उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन किसानों को न्याय दिलाया है, जिनकी सब्जियों के ऊपर से पुलिस की गाड़ी गुजरी थी। न सिर्फ़ ग़रीब किसानों के नुक़सान की भरपाई की गई बल्कि आरोपित सब इंस्पेक्टर को भी सस्पेंड कर दिया गया। ये घटना एक वीडियो के वायरल होने के बाद से चर्चा में आई, जिसका मुख्यमंत्री ने तुरंत संज्ञान लिया। ये घटना प्रयागराज की है। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस की गाड़ी ने किसानों की सब्जियों को रौंद डाला।
सीएम योगी के सख्त होने के बाद घूरपुर के एसआई सुमित आनंद को एसएसपी ने त्वरित रूप से लाइन हाजिर किया। उन्हें सस्पेंड किए जाने के बाद उनके ख़िलाफ़ जाँच बैठा दी गई है। घूरपुर में बुधवार (जून 3, 2020) को साप्ताहिक मंडी लगी थी। ये वीडियो उसी दिन का है। प्रयागराज पुलिस ने भी ट्विटर पर इसे दरोगा का कृत्य करार दिया और साथ ही निलंबन की सूचना दी। लोगों ने इसके लिए योगी सरकार को धन्यवाद दिया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया कि वो घटनास्थल पर जाएँ और एक-एक पीड़ितों से मिल कर कुल नुकसान का हिसाब लगाएँ। साथ ही नुकसान के भरपाई का भी आदेश दिया गया। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने ग़रीब पीड़ितों से मिल कर उन्हें हुए नुकसान पर खेद प्रकट किया। पुलिस ने वहाँ पहुँच कर पीड़ितों से मुलाक़ात की और मुख्यमंत्री कार्यालय से आए आदेश का पालन किया गया।
‘दैनिक जागरण’ की ख़बर के अनुसार, सूबे के इतिहास में यह संभवतः पहली बार हुआ है जब किसी दरोगा के कृत्य पर ख़ुद मुख्यमंत्री ने इस तरह से संज्ञान लिया हो। इस कार्रवाई को भविष्य के लिए सीख बताया जा रहा है और साथ ही ये सन्देश भी दे दिया गया है कि योगी सरकार किसानों को लेकर ख़ासी संवेदनशील है। निर्णय लिया गया है कि आरोपित दरोगा के वेतन से ही नुकसान की भरपाई की जाएगी। अब तक 11 किसानों को मुआवजा दिया भी जा चुका है जबकि अन्य के बारे में सूचना इकट्ठी की जा रही है।
यमुनापार के एसपी चक्रेश मिश्रा ने ख़ुद घटनास्थल पर पहुँच कर किसानों व सब्जी विक्रेताओं से माफ़ी माँगी। कहा जा रहा है कि लॉकडाउन के कारण सिर्फ बुधवार और शुक्रवार को बाजार लगाने की अनुमति दी गई थी लेकिन कुछ किसानों ने गुरुवार को भी मंडी लगा दी। सरकारी वाहन से पहुँचे दरोगा ने उन सब्जियों को रौंद डाला और साथ ही अभद्र टिप्पणी भी की। कुछ लोगों ने इस घटना का वीडियो बना लिया, जो वायरल हो गया।
पाकिस्तान में एक दंपति ने आठ साल की जोहरा शाह की पीट-पीटकर हत्या कर दी। जोहरा उनके घर में काम करती थी। घटना रावलपिंडी के एक पॉश इलाके की है।
बच्ची का गुनाह यह था कि उसने गलती से पिंजड़ा खोल दिया और उसमें बंद तोते उड़ गए। सोशल मीडिया पर घटना के तूल पकड़ने के बाद पुलिस ने आरोपित हसन सिद्दीकी और उसकी बीवी को गिरफ्तार कर लिया है।
Viz case of domestic child maid Zohra abused & killed – MOHR is in touch with police. Our lawyer is following case.Husband & wife on 4 day remand. Mohr proposed amend to add domestic labour as hazardous occupation in Schedule 1 of Employment of Children Act1991 @RabiyaJaveri
जानकारी के मुताबिक जोहरा शाह को आरोपित हसन सिद्दीकी ने करीब चार महीने पहले अपने एक वर्षीय शिशु की देखभाल करने के लिए रखा था। साथ ही सिद्दीकी ने उसके माता-पिता से लड़की की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा देने का वादा किया था।
दरअसल दक्षिणी पंजाब के मुजफ्फरगढ़ के कोट अडू गाँव की रहने वाली लड़की हसन के घर में पिजड़ों की सफाई कर रही थी। इसी बीच उसने गलती से दरवाजा खोल दिया और उसमें बंद दो महॅंगे तोते उड़ गए। इसी बात को लेकर सिद्दीकी और उसकी पत्नी उम्म कुलसुम ने लड़की को बेरहमी से पीटा।
एफआईआर के मुताबिक शाह के चेहरे, पैर, पसलियों और हाथों पर चोट के निशान थे। उसे बेगम अख्तर रुखसाना मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम के बाद उसका शव परिजनों को सौंप दिया गया।
सोशल मीडिया पर घटना के वायरल होने के बाद पुलिस ने आरोपित दंपति को गिरफ्तार कर लिया। पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में है और आरोपितों को 4 दिन की रिमांड पर भेज दिया गया है। मंत्रालय ने बाल श्रम कानून 1991 में संशोधन का भी प्रस्ताव दिया है।
मामले की जाँच करने वाले पुलिस अधिकारी मुख्तार अहमद ने बताया, “हमने दंपति को गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने अपना अपराध कबूल कर लिया है।” उन्होंने कहा कि बच्ची को उसके निजी अंगों में भी लात मारी गई थी और उससे खून बह रहा था।
पाकिस्तान में श्रम कानून बच्चों और कम उम्र के लोगों के काम करने पर रोक लगाता है। इसके बाद भी घरों में काम करने वालों की दुर्दशा चिंताजनक है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मुताबिक पाकिस्तान में 8.5 मिलियन से अधिक घरेलू कामगार हैं, जिनमें कई महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं। कथित तौर पर, उन्हें मासिक या वार्षिक आधार पर रखा जाता है, और पाकिस्तान में उनके खिलाफ हिंसा से जुड़े कई मामले सामने आए हैं।
पिछले साल जनवरी में लाहौर में 16 साल की उज्मा की हत्या उसके नियोक्ताओं ने सिर्फ इसलिए कर दी थी, क्योंकि उज्मा ने उनका कुछ खाना खा लिया था। इस घटना के बाद पंजाब प्रांत की सरकार ने घरेलू कामगारों के लिए पंजाब घरेलू कामगार अधिनियम बनाया।
घरेलू कामगार यूनियन के महासचिव आरूमा शहजाद ने कहा, “इस कानून के बावजूद पंजाब में अभी भी बड़ी संख्या में घरेलू कामगार बिना किसी पंजीकरण के अवैतनिक काम कर रहे हैं और बच्चों को मरने तक प्रताड़ित किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा कार्ड नहीं मिले हैं और सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए।
