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ड्रग्स की गोली दो, फिर मेरे साथ कुछ भी करो… लड़कियों को सेक्स वर्कर बना रहा ‘उड़ता पंजाब’, अनाज मंडी में ‘धंधा’: हाई कोर्ट बोला- नशाखोरी दीमक की तरह खा रहा, क्या जागेगी AAP सरकार?

‘नशा मुक्ति अभियान’ लंबे समय से देश के कोने-कोने में चल रहा है लेकिन इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं है। पंजाब में AAP सरकार जोर-शोर से दावा करती कि वो राज्य से नशे का खात्मा कर देंगे। वहीं दूसरी ओर एक लड़की की आपबीती सामने आती है जो बताती है कि राज्य में नशे के कारण कैसे लड़कियों की जिंदगी बर्बाद हो रही है और उन्हें नशा दे-देकर वेश्यावृत्ति में धेकला जा रहा है।

प्रशासन के लिए अगर उस लड़की की आपबीती एक धक्का है तो सवाल उठता है कि क्या ‘नशा मुक्ति अभियान’ जमीन तक पहुँचा भी है और अगर अधिकारी ऐसी स्थितियों से वाकिफ हैं तो फिर अब तक राज्य में ऐसे हालात क्यों हैं।

लड़की की आपबीती मीडिया में प्रकाशित हुई है। रिपोर्ट बताती हैं कि जिस समय नशा विरोधी कमेटी की टीम मार्च निकाल रही थी तभी उन्हें कोट ईसे खाँ के मसीता रोड पर लड़की सड़क किनारे खाना खाते हुए मिली। लड़की से सवाल-जवाब हुए तो उसने सरेआम जो कहना शुरू किया उससे सभी लोग हिल गए। लड़की ने कहा,

“मुझे बस नशे के लिए छह कैप्सूल चाहिए और उसके बाद कोई मेरे साथ कोई कुछ भी करे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। एक महिला ने पहले मुझे नशे की लत लगाई और मुझे अब जिस्मफिरोशी में धकेल दिया है। मेरे जैसी कई युवतियों को हवस के भूखे भेड़ियों के समक्ष परोसती है और बदले में 300 रुपए लेती है। आधा हिस्सा 150 रुपए मुझे मिलते हैं। पहले 600-700 रुपए की कमाई होती थी पर अब जो पैसा मिलता है, उससे केवल नशे की पूर्ति हो पाती है।”

लड़की ने इस दौरान ये भी जानकारी दी कि वेश्यावृत्ति का काम अनाज मंडी में होता है। वहाँ लगे कुछ तंबू में जिस्म का सौदा करवाया जाता है लेकिन उससे पहले उन्हें नशे का आदी बनाते हैं। वो खुद जब कैप्सूल नहीं मिलती तो अस्पताल से मिलने वाली ‘बुपरीमार्फिन’ गोली पानी में मिलाकर इंजेक्शन लगा लेती है। युवती के मुताबिक ये इंजेक्शन लगाना भी उसे उसी औरत ने ही सिखाया है जिसने उसे वेश्यावृत्ति में धकेला। वहीं गोली उसे सरकारी अस्पताल के पास वाले मेडिकल स्टोर से मिल जाती है।

बच्ची की आपबीती आने के बाद पुलिस ने इस मामले को दर्ज तो कर लिया है लेकिन इसके बाद पूरे प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं। पूछा जा रहा है कि जब राज्य में नशे की कैप्सूल सब बंद हैं तो इनके पास वो कैसे पहुँच रही है।

नशे से हो रही पंजाब में जिंदगियाँ बर्बाद

ये पहली बार नहीं है जब पंजाब में नशे की लत के कारण किसी की जिंदगी बर्बाद हुई हो। 1 साल पहले एक डांसर की खबर आई थी जिसकी पूरी जिंदगी नशे की लत के कारण खराब हो गई थी।

खुद उसके भाई-बहनों ने उसे पहचानने से मना कर दिया था। इसके अलावा उसका पति भी छो़डकर चला गया था। बाद में उसे घर चलाने के लिए सेक्स वर्कर बनना पड़ा। मगर जब उम्र ढली तो उसे वो काम मिलना भी बंद हो गया।

ऐसे ही एक अन्य खबर बताती है कि कैसे अमृतसर के गाँव में नशे की आदत के कारण 100 से ज्यादा महिलाओं का सुहाग उजड़ गया। रिपोर्ट के अनुसार सभी के पतियों की पिछले तीन से छह साल में नशे के कारण मौत हुई थी।

महिलाओं ने शिकायत में पुलिस पर आरोप लगाया था कि पुलिस इन नशा तस्करों को नहीं पकड़ती। नशे से हमारा भविष्य बर्बाद हो रहा है। कई लोग तो इस क्षेत्र से जा चुके हैं। हाल ऐसे हैं कि अब तो लोग यहाँ मकान खरीदने में भी संकोच करते हैं।

इसी तरह 4 दिन पहले एक खबर पंजाब के फिल्लौर से आई थी। यहाँ नशे की एक्स्ट्रा डोज लेने पर 22 साल के युवक की मौत हो गई। उसका शव पेड़ के पास पड़ा मिला। जवान बेटे की मौत की खबर सुनते ही पूरे परिवार में कोहरा मच गया।

कोर्ट बार-बार लगा चुका है फटकार

पंजाब में नशाखोरी इतने चरम पर है कि कोर्ट तक इस मामले पर राज्य की आलोचना कर चुका है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कहा था कि नशाखोरी देश के भविष्य को दीमक की तरह खा रही है। विशेष रूप से पंजाब में ये बड़ी चिंता का विषय है।

पिछले वर्ष अगस्त 2024 भी बठिंडा कोर्ट ने ड्रग तस्करों के खिलाफ सख्त स्टैंड लेने को पुलिस को आदेश दिया था। उन्होंने एक तस्कर की याचिका पर सुनवाई के दौरान पुलिस से कहा था कि वह बताएँ कि राज्य में एनडीपीएस के कितने मामले हैं, जिनमें आरोपी 6 महीने से अधिक समय से फरार हैं। अगर पुलिस द्वारा ड्रग मामलों में आरोपितों को उचित समय अवधि के भीतर गिरफ्तार नहीं किया जाता है, तो ऐसे आरोपितों को तुरंत घोषित अपराधी (पीओ) घोषित किया जाना चाहिए और कानून के प्रावधान के अनुसार बिना किसी देरी के उनकी संपत्ति जब्त की जानी चाहिए।

