किसी AU नाम से रजिस्टर्ड नंबर पर कॉल की। दोनों की 1 मिनट 38 सेकेंड बात हुई थी। वहीं सुशांत के एक पूर्व ड्राइवर का चौंकाने वाला बयान आया है, जिसमें उसने दावा किया है कि सुशांत के बीमार रहने पर भी रिया पार्टी किया करती थी।

ड्राइवर ने बताया कि ऐसा उसने लोगों से सुना है कि जब सुशांत बीमार रहते थे, तब भी उनकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती पार्टियों में मशगूल रहती थी। उन्होंने अपना अनुभव बताते हुए लिखा कि ऐसे ही एक समय वे खुद रिया चक्रवर्ती, शौविक और सुशांत की बहन प्रियंका को पार्टी में लेकर गए थे। हालाँकि, प्रियंका इसके बाद दिल्ली चली गई थी। ड्राइवर ने ये भी बताया कि सुशांत अपनी बहन के काफी करीब थे।

उधर जिया खान की माँ राबिया खान ने सुशांत मामले में सीबीआई जाँच का समर्थन किया है। साथ ही महेश भट्ट को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया है कि जिया के अंतिम संस्कार के समय में महेश भट्ट ने उन्हें धमकाने की कोशिश की थी। जिया के अंतिम संस्कार पर भट्ट ने उनको कहा कि उनकी बेटी (जिया) डिप्रेशन में थी। उन्होंने इसका खंडन किया। लेकिन भट्ट ने उनसे कहा, “तुम चुप हो जाओ वरना तुम्हें भी इंजेक्शन देकर सुला देंगे।”

भारत में टेस्टिंग फेज में कोरोना की 3 वैक्सीन, रिकॉर्ड समय में 1400 लैब्स तैयार: लाल किला से PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 74वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शनिवार को लाल किला की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए ‘आत्मनिर्भर भारत‘ पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई की शुरुआत हुई है। कोरोना के समय में हमने देख लिया है कि डिजिटल भारत अभियान की क्या भूमिका रही है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले महीने ही करीब-करीब 3 लाख करोड़ रुपए का ट्रांजेक्शन अकेले BHIM UPI से हुआ है।

पीएम मोदी ने कहा कि भारत साइबर सुरक्षा के मामले में सचेत और सतर्क है। इन खतरों का सामना करने के लिए नई व्यवस्थाएं लगातार विकसित कर रहा है। देश में नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति का मसौदा तैयार कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि हमारा अनुभव कहता है कि भारत में महिला शक्ति को जब-जब भी अवसर मिले, उन्होंने देश का नाम रोशन किया, देश को मजबूती दी है।

राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि आज भारत में महिलाएँ अंडरग्राउंड कोयला खदानों में काम कर रही हैं तो लड़ाकू विमानों से आसमान की बुलंदियों को भी छू रही हैं। उन्होंने बताया कि देश के जो 40 करोड़ जन-धन खाते खुले हैं, उसमें से लगभग 22 करोड़ खाते महिलाओं के ही हैं। कोरोना के समय में अप्रैल-मई-जून, इन तीन महीनों में महिलाओं के खातों में करीब-करीब 30 हजार करोड़ रुपए सीधे ट्रांसफर किए गए हैं।

उन्होंने बताया कि जब कोरोना शुरू हुआ था तब हमारे देश में कोरोना टेस्टिंग के लिए सिर्फ एक लैब थी, जबकि आज देश में 1400 से ज्यादा Labs हैं। उन्होंने कहा कि आज से देश में एक और बहुत बड़ा अभियान शुरू होने जा रहा है। ये है नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन। पीएम ने विश्वास जताया कि नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन, भारत के हेल्थ सेक्टर में नई क्रांति लेकर आएगा।

बकौल पीएम मोदी, लोगों के हर टेस्ट, हर बीमारी, आपको किस डॉक्टर ने कौन सी दवा दी, कब दी, उनकी रिपोर्ट्स क्या थीं, ये सारी जानकारी इसी एक Health ID में समाहित होगी। उन्होंने बताया कि इस समय भारत में कोरोना की तीन वैक्सीन टेस्टिंग चरण में हैं। वैज्ञानिकों से हरी झंडी मिलते ही देश में बड़े पैमाने पर इन वैक्सीन के प्रोडक्शन की तैयारी भी पूरी कर ली गई है।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशवासियों को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि हमारे देश में अलग-अलग जगहों पर विकास की तस्वीर अलग-अलग दिखती है। कुछ क्षेत्र बहुत आगे हैं, कुछ क्षेत्र बहुत पीछे। कुछ जिले बहुत आगे हैं, कुछ जिले बहुत पीछे। ये असंतुलित विकास आत्मनिर्भर भारत के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। जम्मू-कश्मीर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने देशवासियों से कहा:

“ये एक साल जम्मू-कश्मीर की एक नई विकास यात्रा का साल है। ये एक साल जम्मू-कश्मीर में महिलाओं, दलितों को मिले अधिकारों का साल है! ये जम्मू-कश्मीर में शरणार्थियों के गरिमापूर्ण जीवन का भी एक साल है। लोकतंत्र की सच्ची ताकत स्थानीय इकाइयों में है। हम सभी के लिए गर्व की बात है कि जम्मू-कश्मीर में स्थानीय इकाइयों के जनप्रतिनिधि सक्रियता और संवेदनशीलता के साथ विकास के नए युग को आगे बढ़ा रहे हैं। बीते वर्ष लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाकर, वहाँ के लोगों की बरसों पुरानी माँग को पूरा किया गया है। हिमालय की ऊँचाइयों में बसा लद्दाख आज विकास की नई ऊँचाइयों को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है।“

स्वतंत्रता दिवस 2020 पर प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किला से देश को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार से सिक्कम ने ऑर्गैनिक स्टेट के रूप में अपनी पहचान बनाई है, वैसे ही आने वाले दिनों में लद्दाख, अपनी पहचान एक कार्बन न्यूट्रल क्षेत्र के तौर पर बनाए, इस दिशा में भी तेजी से काम हो रहा है। पीएम ने कहा कि दक्षिण एशिया में दुनिया की एक चौथाई जनसंख्या रहती है। हम सहयोग और सहभागिता से इतनी बड़ी जनसंख्या के विकास और समृद्धि की अनगिनत संभावनाएँ पैदा कर सकते हैं। इस क्षेत्र के देशों के सभी नेताओं की इस विशाल जन समूह के विकास और प्रगति की ओर एक अहम जिम्मेदारी है।

उन्होंने जानकारी दी कि देश के 100 चुने हुए शहरों में प्रदूषण कम करने के लिए एक holistic approach के साथ एक विशेष अभियान पर भी काम हो रहा है। साथ ही बताया कि हमारे पड़ोसी देशों के साथ, चाहे वो हमसे जमीन से जुड़े हों या समंदर से, अपने संबंधों को हम सुरक्षा, विकास और विश्वास की साझेदारी के साथ जोड़ रहे हैं। बकौल पीएम, 21वीं सदी के इस दशक में अब भारत को नई नीति और नई रीति के साथ ही आगे बढ़ना होगा। अब साधारण से काम नहीं चलेगा।

