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बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा, बेगम का मकबरा… सब UP सरकार की, JPC को बताया- जिन जमीन/संपत्ति पर वक्फ बोर्ड का दावा, उनमें 78% सरकारी… उनके पास कागज नहीं

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को बताया है कि राज्य की जिन संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड दावा कर रहा है, उसका 78 प्रतिशत हिस्सा सरकार का है। इन पर वक्फ बोर्ड का कोई कानूनी मालिकाना हक नहीं है। यूपी सरकार की ओर से राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण आयोग की अतिरिक्त मुख्य सचिव मोनिका गर्ग ने अपनी बात रखी।

दरअसल, वक्फ (संशोधन) विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने मंगलवार (21 जनवरी 2025) को लखनऊ में क्षेत्रीय दौरे की अपनी अंतिम बैठक आयोजित की। यह बैठक JPC प्रमुख एवं भाजपा सांसद जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में हुई। बैठक में शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड तथा अल्पसंख्यक आयोग के सदस्यों सहित इससे प्रभावित सभी पक्षों ने भाग लिया।

रिपोर्ट के अनुसार, यूपी सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण आयोग की अतिरिक्त मुख्य सचिव मोनिका गर्ग ने JPC को बताया कि वक्फ बोर्ड का दावा है कि उसके पास राज्य में 14,000 हेक्टेयर जमीन है। इनमें से आधिकारिक रिकॉर्ड में 11,700 हेक्टेयर जमीन सरकारी है। गर्ग ने कहा कि सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि वक्फ बोर्ड जिन 60 संपत्तियों पर दावा कर रहा है, वे सरकारी हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की राजस्व विभाग ने संयुक्त संसदीय समिति को बताया कि वक्फ बोर्ड जिन जमीनों पर अपना दावा कर रहा है, उनमें से एक बड़ा हिस्सा राजस्व रिकॉर्ड में वर्ग 5 और वर्ग 6 के तहत दर्ज है। वर्ग 5 और 6 में सरकारी संपत्तियाँ और ग्राम सभा की संपत्तियाँ शामिल हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश में वक्फ बोर्ड 1.3 लाख से अधिक संपत्तियों पर दावा कर रहा है।

इन संपत्तियों में ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित) स्मारक, बलरामपुर का सरकारी अस्पताल, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की जमीनें सहित कई सरकारी संपत्तियाँ हैं। LDA और आवास विकास विभाग की जिन संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड दावा कर रहा है, उन्हें संबंधित नगरपालिकाओं से आधिकारिक तौर पर संबंधित विभागों को आवंटित की गई थीं।

यूपी सरकार ने JPC को बताया कि राज्य में वक्फ संपत्तियों को चिह्नित करने के लिए दिशा-निर्देश और नियम हैं। जब वक्फ बोर्ड किसी भूमि पर दावा करता है तो उस भूमि का 1952 के अभिलेखों से मिलान किया जाता है। मिलान में भूमि वक्फ बोर्ड के स्वामित्व की पाई जाती है तो वह सरकार से उस भूमि पर अतिक्रमण हटाने का अनुरोध कर सकता है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से यह भी कहा कि लखनऊ के प्रसिद्ध स्मारक बड़ा इमामबाड़ा, छोटा इमामबाड़ा और अयोध्या में बेगम का मकबरा सरकारी संपत्ति हैं, लेकिन वक्फ बोर्ड गलत तरीके से इन संरक्षित स्मारकों के स्वामित्व का दावा कर रहा है। वक्फ बोर्ड ने जिन संपत्तियों पर अपना अधिकार जताया है, उनमें और भी कई नामी-गिरामी संपत्तियाँ हैं।

सांसद जगदंबिका पाल ने बताया कि JPC अगले संसद सत्र में 31 जनवरी को अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। उन्होंने कहा, “JPC पिछले 6 महीने से पूरे देश में लगातार बैठक कर रही है। मुझे पूरा भरोसा है कि हम सब एकमत होकर अपनी रिपोर्ट पेश करेंगे। पिछली बार हमें इसे शीतकालीन सत्र में पेश करना था। हम इस रिपोर्ट को बजट सत्र में पेश करने जा रहे हैं।”

बता दें कि संसद का बजट सत्र 31 जनवरी 2025 से शुरू होकर 4 अप्रैल 2025 तक चलेगा। इस सत्र में केंद्रीय बजट 1 फरवरी 2025 को पेश किया जाएगा। वहीं, वक्फ संपत्तियों को विनियमित करने के लिए 1995 में बनाए गए वक्फ अधिनियम की कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार और अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर अंकुश लगाने के लिए मोदी सरकार तैयारी कर रही है।

अब्देल अजीज कद्दी ने इजरायल में किया आतंकी हमला, 4 को मारा चाकू: सुरक्षाकर्मियों ने मार गिराया, मोरक्को का नागरिक था इस्लामी आतंकी

इजरायल के बड़े शहर तेल अवीव में मंगलवार (21 जनवरी, 2025) की शाम एक इस्लामी आतंकी ने हमला कर दिया। उसने चाकू से कई लोगों पर वार किया। इस हमले में 4 लोग घायल हुए हैं। सुरक्षाबलों ने आतंकी को मौके पर ही मार गिराया। हमलावर कुछ ही दिन पहले इजरायल के भीतर घुसा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह हमला तेल अवीव के भीड़भाड़ वाले इलाके में हुआ। चाकू से किए गए इस हमले में तीन युवक जबकि एक अधेड़ घायल हुए हैं। इनमें से 2 को ज्यादा चोटें नहीं आई हैं लेकिन 2 की हालत गंभीर है। घायलों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। हमले में इस्तेमाल चाकू भी बरामद हो गया है।

हमलावर को सुरक्षा एजेंसियों ने घटना के कुछ ही मिनट के भीतर मार गिराया था। हमलवार की पहचान अब्देल अजीज कद्दी के तौर पर की गई है। 31 वर्षीय कद्दी मोरक्को का निवासी था। उसके पास से मोरक्को का पहचान पत्र भी मिला है। कद्दी के पास अमेरिकी ग्रीन कार्ड भी था।

