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‘अयोध्या में भूमि पूजन के दिन बंगाल में पूर्ण लॉकडाउन तृणमूल कॉन्ग्रेस की हिंदू विरोधी मानसिकता दर्शाती है’

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए पाँच अगस्त को भूमि पूजन समारोह आयोजित किया गया है। भाजपा ने इसी तारीख को पूर्ण लॉकडाउन लागू करने के पश्चिम बंगाल सरकार के फैसले की तीखी आलोचना करते हुए रविवार (अगस्त 2, 2020) को कहा कि इससे सत्तारूढ़ पार्टी की ‘हिंदू विरोधी मानसिकता’ प्रदर्शित होती है।

हालाँकि, तृणमूल कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने भाजपा के दावे को ‘निराधार’ करार दिया और भगवा पार्टी से ‘कोविड-19 महामारी के दौरान सांप्रदायिक राजनीति से बचने’ का आग्रह किया।

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा ने सरकार से आदेश को तत्काल वापस लेने की माँग करते हुए दावा किया कि ‘सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस तुष्टीकरण की राजनीति करती है।’ 

सिन्हा ने कहा, ‘‘राज्य सरकार ने दो अगस्त को लॉकडाउन वापस ले लिया क्योंकि इससे एक दिन पहले ईद का त्योहार था। जब बात स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े अवसरों में से एक – पाँच अगस्त को राम मंदिर के लिए भूमि पूजन की आई तो तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार ने लॉकडाउन लागू करने का फैसला किया।”

उन्होंने कहा, ‘‘यह सच है कि कोविड-19 के कारण कोई बड़ा उत्सव नहीं होगा, लेकिन बुधवार को पूर्ण लॉकडाउन लागू करने का निर्णय तृणमूल सरकार की सांप्रदायिक मानसिकता को दर्शाता है।”

सिन्हा की बातों का समर्थन करते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि अगर राज्य सरकार अपना फैसला वापस नहीं लेती है तो उन्हें इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।

दिलीप घोष ने कहा, “पाँच अगस्त स्वतंत्र भारत के ऐतिहासिक दिनों में से एक है और उस दिन पूर्ण लॉकडाउन लागू करना बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को आहत करने के समान है। अगर राज्य सरकार अपना फैसला वापस नहीं लेती है तो इसका परिणाम भुगतना होगा।”

तृणमूल कॉन्ग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राज्य सरकार के फैसले का तुष्टीकरण से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘पूरा देश महामारी से लड़ रहा है और भाजपा सांप्रदायिक राजनीति में लिप्त है। उन्हें ऐसा करने से परहेज करना चाहिए।”

बता दें कि अयोध्या में भूमि पूजन से पहले अखंड श्रीरामचरितमानस पाठ का आयोजन होने जा रहा है। इसका आयोजन 4 अगस्त की शाम 7 बजे से शुरू होकर अगले दिन यानी 5 अगस्त तक लगभग 24 घंटे तक लगातार चलता रहेगा।

इसका आयोजन ‘रामोत्सव’ नामक ऑनलाइन वेबसाइट कर रहा है। भारत समेत कई देशों के रामभक्त इससे जूम ऐप से जुड़ेंगे और एक-एक घंटे का रामचरितमानस पाठ का वाचन करेंगे। इस कार्यक्रम में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, मॉरीशस, हालैंड, हंगरी, इंग्लैंड आदि देशों के लोग भी पाठ करेंगे।

अमित शाह… अल्लाह को जल्दी प्यारे हो जाओ: कोरोना+ खबर के बाद कट्टरपंथियों ने कहा – ‘ईदी मिल गई’

गृह मंत्री अमित शाह कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। जिसके बाद उन्हें डॉक्टर्स की सलाह पर मेदांता अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। अमित शाह ने खुद ट्वीट कर इसकी जानकारी दी।

अमित शाह ने ट्वीट किया, “कोरोना के शुरुआती लक्षण दिखने पर मैंने टेस्ट करवाया और रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। मेरी तबीयत ठीक है परन्तु डॉक्टर्स की सलाह पर अस्पताल में भर्ती हो रहा हूँ। मेरा अनुरोध है कि आप में से जो भी लोग पिछले कुछ दिनों में मेरे संपर्क में आए हैं, कृपया स्वयं को आइसोलेट कर अपनी जाँच करवाएँ।”

अमित शाह के कोरोना पॉजिटिव आने से लिबरलों और कट्टरपंथी इस्लामी लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। सोशल मीडिया पर किसी ने इसे अमित शाह की अंतिम रात बताते हुए उनके मौत की दुआ माँगी तो कई ने इसे सबसे अच्छा ‘ईदी’ बताया।

