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पालघर में संतों की हत्या पर मोहन भागवत ने उठाए सवाल, कहा- पुलिस क्या कर रही थी

पालघर मॉब लिंचिंग में पुलिस की भूमिका पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सर संघचालक मोहन भागवत ने सवाल उठाए हैं। रविवार (अप्रैल 26, 2020) शाम संघ के ऑनलाइन बौद्धिक वर्ग में उन्होंने यह बात कही।

आरएसएस प्रमुख द्वारा सोशल मीडिया के जरिए इस तरह संवाद का यह पहला मौका था। इस दौरान उन्होंने लॉकडाउन में घरों में रहने और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखने की अपील की। कोरोना संक्रमण की वजह से अब 30 जून तक RSS ने अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं।

भागवत ने पालघर मॉब लिंचिंग घटना की निंदा करते हुए पुलिस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “2 साधुओं की हत्या। क्या यह होना चहिए? क्या कानून-व्यवस्था किसी को हाथ में लेना चाहिए था? ऐसे में पुलिस की भूमिका क्या होनी चाहिए थी? ये सभी चीजें ऐसी हैं जिन पर सोचा जाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि संन्यासियों ने किसी का अहित नहीं किया था। साधुओं का कोई दोष नहीं था।

तबलीगी जमात की तरफ इशारा!

संघ प्रमुख ने कहा कि यदि कोई डर या क्रोध की वजह से कुछ उल्टा-सीधा कर देता है तो सारे समूह को उसमें शामिल कर उनसे दूरी बनाना सही नहीं है। माना जा रहा है कि यह संघ प्रमुख का तबलीगी जमात की तरफ इशारा था। उन्होंने कहा, “भारत की 130 करोड़ की आबादी भारत माता के बच्चे और हमारे भाई हैं। यह दिमाग में रखा जाना चाहिए। दोनों पक्षों की तरफ से कोई गुस्सा और डर नहीं होना चाहिए। समझदार और जिम्मेदार लोग अपने समूहों को इससे रक्षा करें। अगर ऐसा नहीं होता है तो क्या होना चहिए?” 

साथ ही उन्होंने कहा कि लोगों को लगता होगा कि शाखा बंद है, रोज होने वाले कार्यक्रम बंद हैं तो संघ का काम बंद है। लेकिन ऐसा नहीं है। संघ का काम चल ही रहा है, बस उसका स्वरुप बदल गया है।

मोहन भागवत ने कहा, “हमें COVID-19 से डरने की जरूरत नहीं है। प्रचंड रूप से संघ के सेवा कार्य चल रहे हैं और उसको समाज देख रहा है। स्वयं के प्रयास से अच्छा बनना और समाज को अच्छा बनाना ही अपना काम है। केवल संघ के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के लिए भी कुछ बातें स्पष्ट हैं। अपने स्वार्थ की पूर्ति या अपना डंका बजाने के लिए हम काम नहीं कर रहे। यह समाज हमारा है, इसलिए सेवा कर रहें हैं। अहंकार को त्याग कर बिना श्रेय के काम करना है।”

गौरतलब है कि महाराष्ट्र के पालघर जिले में 16 अप्रैल की रात तीन लोगों की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इसमें दो साधु और एक उनका ड्राइवर था। भीड़ ने उन्हें उनकी कार से निकालकर लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला था। मृतकों की पहचान महाराज कल्पवृक्षगिरी (70), सुशीलगिरी महाराज (35) और वाहन चालक निलेश तेलगाडे (30) के तौर पर हुई है। अखिल भारतीय संत समिति ने इस मामले पर यह कहते हुए CBI जाँच की माँग की है कि उन्हें महाराष्ट्र के गृहमंत्री पर भरोसा नहीं है।

कोरोना से जंग में जुटा RPF: मास्क बनाने से लेकर भोजन बाँटने तक के काम में लगे हैं जवान

रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के जवान, रेल प्रशासन, चिकित्सा विभाग, राज्य पुलिस और सिविक प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कोरोना संक्रमण का मुकाबला कर रहे हैं। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स के जवान जागरूकता अभियान, खाद्य वितरण, मास्क एवं सेनिटाइज़र के उत्पादन में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

लॉकडाउन दौरान परिसंपत्तियों, कोचों, लोकोमोटिव, स्टेबल रेक, यार्ड, सिग्नलिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्टेशन, रिले रूम, माल शेड, वैगन स्टॉक इत्यादि की सुरक्षा और उपयोग सुनिश्चित की जाती है और सभी फिक्स्ड और मूविंग एसेट्स पर नजर रखी जाती है। इस समय के दौरान, भारतीय रेलवे ने कोरोना वायरस के व्यापक प्रसार से निपटने के लिए एक रणनीति के तहत यात्री सेवाओं की आवाजाही पर रोक लगा दी है। लेकिन आवश्यक वस्तुओं के परिवहन के लिए मालगाड़ियों की आवाजाही, दवाओं को अभी भी पूरे देश में वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स इसके इतर गरीब और जरूरतमंदों के लिए आगे आई है। वो कई तरह से उनकी सहायता कर रहे हैं। इसमें 2 क्वारंटाइन सेंटर स्थापित करने और संचालित करने के साथ ही जरूरतमंदों के बीच राशन एवं पका हुआ भोजन वितरित करना, Covid19 वॉलेंटियर्स को प्रशिक्षित करना आदि शामिल है।