कद्दी 18 जनवरी, 2025 को ही इजरायल में आया था। उसने इजरायल के भीतर घुसने के लिए टूरिस्ट वीजा का इस्तेमाल किया था। इजरायल के गृह मंत्री ने बताया है कि एयरपोर्ट पर तैनात अधिकारियों ने उसे देश के भीतर एंट्री देने से मना किया था और सुरक्षा एजेंसियों को सौंप दिया था।

सुरक्षा एजेंसियों ने पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया। कुछ ही दिनों के भीतर उसने यह हमला कर दिया। गृह मंत्री ने सुरक्षा एजेंसी शिन बेत को इस संबंध में जाँच करने के आदेश दिए हैं। हमलावर ने किस उद्देश्य से यह हमला किया, यह साफ़ नहीं हो पाया है।

हमलावर के किसी आतंकी संगठन से जुड़े होने की बात भी अभी सामने नहीं आई है। इस हमले को अभी लोन वुल्फ अटैक माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों ने बताया है कि उसकी पृष्ठभूमि में ऐसी कोई जानकारी नहीं थी, जो उसे इजरायल में प्रवेश देने से रोकती।

पुलिस घटनास्थल के आसपास दूसरे हमलावरों की आशंका को लेकर जाँच कर रही है। इससे पहले भी हाल ही में तेल अवीव में एक चाकूबाकी की घटना हुई थी। इसे भी आतंकी हमला ही बताया गया था। इस हमले में एक व्यक्ति घायल हुआ था।

कोविड में जिस केरल मॉडल का ‘लिबरल’ करते थे बखान, उसका CAG ने किया भंडाफोड़: 300% महँगी खरीदी गई PPE किट, खास कंपनी को पहुँचाया गया फायदा

कोरोना महामारी के दौरान पूरे देश में केरल सरकार के ‘केरल मॉडल’ की खूब तारीफ की गई। केरल की तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की कार्यशैली को ‘लिबरल गैंग’ ने आदर्श माना। लेकिन अब नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने पिनराई विजयन सरकार के कोविड प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि महामारी के दौरान पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) किट की खरीदारी में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुईं और एक खास कंपनी को फायदा पहुँचाया गया।

CAG की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2020 में सरकार ने केरल मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KMSCL) को PPE किट और अन्य स्वास्थ्य उपकरण खरीदने की विशेष अनुमति दी थी। सरकार ने उस समय PPE किट की अधिकतम दर ₹545 प्रति किट निर्धारित की थी, ताकि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। इसके बावजूद केरल में PPE किट को ₹1,550 प्रति किट की ऊँची दर पर खरीदा गया। यह दर सरकारी सीमा से लगभग 300% अधिक थी।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस खरीद प्रक्रिया में सन फार्मा (San Farma) नाम की कंपनी को विशेष लाभ दिया गया। इस कंपनी को 100% भुगतान एडवांस में दिया गया, जबकि अन्य कंपनियों ने कम दर पर किट देने की पेशकश की थी। CAG ने इस प्रक्रिया को गलत ठहराते हुए कहा कि इससे राज्य को ₹10.23 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ा।

रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च और अप्रैल 2020 के बीच ऊँची कीमत पर की गई खरीदारी ने राज्य के संसाधनों पर अनावश्यक दबाव डाला। जहाँ लाखों किट सस्ती दरों पर खरीदी जा सकती थीं, लेकिन महँगे दामों पर 15,000 किट की खरीदी गई। इसके अलावा राज्य में दवाइयों, मेडिकल सामानों का भारी अभाव रहा। केरल में डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की कमी भी रही। सीएजी रिपोर्ट में साफ है कि सस्ते दाम पर पीपीई किट देने वाली कंपनियों को कम ऑर्डर दिया गया, जबकि महँगा पीपीई देने वाली कंपनी को एडवाँस में ज्यादा पैसों का भुगतान किया गया और ऑर्डर भी बड़ा दिया गया।

इस खुलासे के बाद विपक्ष ने सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सरकार पर हमला बोला है। कॉन्ग्रेस के नेता वी.डी. सतीशन ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “कोविड महामारी को लोगों की जान बचाने के बजाय सरकार ने अपनी जेबें भरने का अवसर बना लिया।” उन्होंने यह भी कहा कि यह भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की जानकारी में हुआ।

केके शैलजा ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने CAG रिपोर्ट अभी तक नहीं पढ़ी है, लेकिन उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए PPE किट की खरीदारी जरूरी थी। उन्होंने कहा कि “महामारी के दौरान PPE किट की भारी कमी थी। कुछ किट महँगे दाम पर खरीदने पड़े, लेकिन लाखों किट सस्ते दामों पर खरीदी गईं।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि जब यह मामला विधानसभा में उठाया गया था, तब इसका स्पष्ट उत्तर दिया गया था। उन्होंने कहा, “सिर्फ 15,000 किट ऊँची कीमत पर खरीदी गई थीं, और यह उस समय की परिस्थितियों की वजह से हुआ। विपक्ष इस मुद्दे को बार-बार उठाकर लोगों को गुमराह कर रहा है।”

CAG रिपोर्ट ने राज्य के कोविड प्रबंधन के दौरान हुए वित्तीय दुरुपयोग को उजागर करते हुए इसे ‘गैर-जरूरी खर्च’ बताया है। रिपोर्ट ने संकेत दिया कि खरीदारी के दौरान पारदर्शिता की कमी थी और कुछ कंपनियों को गलत तरीके से लाभ दिया गया।

इस बीच, राज्य सरकार ने CAG रिपोर्ट पर विस्तार से जवाब देने की बात कही है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा है कि “रिपोर्ट का गहन अध्ययन किया जाएगा, और जरूरत पड़ी तो सरकार उचित जवाब देगी।” वहीं, विपक्ष ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाने की योजना बनाई है और इसे विधानसभा में फिर से उठाने का इरादा जाहिर किया है। फिरलहाल, CAG रिपोर्ट के इस खुलासे ने न केवल केरल सरकार के कोविड प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन प्रशंसाओं और पुरस्कारों पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है जो महामारी के दौरान राज्य सरकार को मिले थे।