केरल में गर्भवती हथिनी की मौत के मामले की जाँच तेज हो गई है। पुलिस ने जानकारी दी है कि मामले के दो आरोपित अभी भी फरार हैं। पलक्कड़ पुलिस अधीक्षक जी शिवा विक्रम ने फरार होने वाले लोगों के नाम अब्दुल करीम और उसका बेटा रियासुद्दीन बताया है। दोनों ही अंबालाप्पारा के निवासी हैं।
दरअसल, दोनों के उस संपत्ति के मालिक होने का संदेह है, जहाँ से आरोपित पी विल्सन को गिरफ्तार किया गया है। इस मामले में दो प्राथमिकी दर्ज की गई है। एक पुलिस ने जबकि दूसरी प्राथमिकी वन विभाग द्वारा दर्ज कराई गई है।
आरोपितों के नाम सामने आने पर ऑल्टन्यूज़ की बदलती ‘डेवलपिंग स्टोरी’
गर्भवती हथिनी की मौत की खबरों से एक ओर देशभर में आक्रोश का माहौल था, तो दूसरी तरफ ऑल्ट न्यूज़ जैसे कुछ फैक्ट चेकर बस एक ऐसे मौके के इन्तजार में थे, जिसके जरिए किसी ना किसी तरह से इस घटना का सम्बन्ध हिन्दू आस्था से जोड़कर उन्हें बदनाम किया जा सके। ये वही ऑल्टन्यूज़ हैं, जिन्होंने 7 दिन तक अरबीना खातून की मौत पर प्रपंच गढ़ते हुए यह साबित करने का हर प्रयास किया कि उनकी मौत का कारण भारतीय रेलवे है। ऑल्टन्यूज़ ही नहीं बल्कि बॉलीवुड के प्रगतिशीलों ने भी फ़ौरन इस हथिनी की मौत के लिए ‘गणेश को पूजने वाले हिन्दुओं’ की आस्था से जोड़ने का काम किया।
हालाँकि, हुआ यह कि जल्द ही, खबरें सामने आईं कि अपराधियों का संबंध मुस्लिम समुदाय से था और यह बात तब सामने आई जब इस्लामिक प्रचार वेबसाइट ऑल्टन्यूज़ ने कहानी को तोड़ने और अपराधियों को अपनी विचारधारा के स्वरूप में ढालने के लिए हमेशा की ही तरह एक ‘डिबंक’ करता ‘फैक्ट चेक’ प्रकाशित किया।
इस मामले में ऑल्टन्यूज़ द्वारा किए गए दो ‘फैक्ट-चेक’ सामने आए। एक केरल जिले के बारे में था, जहाँ यह घटना हुई थी, और दूसरा, सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले मुस्लिम अपराधियों के नामों का फैक्ट चेक करने वाला! दोनों फैक्ट चेक बेहद भ्रामक और फर्जी थे, जिन्हें एक-एक कर विस्तार से यहाँ बताया जा रहा है –
ऑल्टन्यूज़ के 2 सनसनीखेज फैक्ट चेक, जो अभी भी ‘डेवलपिंग स्टोरी’ हैं
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों फर्जी और भ्रामक फैक्ट चेक अभी भी ऑल्टन्यूज वेबसाइट पर हैं और अपने ‘होम पेज’ पर प्रमुखता से प्रदर्शित किए जा रहे हैं, और ये रिपोर्ट लिखे जाने तक भी ‘फ़ीचर पोस्ट’ के तौर पर बरकरार है।
ऑल्टन्यूज़ का होम पेज
ऑल्टन्यूज़ का पहला फैक्ट चेक – मल्लापुरम नहीं पलक्कड़, मुस्लिमों को बदनाम करने का प्रयास
ऑल्टन्यूज़ का पहला फैक्ट चेक तब सामने आया जब मेनका गाँधी द्वारा केरल के मुस्लिम बहुल जिले मल्लापुरम को लेकर एक नोट जारी किया, जिसमें कहा गया था कि केरल के मुस्लिम बहुल जिले मल्लापुरम में पशु क्रूरता के मामले देखे गए हैं और बार-बार अनुरोध करने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
इस पर ऑल्टन्यूज़ ने इस जानकारी का फैक्ट चेक करते हुए कहा कि यह घटना वास्तव में पपलक्कड़ में हुई थी और मल्लापुरम का नाम केवल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए सामने लाया जा रहा है।
इस तथाकथित फैक्ट चेक में ऑल्टन्यूज़ ने लिखा कि भारत में अधिकांश मामलों की तरह ही इस घटना में भी मुस्लिमों के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया गया है।
इस रिपोर्ट में, ऑल्टन्यूज़ ने केरल के वन मंत्री और मुख्यमंत्री के हवाले से कहा कि यह घटना पलक्कड़ में हुई है। हालाँकि, यह जानकारी सही है, ऑल्टन्यूज़ ने बेशर्मी के साथ यह दावा किया कि मल्लापुरम जिले का नाम लाने की वजह से मुस्लिमों की छवि को नुकसान पहुँचा है।
ऑल्टन्यूज़ द्वारा यह ‘फैक्ट चेक’ जून 04, 2020 को प्रकाशित किया गया था और कल तक भी इसमें किसी को कुछ भी गलत नजर नहीं आता, सिवाए इसके कि ऑल्टन्यूज़ ने इसके जरिए भरपूर कोशिश की कि हिन्दू मुस्लिमों से नफरत करते हैं। हालाँकि बाद में पता चला कि आरोपित मूल रूप से मल्लापुरम जिले का निवासी था और रबर की खेती का काम करता था। यहाँ पर समस्या यह है कि इस रिपोर्ट की वास्तविकता सामने आने के बाद भी यह रिपोर्ट लिखे जाने तक अपडेट नहीं किया गया है।
5 जून को जिसे गिरफ्तार किया गया, वह अपराधी एक पी विल्सन था और अन्य दो, जो फरार हो गए थे, उनकी पुष्टि दो मुस्लिम व्यक्तियों – अब्दुल करीम और बेटे रियासुद्दीन के रूप में की गई थी।
अब चूँकि, ऑल्टन्यूज़ द्वारा पहले यह माहौल तैयार करने का प्रयास किया गया कि इस खबर में मुस्लिमों का नाम लेकर मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है, तो उसी तर्क के साथ अब ऑल्टन्यूज़ को यह माफ़ी माँगते हुए अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से इस बात का भी जिक्र करना चाहिए कि उनका पहला फैक्ट चेक एकदम बेबुनियाद और कल्पना पर आधारित था, जिसमें उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए यह खबर चलाई जा रही है, क्योंकि अब जो आरोपित सामने आए हैं, दुर्भाग्य से वह मुस्लिम ही हैं।
दूसरा फैक्ट चेक – मुस्लिम आरोपितों के नाम सामने आने पर ऑल्टन्यूज़ की धूर्तता
जैसे ही उस मामले ने तूल पकड़ा और यह प्रकरण आगे बढ़ा, 5 जून को, कई व्यक्तियों ने ट्वीट कर जानकारी दी कि हथिनी की मौत के जघन्य अपराध के लिए जिन दो अपराधियों को गिरफ्तार किया गया था, वे दो व्यक्ति अमजथ अली (Amzath Ali) और थामीम शेख (Thamim Shaikh) थे। इस सूचना के बारे में सबसे पहले ट्वीट करने वालों में से एक केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री के मीडिया सलाहकार अमर प्रसाद रेड्डी थे।
