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कोरोना के इलाज में प्रयुक्त हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा के शोध में बड़ा फर्जीवाड़ा, लैंसेट पत्रिका ने हटाया विवादास्पद शोधपत्र

कोरोना वायरस के इलाज को लेकर एक बड़ा शोध घोटाला उजागर हुआ है। चिकित्‍सा क्षेत्र की दुनिया की सबसे प्रभावशाली पत्रिकाओं में से एक द लैंसेट ने मलेरिया ड्रग्स क्लोरोक्विन और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के सम्बन्ध में किए गए चार लेखकों के फर्जी शोध पत्र को वापस ले लिया है।

गौरतलब है कि इन लेखकों का दावा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कोरोना महामारी की लड़ाई में गेमचेंजर्स के रूप में इस्तेमाल किए जाने से रोगियों में मृत्यु दर बढ़ जाती है। इसके पूर्व ऐसा ही एक शोध न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन द्वारा प्रकाशित किए गए थे।

दुनिया की प्रमुख चिकित्सा पत्रिकाओं में से एक लैंसेट द्वारा गुरुवार को जो विवादास्पद शोध पत्र को वापस ले लिया गया। उसमें लेखकों द्वारा दावा किया गया था कि कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए जिस दवा ‘हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन’ को संजीवनी माना जा रहा था, वह दवा कारगर नहीं रही। संक्रमितों में यह दवा लेने वालों का मृत्युदर और अधिक बढ़ जाता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार इस शोधपत्र जो चार लोग शामिल थे। इनमें प्रमुख रूप से डॉ मंदीप आर मेहरा, डॉ अमित एन पटेल, डॉ सपन देसाई और डॉ फ्रैंक रुशिट्जका जैसे लेखकों का शोधपत्र फर्जी पाए जाने पर, पत्रिका ने फर्जी शोध पत्र को हटा दिया है।

बता दें कि इस स्टडी की सत्यता को जानने के लिए WHO और दूसरी संस्थाओं से दुनियाभर के 100 से ज्यादा रिसर्चर ने जाँच करवाने की डिमांड की थी। जिसके बाद लैंसेट ने कहा, “नए डेवलपमेंट के बाद हम प्राइमरी डेटा सोर्स की गारंटी नहीं ले सकते, इसलिए स्टडी वापस ले रहे हैं।”

Lancet’s statement about the retraction of their article, via Twitter

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन से मृत्यदर बढ़ने की आशंका पर की गई इस स्टडी के चलते इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस एडहैनम घेब्रेयसस ने कहा कि विशेषज्ञों ने इस दवा के सुरक्षा संबंधी डाटा के अध्ययन के बाद फिर से परीक्षण की सिफारिश कर दी है।

WHO को संचालित करने वाले कार्यकारी समूह ने परीक्षण में शामिल सभी दवाओं के समूहों को फिलहाल जारी रखने की स्वीकृति दे दी है। इसके साथ ही कोरोना की दवाओं के परीक्षण में शामिल मरीजों को जल्द ही फिर से हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा पहले की तरह देने की अनुमति दे दी है। उन्होंने इस बाबत कहा कि इस सिफारिश का मतलब यह है कि जिन मरीजों ने खुद पर कोरोना दवाओं के परीक्षण की सहमति दे रखी है उन्हें डॉक्टर यह दवा देने लगेंगे। इस आदेश से पूर्व WHO के महानिदेशक ने यह भी बताया कि डब्ल्यूएचओ की सुरक्षा निगरानी कमेटी ने हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्वीन के वैश्विक डाटा का परीक्षण कर लिया है। 

गौरतलब है कि इस दवा को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कोरोना महामारी की लड़ाई में गेमचेंजर्स के रूप में विशेष तौर पर जोर दिया गया था। लेकिन अब इस शोध के फर्जी पाए जाने के बाद, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा को लेकर किए गए इस फर्जी शोध के कारण अमेरिका की सियासत फिर से गरम हो सकती है।

क्या है हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन?

इस दवा का मुख्य तौर पर इस्तेमाल मलेरिया के उपचार के लिए किया जाता है। इसके अलावा आर्थराइटिस के उपचार के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा उत्पादन करने वाले देशों में से एक है। यह एंटी मलेरिया दवा है जो कई तरह के मलेरिया से लड़ने में सक्षम है। हालाँकि, यह दवा कोरोनावायरस से किस तरह लड़ती है इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

गुजरात कॉन्ग्रेस: बगिया लुट गई, माली बेखबर, राज्यसभा चुनाव के साथ ही टलने वाला नहीं है यह संकट

यदि न्यूज चैनल्स की भाषा में कहूँ तो गुजरात में आजकल राजनीति ‘गरमाई’ हुई है। इसका कारण है राज्यसभा चुनाव। शुक्रवार को मोरबी से कॉन्ग्रेस विधायक बृजेश मेरजा ने इस्तीफा दे दिया। सात विधायक पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं।

करीब 36 साल से मैं गुजरात में हूॅं और लगातार राजनीतिक गतिविधि पर नजर बनाए रखता हूॅं। 2017 के राज्यसभा चुनाव को छोड़ दूॅं तो राज्य में संसद के उच्च सदन के सदस्य के चुनाव कभी इतने रोचक नहीं रहे।

क्यों गुजरात में पिछले तीन साल से राज्यसभा चुनाव इतने रोचक होते चले जा रहे हैं? इस सवाल का एक ही कारण है कि भाजपा राज्यसभा में अपना संख्या बल मजबूत करना चाह रही है। इसे ध्यान में रख अपने गढ़ में वह हर चुनाव में एक अतिरिक्त उम्मीदवार मैदान में उतार रही है।

गुजरात में राज्यसभा चुनाव तब पहली बार तब रसप्रद हुए जब भाजपा ने 2017 में अमित शाह और स्मृति ईरानी के अलावा कॉन्ग्रेस से ही पाला बदल कर आए बलवंत सिंह राजपूत को अपना तीसरा उम्मीदवार बनाया था।योजना थी सोनिया गाँधी के करीबी अहमद पटेल, जो उस समय लगातार छठे टर्म के लिए मैदान थे, उन्हें रोकना।