एक यूजर ने लिखा, “सहायक पुजारी कोरोना पॉजिटिव पाए गए। राम मंदिर के पास तैनात 16 पुलिसकर्मी भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए और अब अमित शाह कोरोना संक्रमित हो गए हैं। वो प्लान करते हैं, मगर अल्लाह बेस्ट प्लानर है।” वहीं एक अन्य ने लिखा, “अल्लाह को जल्दी प्यारे हो जाओ।”

एक सोशल मीडिया यूजर लिखती है, “ईदी मिल गई दोस्तों, ईदी मिल गई। इससे अच्छी ईदी और क्या होगी?” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए एक यूजर लिखता है कि यार पहले मरने तो दे।

एक यूजर ने लिखा कि अमित शाह ने दुनिया के पतंजलि के द्वारा बनाया गया बेहतरीन वैक्सीन कोरोनील का इस्तेमाल किया होगा।

मोहम्मद आसिफ खान लिखता है, “अमित शाह ने कौन सी जमात में शिरकत की थी?”

वहीं मोहम्मद जीशान फारूकी लिखता है, “आपको जमात में जाने की क्या जरूरत थी सर।”

सैय्यद जाबिर ने भी इसी को लेकर लिखा, “जमात में गए थे या जमात वाले आए थे मिलने।” इतना ही नहीं, एक ने तो उन्हें ‘तबलीगी शाह’ तक कह दिया।

हालाँकि लोगों ने लिबरलों को भी कई सलाह दे डाली। एक यूजर ने लिखा, “बरनॉल नहीं मिल रही है तो, उस की जगह सैनिटाइजर लगा कर पास में माचिस की तीली जलाने से भी ठंडक मिलती है। बहुत गुप्त जानकारी है। किसी को मत बताना।”

एक ने लिखा कि चाहे कोई भी बात हो पर कोरोना की देन तो तुम जमातियों की ही है।

एक यूजर ने उनकी परवरिश पर बात करते हुए कहा, “आप के माँ-बाप ने आपकी अच्छी ही परवरिश की होगी। अब आपको देखना होगा कि आप ने इस तरह की गंदी बातें सीखी कहाँ, अगर आपको कुछ सही करना है तो… वरना इस दुनिया में जानवर की भी ज़िन्दगी गुजर जाती है।। तुम्हारी और मेरी भी गुजर जाएगी।”

ब्यूटी कॉन्टेस्ट के नाम पर यौन उत्पीड़न: कंपनी प्रमोटर के साथ महेश भट्ट, रणविजय सिंह सहित बॉलीवुड की कई हस्तियों को नोटिस

मॉडलिंग में करियर बनाने की कोशिश में लगी लड़कियों को ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा दिलाने के नाम पर उनके यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग का मामला सामने आया है। इस संबंध में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को दी गई शिकायत के अनुसार, चंडीगढ़ में स्थित आईएमजी वेंचर्स (IMG Ventures) नाम की एक कंपनी के प्रमोटर सनी वर्मा के खिलाफ आरोप लगाया गया है कि उसने मॉडलिंग में करियर बनाने का मौका देने के बहाने कई लड़कियों को ब्लैकमेल और उनका यौन शोषण किया है। 

NCW ने कंपनी के प्रमोटर के खिलाफ ‘यौन उत्पीड़न’ की शिकायत के मामले में बॉलीवुड की कई हस्तियों को नोटिस जारी किया है। कई लड़कियों ने मॉडलिंग में उनका करियर बनाने के बहाने कंपनी प्रमोटर पर ब्लैकमेल करने और यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है।

NCW ने पीपुल अगेंस्ट रेप इन इंडिया (PARI) की संस्थापक सोशल एक्टिविस्ट योगिता भयाना द्वारा दायर शिकायत का संज्ञान लेते हुए 6 अगस्त को अपनी चेयरपर्सन रेखा शर्मा की अध्यक्षता में एक वर्चुअल सुनवाई निर्धारित की है।

आयोग ने शिकायतकर्ता योगिता भयाना को संबोधित एक पत्र में कहा, “NCW ने आपके मामले का संज्ञान लिया है और तदनुसार इस मामले में एक वर्चुअल सुनवाई करने का निर्णय लिया है। आयोग ने आपके द्वारा नामित हस्तियों को नोटिस भी जारी किए हैं।”

सोशल एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने अपनी शिकायत में कई बॉलीवुड हस्तियों का नाम लिया है, जिनमें महेश भट्ट, उर्वशी रौतेला, मौनी रॉय, रणविजय सिंह, प्रिंस नरूला और ईशा गुप्ता के नाम शामिल हैं।

