वीजा मानकों के उल्लंघन के चलते तबलीगी जमात से जुड़े 2200 से अधिक विदेशियों के 10 साल तक भारत में प्रवेश करने पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पाबंदी लगा दी है। इससे पहले अप्रैल महीने में 960 विदेशी लोगों को भी मोदी सरकार ने ब्लैकलिस्ट किया था। इनमें चार अमेरिका, नौ ब्रिटिश और छह चीन के नागरिक थे। ये सभी पर्यटक वीजा पर निजामुद्दीन मरकज में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
#UPDATE More than 2,200 blacklisted foreign nationals banned for 10 years from travelling to India for their involvement in Tablighi Jamaat activities: Government Sources https://t.co/9b4t5QpkSt
फिलहाल 1,000 से अधिक लोगों को गृहमंत्रालय ने वीजा नियमों का उल्लंघन करने के चलते 10 साल के लिए भारत आने पर प्रतिबंध लगाया है। इसके साथ तबलीगी जमात से जुड़े प्रतिबंधित विदेशियों की संख्या 2,200 से अधिक हो गई है। दिल्ली पुलिस पहले ही बता चुकी है कि 960 विदेशियों ने मरकज में हुई इस्लामिक सभा में हिस्सा लेकर वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।
दरअसल जिन विदेशी लोगों के कोरोना पॉजिटिव पाया गया था उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में क्वारंटाइन किया गया था। ब्लैकलिस्ट किए गए विदेशियों में 379 इंडोनेशियाई, 110 बांग्लादेश के, 63 म्यांमार के और 33 श्रीलंका के शामिल थे।
अधिकारियों के मुताबिक किर्गिस्तान के 77 नागरिक, 75 मलेशियाई, 65 थाईलैंड, 12 वियतनाम, 9 सऊदी अरब और 3 फ्रांसीसी नागरिक भी वीजा नियमों का उल्लंघन करने वालों में शामिल थे। गृहमंत्रालय ने इन सभी विदेशियों के अगले 10 वर्षों के लिए भारत में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
सभी 960 विदेशी तबलीगी सदस्यों को अस्पताल से छुट्टी मिलने और क्वारंटाइन की अवधि पूरी होने पर देश से निकाल दिया जाएगा।
दिल्ली पुलिस अपराध शाखा ने कम से कम 700 जमात से जुड़े सदस्यों के पासपोर्ट और महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किर लिए हैं। इस मामले को लेकर दिल्ली पुलिस उनसे पहले ही पूछताछ कर चुकी है। पूछताछ में क्राइम ब्रांच ने यह पता लगाने की कोशिश की थी कि उन्हें किस आधार पर वीजा मिला है और उन्हें वीजा दिलाने में किसने मदद की थी।
इसी तरह, 287 में से 211 विदेशी नागरिकों के पासपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार ने जब्त कर लिए हैं। ये वो विदेशी हैं, जिन्होंने 13 से 15 मार्च के बीच निजामुद्दीन मरकज़ में तबलीगी जमात द्वारा आयोजित इस्लामिक सभा में हिस्सा लिया था।
दरअसल दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात की ओर से एक इस्लामिक कार्यक्रम का आयोजन मार्च के महीने में किया गया था। इसमें हजारों की संख्या में देश-विदेश के जमातियों ने हिस्सा लिया था। इस कार्यक्रम से निकले लोगों के कारण ही देश में तेजी से कोरोना मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ था।
स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक तबलीगी जमात द्वारा दिल्ली के निज़ामुद्दीन मरकज़ में हुए कार्यक्रम के दौरान यानी अप्रैल के मध्य तक देश में कुल 14,378 कोरोना वायरस के मामलों सामने आए थे, इनमें से करीब 30% यानी 4291 मामले मरकज से जुड़े हुए थे।
स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने बताया था कि कुल 14,378 मामलों में से 4291 (29.8%) मामले निजामुद्दीन मरकज से संबंधित हैं। यहाँ से निकले जमातियों ने कम से कम 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रभावित किया। उन्होंने यह भी कहा था कि तमिलनाडु में 84% मामले, दिल्ली में 63% मामले, तेलंगाना में 79% मामले, उत्तर प्रदेश में 59% मामले और आंध्र प्रदेश में 61% मामले इस घटना से संबंधित हैं।
केरल में पटाखों से भरा अनानास खिलाए जाने के बाद एक गर्भवती हथिनी की मौत हो गई थी। इस घटना के बहाने टाइम्स ऑफ़ इंडिया (TOI) की पत्रकार समीना शेख ने हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा प्रदर्शित की है। हिंदुओं को शर्मिंदा करने के मकसद से उसने ट्विटर पर गणपति की एक तस्वीर शेयर की। इस तस्वीर को साझा करते हुए लिखा, “जिसकी पूजा करते हो, उसी को तकलीफ पहुँचाते हो।”
इस तस्वीर के जरिए समीना ने ये बताना चाहा कि जो लोग गणपति पूजन करते हैं, उन्होंने हथिनी को मारा है। यहाँ बता दें, हिंदू धर्म के अनुसार भगवान श्री गणेश का मुख हाथी के समान है और लोगों के मन में उनके प्रति अपार श्रद्धा है। इसके कारण समीना को ट्वीट करने के कुछ देर बाद ही उसे डिलीट करना पड़ा।
हालाँकि बाद में समीना अपनी सफाई देने दोबारा ट्विटर पर आई। उन्होंने कहा कि जो तस्वीर उन्होंने भगवान गणेश की साझा की, उसे पहले उनके हिंदू दोस्त ने शेयर किया था। पर, उनके मजहब के कारण अंधभक्तों ने उन्हें ट्रोल कर दिया।
वे अपने ट्वीट में लिखती हैं, “चिंता मत करो, इस बात को समझते हुए कि हम भारतीय कभी समझदार नहीं होंगे, मैंने ये तस्वीर डिलीट कर दी है।”आगे समीना ने ये भी दावा किया कि केवल हिंदू नहीं, बल्कि हर कोई हाथी की पूजा करता है।
A picture of elephant’s potrait was shared by me, which was actually shared by a friend of mine who’s Hindu, but since I shared it – every andhbhakt had to come to troll me! Don’t worry, I have deleted the pic understanding that we Indians will never mature & blocked all idiots
यहाँ बता दें कि हिंदू धर्म में हाथी के अलावा गाय का भी पूजनीय स्थान है। लेकिन तब भी पिछले साल केरल के कन्नूर में यूथ कॉन्ग्रेस के एक कार्यकर्ता ने बीच सड़क में बछड़े को काट दिया था। इसके अलावा एक अन्य कॉन्ग्रेस नेता ने भी सेकुलरिज्म को मजबूत करने के नाम पर एकता का प्रदर्शन करते हुए केरल में बीफ पार्टी की थी।
उल्लेखनीय है कि गणपति की तस्वीर शेयर करते हुए हिंदुओं को शर्मसार करने की कोशिश करने वाली टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार ने इससे पहले भी हिंदू घृणा से सने न केवल अपने ट्विटर हैंडल से किए हैं, बल्कि टाइम्स का ऑफिशियल हैंडल भी इस एजेंडे के लिए प्रयोग किया।
समीना शेख बॉम्बे टाइम्स की संपादक हैं। ईटी टाइम्स की डिप्यूटी एडिटर हैं और फेमिना मैगजीन से भी जुड़ी हुई है। उनके कारनामों का खुलासा पिछले महीने हुआ था, जब उन्होंने एक ही ट्वीट अपनी आईडी से किया था और वही ट्वीट टाइम्स के अकाउंट से भी शेयर किया गया था।
गर्भवती हथिनी की मौत
समीना शेख का ये विवादित ट्वीट हाल में केरल में हुई घटना को साझा करने के लिए था। जहाँ से एक प्राणी पर मानवीय अत्याचार की एक ऐसी खबर आई थी, जिसने चारों ओर सबको झकझोर दिया। दरअसल, केरल के मल्लपुरम के पलक्कड़ में एक अत्याचारी ने गर्भवती मादा हाथी को धोखे से अनानास में पटाखे रख कर खिला दिया था, जो उसके मुँह में ही फट गया। अत्यंत पीड़ा और असहनीय दर्द के कारण गर्भवती मादा हाथी नदी के पानी में जाकर खड़ी हो गई और वहीं उसकी मौत हो गई।
सऊदी अरब और कुवैत में PUBG के नए वर्जन में ‘मूर्ति पूजा’ को शामिल किए जाने के कारण विवाद खड़ा हो गया है। गल्फ न्यूज की खबर के अनुसार, इस नए वर्जन को देखकर मुस्लिम समुदाय में खासी नाराजगी है। जबकि धार्मिक उलेमाओं ने इसे लेकर चेतावनी जारी कर दी है।
जानकारी के लिए बता दें कि Pubg का नया वर्जन मिस्टीरियन जंगल मोड के नाम से रिलीज हुआ है। इसमें ख़िलाड़ी मूर्ति पूजन करते दिखते हैं। अब इसी वर्जन को देखकर उलेमाओं ने प्रशासन से माँग की है कि इस तरह के इस्लाम विरोधी विचारों से वे बच्चों को बचाएँ। इस्लाम में मूर्ति पूजा प्रतिबंधित है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, कुवैत विश्वविद्यालय में शरिया कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. बासम अल शट्टी ने मीडिया को बताया कि गेम के कई अच्छे और बुरे पहलू हो सकते हैं। लेकिन पबजी ने मूर्ति पूजा के जरिए इस्लामिक मान्यताओं का उल्लंघन किया है और ये इस्लाम में सबसे बड़ा गुनाह है। इस्लाम में सिर्फ़ अल्लाह के सामने ही सिर झुकाया जाता है।
डॉ. बासम कहते हैं, “लाखों बच्चों और युवाओं का पसंदीदा ये गेम सिर्फ़ मनोरंजन नहीं है, बल्कि ये खतरनाक है, क्योंकि ये बहुदेववाद का पाठ पढ़ाता है, अगर बच्चे इसे खेलेंगे तो वे इसके आदी हो जाएँगे।”
इसी प्रकार बेसिक एजुकेशन कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. राशिद अल अलीमी पबजी के नए वर्जन को लेकर कहते हैं, “ये मुस्लिमों के लिए बेहद खतरनाक है, क्योंकि ये ऐसी पीढ़ियाँ पैदा करेगा जिन्हें तौहीन या इस्लाम का अपमान करने वाले सिद्धांतों के बारे में कुछ नहीं पता होगा। इस्लाम एक ईश्वर वाले सिद्धांत में यकीन रखता है। अल्लाह ही इस दुनिया को बनाने वाला है और इसकी रक्षा करने वाला है।”
सऊदी अरब की इस्लामिक यूनिवर्सिटी में फंडामेंटल रिलीजन के प्रोफेसर डॉ. आरेफ बिन सुहैमी ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि इस्लाम, सहिष्णुता, संतुलन, सुधार, बराबरी और सहमति जैसी चीजें सिखाता है। साथ ही लोगों के हित में मध्यम मार्ग वाली सभी चीजों को प्रोत्साहित करता है।
उनके अनुसार, शरिया में स्विमिंग, शूटिंग, घुड़सवारी जैसे खेल खेलने की अनुमति है। लेकिन कुछ ऐसे गेम हैं जो इस्लाम में प्रतिबंधित हैं, जैसे गैंबलिंग यानी जुआ। उनका कहना है कि वीडिया गेम्स में कानून या धर्म विरोधी चीजों को लेकर प्रतिबंध लगाया जाता है। इसलिए, पबजी गेम का नया वर्जन विवादस्पद है, क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजन बैन है।
यहाँ बता दें कि पबजी के इस नए वर्जन में फूड, हॉट एयर बैलून जैसी कई नए फीचर्स जारी किए गए हैं। लेकिन इस्लामिक देशों में विवाद टोटेम्स को लेकर ही हुआ। दरअसल, इस वर्जन में टोटेम्स ताकतवर मूर्तियाँ है, जिनकी पूजा करके खिलाड़ी फिर से सेहतमंद हो सकता है और इसी के साथ उसे एनर्जी ड्रिंक, हेल्थ किट जैसी कई चीजे मिल जाती है। इसलिए, पबजी खेलने वाले तमाम मुस्लिम इस नए वर्जन का विरोध कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ लोग तो अपना गुस्सा गेम में टोटेम्स को जलाकर जाहिर कर रहे हैं।
नरेंद्र मोदी सरकार के लगातार दूसरी बार केंद्र में चुने जाने से आहत वामपंथी संस्थानों ने गैर-वामपंथी आवाजों को दबाने का पुरजोर प्रयास किया। इस बीच ऑपइंडिया एक ऐसा संस्थान बनकर उभरा जो लगातार वामपंथियों की मंशा को उजागर करता रहा और आज भी कर रहा है। मगर, इस दौरान ऑपइंडिया के उद्देश्यों को कई मायनों में न केवल हेट कैंपेन्स के द्वारा नकारात्मक दिखाने का प्रयास हुआ, अपितु विकीपीडिया पेज के जरिए भी ऑपइंडिया की छवि धूमिल करने की कोशिश हुई।
विकीपीडिया पर ऑपइंडिया का पेज इतना नेगेटिव क्यों है?
