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5 अगस्त राम मंदिर भूमि पूजन-शिलान्यास का दिन ही नहीं बल्कि एक नए युग की शुरुआत है, यह युग है रामराज्य का: योगी आदित्यनाथ

अयोध्या में 5 अगस्त के आयोजन की तैयारियाँ लगातार जारी हैं। श्रीराम की जन्मभूमि में उनके मंदिर के स्थापना की नींव रखे जाने की प्रक्रिया पूरी रफ़्तार से आगे बढ़ रही है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में भव्य राम मंदिर की आधारशिला रखी जाएगी। इस दौरान ऐसे तमाम किस्से और किरदार सामने आ रहे हैं, जिन्होंने इस अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई। आज़ादी के पहले से लेकर आज़ादी के बाद, उनमें से कुछ के बारे में हम जानते हैं और कुछ के बारे में नहीं या बहुत कम जानते हैं।  

राम मंदिर शिलान्यास और भूमिपूजन का समय नज़दीक होने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई अहम बातें कही हैं। इस पावन घड़ी की प्रतीक्षा करते हुए पीढ़ियाँ ख़त्म हो गईं। राम के नाम में आस्था रखने वालों ने 5 शताब्दी तक इस अवसर की प्रतीक्षा की। तमाम कठिनाइयों के बावजूद राम मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों ने हार नहीं मानी। उसका ही परिणाम है कि राम मंदिर बहुत जल्द आकार लेने वाला है। करोड़ों लोगों की आस्था का सबसे प्रबल प्रतीक उनके सामने होगा। मर्यादा पुरुषोत्तम का एक वनवास सदियों पहले ख़त्म हुआ था और दूसरा अब ख़त्म हुआ है। इसके बाद वह अपनी जन्मभूमि स्थित सिंहासन पर विराजमान होंगे। इस पूरे अभियान और संघर्ष में कुछ नाम ऐसे थे जिनके उल्लेख के बिना पूरा विषय अधूरा है।  

किन संतों को भूलना मुश्किल 

इसमें सबसे पहला नाम है दादागुरु ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत श्री दिग्विजय नाथ जी महाराज। उनके अलावा परमपूज्य ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत श्री अवेद्यनाथ जी महाराज। इन दोनों विभूतियों ने राम मंदिर निर्माण अभियान में अकल्पनीय संघर्ष किया। इसलिए राम मंदिर की आधारशिला रखने के दौरान इन्हें विस्मृत करना असंभव है।  

फिरंगी हुक़ूमत के दौरान राम मंदिर निर्माण के अभियान को बढ़ावा दिया महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज ने। साल 1934 से लेकर 1949 तक उन्होंने इसके लिए लगातार संघर्ष किया। ऐसा बताया जाता है कि जब 22-23 दिसंबर 1949 के दौरान जब विवादित ढाँचे में श्रीराम प्रकट हुए। ठीक उस वक्त तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजय नाथ जी महाराज साधू संतों के साथ बैठ वहीं पर कीर्तन कर रहे थे।  

मृत्यु के बाद भी जारी रखा गया संघर्ष 

28 सितंबर साल 1969 को उनकी मृत्यु हुई लेकिन राम मंदिर निर्माण के लिए उनके हिस्से का संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ। महंत दिग्विजय नाथ की इस पहल को आगे बढ़ाया उनके शिष्य महंत श्री अवेद्यनाथ ने। उनके साथ साधू संतों के एक बड़े समूह ने राम मंदिर निर्माण अभियान में आगे आया।  

1989 में जब राम मंदिर निर्माण के लिए प्रतीकात्मक तौर पर भूमि पूजन हुआ। तब पहला फावड़ा किसी और ने नहीं बल्कि खुद महंत श्री अवेद्यनाथ ने चलाया था। पहला फावड़ा चलाने में परमहंस रामचंद्र दास भी शामिल थे। इन प्रयासों का यह नतीजा निकला कि पहली आधार शिला रखने का अधिकार कामेश्वर चौपाल जी को मिला। अशोक सिंहल ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई थी।  

देश ही नहीं दुनिया की आस्था का विषय

पिछले तीन वर्षों के दौरान राम जन्मभूमि अयोध्या ने दीपावली देखी है। इस बार के आयोजन का दृश्य सभी की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत और विशाल होगा। राम मंदिर केवल देश की नहीं बल्कि दुनिया की आस्था का विषय है। श्रीराम मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या वैश्विक स्तर धार्मिक और संस्कृति नगरी के रूप में उभर कर आएगी।  

महामारी के चलते श्रीराम में आस्था रखने वाले उनके अटूट भक्त इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाएँगे। लेकिन फिलहाल इसे प्रभु की इच्छा मान कर सभी को स्वीकार करना चाहिए। अंततः यह हमारे लिए गर्व का अवसर है। 5 अगस्त का दिन राम मंदिर भूमि पूजन और शिलान्यास का दिन नहीं है बल्कि एक नए युग की शुरुआत का दिन है। यह युग रामराज्य का है।     

‘जस्टिस लोया की मौत पर राजदीप और उसकी बीवी बने थे ‘जज’, सुशांत की मौत को बताया सर्कस’: लोगों ने याद दिलाए ‘वो दिन’

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर बॉलीवुड के बाद अब मीडिया के लोगों की दिलचस्पी भी देखी जा रही है। इसमें जो एक नया नाम जुड़ा है वो है प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई! राजदीप सरदेसाई का दावा है कि सुशांत सिंह राजपूत के CA ने सुशांत सिंह के परिवार द्वारा लगाए गए पैसों के हेरफेर और पैसे ऐंठने के दावे गलत और झूठे हैं।

राजदीप सरदेसाई ने बृहस्पतिवार (जुलाई 30, 2020) को देर रात एक ट्वीट में लिखा – “सुशांत सिंह राजपूत के CA ने उनके परिवार द्वारा कथित रूप से किसी वित्तीय दुर्व्यवहार के आरोपों का खंडन किया है। उसने सभी अकाउंट डिटेल्स जारी किए हैं। यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा! बिहार पुलिस के पास निश्चित रूप से करने के लिए बेहतर चीजें हैं! एक त्रासदी को सर्कस में मत बदलो!”

रिपोर्ट्स के अनुसार, सुशांत के पिता ने आरोप लगाया था कि सुशांत के अकाउंट से करीब 15 करोड़ रुपए का ट्रांजैक्शन हुआ है। जबकि, सुशांत के सीए का कहना है कि ज्यादा ट्रांजैक्शन नहीं हुआ बल्कि सुशांत के खाते में ज्यादा पैसे थे ही नहीं।

राजदीप सरदेसाई के इस ट्वीट के बाद लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि यही राजदीप जस्टिस लोया की मौत पर लगातार भ्रामक दावे और झूठ परोसता रहा, वो भी तब जबकि जस्टिस लोया का परिवार तक उनकी मृत्यु को स्वाभाविक मृत्यु बताता रहा, लेकिन जब सुशांत सिंह राजपूत का परिवार उनकी मौत की जाँच चाह रहा है तो यही राजदीप सरदेसाई इसे सर्कस बता रहा है। एक ट्विटर यूजर ने उन्हें अपशब्द कहते हुए राजदीप को ‘दोगला’ तक कह दिया।

ज्ञात हो कि जस्टिस लोया की मौत को लेकर सिर्फ राजदीप सरदेसाई ही नहीं बल्कि उन्हीं की जमात के अन्य पत्रकार भी हमेशा जाँच कर रही संस्था और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी संदेह जताते रहे हैं।

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा है – “जज लोया की प्राकृतिक मौत को तो खुद उनके परिवार वालों तक ने स्वीकार कर लिया था पर तुम और तुम्हारी बीबी खुद जज बनकर इस मौत को हत्या साबित करने में जुटे हुए थे। रही बात सर्कस की तो गौरी लंकेश की हत्या को, जिसमें एक कॉन्ग्रेसी ही दोषी पाया गया तुम दोनों ने ही खूब सर्कस किया था। याद है न?”