योगिता भयाना द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा को लिखे गए एक शिकायती पत्र में आरोप लगाया गया है कि सनी वर्मा अपनी कंपनी के माध्यम से मिस एशिया प्रतियोगिता के आयोजन के बहाने लड़कियों को इस दावे के साथ बुलाता है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के बाद वह मॉडल बन जाएँगी।

इस प्रतियोगिता को वास्तविक दिखाने के लिए उसकी कंपनी लड़कियों से 2,950 रुपए एंट्री फीस भी लेती है। 31 जुलाई को दिए गए शिकायती पत्र में कहा गया है कि एक बार जब लड़कियाँ प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के आवेदन करती हैं तो प्रतियोगिता में बेहतर रैंकिंग हासिल करने के लिए सनी वर्मा की महिला साथियों द्वारा उन्हें नग्न तस्वीरें देंने के लिए मजबूर किया जाता है।

यह भी आरोप लगाया गया है कि सनी, फोटो प्राप्त करने के बाद और कभी-कभी पहले भी लड़कियों के संपर्क में आता था और उनसे पूरी तरह न्यू तस्वीरें और वीडियो माँगता था। शिकायती पत्र में यह कहा गया है कि सनी वर्मा मॉडलिंग करने या प्रतियोगिता जीतने की इच्छा रखने वाली लड़कियों को धमकी देकर अपनी यौन इच्छाओं को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करता था।

एक बार लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के बाद वह उन लड़कियों को आगे भी संबंध बनाने के लिए लगातार ब्लैकमेल करता था। देश भर की कई लड़कियों को सनी वर्मा और उसके साथियों द्वारा यौन और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। शिकायत में सबूत के रूप में कई लड़कियों के कई पत्रों, मैसेज और ऑडियो क्लिप के माध्यम से सनी वर्मा और उसकी कंपनी के इस काले कारनामे का खुलासा किया गया है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि यौन उत्पीड़न के आरोप में सनी वर्मा को पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका है। उन्होंने माँग की है कि NCW मामले की गहराई से जाँच करे और दोषियों को सजा दिलवाए ताकि कोई भी अन्य व्यक्ति किसी भी बहाने इस तरह लड़कियों का यौन शोषण करने की हिम्मत न करे। जो कि सनी वर्मा और इससे जुड़े सभी लोगों को एक कड़ा संदेश होगा।

BREAKING: अमित शाह को हुआ कोरोना, रिपोर्ट आई पॉजिटिव – अस्पताल में भर्ती

देश के गृहमंत्री अमित शाह को कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। कोरोना के शुरुआती लक्ष्ण दिखने पर उन्होंने टेस्ट करवाया और यह रिजल्ट पॉजिटिव आया है। अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर उन्होंने इसकी जानकारी दी है।

अमित शाह ने कोरोना के बारे में जानकारी देते हुए बताया, “मेरी तबीयत ठीक है परन्तु डॉक्टर्स की सलाह पर अस्पताल में भर्ती हो रहा हूँ। मेरा अनुरोध है कि आप में से जो भी लोग गत कुछ दिनों में मेरे संपर्क में आए हैं, कृपया स्वयं को आइसोलेट कर अपनी जाँच करवाएँ।”

बहन के निवेदन पर 8 लाख के इनामी भाई ने छोड़ दी नक्सलियों की दुनिया: पहले भी नक्सलवाद पर भारी पड़ा है भाई-बहन का प्यार

शनिवार के दिन छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक नक्सली ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके पीछे की वजह बेहद दिलचस्प थी। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसकी बहन की इच्छा थी कि वह आत्मसमर्पण कर दे। ख़बरों के मुताबिक़ उसकी बहन अक्सर इस बात के लिए निवेदन करती थी। 

नक्सली युवक की बहन ने पुलिस अधीक्षक को खुद इस बात की जानकारी दी। उसने पुलिस को दी गई जानकारी में कहा कि “मेरा भाई वापस घर आ चुका है। अब वह कुछ भी गलत नहीं करेगा और वह मेरे साथ रहेगा।”

मल्ला तामो नाम के इस युवक (नक्सली) पर 8 लाख रूपए का इनाम था। वह आज से लगभग 14 साल पहले अपने चाचा के साथ बीजापुर के डोडी तुमनार गया। वहाँ जाकर वह नक्सलियों के गिरोह (प्लाटून नंबर 13) में शामिल हो गया। इसके बाद वह प्लाटून का डिप्टी कमांडर बन गया। उसे कई तरह के हथियार चलाना भी बहुत अच्छे से मालूम था। 

