भारत में शिक्षा व्यवस्था के क्या हाल हैं ये किसी से छिपा नहीं हैं। देश में सरकारी स्कूलों की हालत बिलकुल जर्जर है। बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति चरमराई हुई है। छात्र-छात्राओं का उद्देश्य आज केवल एग्जाम पास करना रह गया है। IIT से लेकर डीयू तक में अलग-अलग समस्याएँ हैं। बच्चे स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर शिक्षा ग्रहण करते हुए भी केवल रट्टा मारकर उत्तीर्ण होना चाहते हैं। जबकि इस लेवल पर तो छात्रों के भीतर विश्लेषणात्मक गुण विकसित होना सबसे महत्तवपूर्ण होता है।
सरकार ऐसी ही शिक्षा प्रणाली को सुधारने के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लेकर आई है। इस नई शिक्षा नीति के जरिए सरकार का मुख्य जोर शिक्षा में समानता पर है और साथ ही सभी को गुणवत्ता वाली शिक्षा की जद में कैसे लाया जाए, इस पर जोर दिया गया है। लेकिन, बावजूद इसके सवाल ये है कि NEP में है क्या?
इसे लेकर आपने अभी तक कई विश्लेषण सोशल मीडिया पर देख लिए होंगे। या हो सकता है आपने इस विषय पर कई जगह बिंदुवार तरीके से पढ़ भी लिया हो। वामपंथी तो इसे बिना पढ़े ही इस पर ज्ञान बाँच रहे हैं। सीताराम येचुरी जैसे बुद्धिजीवियों ने तो इसे बिलकुल खारिज कर दिया है। ऐसे में ऑपइंडिया संपादक ने पूरा 70 पेज का डॉक्यूमेंट पढ़ा। जिसे मूल दस्तावेज का सारांश बताया जा रहा है।
सोशल मीडिया में रिया चकवर्ती का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें वह खुद को गुंडों की ताई बता रही हैं। हफ्ता वसूली, गुंडा जैसे शब्दों का भरपूर इस्तेमाल करते हुए भाई लोगों जैसी जुबान में ही बात कर रही हैं।
वह अपने बॉयफ्रेंड का भी जिक्र करती हैं। हालॉंकि किस बॉयफ्रेंड की बात हो रही है यह साफ नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह वीडियो कब का है। उल्लेखनीय है कि सुशांत सिह राजपूत की मौत के बाद रिया विवादों के केंद्र में हैं। वह सुशांत की गर्लफ्रेंड थीं।
वीडियो में रिया बिना नाम लिए कहती हैं, “मेरा बॉयफ्रेंड सोचता है कि वह डॉन है जबकि असली डॉन मैं हूॅं। मैं उसे कंट्रोल करती हूॅं।”
खुद को गुंडा बताते हुए रिया ने वीडियो में कहा, “मैं बहुत बड़ी डॉन हूँ, मुझे पता है कि इन छोटे गुंडों और लड़का लोग को कैसे मैन्यूप्लेट करने का है।”
रिया ने आगे कहा,” मेरा क्लास थोड़ा इन छोटे गुंडों से अलग है। मैं अपने हाथों को गंदा नहीं करती, मैं गुंडा लोग से गुंडागर्दी करवाती हूँ। उदाहरण के लिए, मैं उन्हें एक निर्माता के पास जाने और हफ्ता इकट्ठा करने के लिए भी कह सकती हूँ। वे सोच सकते हैं कि वे डॉन हैं, लेकिन वास्तव में वे केवल मेरे लिए काम कर रहे हैं।”
आखिर में रिया यह भी कहती हैं कि ये सब रिकॉर्ड मत करना।
ऊपर दिए गए वीडियो क्लिप का यहाँ पूरा वीडियो है। जिसे आप देख सकते है।
इस वीडियो में रिया यह भी बखान कर रही हैं कि वह अपने कहे से पलट सकती हैं। वह बताती हैं कि कैसे मॉं-बाप के सामने झूठ बोलकर अपने भाई को हैरान कर दिया था। झूठी कसम खा ली थी।
रिया चक्रवर्ती पर दर्ज एफआईआर
सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने अपने बेटे की आत्महत्या को लेकर कई खुलासे किए है। सुशांत के पिता केके सिंह ने रिया को सुशांत की मौत का जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि रिया ने सुशांत को सुसाइड के लिए उकसाया है। सुशांत के पिता ने पटना में रिया और उनके परिवार समेत सहयोगियों पर भी एफआईआर दर्ज करवाया है।
सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत में बताया कि रिया चक्रवर्ती सुशांत का लैपटॉप, उनका पासवर्ड और कई सारी ज्वैलरी लेकर चली गई थीं। सुशांत के पिता ने रिया पर पैसे हड़पने तक का आरोप लगाया था। एफआईआर दर्ज होने के बाद बिहार पुलिस आत्महत्या की जाँच में जुट गई है। पुलिस की एक टीम जाँच के लिए मुंबई भी पहुँची है। जहाँ उन्होंने इस केस के सिलसिले में कई अहम जानकारी प्राप्त की है।
वहीं रिया चक्रवर्ती ने अपने बचाव करने के लिए देश के सबसे महँगे वकीलों में से एक सतीश मनेशिंदे को हायर किया है।
1998 में राजस्थान के एक मंदिर से भगवान शिव की एक प्राचीन 4 फीट की मूर्ति चोरी हो गई थी। 2003 में तस्करी के माध्यम से यह लंदन पहुॅंच गई। अब इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को लौटा दिया जाएगा। पत्थर की इस मूर्ति में भगवान शिव नटराज रूप में हैं।
चार फुट की मूर्ति 9वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राजस्थान की शैली में भगवान शिव का एक दुर्लभ और शानदार चित्रण है। गुर्जर-प्रतिहार वंश ने 8वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य तक उत्तर भारत में शासन किया था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मूर्ति फरवरी 1998 में राजस्थान के बरौली के घाटेश्वर मंदिर से चुराई गई थी। इसे 2003 में लंदन स्थित भारतीय दूतावास को सौंप दिया गया था। मूर्ति को लाने में लंदन स्थित भारतीय उच्चायुक्त ने अहम भूमिका निभाई है।
चोरी होने के बाद नटराज की इस मूर्ति को विदेश में कहीं बेच दिया गया था। साल 2003 में पता चला कि यह मूर्ति यूनाइटेड किंगडम में तस्करी कर दी गई थी। इस मूर्ति को वहाँ के ही एक व्यक्ति ने अपने निजी कलेक्शन में रख लिया था।