पीएम मोदी ने कहा कि हमारे देश में 1300 से ज्यादा द्वीप हैं। इनमें से कुछ चुनिंदा द्वीपों को, उनकी भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए, देश के विकास में उनके महत्व को ध्यान में रखते हुए, नई विकास योजनाएँ शुरू करने पर काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि अगले 1000 दिन में, लक्षद्वीप को भी सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल से जोड़ दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि अब NCC का विस्तार देश के 173 सीमाओं और समुद्री सीमा वाले जिलों तक सुनिश्चित किया जाएगा।

स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि इस अभियान के तहत करीब 1 लाख नए NCC कैडेट्स को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें भी करीब एक तिहाई बेटियों को ये स्पेशल ट्रेनिंग दी जाएगी। उन्होंने कहा कि आज भारत ने असाधारण समय में असंभव को संभव किया है। इसी इच्छाशक्ति के साथ प्रत्येक भारतीय को आगे बढ़ना है।

पीएम ने कहा कि कहा कि विकास के मामले में देश के कई क्षेत्र भी पीछे रह गए हैं। ऐसे 110 से ज्यादा आकांक्षी जिलों को चुनकर, वहाँ पर विशेष प्रयास किए जा रहे हैं ताकि लोगों को बेहतर शिक्षा मिले, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलें, रोजगार के बेहतर अवसर मिलें। उन्होंने जानकारी दी कि वोकल फॉर लोकल, Re-Skill और Up-Skill का अभियान, गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों के जीवनस्तर में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का संचार करेगा।

पीएम ने कहा कि मेरा हिंदुस्तान की सोच-अप्रोच पर भरोसा है। इतिहास गवाह है कि भारत एक बार ठान लेता है तो उसे करके रहता है। उन्होंने कहा कि भारत को आधुनिकता की तरफ तेज गति से ले जाने के लिए देश के Overall Infrastructure Development को एक नई दिशा देने की जरूरत है। इसके लिए ‘National Infrastructure Pipeline Project’ की घोषणा की गई।

‘मैंने अपनी माँ और भाई को जिंदा जलते देखा’: विभाजन की वो कहानी जिससे आज भी काँपते हैं बेअंत सिंह

1947 में 15 अगस्त को भारत को सिर्फ आजादी ही नहीं मिली थी, बल्कि विभाजन का एक ऐसा दंश भी मिला था जिससे देश अब तक उबर नहीं पाया है। एक कहानी बेअंत सिंह की भी है, जो मेरठ की गलियों में आपको रिक्शा चलाते दिख जाएँगे। 84 साल के बेअंत सिंह मेरठ के सबसे बुजुर्ग रिक्शा चालक हैं। अब उनके पाँवों ने जवाब देना शुरू कर दिया है, लेकिन वो अभी भी जीविका के लिए रिक्शा चलाते हैं।

‘न्यूज 18’ की खबर के अनुसार, बेअंत सिंह का ब्लड प्रेशर सही नहीं रहता है, उनके फेफड़े अब पहले की तरह नहीं रहे और उनकी आँखों पर सफेद रंग के धब्बे नजर आते हैं। लेकिन, 7 दशक पहले का वो दृश्य उनके सामने ज्यों का त्यों कौंध जाता है, जब उनकी माँ और भाई को उनके सामने ही जला डाला गया था। वह पल आज भी उनकी जेहन में इस तरह कैद है जैसे कल की ही बात हो। उस घटना के बारे में बाते करते हुए वे रो पड़ते हैं।

रिक्शा चालक बेअंत सिंह ने विभाजन को न सिर्फ देखा है. बल्कि उन्होंने और उनके परिवार ने इस त्रासदी को झेला भी था। उनका मानना है कि भारत ने विभाजन की त्रासदी को भुला दिया है। 22 जनवरी 1936 को जन्मे बेअंत सिंह ने जम्मू-कश्मीर में राजा हरि सिंह के राज में अपनी शुरुआती ज़िंदगी बिताई थी। लेकिन आर्थिक संकट और सिखों पर अत्याचार के कारण उनके परिवार को रावलपिंडी शिफ्ट होना पड़ा था।

उस समय के स्वतंत्रता सेनानियों भगत सिंह, महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के प्रशंसक रहे छोटे बेअंत अक्सर रेडियो पर इन नेताओं को सुन कर स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में अधिक से अधिक जानकारी लेना चाहते थे। आजादी तो आई लेकिन इसके लिए न सिर्फ भारत, बल्कि सिंह को भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। जब नेहरू आजादी के बाद अपना ऐतिहासिक भाषण दे रहे थे, तब बेअंत सिंह मात्र 11 साल के थे।

जब उनके परिवार पर हमला हुआ था तब वो किसी तरह वहाँ से भागने में कामयाब हुए। इस दौरान उनकी मुलाकात एक सैन्य अधिकारी से हुई जिसने उन्हें अमृतसर की ट्रेन पर बिठा दिया। पाकिस्तान से प्रताड़ित कर भगाए गए शरणार्थियों को अमृतसर में ही रखा जा रहा था। इसके बाद एक भारतीय के रूप में बेअंत सिंह की दूसरी ज़िंदगी शुरू हुई। जब वो दिल्ली पहुँचे तो उन्होंने अजीब ही नजारा देखा।

उन्होंने देखा कि दिल्ली में विभाजन के बाद काफी बुरी स्थिति थी और लोग नई ज़िंदगी व रोजगार के लिए तरस रहे थे। विभाजन का दंश झेलने वालों का कोई माई-बाप नहीं था। वो कहते हैं कि वहाँ भीड़ ही भीड़ थी, लेकिन करने को कोई काम नहीं था, जिससे जीविका चल पाए। इसके बाद वो रावलपिंडी के अपने पुराने दोस्तों से मिले, जो विभाजन के बाद उत्तर प्रदेश में बस गए थे। उन्होंने ही बेअंत को भोजन और छत दिया, जीविका के लिए रिक्शा दिया।

आज 84 साल के बेअंत सिंह रिक्शा चला कर बचाए गए धन से ही अपना गुजारा चलाते हैं। वो बताते हैं कि शुरुआत में उनके पास लाइसेंस नहीं था तो उन्हें रात के अँधेरे में रिक्शा चलाना पड़ता था। वो कहते हैं कि अगर उनके पास रिक्शा नहीं होता तो पता नहीं आज उनकी क्या स्थिति होती। मेरठ में रहने वाले बेअंत सिंह आजकल की खबरों पर भी नजर रखते हैं और हालिया आपराधिक घटनाओं से नाराज भी हैं।

ज्ञात हो कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों की विस्थापन हुआ था। इस दौरान करीब 6,00,000 लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दीवार से फोड़ दिए गए, बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काट दिए गए और गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।

ऑप्टिकल फाइबर से जुड़ी 1.5 लाख पंचायतें, कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ₹1 लाख करोड़: PM मोदी का ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किला की प्राचीर से राष्ट्र को सम्बोधित किया। सम्बोधन की शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कोरोना के इस असाधारण समय में, ‘सेवा परमो धर्म:’ की भावना के साथ, अपने जीवन की परवाह किए बिना हमारे डॉक्टर्स, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ, एंबुलेंस कर्मी, सफाई कर्मचारी, पुलिसकर्मी, सेवाकर्मी, चौबीसों घंटे लगातार काम कर रहे हैं।