RPF ने करीब 2.75 लाख लोगों में बाँटा खाना

RPF/DLI फिलहाल 2 क्वारंटाइन सेंटरों का संचालन कर रहा है। इनमें से एक तुगलकाबाद में है और दूसरा दया बस्ती में। इसमें कुल 90 बेड लगे हुए हैं। RPF, आईआरसीटीसी, गैर सरकारी संगठनों के सहयोग और अपने स्वयं के संसाधनों का उपयोग करके लगभग 20 स्थानों पर 2.75 लाख से अधिक पकाए गए भोजन वितरित किए हैं, जो लॉकडाउन के बाद से भारतीय रेलवे द्वारा अखिल भारतीय खाद्य वितरण के 10% से अधिक है।

RPF द्वारा वितरित किया जा रहा भोजन

इसके अलावा जहाँ पर पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना मुश्किल है, वहाँ पर लगभग 2000 लोगों को राशन उपलब्ध करवाया गया है। माँग बढ़ने पर, फोर्स के सदस्यों ने अपने स्वयं के संसाधनों का इस्तेमाल करने का फैसला किया और चार जगहों पर रसोई स्थापित की, जहाँ कच्चे माल की सोर्सिंग से लेकर खाना पकाने और वितरण तक सब कुछ आरपीएफ/डीएलआई द्वारा किया जा रहा है।

RPF महिला स्टाफ बना रही मास्क

RPF ने ‘समाज का समाज के लिए योगदान’ प्रोगाम की शुरुआत की है, जिसमें कोविड-19 स्वयंसेवकों को लॉन्च किया गया है। इसका मकसद रेलवे ट्रैक के आस-पास रहने वाले लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ उन पर नजर रखना है। इसके अलावा ज्यादा से ज्यादा लोगों को मास्क उपलब्ध कराने के लिए आरपीएफ की महिला स्टाफ ने खुद से ही मास्क बनाने का कार्य शुरू किया है। वहीं लॉकडाउन में गरीब लोगों को राशन देने के कार्य के साथ खाना देने का भी काम कर रही है।

Covid-19 के खिलाफ RPF सामुदायिक क्षमता निर्माण कार्यक्रम के स्लम एरिया में वॉलेंटियर्स को व्हाट्सएप जैसी टेक्नोलॉजी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। एक स्वयंसेवक को 20 घरों की जिम्मेदारी दी गई है। इसके जरिए वो उन घरों में रहने वाले बुजुर्गों को दवाई और खाने के साथ गर्भवती महिलाओं की इमरजेंसी के जानकारी देने और रेलवे ट्रैक पर घूमने वाले लोगों पर नजर रखने का कार्य करेगा।

आरपीएफ ने अब तक करीब 500 से ज्यादा लोगों को आरोग्य सेतु एप को डाउनलोड करवाने के साथ उसके प्रति जागरूक भी किया है। आज के समय में तकरीबन हर आरपीएफ सिपाही के फोन में आरोग्य सेतु एप डाउनलोड है। RPF/DLI के लगभग 50 फीसदी कर्मचारियों ने पहले खुद को प्रशिक्षित किया और फिर इनकी मदद में आगे आए।

दिल्ली डिवीजन के सिक्योरिटी कमिश्नर हरीश सिंह पापोला ने बताया कि वो एहतियात बरतने के उपायों के बारे में अपने स्टाफ को हर दिन जानकारी दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि सभी पोस्ट और आउटपोस्ट का वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा बार-बार विजिट किया जा रहा है और वो स्टाफ का मनोबल को ऊँचा रखने के लिए उनके साथ बातचीत भी कर रहे हैं। आगे अधिकारी ने कहा कि ऊपर से नीचे तक सभी लोग इस बात को जान रहे हैं कि ये वक्त अतिरिक्त मेहनत करने की और कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में देश के लिए समर्पित सिपाही बनने का समय है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय रेलवे एक ऐसा तंत्र है जिसके बिना आप देश को चलाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। रेलवे केवल यातायात के लिए ही नहीं, बल्कि देश में जब गंभीर परिस्थितियाँ पैदा होती है तो देश सेवा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रेलवे की सेवा की तुलना किसी अन्य तंत्र से करना मुमकिन नहीं है। आज देश में कोरोना वायरस का प्रकोप फैला है जिससे देश पूरी तरह से बंद हो चुका है लेकिन इन गम्भीर व कठिन समय में भी रेलवे अपनी सेवाएँ देश को दे रहा है।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती: अराधना में थे लीन जब गोलियों से भूना, शव को कुल्हाड़ी से काटा

महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं की निर्मम तरीके से हत्या की गई। करीब 12 साल पहले ओडिशा में इसी तरह निर्ममता से स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या की गई थी। उस वक्त भी इसके पीछे ईसाई मिशनरियों और माओवादियों का कनेक्शन सामने आया था।

पालघर के जिस इलाके में साधुओं की मॉब लिंचिंग हुई वहॉं भी ईसाई मिशनरी सक्रिय हैं। घटना के वक्त मौके पर एनसीपी और सीपीएम नेताओं के मौजूद रहने की बात सामने आई है। हिंदू धर्म आचार्य सभा ने महाराष्ट्र के गवर्नर को जो पत्र लिखा है उसमें स्पष्ट तौर पर कहा है कि इस इलाके के लोगों का ब्रेनवाश कर हिन्दू धर्म के प्रति उनके मन में घृणा पैदा की गई है।

23 अगस्त 2008 को कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद और उनके शिष्यों की हत्या भी सुनियोजित तरीके से की गई थी। जलेसपट्टा स्थित उनके आश्रम में हत्यारे घुसे और उन्हें गोलियों से भून डाला। उनके मृत शरीर को कुल्हाड़ी से काट डाला। चार अन्य साधुओं की भी हत्या कर दी गई।

कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती

स्वामी लक्ष्मणानंद ओडिशा के वनवासी बहुल फुलबनी (कन्धमाल) जिले के गाँव गुरुजंग के रहने वाले थे। बचपन में ही उन्होंने दुखी-पीड़ितों की सेवा में जीवन समर्पित कर देने का संकल्प ले लिया। हिमालय से साधना साधना कर लौटने के बाद वे गोरक्षा आंदोलन से जुड़ गए। प्रारंभ में उन्होंने वनवासी बहुल फुलबनी के चकापाद गाँव को अपनी कर्मस्थली बनाया था।

धर्मांतरण कर ईसाई बनाए गए लोगों की हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए उन्होंने अभियान शुरू किया। उनकी प्रेरणा से 1984 में चकापाद से करीब 50 किलोमीटर दूर जलेसपट्टा नामक वनवासी क्षेत्र में कन्या आश्रम, छात्रावास तथा विद्यालय की स्थापना हुई। आज भी उस कन्या आश्रम छात्रावास में सैकड़ों बालिकाएँ शिक्षा ग्रहण करती हैं।

1970 से दिसंबर 2007 के बीच स्वामी लक्ष्मणानंद पर 8 बार जानलेवा हमले हुए। आखिरकार 23 अगस्त 2008 जब वे जन्माष्टमी समारोह में भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना में लीन थे माओवादियों ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी। उनकी हत्या के बाद समूचा कंधमाल उबल पड़ा था। ओडिशा के अन्य भागों में भी प्रदर्शन व आन्दोलन हुए।

निशाने पर क्यों थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती?

ओडिशा के घने जंगलों में मिशनरी की संदिग्ध और धर्मांतरण की गतिविधियों के खिलाफ जोरदार अभियान चलाने वाले तथा आदिवासियों को चर्च के चंगुल में जाने से बचाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की लगातार साजिश रची जा रही थी। स्वामीजी वहाँ व्यापक तौर पर सामाजिक सेवा के कार्य में लगे थे। आदिवासी लड़कियों के लिए स्कूल व हॉस्टल चलाते थे। उनके इस काम को मिशनरी के लोग धर्मांतरण के अपने मिशन में बाधा के तौर पर देखते थे।

उनकी हत्या का सूत्रधार और मुख्य आरोपी माओवादी नेता सब्यसाची पांडा था। क्राइम ब्रांच ने इस मामले में माओवादी नेता पांडा सहित उसके 14 साथियों के खिलाफ़ विरुद्ध आरोप-पत्र दाखिल किया था। बाद में नौ आरोपी ही गिरफ्तार किए जा सके। दुर्योधन सुना मांझी, मुंडा बडमांझी, सनातन बडमांझी, गणनाथ चालानसेठ, बिजय कुमार सनसेठ, भास्कर सनमाझी, बुद्धदेव नायक और माओवादी नेता उदय को सजा सुनाई गई। क्राइम ब्रांच ने सोमनाथ दंडसेना को भी इस मामले में गिरफ्तार किया था। लेकिन अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उसे बाद में बरी कर दिया था।

मामले को दबाने की कोशिश

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर तमाम तरह के झूठे आरोप लगाए गए। एक फादर के घर की नौकरानी को नन बताकर बलात्कार का झूठा प्रचार किया गया। स्थानीय माओवादी नेताओं ने भी इस बात को दबाने की बहुत कोशिश की। उस वक्त भाजपा महासचिव पृथ्विराज हरिचंदन ने कहा था कि यह हत्या प्रायोजित थी। राज्य सरकार इस हत्याकांड पर पर्दा डालना चाहती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार घटना के चार साल बीत जाने के बावजूद जानबूझकर मुख्यमंत्री के निर्देश के कारण हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया गया था। लगातार विश्व हिंदू परिषद् द्वारा हत्या में शामिल दोषियों की गिरफ्तारी की माँग की गई। साथ ही ओडिशा सरकार से परिषद् के नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या की जाँच के लिए बने दो न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को भी कहा गया।