उस वक्त गुजरात कॉन्ग्रेस के विधायकों को बंगलुरु के एक रिसॉर्ट में कई दिन ठहराए जाने के बाद चुनाव हुआ था। चुनाव तो हो गया पर जब मतगणना हुई तो कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पोलिंग एजेंट और गुजरात के वरिष्ठ नेताओं में से एक शक्ति सिंह गोहिल ने कुछ ऐसे तकनीकी मुद्दे उठाए कि मतगणना कई बार टालनी पड़ी और आखिरकार मध्यरात्रि के बाद अहमद पटेल को विजयी घोषित किया गया। ये मामला अभी भी गुजरात हाई कोर्ट में निलंबित है।

बस कुछ उसी तरह का चित्र गुजरात में इस बार के राज्यसभा चुनाव में भी उभर कर आया है। इस बार गुजरात से राज्यसभा के 4 सांसद जुने चाने हैं। गुजरात विधानसभा की संख्या के आधार पर भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों के दो-दो उम्मीदवारों का राज्यसभा जाना तय था। लेकिन, भाजपा ने अभय भारद्वाज और रमीला बेन बारा के अलावा पूर्व मंत्री नरहरी अमीन को तीसरा उम्मीदवार बनाया। कॉन्ग्रेस ने अपने दो दिग्गज नेता शक्ति सिंह गोहिल और भरत सिंह सोलंकी को मैदान में उतार रखा है।

यूँ तो यह चुनाव अप्रैल में हो जाने थे। लेकिन कोरोना के कारण उपजे हालात की वहज से चुनाव टालने पड़े। अब इस महीने की 19 तारीख को चुनाव होने हैं। वैसे अप्रैल में चुनाव टाले जाने से पहले ही गुजरात कॉन्ग्रेस के पॉंच विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था।

ये पॉंच विधायक थे, प्रवीणभाई मारू (गढडा), जेवी काकड़िया (धारी), सोमाभाई गांडाभाई पटेल (लिंबडी), प्रद्युम्नसिंह जाडेजा (अबडासा) और मंगलभाई गावीत (डांग)। उस समय भी यह कहा जा रहा था कि राज्यसभा के चुनाव आते-आते और भी कॉन्ग्रेसी विधायक अपने इस्तीफे विधानसभा अध्यक्ष को सौंप देंगे। जैसे ही चुनाव की नई तारीखों का ऐलान हुआ, कॉन्ग्रेस विधायक अक्षय पटेल व जीतू चौधरी ने इस्तीफा सौंप गुजरात की राजनीति को गरम कर दिया है।

राजनीति में आरोप प्रत्यारोप चलते रहते हैं। लेकिन यहॉं सवाल यह है कि गुजरात कॉन्ग्रेस को अभी और कितना अपमानित होना है और वह भी अपने ही विधायकों के द्वारा? गुजराती की एक कहावत का भावानुवाद है कि “सेना कहाँ लड़ रही है वो सेनापति को ही पता नहीं है”। गुजरात कॉन्ग्रेस की स्थिति भी कुछ ऐसी है। जब सारे गुजराती न्यूज चैनल्स अक्षय पटेल के इस्तीफे की खबर ब्रेकिंग न्यूज के रूप में चमका रहे थे तभी गुजरात कॉन्ग्रेस के प्रमुख अमित चावड़ा अचानक से प्रगट हुए। उन्होंने अक्षय पटेल के इस्तीफे की बात को अफ़वाह करार दिया। लेकिन, चावड़ा के प्रगट होने के ठीक एक घंटे बाद गुजरात विधानसभा अध्यक्ष ने न केवल अक्षय पटेल, बल्कि उनके साथ जीतू चौधरी के इस्तीफे की भी पुष्टि कर दी। जाहिर है कि गुजरात कॉन्ग्रेस के सेनापति अमित चावड़ा को पता भी नहीं था की उनकी सेना कहाँ लड़ रही है।

य​दि हम एक बार गुजरात कॉन्ग्रेस के इस आरोप को मान भी लें कि भाजपा खरीद-फरोख्त कर रही है तो भी सवाल उस पर ही उठते है। यदि माल खुद बिकने को तैयार हो तो उसे कोई क्यूँ नहीं खरीदेगा? गौर करने वाली बात यह भी है कि कॉन्ग्रेस से बीजेपी में विधायकों के जाने का यह सिलसिला 2017 से शुरू हुआ है। पार्टी छोड़ने वाले हर विधायक ने यह बात कही है कि उनकी कॉन्ग्रेस में नहीं सुनी जाती। यह बात कुंवरजी बावलिया और जवाहर चावड़ा जैसों ने भी कही जो पीढ़ियों से कॉन्ग्रेसी थे।

कॉन्ग्रेस छोड़ते वक्त यही बात ठाकोर नेता अल्पेश ठाकोर ने भी कही थी। हालॉंकि कॉन्ग्रेस और उनका साथ एक-डेढ़ साल से ज़्यादा नहीं रहा, फिर भी इससे यह तो पता चलता ही है कि गुजरात कॉन्ग्रेस में कुछ भी ठीक नहीं है। गुजरात कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष का तो जनता से जुड़ाव उस कदर भी नहीं है जितना शायद शक्ति सिंह गोहिल, भरत सिंह सोलंकी या फिर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष परेश धाणानी का है। शायद यही कारण है कि पार्टी विधायकों के इस्तीफे की भनक तक प्रदेश अध्यक्ष को नहीं थी।

अक्षय पटेल और जीतू चौधरी के इस्तीफे के बाद अल्पेश ठाकोर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि गुजरात कॉन्ग्रेस का और भी बुरा हाल होने वाला है। उन्होंने गुजरात कॉन्ग्रेस की गुटबाजी का हवाला देते हुए यह बात कही। यदि ऐसा है तो राज्यसभा चुनाव के बाद भी कॉन्ग्रेस का यह संकट खत्म होने वाला नहीं दिखता।

जब मार्च में राज्यसभा चुनाव की घोषणा हुई थी और कॉन्ग्रेस के पॉंच विधायकों ने इस्तीफा दिया था तभी से यह माना जा रहा था कि कॉन्ग्रेस को एक ही सीट से संतोष करना पड़ेगा। उस समय शक्ति सिंह गोहिल और भरत सिंह सोलंकी में से किसी एक के मैदान छोड़ देने के विकल्प पर चर्चा भी हुई थी। परंतु दोनों पक्ष अपने आप को एक दूसरे से बेहतर लड़ाकू बताने पर तुला रहा और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। वो तो भला हो कोरोना का कि गुजरात कॉन्ग्रेस की जो अंदरूनी लड़ाई अप्रैल में बेनकाब हो जानी थी वह जून तक टल गया।