विकीपीडिया पर ऑपइंडिया का पेज इतना नेगेटिव क्यों है? ये वो सवाल है जिसके बारे में लोगों ने हमसे कई बार पूछा। लेकिन, इस सवाल जवाब बेहद सरल है। वो ये कि हमने एक बने-बनाए इकोसिस्टम को चुनौती दी।
वो चुनौती जिसमें हमने वामपंथियों के झूठ का हमेशा पर्दाफाश किया, एजेंडे व प्रोपगेंडे की पोल खोली, कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार पर मुखर रिपोर्टिंग की… इसलिए हमें मालूम था कि जो हमारी विश्वनीयता पर हमले हुए वो सब एक आम बात थी।
विकीपीडिया को वास्तविकता में वामपंथियों के एक धड़े द्वारा ही संचालित किया जाता है। इसलिए इस पर ऑपइंडिया की ऐसी छवि का दिखना बेहद सामान्य है।
दरअसल, जो पेज आप लोगों को विकीपीडिया पर दिखता है उसमें ऑपइंडिया के बारे में हमारी ओर से कुछ नहीं लिखा गया। इस जानकारी को उसी गिरोह के लोग संपादित करते हैं, जिन्हें ऑपइंडिया तथ्यों को पेश करके बेनकाब करता है।
संक्षिप्त में बताएँ तो विकीपीडिया पर ऐसी जानकारी के लिए ये बिंदु ही उत्तरदायी हैं;
विकीपीडिया के पेजों पर ब्रांडो का स्वामित्व नहीं है।
वामपंथियों ने ही इस बात को विकीपीडिया पर सुनिश्चित किया है कि ऑपइंडिया पक्षपाती है।
अगर, इस पेज पर कोई आकर निष्पक्ष नजरिया दिखाता है, तो अन्य सहभागी उसे धमकाते हैं और बाद में ब्लॉक कर देते हैं।
एडिटर्स ने हिंदुत्व और हिदुवाद के ख़िलाफ़ कई बार अपनी कुत्सित सोच का प्रमाण दिया है।
हमने इनसे, इन सब बातों पर लड़ने की बजाय हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया।
ऑपइंडिया और विकीपीडिया की लड़ाई कहाँ से शुरू हुई
कुछ 2-3 साल पहले ऑपइंडिया का विकीपीडिया पेज था। जिस पर ऑपइंडिया से संबधी सभी जानकारी मौजूद थी और वो ये भी बताता था कि हमारा उद्देश्य आखिर है क्या? लेकिन कुछ समय पहले हमारे पेज को डिलीट कर दिया गया। हमें लगा कि ये उसी इकोसिस्टम का काम है, जिसे हमसे परेशानी होती है और जो समझता है कि हम विकीपीडिया पर बतौर पोर्टल पहचाने जाने के अधिकारी नहीं हैं।
हालाँकि, ये मालूम चलने के बाद हमें इस बात का कोई गम नहीं हुआ। हम बिना विकीपीडिया पेज के आगे बढ़ते रहे, आपके बीच अपनी पहचान बनाते रहे। मगर, कुछ समय बाद हमने देखा कि ऑपइंडिया का पेज विकी पर वापस आ चुका है। पर इस पोर्टल से संबंधित सूचनाएँ बेहद बरगलाने वाली है। जो न केवल ऑपइंडिया के कंटेंट को पक्षपाती बताती हैं, बल्कि अपमानजनक भी हैं।
यहाँ साफ कर दें कि ऑपइंडिया का विकी पेज ऑपइंडिया द्वारा नहीं बनाया गया। बल्कि इसे तैयार करने वाला खुद को ‘Winged Blades of Godric’ बताता है।
ऑपइंडिया पेज से संबंधित जानकारी
सबसे दिलचस्प बात देखिए कि साल 2018 में डिलीट होने वाले हमारे असली पेज का जिक्र भी विकी के आर्टिकल में किया गया है। इसे डिलीट करवाने के लिए Wings Blade of Godric ने खुद अपना मत रखा था और कहा था कि ऑपइंडिया विकीपीडिया पर होने के लायक नहीं है।
2018 का पेज, जहाँ ऑपइंडिया को डिलीट करने के लिए डिस्कशन हुआ
अब हालाँकि, Wings Blade of Godric ने जो हाल में पेज बनाया है। उसे 10 नवंबर 2019 को क्रिएट किया गया था। आप चाहें तो ये सब एडिट हिस्ट्री में साफ दिखेगा।
अब इसके बाद पेज में मौजूद जानकारी यदि पढ़े तो ये मालूम चलेगा कि पहले वाक्य से ही ऑपइंडिया की छवि को नकारात्मक पेश करने का प्रयास किया गया और बिना किसी रिसर्च के उसे फेक न्यूज वेबसाइट कह दिया गया।
इसके बाद उन सभी पोर्टल्स जैसे ऑल्टन्यूज व बूम का हवाला दिया गया जिन्होंने ऑपइंडिया के ख़िलाफ़ लिखा और खुद ऑपइंडिया ने उनके झूठ को पकड़ा।
कौन है Wings Blade of Godric
Wings Blade of Godric का असली नाम अनुरीक बिस्वास है। वह कोलकाता का रहने वाला है और उसका राजनैतिक झुकाव उसके द्वारा एडिट किए लेखों को देखकर मालूम होता है।
बता दें अनुरीक बिस्वास लगातार उन लोगों के बारे में विकीपीडिया पर जानकारी को अपनी विचारधारा मुताबिक एडिट करता रहता है जो वामपंथियों के ख़िलाफ़ खुलेआम आवाज बुलंद करते हैं। मसलन-रिपब्लिक टीवी, जग्गी वासुदेव, अर्नब गोस्वामी और यहाँ तक स्वराज भी।
इस संपादक का खुद मानना है कि असल में सच्चाई वामपंथियों के विरोध में होती है, इसलिए जाहिर है वह तो उसे फेक न्यूज ही मानेगा।
इसके अलावा ये वामपंथी विकीपीडिया पर हिंदुओं के ख़िलाफ़ भी कई बार एडिटिंग कर चुका है। जैसे इसने जय श्री राम को ‘वार क्राई’ कहकर संबोधित किया था।
‘DBXray and Newslinger’.
अब इतने के बाद ऑपइंडिया से नफरत करने वालों में केवल WBG के नाम का खुलासा नहीं होता। बल्कि उसके अजीज दोस्त DBXray का नाम भी पड़ताल में सामने आता है।
DBXray वो व्यक्ति है जो विकीपीडिया पर इस बात को सुनिश्चित करता है कि कोई भूल से भी ऑपइंडिया के लिए निष्पक्ष होकर अपनी राय न लिख दे।
वे इस बात पर गौर करता रहता है और जैसे ही कोई निष्पक्ष लिखता है, वे तुरंत उसे बदलकर फेक न्यूज वेबसाइट लिख देता है।
DBXray का असली नाम दीपेश राज है। ये वही विकीपीडिया का एडिटर है जिसने दिल्ली दंगों में इस्लामिक कट्टरपंथियों की भूमिका को खारिज कर दिया था। अंकित शर्मा की हत्या पर ताहिर हुसैन को मास्टरमाइंड मानने से इनकार किया था और बाद में लिख दिया था कि जब तक कोर्ट उसे दोषी नहीं मानता तब तक उसका नाम नहीं मेंशन हो सकता।
इसके अलावा जब उससे हेटस्पीच में वारिस पठान का नाम लिखने को कहा गया तो उसने कपिल मिश्रा का नाम लिख दिया था। वास्तविकता में वारिस पठान ने ऐसा बयान दिया था जिससे दंगों की आग में घी का काम किया।
इन्हीं सब हरकतों के कारण हमने इस विकीपीडिया के एडिटर का खुलासा भी किया। लेकिन इससे जुड़ी रिपोर्ट सामने आने के बाद ऑपइंडिया पर हमले और बढ़ गए। जिससे विकीपीडिया पर ऑपइंडिया को ब्लैकलिस्ट करने की माँग उठने लगी।
इस ब्लैकलिस्ट की माँग ने मुख्यत: उस समय जोर पकड़ा जब हमने दिल्ली दंगों पर अपनी रिपोर्ट की और पक्षपाती मीडिया रिपोर्ट्स का खुलासा किया। जिसे हम टॉक पेज के स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं।
बता दें, DBXRAY, जिसने दिल्ली दंगों पर हिंदू घृणा से सना आर्टिकल लिखा था, हमारे खुलासे के बाद वामपंथी उसे बचाने के लिए उसके पक्ष में लेख लिखने लगे और ऑपइंडिया को ब्लैकलिस्ट करने की माँग इसलिए कि क्योंकि इसके बाद उसके लिंक को प्लेटफॉर्म पर सोर्स की तरह इस्तेमाल करना प्रतिबंधित हो जाता।
ऑपइंडिया को ब्लैकलिस्ट करने की माँग में शामिल न्यूजलिंगर कौन है?