यह खबर सामने आते ही ऑल्टन्यूज़ ने फ़ौरन नया ‘फैक्ट चेक’ जारी किया, जिसका शीर्षक था – “केरल हथिनी की मौत के बारे में अमजथ अली और थामिम शेख की गिरफ्तारी को लेकर झूठा दावा।” इस फैक्ट चेक की शुरुआत में लिखा गया कि भारतीय मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए यह खबर अब अलग मुद्दा बन गई है जो कि ‘भारतीय मुस्लिमों को निशाना बनाने’ को लेकर है।
ऑल्टन्यूज़ का फैक्ट चेक
दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों में से 2 के मुस्लिम होने के बाद, इस लाइन को उनके ‘फैक्ट चेक’ में से चुपके से हटा दिया गया है। पूरे फैक्ट चेक के बाद अंत में दावा किया गया कि इस अपराध में कोई ‘मुस्लिम एंगल’ नहीं था, और ऑल्टन्यूज़ ने चुपचाप अपनी रिपोर्ट को ‘अपडेट’ कर दिया।
ऑल्टन्यूज़ ने अब ये लाइन चुपचाप डिलीट कर दी है
और जैसा कि आप यहाँ पर संलग्न स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं – ऑल्टन्यूज़ ने रिपोर्ट के आखिर में लिखा है कि रबर का कारोबार करने वाले अब्दुल करीम और उसके बेटे रियासुद्दीन, जो कि इस आरोप में ‘संदिग्ध’ हैं, की जानकारी के साथ यह अपडेट कर दी गई है, जैसा कि पुलिस का भी बयान है।
ऑल्टन्यूज़ अभी भी अपने इस दावे पर खड़ा है कि इसमें मुस्लिम नजरिए जैसी कोई बात नहीं थी और यह मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए गढ़ी गई, साथ ही यह भी रिपोर्ट को ‘डेवलपिंग स्टोरी’ बताते हुए खत्म किया है।
ऑल्टन्यूज़ की 5 दिन से रोजाना डेवलप होती स्टोरी
इस अपराध में मुस्लिम आरोपितों के नाम सामने आने के बावजूद भी ऑल्टन्यूज की हेडलाइन अभी पूर्ववत और भ्रामक ही हैं, जो कि यही सन्देश देती नजर आती हैं कि मुस्लिमों का इस केस से कोई सम्बन्ध नहीं है।
ऑल्टन्यूज़ के साथ समस्या कहाँ पर है
ऑल्टन्यूज़ अपने चुनिन्दा मुद्दों पर यह कहने से पीछे नहीं हटता है कि उन्होंने पुलिस से बात की। यहाँ भी उन्होंने कुछ ऐसा ही काम कर चतुराई दिखाने की कोशिश करते हुए लिखा कि उन्होंने पलक्कड़ के पुलिस अधीक्षक जी शिवा विक्रम से बात की। ऑल्टन्यूज़ ने कहा कि अपराधियों के मुस्लिम होने का दावा फर्जी है और इस मामले में एक पी विल्सन को गिरफ्तार किया गया था।
हालाँकि, संदिग्धों के नाम अब्दुल करीम और उसके बेटे रियासुद्दीन के नाम सामने आने के बाद, ऑल्टन्यूज़ ने इस पैराग्राफ को बरकरार रखते हुए एक और जोड़ा – “मलयालम न्यूज़ स्रोत मातृभूमि और जन्मभूमि का कहना है कि रबर प्लान्टेशन के मालिक, जहाँ विल्सन काम करता है, भी इस मामले में संदिग्ध हैं। अब्दुल करीम और रियासुद्दीन अभी फरार हैं और यह जानकारी भी हमें पुलिस अधीक्षक जी शिवा विक्रम ने दी है।”
यह भाग ऑल्टन्यूज़ ने बाद में जोड़ा है
पुलिस के बयानों पर चुनिन्दा सहमति
अब यहाँ पर यह पूरी तरह से संभव है कि जब ऑल्टन्यूज़ ने पहले पुलिस अधिकारी से बात की, तो पुलिस अधिकारी ने कहा होगा कि या तो वह इन नामों की पुष्टि नहीं कर सकते हैं या फिर अभी तक ‘अमजथ अली’ और ‘थामिम शेख’ नाम सामने नहीं आए हैं।
या फिर यह भी हो सकता है कि पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा हो कि वो अभी इन खबरों के बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कह सकते और जो नाम सामने आ रहे हैं, वह फेक भी हो सकते हैं। हालाँकि, इस्लामिक विचारधारा के समर्थक ऑल्टन्यूज़ के पुराने रिकॉर्ड को देखकर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के नाम सामने आने की वजह से पुलिस के बयान से ही छेड़छाड़ कर दी हो।
अब यह कहा जा सकता है कि ऑल्ट न्यूज़ द्वारा किए गए दोनों फैक्ट चेक कम से कम मूल आधार पर सही पाए गए हैं। पहले में, यह घटना पलक्कड़ में हुई थी, न कि मल्लापुरम में और दूसरी में, कि अपराधी के नाम वास्तव में अमजथ अली और थामीम शेख नहीं थे (लेकिन वास्तव में अब्दुल करीम और उसका बेटा रियासुद्दीन थे)।
हालाँकि, ऑल्टन्यूज़ का यह दावा कि यह घटना सिर्फ मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए सामने लाई जा रही है, अभी भी झूठ है और ऑल्टन्यूज़ द्वारा सिर्फ मुस्लिम अपराधियों को सुरक्षा कवच और विक्टिम कार्ड देने के उद्देश्य से ही कही गई। यही बात उनके फैक्ट चेक के हेडलाइन और एक्सर्पट से भी जाहिर होती है।
इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑल्टन्यूज़ दावा करता है कि वह फैक्ट चेकर यानी, तथ्यों की जाँच करने वाली वेबसाइट हैं, जबकि उनके कारनामों से यही सन्देश मिलता है कि वह सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक अपराधियों को बचाने के लिए तथ्यों को जरूरत के अनुसार ढालने और उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश करने वाली वेबसाइट से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं और यह साबित करने के लिए ऑल्टन्यूज़ की रोजाना अपडेट हो रही यह ‘डेवलपिंग स्टोरी’ ही काफी है कि वह वास्तविकता के साथ कितना बैर रखते हैं।
NDTV भी ‘डेवलपिंग स्टोरी’ की तर्ज पर ही बदल रहा है हेडलाइन
ऐसा ही कुछ कारनामा NDTV की हेडलाइन भी करती देखी जा सकती हैं, जिन्होंने इस पूरी स्टोरी को रोजाना नई जानकारियों के सामने आने पर बेहद धूर्तता से पहले ‘हथिनी को पटाखों से भरा अनानास खिलाया’ गया से लेकर ‘हथिनी ने पठाखों से भरा अनानास खाया’ तक में तब्दील कर दिया।
‘प्रेस स्वतंत्रता’ टुटपुँजिया वामपंथी पत्रकारों या बड़े संस्थानों के बाप की जागीर नहीं है, कि जब चाहे पुलिस लगा दो! वो मेरी और ऑपइंडिया की भी है, टाइम्स ऑफ इंडिया पत्रकार की भी है, और अगर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ जोड़ दें तो, सड़क किनारे भुट्टा बेचते छोटे व्यापारी की भी है।
किसी भी राज्य की पुलिस, हमारे पीछे अपनी राजनैतिक मजबूरियों के कारण भले ही लग जाए, लेकिन वो हमसे खबरें डिलीट नहीं करवा सकते। कानूनी रूप से लड़ोगे, हम पहले से ज्यादा तैयार हैं। हम यहाँ टिकने आए हैं, खबरें डिलीट करने नहीं।