पीएम मोदी ने 74वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने सम्बोधन के दौरान याद दिलाया कि अगले वर्ष हम अपनी आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर जाएँगे, एक एक बहुत बड़ा पर्व हमारे सामने है। उन्होंने याद किया कि गुलामी का कोई कालखंड ऐसा नहीं था जब हिंदुस्तान में किसी कोने में आजादी के लिए प्रयास नहीं हुआ हो, प्राण-अर्पण नहीं हुआ हो।

उन्होंने कहा कि उस कालखंड में विस्तारवाद की सोच वालों ने दुनिया में जहाँ भी फैल सकते थे, फैलने की कोशिश की। लेकिन भारत का आजादी आंदोलन दुनिया में एक प्रेरणा पुंज बन गया, दिव्य स्तंभ बन गया और दुनिया में आजादी की अलख जगी। पीएम मोदी ने कहा कि आजादी का पर्व हमारे लिए आजादी के वीरों को याद करके नए संकल्पों की ऊर्जा का एक अवसर होता है। ये हमारे लिए नई उमंग, उत्साह और प्रेरणा लेकर आता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भीषण युद्धों और भयानकता के बीच भी भारत ने आजादी की जंग में कमी और नमी नहीं आने दी। ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते हुए पीएम मोदी ने पूछा कि आखिर कब तक हमारे ही देश से गया कच्चा माल, फिनिश्ड प्रोडक्ट बनकर भारत में लौटता रहेगा? उन्होंने याद किया कि एक समय था, जब हमारी कृषि व्यवस्था बहुत पिछड़ी हुई थी। तब सबसे बड़ी चिंता थी कि देशवासियों का पेट कैसे भरे।

पीएम मोदी ने आश्वासन दिया कि आज जब हम सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों का पेट भर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने समझाया कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब सिर्फ आयात कम करना ही नहीं, हमारी क्षमता, हमारी क्रिएटिविटी और हमारी स्किल्स को बढ़ाना भी है।

उन्होंने अंतरिक्ष सेक्टर को प्राइवेट प्लेयर्स के लिए खोलने की बात करते हुए कहा कि इससे काफी रोजगार पैदा होंगे ।उन्होंने बलिदानियों को नमन करते हुए कहा कि आज जो हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, उसके पीछे माँ भारती के लाखों बेटे-बेटियों का त्याग, बलिदान और माँ भारती को आजाद कराने के लिए समर्पण है।

74वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्बोधन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना महामारी के बीच 130 करोड़ देशवासियों ने आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लिया। आत्मनिर्भर भारत देशवासियों के मन-मस्तिष्क में छाया है। ये आज सिर्फ शब्द नहीं रहा, बल्कि 130 करोड़ देशवासियों के लिए मंत्र बन गया है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत आत्मनिर्भर के सपने को चरितार्थ करके रहेगा। उन्होने देश की प्रतिभा, सामर्थ्य, युवाओं, मातृ-शक्तियों पर भरोसा जताया।

पीएम ने कहा कि मेरा हिंदुस्तान की सोच-अप्रोच पर भरोसा है। इतिहास गवाह है कि भारत एक बार ठान लेता है तो उसे करके रहता है। उन्होंने कहा कि भारत को आधुनिकता की तरफ तेज गति से ले जाने के लिए देश के Overall Infrastructure Development को एक नई दिशा देने की जरूरत है। इसके लिए ‘National Infrastructure Pipeline Project’की घोषणा की गई। प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में कहा:

“आज दुनिया की बहुत बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ भारत का रुख कर रही हैं। हमें ‘Make in India’ के साथ-साथ ‘Make for World’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ना है। वन नेशन-वन टैक्स Insolvency और Bankruptcy Code बैंकों का मर्जर, आज देश की सच्चाई है। इस शक्ति को, इन रिफॉर्म्स और उससे निकले परिणामों को देख रही है। बीते वर्ष भारत में FDI ने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। भारत में FDI में 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ये विश्वास ऐसे ही नहीं आता है। कौन सोच सकता था कि कभी देश में गरीबों के जनधन खातों में हजारों-लाखों करोड़ रुपए सीधे ट्रांसफर हो पाएँगे? कौन सोच सकता था कि किसानों की भलाई के लिए APMC एक्ट में इतने बड़े बदलाव हो जाएँगे। सिर्फ कुछ महीना पहले तक N-95 मास्क, PPE किट, वेंटिलेटर ये सब हम विदेशों से मँगाते थे। आज इन सभी में भारत, न सिर्फ अपनी जरूरतें खुद पूरी कर रहा है, बल्कि दूसरे देशों की मदद के लिए भी आगे आया है।“

स्वतंत्रता दिवस सम्बोधन में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज देश अनेक नए कदम उठा रहा है, इसलिए आप देखिए स्पेस सेक्टर को खुला कर दिया, देश के युवाओं को अवसर मिल रहा है। हमने कृषि क्षेत्र को बंधनों से मुक्त कर दिया। हमने आत्मनिर्भर भारत बनाने का प्रयास किया है। पीएम ने कहा कि आज दुनिया इंटर-कनेक्टेड है, इसलिए समय की माँग है कि विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान बढ़ाना चाहिए, इसके लिए भारत को आत्मनिर्भर बनना ही है।

पीएम मोदी ने देशवासियों से कहा कि जब हमारा अपना सामर्थ्य होगा तो हम दुनिया का कल्याण भी कर पाएँगे। उन्होंने समझाया कि आत्मनिर्भर भारत का मतलब सिर्फ इंपोर्ट को कम करना ही नहीं है, बल्कि हमारे सामर्थ्य के आधार पर अपने कौशल को बढ़ाना है। आत्मनिर्भर भारत में कई चुनौतियाँ होंगी, लेकिन अगर ये चुनौतियाँ हैं तो देश के पास करोड़ों समाधान देने वाली शक्ति भी है।

उन्होंने कहा कि विकास के मामले में देश के कई क्षेत्र भी पीछे रह गए हैं। ऐसे 110 से ज्यादा आकांक्षी जिलों को चुनकर, वहाँ पर विशेष प्रयास किए जा रहे हैं ताकि लोगों को बेहतर शिक्षा मिले, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलें, रोजगार के बेहतर अवसर मिलें। उन्होंने जानकारी दी कि वोकल फॉर लोकल, Re-Skill और Up-Skill का अभियान, गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों के जीवनस्तर में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का संचार करेगा।

कृषि सेक्टर की बात करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस सम्बोधन में बताया कि आत्मनिर्भर भारत की एक अहम प्राथमिकता है- आत्मनिर्भर कृषि और आत्मनिर्भर किसान। पीएम मोदी ने बताया कि देश के किसानों को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर देने के लिए कुछ दिन पहले ही एक लाख करोड़ रुपए का ‘एग्रीकल्चर इनफ्रास्ट्रक्चर फंड’ बनाया गया है। उन्होंने बताया कि ‘जल जीवन मिशन’ के तहत आज हर रोज एक लाख से ज्यादा घरों को पानी के कनेक्शन से जोड़ने में सफलता मिल रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में, आधुनिक भारत के निर्माण में, नए भारत के निर्माण में, समृद्ध और खुशहाल भारत के निर्माण में, देश की शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व है। इसी सोच के साथ देश को एक नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति मिली है। उन्होंने कहा कि कोरोना के समय में हमने देख लिया है कि डिजिटल भारत अभियान की क्या भूमिका रही है। अभी पिछले महीने ही करीब-करीब 3 लाख करोड़ रुपए का ट्रांजेक्शन अकेले BHIM UPI से हुआ है।