राजस्थान LDC भर्ती परीक्षा 2018 में आरक्षण घोटाला: OBC और जेनरल की 587 सीटें ‘गायब’

राजस्थान LDC भर्ती परीक्षा 2018 को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। इस भर्ती परीक्षा के फाइनल रिजल्ट के बाद से ही आयोग पर गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। उम्मीदवारों का आरोप है कि राजस्थान कर्मचारी चयन आयोग ने दस्तावेज सत्यापन के बाद जनरल और OBC वर्ग के पदों की संख्या घटा दी। 

उम्मीदवारों का कहना है कि डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के समय अधीनस्थ विभाग में OBC की 2093 और जनरल की 5303 सीटें थी, लेकिन अंतिम परिणाम में OBC श्रेणी से 227 काटें काटकर 1866 कर दी गईं, जबकि जनरल श्रेणी से 360 सीटों की कटौती करके 4943 कर दी गई। इस तरह OBC और जनरल श्रेणी के कुल 587 सीटों की कटौती की गई है। इसका खुलासा RTI के जरिए हुआ।

नियुक्ति का अंतिम परिणाम जारी होने के बाद जहाँ ओबीसी का आरक्षण 21 फीसदी से घटकर 17 फीसदी रह गया तो वहीं जनरल का आरक्षण भी 50 फीसदी से घटकर 46 फीसदी रह गया। इसके अलावा बाकी तीनों वर्गों को आरक्षण का पूरा लाभ दिया गया है। ऐसे में राज्य के बेरोजगार युवा गुहार लगा रहे हैं कि OBC और जनरल के इन 587 बेरोजगारों को भी इंसाफ मिले।

बेरोजगारों का कहना है कि बोर्ड की गलती का खामियाजा प्रदेश के 587 बेरोजगारों को भुगतना पड़ रहा है। नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर हुए इन 587 बेरोजगारों ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा और राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड तक गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक भी कोई रास्ता नहीं निकल पाया है। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति प्रक्रिया तेज होने के बाद इन बेरोजगारों की चिंताएँ भी बढ़ने लगी हैं।

मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र

उम्मीदवारों ने बोर्ड से लेकर मुख्यमंत्री तक लगाई गई गुहार

उम्मीदवारों ने अपनी शिकायत बोर्ड के समझ रखी, लेकिन बोर्ड ने इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री तक को पत्र भेजा गया, लेकिन वहाँ भी इनकी सुनवाई न हो सकी। ऐसे में अब ये उम्मीदवार दर-दर भटक रहे हैं। रोज ट्विटर पर सीएम, आयोग और नेताओं को टैग कर ट्वीट कर रहे हैं, लेकिन उनकी इस समस्या पर कोई खास ध्यान नहीं दे रहा है। राजस्थान बेरोजगार एकीकृत महासंघ के प्रदेश संयोजक उपेन यादव का कहना है कि सरकार से माँग है कि चयनित अभ्यर्थियों को जल्द से जल्द नियुक्ति देने के साथ कम किए गए पदों को वापस जोड़कर एक और लिस्ट जारी की जाए।

राजस्थान के कई नेताओं ने उठाया मुद्दा

राजस्थान LDC भर्ती में लग रहे आरोपों के बाद इस मुद्दे को राजस्थान के कई नेताओं ने भी उठाया। सांसद किरोड़ी लाल मीणा जो कि राजस्थान सरकार में कैबिनट मंत्री रह चुके हैं, उन्होंने इस मुद्दे को उठाया। इसके अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल और बीजेपी नेता राजेंद्र राठौर ने इस मामले को लेकर सरकार को घेरा है।

मामला क्या है?

राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड, जयपुर ने लिपिक ग्रेड-2 और जूनियर असिस्टेंट की भर्ती के लिए 16 अप्रैल 2018 को विज्ञापन जारी किया था। उस विज्ञापन के मुताबिक स्टेट सेक्रेट्रिएट के लिए 329 सीट, राजस्थान लोक सेवा आयोग में 9 सीट और अधीनस्थ विभागों की 10917 सीटों के लिए आवेदन माँगे गए थे। तीनों को मिलाकर कुल 11255 पदों पर भर्तियाँ होनी थी। लेकिन इसके बाद प्री परीक्षा से पहले आयोग ने पदों की संख्या बढ़ा दी और इसके संबंध में 1 मार्च 2019 को एक नोटिस जारी किया गया। 