शनिवार के दिन मल्ला की बहन लिंगे अपने पति के साथ कराली स्थित पुलिस लाइन पहुँची। उसने पुलिस अधीक्षक को पहले ही इस बात की जानकारी दे दी थी। उसका भाई वापस घर लौट चुका है। अब वह किसी भी तरह के गलत काम नहीं करेगा और आम जिंदगी जीना शुरू करेगा। 

मल्ला के वापस आने की जानकारी मिलते ही पुलिसकर्मी कराली पहुँचे। जहाँ उसने पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव और डीआईजी (सीआरपीएफ) विनय कुमार सिंह की मौजूदगी में आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके अलावा लिंगे ने यह भी बताया कि उसका भाई 14 साल बाद उससे मिलने आया। लिंगे ने अपने भाई से निवेदन किया था कि रक्षा बंधन आने वाला है। इस बात को ध्यान में रखते हुए आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। 

यह पहली ऐसी घटना नहीं है जिसमें भाई बहन का प्यार नक्सलवाद पर भारी पड़ा हो। इसके पहले भी ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जिनमें ऐसा हो चुका है। लगभग एक हफ्ते पहले दशमी कुहरामी ने जिस पर 5 लाख रूपए का इनाम था। उसने आत्मसमर्पण कर दिया अब इस रक्षाबंधन पर उन्होंने अपने भाई से अनुरोध किया कि वह आत्मसमर्पण कर दे। दशमी ने यह भी कहा कि वह रक्षा बंधन के मौके पर अपने भाई का इंतज़ार भी करेगी। 

साल 2018 में वेट्टी रामाजो खुद एक नक्सल था और बाद में अधिकारी बना। उसकी बहन नक्सल थी। एक दिन वह अपनी बहन के सामने गया और उससे आत्मसमर्पण के लिए कहा। उसने कहा कि भले रक्षा बंधन के उपहार की तरह ही पर आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। रामा आज भी अपनी बहन का इंतज़ार कर रहा है और आशा करता है कि उसकी बहन एक न एक दिन ज़रूर वापस लौटेगी।   

करगिल की लड़ाई में मरने-मारने के लिए छोड़ दिया था 1 करोड़ 20 लाख रुपए का ऑफर: शोएब अख्तर

अक्सर सुर्ख़ियों में रहने वाले पाकिस्तान के पूर्व तेज़ गेंदबाज़ शोएब अख्तर ने एक हैरान कर देने वाला दावा किया है। उनका कहना है कि करगिल युद्ध में वो अपनी तरफ से मदद करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने Nottinghamshire के साथ 175,000 पाउंड (लगभग 1,20,75,000 रुपए, एक पाउंड 1999 के करेंसी रेट के हिसाब से लगभग 69 रुपए के बराबर था।) का समझौता करने से मना कर दिया था।

साल 1999 के दौरान मई महीने में भारत और पाकिस्तान की सेना के बीच करगिल की लड़ाई हुई थी। जिसमें दोनों देशों के सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध के दो दशक बाद शोएब अख्तर ने इतना बड़ा बड़ा खुलासा किया है। उनका कहना है कि वह सब कुछ छोड़ कर देश के लिए मरने को तैयार थे। 

ARY News नाम के समाचार समूह को साक्षात्कार देते हुए उन्होंने इस बारे में जानकारी दी। साक्षात्कार के दौरान शोएब ने कहा “लोग इस कहानी के बारे में बहुत कम ही जानते हैं। मैंने नॉटिंघम के साथ 175,000 पाउंड का समझौता किया था। इसके बाद साल 2002 में एक और बड़ा समझौता किया था। मैंने करगिल के दौरान दोनों ही समझौतों से इनकार कर दिया था।”

इसके बाद शोएब ने कहा “मैं लाहौर के बाहरी इलाके में खड़ा था। मुझे वहाँ देख कर एक जनरल ने पूछा कि मैं वहाँ क्या कर रहा हूँ? मैंने कहा लड़ाई शुरू होने वाली है, हम साथ मरेंगे। मैंने इस तरह दो बार क्रिकेट छोड़ा था, जिस पर सब के सब हैरान हुए थे। मुझे इस बात की बिलकुल चिंता नहीं थी। मैंने कश्मीर में मौजूद अपने दोस्तों को फोन किया और उनसे कहा कि मैं लड़ने के लिए तैयार हूँ।” 

अंत में शोएब ने कहा,

“जब लड़ाकू विमानों (भारत के) हमारी ज़मीन पर आए। इसके बाद उन्होंने यहाँ पर मौजूद पेड़ गिराए, यह हमारे किए बहुत बड़ा नुकसान था। उन्होंने उस वक्त लगभग 6 से 7 पेड़ गिराए और मैं इस बात से बहुत ज़्यादा दुखी हुआ था। मैं जब सुबह सो कर उठा, तब मुझे चक्कर आ रहा था। तब मेरी पत्नी ने मुझसे आराम करने के लिए कहा। लेकिन जब तक यह सब चलता रहा, मैं तब तक ख़बरें सुनता रहा। मैं जानता हूँ कि घटना के पीछे की असल कहानी क्या थी। मैं रावलपिंडी से हूँ और GHQ को बहुत अच्छे से जानता हूँ।” 