उन्होंने कहा कि मध्यम वर्ग से निकले प्रोफेशनल्स भारत ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी धाक जमाते हैं। मध्यम वर्ग को अवसर चाहिए, मध्यम वर्ग को सरकारी दखलअंदाजी से मुक्ति चाहिए। ये भी पहली बार हुआ है जब अपने घर के लिए होम लोन की EMI पर भुगतान अवधि के दौरान 6 लाख रुपए तक की छूट मिल रही है। उन्होंने याद दिलाया कि अभी पिछले वर्ष ही हजारों अधूरे घरों को पूरा करने के लिए 25 हजार करोड़ रुपए के फंड की स्थापना हुई है।

प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि साल 2014 से पहले देश की सिर्फ 5 दर्जन पंचायतें ऑप्टिल फाइबर से जुड़ी थीं। बीते 5 साल में देश में डेढ़ लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया है। उन्होंने जानकारी दी कि आने वाले 1000 दिन में देश के हर गॉंव को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा जाएगा। साथ ही बताया कि देश में नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति का मसौदा तैयार कर लिया गया है।

Live Video: घर बैठे देखें भारत का 74वाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लाल किले से सम्बोधन

भारत शनिवार (अगस्त 15, 2020) को अपना 74वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार 7वीं बार ध्वजारोहण करेंगे। कोरोना वायरस संक्रमण आपदा के कारण इस बार लाल किले पर होने वाले समारोह में लोगों की उपस्थिति बहुत कम होगी। लाल किले के लाहौर दरवाजे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया।

नीचे आप स्वतंत्रता दिवस समारोह के कार्यक्रम को लाइव देख सकते हैं। कोरोना वायरस के कारण स्कूल-कॉलेज भी बंद हैं और कई जगह जहाँ झंडोत्तोलन होते आ रहे थे, वहाँ इस बार नहीं होंगे। ऐसे में आप घर बैठ कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए जा रहे झंडोत्तोलन का गवाह बनते हुए उनके सम्बोधन को सुन सकते हैं। नीचे हम लाल किले पर होने वाले वार्षिक स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का लाइव वीडियो पेश कर रहे हैं:

देखें प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी के राष्ट्र को सम्बोधन (लाइव)

हालाँकि, इस बार भी अधिकारियों और नेताओं को मिला कर स्वतंत्रता दिवस समारोह में उपस्थित लोगों की संख्या 4000 है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि इस अवसर पर हमें ‘आत्मनिर्भर भारत’ के पीएम मोदी के संकल्प को पूरा करने पर जोर देना चाहिए। राजनाथ सिंह ने भी कहा कि स्वतंत्रता सही मायनों में तभी साकार होगी जब हम पूरी तरह आत्मनिर्भर बन जाएँगे। उन्होंने इसके लिए शपथ लेने की बात कही।

पीएम मोदी ने लाल किले पर झंडा फहराने से पहले राजघाट पर जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को श्रद्धांजलि दी और उनके समाधि की प्ररिक्रमा की। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से भी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई दी।

राम मंदिर भूमिपूजन के बाद पहली स्वतंत्रता दिवस के मायने, क्योंकि अयोध्या से आगे मथुरा-काशी भी है…

गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है;

राम चरित सत कोटि अपारा, श्रुति सारदा न बरनै पारा

वाल्मीकि रामायण से राधेश्याम रामायण तक। लोमश संहिता के रामायण से रामकीर्ति महाकाव्य तक। नेपाल के भानुभक्त कृत रामायण से तुर्की के खोतानी रामायण तक। पूरी दुनिया में 300 से अधिक रामायण हैं। भारत समेत दुनिया के 10 देशों की करीब दो दर्जन भाषाओं में रामायण के 3000 से अधिक संस्करण हैं।

इन सब रामकथाओं के मूल में मानवता, कर्तव्यनिष्ठा, धर्मपरायणता, तितिक्षा और करुणा का वही भाव है, जो सनातन धर्म अपने में समेटे हैं। यह, ‘उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं, वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र संततिः’ के कण-कण में विराजमान है।

जाहिर है, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में जो कुछ हुआ वह महज एक पूजा स्थल का शिलान्यास ही नहीं था। इसी तरह 11 अगस्त 2020 की रात बेंगलुरु में जो कुछ हुआ वह ​केवल एक भीड़ की हिंसा नहीं थी। मंदिर के सामने बनी वह मानव श्रृंखला उतनी ही उदार और निश्चल नहीं थी, जितनी हमारी मीडिया ने हमें बताया।

सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक तरफ है करीब 1000 साल से चल रहा छल, प्रपंच और जोर। दूसरी तरफ है हिंदुओं का वह नैतिक बल, जिसका पहला पड़ाव सोमनाथ का पुनरुद्धार था। वह भारतीय चेतना, जिसकी अप्रतिम ऊर्जा अयोध्या है। वह सनातनी संस्कृति, जिसका प्रकाश पुंज मथुरा-काशी है।

पिलग्रिमेज टू फ्रीडम (Pilgrimage To Freedom) में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने कहा है, “मेरे लिए उस आजादी का कोई मूल्य नहीं है जो मुझे भगवद्गीता से वंचित कर दे या मेरे जैसे लाखों लोगों के मन में मंदिरों के प्रति आस्था को उखाड़ फेंके। मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के सपने को जीने और उसे साकार करने का विशेषाधिकार दिया गया है।”

सोमनाथ पुनरुद्धार को लेकर नेहरू को मुंशी का जवाब

यदि सोमनाथ सनातन सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक था, तो अयोध्या का राम मंदिर सनातन चेतना की स्वतंत्रता का प्रतीक है। जैसा कि पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. डेविड फ्राउली कहते हैं, “5 अगस्त 2020 को राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की नींव 1947 के बाद भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तिथि है। यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिकता की स्वतंत्रता का प्रतीक है।”

सोमनाथ में विध्वंस के अवशेष (1895) साभार: The British Library Board

एक लेख में विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने लिखा है, “अयोध्या में बनने जा रहा मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं होगा, बल्कि यह भारत में रामत्व यानी स्वाभिमान, समरसता, समृद्धि, सुख, शांति और सौहार्द की स्थापना करेगा। यह विशाल मंदिर भारत के विराट स्वरुप का दर्शन भी कराएगा।”

सोमनाथ, सनातन सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक

स्पष्ट है कि अयोध्या का राम मंदिर हिंदुओं के 500 साल के संघर्ष की केवल तार्किक परिणति भर भी नहीं है। यह उस खतरे से मुक्ति का मार्ग है, जिसका जिक्र नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से बरसों पहले किया था। अमेरिका के 9/11 के हमले के बाद ‘इस्लामिक आतंकवाद’ विषय पर एक टीवी डिबेट के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पूरी दुनिया के लिए इस्लाम का एक रोडमैप है। इसके तीन हिस्से हैं;

  • दारुल अमन
  • दारुल हरम
  • दारुल इस्लाम

भारत में पिछले 1000 सालों से जो कुछ हो रहा वह दारुल हरम का हिस्सा है। वरना क्या कारण था कि भारत के शासन सूत्रों पर कब्जा होने के बावजूद इस्लामिक आक्रांताओं ने हमारे मंदिरों का विध्वंस किया? जहाँ पहले से हमारे देवी-देवता विराजमान थे, उन्हीं जगहों को मस्जिद के लिए चुना?