आपराधिक मामलों की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट में नियुक्त हो सकते हैं ‘ठेके’ पर जज, सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों का पहाड़ घटाने को की पहल: 62 लाख मामले हैं लंबित

देश के अलग-अलग हाई कोर्ट में बढ़ते मुकदमों के पहाड़ को कम करने के लिए अस्थायी तौर पर जजों की नियुक्ति की जा सकती है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है। यह जज ‘एड हॉक’ आधार पर लाए जाएँगे। सुप्रीम कोर्ट ने कई हाई कोर्ट में जजों के खाली पदों को लेकर चिंता जताई है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मंगलवार (22 जनवरी, 2025) को सुनवाई करते हुए अस्थायी जजों की नियुक्ति पर टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अस्थायी जज, हाई कोर्ट के एक स्थायी जज के साथ बेंच में शामिल हो कर आपराधिक मामले की अपीलों को निपटा सकते हैं। हालाँकि, यह बाकी किसी तरह का मामला नहीं सुनेंगे।

बढ़ते केस चिंता का विषय

CJI संजीव खन्ना, जस्टिस BR गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट में आपराधिक मामले बहुत बढ़ गए हैं। बेंच ने कहा कि ऐसे में हाई कोर्ट में अस्थायी तौर जजों की नियुक्ति का रास्ता जल्द साफ़ किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में हाई कोर्ट में अस्थायी जजों की नियुक्ति को लेकर फैसला दिया था।

इसके बाद ऐसी नियुक्तियों के लिए नियम बनाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इन नियमों में कुछ संशोधन की जरूरत है। अभी तक के नियमों के अनुसार, अगर किसी हाई कोर्ट में 20% पद खाली हैं, तभी इन अस्थायी जजों की नियुक्ति की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट इन नियमों में बदलाव चाहता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति को गंभीरता को बताने के लिए कई हाई कोर्ट में लटके आपराधिक मामलों का डाटा भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में 63 हजार जबकि कर्नाटक हाई कोर्ट में 20 हजार ऐसे मामले लटके हैं। पटना हाई कोर्ट और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में भी कमोबेश यही स्थिति है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल R वेंकटरमणी से इस मामले में सहयोग करने को कहा है। उसने कहा, “हम चाहते हैं कि सभी वकील और अटॉर्नी जनरल इस बात पर विचार करें कि क्या हाई कोर्ट की खंडपीठों में लटके आपराधिक मामलों के निपटान के लिए एड हॉक जजों की नियुक्ति की जा सकती है।”

गौरतलब है कि एड हॉक नियुक्क्तियों को भारत में ‘ठेके वाली भर्तियाँ’ भी कहा जाता है।

2021 में दिया था अस्थायी जजों पर फैसला

हाई कोर्ट के भीतर मामलों के तेज निपटान के लिए एड हॉक जजों की नियुक्ति को लेकर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 224A का हवाला देते हुए फैसला दिया था। इस अनुच्छेद में एड हॉक जजों की नियुक्ति के बारे में लिखा हुआ है।

अनुच्छेद 224A के अनुसार “किसी भी राज्य के हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस किसी भी समय, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी भी व्यक्ति से, जो उस कोर्ट या किसी दूसरे हाई कोर्ट के जज का पद धारण कर चुका है, उस राज्य के हाई कोर्ट के जज के रूप में बैठने और काम करने का अनुरोध कर सकता है।”

कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर एड हॉक जजों की बहाली को लेकर फैसला होता है, तो हाई कोर्ट से रिटायर हो चुके जज ही वापस लाए जाएँगे। इन्हें 1 वर्ष तक के लिए नियुक्त किया जा सकता है। इस पर अभी बाकी नियम बनना बाक़ी है।

62 लाख मुकदमे लटके

देश के अलग-अलग हाई कोर्ट में लंबित मुकदमों का पहाड़ खड़ा हो चुका है। लंबित मामलों की जानकारी देने वाले पोर्टल नेशनल जुडिशियल डाटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार वर्तमान में देश के 25 हाई कोर्ट में 62 लाख से अधिक मुकदमे लंबित पड़े हैं। इनमें से 18 लाख से अधिक आपराधिक मामले हैं।

अकेले इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने ही 5.47 लाख आपराधिक मामले में लंबित हैं। इनमें से 4.5 लाख मामले 1 साल से ज्यादा लम्बे समय से लटके हैं। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 1.9 लाख आपराधिक मुकदमे लटके हुए हैं। वहीं पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में भी 1.6 लाख से ज्यादा आपराधिक मुकदमे लटके हुए हैं।

ब्राह्मण होना गर्व की बात, उनका ड्राफ्ट नहीं होता तो संविधान बनने में लगते 25 और साल: जानिए कर्नाटक हाई कोर्ट के जजों ने क्यों बताया ‘वर्ण का प्रतीक’, कहा- इनके लिए आयोजन होते रहने चाहिए

कर्नाटक हाई कोर्ट के दो जजों ने एक ब्राह्मण संगठन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने यहाँ ब्राह्मणों के समाज में योगदान की प्रशंसा की और साथ ही ब्राह्मण होना गर्व की बात कहा। उन्होंने ब्राह्मणों की एकता पर काम करने वाले और भी कार्यक्रम आयोजित किए जाने की वकालत की है।

राजधानी बेंगलुरु में ‘विश्वामित्र’ के नाम से 18-19 जनवरी, 2025 को आयोजित किए गए इस कार्यक्रम कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस वेदव्यासाचार्य श्रीशानंद और जस्टिस कृष्णा दीक्षित ने हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम अखिल कर्नाटक ब्राह्मण महासभा ने आयोजित किया था।

इस कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस दीक्षित ने कहा कि ब्राह्मण शब्द जाति का नहीं बल्कि वर्ण का द्योतक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वेद को चार हिस्सों में बदलने वाले वेदव्यास एक मछुआरे के पुत्र थे और रामायण लिखने वाले वाल्मीकि SC या संभवतः ST थे लेकिन ब्राह्मणों ने हमेशा उनका सम्मान किया है।