WBG द्वारा ऑपइंडिया पेज बनाने के बाद विकीपीडिया पर इसे अब न्यूजलिंगर नाम के यूजर द्वारा संचालित किया जाता था। ऑपइंडिया पर हमले बोलने वाला न्यूजलिंगर कौन है?
ऑपइंडिया को ब्लैकलिस्ट कराने की कोशिशों में जुटे न्यूजलिंगर के बारे में अभी हाल में एक पत्रकार सौम्यादित्य ने बताया कि पिछले दिनों ऑफलाइन हैरेसेंट के मामले में उसे विकीपीडिया से ब्लॉक कर दिया गया। इसकी सूचना उन्होंने कुछ दिन पहले ट्विटर पर दी।
उन्होंने बताया कि कैसे उसने फर्जी पहचान बनाकर उसने एक एजेंसी को पीआर बनकर संपर्क किया और प्लैटफॉर्म पर एडिटिंग को लेकर पैसों से जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि न्यूलिंगर अपने उपद्रव के कारण खूब पहचाना जाता है।
सौम्यादित्य ने इस दौरान इस बात का भी खुलासा किया कि विकीपीडिया पर आप मनमुताबिक एडिट नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “50 भारतीय एडिटर्स की गैंग है, जो विकीपीडिया को कंट्रोल करते हैं।” वे कहते है कि आप भले ही पीएचडी हैं और उसपर एडिट करते हैं, लेकिन अगर उनके गिरोह के लोगों में कोई प्रथम वर्ष का छात्र है तो वो आपका एडिट दोबारा रिवर्स कर सकता है। यहाँ सौम्यादित्य गूगल के एल्गोरिदम के बारे में बात करते हैं और बताते हैं कि ये एक ओपन सोर्स है, जहाँ लोग अपनी जानकारी अनुसार एडिट कर सकते हैं।
हालाँकि, वह यह भी कहते हैं, विकीपीडिया में अपने एडिट को हटाए जाने पर एडिटर्स से सवाल पूछने की आजादी भी होती है। मगर, जैसे ही आप यहाँ एडिटर्स पर सवाल उठाएँगे, वो आपके संपादन को बोगस या निराधार करार देेंगे। जब आप उन्हें ज्यादा परेशान करेंगे या सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे तो मुमकिन है आपको ब्लॉक कर दिया जाए।
उल्लेखनीय है कि विकीपीडिया एक ऐसी जगह है जहाँ पर अधिकांश आमजन जानकारी लेने के लिए आते हैं। ऐसे में इसे विश्वसनीय स्रोत मानना, केवल भूल के अलावा कुछ भी नहीं है। क्योंकि इसको पूरा वामपंथ का एक धड़ा हैंडल करता है, जिनकी मर्जी और नैरिटिव के बिना यहाँ पर कोई जानकारी ज्यादा देर तक नहीं ठहरती। मगर, बावजूद इसके गूगल की गणित के मुताबिक हर मुद्दे पर इसका सर्च सबसे पहले दिखता है।
ऐसे में ऑपइंडिया से जुड़ी जानकारी जो ये विकी पेज मुहैया करता है, उससे ऑपइंडिया के पाठकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि सच को हमेशा बोला जाना चाहिए। ऑपइंडिया हमेशा अपनी सोच के अनुरूप हमेशा तटस्थ होकर खड़ा है और अनेकों हमलों के बाद अपना काम कर रहा है। लेकिन, हमारे सशक्त होने के बावजूद, हम ऐसी दुरात्माओं को अपने पीछे हमारे लिए अपमानजनक शब्द बोलने नहीं दे सकते। इसलिए सच उजागर होना चाहिए।
(मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए ऑपइंडिया अंग्रेजी की एडिटर नुपूर शर्मा का लेख यहॉं विस्तार से पढ़ सकते हैं)
आज कोरोना महामारी से पूरा देश लड़ रहा है लेकिन ऐसे माहौल में भी ऑल्ट न्यूज के प्रतीक सिन्हा जैसे कुछ लोग हैं जो प्रपंच के सहारे मजहब की दुकान चलाना चाह रहे हैं। जबकि रेल मंत्रालय ने गरीब, प्रवासी श्रमिकों के लिए ट्रेन की व्यवस्था की, भोजन, पानी और अल्पाहार दिया, 31 बच्चों का जन्म उन्हीं ट्रेनों पर हुआ, ऐसे में ट्रेन पर हुई एक मौत पर वामपंथी प्रोपेगेंडा साइट ऑल्टन्यूज ने सात दिन खर्च करके यह जताने की कोशिश की कि सरकार ने मुज़फ़्फ़रपुर की अरबीना खातून की जान ले ली। यहाँ पर यह जानना भी जरूरी है कि कुल नौ बार मीडिया में ट्रेन पर ‘भूख से हुई मौत’ का जिक्र आया, जो कि सरकार द्वारा गलत बताई गई, लेकिन ऑल्टन्यूज ने अरबीना खातून वाले मामले में ज्यादा रुचि दिखाई।
ऑल्टन्यूज, यूँ तो यही सब करने के लिए मशहूर है जिसमें इसके संस्कारहीन कर्ताधर्ता प्रतीक सिन्हा का हाथ सबसे लम्बा है, लेकिन मौत में इस तरह का घटिया प्रोपेगेंडा लगाना एक नीच स्तर का कार्य है। प्रतीक सिन्हा को संस्कारहीन इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस निठल्ले आदमी का करियर नवजात शिशु तक की डॉक्सिंग और किशोर हिन्दुओं की जानकारियाँ ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर पब्लिक कर इस्लामी कट्टरपंथियों तक पहुँचाने से बना है। ये व्यक्ति नीचता की पराकाष्ठा है और संस्कारहीन विशेषण लगाना न्यायोचित प्रतीत होता है।
अरबीना खातून की मृत्यु कैसे हुई: क्या है मामला
श्रमिक ट्रेन पर बैठी अरबीना खातून की मौत उनके मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) पहुँचने से कुछ घंटे पहले हो जाती है। साथ में उनकी बहन कोहिनूर और बहनोई वजीर थे। वजीर ने मौत के वक्त जो बयान दिया और पुलिस के पास दर्ज बयान, वो यह था कि अपने पति द्वारा त्याग दिए जाने के बाद अरबीना की मानसिक हालत अच्छी नहीं थी, और वो बीमार भी थी। ट्रेन पर उनकी स्थिति बिगड़ गई और रास्ते में वो अल्लाह को प्यारी हो गईं।
इसके बाद मीडिया गिरोह ने, पहले के ही कुछ दिनों की तरह (जिसमें दैनिक भास्कर की भ्रामक रिपोर्ट भी शामिल है) यह कहना शुरु किया अरबीना भूख से स्टेशन पर पहुँचते ही मर गई। इसमें प्रपंच फैलाने में माहिर राणा अयूब भी शामिल थी जिसने एक भावुक, परंतु विशुद्ध झूठ, पोस्ट लिखा कि कैसे बिना खाना और पानी के महिला की मृत्यु हो गई।
PIB ने सरकारी सूत्रों को हवाले इस फर्जी खबर का फैक्टचेक कर के बताया कि भोजन-पानी से वंचित होने और भूख से मरने की बातें झूठी हैं। वजीर ने स्वयं ही बयान दिया था (जिसका ज़िक्र ऑल्टन्यूज ने भी किया है) कि ट्रेन पर खाना-पानी की समस्या नहीं थी। ये सब जब हो गया, तो प्रपंची प्रतीक सिन्हा से रहा नहीं गया क्योंकि इसमें ‘मजहबी प्रपंच’ का स्कोप दिखा। फिर पूरी योजना के तहत, नासा आदि के सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल कर के पत्थर को वॉलेट बताने वाले प्रतीक सिन्हा ने, इस फैक्टचेक का फैक्टचेक करने का दावा किया।
PIB फैक्ट चेक की द्वारा पहले ही इस तथ्य को फर्जी बता चुका था
ऑल्टन्यूज के ‘फैक्टचेक के फैक्टचेक’ का फैक्टचेक: भूखी थी कि नहीं- पाँच अलग बयान
कमाल की बात यह है कि तीन लोगों द्वारा ‘सात दिन मेहनत कर के ‘सत्य’ बताने वाले इस आर्टिकल में, जो PIB के फैक्टचेक को गलत बताने का दावा करती है जहाँ लिखा गया कि ‘मौत भूख से नहीं हुई’, ऑल्टन्यूज ने पाँच अलग-अलग बयान लिखे हैं। इससे फैक्टचेक के नाम पर प्रपंच बाँटने के कूड़े के दर्शन हो जाते हैं। जब फैक्टचेक इस बात का है कि मौत भूख से हुई या नहीं, तो फिर ट्रेन पर भोजन मिला या नहीं, इस बात पर चार अलग बयान क्यों हैं?
पहला बयान वजीर का है, जो ऑल्टन्यूज ने स्वयं छापा है कि, अरबीना खातून जिस ट्रेन पर थीं, वहाँ भोजन, पानी के साथ-साथ निश्चित अंतराल पर अल्पाहार की भी व्यवस्था थी। यह बयान वजीर में बीबीसी को भी दिया है।
ऑल्ट न्यूज़ के ‘फैक्ट चेक ‘ में वजीर के बयान जिसमें उसने ट्रेन में खाना मिलने की बात कही है
दूसरा बयान भी वजीर का है, जो ऑल्टन्यूज की सात दिनों के परिश्रम का परिणाम लगता है, जहाँ वो यह कहता पाया गया है कि ट्रेन पर खाना-पानी नहीं मिल रहा था। साथ ही, वो यह भी कहता है कि उसके पिछले बयान सही नहीं थे क्योंकि वो तुरंत हुई मौत के कारण परेशान था और उसके मन में जो आया वो बोल गया।
वजीर का वह बयान जो उसने कथित तौर पर ‘ऑल्ट न्यूज़’ से साझा किए
यह सामान्य बुद्धि-विवेक की बात है कि जिसके सामने एक लाश हो, वो ‘परेशानी’ में होने पर उसी सिस्टम को ले कर सकारात्मक बात बोल दे, ऐसा उचित नहीं लगता। अमूमन, व्यक्ति अगर ऐसे मामलों में झूठ भी बोलता है तो वो सरकार पर आरोप लगाता है कि सुविधाएँ नहीं मिलीं तो व्यक्ति की मृत्यु हो गई। यहाँ, वजीर (जिसके बयान अपनी पत्नी से भी मेल नहीं खा रहे) वो अपने परिजन की मौत पर रेलवे के पक्ष में बयान दे देता है!