मौत की पहली रात बंद थे CCTV

सुशांत राजपूत की मौत के बाद हर दिन कई बड़े रहस्यों से पर्दा उठ रहा है। इस मामले में सुशांत सिंह राजपूत के पिता केके सिंह द्वारा एफआईआर दर्ज कराए जाने के बाद बिहार पुलिस ने मामले की जाँच तेज कर दी हैं।

सुशांत की पूर्व प्रेमिका अंकिता लोखंडे और सुशांत सिंह राजपूत से पूछताछ करने के बाद जल्द ही बिहार पुलिस सुशांत के नजदीकी दोस्त और फ्लैटमेट सिद्धार्थ पिठानी से पूछताछ कर सकती है। माना जा रहा है इसके बाद ही रिया चक्रवर्ती और उनके भाई से पूछताछ की जाएगी। दरअसल, सुशांत का कोई करीबी उनकी मौत से पहले पार्टी में उनके साथ मौजूद था और उस पार्टी में CCTV कैमरा भी काम नहीं कर रहे थे।

रिया करती थी काला जादू

न्यूज़ चैनल ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के अनुसार, सुशांत की बहन मीतू सिंह ने बुधवार (जुलाई 29, 2020) को पूछताछ के दौरान बताया कि सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती उन पर किसी तरह का ‘ब्लैक मैजिक’ करती थी। यह बात उन्हें सुशांत के हाउस हेल्प ने बताई थी।

बताया जा रहा है कि रिया चक्रवर्ती अब पूछताछ व गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपना ठिकाना बदल रही है। बिहार पुलिस रिया के खिलाफ ठोस सबूत इकट्ठा कर कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट लेने के मूड में है। रिपोर्ट के अनुसार, रिया पूछताछ के भय से अपने परिवार के साथ भूमिगत हो गई हैं।

भारत विरोधी गतिविधियों का नया गढ़ बना ‘तुर्की’, भारत के समुदाय विशेष को रेडिकल बनाने के लिए कर रहा फंडिंग: रिपोर्ट

पाकिस्तान के अलावा एक और ऐसे देश का नाम सामने आ रहा है। जो पिछले काफी समय से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर तुर्की ने पाकिस्तान की बातों का समर्थन किया था। लेकिन इसके बाद वह भारत विरोधी गतिविधियों का गढ़ बन चुका है। तुर्की में पनप रहे इस नए तरह के आतंकवाद को कोई और नहीं बल्कि वहाँ की एर्दोगन सरकार खुद बढ़ावा दे रही है।  

हैरानी की बात यह है कि केरल और कश्मीर में मौजूद इन इस्लामी कट्टरपंथियों को हर तरह की मदद मिल रही है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने इस बारे में हिन्दुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कई अहम बातें बताई। उन्होंने कहा तुर्की की तरफ से भारत के लोगों को कट्टर बनाने की भरपूर कोशिश जारी है। इतना ही नहीं तुर्की भारत के मजहब विशेष वाले कट्टर लोगों को और कट्टर बना कर उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करना चाहता है।  

तुर्की दक्षिण एशियाई देशों में अपना विस्तार करना चाहता है। लेकिन दूसरी तरफ इस इलाके में सऊदी अरब का प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। इसके लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन और उनकी सरकार की तरफ से तमाम प्रयास जारी हैं। उसका नतीजा है कि तुर्की ने अपनी छवि बतौर एक रेडिकल इस्लामिक देश स्थापित कर ली है।  

इसी कड़ी में पिछले ही हफ्ते तुर्की की सरकार ने बाईज़ानटाईन कैथेद्रल हगिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में तब्दील कर दिया था। एर्दोगन के इन कदमों से इतना साफ़ है कि वह वैश्विक स्तर पर खुद को मजहब विशेष के रखवाले की तरह दिखाना चाहते हैं। पिछले साल एर्दोगन ने उन मलेशिया के महातिर मोहम्मद और पाकिस्तान के इमरान खान समेत कुछ मजहबी देशों के साथ एक गैर-अरब इस्लामी देशों का संगठन बनाने की कोशिश की थी। इसमें ईरान और क़तर ने भी तुर्की की सरकार का साथ दिया था।  

सऊदी अरब और यूएई से भारत के समझौते बढ़ने के बाद तुर्की ने पाकिस्तान की और निहारना शुरू कर दिया था। रियाध के दबाव की वजह से तुर्की के साथ होने वाली बैठक में इमरान खान अंतिम वक्त में पीछे हट गए थे। जबकि तुर्की की तरफ से इमरान खान को मनाने की कोशिशें जारी थीं। अधिकारियों का मानना है कि तुर्की की सरकार ने एजेंडा तैयार किया है। जिसके तहत वह दक्षिण एशियाई देशों के मजहबी लोगों में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। इस एजेंडे में भारत के समुदाय विशेष को प्राथमिकता में रखा गया है।  

भारतीय खुफ़िया अधिकारियों के मुताबिक़ तुर्की ने कश्मीर के कट्टर अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी को सालों आर्थिक मदद की थी। बीते कुछ समय में तुर्की ने अलग तरीकों से भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया है। एर्दोगन सरकार ने पिछले कुछ सालों के दौरान भारत में कई मज़हबी आयोजनों को बढ़ावा दिया। जिसमें वह समुदाय के युवाओं को अपने मन मुताबिक़ मज़हबी प्रशिक्षण दे रहे हैं। इसी कड़ी में उस कट्टरपंथी समूह का नाम सामने आया है जो केरल में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है।  

कुछ अधिकारियों का कहना है, “हम अच्छी तरह जानते हैं कि यह समूह तुर्की के लोगों से मिलने के लिए क़तर जाता है। जिससे इन्हें आर्थिक मदद मिलती रहे। उन्हें केरल में इस तरह की गतिविधियों को अंजाम देने के लिए 40 लाख रूपए तक मिलते हैं। इसके अलावा तुर्की पाकिस्तान और इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक की फंडिंग भी करता है। तुर्की फ़िलहाल पाकिस्तान के लिए ‘नया दुबई’ बन चुका है। साल 2000 से लेकर 2010 के बीच दुबई आईएसआई का गढ़ बना हुआ था। जहाँ से पाकिस्तान भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देता था।”  

इस दशक के दौरान पाकिस्तान की आईएसआई ने भारत के मजहब विशेष वालों को उनके ही देश के खिलाफ़ कट्टर बनाने का काम किया था। यहीं से इंडियन मुजाहिद्दीन ही शुरुआत हुई थी। इसके बाद यूएई और भारत ने आपस में संधि कर ली थी। जिसके बाद यूएई ने खुद भारत विरोधी गतिविधियों को ख़त्म करना शुरू कर दिया था। इसके अलावा भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ़ हो रहे विरोध में भी तुर्की ने अपनी भूमिका निभाई थी। भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शन जारी रखने के लिए तुर्की ने आर्थिक मदद तक की थी।  

कश्मीर मुद्दे पर भी संयुक्त राष्ट्र असेम्बली में भी सिर्फ एर्दोगन ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के खिलाफ़ बोला था। भारत के खिलाफ़ साज़िश में पाकिस्तान तुर्की का पूरा साथ देता है। इस साल हुए पाकिस्तान के दौरे में एर्दोगन ने कश्मीर पर कई हैरान कर देने वाली बातें कही थीं। उनका कहना था “कश्मीर हमारे लिए पहले जैसा ही है। कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए उतना ही अहम हमारे लिए भी है।”      

कोरोना को लेकर अयोध्या में लगातार हो रहे परीक्षण, NDTV जैसे चैनल और वामपंथी फैला रहे प्रपंच

अयोध्या में, श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठानों के लिए विस्तृत तैयारी की जा रही है। अनुष्ठान 3 अगस्त को शुरू होगा और बहुप्रतीक्षित मंदिर के निर्माण से पहले 5 अगस्त को भूमि पूजन के साथ समाप्त होगा।