न ही हम ‘अभी ‘फलाँ पत्रकार’, ‘स्कोडा गिल्ड’ का गुप्ता चुप क्यों है’ वाली बातें कहेंगे क्योंकि वो बेकार की बातें हैं। ये नंगे लोग नहाएँगे क्या, और निचोड़ेंगे क्या! हमें इनसे न तो उम्मीद है, न ही उन्हें इस लायक समझते हैं कि वो हमारा प्रतिनिधित्व करें। हम अपने प्रतिनिधि स्वयं हैं।
और हमारे ‘टिकने’ से मतलब है कि हम यहाँ ठहरेंगे, अपना आकार बदलेंगे और पत्रकरिता की दिशा और दशा तय करेंगे। हमने ‘समुदाय विशेष’ की नौटंकी बंद करवा दी है, और बाकियों ने अपराधियों का नाम लेना शुरु कर दिया है। अभी और भी बहुत कुछ बदलेगा।
बात यह नहीं है कि हम पर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों से ले कर राजनैतिक पार्टियों के नेताओं, इस्लामी कट्टरपंथियों और नक्सलियों ने खुजली वाले, केसविहीन कुत्तों के झुंड की तरह हम पर हमला बोला है, वो तो करेंगे ही क्योंकि उनकी नग्न चमड़ी हमने ही झुलसाई है। बात यह है कि भौंकना उनकी प्रकृति है और हमारी प्रकृति है सप्तबाण संधान से उनका मुख बंद करना।
यह समझना कठिन नहीं है एक ट्वीट पर पुलिस संज्ञान क्यों लेती है, और बिना कोर्ट में केस ले जाए, सीधे एक खबर को डिलीट करने का निर्देश (आदेश के लहजे में कि हम पुलिस बोल रहे हैं) दे देती है। मीडिया और सोशल मीडिया के बीच की क्षीण होती भित्ति के कारण, निजी भी सार्वजनिक हो चुका है। अतः कोई हिन्दूघृणा बेचेगा/बेचेगी, तो हम उस पर मुखर हो कर लिखेंगे।
Dear @MumbaiPolice. It is heartening to see you send OpIndia an email to delete the article just after one tweet. But rest assured, we aren’t deleting it. Please check your email for the response from our lawyer pic.twitter.com/lQBPQxEogs
ऑपइंडिया (अंग्रेजी) की सम्पादिका नुपुर शर्मा का ट्वीट
सैकड़ों सालों से दबाई जाती आवाजें एक पूरी जनसंख्या के रूप में गूँगी रह कर सहने को विवश होती रही है। पत्रकारिता के मानदंड वो तय नहीं करेंगे जिन्होंने इतिहास और संस्कृति का शीलहरण किया है। ऐसे हर मानदंड हम तोड़ेंगे क्योंकि वो जनभावना के विरोध में है। एक को प्राथमिकता, दूसरे को नीची निगाह… ये बंद होना चाहिए।
सलमान को ‘रमेश (बदला हुआ नाम)’ कह कर उसके बलात्कार को हिन्दुओं के ऊपर फेंकना, दूसरे मजहब के आलिम के लिए हिन्दू ‘तांत्रिक’ जैसे शब्द और भगवा वस्त्रों वाला कार्टून लगा कर किस तरह की प्रस्तुति हो रही है पत्रकारिता की? क्या हम यह दिखाना चाहते हैं कि एक मजहब अपराध नहीं करता?
या वो यह जताना चाहते हैं कि उनके द्वारा किए गए अपराधों पर लिखना निषिद्ध है? नहीं, उन सबके नाम लिखे जाएँगे, उनके द्वारा किए गए अपराधों का वर्णन ऐसे होगा कि आपके सामने वो चलचित्र बन कर उभरे, उसके ‘लव जिहाद’, ‘रेप जिहाद’ और बाकी अपराधों को आप देख-समझ पाएँगे। सामाजिक अपराध को सामाजिक अपराध कहेंगे और मजहबी को मजहबी।
डरने से तो हम रहे, तुम लार टपकाते लकड़बग्घों का झुंड बन कर आते रहो… हम शिकार के लिए बैठे हैं क्योंकि तुम्हारे लिए हमने जो लैंडमाइन लगाए हैं, वो विस्फोटक नहीं, सामान्य लोगों की खुली आँखें हैं। वो तुम्हारी नग्नता को देखेंगे, और बचे-खुचे वस्त्र भी हर लेंगे। बाकी काम हम अपने पत्रकारिता का हैलोजैन जला कर कर देंगे।
सड़क पर चलते पत्रकार को सत्तारूढ़ नेताओं ने भी गोली मरवाई है, कट्टरपंथियों ने भी हमले किए हैं, इनबॉक्स में धमकियाँ भी आती हैं… लेकिन पत्रकारिता रुक जाएगी क्या? उँगलियों की अंतिम हलचल तक लेख लिखे जाते रहेंगे, होंठों की आख़िरी ज़ुम्बिश तक हम बोलते रहेंगे।
पत्रकारिता ‘ब्लू टिक’ वाली संस्थाओं या व्यक्तियों के सत्यापन का मोहताज नहीं। जिसके पास लिखने की क्षमता है, जो बोल सकता है, वो पत्रकार है। जो विसंगतियों पर बोलता/लिखता है, वृहद् समाज तक ले जाता है, वो पत्रकार है। ट्विटर-फेसबुक माध्यम हैं, और गूँगे बना दिए गए लोगों की स्वरतंत्री है।
ले आओ… कानूनी शब्दावली से भरे दस्तावेज ले कर आओ… हमें डराओ, धमकाओ, पुलिस स्टेशन में बारह घंटे बिठाओ, हमारे परिवार को परेशान करो… फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमें जो पढ़ते हैं, सुनते हैं, वो जानते हैं कि क्या हो रहा है। तुम न्याय व्यवस्था का प्रयोग कर हमें डराने में व्यस्त रहो, हम उसी व्यवस्था के सहारे जीतेंगे।
दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते सक्रिय मामलों के बीच, राज्य सरकार ने कथित तौर पर दो विरोधाभासी आदेश जारी किया। जिसकी वजह से सर गंगाराम अस्पताल के डॉक्टरों के लिए मुसीबत खड़ी हो गई है।
3 जून को, अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार ने कथित तौर पर अस्पताल को आदेश दिया था कि वह ICMR के दिशानिर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए कोरोना वायरस संक्रमितों का टेस्ट करना बंद कर दे।
नोटिस में लिखा था, “जिले को पता चला है कि अस्पताल आज भी RT, PCR ऐप का उपयोग नहीं कर रहा है। अस्पताल को यह बताने के लिए निर्देशित किया जाता है कि उन्होंने आदेश की प्राप्ति के दो दिनों के बाद भी RT PCR ऐप के माध्यम से सैंपल इकट्ठा करना शुरू क्यों नहीं किया है। कोरोना वायरस संदिग्ध / पुष्टि के मामलों के लिए RT PCR सैंपलिंग को तत्काल प्रभाव से रोका जाना चाहिए।”
उसी दिन, दिल्ली सरकार ने एक और घोषणा की कि 675 बेड वाले सर गंगाराम हॉस्पिटल को कोरोना वायरस मरीजों के इलाज के लिए 80 प्रतिशत बेड आरक्षित करने होंगे। डॉक्टरों का कहना है कि एक तरफ कोरोना संक्रमितों का टेस्ट करने से मना करना और दूसरी तरफ उनके इलाज के लिए बेड की संख्या बढ़ाना विरोधाभासी आदेश है, जिसकी वजह से काफी मुश्किलें हो रही हैं।
सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ श्याम अग्रवाल ने बताया कि उनके पास कैंसर के मरीज के लगातार फोन आ रहे हैं, जिन्हें कीमोथैरेपी दी जानी है। उन्होंने बताया, “हमने यह सुनिश्चित किया है कि उन्हें हर दो सप्ताह में एक बार कोरोना वायरस परीक्षण कराना चाहिए क्योंकि कोविड पॉजिटिव वाले रोगी पर कीमोथैरेपी विनाशकारी हो सकती है। हमने उन्हें बताया है कि यदि परीक्षण नहीं किया जाता है, तो यह (कीमोथैरेपी) उनके लिए हानिकारक हो सकता है।”
अग्रवाल को कैंसर मरीजों ने बताया कि कई लैब ने टेस्ट करना बंद कर दिया है। ऐसे में वो अपना टेस्ट कहाँ पर करवाएँ? इस तरह दिल्ली सरकार के आदेश की वजह से कैंसर के मरीज बिना इलाज के रहने को मजबूर हैं।
बुधवार को हॉस्पिटल के लैब में कोरोना वायरस टेस्ट के लिए 174 सैंपल एकत्र किए गए थे। टेस्ट बंद होने से पहले अस्पताल में प्रतिदिन 150 से 170 सैंपलों का टेस्ट हुआ करता था। वहीं डॉक्टरों के मुताबिक एक दिन में लगभग 30-40 सर्जरी की जाती थी। मगर गुरुवार से टेस्ट के साथ सर्जरी भी बंद हो गई। सब कुछ ठप हो गया है।
डॉ अग्रवाल ने एक ब्रेस्ट कैंसर रोगी की कहानी सुनाई, जिसे न चाहते हुए भी सरकारी आदेश की वजह से उन्हें छुट्टी देनी पड़ी। उन्होंने स्वीकार किया कि गुरुवार को महिला का ऑपरेशन होना तय था। मगर आवश्यक टेस्ट किए बिना उस ऑपरेशन को नहीं किया जा सकता था। इसलिए ऑन्कोलॉजिस्ट को उनके परिवार को सरकारी आदेश के बारे में समझाना पड़ा और यह जानने के बावजूद कि कैंसर फैल सकता है, रोगियों को छुट्टी देनी पड़ी। उन्होंने बताया कि पिछले 2 दिनों में तीन रोगियों की सर्जरी को इसी तरह से स्थगित किया गया।
सर गंगा राम अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ ने कहा, “अगर हम बिना टेस्ट के मरीज को कोरोना वायरस पॉजिटिव मानकर इलाज करते हैं, तो मरीज के इलाज में पर्याप्त सुरक्षा (पीपीई, अलग डॉक्टर, समर्पित नर्सों के साथ एक अलग वार्ड) के लिए लाखों का खर्चा होगा और अगर मैं उसे अन्य कोरोना वायरस रोगियों के साथ रखता हूँ, तो यह मासूम बच्चा उनसे संक्रमित हो सकता है।”
सर गंगाराम अस्पताल से जुड़े 40 बेड वाले कोलमेट और 140 बेड वाले सिटी हॉस्पिटल को पहले ही कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए परिवर्तित कर दिया गया है। सरकारी आदेश के अनुसार, सर गंगाराम अस्पताल में केवल 20% बेड गैर-कोरोना वायरस रोगियों के लिए उपलब्ध हैं।
दिल्ली सरकार के एक प्रवक्ता ने दावा किया था कि 35 मान्यता प्राप्त ICMR प्रयोगशालाओं में से 8 आधिकारिक दिशानिर्देशों की धज्जियाँ उड़ाते हुए पाए गए थे। जिसके बाद उनके खिलाफ अस्थायी रुप से कार्रवाई की गई थी। इन प्रयोगशालाओं को व्यक्तिगत सैंपल नहीं लेने का निर्देश दिया गया था। हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अस्पतालों द्वारा भेजे गए नमूने को मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में संसाधित किया जाना जारी है।
जब डॉक्टरों द्वारा उठाए गए मुद्दे पर दिल्ली सरकार के प्रवक्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “दिल्ली में ICMR द्वारा अधिकृत दिल्ली में 35 लैब हैं। इनमें से आठ प्रयोगशालाओं में ICMR द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया था। इसलिए कार्रवाई शुरू की गई। एक अस्थाई उपाय के रूप में, इन प्रयोगशालाओं को व्यक्तिगत नमूने नहीं लेने के लिए कहा गया है। हालाँकि, विभिन्न अस्पतालों और अन्य एजेंसियों द्वारा भेजे गए नमूनों को इन प्रयोगशालाओं में संसाधित किया जाएगा।”
अपने बचाव में, सर गंगा राम अस्पताल के अध्यक्ष ने कहा कि प्रबंधन ने सरकार के नोटिस का जवाब दिया था और दोहराया कि यह एक मामूली मुद्दा था। उन्होंने जोर दिया कि टेस्ट सेवाओं को बहुत जल्द फिर से शुरू किया जाएगा।
ब्रेकिंग न्यूज की बेतहाशा दौड़ में अक्सर मेनस्ट्रीम मीडिया गलत खबरों को उछाल देती है। ऐसा ही एक मामला फिर सामने आया है। शनिवार (जून 6, 2020) को मेनस्ट्रीम मीडिया ने ज्योतिरादित्य सिंधिया, जो कि पहले कॉन्ग्रेस में थे और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए, को लेकर ‘खबर’ चलाई कि उन्होंने अपने ट्विटर बॉयो से बीजेपी हटा लिया है।
कई मेनस्ट्रीम मीडिया चैनलों ने इस खबर को चलाया। TimesNow और Financial Express ने इस खबर को प्रमुखता से उठाया। यह लेख भाजपा के अंदरुनी खेमे में दरार की अटकलों से भरा पड़ा था।
TimesNow article about Scindia’s Twitter profileFinancial Express article about Scindia’s Twitter profile
न्यूज ट्रैक नाम के न्यूज पोर्टल तो यहाँ तक कह दिया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया फिर से कॉन्ग्रेस में शामिल हो सकते हैं।
Article by News Track
हालाँकि, ये खबर गलत है। ऐसा लगता है जैसे मीडिया ने आज सुबह ही उठकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्विटर प्रोफाइल को बेतरतीब ढंग से जाँचने का फैसला किया और ‘BJP’ शब्द नहीं मिलने पर इसके आधार पर एक कहानी बनाई, जो बेबुनियाद है।
सच यह है कि बीजेपी में शामिल होने के बाद भी, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने ट्विटर बॉयो में कभी भी ‘BJP’ शब्द नहीं जोड़ा। ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्विटर बॉयो के वेब आर्काइव में जाने पर बातें खुद ब खुद स्पष्ट हो जाती हैं।
ऑपइंडिया ने सच्चाई का पता लगाने के लिए उनके बॉयो के आर्काइव वर्जन को सर्च किया। इसमें पाया गया कि जब उन्होंने बीजेपी ज्वाइन की थी, तब भी उन्होंने अपने ट्विटर बॉयो में ‘बीजेपी’ का उल्लेख नहीं किया था।
यहाँ पर सिंधिया के ट्विटर प्रोफाइल का 17 मई के आर्काइव का स्क्रीनशॉट है, जिसमें देखा जा सकता है कि उनके ट्विटर बॉयो में बीजेपी का जिक्र नहीं है।
Archive of Twitter profile of Jyotiraditya Scindia