ये वो नोटिस है, जिसमें बताया गया कि 12906 पदों पर दस्तावेज सत्यापन होगा

1 मार्च 2019 के नोटिफिकेशन के अनुसार कुल पदों की संख्या 12456 हो गई, जिसमें RPSC के 35 सचिवालय के 329 और अधीनस्थ विभाग के 12092 पद थे। इसके बाद राजस्थान सरकार की अधिसूचना के अनुसार MBC वर्ग के 4% पद अतिरिक्त बढ़ाए गए और कुल पदों की संख्या 12906 हो गई। नॉन-टीएसपी के 562 पदों का हिसाब भी बोर्ड ने किसी दस्तावेज के जरिए अभी तक नहीं दिया है।

उम्मीदवारों का कहना है कि विडंबना यह है कि अभी तक बोर्ड ने नोटिस में कहीं नहीं बताया है कि कितने पदों पर LDC 2018 भर्ती की गई है और कितने अभ्यर्थियों को चयनित किया गया है और कितने पद MBC के अतिरिक्त सर्जित किए गए हैं। एलडीसी भर्ती के परिणाम के नोटिस को जब बोर्ड द्वारा जारी पिछली 6-7 भर्तियों से तुलना करें तो इसमें साफ-साफ नजर आता है कि पदों में घोटाला किया गया है और पारदर्शिता बिल्कुल नहीं है, कुछ छुपाया जा रहा है। बोर्ड द्वारा पदों की संख्या के बारे में किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी जा रही है।

मुकेश नाम के एक उम्मीदवार ने लिखा, ”LDC 2018 भर्ती में OBC के 227 और General के 360 पदों को मिलाकर 587 पदों की कटौती की है। यह सारी की सारी कटौती सिर्फ ओबीसी और जनरल वर्ग से की गई है। 2 साल की कठिन मेहनत के बाद परिणाम के अंतिम समय में आरक्षण के साथ छेड़छाड़ करके इस तरह कटौती असंवैधानिक है।”

एक उम्मीदवार लक्ष्मी ने लिखा, ”इतिहास में पहली बार किसी भर्ती के कुल पदों की संख्या नहीं बताई गई, मेरिट लिस्ट जारी नहीं की, वर्ग-वार और विभाग-वार रिक्त पदों की जानकारी नहीं दी लेकिन चुपके से काउंसलिंग करवा ली। भर्ती से संबंधित अधिकारी इस घोटाले को दबा रहे।”

सचिन नाम के एक उम्मीदवार ने ट्वीट कर लिखा, “LDC भर्ती में दस्तावेज सत्यापन के समय अधीनस्थ विभाग में सामान्य वर्ग की 5303 और OBC वर्ग की 2093 सीटें थीं तो अंतिम परिणाम में ये 4943 और 1866 कैसे रह गईं? चयन बोर्ड ARD और कार्मिक विभाग ने OBC,जनरल की 587 सीटों में हेरफेर कर दिया।”

राजदीप सरदेसाई ने किया झूठा दावा, कहा-कोरोना से लड़ने के लिए पंजाब को केंद्र ने दिए केवल ₹71 करोड़

राजदीप सरदेसाई ने एक बार फिर झूठा दावा किया है। शनिवार को उन्होंने ट्वीट कर बताया कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने पंजाब को केवल 71 करोड़ रुपए दिए हैं। उनके अनुसार उन्हें यह जानकारी पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने दी है।

इस झूठे दावे की बदौलत राजदीप ने यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की कि कॉन्ग्रेस शासित पंजाब के साथ भेदभाव हो रहा है। आबकारी राजस्व के जरिए पैसा जुटाने के लिए पंजाब में शराब की बिक्री शुरू करने की राज्य सरकार की दलील का समर्थन भी किया।

राजदीप ने कोरोना महामारी पर काबू पाने के लिए ज्ञान बघारते हुए यह भी दावा किया कि केंद्र से फंड मिले बिना इससे नहीं निपटा जा सकता। लेकिन, इंटरव्यू के दौरान उन्होंने केंद्र से मिलने वाली मदद को लेकर पंजाब के मंत्री के तरफ से किए गए दावे की पड़ताल करनी जरूरी नहीं समझी।

पंजाब सरकार को केंद्र से मिले 247 करोड़ रुपये

वर्ष 2020-21 के लिए राज्य आपदा प्रबंधन कोष (SDRMF) की पहली किस्त केंद्र सरकार जारी कर चुकी है। इस मद में राज्य सरकारों को मिली रकम 11,092 करोड़ रुपए है। राजदीप और पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल के दावों के उलट इसमें पजांब को 247 करोड़ रुपए मिले हैं।

आपदा की स्थिति में पीड़ितो तक मदद पहुॅंचाने के लिए एसडीआरएफ राज्य सरकारों का प्राइमरी फंड है। जेनरल केटेगरी के राज्यों के लिए 75% और केंद्रशासित तथा स्पेशल केटेगरी वाले प्रदेशों के लिए एसडीआरएफ में केंद्र का अंशदान 90% होता है।

एसडीआरएफ में केंद्र सरकार बड़ा अंशदान करती है। लिहाजा कोरोना से निपटने के लिए पंजाब सरकार को आवंटित रकम केंद्र की ओर से ‘मदद’ मानी जा सकती है।