वे तब भी उसी मिशन पर थे, जो कल हमने बेंगलुरु में देखा, परसों कहीं और देखा था, कल कहीं और देखेंगे। इसका स्वरुप अलग हो सकता है पर संदेश हर बार एक ही होता है। वह संदेश है, बुतपरस्ती हराम है। इस्लाम न मानने वाला काफिर है। काफिरों की हत्या जायज है। पूरी दुनिया को दारुल इस्लाम बनाना है।

क्या ‘एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ की संस्कृति केवल दारुल इस्लाम से ही मुकाबिल है?

यकीनन, नहीं। मुकाबला एक चौकड़ी से है। इसमें दारुल इस्लाम की सोच के साथ-साथ वामपंथी इतिहासकारों का फरेब, तुष्टिकरण की राजनीति और ईसाई मिशनरी भी शामिल हैं।

जैसा कि डॉ. फ्राउली कहते हैं, “भारत की प्राचीन और विशाल संस्कृति को वामपंथ के नजरिए से समझना वैसा ही है, जैसे कुएँ के मेढ़क से समुद्र को समझना।” अयोध्या का 500 साल का संघर्ष इसका प्रमाण है। वहाँ राम जन्मभूमि का एक इस्लामी अक्रांता ने विध्वंस किया। लेकिन आजाद भारत में भी उसे जायज ठहराने वाले और राम के अस्तित्व को नकारने वाले वामपंथी इतिहासकार और नेहरू पोषित राजनीति ही थी।

महमूद गजनी ने जब भारत के मंदिरों को लूटा, उनका विध्वंस किया तो उसका जश्न बगदाद के खलीफा और वहाँ के मजहब के समर्थकों ने मनाई थी। उसकी तुलना अरब, सीरिया, ईरान, इराक वगैरह में इसी तरह की फतह हासिल करने वाले नबी के साथियों से हुई। लेकिन, भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने मजहबी उन्माद के विमर्श को ही नेपथ्य में धकेल दिया। हमारी आस्था और हमारे पवित्र जगहों पर प्र​हार को ‘लूट’ का नाम दे दिया। कहा कि इन हमलों के पीछे कोई मजहबी मकसद नहीं था। उस समय भारत सोने की खान था, इसके कारण हमला हुआ। सोना मंदिरों में संरक्षित किया जाता था, इसलिए वे निशाना बने।

इंदिरा गाँधी को 1932 में लिखे एक पत्र में नेहरू ने भी इसी सिद्धांत की पैरवी की थी। उनके मुताबिक गजनी वास्तुकला का मुरीद था और उसने मथुरा के मंदिरों की वास्तुकला की बेहद प्रशंसा की थी। लेकिन, नेहरू ने यह नहीं बताया कि इसी गजनी ने सन् 1018 में मथुरा के सारे मंदिरों का ध्वंस कर दिया था। उसके जाने के बाद फिर से मंदिर बने और उनका भी बाद के इस्लामिक अक्रांताओं ने विध्वंस कर दिया। ऐसा ही काशी में हुआ। मथुरा में आज जहाँ शाही ईदगाह मस्जिद खड़ी है, वह श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है। इसी तरह काशी का ज्ञानवापी मस्जिद ध्वस्त किए गए मंदिर पर खड़ा है।

लेकिन नेहरू और वामपंथ पोषित राजनीति और इतिहास की दृष्टि ने स्वतंत्र भारत में भी इस्लाम के नाम पर हर ध्वंस, हर हिंसा को जायज बनाया। जिसने भी इस्लामिक आक्रांताओं के मूर्ति भंजन और हिंदुओं की प्रताड़ना को उजागर किया उसे ‘सांप्रदायिक’ का तमगा दिया गया। धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय अखंडता के लिए खतरा करार दिया गया। सो, ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि आज भी सुनियोजित तरीके से जमा हुए, हिंसा के लिए निकली मजहबी भीड़ को नेपथ्य में धकेल कर बताया जा रहा है कि वह देखो मंदिर बचाने के लिए शांतिप्रिय समुदाय की मानव श्रृंखला।

ऐसे में अयोध्या का राम मंदिर, हिंदू होकर जीने के इस जटिलता से मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता है। जैसा कि पत्रकार ज्ञानेंद्र बरतरिया ने एक लेख में कहा है, “अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का अर्थ है एक युग की समाप्ति और एक नए युग की शुरुआत। यह नया युग भारत के भाग्योदय का है। यह मंदिर ऐसी ऊर्जा पैदा करेगा, जिससे एक नए भारत का निर्माण होगा।”

उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की बाध्यता रहते यह निर्माण अधूरा है।

क्या है प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट?

अयोध्या से रामलला को बेदखल करने के नेहरू के प्रयासों से आप परिचित हैं। जब राम मंदिर का आंदोलन अपने चरम पर था तो कॉन्ग्रेस ने 1991 के चुनावी घोषणा-पत्र में अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के तहत एक कानून का वादा किया। इसका मकसद उन पवित्र भूमि पर हिंदुओं का दावा खत्म करना था, जिसका विध्वंस इस्लामिक अक्रांताओं ने किया था। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि जब घोषणा-पत्र में यह वादा किया गया था, तब राजीव गाँधी कॉन्ग्रेस के सर्वेसर्वा थे। उनकी हत्या चुनाव प्रचार के दौरान हुई थी।

चुनावों के बाद जब 1991 में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी तो मॉनसून सत्र में एक बिल लाया गया। तब के गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण ने लोकसभा में बहस के दौरान इस बिल को भारत के प्रेम, शांति और आपसी भाईचारे के महान संस्कारों का सूचक बताया था। 18 सितंबर 1991 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह बिल कानून बन गया। इसे ही हम आज प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट या उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 के नाम से जानते हैं।

अदालत में होने के कारण अयोध्या विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। यही कारण है कि बीते साल इस मामले में तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट फैसला दे पाई। लेकिन, मथुरा-काशी की राह में यह कानून बड़ी अड़चन है। इस कानून के अनुसार 15 अगस्त 1947 को देश में धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी, वही बनी रहेगी।

हम, ‘एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ को मानने वाले लोग हैं। बहुसंख्यक होते हुए भी अपनी आस्था थोपने वाले लोग नहीं हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन करने वाले लोग हैं। ऐसा नहीं होता तो बेंगलुरु की सड़कों पर हमें होना था, क्योंकि फेसबुक पोस्ट हमारी आस्था को चोट कर किया गया था। लेकिन, सुनियोजित तरीके से उतरे जिहाद में यकीन करने वाले वे लोग जिनके लिए कथित तौर पर इस पोस्ट के जवाब में एक कमेंट किया गया था। ऐसे में हमारे पास अपनी पवित्र भूमि को इस्लामिक अताताइयों की छाया से मु​क्त कराने का मार्ग कानूनी रास्ते से ही निकलेगा। इसके लिए जरूरी है, प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की वैधता का खत्म होना।

कैसे खत्म होगा कानून?