2017 में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) ने साबित किया कि ये वही मूर्ति है, जो कि साल 1998 में राजस्थान के घाटेश्वर मंदिर से चुराई गई थी। इस खुलासे के बाद से ही इस मूर्ति को भारत वापस लाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।
दिलचस्प बात यह है कि इस व्यक्ति ने 2005 में यूनाइटेड किंगडम में भारतीय उच्चायोग को स्वेच्छा से मूर्ति लौटा भी दी थी। भारतीय उच्चायुक्त ने अपने एक बयान में कहा कि वे आने वाले दिनों में भारत की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों को देश में वापस लौटाने में अहम भूमिका निभाएँगे।
गौरतलब है कि साल 2019 में लंदन स्थित भारतीय दूतावास की मदद से भारत को दो एंटीक वस्तुएँ लौटाई गईं थीं। इसमें एक 17वीं शताब्दी में बनी कांस्य धातु की कृष्ण मूर्ति थी, और दूसरा द्वितीय शताब्दी में निर्मित चूना पत्थर से बना नक्काशीदार स्तंभ था।
सुशांत सिंह राजपूत का केस पेचीदा होता हुआ नजर आ रहा है, आए दिन इस केस में एक नया खुलासा हो रहा है। बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत शुरू से ही सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर खुलकर बोलती हुई नजर आ रही हैं। कंगना रनौत ने एक बार फिर से रिया चक्रवर्ती पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किया है। जिसमें सुशांत के अकाउंट से एक्ट्रेस आलिया भट्ट को फॉलो किया गया है। वहीं बिहार पुलिस रिया चक्रवर्ती के खिलाफ मिले सबूत के आधार पर उसे गिरफ्तार करने की तैयारी में जुटी है।
दरअसल, हाल ही में सुशांत के एक फैन ने एक स्क्रीनशॉट शेयर किया है जिसमें उनके अकाउंट से आलिया को फॉलो किया गया। लेकिन यह उस समय हुआ जब सुशांत इस दुनिया में नहीं है। ऐसे में यह बात सुशांत के फैन को खटकी और उन्होेंने सोशल मीडिया पर वो स्क्रीनशॉट शेयर किया और लिखा, “सुशांत का स्मार्टफोन कौन इस्तेमाल कर रहा है ? यह देखिए स्क्रीनशॉट… सुशांत ने आलिया को फॉलो किया। यह मेरे ट्वीटर अकाउंट की नोटीफिकेशन है।
वहीं बॉलीवुड क्वीन कंगना इस ट्वीट को रिट्वीट करते हुए रिया चक्रवर्ती पर वार किया। उनकी टीम कंगना ने ट्वीट शेयर कर लिखा, “अब तो सुशांत मामले में सीबीआई जाँच होनी ही चाहिए। रिया के पास सुशांत के सारे गैजेट हैं। हो सकता है महेश भट्ट से आदेश आया हो कि आलिया को फॉलो करना है। सुशांत के कितने सारे पोस्ट डिलीट भी किए गए थे।” इस ट्वीट से कंगना ने शक जाहिर किया कि सुशांत का फोन कोई इस्तेमाल कर रहा है।
कंगना के इस बयान ने मामले को और उलझा दिया है। कंगना ने एक्टर रिया के साथ महेश भट्ट को भी इस मामले में घसीटा है। साफतौर पर सुशांत की आत्महत्या के पीछे की वजह कंगना इन दोनों को ही मान रही हैं।
वहीं दैनिक जागरण के रिपोर्ट के अनुसार रिया चक्रवर्ती की जाँच के लिए मुंबई पहुँची बिहार पुलिस को उसके खिलाफ कई अहम सबूत मिले है। बिहार पुलिस की टीम ने मुंबई में सुशांत के बैंक खातों और क्रेडिट-डेबिट कार्ड के लेनदेन से रिया चक्रवर्ती के कारनामों का पता लगा लिया है। सुशांत के बैंक खाते से हुई लेन देने से साफ हो गया है कि रिया चक्रवर्ती ने सुशांत के खाते से बड़ी रकम की हेराफेरी की है। सबूत जुटाने के बाद बिहार पुलिस रिया की गिरफ्तारी के लिए कोर्ट में आवेदन करेगी। इसके बाद पटना से महिला पुलिसकर्मियों की टीम मुंबई रवाना होगी।
गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत के पिता ने इस केस को नया मोड़ ही दे दिया है। सुशांत के पिता केके सिंह ने रिया को सुशांत की मौत का जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि रिया ने सुशांत को सुसाइड के लिए उकसाया है। सुशांत के पिता ने पटना में रिया और उनके परिवार समेत सहयोगियों पर भी एफआईआर दर्ज किया है।
सुशांत के पिता ने अपनी शिकायत में बताया कि रिया चक्रवर्ती सुशांत का लैपटॉप, उनका पॉसवर्ड और कई सारी ज्वैलरी लेकर चली गई थीं। सुशांत के पिता ने रिया पर पैसे हड़पने तक का आरोप लगाया था। वहीं एफआईआर दर्ज होने के बाद से सोशल मीडिया पर रिया चक्रवर्ती बुरी तरह ट्रोल होने लगी है।
13 अप्रैल 1919 के जलियाँवाला बाग नरसंहार को भला कौन भूल सकता है? 100 साल बाद भी कोई व्यक्ति शायद ही ऐसा हो जिसे ना मालूम हो कि उस दिन जनरल डायर के इशारे पर 1000 से ज्यादा बेगुनाह लोग गोलियों से भून दिए गए। 2000 से अधिक घायल हुए। इस खूनी दिन जैसा ब्रिटिशों का बर्बर रूप शायद ही कभी दिखा हो।
उस दिन जो कुछ भी हुआ उसने सबको झकझोर दिया। घरों से आती सिसकियों की आवाजें और परिजनों के सूखे आँसुओं ने जैसे कइयों के मन में बदले की आग जला दी थी। लेकिन उधम सिंह एक ऐसे नौजवान थे। जिन्होंने इस घटना के बाद अपने जीवन का मकसद ही जनरल डायर की मौत को बना लिया था। उन्होंने अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए पूरे 21 वर्षों तक इंतजार किया
26 दिसंबर 1899 को जन्मे उधम सिंह मात्र 2 वर्ष की आयु में माँ को खो चुके थे और 8 वर्ष की आयु में पिता का भी देहांत हो गया था। माता-पिता के जाने के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई के साथ अनाथालय में जीवन गुजारा। लेकिन 1917 में जब भाई भी अलविदा कह गए तो वह बिलकुल अकेले रह हए।