9 मई को भी उनके ट्विटर बॉयो में बीजेपी नहीं है।
Archive of Twitter profile of Jyotiraditya Scindia
गौरतलब है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया 12 मार्च को बीजेपी में शामिल हुए थे।
जब हम 7 मार्च से लेकर 22 मार्च तक उनके ट्विटर प्रोफाइल में हुए परिवर्तन पर गौर करते हैं तो पाते हैं कि इस बीच उनका डिस्प्ले पिक्चर चेंज हुआ है। जब वो कॉन्ग्रेस में थे तो उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी के गमछे वाला फोटो लगाया था और बीजेपी में शामिल होने के बाद यह पार्टी के अनुसार बदल गया। बीजेपी में शामिल होने के ठीक बाद भी उनके ट्विटर बॉयो में उनके बीजेपी से एसोसिएशन का उल्लेख नहीं किया गया था।
Twitter profile of Scindia on 7th March and 22nd March
इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने ट्विटर बॉयो से बीजेपी नहीं हटाया है, क्योंकि उन्होंने शुरुआत से कभी इसे अपनी ट्विटर बॉयो में जोड़ा ही नहीं।
बता दें कि यह पहली बार नहीं है, जब सिंधिया के ट्विटर बॉयो को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। इससे पहले दिसंबर 2019 में उन्होंने अपने ट्विटर बॉयो से कॉन्ग्रेस का नाम हटाकर पार्टी छोड़ने की अटकलों को हवा दी थी। सिंधिया के पहले के ट्विटर बॉयो में लिखा था कि वह 2002 से 2019 तक गुना के पूर्व सांसद थे। यह भी लिखा था कि वे पूर्व ऊर्जा मंत्री, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय और MoS कम्युनिकेशन्स, IT विभाग के मंत्री थे। मगर बाद में सिंधिया ने बॉयो से इन जानकारियों को हटाते हुए सिर्फ “लोक सेवक, क्रिकेट में दिलचस्पी रखने वाला” रखा था।
पाकिस्तान के सिंध में एक और लड़की के जबरन इस्लाम कबूल कराने का मामला सामने आया है। ये घटना सिंध के नयनकोट क्षेत्र स्थित शाह लतीफ़ कॉलनी में गुरुवार (जून 4, 2020) को हुई। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, वहाँ के कुछ युवक हथियारों के साथ जबरन पीड़ित युवती के घर में घुस गए और उसका अपहरण कर लिया। पीड़िता का नाम प्रियंका कुमारी है, जिसके परिवार को बन्दूक की नोंक पर धमकाया गया।
प्रियंका कुमारी के परिवार द्वारा दिए गए बयान के अनुसार, कलीम शाह अपने हथियारबंद दोस्तों के साथ आया और प्रियंका को अगवा कर के ले गया। पिछले एक सप्ताह में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में सातवीं ऐसी घटना है, जहाँ किसी हिन्दू लड़की का इस तरह से जबरन इस्लामी धर्मान्तरण के लिए अपहृत कर लिया गया। अधिवक्ता और एक्टिविस्ट राहत ऑस्टिन ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाया। अब तक सिंध पुलिस का इस मामले में कोई बयान नहीं आया है।
इससे पहले (सोमवार) को सिंध में तीन हिन्दू लड़कियों का अपहरण करके उनका जबरन इस्लामी धर्मान्तरण कर दिया गया था और साथ ही जबरदस्ती निकाह भी करा दिया गया था। 24 घंटे के भीतर तीन अलग-अलग जगहों से ये घटनाएँ सामने आई थीं। इनमें से दो मामले तांडो मोहम्मद खान जिले से आए थे। वहाँ मजहबी युवकों ने शिवानी नाम की हिन्दू लड़की का अपहरण किया था। इसके बाद संतारा नाम की एक 15 वर्षीय नाबालिग का भी अपहरण किया गया।
पाकिस्तान के सिंध में हिन्दू लड़की के अपहरण का एक और मामला
इन दोनों को एक मौलवी द्वारा इस्लाम कबूल करवाया गया और साथ ही युवकों से इनका निकाह भी करा दिया गया। इनमें से तीसरा मामला मीरपुरखास का था। वहाँ भी भगवंती नाम की एक हिन्दू युवती का जबरन इस्लाम में धर्मान्तरण करा के एक युवक के साथ निकाह करा दिया गया। भगवंती के पिता को स्थानीय कट्टरपंथियों ने धमकी थी कि अगर उन्होंने अपनी बेटी को वापस लाने के लिए किसी भी प्रकार का प्रयास किया तो उसे मार डाला जाएगा।
A Hindu girl Aisha D/o Kirshan Megwad is converted to Islam at Dargah of Ayoub Jan sharhandi of Samaro, Mirwah Gorchani Mirpurkhas Sindh-Pakistan. 2-6-2020 https://t.co/7QQXn0YSD9
भगवंती के पिता ने बताया कि स्थानीय लोगों ने उन्हें धमकाते हुए कहा कि एक बार अगर किसी ने इस्लाम अपना लिया तो फिर उसके द्वारा दोबारा फिर पुराने धर्म को स्वीकार करने का एक ही दंड है और वो है सज़ा-ए-मौत। इसी जिले में आयशा नाम की एक युवती के साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया गया। उसके पिता कृष्ण मेघवाड ने बताया कि समारो के अयूब जन सरहंदी दरगाह पर जबरन ले जाकर इस्लाम कबूल करा दिया गया।
ये घटना मिरवाह गोर्चानी इलाके में हुई। न सिर्फ हिन्दू बल्कि इसाई और सिख लड़कियों को भी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जा रहा है। कुछ लोगों का ये भी कहना है कि जिस तरह से ये घटनाएँ इतनी योजनाबद्ध तरीके से हो रही है, उसके पीछे कोई बड़ी साजिश भी हो सकती है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यक हितों की बात करते हैं, जो अब तक सिर्फ़ दिखावा ही साबित हुआ है।
पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने 335 पन्नों की 2018 में मानवाधिकार की स्थिति रिपोर्ट में कहा था कि अकेले 2018 में सिर्फ सिंध प्रांत में ही हिन्दू एवं ईसाई लड़कियों से संबंधित अनुमानित 1000 मामले सामने आए। इस रिपोर्ट के बाद पाकिस्तान सरकार ने इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं की थी।
कर्नाटक में नए फ्लाईओवर के नामकरण को लेकर चल रहे सियासी खींचतान के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी को शरणा (Sharanas) जैसे समाज सुधारकों से भी बड़ा बताया है। स्वतंत्रता सेनानी और हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर के नाम का विरोध करते हुए उन्होंने यह बात कही।