अपने लगभग दस के साल के गेंदबाज़ी के करियर में शोएब अख्तर ने 400 से अधिक अंतरराष्ट्रीय विकेट लिए। उन्हें दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ों में एक माना जाता है।

राजस्थान: होटलों में आराम फरमा रहे कॉन्ग्रेस विधायकों के खिलाफ दायर PIL, वेतन-भत्ते और अन्य लाभों को रोकने की माँग

राजस्थान में सियासी घमासान के बीच लगभग तीन सप्ताह से विभिन्न होटलों में आराम फरमा रहे कॉन्ग्रेस के विधायकों के वेतन-भत्ते और अन्य लाभ रोकने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। राजस्थान में यह उठा पटक सरकार में उप मुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट के विद्रोह के बाद हुआ है।

यह याचिका राजस्थान उच्च न्यायालय की डबल बेंच के समक्ष विवेक सिंह जादौन की ओर से दायर की गई है। जिसपर मंगलवार (4 अगस्त,2020) को सुनवाई होगी।

जादौन ने राजस्थान उच्च न्यायालय में दाखिल अपनी याचिका में कहा है कि पिछले कुछ हफ़्तो से होटलों में लुफ्त उठा रहे विधायक न ही जनता के बीच जा रहे है। न ही ये अपने विधानसभा क्षेत्र में कोई काम कर रहे है। ऐसे में इन्हें वेतन-भत्ते क्यों दिए जाएँ। उन्होंने कोर्ट से विधायकों को मिल रहे वेतन, मासिक भत्ते, और अन्य लाभों को वापस लेने की माँग की है।

इंडिया टुडे टीवी के साथ बात करते हुए, याचिका दायर करने वाले विवेक सिंह जादौन के वकील, गजेंद्र सिंह राठौड़ ने कहा, “याचिका इसलिए दायर की गई है क्योंकि, विधायक राज्य के लोगों की सेवा के लिए चुने गए, होटलों में ठहरने के लिए नहीं। इसमें कहा गया है कि जनता के साथ कोई संबंध नहीं रखने वाले होटलों में रहने वाले विधायक अपनी शपथ के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं।”

याचिका में यह भी उल्लेख है कि, विधायकों की अनुपस्थिति में कोई अन्य जिम्मेदार व्यक्ति भी उनके कर्तव्य निर्वहन के लिए मौजूद नहीं है। इसलिए उन्हें कोई वेतन, भत्ता नहीं दिया जाना चाहिए।

दायर याचिका में फेयरमोंट होटल का भी उल्लेख किया गया है, जहाँ कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के वफादार विधायक लगभग दो सप्ताह तक रहे। हालाँकि, अशोक गहलोत खेमे से जुड़े कॉन्ग्रेस विधायकों को राजस्थान के जैसलमेर के एक अन्य होटल में शिफ्ट कर दिया गया है।

वहीं इंडिया टुडे से बात करते हुए विवेक सिंह जादौन ने बताया, “वे अपनी याचिका को किसी कीमत पर भी नहीं बदलेंगे। याचिका के जरिए लोगों के सामने यह बात आएगी कि जिन विधायकों को लोगों के लिए काम करना चाहिए, वे कोरोना संकट जैसी कठिन परिस्थितियों के समय होटलों में ठहरे हुए हैं।”

बकरीद पर 26 करोड़ का 5 मंजिला हज हाउस, मीडिया के सामने हनुमान चालीसा का पाठ: कॉन्ग्रेस का कारनामा

छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार ने हज हाउस बनाने का ऐलान किया है, जिसके लिए 26 करोड़ रुपए ख़र्च किए जाएँगे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ईद-उल-अजहा के मौके पर अपने निवास स्थान से ही वीडियो कॉल के माध्यम से हज हाउस का शिलान्यास किया। तीन एकड़ की भूमि में हज हाउस का निर्माण किया जाएगा। ये भवन 5 मंजिला होगा और इसमें हज यात्रियों के लिए सारी सुख-सुविधाएँ मौजूद होंगी।

छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा हज हाउस का निर्णय लिए जाने की खबर कॉन्ग्रेस द्वारा खुद को रामभक्त घोषित करने की कोशिशों के बीच आई है। जहाँ मध्य प्रदेश में कमलनाथ राम मंदिर निर्माण का स्वागत करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में भगवान राम के ननिहाल में माता कौशल्या का मंदिर बनाने के लिए 15 करोड़ की लगत से प्रोजेक्ट तैयार किया गया है।