सुप्रीम कोर्ट के वकील शशांक शेखर झा ने ऑपइंडिया को बताया, “झूठे सेकुलरिज्म के नाम पर आए इस कानून का काम है कि देश इस्लामिक आक्रांताओं को भूल जाए। सभी दंश भूल जाए। कभी भी उन मंदिरों पर अपना दावा ना करे जो एक समय मे हिंदुओं के पूजनीय स्थल थे और इस्लामिक आक्रमणकारियों ने बल व छल से जिन पर कब्जा कर लिया।”

उन्होंने कहा, “कायदे से होना तो यह चाहिए था कि देश स्वतंत्र होने के बाद ऐसे सभी जगहों को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए था। लेकिन वोट बैंक के लालच में इस कंलकित कानून को संसद से पास कर दिया गया।” झा ने बताया कि अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि 1991 का उपासना स्थल अधिनियम साफ करता है कि 15 अगस्त 1947 के दिन तक जिस भी पूजा स्थल की जो भी स्थिति है, उसमें कोई धार्मिक बदलाव की इजाजत नहीं है। इसलिए इन मामलों से जुड़े सभी मुकदमे अब खत्म माने जाएँगे।

उन्होंने कहा, “स्पष्ट है कि इस कानून के रहते मथुरा-काशी की यथास्थिति नहीं बदली जा सकती, जबकि इस कानून की नींव ही गलत है। संघीय ढाँचे के अनुसार भी यह कानून अनैतिक है। कानूनन तीर्थ स्थल, शमशान घाट व अन्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उनके कानून राज्य ही बना सकता है।” उन्होंने बताया कि यदि मोदी सरकार चाहे तो इस अनैतिक कानून को खत्म कर सकती है। इसके लिए उसके पास लोकसभा में बहुमत है। राज्यसभा में बीजेडी, एआईडीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से वह ऐसा कर सकती।

कानूनी जानकारों अनुसार सरकार चाहे तो अध्यादेश के जरिए भी अल्पकालिक तौर पर इस कानून की बाध्यता खत्म कर सकती है। लेकिन इसमें उसे मुश्किल हो सकती है क्योंकि उसे यह भी बताना होगा कि अध्यादेश लाना जरूरी था और विलंब नहीं किया जा सकता था। ऐसे में संसद के जरिए पूर्ण रूप से इस कानून को हटाना सबसे बेहतर विकल्प है।

मथुरा-काशी यानी बचे-खुचे वामपंथ का पिंडदान

मथुरा-काशी भी अयोध्या की तरह महज एक मंदिर नहीं हैं। यही कारण है कि तीनों भूमि की मुक्ति का खाका भी एक साथ ही खींचा गया था। जिस दिन मथुरा-काशी मुक्त होगी, उस दिन बचे खुचे वामपंथ का भी पिंडदान हो जाएगा। वैसे भी राम, कृष्ण और महादेव का नाम मनुष्य की चेतना को मुक्त करता है। उसे बाँध कर कुंठित नहीं करता। इसी से फैज जैसों की मुक्ति का मार्ग भी निकलेगा, जो कहते हैं कि राम हमारे पूर्वज थे।

इसके लिए जरूरी है कि हम आप भी सिकुलर और लिबरल बहस के झाँसे में न आएँ। जो विचार सनातन आस्था और संस्कृति में यकीन नहीं करता, वह भारत के भौगोलिक अस्तित्व के लिए भी उतना ही खतरनाक है, जितना हमारे अस्तित्व के लिए।

यदि हम ऐसा नहीं कर पाए तो वे हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी संस्कार, साहित्य और मानवता बाबर के मार्फत सिखलाते रह जाएँगे।

याद रखिएगा, गोस्वामी तुलसीदास विनय पत्रिका में लिखकर गए हैं;

जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि प्रेम सनेही।।

अब तजने की बारी आपकी है।

पाकिस्तान भी 15 अगस्त को ही स्वतंत्र हुआ था, फिर हर साल 14 अगस्त को क्यों मनाता है आज़ादी का जश्न?

शनिवार (अगस्त 15, 2020) को भारत अपना 74वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से इस बार अन्य सालों के मुकाबले जश्न कुछ फीका है। इससे एक दिन पहले पाकिस्तान ने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया था।

अब आप सोच रहे होंगे कि भला पाकिस्तान हमसे पहले क्यों आज़ाद हो गया, या फिर पाकिस्तान के प्रति ब्रिटिश ज्यादा मेहरबान थे? जैसा कि हमें पता है, भारत की आज़ादी से पहले ही ‘पाकिस्तान मूवमेंट’ शुरू हो गया था, जिसमें इस्लाम मानने वालों के लिए एक अलग मुल्क पाकिस्तान की माँग की गई थी। ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ ने मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में देश भर में इसके लिए अभियान चलाया था।

1947 में 14 अगस्त के दिन रमज़ान महीने के 26वाँ दिन था। रमजान के 27वें दिन के पहले की शाम और रात को इस्लाम में काफी पवित्र माना गया है। इसके पीछे कहा गया है कि इसी दिन अल्लाह ने फ़रिश्ते गेब्रियल के जरिए पैगम्बर मुहम्मद को कुरान का ज्ञान दिया था, इसीलिए इसे ‘लायलत-अल-कद्र’, अर्थात प्रकाश और सौभाग्य वाली रात करार दिया गया। इस्लाम के शिया और अहमदिया सेक्ट के लोगों को प्रताड़ित करने वाले पाकिस्तान में तभी से सुन्नियों का वर्चस्व रहा है।

सुन्नी ही इस दिन को सबसे ज्यादा पवित्र मानते हैं, क्योंकि धरती पर कुरान का ज्ञान आने के लिए इस्लाम के अलग-अलग पंथों में अलग-अलग तारीखों को पवित्र माना जाता है। अगस्त 14, 1947 को वही शाम थी जब ब्रिटिश ने पाकिस्तान नाम के एक अलग मुल्क को औपचारिक रूप से सत्ता हस्तांतरित की, लेकिन इस दिन समारोह हुआ था जो माउंटबेटन की मज़बूरी थी। वहीं भारत को सत्ता हस्तांतरित करने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन ने अगस्त 15,1947 का दिन मुक़र्रर किया।

दरअसल, इस दिन 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इसी दिन जापान ने आत्मसमर्पण किया था, इसीलिए ब्रिटिश को ये दिन खासा प्रिय था। जापान के सम्राट द्वारा आत्मसमर्पण की घोषणा के बाद ही द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति की ओर चल निकला था। हालाँकि, इस पर औपचारिक हस्ताक्षर सितम्बर 2, 1945 को हुई थी। अमेरिका और ब्रिटिश ने चीन के साथ मिल कर जापान के आत्मसमर्पण की शर्त रखी थी और जापान की नौसेना भी किसी बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने में अक्षम नज़र आ रही थी।