मार्च 2024 में भी कोर्ट ने पंजाब में पुलिस अधिकारियों से ड्रग तस्करों के खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी कोर्ट को देने को कही थी। हाईकोर्ट ने पंजाब की जेलों से नशे की तस्करी के बढ़ते मामलों पर टिप्पणी करते हुए इसे एसएसओसी की नाकामी बताई थी। साथ ही कहा था कि इन केसों की जाँच सीबीआई और ईडी द्वारा होनी चाहिए। पंजाब में स्थिति नियंत्रण से बाहर है और जेल अधिकारियों के खिलाफ जँच करने में पंजाब पुलिस सक्षम नहीं है।

इसी प्रकार साल 2023 में भी कोर्ट ने नशे के कारोबार और तस्करी के आँकड़ों को देख इन्हें डराने वाला बताया था। कोर्ट ने कहा था कि नशे की जड़ों को समाज से काटना बहुत जरूरी है। आरोपितों के खिलाफ न केवल एनडीपीएस का बल्कि मनी लॉंड्रिंग का मामला दर्ज होना चाहिए। अपराधियों को कम से कम 10 से 20 साल कैद की सजा सुनाई जानी चाहिए और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाना चाहिए।

पंजाब की AAP सरकार और उनके नशा मुक्त पंजाब को लेकर वादे

साल 2022 में जब पंजाब में चुनाव थे तब AAP प्रमुख केजरीवाल ने राज्य की जनता से वादा किया था कि AAP की सरकार आने के चार महीने के भीतर नशीले पदार्थ पर अंकुश लगवा देंगे। बाद में साल 2023 में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पटियाला में सभा को संबोधित करते हुए कहा ता कि वह अगले स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 2024 तक पंजाब से चिट्टे के खतरे को खत्म कर देंगे। हालाँकि वो अपना वादा पूरा करने में विफल रहे जिसके कारण विपक्षी पार्टियों ने उन्हें घेरा भी और उनके वादे को महज ‘लॉलीपॉप’ बताया।

अब हर साल-छह महीने पर खबरों में कुछ आँकड़े दिए जाते हैं। बताया जाता है कि एक अवधि में पंजाब में कितने ड्रग तस्कर पकड़े गए, कितनों के मादक पदार्थ जब्त हुए आदि। कभी मुख्यमंत्री घोषणा करते हुए कि जो गाँव नशा मुक्त होगा उन्हें विशेष अनुदान मिलेगा, तो कभी कोई टीम बनाकर नशा रोकने की बात होती है… लेकिन इन घोषणा से ज्यादा जरूरी तो ये है न कि देखा जाए जो प्रयास शुरू हुए उससे जमीनी स्तर पर क्या फर्क पड़ रहा है। अगर इसी चरण पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो ‘100 महिलाओं के विधवा’ होने वाली जैसी खबरें कभी आना बंद नहीं होगीं। लड़कियाँ नशे की लत लगाकर वेश्यावृत्ति में धकेली जाती रहेंगी। ड्रोन तस्करों को पकड़ लेगा लेकिन मेडिकल स्टोर पर मिलने वाली नशीली दवाइयों पर कार्रवाई नहीं होगी।

कुरान जलाने वाले सलवान मोमिका को घर में घुसकर मारी गोली, हत्या के वक्त टिकटॉक पर थे लाइव: इराक से आ स्वीडन में ली थी शरण, इस्लाम के थे कट्टर आलोचक

स्वीडन में कुरान जलाने वाले सलवान मोमिका की हत्या कर दी गई है। हमलावरों ने एक लाइव स्ट्रीम के दौरान मोमिका को निशाना बनाया और उन्हें गोली मार दी। सलवान मोमिका इस्लाम के धुर आलोचक थे और मूल रूप से इराक के रहने वाले थे। उन्होंने स्वीडन में शरण ली थी। उन्हें इससे पहले भी लगातार धमकियाँ मिल रही थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना स्वीडन के शहर स्टॉकहोम के पास हुई। हमलावर मोमिका के अपार्टमेंट में रात 11 बजे के आसपास आए और उन पर हमला कर दिया। दावा है कि उनकी गोली मार कर हत्या कर दी गई।

इसके बाद पुलिस और एम्बुलेंस को सूचना दी गई। पुलिस ने गोलीबारी की घटना की पुष्टि की है। हालाँकि, पुलिस ने इस घटना के विषय में कोई भी आधिकारिक जानकारी देने से मना किया है। पुलिस अभी यह नहीं बता रही कि गोलीबारी में मारा गया शख्स सलवान मोमिका था।

सलवान मोमिका की हत्या की पुष्टि स्वीडन की एक अदालत की कार्यवाही से हुई है। अदालत ने उसने जुड़े एक मामले की सुनवाई आगे बढ़ा दी है। यह मामला मोमिका और उनके एक और साथी सलवान नजेमी के खिलाफ कुरान चलाने के मामले में दर्ज हुआ था। अदालत ने कहा कि मामले में एक व्यक्ति की मौत हो गई है, ऐसे में इसकी सुनवाई स्थगित की जाती है।

मृतक की पहचान सलवान मोमिका के रूप में जज ने की है। पुलिस अब इस मामले जाँच कर रही है। उस बिल्डिंग को भी सील कर दिया गया है, जहाँ पर यह घटना हुई है। पुलिस ने 5 लोगों को पकड़ा भी है। उन्हें अब अदालत में पेश किया गया है। उनकी पहचान सामने नहीं आई है।

सलवान मोमिका हत्या के समय टिकटॉक पर लाइव थे, यह भी सामने आया है। उनका एक वीडियो भी इस संबंध में वायरल हो रहा है। इस वीडियो की जाँच करने की बात भी पुलिस ने कही थी। सलवान मोमिका की चर्चा सबसे अधिक 2023 में हुई थी।