वजीर की बात को इस आलोक में भी देखना चाहिए कि बाकी लोग भी ट्रेन पर थे, किसी एक को खाना पानी न मिला हो, ऐसा मानना तार्किक नहीं लगता। आज के दौर में फोन है सबके पास है, लोग सरकार की एक गलती पर दस वीडियो बना लेते हैं, और यहाँ किसी को भोजन-पानी से वंचित किया गया हो, और वीडियो न हो, ऐसा मानना विचित्र की श्रेणी में रखा जाएगा।
अरबीना ने खाना खाया या नहीं खाया, इस पर दो और बयान हैं, जो वजीर और उसकी पत्नी कोहिनूर के हैं। एक तरफ वजीर, ऑल्टन्यूज के अनुसार, यह कह रहा है कि ट्रेन पर चढ़ने से पहले अरबीना ने भोजन किया था, वहीं कोहिनूर का कहना है कि भोजन नहीं किया था। ये बातें, एक ही घर के दो लोग, जो अरबीना के साथ ट्रेन पर चढ़े, साथ रहते थे, वो कह रहे हैं।
मृतका की बहन कोहिनूर का बयान
ये बातें हाल में कही गई हैं। जिस परिवार की बात कहने में ऑल्टन्यूज यह बताता है कि ये लोग छोटे से जगह में साथ रहते थे, वहाँ क्या वो छोटी सी जगह इतनी बड़ी थी कि ट्रेन पर जाने की तैयारी में अरबीना ने खाना निकाला होगा और कहीं और जा कर खा रही होगी? उसे वजीर ने देख लिया, कोहिनूर ने नहीं देखा? ये बातें भी तर्क और समझ से परे है जो सिर्फ प्रतीक सिन्हा जैसों को ही सामान्य लगती होंगी।
पाँचवा बयान, भोजन को ले कर, दैनिक भास्कर के स्थानीय रिपोर्टर नूर परवेज द्वारा परिवार से लिया गया है। इस रिपोर्टर ने परिवार से बात की (परिवार में किस-किस से बात की, यह स्पष्ट नहीं है) जहाँ उन्हें, वजीर और कोहिनूर से भी एक कदम आगे, यह बताया गया कि ट्रेन में किसी भी यात्री को भोजन-पानी नहीं दिया गया। आप स्वयं आँकिए कि ये परिवार, और उसके सदस्य जिनमें से कई उस ट्रेन पर नहीं थे, वो यह बता रहे हैं कि ट्रेन पर किसी को खाना-पानी नहीं मिला।
हमने रेलवे मंत्रालय से जब भोजन के बारे में बात की कि क्या वाकई यात्रियों को खाना नहीं दिया गया, तो उन्होंने कहा कि बात झूठ है। रेलवे ने चार जगहों पर भोजन-पानी दिया जो क्रमशः अहमदाबाद, अजमेर, कानपुर और छपरा में बाँटे गए। रेलवे ने अपने बयान में बताया है कि किसी भी जगह यात्रियों ने खाने की गुणवत्ता या खाना न मिलने की शिकायत नहीं की।
रेलवे द्वारा जारी बयान
हम यहाँ कुछ भी ऐसा नहीं बता रहे जो ऑल्टन्यूज ने न छापा हो। उन्हीं का लेख है, उन्हीं ने बयान लगाए हैं, उन्हीं लोगों ने सात दिन खर्च किए हैं, और एक ही लेख में पाँच अलग-अलग बयान है। ये सारे बयान भोजन-पानी को ले कर हैं, जो कि PIB द्वारा किए गए फैक्टचेक का मूल हिस्सा है कि मौत ‘भूख से नहीं हुई थी’।
पुलिस को झूठा बताने की जिद
ऑल्टन्यूज ने लेख में ‘मानसिक स्थिति’ के ठीक न होने की आड़ में पुलिस को कटघरे में डालने की कोशिश की है। यहाँ, संदेह का लाभ पीड़ित को देने के तर्क से चलते हुए प्रतीक सिन्हा ने उसी बिहार राज्य के अंतर्गत आने वाली रेलवे पुलिस को कटघरे में डाला है जिसकी बातों को दो सप्ताह पहले गोपालगंज रोहित हत्याकांड के मसले में अकाट्य सत्य के तौर पर दिखाया था।
वजीर ने जो बातें पुलिस से कही, और उसकी कही गई जो बातें पुलिस के पास दर्ज बयान में हैं, वहाँ साफ लिखा है कि मौत भूख से नहीं हुई और मृतका मानसिक रूप से बीमार चल रही थी और कई दिनों से पति द्वारा छोड़ दिए जाने के कारण उसकी स्थिति वैसे भी ठीक नहीं थी।
पुलिस पर आरोप यह लगाया जा रहा है कि पुलिस ने बिना उसे बताए, (जिसका कोई सबूत नहीं है सिवाय इसके कि वजीर ऐसा कह रहा है) बयान पर अँगूठा लगवा लिया। क्या हम वजीर की बातों को सच मान लें जिसने तीन जगह भूख को ले कर तीन बातें की हैं? जिसकी पत्नी ने अरबीना के खाने को ले कर एक बात कही, और वो कुछ और कह रहा है? हम उस वजीर की बात मान लें जो भरी ट्रेन में सिर्फ अरबीना के खाना-पानी न मिलने की बात कह रहा है, जबकि पहले कहा था कि रेलवे उन्हें खाना-पानी दे रही थी?
‘गरीब व्यक्ति’, जो ‘पढ़ लिख नहीं सकता’ के नाम पर ऑल्ट न्यूज ने पुलिस को झूठा ही नहीं, गैरकानूनी काम करने वाला बताने की कोशिश की है जहाँ उन्होंने वस्तुतः यह लिखा है कि पुलिस ने वजीर के बयान पर अंगूठा लगवा लिया लेकिन पढ़ कर सुनाया नहीं। यहाँ, इसी ऑल्ट न्यूज ने पुलिस का पक्ष नहीं रखा है कि क्या कथित अधिकारी ने वाकई अपने मन से कुछ भी लिख कर उसका अंगूठा ले लिया?
गोपालगंज वाले कांड में प्रतीक सिन्हा ने गरीब और असहाय पिता के बयानों को यह कह कर खारिज कर दिया था कि वो बातें FIR में नहीं थीं। क्या वहाँ प्रतीक सिन्हा ने यह पता किया था पुलिस ने प्राथमिकी स्वयं लिखी थी, उसे पढ़ कर सुनाया था या नहीं? जो ‘नासा रोवर’ वाली तकनीक संस्कारहीन सिन्हा यहाँ लगा रहा है और पुलिस को झूठा और गैरकानूनी काम करने वाला बता रहा है, वही तकनीक दो सप्ताह पहले क्या मंगल ग्रह पर चली गई थी?
आखिर ‘मेरी बात बनाम पुलिस की बात’ के मामले में पुलिस का पक्ष गायब क्यों है? यह तो वही बात है कि पीड़ित के प्रति संवेदना की चादर डाल कर जो भी बुलवाना हो, बुलवा लो, उस पर कोई प्रश्न उठा कर संवेदनहीन होने का आरोप क्यों लेगा! जिस लेख को लिखने में तीन लोग लगे हों, और सात दिन का ‘परिश्रम’ किया गया हो, उसमें उक्त पुलिस अधिकारी का बयान कहाँ है जिस पर गैरकानूनी कार्य करने का आरोप लगाया जा रहा है?
यहाँ पर, सिर्फ एक नाम, एक मजहब के होने के कारण, प्रतीक सिन्हा और ऑल्टन्यूज ने परिवार के वीडियो बयानों को अखंड सत्य बताते हुए, पुलिस को अपराधी बताया है। साथ ही, बाकी समय पुलिस अफसर के नानी की भतीजे के भाई के बेटी के दोस्त के क्लास मॉनिटर के चाचा आदि तक की कड़ियाँ तलाश लेने वाले प्रतीक सिन्हा ने पुलिस का कोई पक्ष जानने की कोशिश भी नहीं की। यह न करना बताता है कि प्रतीक सिन्हा पहले परिणाम तय करता है, उसके बाद गोटियाँ सजाता है।
परिवार ने जो कहा वही अखंड सत्य?
ऑल्टन्यूज की अंतर्निहित समस्या यह है कि उसे हमेशा यह लगता है कि एक हिन्दू समुदाय का व्यक्ति अगर अपने पुत्र की मौत पर कुछ बोल रहा है तो वो झूठ ही बोल रहा होगा। वह उसे ‘एक शोकाकुल पिता का बयान’ कह कर, अपनी संवेदनहीनता को ‘हम तो पिता की मानसिक स्थिति को समझ रहे हैं’ की ‘संवेदनशीलता’ के नकाब में ढक लेते हैं।
यही बात पलट दीजिए और मजहब अलग कर दीजिए तो ऑल्टन्यूज की पूरी साइट पर ताहिर हुसैन जैसे दंगाइयों से ले कर फल-सब्जी पर थूकते समुदाय विशेष के लोगों, तबलीगी जमात के थूकने, पेशाब करने और मल त्यागने वाले जमातियों का बचाव पूरी शिद्दत के साथ किया जाता रहा है। सत्य उसके बिलकुल अलग तरफ खड़ा होता है लेकिन प्रतीक सिन्हा जैसे संस्कारहीन अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता बनाए रखते हैं।
दंगाई ताहिर हुसैन को लेकर जो ‘फैक्ट चेक’ ऑल्ट न्यूज़ ने किए थे
अरबीना खातून के मामले में पुलिस और प्रशासन को झूठा बताने से ले कर, परिवार के उन सदस्यों के भी बयान ले लिए गए, जो न तो अरबीना के साथ रहते थे, न ट्रेन पर थे। ‘साक्ष्य’ के नाम पर परिवार के लोगों के वीडियो लगा कर ऑल्टन्यूज क्या जताना चाहता है? कि मृतका के परिवार के व्यक्ति पहले झूठ बोल रहे थे, अब उन्हें याद आया तो सच बोलने लगे हैं? और सच भी ऐसे बोल रहे हैं कि पाँच जगह पाँच बातें हैं?
पूरे लेख में, जो एक तय प्रोपेगेंडा को ढकेलने के लिए लिखी गई है, यह बताने की कोशिश है कि ‘वो बीमार नहीं थी’। चूँकि (शायद ‘समझाने’ आदि में कमी रहने के कारण) पीड़ित परिवार अभी भी ‘भूख’ वाली बात पर क्लियर बयान नहीं दे पा रहा, तो इन्होंने चर्चा को उधर मोड़ दिया कि अरबीना बीमार नहीं थी।
वजीर ने स्वीकारा और पुलिस द्वारा दर्ज बयान में कहा है कि अरबीना के पति ने उसे छोड़ दिया था और वो पिछले कुछ समय से बीमार थी। साथ ही यह भी कहा कि इसी कारण से वो मानसिक रूप से भी ‘अस्थिर’ अवस्था में थी। जहाँ तक बात प्लेटफॉर्म पर शव के होने की थी, तो स्वयं वजीर का बयान है कि उसने ही लाश को प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर रखा, और बाद में पुलिस को सूचना दी। यहाँ भी रेलवे पर आरोप लगाना अनुचित ही है।
वजीर का स्टेटमेंट
लेकिन, क्या ऑल्टन्यूज ने कोर्ट में दाखिल पुलिस द्वारा दर्ज किए गए बयान पर कोई चर्चा की? बिलकुल नहीं। करते भी तो यही लिखते कि परिजन की मृत्यु के बाद वो उस अवस्था में नहीं था कि वो सही बयान दे पाए।
साथ ही, हर जगह ‘ही मेन्टेन्ड दैट अरबीना डिडन्ट हैव अ मेडिकल कन्डीशन’ (हालाँकि, वह इस बात पर डटे रहे कि अरबीना को पहले से कोई बीमारी नहीं थी), लिख कर ऑल्टन्यूज अपनी ही मूर्खता प्रदर्शित कर रहा है। जब तुम एक व्यक्ति (वजीर) की मानसिक स्थिति का हवाला दे कर डेढ़ बीघा में फर्जी लेख छाप देते हो कि बीबीसी से बात करते हुए खाना-पानी न मिलने की बात उसने गलत बोली थी, तो उसी समय उसके द्वारा बोली गई दूसरी बात सही कैसे मान ली जाए?