1919 में उन्होंने खुद को आजादी की मुहिम से जोड़ा और सैंकड़ों बेगुनाहों की जान का बदला लेने के लिए खुद को तैयार किया। उस समय वह मात्र 20 साल के थे। लेकिन अपनी आँखो के आगे जलियाँवाला बाग की घटना देखकर वह क्षुब्ध रह गए थे। शायद यही कारण था कि उस दिन सभी लोगों के घटनास्थल से चले जाने के बाद वह वहाँ फिर गए और वहाँ की मिट्टी को माथे पर लगा कर यह संकल्प लिया कि इस नरसंहार को अंजाम देने वालों से वह बदला जरूर लेंगे।
अपने संकल्प को पूरा करते हुए उन्होंने कई युक्तियाँ बनाईं। उन्होंने केवल जनरल डायर को मौत के घाट उतारने के लिए अपना नाम बदल-बदल कर अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्राएँ की। 1923 में वह अफ्रीका से होते हुए ब्रिटेन पहुँचे। मगर, 1928 में भगत सिंह के कहने पर वह भारत लौट आए और लहौर में उन्हें सशस्त्र अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में पकड़ लिया गया। जहाँ उन्हें 4 साल की सजा सुनाई गई।
इसके बाद 1934 में वह फिर लंदन पहुँचे। वहाँ उन्होंने 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहना शुरू किया और एक कार के साथ 6 गोलियों वाली एक रिवॉल्वर खरीदी।
अब उन्हें केवल सही मौके का इंतजार था। लंबे समय तक खुद को बदले की आग में जलाने वाले उधम सिंह ने 6 साल और इंतजार किया। फिर एक दिन वो समय आया जब उधम सिंह को अपना इंतजार खत्म होता दिखा। वो तारीख 13 मार्च 1940 की थी। जलियाँवाला नरसंहार के 21 साल बाद की तारीख।
रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी और वहाँ जलियाँवाला बाग को अंजाम देने वाले दो खलनायाक- माइकल ओ डायर और तत्कालीन सेक्रेट्री ऑफ स्टेट लॉर्ड जेटलैंड वक्ता के तौर पर आने वाले थे।
उधम सिंह जानते थे कि इससे अच्छा मौका दोबारा नहीं मिलेगा। वो उस दिन समय से उस बैठक में पहुँच गए और अपने साथ 6 गोलियों वाली रिवॉल्वर भी ले गए। उस बंदूक को ले जाने के लिए उन्होंने एक नायाब तरीका ढूँढा था। उन्होंने किताब के पन्नों को बीच में इस तरह से काटा था कि उसमें रिवाॉल्वर छिप गई। फिर उन्होंने बस डायर पर उसे चलाने का इंतजार किया। सभा में जाकर वह मंच से कुछ दूरी पर बैठ गए और सही समय की प्रतीक्षा करने लगे।
माइकल डायर मंच पर आए और भारत के ख़िलाफ़ जमकर जहर उगला। लेकिन जैसे ही उनका भाषण पूरा हुआ। उधम सिंह ने किताब से निकालकर बंदूक उसके सामने तानी और गोलियाँ चला दीं। डायर वहीं गिर गया और लॉर्ड जेटलैंड भी बुरी तरह घयाल हुआ।
मात्र दो गोलियों में दायर अपना दम तोड़ चुका था और हड़कंप में उधम सिंह के पास भागने का मौका भी था। हालाँकि उन्होंने ऐसा नहीं किया। नतीजतन वह गिरफ्तार कर लिए गए। बाद में न्यायालय में उन्होंने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को स्वीकारा और कहा, “मैं 21 साल से प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा था। डायर और जेटलैंड मेरे देश की आत्मा को कुचलना चाहते थे। इसका विरोध करना मेरा कर्तव्य था।”
उल्लेखनीय है कि बलिदानी उधम सिंह के उस दिन सभा से न भागने का एक कारण यह भी था कि वह चाहते थे कि दुनिया को जनरल डायर की काली करतूत पता चले और ये भी पता चले कि उधम सिंह ने उन्हें किस बात की सजा दी है।
गिरफ्तारी के बाद उन पर मुकदमा चला। 4 जून को उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। 31 जुलाई 1940 को पेंटन विले जेल में फँदे पर लटका दिए गया। बताया जाता है कि कॉक्सटन हॉल में माइकल ओर डायर को मारने के बाद भी वह बेरिकस्टन और पेंटनविले जेल से लिखे पत्रों में भी उधम सिंह ने अपना नाम मोहम्मद सिंह आजाद ही लिखा। आज उनके बलिदान को 80 साल बीत गए हैं। लेकिन आज भी उनके प्रतिशोध की ज्वाला हर किसी के मन में देशभक्ति की मिसाल बनकर देखने को मिलती है।
ऐसे बहुत कम दिन बचे हैं जिस दिन पत्रकारिता के नाम पर कोई कॉमेडी नहीं होती। पत्रकारिता पर बकैती का भार हर दिन बढ़ता ही जा रहा है, अब बिना रवीश की बकवास के सोमवार या बुधवार आता ही नहीं है। कोई दिन ऐसा नहीं आता जब फेसबुक या टीवी पर रवीश कुमार देश में बन रहे कानून, कानून के ड्राफ्ट, ड्राफ्ट के पन्ने, पन्नों की इंक, इंक की क्वालिटी, क्वालिटी आइसक्रीम, आइसक्रीम की डंडी, डंडी के झंडे, झंडे का रंग, रंगीन झंडे वाला मंदिर, मंदिर के शिलान्यास, प्रधानमंत्री के कुर्ते, केन्द्रीय मंत्री के बयान, रेलगाड़ी के पहिए, रफाल की कीमत, कोविड के आँकड़े, वित्त मंत्रालय के डेटा, सरकारी पोस्टर, शौचालय, मूत्रालय, रवीशालय आदि पर अपने सारगर्भित विश्लेषण देने से चूकते हों।
विश्लेषणों का दायरा और भी लम्बा हो सकता है। आने वाले दिनों में NDTV में कौन किसका काट कर भाग गया से ले कर, कौन अपना कटवाने के बाद भी प्रेमिका की शादी में सिलिंडर ढो रहा है, इस पर भी रवीशचर्चा की जा सकती है। मैग्सेसे पर पड़ती धूल से ले कर चेहरे पर छाती कालिमा की परत, जिसे घर आया मेकअप एक्सपर्ट फाउंडेशन या बीबी क्रीम मार कर भी सही नहीं कर पाता, इस पर भी रवीशचर्चा की जा सकती है और मोदी को जिम्मेदार बताया जा सकता है। झड़ते बालों और उड़ते टीआरपी पर भी रवीशरोना रोया जा सकता है। रविष अनंत, विषकथा अनंता।
हम मुद्दों को बहुत कम उनकी महत्ता से याद रखते हैं। एंकरों में पतित, पतिताधिराज और पतितखंती एंकरों के फेसबुक और ट्विटर टाइमलाइन पर जाएँ, इतने अच्छे कार्यों और योजनाओं के बीच भी, वो सरकार को किसी भी तरह से घेर लेना, कभी भी नहीं भूलते। मैं हैरान होता हूँ कि उन्हें इतने प्रपंची ख्याल आते कैसे हैं? 29 जून से 29 जुलाई के बीच रवीश ने कुल अनगिनत बार रवीशरोना रोया है।