इस बीच वामपंथी मीडिया तंत्र अपनी तमाम ताकत यह साबित करने में लगा रहा है कि 5 अगस्त को होने वाले भूमि पूजन में कोरोना को लेकर सतर्कता नहीं बरती जा रही है। अयोध्या के डीएम अनुज कुमार झा का कहना है कि भूमिपूजन को लेकर हर प्रकार की एहतियात बरती जा रही हैं और व्यापक स्तर पर COVID-19 टेस्ट भी किए जा रहे हैं।

डीएम अनुज कुमार झा ने कहा – “COVID परीक्षण पूरे अयोध्या जिला और श्रीराम जन्मभूमि में बार-बार किए जा रहे हैं। एक व्यक्ति छुट्टी के बाद महाराजगंज से लौटा था और उसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। इसलिए, उनके सभी सहयोगियों का 7 जुलाई को परीक्षण किया गया और उनमें से एक सकारात्मक निकला।”

अयोध्या के डीएम के अनुसार – “13 जुलाई को, 98 परीक्षण किए गए, एक और व्यक्ति पॉजिटिव निकला था। कल 100 लोगों का एंटीजन टेस्ट किया गया और 4 पुलिसकर्मी और एक सहायक पुजारी पॉजिटिव पाए गए। वह आइसोलेशन में है। यह सुनिश्चित करना हमारी ज़िम्मेदारी है कि आगामी कार्यक्रम COVID मुक्त रहे।”

लेकिन प्रोपेगेंडा समाचार चैनल NDTV और द वायर जैसे ही मीडिया गैंग अयोध्या में जारी व्यवस्थाओं को लेकर लगातार ही भ्रामक खबरें दे रहे हैं। NDTV का अपनी रिपोर्ट में कहना है कि वहाँ पर आने वाले दिनों में बहुत सरे लोग जमा होने जा रहे हैं लेकिन इंतजाम ठीक नहीं किए जा रहे हैं। NDTV का कहना है कि मंदिर को सेनिटाइज नहीं किया जा रहा है और कोरोना को लेकर इंतजाम नहीं किए गए हैं।

जबकि, ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास के उत्तराधिकारी महंत कमल नयन दास ने स्पष्ट किया है कि चिंता करने की कोई बात नहीं है, एक पुजारी जो मंदिर स्थल पर दैनिक अनुष्ठान करता है, पॉजिटिव निकला है। पूरे परिसर को नियमित तौर पर सैनिटाइज किया जा रहा है।”

5 अगस्त को होने वाले समारोह के लिए वाराणसी और अयोध्या के 11 पुजारी पूजा करेंगे। जबकि, कोरोना पॉजिटिव पाए गए सहायक पुजारी प्रदीप दास 11 पुजारियों के इस समूह का हिस्सा नहीं हैं। ट्रस्ट ने दैनिक आधार पर संपूर्ण राम जन्मभूमि परिसर को सैनिटाइज करने का निर्णय लिया है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को समारोह में शामिल होने वाले हैं, जिसके लिए दिवाली जैसी तैयारियाँ जोरों पर हैं। श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने देश भर के सभी संतों से अपील की है कि वे अपने संबंधित मंदिरों और मठों में ही 5 अगस्त को सुबह 11.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक पूजा करें। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से अनुरोध किया गया है कि लोगों से निवेदन करें कि वे इसे शाम को अपने घर पर ही टेलीविजन पर भूमि पूजन का सीधा प्रसारण देखें और घरों में दिया जलाएँ।

झारखंड तक पहुँची एमपी, राजस्थान की आग: कॉन्ग्रेस के 9 MLA नाराज, सोरेन सरकार की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद अब झारखंड में कॉन्ग्रेस विधायक उपेक्षा से नाराज बताए जा रहे हैं। यहॉं हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो-कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही है। नाराज कॉन्ग्रेस विधायक अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पहुॅंचे हैं।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इन विधायकों के नाम इरफान अंसारी, राजेश कच्छप और उमाशंकर अकेला है। इनके साथ राज्यसभा सदस्य धीरज प्रसाद साहू भी आए। सबने यहाँ सोनिया गाँधी के सलाहकार अहमद पटेल और गुलाब नबी आजाद से मुलाकात की। फिर झारखंड दोबारा लौट गए।

दिल्ली आए विधायकों ने सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। लेकिन मीडिया में बताया जा रहा है कि उन्होंने कॉन्ग्रेस हाइकमान से यह गुहार लगाई है कि सोरेन सरकार में उनकी बिलकुल नहीं सुनी जाती। वहाँ कॉन्ग्रेस विधायकों के साथ सोरेन सरकार का रवैया भी ठीक नहीं है। इन्हीं हालातों के मद्देनजर सूचना है कि करीब 9 विधायक ऐसे हैं जो हेमंत सोरेन सरकार से नाराज हैं और आने वाले समय में मौजूदा सरकार की परेशानी बढ़ा सकते हैं।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार नई दिल्ली आकर कॉन्ग्रेस विधायकों ने हाइकमान को आगाह किया कि अगर इस मामले में कुछ एक्शन नहीं लिया जाता तो झारखंड में भी सरकारें अस्थिर हो सकती है। दिल्ली में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं की ओर से उन्हें शांत रहने की नसीहत दी गई।

विधायकों की यह भी माँग है कि राज्य में एक मंत्री पद खाली पड़ा हुआ, उसे जल्द से जल्द भरा जाए और वरिष्ठ विधायकों में से एक को मंत्री बनाया जाए। उनका कहना कि सरकार को चलाने में सबका सहयोग लिया जाना चाहिए। लेकिन सहयोगी पार्टी होने के बाद भी उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में कॉन्ग्रेस के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने भाजपा पर आरोप लगाया था कि वह सरकार गिराने के लिए पार्टी के विधायकों को प्रलोभन दे रही है। बताया जाता है कि पार्टी के भीतर उनको लेकर भी नाराजगी है। वे प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ राज्य सरकार में वित्त मंत्री भी हैं। पार्टी नेता उन्हें एक पद से मुक्त करने की माँग लंबे समय से कर रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले मध्य प्रदेश में उपेक्षा से नाराज कॉन्ग्रेस विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी छोड़ दी थी। इसकी वजह से कॉन्ग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई। अब राजस्थान में उठापठक चल रहा है। वहां सचिन पायलट के समर्थक विधायक अपनी अनदेखी से नाराज हैं। पायलट को उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर कॉन्ग्रेस ने इन विधाकयों पर दबाव डालने की कोशिश की थी। लेकिन अब तक बगावत खत्म करने में उसे सफलता नहीं मिली है और गहलोत सरकार पर गिरने का खतरा मॅंडरा रहा है।

बंगाल: अब बीजेपी के बूथ सचिव का शव पेड़ से लटका मिला, 24 घंटे के भीतर दूसरी घटना

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना के मथुरापुर में गुरुवार (30 जुलाई, 2020) को भाजपा बूथ सचिव गौतम पात्र का शव पेड़ से लटका मिला है। बीते 24 घंटे के भीतर बंगाल में दो भाजपा कार्यकर्ताओं के शव पेड़ से लटके मिले हैं। इससे पहले पूर्वी मिदनापुर जिले के कछुरी गाँव में बीजेपी कार्यकर्ता पूर्णचंद्र दास का शव पेड़ से लटका मिला था।

मृतक के परिजनों व बीजेपी पार्टी ने सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस पर हत्या का आरोप लगाया है। बंगाल बीजेपी ने ट्वीट करके ममता सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “24 घंटे के भीतर बंगाल में एक और बीजेपी के कार्यकर्ता की राजनीति द्वेष के कारण हत्या कर दी गई। मथुरापुर में बूथ सचिव गौतम पात्र को भी बुरी तरह हत्या कर पेड़ से लटका दिया गया था। इस तरह राजनीतिक हत्याएँ राज्य की मुख्यमंत्री जो गृहमंत्री भी है उनके कार्यालय में बहुत ही आम हो चुकी है। परन्तु वह अब इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकती हैं।”