मतलब, मानसिक स्थिति उसकी ऐसी थी कि बाद में ऑल्टन्यूज आधी बात को पकड़ ले और डटा रहे, बार-बार लिखे: ‘हालाँकि अरबीना को कोई बीमारी नहीं थी, इस पर वो कायम रहे’। वो ‘कायम’ हैं या अभी भी तुम्हारे सात दिन के ‘परिश्रम’ के बाद झूठ बोल रहे हैं क्योंकि अब लाश दफ्न हो चुकी है, ये कैसे पता चलेगा?
मैं इस ‘गिल्ट ट्रिप’ पर नहीं जाने वाला कि ‘उसके घर में एक व्यक्ति की मौत हो गई है, और आप परिजनों पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं’। मेरा काम इस प्रपंच में हर बात को तार्किक तरीके से देखना है कि इनके लेख में किस तरह की विसंगतियाँ हैं। उसके अलावा मैं भावनात्मक तौर पर किसी भी पीड़ित से जुड़ाव महसूस नहीं कर सकता क्योंकि फिर मेरी रिपोर्टिंग पक्षपाती हो जाएगी।
हर जगह ‘हालाँकि उन्होंने पहले से बीमार थी इस बात पर…’ इतनी बार लिखा गया है कि लोगों का ध्यान इस बात से हट जाए कि PIB का फैक्टचेक इस संदर्भ में था कि उसकी मृत्यु भूख से हो गई है। ‘भूख-प्यास’ को खूब केन्द्र में रख कर कविता पाठ हुआ और गिरोह ने खूब उछाला। जब यह साबित नहीं हो सका कि ट्रेन पर लोगों को भोजन-पानी नहीं दिया जा रहा था, तो अब आरोप यह लगाया जा रहा है कि पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, वरना पता चल जाता।
अगर परिवार को लगता है कि इसमें सरकार की गलती है, तो परिवार ने क्या सरकार को पोस्टमार्टम के लिए आवेदन किया? पूरे लेख में पोस्टमार्टम और ऑटोप्सी से क्या-क्या कारण ‘हो सकते थे’ की कल्पनाशीलता दिखाई गई है। पूरे लेख का आधार ही यही है कि अगर ऑटोप्सी हो जाती तो ये साबित हो जाता…
ऑल्टन्यूज ने पुलिस को झूठा बताया, वजीर के विरोधाभासी बयानों के आधे हिस्से को को सही और आधे को ‘मानसिक परेशानी’ के नाम पर गलत कह देने जैसा दिखाया, डॉक्टर आदि की बातों के ‘हो सकता है’ को ही तथ्य मान लिया। इस कारण ये पूरा लेख सरकार को निशाना बनाने के इरादे से लिखा हुआ प्रतीत होता है।
ऑल्टन्यूज की कश्मकश इस बात को ले कर भी है कि सरकार ने PIB फैक्टचेक शुरु कर के ‘पत्रकारों को निशाना’ बनाना शुरु किया है। ये बातें मूर्खतापूर्ण ही हैं कि एक सरकारी संस्था किसी फेकन्यूज (जो कि ऑल्टन्यूज के जीवन का मुख्य आधार है) फैलाने वाली मीडिया की खबरों का खंडन कर के सही जानकारी दे, तो उसे उन ‘पत्रकारों को निशाना’ बनाने की बात से कह दिया जाए जो फेकन्यूज फैला रहे थे।
ऑल्ट न्यूज़ के ‘फैक्ट चेक’ का निचोड़
पीड़ितों को कोचिंग देने की निंजा तकनीक
जुलाई 2017 में स्वघोषित पत्रकार निखिल वाग्ले ने एक ट्वीट में लिखा था कि ‘साम्प्रदायिक अजेंडे को ठेलने के लिए पीड़ितों को एक खास तरह के बयान देने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है’। वामपंथी आदमी स्वयं यह बात बोले तो पता चलता है कि हो न हो, ये लोग इस तरीके का इस्तेमाल तो करते ही होंगे। साथ ही, इनकी करतूतों से सीखते हुए कई बार खास मजहब के लोगों ने स्वयं ही पुलिस को झूठे बयान सिर्फ इसलिए दिए हैं ताकि वो चर्चा में आ जाएँ।
‘जय श्री राम’ न कहने पर पीटा, मारा, टोपी फेंक दी… ये नौटंकी तो पिछले साल जून-जुलाई महीने में खूब हुई है। पुलिस को इन पीड़ितों ने ‘जय श्री राम’ का झूठ बस इसलिए बोला क्योंकि वो चर्चा में था और खबरों में आ रहा था। उसी तरह कई घटनाएँ हैं जहाँ ‘अलग एंगल’ तलाशता पत्रकार, घटना के बीतने के बाद उनसे बात करने जाता है और उन्हें बताता है कि क्या बोलना है, कैसे बोलना है।
बुलंदशहर में जो दंगे हुए वहाँ भी इसी तरह की बातें दिखीं जहाँ हरे दरवाजे की भीतर कुछ महिलाओं को एक पत्रकार कुछ समझा रहा था, हम पास पहुँचे तो दरवाजा बंद किया गया। वहाँ खड़े लोगों ने कहा कि उन महिलाओं ने अपनी आँखों से ‘देखा’ है कि लाउडस्पीकर पर बजरंग दल के लोगों ने 2 दिसंबर की रात को इकट्ठा होने की बात कही। पूरी जानकारी आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।
गुड़गाँव के बरकत आलम का मामला याद आता है जहाँ पुलिस ने कहा कि उसने ‘टोपी’ फेंकने वाली बात और ‘जय श्री राम’ की बात मीडिया द्वारा कोचिंग देने के बाद कही हो, ऐसा प्रतीत होता है। इसी तरह, अगस्त 2019 में एक खबर आई कि बेगूसराय के एक नाबालिग दलित पीड़ित को जब कट्टरपंथियों ने मारा-पीटा, उसकी माँ पर गलत निगाह डाली तब ‘द वायर’ के एक पत्रकार ने उस नाबालिग को फोन पर निर्लज्जता से यह पूछा कि क्या उन्होंने पीटते वक्त यह कहा था कि तुम हिन्दू हो इसलिए हम मार रहे हैं?
इसी तरह शाहीन बाग मामले में कुख्यात ‘एक्टिविस्ट’ तीस्ता सेतलवाड़ ने ‘विरोध प्रदर्शन’ पर बैठी महिलाओं को कोचिंग दी कि जब सुप्रीम कोर्ट के लोग उनसे बातचीत करने आएँ तो उन्हें क्या-क्या कहना है।
टीवी पत्रकारों को ऐसा करते हुए कई बार देखा गया है जहाँ किसी खास मौके पर कैसे रोना है, किधर देखना है, कैसे नारे लगाने हैं, सब बता कर तैयार किया जाता है। ऑल्टन्यूज ने इस लेख में सात दिनों की मेहनत की है। उन्होंने वामपंथी छात्र संगठन AISA के बिहार अध्यक्ष काजिम इरफानी और दैनिक भास्कर के स्थानीय पत्रकार नूर परवेज को परिवार से बात करने भेजा। कमाल की बात यह है कि इन दोनों ही लोगों को प्रतीक सिन्हा पुलिस स्टेशन नहीं भेज पाए कि उनका भी ‘वीडियो स्टेटमेंट’ ले लिया जाता।
कुल मिला कर, यह लेख ऑल्टन्यूज के कई बेकार कारनामों की शृंखला में एक नया पन्ना भर है। ऐसे लोग तब तक नहीं रुकेंगे जब तक समाज में साम्प्रदायिकता और अराजकता पूरी तरह से व्याप्त न हो जाए। इनके नियम तय हैं कि पीड़ित अगर एक खास मजहब का है तो उसकी ट्रीटमेंट खास तरीके से होगी, उसी तरह अपराधी अगर खास मजहब का है, तो उस मामले में बचाव के सारे प्रयास किए जाएँगे।
पत्रकारिता छोड़ कर ऑल्टन्यूज को कोचिंग संस्थान चलाने के धंधे में भी आने के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि सात दिनों के परिश्रम से जब इस तरह के परिणाम मिल सकते हैं तो ये लोग न्यूज एजेंसी की तर्ज पर ‘समुदाय विशेष पीड़ित कोचिंग संस्थान’ शुरु कर सकते हैं।
एक रिक्शा चालक का सड़क पर तड़पते और नाक से खून बहते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। बताया जा रहा है कि पीड़ित रिक्शा चालक को समाजवादी पार्टी के एक विधायक के सुरक्षा गार्ड धर्मेंद्र कुमार ने बेरहमी से पीटा था। बाद में विधायक का सुरक्षा गार्ड रिक्शा चालक को सड़क पर तड़पता छोड़ चला गया।
इस घटना का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों को घटना की जानकारी हुई। अब इस मामले पर पुलिस ने भी संज्ञान लिया है।
सपा विधायक मनोज पाण्डेय की दिखी खुलेआम गुंडागर्दी….रिक्शाचालक को हजरतगंज मेन रोड पर हॉकी से पीट-पीटकर किया लहूलुहान…क्या @yadavakhilesh इस रिक्शाचालक को न्याय दिलवाएंगे या ऐसे ही सपा के लोग समय-समय पर गुंडई करते रहेंगे ..बेहद शर्मनाक है ये…वीडियो देखिए और रिट्वीट करिए pic.twitter.com/vxQ1pnXlgl
— मृगेंद्र प्रताप सिंह (@BaabuSaaheb) June 3, 2020
जानकारी के मुताबिक मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज में अशोक मार्ग पर श्रीराम टावर के सामने सोमवार दोपहर का है। इस दौरान समाजवादी पार्टी के विधायक अपने टोयोटा फॉर्च्यूनर गाड़ी नंबर- UP33 AR 1276 से इलाके से होकर गुजर रहे थे। दरअसल यह SUV कार समाजवादी पार्टी के विधायक मनोज कुमार पांडे के नाम पर दर्ज है, जो कि रायबरेली जिले के ऊँचाहार से वर्तमान में विधायक हैं।
यहाँ यह जान लेना भी जरूरी है कि कार के मालिक का नाम सरकारी पोर्टल https://vahan.nic.in/nrservices/faces/user/searchstatus.xhtml के माध्यम से प्राप्त किया गया है। सरकारी पोर्टल पर वाहन का पंजीकरण नंबर टाइप करने पर जो जानकारी प्राप्त हुई है, उसे आप भी नीचे देख सकते हैं।
कार नंबर- UP33 AR 1276 से संबंधित जानकारी
इसी बीच आशोक मार्ग से गुजर रही विधायक मनोज कुमार पांडेय की गाड़ी से एक रिक्शा चालक का रिक्शा गलती से टकरा गया। इसी बात को लेकर गाड़ी से उतरे विधायक के सुरक्षा गार्ड धर्मेंद्र कुमार (पहचान संख्या 192635295) ने रिक्शा चालक को गालियाँ देते हुए उसे पीटना शुरू कर दिया।
चश्मदीदों के मुताबिक सुरक्षा गार्ड यहीं नहीं रुका। उसने विधायक की गाड़ी से हॉकी स्टिक निकाली और फिर उससे पीटते-पीटते रिक्शा चालक को लहूलुहान कर दिया। इसके बाद वह गाड़ी में बैठकर घटनास्थल से चला गया। लेकिन इस बीच गनर धर्मेंद्र कुमार की नेमप्लेट मौके पर गिर गई, जिसे वीडियो में साफ तौर पर कई बार दिखाया गया है।
अब इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने सपा विधायक और उसके गनर धर्मेन्द्र के खिलाफ शिकायत पत्र देकर प्रशासन से मामले में मुकदमा दर्ज कर दोनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है।
घटना पर पुलिस आयुक्त सुजीत पांडे का कहना है कि वीडियो की जाँच की जा रही है और वीडियो में दिख रहे रिक्शा चालक की तलाश की जा रही है। पांडे बताया कि पीड़ित के बयान के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। मौके पर खड़े कुछ लोगों का कहना है कि घायल अवस्था में पड़े रिक्शा चालक से आरोपित सुरक्षा गार्ड ने आखिर में इलाज कराने के लिए कुछ पैसे की देने की भी बात कही थी।
दिल्ली की रहने वाली अमरप्रीत के पिता की गुरुवार (4 मई 2020) को कोरोना वायरस से मौत हो गई। अमरप्रीत का दावा है कि उन्हें LNJP हॉस्पिटल ने भर्ती करने से मना कर दिया था। उनके पिता तेज बुखार से पीड़ित थे और गंगाराम हॉस्पिटल से एलएनजेपी शिफ्ट किए गए थे।
आज सुबह के आठ बजे अमरप्रीत ने ट्विटर पर बताया कि उनके पिता को तेज बुखार है और सॉंस लेने में दिक्कत हो रही है और वह दिल्ली सरकार के एलएनजेपी अस्पताल के बाहर उन्हें भर्ती किए जाने के इंतजार में बैठी है।
My dad is having high fever. We need to shift him to hospital. I am standing outside LNJP Delhi & they are not taking him in. He is having corona, high fever and breathing problem. He won’t survive without help. Pls help.