जस्टिस दीक्षित ने संविधान निर्माण में भी ब्राह्मणों के महत्वपूर्ण योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “सात सदस्यों वाली ड्राफ्ट कमिटी में तीन ब्राह्मण थे, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, गोपालस्वामी अयंगर और BN राव… डॉ BR अंबेडकर ने भंडारकर संस्थान में कहा था कि अगर BN राव ने संविधान का ड्राफ्ट नहीं बनाया होता, तो इसे तैयार होने में 25 साल और लगते।”

जस्टिस दीक्षित ने कहा कि जब हम ब्राह्मण कहते हैं तो यह गर्व की बात होती है। उन्होंने कहा, “क्यों? क्योंकि उन्होंने (ब्राह्मणों ने) संसार को द्वैत, अद्वैत, विशिष्ट अद्वैत और सुधाअद्वैत जैसे कई सिद्धांत दिए। यह वह समुदाय है जिसने दुनिया को ‘बसाव’ महान दार्शनिक व्यक्तित्व दिए।”

वहीं जस्टिस श्रीशानंद ने इस बात पर जोर दिया कि ब्राह्मणों में एकता लाने वाले कार्यक्रम किए जाते रहने चाहिए। उन्होंने कहा, “कई लोग पूछते हैं कि जब लोग खाने या शिक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो ऐसे बड़े आयोजनों की क्या ज़रूरत है। लेकिन यह आयोजन समुदाय को एक साथ लाने और उसके मुद्दों पर चर्चा करने के लिए ज़रूरी हैं। ऐसे आयोजन आखिर क्यों नहीं होने चाहिए?”

जस्टिस श्रीशानंद ने बताया कि जज बनने से पहले वह कई संस्थाओं से जुड़े हुए थे लेकिन अब उनसे दूर हैं।

ताहिर हुसैन को क्यों नहीं मिलनी चाहिए जमानत: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अमानुल्लाह का सवाल, चुनाव प्रचार के लिए जेल से बाहर आना चाहता है दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का ‘मास्टरमाइंड’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (21 जनवरी 2025) को दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के आरोपित और विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम उम्मीदवार ताहिर हुसैन की अंतरिम जमानत याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार के लिए दायर की गई थी। सुनवाई के दौरान जजों के बीच मामले को लेकर गहरी चर्चा हुई। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ ने दिल्ली पुलिस से यह स्पष्ट करने को कहा कि ताहिर हुसैन को अंतरिम या नियमित जमानत क्यों न दी जाए।

बता दें कि ताहिर हुसैन पर 2020 के दिल्ली दंगों में शामिल होने और आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या का गंभीर आरोप है। वह इस मामले में चार साल और दस महीने से जेल में है। इससे पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज करते हुए सिर्फ नामांकन के लिए कस्टडी पेरोल दी थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि ताहिर हुसैन के खिलाफ 11 मामले दर्ज हैं, जिनमें से 9 मामलों में उसे जमानत मिल चुकी है। लेकिन दो मामलों में वह अभी भी जेल में हैं, जिनमें से एक मनी लॉन्ड्रिंग और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या का मामला है। जस्टिस मित्तल ने टिप्पणी की थी, “जेल में रहते हुए चुनाव लड़ना आसान हो गया है। लेकिन ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना चाहिए।” उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल से यह भी पूछा कि ताहिर हुसैन सिर्फ अंतरिम जमानत की माँग क्यों कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “चुनाव ही जीवन में सबकुछ नहीं है। अगर जमानत लेनी है तो नियमित जमानत के लिए आवेदन करें।”

दूसरी ओर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने मामले पर अलग नजरिया रखा। उन्होंने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि जब ताहिर हुसैन को अन्य 9 मामलों में जमानत दी जा चुकी है, तो इस मामले में उन्हें जमानत क्यों नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा, “अगर अन्य मामलों में वही आरोप हैं और उनमें जमानत मिल चुकी है, तो इस मामले में क्या अलग है? अगर वह मुख्य आरोपित नहीं हैं बल्कि सिर्फ उकसाने का आरोप है, तो पाँच साल से अधिक समय तक जेल में रखने का औचित्य क्या है?”

वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने अपनी दलील में कहा कि ताहिर हुसैन ने चार साल और दस महीने जेल में बिताए हैं। उन्होंने कहा कि हुसैन पर सिर्फ यह आरोप है कि उन्होंने भीड़ को उकसाया। मुख्य आरोपितों को नियमित जमानत दी जा चुकी है। अग्रवाल ने यह भी कहा कि ताहिर हुसैन ने दंगों के समय मदद के लिए कई पीसीआर कॉल किए थे।

सुनवाई के दौरान, जस्टिस मित्तल ने हाई कोर्ट के आदेश में कुछ तथ्यों को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि हुसैन को हाई कोर्ट से आदेश में गलती सुधारने के लिए अर्जी देनी चाहिए थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत फिलहाल अंतरिम जमानत देने के पक्ष में नहीं है।

जस्टिस अमानुल्लाह ने ताहिर हुसैन की जमानत याचिका को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, “हम मामले की मेरिट पर विचार कर रहे हैं। अगर हमें लगे कि नियमित जमानत का आधार है, तो अंतरिम जमानत क्यों न दी जाए? पाँच साल से अधिक समय से वह जेल में हैं, और जिन मामलों में आरोप समान हैं, उनमें जमानत मिल चुकी है।”

दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता राजत नायर ने अदालत से समय माँगा ताकि वह मामले पर अपनी दलीलें प्रस्तुत कर सकें। इस पर अदालत ने मामले की सुनवाई बुधवार तक स्थगित कर दी।

गौरतलब है कि ताहिर हुसैन पर 2020 के दिल्ली दंगों का मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप है। वो उस समय आम आदमी पार्टी में था और पार्षद था। उसके खिलाफ आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या सहित कई गंभीर आरोप हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले उसे चुनाव के लिए नामांकन भरने के लिए कस्टडी पैरोल दी थी, लेकिन जमानत देने से इनकार कर दिया था। अब हुसैन चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत माँग रहा है।

सैफ अली खान को अस्पताल से मिली छुट्टी, पर 15 हजार करोड़ की फैमिली प्रॉपर्टी ले सकती है MP सरकार: जानिए क्यों आई ये नौबत

बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान पर 16 जनवरी 2025 की रात चाकू से हमला हुआ था, जिसके बाद से वो मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती थे। अब 5 दिन बाद मंगलवार (21 जनवरी 2025) को उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई है। उन्हें अस्पताल से भले ही छुट्टी मिल गई हो, लेकिन उनके सामने एक और मुसीबत खड़ी हो गई है। दरअसल, जबलपुर से लेकर भोपाल तक की 15 हजार करोड़ रुपये की खानदानी संपत्ति खतरे में पड़ गई है, जिसपर सरकार कब्जा कर सकती है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैफ अली खान की यह संपत्ति भोपाल में स्थित है। यह विवाद काफी पुराना है और 1960 के दशक से चला आ रहा है। सैफ के दादा नवाब हमीदुल्ला खान की मौत के बाद उनकी संपत्ति पर कानूनी विवाद शुरू हुआ। नवाब की बेटी आबिदा सुल्तान को इस संपत्ति का असली वारिस माना गया था, लेकिन वे पाकिस्तान चली गई थीं। इसके बाद भारत सरकार ने इस संपत्ति को दुश्मन संपत्ति (एनिमी प्रॉपर्टी) घोषित कर दिया और उनकी दूसरी बेटी साबिया सुल्तान को इसका उत्तराधिकारी माना।

सैफ अली खान और उनके परिवार ने 2014 में इस संपत्ति को दुश्मन संपत्ति घोषित किए जाने के खिलाफ अदालत में चुनौती दी थी। उनका कहना था कि यह संपत्ति दुश्मन संपत्ति नहीं है और इसे गलत तरीके से अधिग्रहण करने की कोशिश की जा रही है। 2015 में इस मामले में अदालत ने संपत्ति पर रोक लगा दी थी, जिससे सरकार इसे अपने कब्जे में नहीं ले सकी। हालाँकि, दिसंबर 2024 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने सैफ अली खान, उनकी माँ शर्मिला टैगोर और उनकी बहनों सोहा अली खान और सबा अली खान की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने उन्हें 30 दिनों के भीतर अपीलीय प्राधिकरण में अपील करने का विकल्प दिया था।

अब यह समय सीमा समाप्त हो चुकी है। सैफ अली खान और उनके परिवार ने अपील दायर नहीं की, जिसके चलते हाई कोर्ट की ओर से संपत्ति पर लगी रोक (स्टे ऑर्डर) अब निष्प्रभावी हो चुका है। जिसके बाद से भोपाल जिला प्रशासन के लिए इन संपत्तियों को अपने अधिकार में लेने का रास्ता साफ हो गया है।

बता दें कि भोपाल की यह संपत्ति करीब 100 एकड़ में फैली है। इसमें कोहेफिज़ा और चिकलोड इलाके की जमीन शामिल है, जहाँ लगभग 1.5 लाख लोग रहते हैं। संपत्ति में पटौदी परिवार का एक ऐतिहासिक घर भी शामिल है, जिसे ‘पटौदी फ्लैग हाउस’ कहा जाता है। इस संपत्ति की अकेले कीमत 1000 करोड़ रुपये बताई जाती है। सरकार ने इस संपत्ति को दुश्मन संपत्ति अधिनियम, 1968 के तहत अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। कोर्ट के हालिया फैसले के बाद जिला प्रशासन इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा सकता है।

हालाँकि सैफ अली खान और उनके परिवार के पास अब भी एक आखिरी मौका है। वे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील कर सकते हैं। अगर वहाँ से फैसला उनके पक्ष में आता है, तो उनकी संपत्ति पर से संकट हट सकता है।

गौरतलब है कि 16 जनवरी 2025 को सैफ अली खान पर हुए हमले ने पहले ही उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से झकझोर दिया था। ऐसे में सैफ अली खान के लिए यह समय कई चुनौतियों से भरा हुआ है। एक तरफ वह अपने स्वास्थ्य को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनकी खानदानी संपत्ति पर खतरा मंडरा रहा है। अब देखना होगा कि वे इस संपत्ति को बचाने के लिए कानूनी लड़ाई में क्या कदम उठाते हैं।

क्या एनसन फंड के फाउंडर की बीवी के साथ TMC सांसद महुआ मोइत्रा का है लिंक? हिंडनबर्ग के साथ मिलकर शॉर्ट सेलिंग का चलाया अभियान, अमेरिका में चल रही जाँच

हेज फंड कम्पनी एनसन फंड्स और हिंडनबर्ग रिसर्च के फाउंडर नाथन एंडरसन पर शेयर बाजार में गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। अब उनके खिलाफ अमेरिकी एजेंसियाँ जाँच कर रही है। इस मामले में सामने आए कोर्ट के कागजों से खुलासा हुआ है कि एंडरसन ने एनसन फंड्स के साथ मिलकर शॉर्ट सेलिंग का एक पूरा अभियान चलाया और मोटा पैसा कमाया।

यह सब मिलीभगत से किया गया। यह भी सामने आया है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में दिए जाने वाले तथ्य एनसन ने दिए। हिंडनबर्ग लगातार दावा करती रहती थी कि उसकी रिपोर्ट एकदम स्वतंत्र है और इसमें कोई भी बाहरी एजेंसी दखल नहीं देती है। जबकि जाँच में पता चला कि हिंडनबर्ग को एनसन बता रही थी कि उसे अपनी रिपोर्ट में क्या लिखना है।

अमेरिका की सिक्यूरिटी एक्सचेंज एजेंसी (SEC) समेत कई और एजेंसियाँ अब इन दोनों के गठजोड़ की जाँच कर रहे हैं। इस मामले में आगे दोनों कम्पनियों पर मुकदमा भी चल सकता है। इस मामले में TMC सांसद महुआ मोइत्रा का एंगल भी सामने आ रहा है।

कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि सांसद महुआ मोइत्रा और एनसन फंड्स के सह-संस्थापक मोएज कासम की पत्नी मारिसा सीगल कासम के बीच कनेक्शन हो सकते हैं। कयास है कि दोनों की अच्छी पहचान हो सकती हैं क्योंकि यह दोनों ही जेपी मॉर्गन के लिए काम कर चुकी हैं।