गौरतलब है कि पूर्णचंद्र दास के पारिवारिक सदस्यों के मुताबिक उनसे टीएमसी में शामिल होने के लिए कहा जा रहा था लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव से मना कर दिया। इसके बाद टीएमसी के लोग उन पर लगातार दबाव बना रहे थे।

दास के परिजनों के अलावा स्थानीय भाजपा नेता अनूप चक्रवर्ती ने भी इस मामले पर टीएमसी को जिम्मेदार बताया है। उन्होंने कहा, “हमें पूरा यकीन है कि इसमे टीएमसी का हाथ है। उनकी पहले हत्या की गई और बाद में उनका शव फंदे पर लटका दिया गया ताकि ये आत्महत्या लगे।”

वहीं, टीएमसी ने आरोपों को खारिज करते हुए निराधार और राजनीति से प्रेरित बताया था। टीएमसी के अखिल गिरी कहा कि, “हमारी पार्टी का इसमें कोई हाथ नहीं है। ऐसा लगता है अवसाद के कारण उन्होंने आत्महत्या की। दास और उनके पड़ोसी के बीच कई समय से एक कानूनी झगड़ा चल रहा था। भाजपा सिर्फ इसका राजनीतिकरण करने की कोशिश कर रही है।”

उल्लेखनीय है कि बंगाल में राजनीति से जुड़े लोगों की रहस्यमय परिस्थितियों की मौत की कई घटना पिछले कुछ समय में सामने आई है। खासकर बीजेपी से जुड़े लोगों की। अभी कुछ दिन पहले सुदर्शनपुर के रायगंज में हेमताबाद के भाजपा विधायक देबेन्द्र नाथ रॉय का मृत शरीर एक फंदे से झूलता मिला था।

रॉय के परिजनों ने पूछताछ में बताया था कि रात के 1 बजे कुछ युवक उन्हें बुलाने आए थे। इसके बाद से उनकी कोई जानकारी नहीं मिली। अगले दिन सुबह कुछ स्थानीय लोगों ने उन्हें फंदे से झूलता हुआ पाया। पुलिस ने बताया था कि विधायक का मृत शरीर बंद चाय की एक दुकान के सामने झूल रहा था।

LAC पर 35000 सैनिकों की होगी तैनाती, युद्ध स्मारक पर अंकित होंगे गलवान के 21 बलिदानियों के नाम

चीन की चालबाजियों के मद्देनजर भारत ने किसी भी स्थिति से निपटने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 35,000 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की तैयारी शुरू कर दी है। वहीं गलवान घाटी में बलिदान हुए 21 जवानों के नाम युद्ध स्मारक पर अंकित किया जाएगा।

अनाम अधिकारियों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से 3,488 किमी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति बदल जाएगी।

एक अधिकारी ने बताया कि 15 जून को पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। संघर्ष में भारत के 21 जवान और अफसर बलिदान हुए थे जबकि चीन के कम से कम 45 सैनिक मारे गए। गलवानी घाटी में हुए खूनी संघर्ष के बाद भारत ने भी सीमा पर अतिरिक्त सैनिकों, तोप और टैंकों की तैनाती की है। अधिकारियों ने बताया कि हालात को मद्देनजर रखते हुए वहाँ और भी ज्यादा सैनिकों की तैनाती की आवश्यकता है।

दिल्ली स्थित थिंक टैंक ‘द यूनाइटेड सर्विस इंस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया’ के डायरेक्टर और रिटायर्ड मेजर जनरल बीके शर्मा ने कहा, ”लाइन ऑफ कंट्रोल की प्रकृति, कम से कम लद्दाख में हमेशा के लिए बदल गई है। किसी भी पक्ष की ओर से अतिरिक्त सैनिकों की वापसी तब तक नहीं की जाएगी जब तक सर्वोच्च राजनीतिक स्तर से पहल ना हो।”

सरकारी सूत्रों ने एएनआई को बताया, “हम पूर्वी लद्दाख सेक्टर में तैनात किए गए लगभग 35,000 सैनिकों के लिए अत्यधिक ठंडे मौसम वाले पोर्टेबल केबिन उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहे हैं।” उन्होंने कहा, “वहाँ तैनात हमारे सैनिकों ने सियाचिन, पूर्वी लद्दाख या पूर्वोत्तर में पहले ही एक या दो कार्यकाल किए हैं और वे वहाँ लंबी तैनाती के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हैं।”

एनएनआई ने सूत्रों के हवाले से कहा कि भारतीय मोर्चे पर तैनात चीनी सैनिकों में मुख्य रूप से ऐसे लोग शामिल हैं जो 2-3 साल की अवधि के लिए पीएलए में शामिल होते हैं और फिर अपने सामान्य जीवन में लौट जाते हैं।

वहीं पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून की रात चीन के धोखे से किए गए वार में बलिदान हुए 21 जवानों के नाम राष्ट्रीय समर स्मारक पर अंकित किया जाएगा। इस प्रकिया में कुछ महीनों का समय लगेगा। अधिकारियों ने गुरुवार को इस बारे में जानकारी दी।

झड़प में 16 वीं बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग अधिकारी कर्नल बी संतोष बाबू समेत अन्य सैन्यकर्मी बलिदान हो गए थे। इस घटना के बाद पूर्वी लद्दाख में सीमा पर तनाव बढ़ गया और भारत ने इसे ‘चीन द्वारा सोची-समझी और पूर्वनियोजित कार्रवाई’ बताया था।

चाँद और उसके साथी जावेद-सलीम गिरफ्तार: दिल्ली में बुजुर्ग महिला और उसके बेटे को बंधक बना लूटे थे लाखों

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दयालपुर इलाके में 63 वर्षीय बुजुर्ग महिला और उसके बेटे को बंदी बनाकर लाखों की चोरी को अंजाम दिया गया। पुलिस ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया। इनकी पहचान मोहम्मद चाँद, जावेद और सलीम के रूप में हुई।

इनके पास से यूपी पुलिस ने 3.77 लाख रुपए बरामद किए हैं। साथ ही चाँदी के सिक्के और मोबाइल फोन भी बरामद किया, जिसे इन्होंने चोरी के पैसों से खरीदा था।

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, मो चाँद (30) ने 10 लाख रुपए का कर्जा लिया हुआ था। इसी बीच उसे मालूम चला कि डीयू के स्टाफ सुनील शर्मा (39) के घर में लाखों रुपए और जेवरात हैं। उसने माँ-बेटे को एक दिन अकेले देखकर 5 साथियों के साथ घर पर हमला बोल दिया।

सुनील शर्मा और उनकी माँ को बंदूक की नोक पर बंदी बनाया। 14.25 लाख रुपए कैश और 40 तोला सोना व 500 ग्राम चाँदी के जेवरात लूट लिए। इस दौरान सुनील शर्मा की माँ को थोड़ी चोटें भी आईं।

पुलिस उपायुक्त राकेश पावेरिया ने बताया कि सूचना पाते ही उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया। सीसीटीवी फुटेज खँगाली और कॉल रिकॉर्ड चेक किए। पड़ताल में संदिग्धों की तलाश में हापुड़ और लोनी में छापेमारी की गई। लेकिन, गुरुवार को सूचना मिली कि आरोपित चाँदबाग में है। पुलिस ने एक जाल बिछाया और 3 आरोपितों को पकड़ लिया।

पूछताछ में मालूम हुआ कि मोहम्मद चाँद को जुए की लत लगी हुई थी और वह भारी कर्जे में था। शर्मा के परिवार को वह अच्छे से जानता था और एक कार्यक्रम में सुनील की बहन ने उसे यह भी बता दिया था कि उसके भाई के घर पर कैश और जेवरात रखे हुए हैं। 