सिद्धारमैया ने पिछले हफ्ते कन्नड़ समाचार चैनल टीवी 9 को दिए इंटरव्यू में कोरोना वायरस महामारी से लेकर इस संकट पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया समेत तमाम मुद्दों पर बात की।
इंटरव्यू के दौरान, पूर्व सीएम ने बंगलुरु और मंगलुरु में नवनिर्मित फ्लाईओवर का नामकरण वीर सावरकर के नाम पर करने को लेकर सत्तारुढ़ भाजपा और विपक्षी दलों के बीच चल रही राजनीतिक लड़ाई के बारे में भी बात की।
सरकार के फैसले को खारिज करते हुए, पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वीर सावरकर एक विवादास्पद व्यक्ति थे, जो महात्मा गाँधी की हत्या के आरोपित थे। उन्होंने विरोध करते हुए कहा कि फ्लाईओवर का नाम उनके नाम पर नहीं रखा जाना चाहिए।
इसके साथ ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी सुझाव दिया कि राज्य सरकार को स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर फ्लाईओवर का नाम रखना चाहिए। उन्होंने कहा, “क्या हमारे पास राज्य से 7 ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले नहीं हैं। उनमें से किसी एक के सम्मान में रखें। क्या हमारे पास स्वतंत्रता सेनानी नहीं हैं? उनके नाम पर नाम रखें। क्या गलत है इसमें? वे कर्नाटक से हैं, और वे कन्नडिगा हैं। इसका नाम उनके नाम पर रखें।”
भाजपा पर निशाना साधने की जल्दबाजी में शायद पूर्व मुख्यमंत्री यह भूल गए कि राज्य के सात नहीं, बल्कि आठ साहित्यकारों ने साहित्य कला के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार जीते हैं।
जब एंकर ने कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी को उजागर करते हुए विभिन्न योजनाओं, पार्कों सार्वजनिक संपत्तियों का नामकरण स्थानीय नेताओं की अनदेखी कर गाँधी-नेहरू परिवार पर किए जाने जाने को लेकर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी और वीर सावरकर जैसे अन्य नेताओं के बीच कोई तुलना नहीं है।
एंकर ने सरकार द्वारा संचालित कैंटीनों का नामकरण राज्य के समाज सुधारकों के नाम पर न होने को लेकर भी सवाल किया, जिन्होंने सैकड़ों साल पहले इस तरह के कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किए थे। एंकर ने पूछा कि तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने कैंटीन का नाम Basavannas जैसे समाज सुधारकों या फिर किसी अन्य Sharanas के नाम पर क्यों नहीं रखा।
इसका जवाब देते हुए सिद्धारमैया कहते हैं, “इंदिरा गाँधी इन सभी व्यक्तियों से ऊपर थीं, इसीलिए हमने उनके नाम पर कैंटीन का नाम रखा।” इसे आप वीडियो में लगभग 20:00 मिनट पर सुन सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि कर्नाटक की येदियुरप्पा सरकार बेंगलुरु के येलाहांका इलाके में नवनिर्मित फालईओवर का नाम स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के नाम पर रखने का फैसला किया है। 28 मई को मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा सावरकर के जन्मदिन पर 34 करोड़ रुपए की लागत से नगरोटाथाना योजना के तहत बनाए गए 400 मीटर लंबे फ्लाईओवर का उद्घाटन करने वाले थे। हालाँकि, बाद में इसे आगे की तारीख के लिए स्थगित कर दिया गया।
इसके बाद 3 जून को मंगलुरु में पंपवेल फ्लाईओवर के फुटपाथ पर ‘वीर सावरकर फ्लाईओवर पंपवेल’ लिखा एक बैनर सामने आया। बाद में कुछ अज्ञात लोगों द्वारा बैनर हटा दिया गया था। जेडीएस और कॉन्ग्रेस ने वीर सावरकर के नाम पर फ्लाईओवर का नाम रखने को राज्य के स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान बताया है।
दिल्ली पुलिस ने उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों के मामले की जाँच को आगे बढ़ाते हुए देवांगना कलिता के खिलाफ गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया है। वह पिंजड़ा तोड़ की दूसरी ऐसी सदस्य है जिसके खिलाफ UAPA के तहत कार्रवाई की गई है।
जेएनयू की छात्रा और फार-लेफ्ट ग्रुप पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता पर दिल्ली के कुछ हिस्सों में दंगे भड़काने की सोची-समझी साजिश और गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने के लिए आतंकवाद विरोधी आरोपों के तहत मामला दर्ज किया गया है।
उसके वकील ने बताया कि उस पर देशद्रोह, हत्या के प्रयास, हत्या, आपराधिक साजिश और धर्म, नस्ल, जन्मस्थान आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
इससे पहले पिंजड़ा तोड़ की नताशा नरवाल के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने UAPA के तहत मामला दर्ज किया था। फरवरी में हुई हिंसा के मामले में नताशा नरवाल ओर देवांगना कलिता को 23 मई को गिरफ्तार किया था। 24 मई को दोनों को कोर्ट में पेश किया गया था। लेकिन दोनों को जमानत मिल गई थी। इसके फौरन बाद दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने दोनों को हत्या, हत्या के प्रयास, दंगा और आपराधिक साजिश के आरोप में गिरफ्तार कर पूछताछ के लिए दो दिन का रिमांड ले लिया था।
देवांगना इस समय न्यायिक हिरासत में है। यह चौथा मामला है जिसके तहत कालिता को यूएपीए मामले में कुछ सप्ताह की अवधि में गिरफ्तार किया गया है। दो अन्य मामले उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों से संबंधित हैं, जबकि एक मामला पिछले साल दिसंबर की शुरुआत में हुए हिंसा से जुड़ा है।
पहले हुई गिरफ्तारी में उसे अदालत ने जमानत दे दी थी, लेकिन दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने उसे दंगों से संबंधित एक हत्या के मामले में फिर से गिरफ्तार कर लिया था। बाद में फिर 30 मई को उसे पिछले साल दिसंबर में पुरानी दिल्ली के दरियागंज में दंगे भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। मगर इस मामले में भी उसे जमानत दे दी गई थी।