तब सलवान ने 28 जून, 2023 को पैरों तले कुरान को कुचल कर जला दिया था। यह सब उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर एक लाउडस्पीकर के साथ किया था। उन्होंने जहाँ कुरान जलाई थी, वह जगह पाकिस्तान का दूतावास के सामने थी। सलवान के इस एक्शन के बाद दुनिया भर के मुस्लिमों ने खूब हल्ला काटा था।

मोमिका की उम्र 38 साल थी और वो 2018 में इराक़ से भागकर स्वीडन आ गए थे। मोमिका फेसबुक पर खुद को ‘प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ, विचारक, लेखक और एक आजाद नास्तिक’ बताते थे। मोमिका एक ईसाई थे। वह कई सोशल मीडिया साइटों- खासकर टिकटॉक और फेसबुक पर एक्टिव थे।

इससे पहले अप्रैल 2024 में भी सलवान मोमिका के मरने की खबरें चली थी। हालाँकि, तब सलवान मोमिका ने खुद सामें आकर इनका खंडन किया था। सलवान मोमिका की मौत की खबर की पुष्टि इस बार उनके दोस्त और कुरान जलाने में साथ रहे सलवान नाजेमी ने भी की है।

वाजपेयी राज में बना, कॉन्ग्रेस शासनकाल में आया, पर पीएम मोदी ने बनाया काले धन से लड़ने का ‘हथियार’: जानिए कैसे PMLA से कसा शिकंजा, ED ने 20 साल का दिया हिसाब

मोदी सरकार के अंतर्गत प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में काफी तेजी आई है। ED ने 2014 के बाद से भ्रष्टाचार से कमाई गई लाखों करोड़ की सम्पत्ति को सीज किया है और कई मामलों में उन्हें वापस पीड़ितों या एजेंसियों तक पहुँचाया है। ED ने मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत सजा दिलाने में भी बीते सालों में बड़ी सफलता पाई है। इसके कुछ आँकड़े भी सामने आए हैं।

95% प्रॉपर्टी मोदी सरकार में हुई सीज

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2005 में लागू हुए गए धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) कानून के तहत अब तक जाँच एजेंसी ED ₹1.45 लाख करोड़ की सम्पत्ति अटैच कर चुकी है। अकेले 2024 में ही एजेंसी ने ₹21 हजार करोड़ से अधिक सम्पत्ति अटैच की है।

इस ₹1.45 लाख करोड़ में से ₹1.40 लाख करोड़ तो मोदी सरकार के अंतर्गत ही जब्त हुए हैं। इसका अर्थ है कि भ्रष्टाचार की कमाई का 95% जब्तीकरण मोदी सरकार में हुआ है। PMLA के तहत ED ने मात्र सम्पत्तियाँ ही जब्त नहीं की बल्कि लोगों को कानून के घेरे में लाने में भी सफलता पाई है।

ED ने 44 मामलों में 100 लोगो को अब तक PMLA के तहत दोषी करार दिलाया है। इस कार्रवाई में तेजी बीते एक वर्ष में आई है। 100 में से 36 लोग 2024-25 के शुरूआती 9 महीनों में ही दोषी करार दिए गए हैं। ED ने अपनी स्थापना के बाद से अब तक 911 लोगों को गिरफ्तार किया है।

वित्तीय मामलों से जुड़े अपराधों पर काम करने वाली एजेंसी बीते कुछ सालों में बड़े नेताओं, हवाला ऑपरेटरों और नौकरशाहों तक को शिकंजे में लेने में कामयाब रही है। एजेंसी की बीते कुछ वर्षों में कार्य क्षमता भी बढ़ी है। उसे कई नए अधिकारी और कर्मचारी मिले हैं। एजेंसी ने माँग की है कि उसके स्टाफ की क्षमता तीन गुना बढ़ाई जाए।

PMLA लागू कॉन्ग्रेस सरकार में हुआ, उपयोग किया मोदी सरकार ने

PMLA कानून अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने बनाया था। इसे 2002 में संसद ने पास किया था। यह कानून मनी लॉन्ड्रिंग रोकने, इस पैसे से बनाई गई सम्पत्ति को वापस लेने और दोषियों को कठघरे में लाने के लिए बनाया गया था।

इस कानून के प्रावधान काफी कड़े हैं और इसके शिकंजे में आए आरोपित बच नहीं पाते। इसमें बेल मिलना भी कठिन है। इस कानून से पहले भ्रष्टाचार से अर्जित कमाई को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं था। ऐसे में अलग-अलग कानूनों में लूपहोल को ढूंढ कर लोग बच जाते थे।

लेकिन इस कानून के नए के बाद ED की शक्तियां बढ़ गईं। कानून को कॉन्ग्रेस सरकार ने 2005 में लागू किया था। इसमें 2 बार कॉन्ग्रेस सरकार ने संशोधन भी किया। इस कानून के चलते कॉन्ग्रेस सरकार में कुछ कार्रवाई हुई लेकिन ख़ास कोई भ्रष्टाचार के मामलों में फर्क नहीं पड़ा।

लेकिन मोदी सरकार ने 2014 के बाद इस कानून का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल चालू किया है। इसी का परिणाम है कि 2005-14 के बीच जहाँ ₹5 हजार करोड़ की कालेधन से कमाई गई सम्पत्ति जब्त हुई थी तो वहीं मोदी सरकार में यह आँकड़ा लगभग 28 गुने बढ़ गया।

सिर्फ जब्त करने के मामले में ही नहीं बल्कि उन्हें वापस पीड़ितों को दिलाने में भी ED बड़ी सफलता पा रही है। 2024 में ही ED ₹7 हजार करोड़ की सम्पत्ति को पीड़ितों या फिर बैंकों को वापस दिया है। ऐसे में जो पैसा भ्रष्टाचार से कमाया गया है, उसकी वसूली भी हुई है।