इसके अलावा, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने अप्रैल में केंद्रीय करों और ड्यूटीज का राज्य के हिस्से का 823.16 करोड़ रुपए ट्रांसफर कर दिया है।

साथ ही पंजाब सरकार को केंद्र से रेवेन्यू डेफिसिएट ग्रांट के तौर पर 638.25 करोड़ रुपए भी मिले हैं। केंद्र ने पंजाब सरकार को जीएसटी मुआवजे के रूप में 1.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक ट्रांसफर किया है।

सोशल मीडिया यूजर्स ने जब राजदीप सरदेसाई की फर्जी दावे के लिए आलोचना की तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने पंजाब के मंत्री की बात को कोट किया था।

राजदीप ने आगे दावा करते हुए कहा कि पंजाब को दिया गया शेष धन केंद्र ने सामान्य व्यवसायिक उपयोग के लिए दिया था, क्योंकि यह संविधान के अनुसार वितरित किया गया था, जो कि केंद्रीय करों के हिस्से से दिया जाता है, इसका कोरोना वायरस से कोई संबंध नहीं है।

नालंदा: दुकान पर भगवा झंडा लगाने पर कार्रवाई, ऑपइंडिया के सवाल पर SHO ने कहा- गूगल सर्च करें

झारखंड के बाद अब बिहार के नालंदा में फल, सब्जी और किराने की दुकान पर भगवा झंडा लगाने को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की है। यहाँ पर बजरंग दल के दो सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। उन्होंने स्थानीय हिंदुओं से आग्रह किया था कि वे अपनी जरूरत की वस्तुएँ जैसे फल, सब्जी, राशन इत्यादि हिंदुओं की दुकान से ही खरीदें।

इस मामले पर कार्रवाई बिहारशरीफ प्रखण्ड विकास अधिकारी राजीव रंजन की शिकायत पर हुई। स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने इस FIR की कॉपी ट्विटर पर शेयर की है। इसके मुताबिक बजरंग दल नालंदा के सदस्य कुन्दन कुमार और धीरज कुमार के साथ ही 5 अज्ञात के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। इन पर आईपीसी की धारा 147, 149, 188, 153 (A) और 295 (A) के तहत कार्रवाई की गई है।

जब इस बाबत ऑपइंडिया ने लहेरी पुलिस स्टेशन के SHO रंजीत राय से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने मीडिया को कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, “आप जाकर गूगल पर सर्च कीजिए। हम आपसे फोन पर बात नहीं करेंगे।” दरअसल हमने ये जानने की कोशिश की थी कि 295 (A) क्यों लगाया गया है? 295 (A) की धारा तभी लगाई जाती है, जब किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाई जाती है। मगर यहाँ पर तो किसी की भी धार्मिक भावना को ठेस नहीं पहुँचाया गया था और ना ही अपमान किया गया था।

उल्लेखनीय है कि इसी तरह झारखंड के जमशेदपुर में कुछ फल विक्रेताओं ने अपनी दुकानों के आगे ‘हिंदू फल की दुकान’ लिखे पोस्टर लगाकर फल बेचना शुरू किया था। इसके बाद ऐसे दुकानदारों पर सांप्रदायिकता फैलाने के आरोप में पुलिस ने कार्यवाही की। इन दुकानदारों के खिलाफ ‘हिंदू’ शब्द लिखने के लिए कार्यवाही हुई। हालाँकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने पीड़ित फल विक्रेताओं से मिलकर उन्हें आश्वासन दिया है कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

दुकान पर हिंदू लिख देने से कार्रवाई करने वाली सरकार से जनता कई इस्लामी नाम वाले दुकानों की तस्वीरें ट्वीट कर पूछ रहे हैं कि अगर हिन्दू ऐसा नहीं कर सकते तो दूसरों को छूट क्यों है? विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि संगठन इस मुद्दे को बड़े स्तर पर उठाएगा।

उन्होंने कहा, “यदि भारत में अपने संस्थान पर हिन्दू लिखना, भगवा फहराना या विश्व हिंदू परिषद या बजरंग दल से जुड़ा होना अपराध है तो बंद करो उन सभी दुकान, होटलों व अन्य संस्थानों को भी, जिनसे जिहादी होने की बू आती है। क्या हिन्दू पर आक्रमण ही सेक्यूलरिज्म है? बिहार और झारखंड क्या पाकिस्तान में हैं? क्या बिहार व झारखंड सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी विक्रेता के सिर पर गोल टोपी, लम्बी दाढ़ी व ओछा पजामा नहीं होगा? कोई भी व्यवसायी इस्लाम, मोहम्मद व खान इत्यादि सांप्रदायिक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा?”