पर अब जून भी आ गया है। 19 जून भी आने को है। फिलहाल परिस्थिति ऐसी है कि एक उम्मीदवार को जीत के लिए 35 वोट चाहिए। आठ विधायकों के इस्तीफे के बाद कॉन्ग्रेस के 65 विधायक रह गए हैं। अगर निर्दलीय जिग्नेश मेवानी के वोट भी उनके साथ गिन ले तो आँकड़ा 66 तक पहुॅंचता है। ट्राइबल पार्टी BTP के दो विधायक जोड़ने पर 68 और NCP के एकमात्र विधायक के साथ आने पर भी यह 69 ही होता है। यानी तब भी कॉन्ग्रेस के केवल एक ही उम्मीदवार की जीत पक्की है। वैसे कहा जा रहा है कि शरद पवार का चाहे जो निर्देश हो NCP विधायक कांधल जाडेजा भाजपा के उम्मीदवारों को ही अपना वोट देंगे। चुनाव तक BTP विधायकों के भी जाडेजा की ही राह पकड़ने की अटकलें हैं।

ऐसे में कॉन्ग्रेस के पास एक ही रास्ता है कि वह भाजपा विधायकों से इस्तीफ़ा दिलवाना शुरू करे और गेंद धीरे धीरे अपने पाले में लाने की कोशिश करे। लेकिन जिस कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को अपने विधायकों के पार्टी छोड़ने की खबर न हो, वो भला भाजपा के विधायकों को कैसे पाला बदलने के लिए राजी कर सकते हैं और वह भी एक-दो नहीं, बल्कि तीन से चार विधायकों को। वैसे भी जो पार्टी तीन दशक से गुजरात की सत्ता में लगातार बनी हुई हो उसको छोड़कर कोई भी विधायक ऐसी पार्टी में क्यों जाना चाहेगा जिसका सेनापति दिशाहीन हो?

मोटी बात यह है कि गुजरात में भी कॉन्ग्रेस की स्थिति देश के अन्य हिस्सों से अलग नहीं है, बल्कि ज्यादा ही खराब दिखती है। जब हालात यह बन गए हैं कि शक्ति सिह गोहिल या भरत सिंह सोलंकी में से एक ही राज्यसभा में जा सकेंगे तो यह संकट और बढ़ेगा। जो उच्च सदन नहीं पहुॅंचेगा वह या तो अपनी गतिविधियों, अपनी ताकत को सीमित कर लेगा या फिर उसे पार्टी की अंदरुनी लड़ाई को तेज करने में लगाएगा।

गुजरात में इस साल के अंत तक 7 म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव होने हैं। 2022 में विधानसभा चुनाव है। क्या गुजरात कॉन्ग्रेस में तब तक इतनी ताकत बचेगी कि वह इन चुनावों में टक्कर दे पाए? या फिर उस के पास पाटीदार आंदोलन की तरह एक और वर्ग विग्रह का कटु शस्त्र ही बच जाएगा ताकि भाजपा को हराना सुनिश्चित न हो सके तो पिछली बार की तरह ही उसे प्रचंड बहुमत पाने से रोकने में सफलता मिल सके।

फिलहाल तो गुजरात कॉन्ग्रेस की हालत ‘खाया पिया कुछ नहीं पर गिलास तोड़ा बारह आना’ जैस’ है। न वह तीन दशक से सत्ता में आ सकी है और न अब अपने विधायकों को एकजुट रख पा रही है।

हथिनी के बाद, अब हिमाचल में गर्भवती गाय को बम खिलाने की बात सोशल मीडिया पर आई सामने

केरल में गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाने की घटना के बाद अब हिमाचल प्रदेश में गाय को बम खिलाने की घटना सोशल मीडिया पर सामने आई है।

सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे इस वीडियो में हिमाचल प्रदेश के गुरदयाल सिंह इस जख्मी गाय के साथ नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि लोग गौरक्षा की बात कर रहे हैं जबकी एक गर्भवती गाय को विस्फोटक खिला दिया है।

अपना नाम गुरदयाल सिंह बता रहे इस व्यक्ति ने किसी नंदलाल को इस हरकत का जिम्मेदार बताया है। गुरदयाल का कहना है कि नंदलाल उनके पड़ोस में रहता है और मिस्त्री का काम करता है। साथ ही, उन्होंने कहा कि गाय के साथ ऐसी हरकत करने के बावजूद नंदलाल का कहना है कि उन्हें अब जो करना है करे लें और प्रधान से लेकर तमाम लोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे इस वीडियो के बारे में हमें इस क्रूर कृत्य के होने के समय की जानकारी नहीं है। लेकिन हम अपने स्तर से उक्त व्यक्ति तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।

वीडियो में देखा जा सकता है कि गाय का मुँह बहुत गंभीर रूप से जख्मी है और उससे बहुत खून भी निकल रहा है। यह वीडियो शेयर किए जाने के पीछे एक वजह केरल में गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाने के बाद उसकी मौत की घटना भी है। जिसे लेकर देशभर में लोग पहले से ही आक्रोशित हैं।

सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे इस वीडियो को आप इस लिंक पर देख सकते हैं। ज़ख्मी गाय का यह वीडियो संवेदनशील है।

गर्भवती हथिनी की मौत से पहले से ही आक्रोशित हैं लोग

केरल में पटाखों से भरा अनानास खिलाए जाने के बाद गर्भवती हथिनी की मौत को केंद्र सरकार ने गंभीरता से लिया है और कहा कि इसकी आवश्यक जाँच की जाएगी। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस सम्बन्ध में केरल सरकार से पूरी रिपोर्ट माँगते हुए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अपनी नाराजगी जताते हुए माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर लिखा, “केंद्र सरकार ने केरल में एक हथिनी की हत्या के मामले पर बहुत गंभीरता से ध्यान दिया है। हम सही तरीके से जाँच करने और अपराधी को पकड़ने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। पटाखे खिलाना और मारना भारतीय संस्कृति नहीं है।”