खुद को कर्जे से उबारने के लिए चाँद ने लूटपाट का प्लान बनाया। उसने इसके लिए जावेद (31), सलीम (19) और राजू को जोड़ा। जावेद भी कुछ समय पहले बहन की शादी करने के कारण कर्जे में था, तो वह भी इस अपराध के लिए तैयार हो गया।

उधर, राजू ने शरीक व रईस को जोड़ा व हथियारों का इंतजाम किया। बाद में सभी सुनील के घर पहुँचे वहाँ उन्होंने लूटपाट की। चाँद इस दौरान बाहर इंतजार करता रहा।

पुलिस के अनुसार, चाँद से पुलिस ने 2 लाख रुपए, जावेद से 1.5 लाख रुपए और सलीम से 50,000 रुपए बरामद किए हैं।

34 साल बाद बदली भारत की शिक्षा नीति: जानिए हर पहलू, सरल शब्दों में

केंद्र सरकार ने बीते दिन लगभग 34 साल बाद भारत की शिक्षा नीति में बदलाव किया। कई बदलाव ऐसे हैं, जिन्हें वाकई पढ़ा और समझा जाना चाहिए। सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि देश को वैश्विक स्तर पर मुखिया बनाने के दौर में शिक्षा नीति की भूमिका सबसे अहम होगी। 

चाहे सामाजिक न्याय और समानता हो या अर्थव्यवस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी या देश की एकता, शिक्षा की भूमिका लगभग हर क्षेत्र में अहम है। सरकार ने इन सारी बातों को मद्देनज़र रखते हुए शिक्षा नीति में बड़े पैमाने पर बदलाव किए हैं।  

सरकार ने शिक्षा नीति के इन बदलावों को बुनियादी स्तर पर 4 हिस्सों में बाँटा है। पहले और दूसरे हिस्से में प्राथमिक और उच्च शिक्षा का ब्यौरा है। तीसरे हिस्से में भाषा, संस्कृति और तकनीक पर विस्तार से चर्चा की गई है। चौथे हिस्से में इस बात का ज़िक्र है कि कैसे सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और नई नीति लागू कैसे की जाए।  

स्कूली शिक्षा

हमारे देश की शुरुआती पढ़ाई का ढाँचा 10+2 पर आधारित था। इसके हिसाब से एक बच्चा 6 साल की उम्र में पहली कक्षा में पहुँचता है। यानी 3 से 6 साल की उम्र के बीच उसका शिक्षा से कोई सरोकार नहीं रहता है। नए बदलाव के हिसाब से इसे 5+3+3+4 कर दिया गया है। और इसका नाम रखा गया है  Early Childhood Care and Education (ECCE), यानी 3 साल की उम्र से ही बच्चों की पढ़ाई शुरू होगी।  

शुरुआती उम्र से तैयार किए जाएँगे बच्चे 

सरकार ने ऐसा करने के पीछे उल्लेखनीय कारण दिया है।  सरकार का कहना है एक बच्चे के दिमाग का 85 फ़ीसदी विकास 6 साल की उम्र के पहले हो जाता है। ऐसे में यह बेहद ज़रूरी है कि वह पहली कक्षा में जाने के पहले विद्यालय (स्कूल) के लिए पूरी तरह तैयार रहे। बच्चों को बेहतर भाषा और अक्षर ज्ञान कराने के लिए अलग-अलग तरह के खेल और क्रियाकलापों का हिस्सा बनाया जाएगा। 

एनसीइआरटी (NCERT) दो हिस्सों में बच्चों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करेगी। पहला 0-3 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए और दूसरा 3-8 तक की उम्र के बच्चों के लिए। इसके अलावा प्राथमिक शिक्षा को आँगनबाड़ी से भी जोड़ा जाएगा। साथ ही आँगनबाड़ी को बहुत मज़बूती प्रदान की जाएगी। 

कक्षा 1 से पहले बच्चों को “Preparatory Class” यानी “बालवाटिका” में भेजा जाएगा। इसमें पढ़ाने वाले शिक्षक का ज़ोर बच्चों को स्कूली शिक्षा के लिए तैयार करना होगा। इसके पहले आँगनबाड़ी में काम करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को एनसीइआरटी के नीति-निर्देशों के आधार पर तैयार किया जाएगा। आदिवासी इलाकों के लिए ECCE के लिए “आश्रमशाला” बनाई जाएगी और इसमें भी ऊपर दी गई जानकारी के आधार पर काम होगा।  

30 बच्चों पर 1 शिक्षक का लक्ष्य 

सरकार के मुताबिक़ देश के 5 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्हें अंकों का सही ज्ञान नहीं है। सरकार का ज़ोर इस बात पर होगा कि वह जोड़, घटाव, गुणा और भाग करना सीखें। सरकार इस योजना पर चल रही है कि साल 2025 तक बच्चों को संख्याओं और अंकों की सही समझ हो जाए। इसके लिए बच्चों को कक्षा 3 तक अच्छे से अंकों की पढ़ाई करवाई जाएगी। 

इसके अलावा पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की बहाली की जाएगी। छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) 30:1 रखा जाएगा, यानी 30 बच्चों पर एक शिक्षक। वहीं आर्थिक और समाजिक रूप से कमज़ोर बच्चों के लिए यह अनुपात 25:1 रखा जाएगा। इसके लिए सरकार एक राष्ट्रीय स्तर का पोर्टल भी संचालित करेगी, Digital Infrastructure for Knowledge Sharing (DIKSHA)। बच्चों के पोषण (Nutrition) और मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) का ख़ास ध्यान रखा जाएगा।  

जिससे बच्चों की पढ़ाई बीच में न छूटे 

सरकार इस बात पर भी विशेष ध्यान देगी कि ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में बच्चे विद्यालयों में दाख़िला लें और शिक्षा हासिल करें। कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों की पढ़ाई का सकल नामांकन अनुपात Gross Enrollment Ratio (GER) 90.9 % था। यानी 90.9 % बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं लेकिन आगे की पढ़ाई में ऐसा नहीं है।

कक्षा 9 से 10 और 11 से 12 तक यह अनुआत सिर्फ 79.3% और 56.5% है। सरकार इस लक्ष्य पर काम कर रही है कि साल 2035 तक 12वीं तक के बच्चों की पढ़ाई का GER 100% हो जाए। इसके लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के बच्चों के लिए National Institute of Open Schooling (NIOS) के तहत Open and Distance Learning (ODL) भी शुरू की जाएगी। साथ ही साथ पढ़ाई जारी रखने के लिए उनको बढ़ावा देने के लिए पूर्व छात्रों और स्थानीय समुदाय के लोगों की मदद भी ली जाएगी।    

किस उम्र में कितने दर्जे में होगा बच्चा 

इस नीति से बच्चों की शुरुआती पढ़ाई का पूरा ढाँचा बदला जाएगा। इसे कक्षा और आयु वर्ग के हिसाब से बदला जाएगा। यह कुछ इस तरह होगा, 3-8 साल, 8-11 साल, 11-14 साल और 14-18 साल। 5+3+3+4 कुछ इस तरह होगा, 

  • Foundational Stage: कुल 3 साल का प्री-स्कूल और कक्षा 1-2 की पढ़ाई 3 से 8 साल की उम्र तक
  • Preparatory Stage: 8 से 11 साल उम्र तक कक्षा 3 से 5 तक की पढ़ाई
  • Middle School Stage: 11 से 14 साल की उम्र तक कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई
  • High School or Secondary Stage: कक्षा 9 से 12 की पढ़ाई कुल दो हिस्सों में, 9-10 पहले हिस्से में और 11-12 दूसरे हिस्से में

इसके अलावा अलावा ECCE पाठ्यक्रम में अच्छे व्यवहार, मान-सम्मान की भावना, नैतिकता, व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता और सहयोग की भावना से जुड़ी चीज़ें भी बताई जाएँगी।