उन्होंने दिल्ली के विधायक दिलीप पांडे, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को भी अपने ट्वीट में टैग किया था।
अमरप्रीत ने एक ऑडियो फ़ाइल भी शेयर किया, जिसमें उसने कहा था कि उसके पिता को गंगाराम अस्पताल से एलएनजेपी अस्पताल में शिफ्ट किया जाना था, लेकिन अस्पताल ने रेफरल के बिना स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद वह वापस रेफरल लेने गंगा राम अस्पताल गई।
दिल्ली सरकार द्वारा चलाया जा रहा एलएनजेपी अस्पताल स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के अंतर्गत आता है।
हालाँकि करीब एक घंटे के बाद उन्होंने दोबारा ट्वीट किया और बताया कि अस्पताल के बाहर इंतजार करते हुए उसके पिता ने दम तोड़ दिया और वह अब जिंदा नहीं है।
दिल्ली सरकार के कोरोनावायरस डैशबोर्ड के अनुसार, एलएनजेपी अस्पताल में कुल उपलब्ध 2,000 बेड्स में से 1,129 बेड्स इस समय खाली हैं।
वहीं इस सप्ताह के शुरूआत में अमरप्रीत ने ट्विटर के जरिए दिल्ली सरकार से अपने पिता के लिए मदद की गुहार लगाई थी, जब उनके पिता का कोरोना वायरस टेस्ट पॉजिटिव आया था।
पिता का कोरोना वायरस टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद 2 जून को अमरप्रीत ने दिल्ली सरकार द्वारा जारी सभी हेल्पलाइन नबरों पर कॉल की कोशिश की लेकिन कथित तौर पर उनमें से कोई भी नंबर काम नहीं कर रहा था। बाद में उन्होंने मदद को सामने आए दिल्ली के विधायक दिलीप पांडे और अन्य लोगों को धन्यवाद दिया था।
लोकनायक अस्पताल में शवों की बदतर स्थिति
बता दें अभी हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने लोकनायक अस्पताल में शवों की बदतर स्थिति को लेकर दिल्ली सरकार और तीनों नगर निगमों को नोटिस जारी किया था। हाईकोर्ट ने शवों को लेकर मानवाधिकारों के उल्लंघन पर आपत्ति जताई थी।
जहाँ अस्पताल स्थित कोविड-19 मॉर्चरी में 108 शव रखे हुए थे। मॉर्चरी में 80 शवों वाले रेक के भरने के बाद 28 कोरोना संक्रिमत शवों को ज़मीन पर एक के ऊपर रखा गया था। अस्पताल अधिकारी ने शवगृह की हालत बताते हुए कहा कि, अभी तक पाँच दिन पहले जिनकी मौत हुई थी, उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया है। इसकी वजह से मॉर्चरी में हर दिन संख्या बढ़ती चली जा रही है। पिछले हफ्ते जमीन पर 28 की जगह 34 शव पड़े हुए थे।
पाकिस्तान में लगातार बढ़ती हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण की घटनाओं से चिंतित पाकिस्तान के ही एक सामाजिक कार्यकर्ता ने पाकिस्तान की हिंदू लड़कियों को बचाने के लिए एक अभियान चलाने की घोषणा की है। घोषणा के मुताबिक 6 जून को सोशल मीडिया पर इस अभियान को चलाया जाएगा।
पाकिस्तान के सामाजिक कार्यकर्ता धनजी कोलही ने बुधवार (03 जून, 2020) को ट्विटर पर ट्वीट करते हुए लिखा, सिंधी हिंदू लड़कियों के लिए शनिवार 6 जून को सिंधी ट्विटर पर टैंड शुरू करने जा रहे हैं। यह अभियान पीड़ित लड़कियों और उनकी माताओं के लिए समर्पित होगा। इसलिए इस अभियान में अधिक से अधिक लोग हिस्सा लें।
साथ ही अपनी योजना के तहत कोलही ने लिखा कि इस अभियान को सफल बनाने के लिए वह अभी से इस प्रकार की घटनाओं से जुड़े वीडियो, कार्टून, GIF और फोटो तैयार करना शुरू करे दें। ताकि ट्रैंड वाले दिन इन्हें शेयर किया जा सके।
Sindhis are going to trend on twitter for Sindhi Hindu girls, for victims mothers on #6th_June on Saturday. So please participate more & more. Start preparing for videos, cartoons, GIFs, Images so on.
सामाजिक कार्यकर्ता धनजी कोलही अपने ट्वीट के आखिर में लिखा कि हम सभी से मानवीय अपील करते है कि 6 जून को #SindhRejectsForcedConversions ट्रैंड अभियान में शामिल होकर पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करें। कोलही ने ट्वीट के साथ उन पीड़ित लड़कियों का एक कोलॉज बनाकर तस्वीर भी शेयर की है, जो कि पछले दिनों में पाकिस्तान के अंदर हिंदू लड़कियाँ जबरन धर्मांतरण का शिकार हुई हैं।
दरअसल, पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण की घटनाएँ सामने आ रही हैं। इस प्रकार की घटनाएँ पिछले कुछ समय में पाकिस्तान के सिंध प्रांत से सबसे अधिक घटित हुई हैं। यही कारण है कि अब इसके खिलाफ में एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने की तैयारी की जा रही है।
इस आंदोलन को सफल बनाने और इसमें शामिल होने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से ही लोगों से मानवीयता के नाते अपील भी की जा रही है। धनजी कोलही कहते हैं कि यदि इस अभियान के बाद भी शासन-प्रशासन नहीं जागा तो आगे बड़े आंदोलन की रणनीति बनाई जाएगी।
पाञ्यजन्य की खबर के मुताबिक पाकिस्तान में महिलाओं के अधिकार के लिए संघर्ष करने वाली जोया असगर कहती हैं कि जबरन कन्वर्जन यकीनन अपराध है। इसे समूल खत्म होना चाहिए। इसके उलट पाकिस्तान में हिंदू सहित दूसरे अल्पसंख्यकों की बच्चियों के अपहरण और कन्वर्जन की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। पिछले तीन दिनों के भीतर ही छह से अधिक हिंदू लड़कियों का कन्वर्जन की नियत से अपहरण कर लिया गया।
पिछले चौबीस घंटे में सिंध प्रांत के मीरपुर खास जिले के समारो, मीरवाह गोरचनी में कृष्ण मेघवाड़ की पुत्री आशा मेघवाड़ का पहले अपहरण और फिर कन्वर्जन किया गया। इस मामले में एक कट्टरपंथी अय्यूब जान को आरोपित बनाया गया है।
इससे पहले 2 जून 2020 को पाकिस्तान के सिंध प्रांत के पीरबक्स जरवार गाँव में 13 वर्षीय हिंदू लड़की के साथ 6 हथियारबंद युवकों ने बर्बरता से गैंगरेप किया था। यह घटना सिंध प्रांत के मीरपुरखास में दिलबर खान पुलिस स्टेशन के अंतर्गत की थी।
पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने बताया था कि 6 हथियारबंद लोग 13 वर्षीय हिंदू लड़की के घर में जबरन घुस गए। इसके बाद उन्होंने परिवार के लोगों के साथ मारपीट करके लड़की को अगवा करके ले गए। इसके बाद उन दरिंदों ने रात भर हिंदू लड़की के साथ बेरहमी से बलात्कार किया। इधर लड़की के परिजन उसे ढूँढते रहे, मदद के लिए गुहार लगाते रहे।
इससे पहले भी पिछले महीने 12 मई को कोरोना महामारी के बीच पाकिस्तान में एक हिंदू लड़की का अपहरण करके उसका धर्मांतरण करवाया गया था। लड़की की पहचान कविता कुमारी के रूप में हुई थी और पूरा मामला सिंध प्रांत के घोटकी इलाके के बारझुंडी का बताया गया। इतना ही नहीं जानकारी मिली थी कि इस घटना के पीछे भी मियाँ मिट्ठू का ही हाथ था।
पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन के मुताबिक, कविता का पहले मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा अपहरण किया गया और बाद में उसे मियाँ मिट्ठू के पास ले जाया गया। इसके बाद मियाँ मिट्ठू ने जबरन कविता को इस्लाम धर्म कबूल कराया था।
गौरतलब है कि पाकिस्तान में 15 फरवरी को 15 साल की महक को अगवा कर जबरन इस्लाम कबूल करवाने के खिलाफ और महक को न्याय दिलाने के लिए बड़ी संख्या में लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया था। दरअसल वकीलों के साथ सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने प्रेस क्लब के सामने एकट्ठा होकर इंसाफ का माँग की थी।
गुजरात में 19 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस की मुसीबतें बढ़ गई हैं। पार्टी के दो और MLA ने इस्तीफा दे दिया है। इनके नाम हैं- अक्षय पटेल और जीतू चौधरी।
पटेल कर्जन से तो चौधरी करपाड़ा से विधायक थे। दोनों का इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी ने स्वीकार कर लिया है। एक और कॉन्ग्रेस विधायक के इस्तीफे की अटकलें हैं। अब तक कॉन्ग्रेस के सात विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं।
Two MLAs Akshay Patel and Jitu Bhai Chaudhary (both from Congress) have resigned voluntarily from the post of MLA and I have accepted it: Rajendra Trivedi, Gujarat Assembly Speaker pic.twitter.com/nKqSeRgafo
बता दें कि इससे पहले मार्च में कॉन्ग्रेस के 5 विधायकों ने इस्तीफा दिया था। AICC के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “मैं दो विधायकों के इस्तीफे की पुष्टि कर सकता हूँ। तीसरा, हम पुष्टि करने की कोशिश कर रहे हैं। हमें इन सबकी उम्मीद थी। यह गुजरात है। अगर वे (भाजपा) अन्य राज्यों में इस तरह का काम कर सकते हैं तो गुजरात उनका घरेलू मैदान है।”
जानकारी के मुताबिक, इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता इन दोनों विधायकों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन कई प्रयासों के बाद वे उन तक नहीं पहुँच पाए। गुजरात में कॉन्ग्रेस के इंचार्ज राजीव सातव ने ट्विटर पर इन सबके लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया और भाजपा पर अपने विधायकों को खरीदने का आरोप लगाया है।
उन्होंने लिखा, “भारत अपने स्वतंत्र इतिहास के सबसे बड़े स्वास्थ्य, आर्थिक और मानवीय संकट के बीच में है। तब भी, बीजेपी राज्यसभा चुनावों के लिए अवैध विधायकों में अपनी सारी ऊर्जा लगाने से परे नहीं सोच सकती, हालाँकि लोगों को नुकसान हो सकता है!”