ED ने मेहुल चौकसी, नीरव मोदी और सारदा चिट फंड जैसे घोटालों में पैसा वापस दिलाने में सफलता पाई है। इन मामलों में आम जनता और बैंकों को लंबा चूना लगाया गया था। ED की कार्रवाई के चलते अब राज्यों की पुलिस भी कई आर्थिक अपराधों में उनकी सहायता ले रही हैं।

हिंदू बीवी को बनाना चाहता था मुस्लिम, इनकार करने पर देता था जाति की गाली; छोड़ने को भी नहीं था तैयार: हाई कोर्ट ने कहा- धर्मांतरण के लिए मजबूर करना क्रूरता, तलाक पर लगाई मुहर

मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अंतर-धार्मिक विवाहों में एक पति या पत्नी को धर्मांतरण करने के लिए मजबूर करना क्रूरता है। फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने तलाक की इजाजत दे दी। अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाली हिंदू पत्नी ने अपने मुस्लिम पति पर इस्लाम में धर्मांतरण करने के लिए दबाव डालने और मारपीट करने का आरोप लगाया था।

जस्टिस एन शेषासायी (अब सेवानिवृत) और जस्टिस विक्टोरिया गौरी की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि धर्मांतरण के लिए मजबूर करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने कहा, “किसी के धर्म का पालन करने के अधिकार से वंचित करना और दूसरे धर्म में धर्मांतरण के लिए मजबूर करना पीड़ित को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करेगा।”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि जब किसी अपना धर्म स्वतंत्रता के साथ पालन करने की अनुमति नहीं दी जाती है तो यह उसके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। इससे उसकी जिंदगी गरिमाहीन हो जाती है। जब किसी को अपने विवाह को बचाने के लिए ऊपरवाले के नाम पर धर्मांतरण के लिए मजबूर किया जाता है तो वह विवाह नाम की संस्था की नींव को हिला देता है।

अदालत ने कहा, “हर व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह की संस्था दो आत्माओं का पवित्र मिलन है। विवाह प्रणाली को पवित्र माना जाता है और इसे संरक्षित किया जाना चाहिए।” इसके बाद हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए उसे अपने मुस्लिम पति से तलाक की इजाजत दे दी। फैमिली कोर्ट ने यही निर्णय दिया था, जिसके खिलाफ मुस्लिम पति ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

पत्नी ने फैमिली कोर्ट में याचिका डालकर अपने मुस्लिम पति से तलाक की माँग की थी। इसके लिए उसने क्रूरता और परित्याग का आधार बताया था। पत्नी ने कहा था कि उसका मुस्लिम पति उसे धर्मांतरण करके इस्लाम अपनाने के लिए लगातार मजबूर कर रहा है। जब वह मना करती है तो उसे उसकी जाति को लेकर उसका पति उसे गाली देता है। पत्नी ने बताया कि वह अनुसूचित जाति की हिंदू महिला है।

पति ने तर्क दिया कि यह मामला किसी उद्देश्य से दर्ज किया गया है। पति ने कहा कि उसकी पत्नी ने दावा किया कि उसे बेरहमी से पीटा गया और उसने इलाज करवाया था, लेकिन इसको साबित करने के लिए उसने कोई दस्तावेजी सबूत नहीं पेश किया। पति ने यह भी तर्क दिया कि यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि उसके पत्नी को मुस्लिम बनने के लिए मजबूर किया था।

कोर्ट ने माना कि दोनों ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत प्रेम विवाह किया था, लेकिन उसे धर्मांतरण के लिए शारीरिक एवं मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया। कोर्ट ने यह भी माना कि पति ने अपनी पत्नी का हिंदू नाम भी बदल दिया था। इतना ही नहीं, पति अपनी बीवी को छोड़कर पिछले दो साल से वह अपनी बहन के पास रह रहा था। इसको कोर्ट ने क्रूरता बताते हुए तलाक के लिए पर्याप्त आधार माना।

‘यमुना में जहर’ का दावा कर चौतरफा घिरे केजरीवाल, हरियाणा की अदालत ने हाजिर होने का भेजा नोटिस: ‘जनहित’ वाले जवाब से चुनाव आयोग भी संतुष्ट नहीं, कहा- सबूत दो

आम आदमी पार्टी (AAP) संयोजक अरविन्द केजरीवाल हरियाणा यमुना में ‘जहर मिलाने’ के आरोप पर फंस गए हैं। उन्हें हरियाणा की एक अदालत ने हाजिर होने का आदेश दिया है। यह आदेश हरियाणा सरकार की तरफ से दाखिल एक मुकदमे में दिया गया है।

वहीं चुनाव आयोग भी इस मामले पर केजरीवाल के जवाब से संतुष्ट नहीं है। उसने केजरीवाल से उनके ‘जहर मिलाने’ के दावे के सबूत देने को कहा है। केजरीवाल ने अपने जवाब में अमोनिया की मात्रा ज्यादा होने को बयान का आधार बताया था।

बुधवार (29 जनवरी, 2025) को हरियाणा के सोनीपत में कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा, “अरविंद केजरीवाल को 17 फरवरी, 2025 के लिए नोटिस जारी किया जाता है। उन्हें निर्देश दिया जाता है कि अगर उन्हें कुछ कहना है तो वे अगली सुनवाई की तारीख को इस अदालत के सामने हाजिर हों।”

अदालत ने कहा, “यदि वह अगली सुनवाई की तारीख को इस अदालत के सामने हाजिर नहीं होते तो यह माना जाएगा कि उन्हें कुछ नहीं कहना। ऐसे में आगे की कार्यवाही कानून के अनुसार की जाएगी।” सोनीपत की अदालत ने यह आदेश हरियाणा सरकार द्वारा दायर किए गए एक केस में दिया गया है।

हरियाणा सरकार ने हरियाणा राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकार (HSDMA) के माध्यम से यह केस दायर किया है। हरियाणा सरकार ने कहा है कि केजरीवाल ने यमुना में जहर मिलाने को लेकर झूठे दावे किए और लोगों को भ्रम में डाला। इसके बाद सोनीपत के कुछ गाँव वालों ने भी इस पर प्रश्न उठाए।