‘केवल हलाल मांस ही बेचेंगे’ – मीट कम्पनी Licious ने झटका के डिमांड को ठुकराया

बेंगलुरु में स्थित एक कम्पनी है लिसियस। यह कच्चे मांस की सप्लाई करती है। इसके अलावा वो मांस के ऐसे आइटम्स भी बेचती है, जिन्हें पका कर खाया जाता है। यानी, वो ‘रॉ मीट’ और ‘रेडी टू कूक’ मांस आइटम्स बेचती है। अब कम्पनी ने निर्णय लिया है कि वो अपनी बिजनेस पॉलिसी के तहत केवल हलाल मीट की ही सप्लाई करेगी। दरअसल, एक व्यक्ति ने गुस्से में कम्पनी को ईमेल किया था और कहा था कि उसने अब लिसियस के प्रोडक्ट्स का प्रयोग करना बंद कर दिया है।

ये सब शुरू हुआ एक ट्विटर ट्रेंड से। सोशल मीडिया पर लोगों ने भारत में सक्रिय मीट ब्रांड्स से पूछा कि उन्हें हलाल मीट खाने को क्यों बाध्य किया जा रहा है, जबकि उनके धर्म या संप्रदाय में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। अगर किसी ख़ास वर्ग को हलाल मीट ही चाहिए, तो बाकियों को भी उसी श्रेणी में रख कर हलाल ही क्यों खिलाया जा रहा है? यानी, मीट ख़रीदते समय एक आम आदमी के पास कोई विकल्प नहीं है। हलाल ही मिलेगा।

लोग इसीलिए गुस्सा थे क्योंकि उनकी भावनाओं की कोई भी कम्पनी सम्मान नहीं कर रही है और हलाल खाने को मजबूर कर रही है क्योंकि एक वर्ग विशेष केवल हलाल मीट ही खाता है। लिसियस को भेजे गए ईमेल में मनोहर नामक व्यक्ति ने कुछ तीखे सवाल पूछे:

“आखिर हलाल मीट ही क्यों? अगर हम हलाल न खाना चाहें, तो हमें अन्य विकल्प क्यों नहीं दिए जा रहे हैं? आप किसी अरब देश में मांस बेच रहे हो क्या? ये भारत है, यहाँ सभी धर्मों और सम्प्रदायों की भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए, एक वर्ग विशेष का नहीं। हलाल मीट के लिए न जाने कितने ही जमातियों को बहाल कर के रखा गया होगा, ताकि हलाल मीट की ही केवल सप्लाई हो। आप सेक्युलर बनिए लेकिन इस ‘हलाल इकॉनमी’ का अंग नहीं बनना चाहिए आपको।”

इसके बाद कम्पनी ने रविवार (अप्रैल 26, 2020) को दोपहर 2:19 बजे मनोहर के ईमेल का जवाब दिया और कहा कि लिसियस की ये बिजनेस पॉलिसी है कि सभी प्रकार के केवल हलाल सर्टिफाइड मांस ही बेचे जाएँगे (मेल की पहली लाइन ही पढ़िए, ध्यान से पढ़िए – we have decided to slaughter all our meat in halal way – मतलब मीट चाहे जैसा हो, कंपनी उसे हलाल ही करेगी)। इसका सीधा अर्थ है कि एक ग्राहक के पास हलाल मीट खाने के अलावा कोई चारा नहीं है, भले ही वो मजहब विशेष से नहीं हो।

मीट कम्पनी लिसियस ने बताई अपनी बिजनेस पॉलिसी

ये ईमेल [email protected] ईमेल एड्रेस से आया, जो इसी कम्पनी का आधिकारिक ईमेल एड्रेस है। कम्पनी के आधिकारिक वेबसाइट पर भी कॉन्टैक्ट ईमेल के रूप में इसी को दिया गया है। इसका अर्थ है कि लिसियस भारतीय बाजार में नॉन-हलाल मीट सप्लाई करने से साफ़ इनकार कर रहा है क्योंकि समुदाय विशेष वाले इसे नहीं खाते। जबकि, कई लोगों की माँग है कि उन्हें नॉन-हलाल मीट ही चाहिए। उनकी भावनाओं का क्या कोई सम्मान नहीं, इन कंपनियों की नज़र में?

झटका Vs हलाल मीट

बता दें कि ‘झटका‘ हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

‘Dr. झटका’ और ‘King of झटका revolution’  कहे जाने वाले रवि रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बात करते हुए ‘हलाल’ के आर्थिक पहलू की बात की थी। उन्होंने समझाते हुए कहा था कि किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं।

दिक्कत ये है कि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले! ‘हलाल इंडिया’ के एक उच्चाधिकारी ने शाकाहारी खाद्य पदार्थों को ‘हलाल सर्टिफिकेट’ देने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा था कि उनके अधिकारी फैक्ट्रियों तक जाते हैं और ये भी पता करते हैं कि रॉ-मैटेरियल्स कहाँ से आते हैं। 

हालिया कोरोना वायरस आपदा के बाद न्यूजीलैंड में समुदाय विशेष के कई लोग शाकाहारी हो गए हैं क्योंकि वहाँ लॉकडाउन नियमों के तहत कसाईखानों को बंद कर दिया गया है। वहाँ रहने वाले इस्लाम के समर्थकों का कहना है कि वो सब्जियाँ खाने को विवश हैं। एक व्यक्ति ने यहाँ तक माँग की है कि हलाल मीट ज़रूरी है क्योंकि ये स्वस्थ रखता है और जानवरों को मारे जाने वक्त सिर्फ़ अल्लाह का ही नाम लिया जा सकता है।