जहाँ तक हज हाउस की बात है, इसका निर्माण मंदिरहसौद रोड एयरपोर्ट के पास नवा रायपुर अटल नगर में किया जा रहा है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लोगों को बकरीद की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ के लिए ये दोहरी ख़ुशी का मौका है। उन्होंने ‘समाज के लोगों’ को हाजियों की परेशानी कम करने के लिए मेहनत करने का श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि लम्बे समय से इस हज हाउस की माँग चल रही थी, जो आज पूरी हुई।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस दौरान हज की जम कर तारीफ की और इसे समुदाय वालों के जीवन का अभूतपूर्व पल करार दिया। उन्होंने कहा कि कोरोना के कारण इस साल की हज यात्रा पहले जैसी नहीं है, ऐसे में 2021 की हज यात्रा में केंद्र सरकार को पहले से चयनित छत्तीसगढ़ के हज यात्रियों को मौका देना चाहिए। ‘हज कमिटी ऑफ इंडिया’ से छत्तीसगढ़ को 5 करोड़ रुपए मिलने हैं, जिसके लिए उन्होंने पहल करने की बात कही।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि पहले लोगों को हज हाउस के लिए नागपुर जाना पड़ता था। साथ ही वहाँ की सरकार छत्तीसगढ़ से ही हज के लिए उड़ान की व्यवस्था भी करने वाली है। हज हाउस के निर्माण के बाद छत्तीसगढ़ में ही लोगों को सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी। इसे कॉन्ग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के रूप में भी देखा जा रहा है क्योंकि भूपेश बघेल इससे पहले भी मजहबी वोट्स के लिए ये जुगत करते रहे हैं।

कारसेवकों का नरसंहार कब, कितने मरे, किसने मरवाया? देश के मीडिया संस्थानों के लेख से सब कुछ गायब

देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश आने के बाद आगामी 5 अगस्त की तारीख को राम मंदिर का भूमि पूजन होना है। साल 2019 में 500 सालों तक चले इस संघर्ष का अंत हो गया। अब मंदिर बनने जा रहा है लेकिन मंदिर निर्माण के पीछे हज़ारों लोगों का बलिदान है। न जाने कितनी पीढ़ियाँ इस दिन के लिए ख़त्म हो गईं। लेकिन बात केवल इतनी नहीं है। इस मामले से जुड़ी ऐसी न जाने कितनी घटनाएँ हैं, जिनमें हिंदुओं पर हुए अत्याचार को छुपाया और दबाया गया। 

इस तरह की एक घटना साल 1990 में हुई थी, जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। अयोध्या में कारसेवक इकट्ठा हुए थे, तभी समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मौके पर ओपन फ़ायर का आदेश दे दिया। रिपब्लिक टीवी द्वारा किए गए पड़ताल में यह बात सामने आई थी कि मुलायम सिंह की सरकार ने असल मौतों का आँकड़ा छिपाया था। सरकार के मुताबिक़ वहाँ पर 16 लोगों की मौत हुई थी जबकि असल में संख्या काफी ज़्यादा थी। 

सरकार ने मरने वालों की असल संख्या छिपाने के लिए हिंदुओं की लाशों का अंतिम संस्कार करने की जगह उन्हें दफ़न करवा दिया था। साल 2016 में मुलायम सिंह ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि उन्हें कारसेवकों पर गोली चलवाने का पछतावा है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मुस्लिम समुदाय के लोगों की भावनाओं का ध्यान रखना था। इस नरसंहार के दौरान ही कोठारी बंधुओं ने अपनी जान गँवाई थी।

मुख्य धारा मीडिया ने 2 नवंबर 1990 के दिन हिंदुओं पर हुए भयावह अत्याचार को सामने न लाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा। हैरानी की बात यह है कि वह अब तक इस तरह के षड्यंत्रों में शामिल हैं। तमाम मीडिया संस्थानों ने श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन के बारे में ख़बरें प्रकाशित की हैं। लेकिन इस विवाद के दौरान तत्कालीन उत्तर प्रदेश द्वारा हिंदुओं पर किए गए अत्याचार का कोई ज़िक्र ही नहीं है।

वह मुग़ल शासन से लेकर अभी तक तमाम घटनाओं का उल्लेख सिलसिलेवार तरीके से करते हैं। लेकिन साल 1990 के दौरान अयोध्या में कारसेवकों पर चलाई गई गोली की घटना का कोई ज़िक्र ही नहीं करते हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने अपनी रिपोर्ट में सितंबर 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी का ज़िक्र किया है। इसके बाद सीधे 2 दिसंबर 1992 के दिन हुई विवादित ढाँचे की घटना का ज़िक्र किया है। 