दरअसल, 27 मई को एक 15 वर्षीय गर्भवती हथिनी एक अमानवीय कृत्य का शिकार हो गई। उसे किसी उपद्रवी शख्स ने पटाखों से भरा अनानास खिलाया, जिससे हथिनी के मुँह में विस्फोट हो गया और वह बुरी तरह जख्मी हो गई। हथिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि वह गर्भवती थी। उसका जबड़ा टूट गया था और मुँह में विस्फोट के कारण वह अनानास चबाने के बाद कुछ खा नहीं पा रही थी।

इस विस्फोट से उसकी जीभ और मुँह पर गंभीर चोटें आईं। इसके बाद वह एक नदी में चली गई और तीन दिनों के बाद आखिर में उसने प्राण त्याग दिए। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने हथिनी की मौत पर रिपोर्ट माँगी है और कहा कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

आज सुबह ही कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि गर्भवती हथिनी की मौत को लेकर देश भर में जारी आक्रोश के बीच पुलिस ने इस मामले में एक शख्स को गिरफ्तार किया है। बताया जा रहा है कि केरल राज्य के वन मंत्री के राजू ने यह जानकारी देते हुए बताया कि आरोपित का नाम पी विल्सन है और वह नकदी फसलों और मसालों के एक फार्म में काम करता है। एक अन्य शख्स को भी हिरासत में लिया गया है।

दिल्ली पुलिस ने चार्जशीट में बताया मुस्लिम दंगाइयों ने काटकर आग में फेंक दिया था दिलबर नेगी को, CCTV तोड़ दिए थे

दिल्ली पुलिस ने बृहस्पतिवार (जून 04, 2020) को पाँचवीं चार्जशीट कड़कड़डूमा कोर्ट में दायर कर दी है। पुलिस ने दिलबर नेगी की हत्या के मामले में 12 लोगों को आरोपित बताया है। पुलिस ने अदालत को बताया कि गत फरवरी में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं की संपत्तियों को निशाना बनाते हुए उसकी मिठाई-दुकान के अंदर एक व्यक्ति (दिलबर नेगी) को जिंदा जला दिया गया था।

क्राइम ब्रांच ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ऋचा परिहार के समक्ष चार्जशीट दायर की है। कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के लिए 18 जून की तारीख तय की है। वो सभी आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं, जिन पर हत्या, दंगा, धर्म के आधार पर दो समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए हैं।

इस चार्जशीट के अनुसार, मुस्लिम समुदाय की एक भीड़ ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बृजपुरी पुलिया की तरफ से आई और हिंदुओं की संपत्तियों को निशाना बनाते हुए दंगा करना शुरू कर दिया और 24 फरवरी की देर रात तक उनमें आगजनी करती रही।

पुलिस ने कहा कि भीड़ ने अनिल स्वीट्स नाम की एक दुकान में आग लगा दी थी, जहाँ से पुलिस ने 26 फरवरी को दिलबर नेगी का शव बरामद किया था। हत्या के वक्त नेगी लंच और आराम करने के लिए दुकान के गोदाम में गया था, जहाँ उसे दंगाइयों ने काटकर आग में झोंक दिया था।

उल्लेखनीय है कि जिस दिन उत्तराखंड के निवासी दिलबर नेगी के साथ यह क्रूर हादसा हुआ, उसी समय वहाँ मौजूद दंगाइयों की भीड़ से किसी तरह भाग निकलने में सफल रहे उसके साथियों ने जीटीबी अस्पताल से ऑपइंडिया से सम्पर्क कर इस बारे में विस्तृत रूप से बताया था।

दिलबर सिंह नेगी उत्तराखंड के पौड़ी जिले स्थित थलीसैण ब्लॉक से सम्बन्ध रखते थे। उनके करीबी श्याम सिंह ने ऑपइंडिया को बताया कि 23 फ़रवरी की शाम कुछ दंगाई शाहदरा इलाके में शोर मचाते हुए घुसे। दंगाइयों ने नेगी को अपना पहला निशाना बनाया। उनके हाथ-पैर काट दिए। फिर पास की दुकान में लगी आग में झोंक दिया।

इस घटना को देख वहाँ के लोगों में अफरा-तफरी मच गई। अपनों के बीच चीख-पुकार शुरू हो गई। दहशत में लोग अपनी जान बचाकर भागे। फ़ोन पर ऑपइंडिया के साथ बातचीत में भी दिलबर के परिजन बेहद डरे लग रहे थे। उन्होंने बताया कि वे अभी भी GTB अस्पताल में मौजूद हैं और दिलबर की बॉडी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

दिलबर नेगी के शरीर की राख अनिल स्वीट्स के गोदाम से बरामद हुई थी। जिसमें स्पष्ट देखा जा सकता था कि बिना हाथ और पैरों का शरीर राख के ढेर में तब्दील हो चुका था।

दंगाइयों ने पहचान छिपाने को नष्ट किए थे CCTV कैमरे, तीसरी चार्जशीट में हुआ खुलासा

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान समुदाय विशेष की भीड़ के निशाने पर दूसरे समुदाय की संपत्ति थी। दंगाइयों की भीड़ ने देर रात तक उत्पात मचाते हुए शिव विहार तिराहे के आसपास की एक समुदाय के लोगों की संपत्तियों में तोड़-फोड़ करने के साथ आगजनी की थी।

क्राइम ब्रांच के आरोप पत्र के मुताबिक उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की शुरुआत कर्दमपुरी, मौजपुर और चाँद बाग में हुई थी। इसके बाद दंगाईयों की भीड़ उत्तर-पूर्वी जिले के विभिन्न इलाकों में और उसके बाद डीआरपी स्कूल और राजधानी पब्लिक स्कूल के पास शिव विहार तिराहा पर पहुँची थी। दोपहर बाद लगभग तीन बजे बृजपुरी पुलिया की तरफ से समुदाय विशेष के लोगों की भीड़ आ गई और दंगा शुरू कर दिया। दंगाई भीड़ ने देर रात तक उत्पात मचाया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार: जब सेना को स्वर्ण मंदिर पर चढ़ाने पड़े टैंक, जिसके कारण मारी गईं इंदिरा गाँधी

आज ऑपरेशन ब्लू स्टार की 36वीं बरसी है, 3 से 6 जून 1984 तक भारतीय सेना द्वारा चलाए गए इस सैन्य ऑपरेशन का मकसद अमृतसर (पंजाब) में हरिमंदिर साहिब परिसर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरांवाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराना था और इसमें अहम भूमिका निभाई थी अजीत डोभाल ने, जो कि आज देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं।