एक और कारण ये है कि लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत की स्वतंत्रता से एक दिन पहले पाकिस्तान के गठन एवं स्वतंत्रता का निर्णय इसीलिए लिया क्योंकि वो दोनों ही देशों के समारोहों में हिस्सा लेना चाहते थे और एक ही दिन में ऐसा करना संभव नहीं था। इसीलिए उन्होंने दो अलग-अलग दिन मुक़र्रर किया। लेकिन, यहाँ एक और पेंच है। दरअसल, अगर आप ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947’ को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि भारत और पकिस्तान, दोनों की आज़ादी की आधिकारिक तारीख अगस्त 15, 1947 ही है।

इसमें लिखा है कि इसी दिन भारत और पाकिस्तान नाम के दो Dominions का जन्म हुआ। पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी जब अपने मुल्क को सम्बोधित किया तो उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि संप्रभु एवं आज़ाद मुल्क पाकिस्तान का जन्मदिन 15 अगस्त को मनाया जाएगा। इस तरह से देखा जाए तो पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस गलत तारीख पर मनाता आ रहा है, क्योंकि अपने भाषण में जिन्ना ने स्पष्ट रूप से इस तारीख का जिक्र किया था। आधिकारिक रूप से 15 अगस्त ही वो तारीख है।

दरअसल, इंडियन इंडिपेंडेंस बिल को ब्रिटिश संसद में 4 जुलाई को पेश किया गया था। इसे 15 जुलाई को क़ानून का रूप दिया गया एवं 14-15 की अर्द्धरात्रि से भारत एवं पाकिस्तान की आज़ादी की घघोषणा की गई। पेंच ये था कि लॉर्ड माउंटबेटन को व्यक्तिगत रूप से दोनों देशों के समारोहों में उपस्थित रह कर औपचारिक रूप से सत्ता का हस्तांतरण करना था और क़ानूनी रूप से वो 15 अगस्त को दिल्ली में ऐसा करने के बाद कराची जाकर ये काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि तब तक वो ‘डोमिनियन ऑफ इंडिया’ के गवर्नर जनरल बन गए होते।

ब्रिटिश संसद में पारित ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ में दर्ज है 15 अगस्त की तारीख

ब्रिटिश ने ‘डोमिनियन ऑफ इंडिया’ और ‘डोमिनियन ऑफ पाकिस्तान’ के रूप में विभाजन और आज़ादी की घोषणा की थी, जो बाद में क्रमशः ‘रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ और ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ बना। बंगाल और पंजाब जैसे बड़े प्रदेशों को दोनों देशों के बीच बाँट दिया गया। इसी एक्ट में अंग्रेजों ने गवर्नर जनरल के पद के गठन की घोषणा की और दोनों देशों के बीच संपत्ति के बँटवारे का ऐलान किया। मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ ली।

इसके अलावा और भी कई सबूत हैं जो बताते हैं कि पाकिस्तान का असली स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को है। जिन्ना पाकिस्तान की आज़ादी के 13 महीने बाद ही चल बसे थे। 1948 में भी पाकिस्तान ने 14 अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस मनाया था, जो जिन्ना के जीवनकाल का भी आखिरी था। साथ ही पाकिस्तान का पहला कमेमोरेटिव स्टाम्प भी 15 अगस्त की ही बात करता है। हर साल 14 अगस्त को वहाँ जिन्ना का रेडियो मैसेज चलाया जाता है, लेकिन उसमें तारीख 15 अगस्त बताई जाती है।

यहाँ बात पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के तारीख को लेकर हो रही है लेकिन जब भी विभाजन की बात आएगी तो 20 लाख लोगों की मौत की भी बात की जाएगी, जो सांप्रदायिक दंगों में मारे गए। साथ ही क़रीब 2 करोड़ लोग विस्थापित हुए। महात्मा गाँधी ने ऐसे समय में सक्रियता दिखाने की बजाए बंगाल जाकर बैठना उचित समझा था। नेहरू और जिन्ना जैसे नेता अपने-अपने देशों में सांप्रदायिक दंगों को रोकने में पूरी तरह असफल रहे। इधर दोनों देशों की राजधानियों और कुछ इलाक़ों में जश्न चल रहा था, वहीं अधिकतर क्षेत्रों में खून बह रहा था।

हालाँकि, पाकिस्तान के गठन की माँग और इसके लिए हिन्दुओं के नरसंहार की धमकी तो 30 के दशक से ही दी जा रही थी, लेकिन लाहौर में 22-24 मार्च, 1940 को हुए ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ के सेशन में इस्लाम मानने वालों के लिए औपचारिक रूप से अलग देश की माँग करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे ‘लाहौर रिजॉल्यूशन’ नाम दिया गया। इसीलिए, 1956 में पकिस्तान जब डोमिनियन से गणतंत्र बना, तो उसने इसके लिए 23 मार्च का दिन चुना और इसे ‘पाकिस्तान डे’ घोषित किया।

इसी तरह भारत ने 1950 में 26 जनवरी की तारीख को गणतंत्र दिवस के रूप में अपनाया। आज गलत दिन पर स्वतंत्रता दिवस मनाने वाले पाकिस्तान की स्थिति ये है कि वो कंगाल हो चला है और चीन की कृपा से सऊदी का लोन सधा रहा है, वहीं भारत दिन पर दिन उन्नति की नई गाथा लिख रहा है। पाकिस्तान अभी भी कश्मीर लेने के सपने देख रहा है, जबकि भारत सही मायनों में स्वतंत्रता के ध्येय को साकार करने की ओर बढ़ चला है।

BJP का चीन से याराना बताने के चक्कर में कॉन्ग्रेस की हुई फजीहत, जापानी PM को बता दिया चीनी

चीन के साथ अपने संबंधों की सच्चाई का खुलासा होता देख, कॉन्ग्रेस लोगों का ध्यान भटकाने के लिए भाजपा पर चीन से जुड़े होने के आरोप लगा रही है। अपनी इन कोशिशों में उसकी लगातार फजीहत भी हो रही है। हालिया मामले में भाजपा को निशाना बनाने के लिए कॉन्ग्रेस ने एक वीडियो शेयर किया। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के पीएम शिंजो आबे के साथ नजर आ रहे थे।

हास्यस्पद बात ये है कि अपने ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि चीन ने भारतीय सीमा पर कब्जा कर लिया है और भाजपा चीन के साथ याराना दिखा रही है। इस ट्वीट में कॉन्ग्रेस की ओर से यह भी दावा किया गया कि भारतीय माता की आजादी के हजारों-लाखों बलिदान हुए हैं। मगर आजादी के संघर्ष से दूरी बनाने वाले लोग इसकी अहमियत कैसे समझेंगें।

चीन के साथ भाजपा नेताओं के रिश्तों पर निशाना साधते हुए इस वीडियो में कॉन्ग्रेस ने जापानी प्रधानमंत्री और भारतीय पीएम की मुस्कुराती फोटो के नीचे कैप्शन लिखा कि भाजपा की चुनावी प्रचार के लिए चीनी कंपनियों को करोड़ों रुपया दिया गया।