जब गाँव वालों से प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने केजरीवाल के उस वीडियो का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि हरियाणा सरकार यमुना में जहर मिलाकर दिल्ली में भेज रही है। केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि हरियाणा की भाजपा सरकार दिल्ली के निवासियों का नरसंहार करना चाहती थी और इसे दिल्ली जल बोर्ड ने रोक लिया।

उनके इस बयान पर सीएम नायब सिंह सैनी ने मानहानि का मुकदमा करने का ऐलान किया था। इस मामले में चुनाव आयोग ने भी केजरीवाल से जवाब माँगा था कि आखिर उन्होंने जहर मिलाने की बात किस आधार पर कही थी। केजरीवाल ने अपने जवाब में दावा किया कि उन्होंने यह बयान ‘जनहित’ में दिया था।

केजरीवाल ने दावा किया कि हरियाणा से आने वाले पानी में अमोनिया की मात्रा ज्यादा थी, ऐसे में उन्होंने लोगों को चेताने को यह बयान दिया था। उनके इस जवाब से चुनाव आयोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि चुनाव आयोग ने केजरीवाल से कहा है कि वह ‘जहर मिलाने’ का सबूत पेश करें।

यमुना के पानी में जहर… दावे पर घिरने के बाद फर्जीवाड़े पर उतरी AAP, केजरीवाल ने एडिटेड वीडियो किया शेयर: हरियाणा के CM ने खुद पीकर दी ‘शुद्धता’ की गारंटी, देखिए Video

दिल्ली आने वाली पानी में जहर मिलाने के आरोप के बाद हरियाणा की एक अदालत ने दिल्ली के पूर्व सीएम और आम आदमी पार्टी (AAP) के मुखिया अरविंद केजरीवाल को नोटिस भेजा है। केजरीवाल ने दावा किया था कि दिल्ली जल बोर्ड (DJB) ने ज़हर का पता लगाकर पानी को दिल्ली पहुँचने से रोक दिया। हालाँकि, DJB ने इससे इनकार किया है। इससे पहले चुनाव आयोग ने भी केजरीवाल को नोटिस दिया था। उन्होंने अब सीएम सैनी को लेकर झूठ फैलाया है।

हालाँकि, अरविंद केजरीवाल अपने बेबुनियाद आरोप से पीछे नहीं हट रहे हैं। वहीं, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने केजरीवाल के आरोपों को नकारते हुए दिल्ली में यमुना का पानी पीते हुए वीडियो जारी किया था। अब यमुना की पानी का घूँट लेते हुए सीएम सैनी का एक एडिटेड वीडियो पोस्ट करते हुए केजरीवाल ने दावा किया है कि सीएम ने पानी पीने का नाटक किया था। वास्तव में उन्होंने पानी नहीं पी थी।

अरविंद केजरीवाल का दावा है कि सीएम सैनी ने पानी पीने का नाटक किया और फिर मुँह में लिए पानी को वापस यमुना में थूक दिया। केजरीवाल ने सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी जी ने यमुना का पानी पीने का ढोंग किया… और फिर वही पानी वापस यमुना में थूक दिया।”

अरविंद केजरीवाल ने आगे दावा किया, “जब मैंने कहा कि अमोनिया की मिलावट के कारण यमुना का पानी दिल्लीवालों की जान के लिए ख़तरा हो सकता है तो इन्होंने मुझ पर FIR करने की धमकी दी। जिस ज़हरीले पानी को ये खुद नहीं पी सकते, वही पानी दिल्ली की जनता को पिलाना चाहते हैं। मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूँगा।

हालाँकि, केजरीवाल ने इस वीडियो का एक छोटा सा हिस्सा एडिट करके डाला है। यह वीडियो केजरीवाल द्वारा पोस्ट की गई वीडियो से चार गुना अधिक लंबी है। ANI द्वारा जारी ऑरिजिनल वीडियो में देखा जा सकता है कि सीएम सैनी ने नदी से पानी का एक घूँट लिया और फिर उसे थूक दिया। संभवत: वे अपना मुँह धो रहे थे। इसके बाद उन्होंने एक अंजुली पानी मुँह में लेकर उसे पी लिया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सीएम सैनी दिल्ली के पल्ला गाँव में यमुना नदी के किनारे गए था। वहाँ उन्होंने अरविंद केजरीवाल के पानी में जहर मिलाने के दावे को गलत साबित करने के लिए नदी का पानी पीया। अरविंद केजरीवाल के इस दावे के बाद उनके खिलाफ हरियाणा के सोनीपत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई गई है। कोर्ट ने केजरीवाल को 17 फरवरी को पेश होने के लिए कहा है।

उधर, चुनाव आयोग ने भी अरविंद केजरीवाल से नोटिस भेजकर इस बुधवार (29 जनवरी 2025) की शाम 8 बजे तक जवाब माँगा था। केजरीवाल के बयान पर आयोग ने कहा था कि इस तरह के आरोपों से क्षेत्रीय समूहों के बीच दुश्मनी, पड़ोसी राज्यों के निवासियों के बीच तनाव और पानी की कमी को लेकर कानून-व्यवस्था की समस्याएँ हो सकती हैं।

नोटिस में विभिन्न निर्णयों और कानूनी प्रावधानों का हवाला दिया गया था। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि राष्ट्रीय एकता और सार्वजनिक सद्भाव के खिलाफ भ्रामक बयान देने के लिए केजरीवाल को तीन साल तक की जेल हो सकती है। वहीं, अपने जवाब में केजरीवाल ने कहा कि हाल के दिनों में बीजेपी शासित हरियाणा से मिल रहा पानी अत्यधिक दूषित और जहरीला रहा है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।

महाकुंभ में 30 श्रद्धालुओं की मौत पर CM योगी हुए भावुक, न्यायिक जाँच के साथ किया ₹25-25 लाख की मदद का ऐलान: मेला क्षेत्र में VVIP और वाहनों के प्रवेश पर रोक, 5 विशेष सचिव करेंगे देखरेख