India is in the midst of its independent history’s biggest health, economic & humanitarian crises. BJP, though, cannot think beyond putting all its energies in poaching legislators for RS polls, people be damned!
गौरतलब है कि इससे पहले मार्च महीने में गुजरात कॉन्ग्रेस के 5 विधायकों प्रवीण मारू, मंगल गावित, सोमाभाई पटेल, जेवी काकड़िया और प्रद्युम्न जडेजा ने अपने पद से इस्तीफा दिया था। बाद में कॉन्ग्रेस ने उन्हें पार्टी से भी सस्पेंड कर दिया था।
इसके बाद मध्यप्रदेश में बिगड़े हालातों को देखते हुए कोरोना संकट के बीच राज्यसभा इलेक्शन में बिखराव रोकने के कवायद के कारण गुजरात से पार्टी विधायकों को जयपुर व उदयपुर लाने की रणनीति बनाई गई और मीडिया के पूछने पर बताया गया कि सब कुछ ठीक है। बस हर पार्टी की रणनीति होती है। यहाँ आना भी रणनीति का ही हिस्सा है।
दरअसल, गुजरात राज्यसभा के मद्देनजर पार्टी को क्रॉस वोटिंग का डर था। इसी कारण सभी विधायक राजस्थान लाए गए थे।
Seventh Congress MLA resigns from the Assembly ahead of polling for Rajya Sabha seats in Gujarat https://t.co/IKRQfQaf69
गौरतलब है कि राज्यसभा चुनाव पहले मार्च में होना तय था। लेकिन कोरोना के कारण इसकी तारीख आगे बढ़ानी पड़ी। इसके बाद चुनाव आयोग ने बताया था कि आँध्र प्रदेश और गुजरात की 4 राज्यसभा सीटों, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तीन-तीन सीटों, झारखंड की दो सीटों और 22 जून से पहले मणिपुर और मेघालय की 1 सीटों के लिए चुनाव होंगे।
कॉन्ग्रेस विधायकों के इस्तीफे के कारण गुजरात में एक बार फिर स्थिति 2017 के राज्यसभा चुनाव की तरह बनती दिख रही है। उस वक्त भी बीजेपी ने एक अतिरिक्त उम्मीदवार उतारा था और चुनाव से ठीक पहले कॉन्ग्रेस के 6 विधायकों ने इस्तीफा दिया था। तब एक वोट निरस्त होने की वजह से कॉन्ग्रेस के अहमद पटेल चुनाव तो जीत गए थे, लेकिन चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कॉन्ग्रेस को पूरी ताकत झोंकनी पड़ी थी।
इस बार चार सीटों के लिए कॉन्ग्रेस ने दो तो बीजेपी ने तीन उम्मीदवार उतारे हैं। कॉन्ग्रेस की तरफ से शक्ति सिंह गोहिल और भरत सिंह सोलंकी कैंडिडेट हैं। बीजेपी ने अभय भारद्वाज, रमीला बारा और नरहरी अमीन को मौका दिया है। अमीन तीसरे उम्मीदवार हैं और वे एक जमाने में कॉन्ग्रेस में ही थे।
विधानसभा के मौजूदा गणित के हिसाब से राज्यसभा चुनाव में एक उम्मीदवार की जीत के लिए 35.01 वोट की जरूरत होगी। बीजेपी के 103 विधायक हैं। ऐसे में तीसरे उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए उसे तीन अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। माना जा रहा है कि इसके लिए वह भारतीय ट्राइबल पार्टी के दो और एनसीपी के एक विधायक के संपर्क में है। वहीं इस्तीफों के बाद विधानसभा में कॉन्ग्रेस के 66 सदस्य ही बचे हैं। उसे अपने दोनों उम्मीदवारों की जीत के लिए कम से कम 70 वोटों की जरूरत है जो फिलहाल मुश्किल दिख रही है।
लॉकडाउन में एक छोटी सी गलती ने एक बड़ी मर्डर मिस्ट्री सुलझा दी। मामला लुधियाना पंजाब के खालसा कॉलेज की 19 वर्षीय एकता देशवाल के जघन्य हत्या की है। जिसे अंजाम देने में आरोपित शाकिब के पिता, भाई, दोस्त सहित दो सगी भाभियों रेशमा और इस्मत ने साथ दिया था। मेरठ पुलिस द्वारा इस हत्या की गुत्थी सुलझाने के साथ ही अब एक तरह से ‘लव जिहाद’ का ये पूरा मामला देश के सामने है।
लुधियाना के अंकुजा आनंद नगर की एकता देशवाल शाकिब से अमन बने एक और शातिर के प्यार में ‘लव जिहाद’ की भेंट चढ़ गईं। इस पूरे हत्याकांड में न सिर्फ शाकिब शामिल था बल्कि अब करीब एक साल बाद मेरठ पुलिस के खुलासे के मुताबिक शाकिब, मुसर्रत, मुस्तकीम, रेशमा, इस्मत और अयान नाम के 6 आरोपितों के नाम सामने आए हैं। जिसमें से एक को छोड़कर सभी उसके परिवार के लोग हैं।
मेरठ के दौराला थाना क्षेत्र के लोइया गाँव से शाकिब करीब चार साल पहले लुधियाना चला गया था। वहाँ दिलशाद के पास रहकर तांत्रिक क्रिया सीखने और करने लगा था। या यूँ कहा जाए इसकी आड़ में वह अपनी यह दुकान चलाते हुए लुधियाना में ही रहते हुए शिकार तलाशने लगा। हालाँकि, पुलिस के अनुसार, यह अभी जाँच का विषय है कि वह एकता देशवाल से पहले कितनी और हिन्दू लड़कियों को नाम बदलकर अपना शिकार बना चुका था।
लुधियाना में झाड़-फूँक की दुकान चलाते हुए, एक दिन लुधियाना के ही अंकुजा आनंद नगर की रहने वाली एकता देशवाल की मुलाकात शाकिब से हुई। या शाकिब ने उसे किसी इवेंट के दौरान देखा और टारगेट किया, ये अभी तक स्पष्ट नहीं है। मध्यम वर्गीय परिवार की एकता देशवाल उस समय बीकॉम की पढ़ाई के साथ-साथ पिता का हाथ बटाने के लिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में विभिन्न कंपनियों के लिए इवेंट भी करती थी।
हालाँकि, विभिन्न मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि एकता अचानक से बीमार होने की वजह से दिलशाद के तांत्रिक वाले दुकान पर शाकिब से मिली थी। जब हमने शाकिब से मुलाकात के बारे में पीड़िता के मामा से जानना चाहा तो पीड़िता के मामा ने ऑपइंडिया से बताया कि एकता बीमार नहीं थी, हाँ उसे थोड़ी बहुत एलर्जी की समस्या थी। जो ठीक नहीं हो रही थी, जिसकी वजह से हो सकता है वह वहीं लुधियाना बस अड्डे के पास ही तांत्रिक की दुकान चलाने वाले दिलशाद के पास गई होगी। जहाँ से शाकिब की उस पर निगाह पड़ी, या हो सकता है लुधियाना बस स्टैंड पर इवेंट करते समय शाकिब ने उसे देखा हो और वहीं से शाकिब ने एकता पर नजर रखनी शुरू की हो। इसका खुलासा तो अब शाकिब से उगलवा कर पुलिस ही कर सकती है।
पुलिस के अनुसार, शाकिब ने एकता को झाँसे में लेने के लिए खुद का नाम अमन बताया था। करीब छह महीने तक वह एकता से प्यार का नाटक करता रहा। और एकता से यहाँ-वहाँ मिलता रहा। अमन समझ कर शाकिब से प्यार कर बैठी एकता को अंदाजा भी नहीं था कि वह किस जाल में फँस चुकी है। बात आगे बढ़ी तो प्रेम संबंधों में तब्दील हो गई।
एकता की माँ सीमा ने बताया कि जब इस मामले की भनक परिवार को लगी तो अमन बने शाकिब को उन्होंने एक बार अपने घर समझाने के लिए भी बुलाया था। तब भी शाकिब ने हाथ में कलावा बाँध रखा था। जिससे उस पर किसी को संदेह नहीं हुआ। माँ ने उसे अपनी बेटी को कम उम्र की बता कर उससे दूर रहने को कहा था। पीड़िता के मामा के अनुसार, माँ सीमा ने उस समय कहा था कि उसे पढ़ने दो, वो अपना करियर बनाना चाहती है।
बिना सिर और हाथ के लाश
उत्तर प्रदेश के मेरठ में पिछले साल 13 जून 2019 को सबी अहमद के खेत में पड़ोसी ईश्वर पंडित ने एक कुत्ते को इंसान का हाथ मुँह में लेकर भागते हुए देखा था, जिसके बाद उन्हें शक हुआ। और इसी शक के आधार पर जब सबी अहमद के गन्ने के खेत को खुदवाया गया तो वहाँ से एक युवती की लाश मिली थी। चूँकि, लाश की सिर और हाथ गायब थे। ऐसे में पहचान करना मुश्किल थी। तो मामला पुलिस रिकॉर्ड में तो रहा है लेकिन आगे कोई पुख्ता सुराग हाथ नहीं लगा।
इस दौरान, लगभग एक साल तक एकता का परिवार इस बात से अनजान रहा कि एकता इस दुनिया में है भी या नहीं?