हालाँकि, इस ट्वीट पर जैसे ही कॉन्ग्रेस की फजीहत होना शुरू हुई, उन्होंने इसे डिलीट कर दिया। लेकिन ये ध्यान रखने वाली बात है कि भाजपा पर निशाना साधने की होड़ में ऐसी जगहँसाई कॉन्ग्रेस की पहली बार नहीं हुई है। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस नेता निखिल अल्वा ने प्रधानमंत्री की ऐसी तस्वीर शेयर की थी, जिसमें पीएम मोदी किर्गिस्तान के राष्ट्रपति जेनबकोव के साथ थे। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता ने उस तस्वीर को लेकर दावा किया कि भाजपा के सीसीपी के साथ संबंध हैं।

यहाँ बता दें कि LAC पर भारतीय-चीन सेना के बीच तनाव बढ़ने के बाद से कॉन्ग्रेस अपने बयानों और चीन के साथ संबंधों को लेकर चर्चा में है। पहले तो उसके साल 2008 में चीन के साथ हुए गुप्त समझौते का खुलासा हुआ। फिर राजीव गाँधी फाउंडेशन के कारण उसकी भद पिटी। मालूम चला कि राजीव गाँधी फाउंडेशन को सिर्फ़ चीन के एंबेसी से पैसा नहीं मिला, बल्कि चीन की सरकार भी उसे पैसे देती थी।

‘तुम चुप हो जाओ, वरना तुम्हें भी इंजेक्शन देकर सुला देंगे’: महेश भट्ट ने मुझे भी धमकाया था, मेरी बेटी जैसा ही सुशांत का केस

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद अब बॉलीवुड नेक्सस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए जिया खान की माँ राबिया खान ने सुशांत मामले में सीबीआई जाँच का समर्थन किया है। साथ ही महेश भट्ट को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया है कि जिया के अंतिम संस्कार के समय में महेश भट्ट ने उन्हें धमकाने की कोशिश की थी।

इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में राबिया खान ने बताया जिया के अंतिम संस्कार पर भट्ट ने उनको कहा कि उनकी बेटी (जिया) डिप्रेशन में थी। उन्होंने इसका खंडन किया। लेकिन भट्ट ने उनसे कहा, “तुम चुप हो जाओ वरना तुम्हें भी इंजेक्शन देकर सुला देंगे।”

बता दें जिया खान की मौत 3 जून 2013 को हुई थी। उनकी मौत के बाद साल 2016 में बॉम्बे कोर्ट में सुनवाई के दौरान उनकी मौत को आत्महत्या करार कर दिया गया था। हालाँकि राबिया खान इसे हमेशा हत्या बताती रहीं और सूरज पंचोली पर इल्जाम मढ़ती रहीं। साल 2018 में इसके बाद मुंबई की एक अदालत में सूरज पर आत्महत्या का आरोप लगा। ये मामला आज भी सुलझा नहीं है।

अपने हालिया साक्षात्कार में राबिया खान ने महेश भट्ट की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उनकी निंदा की है और बताया है कि जिया ने भट्ट के लिए 16 साल की उम्र में काम करना शुरू किया था और तब भी भट्ट ने उनसे जिया को अकेले छोड़ने को कह दिया था।

अपने इंटरव्यू में उन्होंने जिया के ब्वॉयफ्रेंड सूरज पंचोली को मतलबी बताया और ये भी कहा कि उसने जिया को वैलेंटाइन डे पर मारा भी था। जिसे जानने के बाद उन्होंने जिया को भारत लौटने से मना किया। पर सूरज ने बरगला कर उसे वापस मुंबई बुला लिया।

राबिया कहती हैं कि उन्होंने जिया की मौत के बाद उसे इंसाफ दिलाने के लिए बहुत प्रयास किए। वे लंदन से हर महीने आती थीं। लेकिन सूरज कोर्ट में टाइम से नहीं जाता था और जब उससे सवाल पूछा जाता था तो वह ऐसे बर्ताव करता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं। साक्षात्कार में उम्मीद जताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान जिया को न्याय जरूर दिलाएँगे, उन्हें पूरा यकीन है।

उनका कहना है कि सुशांत और जिया के मामले में कई समानताएँ हैं। उनके मुताबिक, जिया के केस में जैसे उनकी मौत को आत्महत्या बताया गया। वैसे ही सुशांत के केस में भी हुआ।

राबिया खान ने सुशांत मामले में सीबीआई जाँच को लेकर अपना पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने सीबीआई जाँच की माँग करते हुए कहा कि पुलिस पर राजनीतिक दबाव के कारण सच सामने नहीं आ पाएगा।

सोशल मीड‍िया पर शेयर पोस्ट में जिया की माँ ने लिखा, “सुंशात को जिया की तरह मरता देखने के बाद मुझे इससे ज्यादा मजबूर, बेबस और उदास कभी महसूस नहीं हुआ। दोनों सुशांत और जिया को पहले झूठा अटेंशन और प्यार दिया गया। जब दोनों उनके नार्स‍िस्टि साइकोपैथ‍िक गैस लाइट‍िंग पार्टनर्स के जाल में फँस गए तो उन्हें शारीरिक तौर पर नुकसान पहुँचाया गया और उन्हें गाली दी गई।”

उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों कलाकारों का साथ पैसों के लिए इस्तेमाल किया गया और उन्हें पर‍िवार-चाहने वालों से दूर कर दिया गया। जिया और सुशांत दोनों को मानस‍िक तौर पर डिसेबल करार दिया गया और उन्हें काम ना होने की वजह से डिप्रेस्ड कहा गया। जब पार्टनर्स अपना कंट्रोल खोते गए तो उनके होमिसाइडल डेथ को सुसाइड कहा गया।

उन्होंंने आगे पोस्ट में लिखा कि जिया खान और सुशांत के नार्स‍िस्ट‍िक क्रिमिनल पार्टनर्स ताकतवर बॉलीवुड माफ‍ियाओं और नेताओं से जुड़े हुए हैं, इसल‍िए उन्होंने इनका सपोर्ट ले रखा है, क्योंकि उन्हें पता है कि ये बॉलीवुड माफ‍िया और नेता के पास क्रिमिनल्स के बिहेवियर को जानने की ताकत है।

वे लिखती हैं कि मुंबई पुलिस राजनीतिक दबाव के कारण सबके सामने सच नहीं ले पा रही और उन्होंने बस अपना समय सबूत मिटाने व इस केस को होमिसाइडल डेथ करार देने में बिताया।

आगे राबिया खुले तौर पर बॉलीवुड माफिया से जुड़े लोगों को सजा दिलाने की बात कहती हैं। वे बताती हैं कि सीबीआई को इन मामलों में तह तक जाकर अपराधियों को सजा दिलवानी चाहिए। वरना ये लोग हैवान बन जाएँगे और मासूमों को मारते रहेंगे।

राबिया खान ने टाइम्स नाऊ को दिए अपने इंटरव्यू में भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नेता पुलिस पर दबाव डालते हैं कि इस मामले की जाँच मत करना और पुलिस ऐसा ही करती है। देश में रोज़ लोगों के मर्डर होते हैं। क्या ये नेता हर मर्डर के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं? तब कोई नेता आवाज़ नहीं उठाता।

वे पूछती हैं, “अब क्यों नेता इस केस में इन्वॉल्व हो गए हैं, क्योंकि उनके अपने लोग इसमें फँस रहे हैं। ज़िया और सुशांत के केस में इसलिए नेता शामिल हुए क्योंकि उनके अपने लोग फँस रहे। वे उन्हें बचाना चाहते हैं।”