सुबह में भी प्रोपेगेंडा ठेलते हैं, शाम में भी। मुझे एक गीत याद आ गया: सुबह को लेती है, शाम को लेती है, दिन में लेती है, रात में लेती है, क्या बुरा है, उसका नाम लेती है… गीत की अगली पंक्तियाँ हैं: रात को मोहे नींद न आए, मोदीघृणा मेरे तन को जलाए, तेरा तो हाल बुरा है, प्रपंच का रोग लगा है, चुपके से चोरी-चोरी, कॉन्ग्रेस से मिल ले गोरी… बस में लेती है, लोकल में लेती है, स्टूडियो में लेती है, टीवी पर लेती है… पूरा गाना अश्लील है, शब्द पर कम ध्यान दीजिए, भावनाओं को पकड़िए।
उन दिनों को भी याद करें जब रवीश कुतर्क के सहारे सुषमा स्वराज की मृत्यु के बाद उसमें राजनीति ढूँढ लाए थे। उन दिनों को भी याद करें जब रवीश का चैनल जुलाई के अंत तक 30 से 40 करोड़ लोगों के कोरोनाग्रस्त होने के दावे कर रहा था। वैसे पोस्टों को भी याद करें जब रवीश हर दिन ‘अहमदाबाद में टेस्टिंग नहीं हो रही है’ पर रोता था, लेकिन उसे मुंबई, दिल्ली या तमिलनाडु के आँकड़े सही लगते रहे।
29 जुलाई के रवीश के प्राइम टाइम पर अजीत भारती का वीडियो
भारत की पत्रकारिता में यह रवीश का सबसे बड़ा योगदान है। अच्छी योजनाओं और सरकारी कार्यों में भी, खोज-खोज कर कमियाँ बताई जाने लगी हैं। देखा-देखी बाकी वामपंथी एंकरों और पुराने चावल पत्रकारों ने भी, अपनी गिरती लोकप्रियता बनाए रखने के लिए, अपने दैनिक शौच से पहले और फेफड़ों से चढ़ते हर खखार (हिन्दी में बलगम) के बाद, मोदी और सरकार को गरियाना अपना परम कर्तव्य बना लिया है।
पत्रकारिता अब वैसी पत्रकारिता नहीं रही कि शाम में एक शो किया और चले गए। अब तो पत्रकारिता की शुरुआत रवीश जैसे लोग फेसबुक पर बकैती से करने लगे हैं। पत्रकारिता के नाम पर बकैती होती है, या बकैती के नाम पर पत्रकारिता, प्रोपेगेंडा के टाइम में ‘ललित लवंग लता परिशीलन कोमल मलय समीरे, मधुकर निकर करंबित कोकिल कूँजति कुंज कुटीरे’ करने से कोई फायदा नहीं।
पत्रकारिता को बकैती की फैक्ट्री से निकालने वाले पत्रकार इन दिनों दिन गिन रहे हैं। वो दिन वाकई बदकिस्मत होगा जिस दिन रवीश ने कोई बकैती न की हो। बल्कि NDTV को रवीश के प्राइम टाइम को दिन भर चलाना चाहिए ताकि पता चलता रहे कि कौन-कौन से ऐसे घंटे बचे हैं, जिस घंटे रवीश ने पत्रकारिता के नाम पर बकैती न की हो! ऐसे अभागे घंटों को भी हमें प्रोपेगेंडा और बकैती के प्राइम टाइम में बदलना चाहिए। अगर आप भी ऐसे किसी दिन या घंटे को जानते हों जब रवीश ने बकैती न की हो, तो ट्विटर पर ट्रेंड करवाइए, क्या पता रवीश अपना मलिनप्रभ चेहरा और म्लान आवाज ले कर आए और कुछ प्रोपेंगेडा चला दे!
कुछ एंकर इंटरनेट पर, या ऑफिस फोन कर ये पता करते रहते हैं कि उनके प्राइम टाइम की टीआरपी कितनी है। वो सोचते हैं कि बाकियों की इतनी बढ़ रही है, वो भी तो नौ बजे का ही स्लॉट छेंक कर बैठे हुए हैं, और कोरोना के समय में डर के मारे घर की लाइब्रेरी में गाँधी की फोटो लगा कर अपने प्रपंच को उनकी सत्यवादिता से बैलेंस भी कर रहे हैं, फिर भी बाकियों के प्रोग्राम टीवी के बाद यूट्यूब और ट्विटर पर भी देखे जाते हैं, जबकि उनका सिर्फ मजाक के लिए आँखों से नीले रंग निकलने वाले इमोजी की गिनती के लिए शेयर किया जाता है। आँकड़ों की बात मानें तो मैसूरपाकप्रेमी आनंद रंगनाथन के दो मिनट के क्लिप की दैनिक व्यूअरशिप लाखों में जाती है, रवीश के पूरे प्राइम टाइम को देखने वाले बैसाखनंदनों के समूह की गिनती आसपास भी नहीं फटकती।
मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो लोगों के बुरे दिनों में चिढ़ाते हैं कि तुमसे आधी उम्र का, दोपहर में प्रोग्राम करने वाला फलाँ एंकर भी तुमसे ज्यादा देखा और सुना जा रहा है, तुम टॉप टेन में कब आओगे? बल्कि मैं तो रवीश द्वारा घर में बैठ कर अपने ही प्राइम टाइम के प्रपंची यूट्यूब वीडियो को रिपीट मोड पर लगा कर ‘हें हें हें, क्या बात कह दी मैंने, मोदी डर गया होगा, इसीलिए मुझे इंटरव्यू नहीं देता’ कह कर ठहाके लगाने और फिर यह पाने पर कि इस आत्ममुग्धता में उन्हें सुनने वाला अपने घर में भी कोई नहीं है, मजाक नहीं बनाता।
अब सामान्य बकैती नहीं होती, बल्कि एक बात को पकड़ कर गन्ने की तरह सिट्ठी निकाल कर, उस सिट्ठी को भी आग लगा कर तापने और हाथ गर्म करने वाली बकैती आती है। 5 अगस्त के शिलान्यास के उल्लास से हर्षित हिन्दू जनता की प्रसन्नता में जब भारत डूबा होगा, तब इस अभागे पत्रकार की मनोदशा जो होगी, सो होगी, पर परसों के प्राइम टाइम में ‘याँ से उठता है कि, वाँ से उठता है, देख वो धुआँ कहाँ से उठता है’ की तर्ज पर जो राष्ट्र ने देखा, वो दृश्य अद्भुत था। ये बात और है कि जहाँ से वो प्राइम टाइम करता है, उसी कमरे में गाँधी की तस्वीर के नीचे वाले टेबल पर बर्नोल के साथ-साथ, जलन के अतितीव्र और आपातकालीन स्थिति में चले जाने के लिए कच्चे पीसे हुए आलू के पेस्ट की भी व्यवस्था रहती है।
पाँच रफाल और पाँच अगस्त के कारण, आप देखिए पाँच की किस्मत कि दिन चाहे 29 जुलाई हो, 5 अगस्त, बर्नोल के कुल पाँच ट्यूब की व्यवस्था रवीश के कोट की हर जेब में रहती है, क्या पता कब, क्या, और कैसे जल जाए। यही वो पाँच-पाँच की रट लगाने वाले प्रपंची प्रणाली है, जिसे सुन कर रवीश के फैन्स व्हाट्सएप्प में स्खलन और शीघ्रपतन का शिकार होते रहते हैं कि काश रवीश का प्राइम टाइम टॉप फाइव में न सही, टॉप टेन में ही आ जाए!