प्रयागराज महाकुंभ में मंगलवार-बुधवार (28-29 जनवरी) की रात हादसे में 30 लोगों की मौत हो गई है। वहीं, 60 लोग घायल हैं। प्रशासन ने इसकी जानकारी दी है। इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गला रूंध गया। उन्होंने मृतकों के परिजनों को 25-25 लाख रुपए के मुआवजे की घोषणा की। साथ ही न्यायिक जाँच के आदेश भी दिए। हादसे के बाद उन्होंने कुंभ क्षेत्र में बदलाव के जरूरी निर्देश भी दिए हैं।

इस घटना को सबक बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “सरकार ने फैसला लिया है कि घटना की न्यायिक जाँच कराई जाएगी। इसके लिए हमने जस्टिस हर्ष कुमार की अध्यक्षता में पूर्व DG वीके गुप्ता और रिटायर्ड IAS डीके सिंह वाली 3 सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है।” उन्होंने कहा कि मेला क्षेत्र में जितनी भी व्यवस्थाएँ की जा सकती हैं, सबको तैनात किया गया है।

हादसे के बाद पूरे कुंभ मेला क्षेत्र को ‘नो-व्हीकल जोन’ घोषित किया गया है। क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वाहन को अंदर जाने की अनुमति नहीं होगी। सारे VVIP पास भी रद्द कर दिए गए हैं। किसी तरह के पास के जरिए वाहन को कुंभ क्षेत्र में प्रवेश नहीं मिलेगा। इसके अलावा, सभी रास्तों को वन-वे बना दिया गया है। यानी किसी रास्ते पर श्रद्धालुओं के आने और जाने, दोनों काम नहीं होगा। इनमें से सिर्फ एक होगा।

इसके अलावा, बाहर से आने वाले वाहनों को प्रयागराज की सीमा पर ही रोका जाएगा। उन्हें अंदर आने की अनुमति नहीं होगी। चार फरवरी तक शहर में चार-पहिया वाहनों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। VVIP स्नान और एस्कॉर्ट की गाड़ियों के काफिले पर रोक लगाई गई है। सिर्फ बाइक, एंबुलेंस, नगर निगम और फायर की गाड़ियाँ ही अंदर चलेंगी। सड़कों पर रेहड़ी-पटरी लगाने वालों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जाएगा, ताकि जाम आदि ना लगे।

भीड़ को देखते हुए सीएम ने परिवहन निगम की अतिरिक्त बसें चलाने, लोगों को ठहरने और उनके भोजन-पानी की व्यवस्था करने के भी निर्देश दिए हैं। साथ ही बिजली आपूर्ति भी सुनिश्चित करने को कहा है। इसके साथ ही भीड़ वाली जगहों पर पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। अयोध्या और वाराणसी में भी व्यवस्था को सुचारू और भीड़ को नियंत्रित करने का आदेश दिया गया।

योगी आदित्यनाथ ने मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से महाकुंभ मेला की व्यवस्थाओं की समीक्षा करने को कहा है। इसके साथ ही उन्होंने कुंभ 2019 के दौरान प्रयागराज के संभागीय आयुक्त रहे आशीष गोयल और एडीए के पूर्व उपाध्यक्ष भानु गोस्वामी को व्यवस्थाओं को और मजबूत करने के लिए तैनाती का आदेश दिया है। संचालन की देखरेख के लिए पाँच विशेष सचिव स्तर के अधिकारियों को नियुक्त किया जा रहा है। ये सभी अधिकारी 12 फरवरी तक कुंभ क्षेत्र में रहेंगे।

भगदड़ की घटना के बाद मुख्यमंत्री योगी ने प्रयागराज और उसके आसपास के जिलों- कौशांबी, वाराणसी, अयोध्या, मिर्जापुर, बस्ती, जौनपुर, चित्रकूट, बांदा, अंबेडकरनगर, प्रतापगढ़, संत कबीर नगर, भदोही, रायबरेली, गोरखपुर सहित कई जिलों के DM और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों एवं अन्य अधिकारियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए देर रात को बात की।

सीएम योगी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर 30 जनवरी को प्रस्तावित दिल्ली की सभा को भी टाल दिया है और वे कुंंभ की व्यवस्था के साथ-साथ अयोध्या एवं वाराणसी में व्यवस्था की निगरानी कर रहे हैं। माना जा रहा है कि दिल्ली में उनकी 30 जनवरी वाली रैली को 31 जनवरी को आयोजित किया जा सकता है।

बांग्लादेश में महिलाओं के फुटबॉल मैच को देख बौखलाए इस्लामी कट्टरपंथी, 2 जगह की तोड़फोड़: कहा- ये इस्लाम के खिलाफ, हमलावरों में मदरसे के छात्र तक शामिल

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों ने महिला फुटबॉल मैचों को निशाना बनाया है। इस्लामी कट्टरपंथियों ने महिलाओं के फुटबॉल खेलने को इस्लाम विरोधी बता कर तोड़फोड़ मचाई। यह हमले बांग्लादेश में दो अलग-अलग जगह हुए। हमला करने वाले एक इस्लामी संगठन से जुड़े हुए थे।

पहली घटना बांग्लादेश के जॉयपुरहाट के तिलकपुर में हुई। यहाँ मंगलवार (28 जनवरी, 2025) को एक मदरसे के तालिब (छात्र) और बाकी कट्टरपंथी ग्राउंड के बाहर हंगामा करने लगे। दो महिला टीमों के बीच होने वाले इस मैच को लेकर खूब तोड़फोड़ मचाई गई।

यह मैच बुधवार (29 जनवरी) को तिलकपुर हाई स्कूल के खेल के मैदान पर जॉयपुरहाट और रंगपुर महिला फुटबॉल टीमों के बीच होना था। इसको लेकर सोशल मीडिया पर वीडियो भी वायरल हुए। इसमें मुस्लिम भीड़ को स्कूल की टिन की बाड़ को तोड़ते हुए देखा जा सकता है। इन हमलावरों को भड़काऊ भाषण देकर यहाँ लाया गया था।