राजनीति में आने से पहले मोइत्रा ने लगभग 12 साल तक जेपी VP के रूप में काम किया था तो वहीं मारिसा ने लंदन, हांगकांग और न्यूयॉर्क में जेपी मॉर्गन में विभिन्न पदों पर काम किया। इस पैटर्न के सामने आने के बाद अडानी समूह पर लगाए गए आरोपों को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं।

गौरतलब है ऑपइंडिया ने बताया था कि महुआ मोइत्रा ने लगातार अडानी समूह के खिलाफ संसद में प्रश्न पूछे थे। आरोप था कि यह प्रश्न महुआ मोइत्रा ने कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से गिफ्ट और बाकी फायदे लेकर पूछे थे। प्रश्न भी इस तरीके के थे जिनसे हीरानंदानी को कारोबारी फायदा पहुँचे।

एनसन फंड्स के खिलाफ यह आरोप भी है कि उसने शेयरों के भाव में गड़बड़ी की और मुनाफा कमाया। इसके लिए पहले स्टॉक के जानबूझकर दाम गिराए गए और बड़ा पैसा बनाया। अदालत में दायर किए गए कागजों में भी यह बताया गया है।

इन सब जाँच के बीच अगर यह साबित हो जाता है कि मोइत्रा के मारिसा कासम एनसन फंड्स के सह-संस्थापक के साथ रिश्ते हैं, तो मामले में और भी कई कड़ियाँ जुड़ जाएँगी। गौरतलब है कि हाल ही में हिंडनबर्ग को इसके संस्थापक एंडरसन ने बंद कर दिया था।

महुआ मोइत्रा ने अडानी समूह को बनाया था निशाना

अक्टूबर 2023 में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने तृणमूल TMC महुआ मोइत्रा पर व्यवसायी दर्शन हीरानंदानी से नकद और गिफ्ट लेने का आरोप लगाया था। आरोप था कि इसके बदले में महुआ मोइत्रा ने अडानी समूह को लेकर संसद में प्रश्न पूछे।

इस रिपोर्ट में लोकसभा के भीतर मोइत्रा द्वारा पूछे गए प्रश्नों की जानकारी दी गई थी। महुआ ने पारादीप पोर्ट और अडानी समूह को निशाना बनाया था। इन प्रश्नों से हीरानंदानी को कथित तौर पर फायदा होना था। यह प्रश्न बंदरगाह समझौतों, टेलिकॉम सेवाओं और गैस के प्रोजेक्ट को लेकर थे।

यह भी आरोप था कि महुआ के प्रश्नों से अडानी से मुकाबले में हीरानंदानी का पक्ष लिया गया। मोइत्रा ने बाद में कुछ भी गलत करने से इनकार किया था। हालाँकि, ऑपइंडिया की रिपोर्ट के बाद उनके खिलाफ जाँच तेज हो गई थी। यह जाँच उनके प्रश्नों और हीरानंदानी के व्यापारिक हितों से सम्बन्धित थी।

अब जबकि एनसन फंड्स के सह संस्थापक की पत्नी के साथ उनके संबंध तलाशे जा रहे हैं, तब उनके अडानी समूह पर प्रश्न पूछने के पीछे के उद्देश्य पर भी सवाल उठ रहे हैं।

चेतावनी: ऑपइंडिया ने किसी भी तरह से महुआ मोइत्रा और मारिसा सीगल कासम के बीच संबंधों की पुष्टि नहीं की है। ऊपर दी गई जानकारी उपलब्ध समाचार रिपोर्टों , मारिसा सीगल कासम और महुआ मोइत्रा के प्रोफाइल पर आधारित कयास हैं।

जहाँ मुरुगन मंदिर, वहीं जानवरों की कुर्बानी देने वाले थे मुस्लिम: हिंदुओं के विरोध के बाद पवित्र पहाड़ी के इस्लामीकरण की कोशिश विफल, प्रतिबंधित PFI के राजनीतिक विंग SDPI की थी साजिश

तमिलनाडु के थिरुपरनकुंद्रम जिले में पवित्र मदुरै पहाड़ी पर मुस्लिमों ने शनिवार (18 जनवरी 2025) पशुओं की कुर्बानी देने की कोशिश की, जिसे पुलिस ने विफल कर दिया। पुलिस ने हिंदू संगठनों की शिकायत के बाद कुर्बानी देने से रोका। मदुरै पहाड़ी पर पशुओं की कुर्बानी बैन आतंकी संगठन पीएफआई के पॉलिटिकल विंग एसडीपीआई के लोग देने वाले थे। बता दें कि पीएफआई यानी पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को बैन करने के बाद इससे जुड़े लोगों ने सोशल डेमोक्रेटिकल पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) बनाई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एसडीपीआई के सदस्यों द्वारा पवित्र मंदिर क्षेत्र में स्थित एक दरगाह पर कुर्बानी देने की प्लानिंग की गई थी। इसके बारे में इंदु मक्कल कच्ची (IMK) के मदुरै जिलाध्यक्ष सोलैकन्नन ने कमिश्नर लोगनाथन को सूचना दी थी और लिखित में कुर्बानी रोकने की माँग की थी। इस पवित्र पहाड़ी पर मुरुगन मंदिर स्थित है, तो मुस्लिमों के लिए कथित सिकंदर बादुशाह (बादशाह) की मजार भी है। इसी मजार पर बकरों और मुर्गियों की बलि देने की तैयारी की जा रही थी।

कमिश्नर को दी गई अपनी शिकायत में सोलैकनन ने लिखा, “मदुरै में थिरुपरनकुंद्रम सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर पहाड़ी एक प्राचीन स्थल है और हिंदुओं के लिए इसका बहुत धार्मिक महत्व है। यहाँ का हिंदू समुदाय हर पूर्णिमा पर पहाड़ी की पूजा और गिरिवलम (परिक्रमा) करता रहा है।” ऐसे में यहाँ कुर्बानी जैसी चीजें रोकी जाए।