भारत ने पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद करवाया था और इसी बात का बदला लेने के लिए पाकिस्तान ने भारत से पंजाब को अलग करवाने की योजना बनाई। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने इस काम के लिए पंजाब में सिख आतंकवाद और कट्टरपंथ को हवा दी और भिंडरांवाले को अपना हथियार बनाया जिसके नेतृत्व में अलगाववादी ताकतों को पाकिस्तान से लगातार समर्थन मिल रहा था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के पीछे जो बातें सबसे अहम रहीं, उनमें खालिस्तानी अलगाववादियों के पंजाब की स्वायत्तता की माँग का उग्र रूप में सामने आना प्रमुख वजह रहा।

नतीजा यह हुआ कि पंजाब को भारत से अलग कर खालिस्तान बनाने की माँग तेजी से जोर पकड़ने लगीं थीं। गलियों में आवाजें सुनाई पड़ रही थीं- ‘पंजाब को भारत से अलग करने के लिए सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार रहें।’ इसकी एक तरह से आधिकारिक घोषणा तब हुई जब मार्च, 1981 को एक नए स्वायत्त खालिस्तान का झंडा पंजाब स्थित आनंदपुर साहिब पर फहराया गया।

पंजाब में बिगड़ते हालातों के बीच 1982 में इंदिरा गाँधी ने एक बड़ा राजनैतिक फैसला लिया और गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति बना दिया। वही जेल सिंह जिन्होंने गृह मंत्री रहते 1981 में भिंडरांवाले की रिहाई की घोषणा करते हुए कहा था कि भिंडरांवाले के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं है। जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय उन पर मूक दर्शक बनने का आरोप भी लगे थे।

जनरैल सिंह भिंडरांवाले चरमपंथी के रूप में उभरने लगा था

आखिर एक दिन जनरैल सिंह भिंडरवाले ने हथियारों से लैस आतंकवादियों के साथ स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया। सभी हालातों को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने समझौते के प्रयास किए, लेकिन जब कोई समझौता नहीं हो पाया तो उन्होंने फैसला किया कि अब कार्रवाई की जाए और स्वर्ण मंदिर को भिंडरांवाले के हाथ से निकाला जाए।

ऑपरेशन ब्लू स्टार

01 जून को खालिस्तान समर्थक आतंकियों ने तत्कालीन सरकार के साथ किसी भी समझौते में विफल होने के बाद आखिर में 3 जून को भारतीय सुरक्षा बलों को स्वर्ण मंदिर घेरना पड़ा। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी थी कि जून 03, 1984 को हजारों भक्त गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस मनाने के लिए अमृतसर में इकट्ठे होने वाले थे।

हरिमंदिर साहब परिसर में भिंडरांवाले और उसके साथियों की मोर्चाबंदी और परिसर के बाहर सुरक्षाबलों की मोर्चाबंदी ने अमृतसर के उस इलाके को छावनी की शक्ल दे दी।

4 जून को सेना ने मंदिर में छुपे आतंकियों की स्थिति जानने के लिए गोलीबारी शुरू कर दी थी, जिसके बाद 5 जून को आतंकियों और सेना में जमकर टकराव हुआ, भारी गोलीबारी और संघर्ष में 83 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गँवाई और 249 घायल हुए थे।

ऑपरेशन ब्लू स्टार में सेना का नेतृत्व तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल केएस बरार ने किया था। जनरल बरार ने इस बारे में कहा था –

“मुझे बताया गया था कि हालात इतने खराब हो गए हैं कि अगले दो-चार दिन में खालिस्तान की घोषणा हो जाएगी। जिसके बाद पंजाब पुलिस खालिस्तान में मिल जाएगी। फिर दिल्ली और हरियाणा में जो सिख हैं वो फौरन पंजाब की ओर बढ़ेंगे और हिंदू पंजाब से बाहर निकलेंगे। 1947 की तरह दंगे हो सकता है। पाकिस्तान भी सीमा पार कर सकता है, यानी पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने की घटना भारत में दोहराई जा सकती है।”

जनरल बरार ने आपने अपनी किताब में भी इस बात का जिक्र किया कि इस ऑपरेशन के बारे में उन्हें पता नहीं था। तब वो मेरठ में थे और 90 इनफैंट्री डिविजन को कमांड कर रहे थे। उन्होंने लिखा है कि मई 30 की शाम उन्हें फोन आया कि जून 01 को चंडीमंदिर एक मीटिंग के लिए पहुँचना है, जबकि उसी शाम उनका प्रोग्राम मनीला जाने का था, टिकटें बुक हो चुकी थीं लेकिन इस कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा।

इस ऑपरेशन के दौरान बरार को महसूस हुआ था कि स्वर्ण मंदिर में छुपे अलगाववादियों के पास राकेट लॉन्चर जैसे हथियार थे और तमाम प्रयासों के विफल होने और भीतर मौजूद खालिस्तानी आतंकियों की तैयारी को देखकर साफ था कि वो आत्मसमर्पण के मूड में बिल्कुल भी नहीं हैं। तब तक भारतीय सुर्ख बल भी अपने कई जवानों को खो चुकी थी। ऐसे में मेजर जनरल केएस बरार के एक कमांडिंग ऑफिसर ने उनसे टैंक बुलाने की माँग की।

बरार ने भी यह बात मानी की अब इसके अलावा कोई अन्य उपाय फिलहाल उनके पास नहीं था। वो चाहते थे कि सुबह होते ही यदि इस ऑपरेशन की खबर फ़ैल गई तो पंजाब उबल पड़ेगा, इसलिए वो इन्तजार भी नहीं करना चाहते थे।

आख़िरकार बरार ने सरकार से टैंक इस्तेमाल करने की इजाजत माँगी। परमिशन मिलते ही मौके पर टैंक बुलाए गए और सुबह 5 बजकर 21 मिनट पर टैंक ने पहला गोला दागा।

आखिरकार जून 06, 1984 को जरनैल सिंह भिंडरांवाले की मौत की खबर आई, जिसने अप्रैल 1983 से ही स्वर्ण मंदिर को अपना हेडक्वार्टर बना लिया था, और सेना इस मंदिर को अलगावादियों के चंगुल से मुक्त करने में सफल रही। हालाँकि सिखों के इस पवित्र मंदिर में सेना के ऑपरेशन ने दुनियाभर के सिखों को नाराज कर दिया था।