नताशा नरवाल और देवांगना कलीता जेएनयू की छात्राएँ हैं। कलीता सेंटर फॉर वीमेन स्टडीज में एमफिल, जबकि नरवाल सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज की पीएचडी की छात्रा है। दोनों पिंजरा तोड़ संगठन की संस्थापक सदस्य हैं, जिसे 2015 में स्थापित किया गया था।
पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने 22 फरवरी की शाम को नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के लिए स्थानीय निवासियों को भड़काया और उन्हें जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर इकट्ठा होने के लिए कहा। पूछताछ में खुलासा हुआ था कि नताशा और देवांगना ने लोगों को भड़काने के लिए पूरी रणनीति तैयार की थी।
नताशा और देवांगना ने साजिश रच के 66 फूटा सड़क को ठप्प करवाया था। दोनों का काम जाफराबाद तक ही सीमित नहीं था। इन्होंने कई अन्य इलाकों में घूम-घूम कर लोगों को भड़काया और दंगों में भाग लेने को उकसाया।
दिल्ली दंगों को लेकर अब तक सात लोगों पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज हुआ है। इनमें आम आदमी पार्टी के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन, मीरान हैदर, सफूरा जरगर, आसिफ इकबाल तन्हा शामिल हैं।
अमेरिकी फिल्मकार और ब्लॉगर सिंथिया रिची (Cynthia D Ritchie) ने पाकिस्तानी नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक (Rahman Malik) ने 2011 में अपने आवास पर उनके साथ रेप किया था।
सिंथिया लंबे समय से पाकिस्तान में रह रही हैं। उन्होंने पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मखदूम शहाबुद्दीन पर भी इस्लामाबाद स्थित राष्ट्रपति भवन में बदसलूकी के आरोप लगाए हैं। उस वक्त आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे।
फेसबुक पर लाइव वीडियो सेशन के दौरान सिंथिया रिची ने कहा कि 2011 में रहमान ने उनके साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया था। उस समय पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सत्ता में थी। पीपीपी के दो अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी उनका शोषण किया था। इस मामले में अब रिची ने जाँच की माँग की है। रिची का कहना है कि उनके पास इसको लेकर कई सबूत हैं और वह जरूरत पड़ने पर उसे जरूर पेश करेंगी।
— Ghulam Abbas Shah (@ghulamabbasshah) June 5, 2020
रिची के मुताबिक, घटना 2011 में उस वक्त की है जब वो राष्ट्रपति भवन में रहती थीं। खास बात ये है रिची अब प्रधानमंत्री इमरान खान की सोशल मीडिया टीम में हैं। इस घटना के दौरान बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) सत्ता में थी। फिलहाल, पार्टी की कमान बेनजीर के बेटे बिलावल भुट्टो जरदारी के हाथ में है।
सिंथिया डॉन रिची, जिनके कई वर्तमान पाकिस्तानी सत्तारूढ़ संस्था से करीबी संबंध हैं, ने यह भी आरोप लगाया कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अन्य वरिष्ठ नेताओं द्वारा उनके साथ मारपीट की गई थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके ई-मेल खातों को हैक कर लिया गया और लोगों ने उसकी जासूसी की।
सिंथिया ने कहा, “सीनेटर रहमान मलिक द्वारा मेरा यौन उत्पीड़न 2011 में आंतरिक मंत्री के आवास पर हुआ था। मैंने सोचा कि यह मेरे वीजा के बारे में आयोजित एक बैठक थी, लेकिन मुझे फूल/ एक नशीला पेय दिया गया था। मैं चुप रही।”
सिंथिया ने यह भी कहा कि उन्होंने घटना के बारे में 2011 में पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी दूतावास को सूचित किया था, लेकिन, वहाँ से सही जवाब नहीं मिला। उन्होंने कहा कि उस दौरान अमेरिका और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्ते नहीं थे। रिची ने पीपीपी पर गंदी राजनीति का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूँ कि दुनिया मेरी बात सुने।”
रिची ने फेसबुक पर बताया, “मैं कई सालों तक खामोश रही। इसकी वजह यह थी कि पीपीपी के नेता मुझे धमकी देते रहे। इस वजह से मैं कुछ बोल नहीं पाई। अब वक्त आ गया कि सारी दुनिया को इसका पता चले। इसी वजह से मैंने सबके सामने यह सच रखा।”
सिंथिया डी रिची ने शनिवार (जून 06, 2020) सुबह कुछ ट्वीट किए। जिनमें लिखा है, “पीपीपी नेता मेरे खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। रेप कल्चर बंद होना चाहिए। महिलाएँ एकजुट हों और बच्चों को इस घृणित काम के बारे में जानकारी दें। वैसे यह सिर्फ पीपीपी का मामला नहीं है। कई सियासी पार्टियों ने मेरा शोषण किया। मैंने कभी परिवार को भी इन घटनाओं के बारे में नहीं बताया। मैंने हमेशा पाकिस्तान की एक सॉफ्ट इमेज बनाने के लिए मेहनत की। हालाँकि मेरे अधिकांश मामलों में, जिनमें से दो का उल्लेख नहीं किया गया है, वे या तो PK लॉबिस्ट थे या 2 टियर पीपीपी।”
1/ My story is deeply emotional. Even my family has not known until now. I’ve tried to be positive & promote the softer side of Pakistan but have also experienced the very bad. I wish to tell my truth one time so that women, transgenders, locals can understand they are not alone.
— Cynthia D. Ritchie (@CynthiaDRitchie) June 6, 2020
अमेरिकी ब्लॉगर सिंथिया रिची कथित तौर पर सोशल मीडिया पर पीपीपी नेताओं की निंदनीय तस्वीरें भी साझा कर रही हैं। सिंथिया, जो एक फिल्म निर्माता, पत्रकार और ब्लॉगर हैं, ने हाल ही में पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को निशाना बनाकर विवाद खड़ा कर दिया था, जिसके लिए पीपीपी ने उनके खिलाफ एक FIR दर्ज की थी।
इस बीच, पाकिस्तान में विपक्षी दलों ने दावा किया है कि देश में एक पर्यटक, पत्रकार और बेली डांसर के रूप में आई सिंथिया पूर्व पीएम के खिलाफ इस तरह की भद्दी टिप्पणी कर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही थी।