साभार – बिज़नेस स्टैण्डर्ड

यानी देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान इतनी गंभीर घटना को सिरे से नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। ठीक इसी तरह द हिंदू ने भी बिज़नेस स्टैंडर्ड जैसा रवैया ही अपनाया है। इन्होंने भी अपनी रिपोर्ट में सितंबर 1990 में हुई लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बारे में बताया। लेकिन कारसेवकों पर चली गोली की घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। 

साभार – द हिन्दू

ठीक इसी तरह शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने भी किया है। उन्होंने भी मुलायम सरकार में कारसेवकों के नरसंहार की घटना का कोई उल्लेख ही नहीं किया है। इन्होंने 25 सितंबर 1990 के दौरान गुजरात के सोमनाथ में लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के बारे में बताया। इसके बाद सीधे पर कल्याण सिंह की सरकार के उस फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें उन्होंने राम जन्मभूमि के पास 2.77 एकड़ की ज़मीन पर अधिग्रहण किया था। 

साभार – द प्रिंट

वहीं एनडीटीवी ने इन सभी से एक कदम आगे बढ़ कर घटना के बारे में बताया। उन्होंने लिखा कि 1990 के दौरान के विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद का ढाँचा गिराया। लेकिन दूसरी तरफ कारसेवकों पर चलाई गई गोली की घटना के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा। बेशक यह घटना इतिहास की सबसे निर्दयी घटनाओं में एक है। लेकिन अफ़सोस मुख्य धारा मीडिया की निगाह में नहीं। 

साभार – एनडीटीवी

वहीं फर्स्टपोस्ट ने तो 1990 का पूरा घटनाक्रम ही छोड़ दिया। उन्होंने 1989 की घटनाओं पर संक्षेप में जानकारी दी। इसके बाद वह सीधे 1992 की घटना पर आ गए, कुल मिला कर उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि 1990 के दौरान कुछ हुआ ही नहीं था। 

साभार – फर्स्ट पोस्ट

जब भारतीय मीडिया संस्थानों ने कारसेवकों के साथ हुए अत्याचार के बारे में कुछ नहीं लिखा। ऐसे में विदेशी मीडिया संस्थाओं से इस बारे में आशा करना बेकार ही है कि वह इस घटना का ज़िक्र करेंगे। बीबीसी जो हमेशा से ही हिंदू विरोधी एजेंडे पर चलती रही है, उसने भी कुछ ऐसा ही किया है। 

साभार – बीबीसी

जब भी इतिहास से जुड़ी किसी घटना का ज़िक्र किया जाता है, तब इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाता है कि उसमें छोटी से छोटी बात भी शामिल की जाए। भले घटनाक्रम निर्धारित किए गए प्रारूप से कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए। राम जन्मभूमि आन्दोलन के बारे में भी ठीक ऐसा ही होना चाहिए था। पढ़ने वाला हर व्यक्ति यह उम्मीद करता होगा कि उसे पूरी घटना सिलसिलेवार तरीके से बताई जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

पाठकों के सामने हर घटना का उल्लेख नहीं किया गया। लगभग आधी जानकारी ही दबा दी गई। इसका एक मतलब यह भी है कि मुख्यधारा मीडिया के लिए हिंदुओं की जान का कोई मूल्य ही नहीं है। मुलायम सिंह की सरकार में हिंदुओं के साथ हुई वह घटना बेहद भयावह और निर्दयी थी। मुख्यधारा मीडिया ने इसे पूरी तरह दरकिनार कर दिया। इस मामले में मीडिया की कोशिश यही रही है कि आम लोगों के सामने कारसेवकों के साथ हुआ अत्याचार सामने न आ पाए। 

संदिग्ध महिला के खिलाफ FIR दायर करना नारीवाद के खिलाफ नहीं: सुशांत के जीजा ने थेरेपिस्ट के साथ इंटरव्यू पर लताड़ा

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के जीजा विशाल कीर्ति ने रविवार (अगस्ता 2, 2020) को YouTube पत्रकार बरखा दत्त को उनकी असंवेदनशीलता और रिपोर्टिंग में नैतिकता को दरकिनार करने को लेकर लताड़ लगाई।

कथित तौर पर सुशांत के थेरेपिस्ट सुसैन वॉकर मोफत ने विवादित पत्रकार बरखा दत्त को दिए इंटरव्यू में अभिनेता के मेडिकल रिकॉर्ड की गोपनीयता को नजरअंदाज करते हुए दावा किया कि उन्हें बाइपोलर डिसऑर्डर (bipolar disorder) था।