हालाँकि तुरंत ही सक्रिय हुई पुलिस ने इस्लामिक समूह को बकरों और मुर्गियों की कुर्बानी देने से रोक दिया। पुलिस ने कहा कि इस मजार पर सिर्फ नमाज या दुआ पढ़ी जा सकती है, कुर्बानी नहीं दी जा सकती।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते सप्ताह इस्लामी संगठनों से जुड़े लोगों ने राजस्व अधिकारियों और जिला प्रशासन से मुलाकात की थी और सिकंदर बादुशाह दरगाह पर कुर्बानी की अनुमति माँगी थी, लेकिन मदुरै जिला प्रशासन ने दरगाह पर सिर्फ नमाज़ अदा करने की अनुमति दी।

दरअसल, इस्लामी संगठनों की कोशिश का हिंदू विरोध कर रहे हैं। हिंदुओं का कहना है कि मदुरै पहाड़ी पर स्थित मंदिर भगवान मुरुगन के 6 पवित्र निवासों में से एक है। ऐसे में यहाँ कुर्बानी नहीं दे सकते। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम लोग इस मंदिर को अपवित्र कर इस्लामी स्वरूप देना चाहते हैं।

इस मामले में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई का भी बयान आया है। उन्होंने एक्स पर लिख कि कुछ लोग थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी को सिकंदर मलाई (पहाड़ी) कह रहे हैं। भाजपा नेता ने सत्तारूढ़ डीएमके पर मुस्लिम तुष्टिकरण में लिप्त होने का आरोप लगाया। उन्होंने धार्मिक मान्यताओं की परवाह किए बिना थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर शांति बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया।

कब से शुरू हुआ ताजा विवाद?

इस मामले में ताजा विवाद 27 दिसंबर 2024 को शुरू हुआ, जब कुछ मुस्लिमों ने थिरुपरनकुंड्रम मुरुगम मंदिर पहाड़ियों पर स्थिति दरगाह परिसर में कुर्बानी के लिए बकरे और मुर्गियाँ ले जाते की कोशिश की। इस मामले में तमिलनाडु पुलिस ने मलैयाडीपट्टी निवासी सैयद अबू दाहिर और उसके परिवार को पहाड़ी के नीचे ही रोक लिया, जिसके बाद 20 से अधिक मुस्लिमों ने प्रदर्शन भी किया था।

इसके बाद इस महीने की शुरुआत में सिकंदर मस्जिद समिति और ऐय्यकिया कूटामाइप्पू जमात के 100 से ज़्यादा सदस्यों को मस्जिद खोलने और वहाँ नमाज़ पढ़ने की अनुमति माँगते हुए विरोध प्रदर्शन किया था, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में भी लिया था। प्रदर्शन कर रहे मुस्लिमों ने 5 जनवरी 2025 को दावा किया कि सुल्तान सिकंदर ने लगभग 400 साल पहले सिकंदर बादुशाह थोझुगई पल्लीवासल को बनवाया था।

थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी का ‘मालिकाना हक’ सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर के पास

थिरुपरनकुंद्रन पहाड़ी की चोटी पर काशी विश्वनाथ मंदिर, एक लैंप पोस्ट और एक पवित्र कल्लथी वृक्ष है। अंग्रेजी प्रशासन ने भी फैसला दिया था कि “थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी का मालिक सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर है।” अंग्रेजी ने कहा था कि पहाड़ी के आसपास स्थित जैन मंदिरों और शिलालेखों की सुरक्षा के लिए इस पूरे क्षेत्र को पुरातत्व विभाग के अधिकार क्षेत्र में रखा जाना चाहिए। लेकिन साल 2011 से इस्लामी संगठन SDPI थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर लैंप पोस्ट के पास झंडा लगाने का विरोध कर रहा है और अब पवित्र पहाड़ी पर कुर्बानी देने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में ये पवित्र पहाड़ी को इस्लामी मजहबी स्थल बनाने की कोशिश नहीं तो क्या है?

स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि स्थानीय मुस्लिमों ने समय के साथ पहाड़ी के कुछ हिस्सों पर अतिक्रमण कर लिया। तमिलनाडु सरकार भी इस मामले में तुष्टिकरण करती है।

बता दें कि एसडीपीआई प्रतिबंधित आतंकी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा है। इस संगठन से जुड़े लोग हिंदुओं के खिलाफ अपराधों में शामिल रहे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि PFI के लोग मुखौटा संगठनों की आड़ में आतंकी वारदातों में शामिल रहे हैं। यही वजह है कि गृह मंत्रालय ने पीएफआई पर बैन लगाया हुआ है।

महिला डॉक्टर के रेप-मर्डर को ‘सुसाइड’ साबित करने की कोशिश, संजय रॉय को ‘VIP ट्रीटमेंट’: अदालत ने बंगाल पुलिस को किया नंगा, पीड़ित पिता बोले- अब कुछ न करें ममता बनर्जी

कोलकाता में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टर के साथ हुए रेप और हत्या मामले में अभियुक्त संजय रॉय को फाँसी की जगह उम्रकैद की सजा दी गई है। इस फैसले पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यदि इस मामले की जाँच सीबीआई के बजाय राज्य पुलिस ने की होती, तो दोषी को फाँसी की सजा मिल सकती थी। इस मामले में अब ममता सरकार ने हाई कोर्ट में अपील कर संजय रॉय के लिए फाँसी की सजा माँगी है।

हालाँकि इस केस में सियालदाह की कोर्ट ने दोषी संजय रॉय को सजा सुनाते समय बंगाल पुलिस की जाँच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पुलिस की कार्यशैली को ‘बेहद उदासीन’ करार दिया और कई गड़बड़ियों पर कड़ी आपत्ति जताई।

बंगाल पुलिस को लेकर कोर्ट ने क्या कहा? विस्तार से पढ़ें

जज अनिर्बाण दास ने फैसले में कहा कि ताला पुलिस स्टेशन ने इस मामले की शुरुआत से ही लापरवाह रवैया अपनाया। उन्होंने सब-इंस्पेक्टर सुब्रत चटर्जी की गवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने झूठे दस्तावेज तैयार किए और इसे अदालत में स्वीकार करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई। जज ने कहा, “यह पुलिस अधिकारियों की गंभीर लापरवाही को दिखाता है। मैंने पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर से इस तरह की गवाही की उम्मीद नहीं की थी। यह साबित करता है कि इस संवेदनशील मामले को कितनी लापरवाही से संभाला गया।”