इसी सैन्य ऑपरेशन का परिणाम यह हुआ कि अक्टूबर 31, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के दो सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। इंदिरा गाँधी की हत्या के तुरंत बाद देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़के उठे। इन दंगों में हज़ारों लोगों की जान गई।

ऑपरेशन ब्लू स्टार में कुल 493 आतंकी मारे गए थे और 86 घायल हुए थे, जबकि गिरफ्तार किए गए आतंकियों की संख्या 1592 थी। जून 06, 1984 का वह दिन था, जब अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में की गई भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का नाम दिया गया।

ऑपरेशन ब्लैक थंडर

ऑपरेशन ब्लू स्टार के कुछ समय बाद ऑपरेशन ब्लैक थंडर (Operation Black Thunder) को अंजाम दिया गया, जिसका मकसद स्वर्ण मंदिर से बाकी आतंकवादियों को बाहर निकालना था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के करीब 4 साल बाद एक बार फिर खालिस्तान समर्थक आतंकवादी स्वर्ण मंदिर में अकाल तख्त के पास पहुँच गए।

यही वो समय था, जिसमें भारत के वर्तमान NSA अजित डोभाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वर्ण मंदिर में छुपे हुए आतंकवादियों के बारे में पता लगाने के लिए ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान अजीत डोभाल रिक्शे वाले की भेष में स्वर्ण मंदिर के अंदर गए। इस ‘रिक्शावाले’ को खालिस्तानियों को ये विश्वास दिलाने में दस दिन लग गए कि उसे आईएसआई ने उनकी मदद के लिए भेजा है।

यही रिक्शावाला ऑपरेशन ब्लैक थंडर से ठीक दो दिन पहले स्वर्ण मंदिर के अहाते में घुसा और जब 2 दिन बाद स्वर्ण मंदिर से बाहर निकला तो उनके पास आतंकियों के हथियारों से लेकर, उनकी योजना, लड़ाकों की छिपे होने की सटीक जानकारी अजीत डोभाल के पास थीं। अजित डोभाल के इस कारनामे से ही ऑपरेशन सफल रहा और पंजाब सिख आतंकवादियों के प्रभाव से मुक्त हो पाया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के चार साल बाद स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को बाहर निकालने के लिए ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ चलाया गया था। यह ऑपरेशन ब्लू स्टार से कहीं ज्यादा कुशलतापूर्वक बिना किसी रक्तपात और मंदिर को नुकसान पहुँचाए ही सफलतापूर्वक पूरा किया गया। अंततः सिख लोगों के बीच बढ़ रहे उग्रवादी खालिस्तानी आंदोलन की विश्वसनीयता और लोकप्रियता को समाप्त कर पंजाब से आतंकवाद के संकट को समाप्त किया। इन सभी कारकों के कारण ब्लैक थंडर को 1984 में भारतीय सेना द्वारा शुरू किए गए ब्लू स्टार की तुलना में अधिक सक्षम और क्लीनर ऑपरेशन के रूप में देखा गया, जिसने सिख समुदाय पर विशेष प्रभाव छोड़ा।

J&K के राजौरी जिले में हुई मुठभेड़ में आतंकी ढेर, शोपियां में फेंका ग्रेनेड, एक जवान वीरगति को प्राप्त

जम्मू-कश्मीर में गुरुवार (4 जून,2020) देर रात को राजौरी जिले के मेहारी गाँव में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हुए मुठभेड़ में एक आतंकी मारा गया और उसके पास से भारी मात्रा में गोला बारूद बरामद किया गया। इसके अलावा कुछ आतंकियों के घिरे होने की जानकारी सामने आ रही है। सुरक्षाबलों ने जंगल के करीब एक किलोमीटर क्षेत्र को घेर कर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है। गौरतलब है कि कालाकोट तहसील के मियाडी जंगल में संदिग्ध हलचल देखे जाने के बाद स्थानीय लोगों ने सेना को सूचित किया था। जिसके बाद आरआर बटालियन के जवानों ने जंगल में सघन तलाशी अभियान शुरू किया। 

मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि सेना को जंगलों में 2 से 3 आतंकियों के छुपे होने की सूचना मिली है। जिसके चलते सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को चारों तरफ घेर लिया है और सर्च ऑपरेशन अब भी जारी है। मौके पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है।

जानकारी के अनुसार गाँव के कुछ लोगों को कालाकोट तहसील के मियाडी जंगल में संदिग्ध लोगों की हलचल दिखी। जिसके बाद उन्होंने सेना को इसकी जानकारी दी। आरआर बटालियन के जवानों द्वारा इस पर तुरंत कार्रवाही करते हुए एक तलाशी अभियान कासो (Cordon and Search Operation, CASO) कालाकोट इलाके में चलाया गया। जिसमें एक आतंकी के मारे जाने के बाद उसके ठिकाने से सुरक्षाबलों को बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद मिला है।

मीडिया सूत्रों के अनुसार ये आतंकी उन्हीं लोगों में से है जिन्हें 28 मई सुरक्षाबलों ने कलाल सेक्टर में सीमा से अंदर घुसपैठ करने पर मार गिराया था। अनुमान ये भी लगाया जा रहा है कि साथियों के मारे जाने और सुरक्षाबलों की कड़ी तैनाती को देखते हुए आतंकी जान बचाने के लिए जंगल में छुप गए थे।

शोपियां में हमला

वहीं गुरुवार को श्रीनगर के शोपियां पुलिस स्टेशन पर आतंकियों ने ग्रेनेड फेंक कर हमला किया। मगर वह ब्लास्ट नहीं हुआ। और आतंकी वहाँ से भाग गए। जिसके बाद मौके पर मौजूद पुलिसबल तुरंत आतंकियों के तलाश में जुट गए।

कुलगाम में हमला

गुरुवार को ही कुछ आतंकवादियों ने कुलगाम के यारीपोरा इलाके में पुलिसदल पर हमला हमला कर दिया था। जिसमें आतंकवादियों की गोली लगने से एक स्वास्थ्य कर्मी घायल हो गया। और आतंकी वहाँ से भाग निकले। जिस गाड़ी से आतंकी आए थे उसे बरामद कर लिया गया है। फिलहाल छाती पर गोली लगने की वजह से स्वास्थ्य कर्मी की हालत नाजुक बनी हुई है।