बच्चों को बनाया जाएगा बहुभाषी  

  • प्रायोगिक तरीके से पढ़ाई और सीखने पर ज़ोर दिया जाएगा, उदाहरण- किस्सागोई।
  • पाठ्यक्रम के लगभग हर पहलू में कला को शामिल किया जाएगा।
  • खेल-कूद को बढ़ावा दिया जाएगा, इसे फिट इंडिया मूवमेंट के तहत पढ़ाई में शामिल किया जाएगा।
  • बच्चों की पढ़ाई में ह्यूमैनिटीज़ (मानव मूल्यों) को भी शामिल किया जाएगा।
  • कक्षा 5 तक बच्चों की पढ़ाई में मातृभाषा अनिवार्य होगी। ऐसा निजी और सार्वजनिक दोनों तरह के विद्यालयों में किया जाएगा।
  • इसके अलावा भाषा की पढ़ाई पर ज़ोर दिया जाएगा। जिससे बच्चे ज़्यादा भाषाओं में संवाद कर सकें।
  • किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। बच्चों को 3 भाषाएँ पढ़ाने पर ज़ोर दिया जाएगा।
  • भाषाओं का चुनाव करने का अधिकार राज्य और बच्चों को दिया जाएगा।
  • एक भारत श्रेष्ठ भारत योजना के तहत ‘The Languages of India’ नाम की पहल शुरू की जाएगी। इसके तहत बच्चों को बताया जाएगा कि भारत की एकता का आधार भाषाएँ रही हैं।
  • बच्चों की पढ़ाई में संस्कृत भी अनिवार्य रूप से शामिल की जाएगी।
  • संस्कृत के अलावा तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयाली, उड़िया, पर्शियन, प्राकृत और पाली भी (वैकल्पिक रूप से) शामिल की जाएगी।
  • रूसी, कोरियाई, जापानी, चीनी, जर्मन, फ्रांसीसी, स्पैनिश जैसी अंतर्राष्ट्रीय भाषा भी पढ़ाई में शामिल की जाएगी।
  • साथ ही सांकेतिक भाषा में बच्चों की पढ़ाई भी पाठ्यक्रम में शामिल की जाएगी। 

बदला जाएगा परीक्षा और मूल्यांकन का स्वरूप 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के तहत एनसीईआरटी National Curricular Framework, NCF 2020 लागू करेगा। इसका हर 5 से 10 साल में मूल्यांकन किया जाएगा। आसान शब्दों में इसका लक्ष्य बच्चों से किताबों का भार कम करना होगा। साथ ही इसका लक्ष्य बच्चों में सीखने समझने का कौशल तैयार करना होगा। 

NCF के तहत बच्चों की परीक्षाओं का स्वरूप भी बड़े पैमाने पर बदला जाएगा। बोर्ड की परीक्षाओं में छात्रों को “बेस्ट ऑफ़ टू” असेसमेंट की सुविधा दी जाएगी। छात्रों के मूल्यांकन (असेसमेंट) के लिए National Assessment Centre बनाया जाएगा। इसका कार्य छात्रों की परीक्षाओं और मूल्यांकन के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना होगा। इसे लागू करने में State Achievement Survey (SAS) और National Achievement Survey (NAS) बनाया जाएगा। 

विद्यालयों में विषय और प्रोजेक्ट संबंधी समूह (क्लब/सर्कल) बनाए जाएँगे। इसमें विज्ञान, गणित, संगीत, शतरंज, कविता, भाषा, परिचर्चा के अलग -अलग सर्कल बनाए जाएंगे। यह बच्चों की पढ़ाई से पूरी तरह होगा।    

शिक्षकों के लिए भी होंगे तमाम नए अवसर  

नई शिक्षा नीति में शिक्षकों के लिए भी काफी कुछ नया है। 4 साल के बैचलर ऑफ़ एजुकेशन प्रोग्राम के लिए विशेष छात्रवृत्ति का प्रावधान किया गया है। इससे स्थानीय स्तर पर काफी संख्या में रोज़गार पैदा होगा, खासकर महिला शिक्षिकाओं के लिए। 

शिक्षकों का स्थानान्तरण भी विशेष परिस्थितियों में ही होगा। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को भी मज़बूत किया जाएगा। एक सुझाव के मुताबिक़ विद्यालयों को “स्कूल कॉम्प्लेक्स” बनाना चाहिए। इसके प्रबंधन के लिए स्थानीय लोगों को अभिवावकों की मदद ली जा सकती है। 

शिक्षकों के पास अपने तरीके से पाठ्यक्रम लागू करने का अधिकार होगा। शिक्षकों को ऑनलाइन मंच दिए जाएँगे, जहाँ वह अपने सुझाव साझा कर सकें। उन्हें एक साल में 50 घंटे का समय खुद पर काम करने के लिए मिलेगा।इस दौरान अच्छा प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को समय-समय पर प्रोन्नति भी मिलेगी। 

साल 2022 के अंत तक National Professional Standards for Teachers (NPST) बनाई जाएगी। इसमें शिक्षकों के विकास प्रोन्नति से जुड़े दिशा-निर्देश मौजूद होंगे। दिव्यांग बच्चों के लिए अलग शिक्षक रखे जाएँगे, जिनका काम उन बच्चों के विकास पर ध्यान देना होगा। साल 2030 के अंत तक शिक्षकों को पढ़ाने के लिए 4 साल का बीएड अनिवार्य होगा।   

दिव्यांग, ट्रांसजेंडर और लड़कियाँ सभी को समान शिक्षा

सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEDGs) से आने वाली आबादी को कई श्रेणी में बाँटा गया है। जिसमें मुख्य रूप से लैंगिक आधार पर (महिलाएँ और ट्रांसजेंडर), अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक को रखा गया है। इसके अलावा दिव्यांग, गरीबी रेखा से नीचे के लोग, तस्करी का शिकार हुए बच्चे, अनाथ और शोषित वर्ग से आने वाले बच्चे इन सभी के लिए सामान शिक्षा सुनिश्चित की जाएगी। 

जिन इलाकों में SEDGs श्रेणी के बच्चे ज़्यादा होंगे उन इलाकों को Special Education Zones घोषित कर दिया जाएगा। जवाहर नवोदय विद्यालय के तरह के विद्यालय तैयार किए जाएँगे जिसमें छात्रों को लगभग मुफ़्त सुविधाएँ मिलेंगी। इसमें लड़कियों और ट्रांसजेंडर की शिक्षा और सुरक्षा को मद्देनज़र रखते हुए छात्रावास तैयार किए जाएंगे। 

इसके अलावा दिव्यांग अधिकार क़ानून 2016 के तहत दिव्यांग बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित कराने के लिए उचित कदम उठाए जाएँगे। दिव्यांग बच्चों को समान शिक्षा दिलाने के लिए शिक्षा पद्धति में उनके अनुसार बदलाव होंगे। SEDGs वर्ग के बच्चों के लिए कई छात्रवृत्ति योजना भी शुरू की जाएँगी।               

पढ़ाई में बढ़ाई जाएगी गवर्नेंस की भूमिका 

शिक्षा में गर्वनेंस को बढ़ावा देने के लिए इससे जुड़े अधिकारियों को अहम ज़िम्मेदारियाँ दी जाएगी। इसमें मुख्य रूप से ज़िला शिक्षा अधिकारी (DEO) और खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) शामिल किए जाएँगे। यह विद्यालयों के कॉम्प्लेक्स/समूह के साथ मिल कर नीति-निर्देश लागू करेंगे। 

हर ज़िले या राज्य में “बाल भवन” का निर्माण कराया जाएगा जिसमें बच्चे हफ्ते के एक दिन जा सकेंगे। यह मूल रूप से सामुदायिक शिक्षा पर केन्द्रित होंगे और कई विद्यालयों के साथ मिल कर चलाए जाएँगे। विद्यालयों को बतौर ‘सामाजिक चेतना केंद्र’ भी स्थापित किया जाएगा।