कट्टरपंथियों ने आरोप लगाया गया कि फुटबॉल खेलने वाली लड़कियाँ पर्दा नहीं करती हैं। उनके इस हंगामे के चलते फुटबॉल मैच कैंसल कर दिया गया। लड़कियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना पड़ा। इस्लामी भीड़ ने चेतावनी दी है कि आगे भी ऐसे आयोजन ना हों।

एक कट्टरपंथी ने ऐलान किया, “मैं उन लोगों को चेतावनी देना चाहता हूँ जो हमारी महिलाओं को बेपर्दा करके पैसा कमाना चाहते हैं। सावधान रहें। महिलाओं के सभी खेल बंद कर दो। अगर तुम नहीं रुकते, तो हम अपनी ताकत दिखाएँगे” स्थानीय पुलिस ने भी घटना की कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया।

वहीं इसी दिन बांग्लादेश के दिनाजपुर में हाकिमपुर में भी तौहीदी जनता नाम के एक इस्लामी संगठन ने एक फुटबॉल मैच को निशाना बनाया। यहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने महिलाओं के मैच पर हमला कर दिया। इस हमले में 10 लोग घायल हो गए। हमले के बाद मैच को रद्द करना पड़ा। आयोजकों ने धमकियों के बाद पूरा टूर्नामेंट ही कैंसिल कर दिया है।

बंगलादेश में हुई इन घटनाओं के पीछे बढ़ता इस्लामी कट्टरपंथ है। यूनुस सरकार आने के बाद से लगातार इस्लामी कट्टरपंथी अपनी मनमर्जी में लगे हुए हैं। महिलाओं के साथही अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भी निशाना बनाया गया है। महिलाओं के मैच पर हमले की कई संगठनों ने आलोचना की है।

जनजातीय समाज की जमीनों पर दावा नहीं कर पाएगा वक्फ, बोर्ड में गैर मुस्लिमों की होगी एंट्री: बिल पर JPC ने लगाई मुहर, कहा- वंचितों-महिलाओं को मिले लाभ; विपक्ष बिफरा

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने सरकार को जनजातीय भूमि को ‘वक्फ’ संपत्ति घोषित करने से रोकने के लिए एक कानून लाने की सिफारिश की है। JPC का कहना है कि ‘इन सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के अस्तित्व’ के लिए ‘गंभीर खतरा पैदा करने वाले’ कई मामले सामने आए हैं। JPC ने मसौदा रिपोर्ट स्वीकार करते हुए 30 जनवरी को इसे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को रिपोर्ट पेश करेगी।

सोमवार (27 जनवरी 2025) को पैनल ने सत्तारूढ़ एनडीए सांसदों द्वारा सुझाए गए संशोधनों को स्वीकार कर लिया था, जबकि विपक्षी सांसदों के सुझाए गए संशोधनों को खारिज कर दिया था। इन संशोधनों में विवादों को निपटाने के लिए कलेक्टर के पद से ऊपर के अधिकारी को नियुक्त करना और ट्रिब्यूनल में तीसरे सदस्य के रूप में मुस्लिम लॉ जानने वाले व्यक्ति को बहाल करना भी शामिल है।

मसौदा रिपोर्ट पर सूत्रों के हवाले से डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट में कहा गया कि संविधान की अनुसूची V और अनुसूची VI के तहत आने वाले आदिवासी क्षेत्रों में वक्फ भूमि की घोषणा के कई मामले थे। जो इन सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं, जिनकी धार्मिक प्रथाएँ अलग हैं और वे इस्लाम के तहत निर्धारित धार्मिक प्रथाओं का पालन नहीं करते हैं।

JPC ने विधेयक में वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने वाले प्रावधान में भी कोई समस्या नहीं पाई है, क्योंकि वे लाभार्थी, विवादों में पक्षकार या वक्फ मामलों में अन्यथा रुचि रखने वाले हो सकते हैं। इसमें कहा गया है कि प्रस्ताव इसे अधिक व्यापक आधार वाला बनाएगा और वक्फ संपत्ति प्रबंधन में समावेशिता और विविधता को बढ़ावा देगा।

वहीं, मंगलवार (28 जनवरी 2025) को पैनल के सदस्यों के बीच मसौदा रिपोर्ट वितरित की गई। विपक्षी सांसदों ने रिपोर्ट को अपनाने के लिए बैठक बुलाई गई बैठक की आलोचना करते हुए कहा कि उनके लिए कुछ ही घंटों में 655 पृष्ठों की रिपोर्ट को पढ़ना, चर्चाओं में भाग लेना और असहमति नोट तैयार करना संभव नहीं है।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है, “वक्फ बोर्ड द्वारा अधिग्रहित भूमि की मात्रा में वृद्धि और मुकदमों की संख्या इस गंभीर चिंता को दूर करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।” पैनल ने कहा कि एसटी समाज के सबसे हाशिए पर और कमजोर वर्गों में से एक हैं। इसलिए संविधान में परिकल्पित सुरक्षा को हर कीमत पर बरकरार रखा जाना चाहिए।

वक्फ संपत्तियों पर किराएदारों के मामले में पैनल ने लीज नियम बनाते समय सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता की वकालत की। किराएदार संगठनों ने इस बात पर चिंता जताई थी कि उन्हें अतिक्रमणकारी माना जा रहा है, जबकि वे कानूनी रूप से संपत्ति पर कब्जा कर रहे हैं और वक्फ बोर्ड द्वारा निर्धारित किराया दे रहे हैं।

इसमें कहा गया है, “वक्फ बोर्ड और किराएदारों के बीच सहजीवी और सामंजस्यपूर्ण संबंध को बढ़ावा देने से वक्फ संपत्तियों की समृद्धि सुनिश्चित होगी। इसलिए समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय देश भर के वक्फ किराएदारों की चिंताओं पर विचार कर सकता है और ऐसे कानून बना सकता है, जो उनके वैध अधिकारों की रक्षा के लिए दीर्घकालिक पट्टे की अनुमति देते हैं।”