मेरठ पुलिस ने ऐसे सुलझाई गुत्थी
मीडिया रिपोर्ट में तो कहा यह भी जा रहा है कि लॉकडाउन होने पर शाकिब जब अपने घर लौटा, तो एक दिन नशे में अपने दोस्तों को उसने सारी बात बताई जो मुखबिर के माध्यम से पुलिस तक पहुँच गई।
हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, साल भर पहले जब खेत में लाश मिली थी, इसके बाद डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में मिसिंग केसेज की पड़ताल की गई। एसएसपी ने जानकारी दी कि इस छानबीन के बाद भी कोई सफलता नहीं मिल पाई थी। इसके बाद पुलिस की एक टीम को ये पता लगाने के लिए मुस्तैद किया गया कि लोइया गाँव के कौन-कौन से लोग हैं, जो बाहर कमाते हैं। एसएसपी साहनी ने बताया कि बाहर जहाँ-जहाँ यहाँ के लोग काम करते थे, वहाँ-वहाँ के थानों में जाकर मिसिंग केसेज दिखवाए गए।
जब पुलिस पंजाब पहुँची, तो उसे वहाँ पहली सफलता मिली। वहाँ लुधियाना के मोतीनगर थाना क्षेत्र की निवासी पीड़िता एकता के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज थी। जिसे कई महीने तलाशने के बाद एकता के परिवार ने ही अपनी बेटी के लापता होने की रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई थी, जहाँ पहुँचने पर यूपी पुलिस को लाश और आरोपित की पहचान सुनिश्चित करने में सफलता मिली।
मेरठ के एसएसपी अजय साहनी ने पूरे मामले का खुलासा करते हुए बताया, “हमने सुराग के लिए इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य सर्विलेंस तकनीकों का इस्तेमाल किया। हमने पाया कि इलाके में कुछ मोबाइल फोन नंबर एक्टिव थे, मगर घटना के तुरंत बाद बंद कर दिए गए थे। उन नंबरों को खोजा गया, जो हमें पीड़िता और आरोपित तक ले गए।” लॉकडाउन में घर आए शाकिब के बारे में पक्का सुराग लगते ही पुलिस मामले की कड़ियों को जोड़ने में सफल रही।
इस तरह से मेरठ में एक साल पहले बिना सिर और हाथ के मिली लाश मामले में पुलिस ने शाकिब, मुसर्रत, मुस्तकीम, रेशमा, इस्मत और अयान नाम के सभी 6 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। एसएसपी अजय साहनी ने मामले का खुलासा करते हुए बताया कि शाकिब की पूरी हिस्ट्री खंगाली जा रही है।
क्या है पूरा मामला
कहानी वापस पीछे ले चलते हैं। लुधियाना में दिलशाद के साथ तांत्रिक का काम करते हुए शाकिब ने एक दिन दिलशाद से मनमुटाव होने के बाद पहले करनाल में खुद की दुकान खोली। उसके बाद एकता देशवाल को नौकरी देने के नाम पर अपने पास बुलाया। करीब तीन माह तक एकता उसके साथ करनाल में रहीं। लेकिन उस दौरान एकता का संपर्क परिवार से बना रहा। उसके बाद अमन बने शाकिब ने एकता को बिजनेस बढ़ाने या नए काम के लिए घर से ज्वेलरी लाने के लिए कहा। लड़की के मामा ने बताया कि शाकिब ने एकता को अपने बस में कर लिया था। जिससे एकता चोरी से घर से करीब 25 लाख की ज्वेलरी लेकर शाकिब के कहने पर उसके पास चली गई।
शाकिब को शायद इन सबके बारे में पहले से ही भनक थी। अमन बने शाकिब ने 13 मई 2019 को एकता को शादी का झाँसा देकर करनाल से मेरठ के दौराला थाना क्षेत्र के गाँव लोइया ले आया। यहाँ पर एकता को उसकी हकीकत पता चली तो उसने साथ रहने और निकाह से इन्कार कर दिया था। तभी 25 लाख की ज्वेलरी हाथ से निकलती देख शाकिब ने अपने परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर एकता की नृशंस हत्या की साजिश रच दी।
एकता के मामा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि संभवतः (शाकिब के भाभी के अनुसार) वो लोग वैसे ही किसी दरगाह में शादी कर चुके थे लेकिन उनका निकाह नहीं हुआ था। और अब हकीकत जानने के बाद एकता किसी भी कीमत पर साथ रहने को तैयार नहीं थी।
5 जून 2019 को ईद के दिन शाकिब उसे बाहर घुमाने के बहाने ले गया। जहाँ रात करीब 9 बजे उसने अपने परिवार की मदद से कोल्डड्रिंक में नशीली दवा मिला कर एकता को पिला दी थी। तब भाई मुसर्रत, पिता मुस्तकीम, भाभी रेशमा पत्नी नवेद, इस्मत पत्नी मुसर्रत एवं गाँव के साथी अयान के साथ सुनसान इलाके में बेहोश एकता को ले गए।
मेरठ पुलिस के सामने दिए बयान के अनुसार भाभी रेशमा ने एकता के सभी कपड़े उतार दिए। इसके बाद सभी ने मिलकर उसके हाथ, पैर और सिर अलग-अलग कर दिए। मकसद पहचान छिपाना था। पुलिस ने बताया कि शाकिब ने पीड़िता का हाथ इसलिए काट दिया था, क्योंकि उस पर उसके नाम का टैटू था। धड़ को पास के ही सबी अहमद के गन्ने के खेत में गड्ढा खोदकर दबा दिया। इतना ही नहीं, आरोपितों ने लाश के ऊपर नमक छिड़क दिया था, ताकि वो जल्द से जल्द गल जाए। हाथ, पैर और सिर को गाँव के तालाब में फेंक दिया।
हत्या के बाद शाकिब चलाता रहा एकता का सोशल मीडिया अकाउंट
एकता देशवाल की जघन्य हत्या के बाद शाकिब और गुनाह में शामिल उसके साथी करनाल जाकर तंत्र मंत्र के काम में लग गए। जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो। चूँकि, एकता के घरवाले अमन बने शाकिब को पहचानते और एक बार घर आने की वजह से जानते थे। इसलिए, कहीं परिवार को उस पर ही शक न हो जाए, शाकिब ने एक तरकीब निकाली। वो युवती के फोन से ही उसकी फेसबुक आईडी लगातार अपडेट करते रहा, ताकि घर वालों को उसकी मौत हो जाने का बिलकुल भी पता न चले।
तो इस तरह से बड़ी चालाकी से शातिर शाकिब ने 19 वर्षीय एकता को झाँसा देकर मारने के बाद भी उसका फोन चालू रखा। परिवार को भ्रम में डालने के लिए वो लगातार सोशल मीडिया पर एक्टिव रहता था और व्हाट्सएप की डिसप्ले पिक्चर भी लगातार बदलता रहता था, ताकि सभी को लगे कि वो जिंदा है।
मृत एकता के मामा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि जब कई बार फोन लगाने के बाद भी कभी उधर से कोई रिसीव न करे और काट दे, लोकेशन पता करने पर भी अक्सर अलग-अलग राज्यों का बताए, तो इस तरह जब अपनी बेटी से महीनों तक संपर्क नहीं हुआ तो परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसके बाद अब मामले का खुलासा हुआ।
मृतक एकता की माँ ने जड़े थप्पड़
करीब साल भर से अपनी बेटी को हर जगह तलाशती माँ को जब पुलिस के खुलासे के बाद पूरी बात मालूम चली तो उन्हें भरोसा नहीं हुआ कि उनकी बेटी दुनिया में नहीं है। इसके पहले उनका परिवार यही सोच रहा था कि वो जहाँ भी होगी, खुश होगी। क्योंकि उसके फेसबुक और व्हाट्सअप स्टेटस लगातार साल भर तक चेंज होते रहे। लड़की के मामा ने बताया कि उन्होंने कई बार कोशिश की पता करने की लेकिन हर कुछ दिन पर मोबाइल की लोकेशन अलग-अलग राज्यों की मिलती।
पुलिस ने जब मृत एकता की माँ को साल भर पहले हुई हत्या और मुख्य आरोपित शाकिब समेत 6 और लोगों को गिरफ्तार करने की खबर दी तो उनके सब्र का बाँध टूट गया। जब प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मृतक युवती की माँ को अपने सामने शाकिब की भाभी रेशमा से पूरी कहानी पता चली तो उन्होंने वहीं उठकर शाकिब पर थप्पड़ों की बरसात कर दी। मृतक एकता के मामा भी खुद को रोक नहीं सके। उन्होंने भी दो चार थप्पड़ लगा के अपना आक्रोश तो व्यक्त किया लेकिन अंदर से इस घटना का सारा सच जानकर वो हिल गए।
पीड़िता की माँ सीमा शाकिब का साथ देने वाली उसकी दोनों भाभियों रेशमा और इस्मत से पूछती रहीं, “क्या एकता के कपड़े उतारते हुए, उसे नंगा करते हुए, इतनी बर्बरता से मारते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई।” गुस्से में दो-चार झापड़ रेशमा को लगा बैठीं लेकिन इतने से भला एक जवान बेटी की माँ को कहाँ सुकून मिलने वाला था।
गिरफ़्तारी के बाद भी शाकिब ने की भागने की कोशिश
पुलिस ने बताया कि सोमवार (जून 1, 2020) को जब शाकिब को हत्या की जगह पर ले जाया जाने लगा, तो उसने एक कॉन्स्टेबल की पिस्टल छीनी और रास्ते में पुलिस पर फायरिंग करके भागने की कोशिश की। जवाबी फायरिंग में इस शातिर को गोली लगी। साथ ही एक कॉन्स्टेबल को भी गोली लगी है। शाकिब के पैर में चार गोली लगने के बाद पुलिस उसका अस्पताल में उपचार करा रही है, जबकि उसकी दोनों भाभी रेशमा और इस्मत को जिला जेल भेज दिया गया। मुसर्रत, अयान और मुस्तकीम को अस्थाई जेल में भेजा गया। उनके क्वारंटाइन का समय पूरा होने के बाद जिला जेल भेजा जाएगा।
हालाँकि, पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किया गया फावड़ा, कत्ल का सामान और मृतका का मोबाइल बरामद कर लिया है और इस लव जिहाद के इस हत्याकांड से पर्दा उठाकर सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन अब साल भर से अपनी बेटी को तलाशते परिवार की आखिरी उम्मीद प्रशासन से शाकिब और उसके परिवार को इस जघन्य हत्या के अपराध में फाँसी की माँग पर टिकी है ताकि आने वाले समय में कोई इस तरह से मजहब बदलकर किसी के भरोसे के साथ ही उसकी बर्बर हत्या न कर सके।