सार्वजनिक विद्यालयों में होगा सुधार  

पुरानी शिक्षा नीति में ज़्यादातर नीति-निर्देश तैयार करने का अधिकार कुछ ही इकाइयों के पास है। मसलन, स्कूली शिक्षा विभाग। इसका तंत्र ऐसा है कि बड़े बदलावों की जगह बहुत कम बचती है। इसकी वजह से निजी क्षेत्र में शिक्षा का व्यवसायीकरण बहुत बढ़ा है। शिक्षा भले महँगी हुई है लेकिन यह तय नहीं हो पाया कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो पा रहा है या नहीं। 

इस ढाँचे में बदलाव के लिए कुछ निर्देश तैयार किए गए हैं। निजी से लेकर सार्वजनिक सभी तरह के विद्यालयों का उचित मूल्यांकन होगा। इससे बच्चों को बेहद शुरुआती स्तर से अच्छी शिक्षा मिलेगी। इसके अलावा Sustainable Development Goal4 (SDG4) सुनिश्चित किया जा सकेगा। सार्वजनिक विद्यालयों को बढ़ावा दिया जाएगा जिससे बच्चों को वहाँ भी अच्छी शिक्षा मिले। अभिवावकों को इस बात का विकल्प कि वह बच्चों का दाख़िला यहाँ भी करवा सकते हैं। National Achievement Survey (NAS) के तहत बच्चों की नियमित रूप से जाँच कराई जाएगी।   

उच्च शिक्षा के लिए कई खामियों का उल्लेख करते हुए उन पर काम करने की जरूरत बताई गई है। ये हैं;

  • सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए संस्थानों में अलग प्रावधान न होना।
  • शिक्षक और संस्थागत स्वायत्तता न होने की वजह से छात्रों का विकास न होना।
  • पाठ्यक्रम और विषयों के विस्तृत न होने से छात्रों में समग्र गुणों की कमी।
  • विश्वविद्यालयों में फंडिंग न होने के चलते शोध और अनुसंधान की कमी।
  • विश्वविद्यालयों में गवर्नेंस और मानकों की कमी।
  • नियमों की अनदेखी और फ़र्ज़ी तरीके से चल रहे शैक्षिक संस्थानों में बढ़ोतरी।

उच्च शिक्षा का हिस्सा लिबरल आर्ट्स 

सॉफ्ट स्किल्स (बुनियादी कौशल) को भारतीय शिक्षा का अहम हिस्सा बनाया जाएगा। इसमें कला (विशेष रूप से लिबरल आर्ट्स) को सबसे ज़्यादा महत्व दिया जाएगा। छात्रों को ज़्यादा से ज़्यादा कला विधा की समझ और जानकारी देने के लिए तक्षशिला और नालंदा की पद्धति पर काम किया जाएगा।

बाणभट्ट के कादम्बरी में 64 कलाओं के बारे में विस्तार से बताया गया था। इसमें सिर्फ चित्र कला और गायन नहीं बल्कि विज्ञान से संबंधित तमाम विषय शामिल थे। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में भी इस तरह की शिक्षा पर ज़ोर दिया जाएगा। इनके पाठ्यक्रम में भी ह्यूमैनिटीज़ और कला को शामिल किया जाएगा। 

उच्च शिक्षा में मानव संबंधी मूल्यों को विशेष रूप से शामिल किया जाएगा, सत्य, धर्म, शांति, प्रेम, अहिंसा, नागरिक मूल्य और जीवन कौशल। एक एकेडमिक बैंक ऑफ़ क्रेडिट बनाया जाएगा जिसके तहत संस्थानों के क्रेडिट का ब्यौरा तैयार किया जाएगा।  

दुनिया में भारतीय शिक्षा को बढ़ावा

देश में अच्छा प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को कई बड़े अवसर दिए जाएँगे। एक ऐसा केंद्र तैयार किए जाएगा जिसमें विदेशी छात्र भारतीय छात्रों के साथ मिल कर अनुसंधान संबंधी विषयों पर काम कर सकते हैं। दूसरे देशों के साथ इस पर समझौते भी किए होंगे जिससे ज़्यादा से ज़्यादा संख्या में साझा कार्यक्रम पूरे किए जा सकें। इसमें छात्रों से लेकर प्राध्यापकों तक सभी शामिल होंगे। 

देश में अच्छा प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को दुनिया के कुछ देशों में अपना परिसर बनाने का मौक़ा मिलेगा। इसके अलावा दुनिया के 100 सबसे अच्छे विश्वविद्यालय भारत में अपना परिसर स्थापित कर सकेंगे। साथ ही छात्रों को उच्च शिक्षा मुहैया कराने के लिए उन्हें आर्थिक मदद भी की जाएगी। इसके लिए नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल को बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा शिक्षक और छात्रों का अनुपात कम से कम 10:1 और ज़्यादा से ज़्यादा 20:1 रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।   

जिससे छात्रों की उच्च शिक्षा जारी रहे 

देश के हर वर्ग और हर क्षेत्र से आने छात्र उच्च शिक्षा जारी रखें इसके लिए भी कई नए प्रावधान किए गए हैं। सबसे पहले सरकार उच्च शिक्षा के लिए फंड बढ़ाएगी। उच्च शिक्षा में लिंगानुपात पर भी विशेष ध्यान रखा जाएगा। देश में ज़्यादा से ज़्यादा स्पेशल एजुकेशन ज़ोन बनाए जाएँगे। विश्वविद्यालयों में भारतीय और स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई कराने पर ज़ोर दिया जाएगा। 

उच्च शिक्षा में छात्रवृत्ति भी बढ़ाई जाएगी और शिक्षा में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा। उच्च शिक्षा में ऐसे बदलाव होंगे जिससे ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों का रोज़गार सुनिश्चित हो। इस बात का ख़ास ख़याल रखा जाएगा कि पढ़ाई के दौरान किसी छात्र का शोषण न किया जा रहा हो।   

प्रोफेशनल स्टडीज़ को उच्च शिक्षा का अहम हिस्सा बनाया जाएगा। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालय, विधि विश्वविद्यालय, स्वास्थ्य और विज्ञान विश्वविद्यालय, तकनीकी विश्वविद्यालय समेत हर तरह के शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा दिया जाएगा। लक्ष्य के मुताबिक़ साल 2030 तक प्रोफेशनल स्टडीज़ प्रदान करने वाले हर संस्थान को समूह के तौर पर विकसित किया जाएगा। अलग-अलग प्रोफेशनल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले संस्थानों के लिए उनकी आवश्यकता के हिसाब से निर्देश तैयार किए जाएँगे।    

देश और दुनिया में ऐसी तमाम घटनाएँ हो रही हैं जिन पर शोध और अनुसंधान की ज़रूरत है। जैसे जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या बढ़ोतरी और नियंत्रण, बायो टेक्नोलॉजी, डिजिटल दुनिया का प्रभाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कई अहम मुद्दे। ऐसे ज़रूरी मुद्दों पर अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए सरकार शोध और अनुसंधान पर विशेष ध्यान देगी। 

शोध और अनुसंधान, Research & Innovation (R&I) इतना अहम विषय होने के बावजूद भारत इस पर अपनी जीडीपी का केवल 0.69 हिस्सा खर्च करता है। वहीं दूसरे देशों से तुलना करें तो अमेरिका 2.8%, इज़रायल 4.3%, चीन 2.1% और दक्षिण कोरिया 4.2% हिस्सा खर्च करता है। 

भारत भी अब इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम करने वाला है। भारत का इतिहास शोध और अनुसंधान के मामले में बेहद गहरा है, इस नीति में उसे वापस हासिल करने की बात की गई है। इसके लिए National Research Foundation (NRF) तैयार की जाएगी, जिसका काम देश के विश्वविद्यालयों में शोध कार्य को बढ़ावा देना होगा।

साथ ही यह विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध का मूल्यांकन भी करेगा। इसके बाद कारगर शोध कार्यक्रमों की जानकारी सरकारी समूहों और एजेंसियों को देगा। शोध कार्यों को फंड दिलाना भी NRF के तहत ही आएगा।  