थेरेपिस्ट के साथ बरखा दत्त के साक्षात्कार के बाद विशाल कीर्ति ने एनडीटीवी के पूर्व न्यूज एंकर बरखा दत्त को लताड़ लगाते हुए कहा कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता फैलाने का अवसर नहीं है।

विशाल कीर्ति ने कहा कि उनका व्यक्तिगत रूप से मानना है कि शारीरिक स्वास्थ्य की तरह ही मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर भी “विशेष” धब्बा नहीं होना चाहिए, मानसिक स्वास्थ्य भी जीव विज्ञान और पर्यावरण का एक परिणाम है।

कीर्ति ने यह भी कहा कि “विशेष” का स्पष्ट रूप से उल्लेख करने का उनका कारण यह है कि स्वास्थ्य के मुद्दों से धब्बा को पूरी तरह से समाप्त करना लगभग असंभव है।

विशाल कीर्ति ने कहा, “हालाँकि, आज धब्बा की एक बड़ी मात्रा है, मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी कानून द्वारा संरक्षित है। एक मनोचिकित्सक / मनोवैज्ञानिक द्वारा मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी का खुलासा करना न केवल अनैतिक है, बल्कि अवैध भी है (कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर जो यहाँ लागू नहीं होते हैं)।”

विशाल ने खुद को ‘नारीवादी’ बताते हुए कहा कि वो भी महिलाओं के मुद्दों की परवाह करते हैं, लेकिन रिया के खिलाफ FIR को ‘महिलाओं से घृणा करने वाला’ बताना गलत है।

कीर्ति ने लिखा, “मेरा पहला मुद्दा यह है कि महिलाओं के मुद्दों के बारे में परवाह करना एक संदिग्ध महिला के खिलाफ आपराधिक आरोप दायर करने के साथ असंगत नहीं है।”

विशाल ने सुसैन पर सवाल उठाया कि वह दो महीने से भी कम वक्त में मूल्यांकन कैसे करते हैं। उन्होंने कहा, “मानसिक बीमारी का इलाज करना एक कठिन काम है और किसी के लिए बायपोलर (I या II) बीमारी का ईलाज करना और भी कठिन है। न केवल आपको व्यक्ति को बहुत बारीकी से निरीक्षण करना है, बल्कि आपको उन्हें लंबे समय तक भी देखना होगा (लक्षणों की शुरुआत के बाद पूरी तरह ठीक करने में औसतन छह साल लगते हैं)। सुसैन बहुत आसानी से दो महीने से भी कम समय में (शायद कुछ मीटिंग में) सुशांत का इलाज का दावा करती है, जिसमें जीवन-परिवर्तन होता है।”

सुशांत सिंह राजपूत की मौत में रिया चक्रवर्ती की भूमिका पर संदेह जताते हुए, कीर्ति ने एफआईआर पर ध्यान दिलाया जिसमें कहा गया था कि कैसे सुशांत को रिया द्वारा ड्रग दिया गया था, जिसे अवैध बताया गया।

इसके अलावा, कीर्ति को संदेह है कि सुशांत सिंह राजपूत को देखभाल के बहाने मनोचिकित्सक के पास ले जाया गया। उन्होंने रिया द्वारा थेरिपिस्ट नियुक्त किए जाने के तरीके पर भी आश्चर्य व्यक्त किया, जो हर सेशन में उनके साथ होती थी। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि रिया उस मनोचिकित्सक के साथ सुशांत की बाचतीत पर नजर रखने का संकेत भी हो सकता है।

उन्होंने रिया पर यह भी आरोप लगाया कि वह उनके मानसिक स्वास्थ्य की जानकारी रखने के लिए ऐसा करती हों, ताकि बाद में इसका इस्तेमाल ब्लैकमेल करने के लिए किया जा सके या अपने संसाधनों से उन्हें आसानी से कंट्रोल किया जा सके।

गौरतलब है कि बरखा दत्त ने 1 अगस्त के दिन सुशांत सिंह राजपूत की तथाकथित थेरेपिस्ट सुसैन वॉकर मोफत के साक्षात्कार का एक वीडियो साझा किया था। जिस पर नेटिज़न्स ने गंभीर सवाल खड़े किए। वॉकर जो खुद एक मनोवैज्ञानिक, साइकोथेरेपिस्ट और हिपनोथेरेपिस्ट हैं। उन्होंने ऐसा दावा किया था कि सुशांत को बाईपोलर डिसऑर्डर था। जिसके बाद उन पर सुशांत सिंह से जुड़ी इस तरह की जानकारी साझा करने के लिए काफी सवाल उठाए गए थे।