एनीवे! आपने अपनी सोच में रवीश की बकैती का दायरा छोटा कर लिया है, जबकि वो फेसबुक से आगे, प्राइम टाइम में भी ऐतिहासिक स्तर की बकैतियाँ हर दिन करता पाया जाता है। जैसे कि बंगाल में ममता के राज में एक भी दंगे नहीं हुए, जैसे कि रोहित वेमुला की मौत का कारण भाजपा है, जैसे कि कन्हैया और उमर खालिद द्वारा देश के टुकड़े होने की तमन्ना डिसेंट है, जैसे कि अरविंद केजरीवाल ने कोरोना को नियंत्रण में ला दिया, जैसे कि बंगाल में सारी नौकरियों की नियुक्तियाँ सही हो रही हैं, जैसे कि कमलनाथ के मध्यप्रदेश और गहलोत के राजस्थान के लोगों ने रवीश को ‘रवीश जी आपसे उम्मीद है’ हैशटैग के साथ कभी कोई चिट्ठी नहीं लिखी, जैसे कि इन राज्यों में बेरोजगारी भत्ता भी मिला और किसानों के कर्जे भी माफ हो गए…
इस प्राइम टाइम में बकैतश्रेष्ठ रवीश का पूरा टैलेंट ‘दिन’ शब्द को कितने ज्यादा बार प्रयोग किया जा सके इस पर था। अतः, उन्होंने अभागे दिन, ऐतिहासिक दिन, बदकिस्मत दिन, सुख भरे दिन, और पता नहीं कौन-कौन से दिन गिनाने के चक्कर में शो को इतना खींच दिया कि वो महीने जितना लम्बा हो गया। महीने से मुझे 1997 का एक बहुचर्चित गीत याद आ रहा है, स्वर दिया था श्री अल्ताफ राजा ने, और झूमा पूरा इंडिया था:
जब तुम से इत्तेफ़ाकन मेरी नज़र मिली थी अब याद आ रहा है, शायद वो जनवरी थी तुम यूँ मिलीं दुबारा, फिर माह-ए-फ़रवरी में जैसे कि हमसफ़र हो, तुम राह-ए-ज़िंदगी में कितना हसीं ज़माना, आया था मार्च लेकर राह-ए-वफ़ा पे थीं तुम, वादों की टॉर्च लेकर बाँधा जो अहद-ए-उल्फ़त अप्रैल चल रहा था दुनिया बदल रही थी मौसम बदल रहा था लेकिन मई जब आई, जलने लगा ज़माना हर शख्स की ज़ुबाँ पर, था बस यही फ़साना दुनिया के डर से तुमने, बदली थीं जब निगाहें था जून का महीना, लब पे थीं गर्म आहें जुलाई में जो तुमने, की बातचीत कुछ कम थे आसमां पे बादल, और मेरी आँखें पुरनम माह-ए-अगस्त में जब, बरसात हो रही थी बस आँसुओं की बारिश, दिन रात हो रही थी कुछ याद आ रहा है, वो माह था सितम्बर भेजा था तुमने मुझको, तर्क़-ए-वफ़ा का लेटर तुम गैर हो रही थीं, अक्टूबर आ गया था दुनिया बदल चुकी थी, मौसम बदल चुका था जब आ गया नवम्बर, ऐसी भी रात आई मुझसे तुम्हें छुड़ाने, सजकर बारात आई बे-कैफ़ था दिसम्बर, जज़्बात मर चुके थे मौसम था सर्द उसमें, अरमां बिखर चुके थे लेकिन ये क्या बताऊं, अब हाल दूसरा है अरे वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा है क्या करोगे तुम आखिर कब्र पर मेरी आकर थोड़ी देर रो लोगे और भूल जाओगे
परदेसी लोग साथ नहीं निभाते, ये बात और है कि परदेसी लोग बकैत एंकर की प्रिय पार्टी को डेढ़ करोड़ दे देते हैं, लेकिन बकैत एंकर उस पर चूँ भी नहीं करता, चूँ में तो खैर तीन अक्षर हैं, रवीश ‘च’ पर भी नहीं जाता। इसलिए, ‘इट्स बीन लॉन्ग, तेरी बीन सुने परदेसी, नागिन दिन गिन गिन गिन गिन गिन गिन गिन गिन गिन गिन (कै बार है भाई, दिमाग का घिरनी बना दिया… 11 बार है), हाँ तो नागिन के बाद दिन, फिर 11 बार ‘गिन’ के बाद पता चला नागिन मर गई! छः बार बोलते तो हो सकते हैं बच जाती। रवीश भी ‘दिन’ पर थोड़ा कम बोलते, तो शो बच जाता, टॉप टेन से बाहर नहीं जाता!
विकिपीडिया से फैक्ट उठाने वाले रवीश दूसरों पर इतिहास के बारे में तंज करते हैं तो एकदम रवीश लगते हैं! जिस देश का पूरा इतिहास ही रोमिला थापर, इरफान हबीब, रामचंद्र गुहा जैसे उपन्यासकारों ने लिखा हो, वहाँ तो कुंजी पढ़ने वाले सबसे अच्छे निकले कि उनके दिमाग में राष्ट्र को ले कर हीनभावना और आक्रांताओं के नाम सुन कर ऑर्गेज्मिक होने वाले हॉर्मोन्स नहीं दौड़े।
रवीश की बकैती पर इतना लम्बा लेक्चर क्यों दिया है? अभी तक मैं 1857 शब्द बोल चुका हूँ।
1857 वही दौर था जब देश में स्कोडा-लहसुन तहजीब की नौटंकी शुरू हुई थी, जिसे हम आज तक फैजाबाद के अयोध्या होने और वहाँ वापस फैज खान के मिट्टी लाने वाली सेकुलर नौटंकी के रूप में झेल रहे हैं।
रवीश की कोरोना बकैती मार्च से ही जारी है। लोगों में निराशा, हताशा और मरने का डर भरने की प्रचुर कोशिशों के उपरांत भी, लोग सड़कों पर दंगा करने नहीं उतरे, इससे बकैताधिपति रवीश को आश्चर्यातिरेक हुआ, वो अचंभित रह गए कि लोग थाली पीटने से ले कर, टॉर्च जलाने और लॉकडाउन का पालन करने में मोदी के साथ कैसे हैं। रवीश ने हर दिन बिना किसी समाधान की बात किए, संख्या के आधार पर पैनिक बाँटा, वो यह उम्मीद लगाता रहा कि एक दिन उसकी मेहनत रंग लाएगी और लोग सड़कों पर निकल जाएँगे।
लेकिन खुद अपने घर के एक कमरे में डर कर बैठा यह प्राइम टाइम पत्रकार अगर यह सोचता है कि लोग इसकी प्रपंची बातों में आ जाएँगे, और पूरे देश में तब्लीगियों की तरह, जान-बूझ कर थूकते हुए कोरोना फैलाने पर उतर आएँगे, ताकि मोदी की सरकार गिर जाए, तो रवीश यह जान ले, कि सरकारें न तो ऐसे बनती हैं, न गिरती हैं। वो बर्नोल घिसता रहे, वो 1957 के गीत गाता रहे, वो दूसरे चैनलों के रफाल कवरेज का मजाक बनाता रहे, सत्य यही है कि NDTV को भी पता है कि क्या बिकता है।
दूसरों का मजाक बनाने के चक्कर में अपना ही चैनल न देखने वाला रवीश, जो स्वयं को पत्रकारिता का एकमात्र मानदंड मानने के घमंड में बाल पका कर सनक की सीमाएँ लाँघता जा रहा है, अब अपने ही अच्छे दिनों की एक भद्दी पैरोडी बन कर रहा गया है। रवीश को 29 जुलाई के प्राइम टाइम जैसे स्टंट नहीं करने चाहिए क्योंकि जिनका दैनिक शो स्वयं में एक मजाक है, वो जब मजाक करते हैं तो हास्य का स्तर गिर जाता है। इसे देख कर कुणाल कामरा जैसे सस्ते और टुटपुँजिए स्वघोषित कॉमेडियन कहते होंगे कि इससे बढ़िया जोक तो साल में एक बार वो भी मार लेता है! हें, हें, हें?