कैसे लागू होंगे उच्च शिक्षा के बेहतर विकल्प 

उच्च शिक्षा का स्वरूप बेहतर करने के लिए इसका रेगुलेटरी सिस्टम (लागू करने की पद्धति) बदला जाएगा। यह सारे कार्य भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (HECI) के तहत किए जाएँगे। इस आयोग में 4 स्वतंत्र इकाइयाँ शामिल की जाएँगी। इनके जरिए उच्च शिक्षा का बुनियादी ढाँचा सुधारा जाएगा। इसकी सबसे पहली इकाई होगी, 

  • National Higher Education Regulatory Council (NHERC) का काम मुख्यतः रेगुलेशन सुनिश्चित करना होगा।
  • National Accreditation Council (NAC) का काम मान्यता दिलाना होगा।
  • Higher Education Grants Council (HEGC) का काम फंडिंग उपलब्ध कराना होगा।
  • General Education Council (GEC) का काम शिक्षा के उचित मानक तय कराना होगा।

 उच्च शिक्षा में गवर्नेंस 

उच्च शिक्षा में गवर्नेंस को लेकर कई अहम कदम उठाए जाएँगे। सुविधाजनक मान्यता प्रणाली और स्वायत्तता तैयार की जाएगी। इसकी मदद से संस्थान खुद सकारात्मक बदलाव और बड़े कदम उठा सकेंगे। 

उच्च शिक्षा संस्थानों में बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स स्थापित किया जाएगा। इनका काम उच्च शिक्षा संस्थानों को राजनीति दखलंदाज़ी से बचाकर रखना होगा। प्राध्यापकों की भर्ती करना होगा और संस्थागत निर्णय लेना होगा। यह शिक्षाविदों और शिक्षा से जुड़े अनुभवी लोगों का एक समूह होगा जो उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए स्वतंत्र रूप से काम करेगा। तय लक्ष्य के मुताबिक़ साल 2035 के अंत तक देश के लगभग सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स का यह समूह होगा।  

भाषाओं के ज़रिए युवाओं को पढ़ाने का लक्ष्य 

इसके अलावा जिस बात पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाएगा वह है युवाओं की शिक्षा और भारतीय भाषाओं का प्रचार। इन दो बातों के अलावा प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कला और संस्कृति को भी शामिल किया जाएगा। दशकों पहले देश में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन शुरू किया गया था, इसे आधार बनाते हुए सरकार देश के हर युवा को साक्षर और शिक्षित बनाने लक्ष्य लेकर चल रही है। देश भर में इसके लिए एडल्ट एजुकेशन सेंटर शुरू किए जाएँगे। 

नई शिक्षा नीति में ‘अतुल्य भारत’ को आधार बनाते हुए भारतीय संस्कृति के एक बड़े हिस्से को पढ़ाई में शामिल करने की बात कही है। यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लगभग लुप्त बताया है। पिछले 50 सालों में लगभग 50 भारतीय भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। इसके अलावा एक और नए तरह का संस्थान शुरू किया जाएगा Indian Institute of Translation and Interpretation (IITI)। इसका काम व्याख्या और अनुवाद संबंधी काम को बढ़ावा देना होगा। 

भाषा और संस्कृति की पढ़ाई करने वालों के लिए छात्रवृत्ति शुरू की जाएगी। इतना ही नहीं डिजिटल इंडिया अभियान के तहत देश में आधुनिक माध्यमों के ज़रिए संवाद को बढ़ावा दिया जाएगा।  

जीडीपी का 6% शिक्षा पर 

नई शिक्षा नीति में ‘केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड’ को मज़बूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। शिक्षा को सबसे ऊपर रखने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर ‘शिक्षा मंत्रालय’ किया जाएगा। इसके अलावा नई शिक्षा नीति में सबसे ज़्यादा इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी का 6% तक खर्च हो। फिलहाल यह 4.43% ही है। यह दुनिया के तमाम विकासशील और विकसित देशों से कमतर हैं। इसलिए नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च को बढ़ावा देने की बात का ज़िक्र है। 

यह भारत की साक्षरता और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए ही बहुत ज़रूरी है। सरकार इस योजना पर काम कर रही है कि 2030 से 2040 के दशक के बीच यह शिक्षा नीति पूरी तरह प्रभावी होगी।     

मौत के बाद भी इरफान पर टूट पड़े थे इस्लामी कट्टरपंथी, बेटा बाबिल बन गया ‘डरा हुआ मुस्लिम’

दिवंगत अभिनेता इरफान खान के बेटे बाबिल इन दिनों सोशल मीडिया पर ‘डरे हुए मुस्लिम’ की तरह बर्ताव कर रहे हैं। वह सोशल मीडिया पर बता रहे हैं कि अगर वह सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ लिखेंगे तो उनका करियर खतरे में पड़ जाएगा।

अपने इंस्टाग्राम पर बाबिल खान ने लगातार कुछ पोस्ट डाले हैं। इनमे पढ़ा जा सकता है कि रक्षाबंधन के लिए छुट्टी और बकरीद के लिए छुट्टी न पाकर वह निराश हैं। वह लिखते हैं कि यह सब हमारे देश की सेकुलर रचना के ख़िलाफ़ है। बाबिल लिखते हैं कि वे नहीं चाहते कोई उन्हें उनके मजहब से जज करे। वह भी अन्य भारतीयों की तरह ही मनुष्य हैं।

इरफान खान के बेटे को दुख ये है कि बकरीद जो शुक्रवार को पड़ रही है उसकी छुट्टी निरस्त कर दी गई है, जबकि रक्षा बंधन जो सोमवार को पड़ रहा है उसकी छुट्टी दी जा रही है। उनका यह भी दावा है कि सेकुलर भारत में इस तरह धार्मिक विभाजन बहुत खतरनाक हो रहा है। आगे वे बताते हैं कि उनके दोस्तों ने उनके मजहब के कारण उनसे बात करना बंद कर दिया है।

अब इस मामले में दिलचस्प बात ये है कि जिस देश और सरकार से वह बकरीद की छुट्टी न मिलने पर मलाल मना रहे है, उसी देश की केंद्र सरकार ने सरकारी छुट्टियों में ईद उल अधा को शामिल किया है। लेकिन रक्षाबंधन इस सूची में शामिल नहीं है।

हम देख सकते हैं कि 14 सरकारी छुट्टियों के बीच 4 छुट्टियाँ इस्लामिक त्योहार पर दी गई है। इनमे 3 ईद और 1 मुहर्रम की हैं। जबकि हिंदुओं के पर्वों में सिर्फ़ दिवाली को सरकारी छुट्टियों में रखा गया है। होली भी यहाँ वैकल्पिक छुट्टियों की सूची में है। वहीं, राखी को ये भी स्थान प्राप्त नहीं है।

इसके बावजूद भी बाबिल लिख रहे हैं कि जो लोग सत्ता में है वह धार्मिक विभाजन करवा रहे हैं। हम देख सकते हैं कि महाराष्ट्र सरकार ने 2020 की छुट्टियों की सूची में बकरीद को सरकारी छुट्टियों की लिस्ट में डाला हुआ है। बावजूद इसके कि वो 1 अगस्त यानी शनिवार के दिन पड़ रही है। लेकिन राखी इस लिस्ट में नहीं है।

ऐसे में शनिवार के दिन पड़ने वाली ईद के लिए सरकार को दोषी ठहराना आखिर कहाँ तक उचित है। वो भी तब जब ये त्योहार पूरी तरह से चाँद दिखने पर निर्भर करता हो और जामा मस्जिद के शाही मौलवी तक ने इसके लिए 1 अगस्त की तारीख को सुनिश्चित किया हो।

उल्लेखनीय है कि इरफान खान की दुखद मौत के बाद भी इस्लामिक कट्टरपंथी अपनी मजहबी घृणा का प्रदर्शन करने से बाज नहीं आए थे। इसकी वजह है इरफ़ान खान द्वारा इस्लाम की कुरीतियों और मजहबी कट्टरता पर बेबाकी से रखे गए विचार थे।