जज अनिर्बाण दास ने सब-इंस्पेक्टर सुब्रत चटर्जी के गवाही में दिए गए बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने झूठे दस्तावेज तैयार किए। उन्होंने घटना के दिन का एक फर्जी जनरल डायरी (जीडी) एंट्री बनाया, जिसका समय सुबह 10:10 बजे का था। लेकिन यह साबित हुआ कि सुब्रत चटर्जी उस समय पुलिस स्टेशन में मौजूद ही नहीं थे।

कोर्ट ने कहा, “उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन यह नहीं बताया कि यह आदेश किसने दिया।” जज ने कहा कि मैं सब-इंस्पेक्टर सुब्रत चटर्जी के इस कृत्य की निंदा करता हूँ। कोर्ट ने कहा, “पीड़िता के परिवार को शिकायत दर्ज कराने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा।”

असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर अनुप दत्ता (Anup Dutta) को लेकर भी कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, “असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर अनुप दत्ता ने आरोपित के साथ नरमी बरती। यह काम बिल्कुल गलत था।” वहीं, इंस्पेक्टर रूपाली मुखर्जी (Rupali Mukherjee) को लेकर भी कोर्ट ने निराशा जताई। कोर्ट ने कहा, “इंस्पेक्टर रूपाली मुखर्जी द्वारा 9 अगस्त 2024 को आरोपित से मोबाइल फोन लेकर उसे ताला पुलिस स्टेशन में बिना निगरानी के छोड़ना भी बेहद संदिग्ध था। हालाँकि फोन से छेड़छाड़ नहीं हुई, लेकिन यह लापरवाही स्पष्ट रूप से एक गंभीर चूक है।”

कोर्ट ने कोलकाता पुलिस के आयुक्त से अपील की कि वे इस तरह की लापरवाही और अवैध कृत्यों को सख्ती से रोकें। उन्होंने सुझाव दिया कि पुलिस अधिकारियों को ऐसे मामलों में जाँच के लिए ट्रेनिंग देने की जरूरत है, खासकर जब मामला परिस्थितिजन्य, इलेक्ट्रॉनिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित हो।

कोर्ट ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने पीड़िता की मौत को आत्महत्या बताने की कोशिश की ताकि अस्पताल को किसी भी जिम्मेदारी से बचाया जा सके। जज ने कहा, “अस्पताल प्रशासन ने न केवल जाँच में देरी की, बल्कि पीड़िता के माता-पिता को भी उनकी बेटी को देखने से रोका। यह कर्तव्य से चूक और तथ्यों को छिपाने का प्रयास था।” कोर्ट ने साफ कहा कि अगर जूनियर डॉक्टर विरोध न करे, तो शायद मामला आगे बढ़ता ही नहीं।

हालाँकि जज ने कहा, “अपराध निर्मम और बर्बर था, यह मामला ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ की श्रेणी में नहीं आता। न्यायपालिका की प्राथमिक जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर कानून का पालन करना और न्याय सुनिश्चित करना है, न कि केवल जनभावनाओं से प्रभावित होना। हमें ‘आँख के बदले आँख’ जैसे पुराने विचारों से ऊपर उठकर मानवता को बुद्धिमत्ता, करुणा और न्याय की गहरी समझ के माध्यम से ऊँचा उठाना होगा।”

जज ने अपने फैसले में यह भी कहा कि पीड़िता के माता-पिता के असीम दुख और दर्द को कोई सजा कम नहीं कर सकती, लेकिन न्यायपालिका का कर्तव्य यह है कि वह कानून के दायरे में रहकर दोषियों को सजा दे। इस दौरान कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 17 लाख रुपए मुआवजा देने के आदेश दिए गए थे, लेकिन परिवार ने कहा कि उन्हें मुआवजा नहीं बल्कि न्याय चाहिए।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भड़के पीड़ित के पिता

सियालदाह कोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता के पिता ने कहा, “आदेश की कॉपी मिलने के बाद हम आगे का फैसला करेंगे। उन्हें (सीएम ममता बनर्जी) जल्दबाजी में कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। आज तक मुख्यमंत्री ने जो भी किया है, उन्हें आगे कुछ नहीं करना चाहिए।” यह कहते हुए कि उम्रकैद इसलिए दी गई, क्योंकि सीबीआई उचित सबूत नहीं दे सकी, पीड़िता के पिता ने कहा, “वह बहुत कुछ कह सकते हैं, लेकिन कहेंगे नहीं। तत्कालीन सीपी और अन्य लोगों ने सबूतों से छेड़छाड़ की, क्या ये सब उन्हें शुरुआत से नजर नहीं आया।”

बंगाल पुलिस पर शुरू से उठ रहे थे गंभीर सवाल

गौरतलब है कि 9 अगस्त 2024 की सुबह आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टर क्षत-विक्षत हालत में मिली। उस समय वो बेहोश थी। उसे तुरंत इलाज देना शुरू किया गया, लेकिन उसने दम तोड़ दिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न और हत्या की बात सामने आई। रिपोर्ट में कहा गया है, “उसकी दोनों आँखों और मुँह से खून बह रहा था, चेहरे और नाखून पर चोटें थीं। पीड़िता के निजी अंगों से भी खून बह रहा था। उसके पेट, बाएँ पैर…गर्दन, दाएँ हाथ और…होंठों पर भी चोटें थीं।” हालाँकि पुलिस ने पहले इसे आत्महत्या बताया था, लेकिन अर्धनग्न शरीर की हालत कुछ और ही बयाँ कर रही थी। जिसके बाद छात्रों ने जमकर हंगामा किया और फिर छात्रा के शव का पोस्टमार्टम किया गया।

इस मामले में पीड़ित के माता-पिता और परिजनों ने गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने बंगाल पुलिस पर मामले को दबाने, बेटी को उन्हें 3 घंटे तक न देखने देने जैसे आरोप लगाए। यही नहीं, आरजी कर प्रशासन पर भी उन्होंने मामले को दबाने के आरोप लगाए थे। इस मामले में कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने जाँच की, वहीं, पुलिस ने संजय रॉय को पकड़ा था और फिर उसे अब कोर्ट ने उम्रकैद की सजा दी है।