रफाल की कवरेज बिलकुल हास्यास्पद रही है, और इसका मजाक रवीश ने प्राइम टाइम में बनाया, लेकिन ऐसा प्रतीत होता कि बकैतशिरोमणि रवीश स्वयं अपना चैनल भी नहीं देखता क्योंकि रफाल की कवरेज में जिस-जिस बात का मजाक रवीश उड़ा रहे थे, वो रफाल के उड़ने की तीव्रता से NDTV पर ही लगातार लैंड हो रहा था।
दूसरी बात, रवीश तो टीवी के एक घिसे-पिटे फॉर्मेट का उपहास कर रहा था कि कैसे एक मुद्दे पर समय बर्बाद किया जाता है, और हाइप बना कर लोगों को ठगा जाता है, लेकिन रवीश के करियर के उत्तरार्ध में उनका पूरा करियर ही एक मुद्दे को खींच कर, हाइप बनाने, डर का माहौल बाँटने, आपातकाल लाने, बागों में बहार खोजने, स्टूडियो से कैम्पेनिंग करने, असफल रहने, दोबारा कैम्पेनिंग करने, हर योजना का एक ही तरह से मजाक बनाने में व्यस्त रहा है, वो क्या दूसरों को उपदेश देंगे!
ढें, ढें, ढें, ढन, ढना, ढन के म्यूजिक के बिना ही रवीश ने अपनी पत्रकारिता का कॉफिन डॉन्स किया है। उसने ‘कड़े सवालों’ के नाम पर ‘कड़े सवालों’ का मतलब ही गौण कर दिया है। अब कड़े सवाल सिर्फ वो हैं जो रवीश पूछता है। उसने जो भी पूछा वही कड़ा सवाल है, उसने जो शो किया वही पत्रकारिता है, उसने जब गंभीर चेहरा बनाया, वही भारतीय जनमानस की सामूहिक चिंता का एकमात्र सटीक परिचायक है।
मैंने रवीश के फेसबुक पोस्ट, प्राइम टाइम और ब्लॉग आदि पर लिखना और बोलना दो महीने पहले ‘बकैत कुमार की रिपोर्ट’ के 32वें संस्करण के साथ ही छोड़ दिया क्योंकि अब इस व्यक्ति की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है। लेकिन कभी-कभी ऐसे सुनहरे मौके आते हैं कि आपको रिटायरमेंट त्याग कर मजे लेने के लिए आना पड़ता है।
भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के लिए अभी एक विवाद सबसे बड़ा है। वह है पार्टी के भीतर बुजुर्ग और युवा नेताओं के बीच जारी खींचतान। चाहे मध्य प्रदेश हो या राजस्थान, दोनों ही राज्यों में इस मुद्दे को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस ने अपना एक युवा नेता खो दिया और राजस्थान में दूसरा युवा नेता हाशिये पर है।
कॉन्ग्रेस में युवा बनाम बुजुर्ग
ऐसे में यह सवाल बेहद स्वाभाविक हो जाता है कि क्या पार्टी में युवा बनाम बुजुर्ग की गुटबाजी बढ़ती आ रही है? गुरूवार के दिन पार्टी मुखिया सोनिया गाँधी ने राज्यसभा सांसदों की बैठक बुलाई। इस बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेता ने पार्टी को आत्मनिरीक्षण का सुझाव दिया। जिस पर राहुल गाँधी के नज़दीकी माने जाने वाले एक युवा नेता ने उनका जम कर विरोध किया।
बैठक में शामिल होने वाले एक और नेता का कहना था कि राहुल गाँधी पूरा प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद हालात वैसे के वैसे ही बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस सरकार में पूर्व मंत्री पी चिदंबरम ने कहा “पार्टी का संगठन ज़िला और मंडल स्तर पर कमज़ोर है।” वहीं दूसरी तरफ कपिल सिब्बल ने कहा कि पार्टी को इसकी अंतिम पंक्ति तक निरीक्षण की ज़रूरत है। उनके मुताबिक़ संगठन के हर व्यक्ति को सिरे से सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है।
युवा नेता ने किया सिब्बल का विरोध
कपिल सिब्बल की तरफ से इस तरह का बयान आने के बाद उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। राज्यसभा सांसद और राहुल गाँधी के नज़दीकी माने जाने वाले राजीव सातव ने उनका विरोध किया। और कहा हर आत्मनिरीक्षण शुरू से होना चाहिए, जिस वक्त से हम सत्ता में थे। साल 2009 से लेकर साल 2014 के बीच का निरीक्षण किया जाना चाहिए। इसके बाद राजीव सातव ने कपिल सिब्बल पर हमलावर होते हुए कई बातें कही।
उन्होंने कहा कपिल सिब्बल के प्रदर्शन की भी समीक्षा होनी चाहिए। अगर यही निरीक्षण यूपीए 2 के दौर में हुआ होता तो आज कॉन्ग्रेस जिस स्थिति में है उस स्थिति में कभी नहीं होती। और न ही कॉन्ग्रेस को साल 2014 के आम चुनावों में सिर्फ 44 सीटें मिलतीं। इसलिए जितनी समीक्षा की ज़रूरत है वह सिलसिलेवार तरीके से होनी चाहिए और लगभग शुरू से होनी चाहिए।
वहीं राजस्थान में शिफ्ट किए जा रहे हैं विधायक
कॉन्ग्रेस बुजुर्ग बनाम युवा का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण राजस्थान की सरकार में नज़र आ रहा है। जहाँ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच तनाव बना हुआ है। विधानसभा सत्र पर मचे शोर के बीच विधायकों को शिफ्ट करने की बात सामने आ रही है। न्यूज़ 18 में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ सचिन पायलट खेमे के विधायकों के बाद अशोक गहलोत गुट के विधायकों को शिफ्ट किया जाएगा।
फिलहाल, आज जयपुर के होटल से 53 विधायक एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए हैं। सभी को चार्टर्ड फ्लाइट में जैसलमेर भेजा जाएगा। बाकी विधायकों को दूसरे राउंड में भेजा जाएगा। पहले यह तय किया गया था कि उन्हें जयपुर से बाहर जैसलमेर के मैरियट या सूर्यगढ़ के एक रिज़ोर्ट में रखा जाएगा। विधायकों को कुल 3 बार में चार्टर विमान से शिफ्ट किए जाने की योजना बनाई गई थी। वहीं राजस्थान सरकार के मंत्रियों को जयपुर में ही ठहरने के लिए कहा गया था। गुरूवार के दिन इस विषय पर विधायक दल की एक बैठक हुई थी। जिसमें ज़्यादातर विधायकों ने शिफ्ट करने की बात पर सहमति जताई। जिसके बाद योजना के आधार पर यह कदम उठाया जा रहा है।
जनता कैसे भाजपा की तरफ
सोनिया गाँधी की अगुवाई में हुई इस बैठक में कॉन्ग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए थे। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, एके एंटनी, कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आज़ाद, पी चिदंबरम और आनंद शर्मा समेत कई दिग्गज नेता शामिल हुए थे। इस चर्चा में पार्टी के दिग्गज नेताओं ने रणनीति और संगठन की कमज़ोरी दोनों में सुधार का सुझाव दिया।
चर्चा के दौरान पीएल पुनिया और रिपुन बोरा समेत कई नेताओं ने राहुल गाँधी को फिर से पार्टी अध्यक्ष बनाने की माँग उठाई। वहीं कुछ नेताओं का यहाँ तक कहना था कि मोदी सरकार कई मोर्चों पर असफल रही है। इसमें चीन का मुद्दा, अर्थव्यवस्था और कोरोना महामारी जैसे मुद्दे अहम हैं। इसके बावजूद जनता कॉन्ग्रेस की तरफ ध्यान नहीं दे रही है। इसके उलट भारतीय जनता पार्टी को लगातार समर्थन मिल रहा है।
कई बार कहा जाता है कि नारों से क्या होता है? हाल में जब दिल्ली के किसी विश्वविद्यालय में लगे नारों का मामला पुलिस तक पहुँचा और देशभर में उनकी फजीहत होने लगी, तो कुछ लोगों ने कहा कि भला यूनिवर्सिटी के छात्रों के नारों से क्या असर होगा?