जेपीसी के अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने कहा, “पहली बार हमने एक खंड शामिल किया है, जिसमें कहा गया है कि वक्फ का लाभ हाशिए पर पड़े लोगों, गरीबों, महिलाओं और अनाथों को मिलना चाहिए। कल, हम यह रिपोर्ट स्पीकर को सौंपेंगे। हमारे सामने 44 खंड थे, जिनमें से 14 में सदस्यों ने संशोधन प्रस्तावित किए। हमने बहुमत से मतदान कराया और फिर इन संशोधनों को स्वीकार कर लिया गया।”

भाजपा नेता राधामोहन दास अग्रवाल ने कहा कि वक्फ संशोधन विधेयक पर रिपोर्ट 14 में से 11 मतों से पारित हुई है। विभिन्न दलों ने अपने असहमति नोट प्रस्तुत किए हैं। भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने कहा कि सरकार का इरादा वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में आधुनिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही लाना है। इसके साथ ही निहित स्वार्थों द्वारा कानून के दुरुपयोग को रोकना है।

वहीं, इस रिपोर्ट का विरोध करने वालों में से एक AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि जब बजट सत्र के दौरान संसद में इस विधेयक पर चर्चा होगी तो वे इसका विरोध करेंगे। उन्होंने कहा, “कल रात हमें 655 पन्नों की मसौदा रिपोर्ट दी गई और किसी के लिए भी इतने कम समय में इतनी लंबी रिपोर्ट पढ़ना और अपनी राय देना मानवीय रूप से असंभव है। फिर भी हमने प्रयास किया और अपनी असहमति रिपोर्ट पेश की।”

ओवैसी ने आगे कहा, “यह वक्फ के पक्ष में नहीं है। मैं शुरू से कह रहा हूँ कि भाजपा अपनी विचारधारा के अनुसार मुस्लिमों के खिलाफ यह बिल लेकर आई है। इसका उद्देश्य वक्फ बोर्ड को नुकसान पहुँचाना और उनकी मस्जिदों पर कब्जा करना है। अगर हिंदू, सिख और ईसाई अपने-अपने बोर्ड में अपने धर्म के सदस्य रख सकते हैं तो मुस्लिम वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्य कैसे हो सकते हैं?”

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा, “मैंने अपनी असहमति जताई है… इसमें पीड़ितों के बयानों पर विचार नहीं किया गया है। हमने चर्चा के दौरान जो कहा, उस पर विचार नहीं किया गया… सवाल यह उठता है कि हमने जो हितधारकों का दृष्टिकोण व्यक्त किया है, वह अध्यक्ष को क्यों पसंद नहीं आया। मेरे हिसाब से जेपीसी की कार्यवाही मजाक बनकर रह गई है।”

शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने कहा, “कल तक लोग वक्फ में चुनाव के जरिए आते थे, लेकिन अब आप चुनाव हटा रहे हैं। वहाँ लोगों को मनोनीत किया जाएगा और केंद्र सरकार यह काम करेगी। अगर सरकार चुनाव आयोग से जुड़े कानून बदल सकती है तो वह यहाँ क्या करेगी? आज वक्फ में गैर-मुस्लिमों को लाने का प्रावधान है तो कल वे हमारे मंदिरों में भी ऐसा ही कर सकते हैं (गैर-हिंदुओं को लाना), क्योंकि संविधान में समानता का मुद्दा आएगा।”

गाजा में कंडोम बाँटने के लिए बायडेन देते थे ₹4000 करोड़, डोनाल्ड ट्रंप के आते ही हुआ बंद: एलन मस्क की नेतृत्व वाली DOGE ने बताया फालतू का खर्च, टैक्सपेयर के पैसे की बर्बादी

व्हाइट हाउस प्रशासन ने बताया है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बायडेन के शासनकाल में गाजा को 50 मिलियन डॉलर (लगभग ₹4000 करोड़) कंडोम के लिए दिए जा रहे थे। व्हाइट हाउस ने बताया है कि नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस पर रोक लगा दी है। अमेरिकी सरकार में शामिल हुए एलन मस्क के विभाग DOGE ने इस खर्च का खुलासा किया है।

व्हाइट हाउस की नई प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने यह खुलासा मीडिया के साथ पहली बातचीत में किया है। उन्होंने कहा, “DOGE और OMB ने पाया कि 50 मिलियन डॉलर गाजा के भीतर कंडोम के लिए दिए गए थे। यह लोगों के टैक्स के पैसे की चिंताजनक रूप से बर्बादी थी।”

उन्होंने कहा कि ट्रम्प प्रशासन स्पष्ट करना चाहता है कि वह अमेरिकी टैक्सपेयर के पैसे की कद्र करता है। एलन मस्क ने कहा है कि यह इस खर्चे का खुलासा सिर्फ अभी एक शुरुआत है। वहीं बायडेन प्रशासन में शामिल रहे लोगों ने इस दावे को नकारा है।

बायडेन प्रशासन में रहे एंड्रयू मिलर ने इस दावे को हवा हवाई बताया है। उन्होंने कहा, “यह संभव है कि 50 मिलियन डॉलर यौन स्वास्थ्य या उस तरह की किसी चीज़ के लिए अलग रखे गए हों, जिसमें स्त्री रोग और कई अन्य सेवाएँ शामिल होंगी, लेकिन निश्चित रूप से अकेले कंडोम के लिए नहीं होंगे।”

वहीं यह खर्च करने के लिए जिम्मेदार एजेंसी ने कहा कि 2023 में इंजेक्टेबल गर्भनिरोधक, पुरुष कंडोम, गर्भनिरोधक दवाइयां, और महिला कंडोम जैसे सामान पर खर्च 60 मिलियन डॉलर तक पहुँच गया है लेकिन यह पूरे विश्व में है- सिर्फ गाजा में नहीं।”

इसी दौरान अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन ने आने के साथ ही गाजा और फिलिस्तीन को जाने वाली सभी प्रकार की मदद बंद कर दी है। केवल खाद्य पदार्थों को लेकर भेजी जाने वाली मदद नहीं रोकी गई है। ट्रम्प प्रशासन ने यह फैसला इजरायल और हमास ममे समझौता होने के बाद लिया है।