एलओसी पर हमला

वहीं एक अन्य घटना गुरुवार रात सुंदरबनी सेक्टर में हुई। जहाँ आतंकियों ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी। सेना की तरफ से की गई जवाबी कार्यवाही में एक सेना का जवान हवलदार एमएम करण वीरगति को प्राप्त हो गए। आतंकियों ने इस हमले में अपना मुख्य निशाना भारतीय सैन्य चौकियों के साथ रिहायशी क्षेत्रों को बनाया था।

ISI एजेंट्स ने किया बाइक से भारतीय राजनयिक का पीछा: पाक ने घर के बाहर तैनात किए लोग, वीडियो वायरल

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में तैनात शीर्ष भारतीय राजनयिक गौरव अहलूवालिया को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के जरिए परेशान किए जाने का मामला सामने आया है।

भारतीय प्रभारी गौरव अहलूवालिया की कार का पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के एक सदस्य ने मोटरसाइकिल से पीछा किया है, जिसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, ISI ने गौरव अहलूवालिया का उत्पीड़न करने और उन पर नजर रखने के लिए उनके घर के बाहर कई कारों और बाइकों का जमावड़ा लगा रखा है। इसमें बैठे ISI के जासूस हर वक्त भारतीय राजनयिक पर नजर रख रहे हैं।

भारत ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है और पाकिस्तान से जाँच की माँग की है।

यह मामला जून 02, 2020 का है, जब पाकिस्तान में भारत के डिप्टी चीफ गौरव अहलूवालिया से बदसलूकी की गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, जब अहलूवालिया अपने घर से बाहर निकल रहे थे, तभी वहाँ ISI के लोग कार और बाइक के साथ खड़े थे और बाद में उनका पीछा भी करने लगे। भारतीय राजनयिकों को परेशान करने का आईएसआई का ये पुराना पैंतरा है।

भारत ने गत मार्च माह में ही उत्पीड़न की 13 घटनाओं के बारे में बताया और पाकिस्तान से कहा कि इस तरह की घटनाएँ बंद हो और मामले की जाँच की जाए। भारत ने पाकिस्तान के अथॉरिटीज से कहा था कि वे फौरन इन मामलों की जाँच करे और संबंधित एजेंसियों को यह निर्देश दे कि दोबारा ऐसी घटनाएँ न हों।

इसमें आगे कहा गया कि ऐसी उत्पीड़न की घटनाएँ स्पष्ट तौर पर विएना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमेटिक रिलेशंस ऑफ 1961 का उल्लंघन है और भारतीय उच्चायोग के अधिकारियों, स्टाफ सदस्य और उनके परिवारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पाकिस्तान सरकार की है।

जासूसी करते पकड़े गए पाकिस्तानी उच्चायोग के अफसर

उल्लेखनीय है कि कुछ ही दिन पहले नई दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के दो कर्मचारियों को भारतीय सेना की जासूसी करते हुए पकड़ा गया, जिसके बाद उन्हें वापस पाकिस्तान भेज दिया गया था। पाकिस्तान अपनी इस खुन्नस में किसी न किसी बहाने भारतीय उच्चायोग के अफसरों को परेशान कर रहा है। 

सीता माता पर अभद्र टिप्पणी करने वाले ट्रेनी ऑफिसर आसिफ खान को GoAir ने बाहर निकाला

सोशल मीडिया पर सीता माता को लेकर अभद्र टिप्पणी करने वाले ट्रेनी ऑफिसर आसिफ खान को गोएयर (GoAir) ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। एयरलाइन ने कहा कि किसी व्यक्ति या कर्मचारी के निजी विचारों से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

आसिफ खान ने सोशल मीडिया पर हिंदू देवताओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसके स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे। आसिफ खान ने अपने प्रोफाइल में उल्लेख किया था कि वह GoAir में केबिन क्रू मेंबर है।

आसिफ खान द्वारा की गई अपमानजनक टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद गो एअर ने घोषणा की थी कि वह इस बात की पुष्टि करने में लगे हैं कि आसिफ खान उनकी एयरलाइन के साथ जुड़ा हुआ है या नहीं। गोएयर ने कहा था कि हमारी नीति सभी कर्मचारियों के लिए शून्य सहिष्णुता की है, जिसमें कर्मचारियों को रोजगार नियमों का पालन करना पड़ता है, इसमें सोशल मीडिया का भी व्यवहार शामिल है।

नेटिज़ेंस ने आसिफ खान को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए गोएअर के प्रति आभार व्यक्त किया है। नेटिजेंस ने कहा कि आसिफ खान ने हिंदू देवताओं पर बहुत ही अभद्र टिप्पणी की थी और इसके परिणामस्वरूप उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

इससे पहले सोशल मीडिया पर सीता माता के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की पुलिस में शिकायत करने वाले संघ (RSS) कार्यकर्ता की पीटकर हत्या करने का मामला सामने आया था। सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत पटेल उमराव ने लिखा था, “खंडवा, MP में संघ कार्यकर्ता राजेश फूलमाली (26) द्वारा फेसबुक में सीता माता पर अपशब्द की शिकायत पुलिस से करने पर 18 मई को रोजेदारों नें लिंचिंग की थी, इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। 15 नमाजियों को अरेस्ट किया गया है, हमारी टीम राजेश के परिवार को न्याय दिलाने के लिए वहाँ तत्पर है।”

प्रशांत पटेल उमराव ने मृतक राजेश फूलमाली (Rajesh Phoolmali) को न्याय दिलाने की बात कहते हुए लिखा था कि “आरएसएस कार्यकर्ता राजेश एससी समुदाय से थे। हम पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए अनुसूचित जाति आयोग के पास जा रहे हैं।”

जामिया की सफूरा जरगर को फिर नहीं मिली बेल, मेडिकल ग्राउंड पर लगाई थी गुहार, दिल्ली दंगों की है आरोपी

दिल्ली की एक अदालत ने जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर की जमानत याचिका को एक बार फिर खारिज कर दी है। दिल्ली के पटियाला कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मेडिकल आधार पर जमानत देने की उसकी दलीलें ठुकरा दी।