ऐसे ही कुछ भी बोल गए होंगे, जाने देना चाहिए। ऐसा कहने या सोचने वालों की इतिहास की जानकारी या तो कम होती है, या फिर वो शुद्ध धूर्तता कर रहे होते हैं। बरसों पहले 1986 में एम कॉम की पढ़ाई कर रहे एक छात्र ने भी नारा लगाया था। करीब पैंतीस वर्ष पहले लगा ये नारा आज तक भारत में गूँज रहा है।
पक्ष के लोग या कहें कि भक्त इसे उत्साहवर्धन के लिए लगाते रहे, और विपक्ष के लोग या कहें कि कमभक्त इसे मजाक उड़ाने के लिए इस्तेमाल करते रहे। मध्यप्रदेश के राजगढ़ से एम कॉम कर रहे छात्र ने बजरंग दल के एक शिविर में जब ये नारा लगाया, तो फिर ये नारा रुका ही नहीं। नारा था – ‘राम लला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे!”
विपक्षी कमभक्तों ने इसमें ‘तारिख नहीं बताएँगे!’ जोड़कर इसका चुटकुला भी बनाना चाहा। ये उनके पूज्य गोएबेल्स की एक प्रचलित तकनीक है, जिसमें विपक्षी के तर्कों का जवाब देने के बदले उनका मजाक बनाया जाता है। कमभक्तों ने गोएबेल्स से अच्छी शिक्षा पाई थी, और काफी सफलतापूर्वक गोएबेल्स की तकनीक का इस्तेमाल करने की कोशिश भी की।
उस वक्त के छात्र बाबा सत्यनारायण मौर्य अब पचपन साल के हैं। उन्होंने छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में मंच संचालन भी किया था। उस वक्त वो आन्दोलन में प्रचार प्रमुख की भूमिका में थे। अयोध्या में उस दौर में दीवारों पर लिखे नारों और श्री राम और हनुमान जी के चित्रों में भी उनका काफी योगदान था।
वो अब भी पेंटिंग करते हैं और थोड़े दिनों में शायद उनकी प्रदर्शनी अयोध्या में भी होगी। लेकिन बात तो हम नारों की कर रहे थे। इन नारों में भी विशेष तौर पर ‘जय श्री राम’ के या इससे मिलते-जुलते दूसरे नारों से कई वर्गों को खासी समस्या रही है। कुछ मक्कार तो इसे श्री राम का नाम खराब करने की साजिश तक बताते रहे हैं।
राजपुताना रायफल्स का अस्तित्व जनवरी 10, 1775 है। भारतीय सेना के इस अंग के शौर्य की गाथाएँ और पदक तो अनगिनत हैं, लेकिन देखने योग्य उनका युद्ध उद्घोष है। वो ‘राजा रामचंद्र की जय’ के उद्घोष के साथ युद्ध में उतरते हैं। तो जैसा कि कुछ लोग साबित करना चाहते हैं, वैसे श्री राम का नाम कोई 1990 के दौर में युद्ध उद्घोष भी नहीं बना।
दूसरे तरीकों से भी देखें तो ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ लंका दहन करते हनुमान जी या लंका पर आक्रमण करती वानर सेना को लोग 1990 से थोड़ा पहले ही, रामानंद सागर के रामायण में देख चुके थे। ये अलग बात है कि कुछ लोगों ने इस नारे से चिढ़ना शुरू कर दिया तो बंगाल में ये नारा कई बार सुनाई दिया।
एक कोई लल्लू-पंजू से पोस्टर बॉय भी इस नारे को नारी विरोधी सिद्ध करने के प्रयास में ‘जय सियाराम’ कहने की वकालत करते दिखे थे। वैसे तो वो खुद स्त्रियों के साथ अभद्रता करने के कारण जुर्माना भर चुके हैं लेकिन हम नारे तक ही सीमित रहेंगे।
यहाँ गौर करने लायक ये है कि आप बड़ी आसानी से श्री राम या श्री कृष्ण कह सकते हैं। क्या उतना ही सुविधाजनक श्री को शिव, शंकर, महादेव या ब्रह्मा के आगे लगाना लगता है, या शिव जी, शंकर जी, ब्रह्मा जी कहना ठीक लगता है?
इसका साधारण सा कारण ये है कि ‘श्री’ लक्ष्मी का भी एक नाम होता है। इसलिए विष्णु के अवतारों के आगे तो वो आसानी से जुड़ता है, बाकियों पर जबतक किसी विशेष गुण को ना दर्शा रहा हो, तब तक नहीं जोड़ा जाता। तो जय सिया राम कहें या जय श्री राम, स्त्री का नाम पहले आ ही जाता है।
नारों, नामों, या प्रतीकों की महत्ता भारतीय तरीके से समझनी हो तो ‘राम से बड़ा राम का नाम’ वाली उक्ति याद रखिए। अगर इससे समझ ना आए तो ‘स्वास्तिक’ के प्रतीक को देखिए। हिटलर इससे मिलते-जुलते एक इसाई प्रतीक, मुड़े हुए क्रॉस (हकेन-क्रूज़) का इस्तेमाल करता था।
धूर्ततापूर्ण तरीके से इसे जबरन हिन्दुओं का ‘स्वास्तिक’ नाम दे दिया गया। इतने वर्षों में किसी ने विरोध नहीं किया, इसलिए कमभक्त इसे ‘स्वास्तिक’ घोषित करने में कामयाब भी हो गए। आज कई देशों में हकेन-क्रूज से मिलते जुलते दिखने वाले ‘स्वास्तिक’ के प्रयोग के लिए अकारण प्रताड़ित भी किया जाता है।
कुछ ऐसी ही नीचता, भक्त शब्द के साथ करने का (गोएबेल्स के नेमकालिंग वाला) करने का प्रयास तो हम सभी ने हाल ही में देखा है। बाकी जैसे-जैसे तिथि नजदीक आती जा रही है, कई लोग अगस्त में ही दीपावली मानाने की तैयारी में भी दिखते हैं। वैसे इससे हमें दूसरा वाला नारा – काशी-मथुरा बाकी है, याद आ जाता है, मगर उससे दीयों के बजाए कुछ और ही जलने लगेगा! नहीं?
देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अलग से ज़मीन दी थी। यह ज़मीन अयोध्या के धन्नीपुर गाँव, रौनाही में स्थित है। वक्फ़ बोर्ड ने साफ कर दिया है कि वह इस ज़मीन पर मस्जिद बनाएँगे। जिस पर साधू संतों ने प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि मुस्लिम समाज के लोग चाहें तो मिली हुई ज़मीन पर अस्पताल या विद्यालय बनवा सकते हैं। संत समाज इस पहल में उनकी आर्थिक मदद भी करेगा।
दरअसल, सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड ने मिली हुई ज़मीन पर ट्रस्ट का ऐलान कर दिया है। बोर्ड के चेयरमैन ज़ुफ़र अहमद फ़ारुखी ने बताया कि इस ट्रस्ट का नाम इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन होगा। ट्रस्ट के तहत ही उस ज़मीन पर मस्जिद का निर्माण कराया जाएगा। इस पर अयोध्या के संतों ने प्रतिक्रिया दी है। संतों का कहना है कि वह इसे गलत नहीं मानते हैं, उनकी मर्ज़ी वह मिली हुई ज़मीन पर कुछ भी बनवाएँ।
करा सकते हैं विद्यालय या अस्पताल निर्माण
इस मुद्दे पर राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येन्द्र दास ने भी अपना मत रखा है। उन्होंने कहा उनका (वक्फ़ बोर्ड) का जो मन करे वह बनवाएँ। लेकिन बाबर के नाम की मस्जिद किसी भी सूरत में नहीं बनाई जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो संत समाज इसका पूरी ताकत से विरोध करेगा।
आचार्य सत्येन्द्र दास (चित्र साभार – न्यूज़ 18)
इसके अलावा तपस्वी छावनी के महंत परमहंस दास ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि बाबर के नाम की मस्जिद पूरे देश में नहीं है। दान की भूमि पर मस्जिद का निर्माण नहीं किया जा सकता है, ऐसा होने पर मस्जिद में की गई दुआ कबूल नहीं होती है। नतीजतन मुस्लिम समाज को उस स्थान पर अस्पताल और विद्यालय खोलना चाहिए। अगर वह ऐसा करते हैं तो सबसे पहले हमारी तरफ से सवा लाख रूपए का दान तय है।
स्वीकार नहीं बाबर के नाम की मस्जिद
इसके अलावा उन्होंने कहा वक्फ़ बोर्ड को यह ज़मीन न्यायालय और सरकार से दान में मिली है। इस पर मस्जिद का निर्माण किया जाना सही नहीं है। यहाँ की जाने वाली कोई भी नमाज़ कबूल नहीं होगी, यह पूरी तरह इस्लाम के खिलाफ़ है। इसलिए ट्रस्ट को इस ज़मीन पर अस्पताल या विद्यालय का निर्माण कराना चाहिए। ऐसा करने पर सबसे पहले संतों की तरफ से आर्थिक मदद की जाएगी।
बिहार के बेगूसराय में दिनेश पंडित की बेटी को चार लोगों ने पिस्तौल के दम पर रास्ते से ही गाड़ी से उतारकर अगवा कर लिया। दिनेश पंडित की 15 वर्षीय बेटी को अगवा करते हुए मोहम्मद नरूल अंसारी ने उनसे कहा कि अगर यह पाकिस्तान होता, तो वह लड़की को घर से ही अगवा कर लेता। लड़की के पिता दिनेश द्वारा दर्ज शिकायत में नरूल के अलावा अन्य का नाम इज़मुल खान उर्फ नज़्मुल उर्फ आर्यन, मोहम्मद मुनफ़र अंजुम अंसारी उर्फ चाँद मोहम्मद और फ़रत है।
ऑपइंडिया से बातचीत में बेगूसराय, बछवाड़ा थाना स्थित गाँव भिखम चक के पीड़ित दिनेश पंडित (42) ने बताया कि उन्होंने अपनी बेटी के अपहरण के सम्बन्ध में थाने में शिकायत दर्ज कराई है। दिनेश पंडित ने बताया कि 26 जुलाई की शाम 5 बजे वो अपनी बेटी को लेकर घर लौट रहे थे, उसी समय चार लोगों ने उनका रास्ता रोककर उनकी बेटी का पिस्तौल के बल पर अपहरण कर लिया।
दिनेश ने कहा- “बाजार से खरीददारी कर जब मैं घर लौट रहा था तो एक बिना नंबर प्लेट वाली बोलेरो गाड़ी ने हमें बहरामपुर पंचायत के मोड़ पर रोक लिया। चारों ने हमें पकड़ लिया और धमकाते हुए कहा कि साले पाकिस्तान होता तो घर से ही उठा लेते। ये चारों एक ही परिवार के थे।”
दिनेश पंडित ने कहा कि इस बात की सार्वजनिक चर्चा के बजाए जब वो आरोपित नज़्मुल के घर उसकी माँ से अपनी बेटी को वापस माँगने गए तो उसकी माँ हसीना खातून और वहाँ मौजूद अन्य लोगों ने उसके साथ मारपीट और उनकी पत्नी के जेवर छीन लिए।
दिनेश के अनुसार, हसीना खातून ने उनकी पत्नी से बदसलूकी करते हुए कहा – “जाती है कुतिया यहाँ से या नहीं? तेरी बेटी को बाजार में बेच दूँगी, वैश्या बना दूँगी।”
दिनेश ने बताया कि इससे पहले भी नज़्मुल और उसकी माँ इस तरह की हरकत कर चुके हैं, इस कारण वो इस बदसलूकी के दौरान चुप रहे। इसके अगले दिन बृहस्पतिवार (जुलाई 30, 2020) को एक आदमी दिनेश पंडित को अपनी बिना नम्बर प्लेट की मोटरसाइकिल पर बिठाकर ले गया और आधे रास्ते में रुककर उनसे कहा कि अगर उन्हें अपनी बेटी वापस चाहिए तो 2 लाख रूपए देने होंगे।
उसने कहा कि ये 2 लाख रूपए नज़्मुल की माँ हसीना खातून के पास जमा कराने होंगे वरना उनकी बेटी को बांग्लादेश बेच दिया जाएगा। फिलहाल दिनेश पंडित पुलिस थाने में हैं और इस बारे में जाँच की अपील कर रहे हैं। दिनेश की तीन बेटियों में जिसका अपहरण किया गया है, वो सबसे छोटी बेटी है। वह इस साल अपनी कक्षा 10 की परीक्षा में शामिल हुई थी। उसकी दोनों बहनों की शादी हो चुकी है। उसका कोई भाई नहीं है।
बछवाड़ा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी ने आज सुबह (31 जुलाई) बताया कि कल देर रात (संख्या 58/2020) मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी। नामजद आरोपितों पर अपहरण और चोट पहुँचाने का मामला दर्ज किया गया है। इस मामले में आईपीसी की धारा 366, 323, 341, 379, 384 और 504 लगाई गई हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस ने POCSO अधिनियम लागू नहीं किया है क्योंकि अभी जाँच जारी है।
पीड़िता के पिता दिनेश पंडित द्वारा दर्ज की गई शिकायत की कॉपी –