बता दें, इसी साल फरवरी के महीने में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मामले में दिल्ली पुलिस ने सफूरा को 10 अप्रैल को गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया था। इसके बाद, उसने पटियाला कोर्ट में स्वास्थ्य का हवाला देकर बेल की गुहार लगाई थी।

सफूरा जरगर के वकील ने उसके गर्भवती होने की बात का उल्लेख करते हुए कहा कि सफूरा पॉलीसिस्टिक ओवेरी सिंड्रोम से पीड़ित है। इससे गर्भपात की आशंका बढ़ जाती है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ऑन रिकॉर्ड बातों को ध्यान में रखते हुए, ये नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्त के ख़िलाफ़ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं है। इसके अलावा उन्होंने जेल अधिकारियों को आदेश दिया कि गर्भवती सफूरा जरगर को उपयुक्त मेडिकल सुविधाएँ दी जाएँ।

गौरतलब है कि इससे पहले भी दो बार सफूरा जरगर की याचिका को खारिज की जा चुकी है। इससे पूर्व पटियाला कोर्ट ने जरगर की बेल याचिका को खारिज करते हुए उसकी न्यायिक हिरासत की अवधि 25 जून तक बढ़ा दी थी। उससे पहले 23 अप्रैल को मेट्रोपोलिटियन मजिस्ट्रेट वसुंधरा छौंकर ने सफूरा को आरोपों को मद्देनजर राहत देने से मना कर दिया था।

बता दें कि सफूरा जरगर के खिलाफ यूएपीए के तहत मामला चल रहा है। उसपर आरोप है कि उसने जाफराबाद-सीलमपुर में 50 दिनों के हंगामा की साजिश रची थी और वहाँ महिलाओं-बच्चों को बिठाने के लिए पूरा जोर लगाया था। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस पार्टी के फिरोज ख़ान ने भी सफूरा जरगर को रिलीज करने की माँग की है। उन्होंने दिल्ली पुलिस पर अपनी शक्ति का दुरूपयोग करने और लोगों के अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया है।

ताहिर हुसैन के बचाव में फिर खड़ा हुआ केजरीवाल का MLA अमानतुल्लाह खान, कहा- मुस्लिम होने की मिली है सजा

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में चार्जशीट दाखिल होने के बाद आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान ने पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन का बचाव किया है। ताहिर के कुकृत्यों पर मजहब का पर्दा डालने की उसने कोशिश की है।

अमानतुल्लाह खान ने ट्वीट कर कहा, “दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में ताहिर हुसैन को दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड बनाया है, जबकि पूरा देश जनता है कि दंगे किसने कराए। असल दंगाइयों से अभी तक पुलिस ने पूछताछ तक नहीं की। मुझे लगता है कि ताहिर हुसैन को सिर्फ मुस्लिम होने की सज़ा मिली है।”

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदेश कुमार गुप्ता ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्वीट किया है, “अमानतुल्लाह खान, दिल्ली पुलिस ने अभी ताहिर हुसैन को पकड़ा है तो इतनी बौखलाहट। तब क्या हाल होगा तुम्हारा जब पर्दे के पीछे के असली किरदार पकड़े जाएँगे। चिंता मत करो, दिल्ली पुलिस ईमानदारी से कार्य कर रही है। दिल्ली जलाने वाले 1 भी व्यक्ति को छोड़ेंगे नहीं।”

बता दें, 2 जून को दिल्ली पुलिस ने दंगों के मामले में 2 चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में ताहिर को मुख्य आरोपित बनाया गया है। चार्जशीट में दिल्ली पुलिस ने कहा है दंगे कराने के लिए ताहिर हुसैन ने करोड़ों ख़र्च किए थे। इस दौरान वह जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद से लगातार संपर्क में था।

उसने उमर खालिद से कहा था कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत आने वाले हैं, तब कुछ बड़ा होने वाला है, जिसके लिए सबको तैयार रहना है। उसने अपने समर्थकों को ‘बड़े एक्शन’ के लिए तैयार रहने को कहा था। उसने सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के बीच भी रुपए बाँटे थे। 

बता दें कि अमानतुल्लाह ने इससे पहले भी मार्च महीने में एक ट्वीट कर ताहिर का बचाव किया था। जिसमें उन्होंने ताहिर के खिलाफ़ होती कार्रवाई को देखकर कहा कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि ताहिर एक मुस्लिम है।

अमानतुल्लाह ने कहा था,  “आज ताहिर हुसैन सिर्फ इस बात की सजा काट रहा है कि वो एक मुस्लिम है। शायद आज हिंदुस्तान में सबसे बड़ा गुनाह मुस्लिम होना है। ये भी हो सकता है कि आने वाले वक्त में ये साबित कर दिया जाए कि दिल्ली की हिंसा ताहिर हुसैन ने कराई है।”

हालाँकि, स्पष्ट हो कि न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच अपने मजहब को लाने वाले अमानतुल्लाह जैसे लोग आज तक यह साबित नहीं कर सके हैं कि अगर सिर्फ मुस्लिम होने के कारण किसी को निशाना बनाया जाता है तो फिर उन्हीं के जैसे दंगाई मानसकिता के लोग बाहर खुले घूमकर इस तरह का जहर कैसे उगलते आ रहे हैं।

गत फरवरी माह में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों की लगभग सभी परतें खुल चुकी हैं। इसमें यह भी स्पष्ट हो चुका है कि किस तरह से शाहीनबाग से लेकर जामिया, JNU के उग्रवादियों ने इसमें अहम भूमिका निभाई।

वही शाहीनबाग, जहाँ ‘फक हिंदुत्व’ से लेकर गाय और गोमूत्र के बहाने हिंदुओं की आस्था का उपहास बनाया गया। फ़ैज़ और इकबाल के बहाने काफिरों के खिलाफ तमाम बातें की गईं।

जब यही शाहीनबाग दंगों के रूप में बाहर आया, तब ‘काफिरों’ पर तमाम क्रूरता की हदों को लांघा गया। महज 20 साल के दिलबर नेगी के हाथ और पाँव काटकर शरीर के भाग को जिंदा जलती आग में झोंक दिया गया। IB अधिकारी अंकित शर्मा को इसी दंगाई ताहिर हुसैन के घर के बाहर मारा गया। उनके शरीर पर घाव के 51 गहरे निशान थे।