‘हिंदू फल दुकान’ पहुँचे पूर्व CM रघुवर दास, कहा- फल विक्रेताओं पर नहीं दर्ज होगा केस, हरसंभव मदद करेंगे

झारखंड के जमशेदपुर में दुकान पर विश्व हिंदू परिषद और ‘हिंदू फल की दुकान’ पोस्टर लगाने वाले विक्रेताओं पर कोई केस दर्ज नहीं होगा। यह जानकारी ट्वीट कर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने दी है। पुलिस कार्रवाई के बाद पूर्व सीएम पीड़ित फल विक्रेताओं की दुकान पहुॅंचे थे।

उन्होंने ट्वीट कर कहा, “आज पीड़ित फल विक्रेताओं से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मिला। उन्हें हरसंभव मदद के लिए आश्वस्त किया। साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों से बात हुई। फल विक्रेताओं पर कोई केस दर्ज नहीं होगा।”

पूर्व सीएम की इस पहल को सोशल मीडिया पर लोगों ने काफी सराहा है। साथ ही कहा है कि थोड़े समय के बाद ही सही, लेकिन झारखंड के लोगों को अफसोस जरूर होगा कि उन्होंने क्या खोया है।

एक यूजर ने लिखा, “धन्यवाद सर। उनको पोस्टर लगाने का भी हक है। यह माँग भी आप प्रप्रशासन से करें, क्योंकि मौजूदा झारखंड सरकार तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “झारखंड में तालिबानी राज आ चुका है। अब जजिया कर देना बाकी रह गया है हिंदूओं को। भाजपा सरकार का हारना क्या होता है, अब झारखंड के हिंदुओं को समझ आ रहा होगा।”

कुमार अभिषेक नाम के एक यूजर ने रघुवर दास का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा कि इसे कहते हैं गरीब जनता का का सच्चे साथी। मामला सामने आते ही फल विक्रेताओं से मिलकर इस तुगलकी कार्रवाई के खिलाफ उनका समर्थन किया।

एक यूजर ने लिखा, “सही मायने में इसको कहते हैं जनता की सरकार। मुझे तो ताज्जुब है कि सरयू राय अभी तक उस फल वाले से मिलने क्यों नहीं गए।”

गौरतलब है कि इससे पहले रघुवर दास ने कहा था कि अगर व्यापारियों पर किया गया केस तत्काल वापस नहीं लिया गया तो भाजपा बड़ा आंदोलन करेगी। उन्होंने कहा था कि राज्य सरकार तुष्टिकरण की राजनीति के कारण आजीविका चला रहे छोटे-छोटे व्यापारियों को तंग करना बंद करे। 

झारखंड के पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता सीपी सिंह ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि किस कानून के तहत पोस्टर हटाया गया? झारखंड में हिन्दू धर्म का पालन अपराध है? झारखंड सरकार ‘हलाल सर्टिफाइड मार्क’ कब हटा रही वस्तुओं व दुकानों से? एक सम्प्रदाय विशेष के तुष्टिकरण की पराकाष्ठा है। मौलिक अधिकारों का हनन है।

विहिप के प्रवक्ता ने भी एक के बाद एक ट्वीट कर अपनी बात रखी थी। उन्होंने पूछा था कि क्या भारत मे हिंदू होना अपराध है? या विहिप बजरंग दल व भगवा से जुड़ना अपराध है? उनका सवाल था कि क्या जिन मीट की दुकानों, बूचड़खानों या पैकेटों पर हलाल शब्द लिखे होंगे, उन सभी साम्प्रदायिक व धार्मिक विद्वेष फैलाने वाली शब्दावली को भी ये सरकारें बंद करेंगीं? यह बड़ा मामला है क्योंकि सिर्फ़ बैनर नहीं हटाया गया है। भगवान श्रीराम व भगवान शिव की तस्वीर भी हटाई गई है।

खाने की थाली को मारी लात, मॉंग रहे बिरियानी और मांसाहार: कानपुर में जमाती के उपद्रव से अस्पताल त्रस्त

देश में कोरोना वायरस के संक्रमण को बढ़ाने में तबलीगी जमात के लोगों की बड़ी भूमिका है। आँकड़ों से भी यह जगजाहिर है। बावजूद इसके उनकी करतूतों पर लगाम लगता नहीं दिख रहा। देश के अन्य हिस्सों की तरह उत्तर प्रदेश के कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में भी जमाती भर्ती हैं। उनकी हरकतों से पूरा अस्पताल प्रशासन परेशान है।

उनकी मनमानी और उपद्रव को मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. आरती लालचंदानी ने खुद बयॉं किया है। उनके मुताबिक बीते दिनों जमातियों ने वार्ड बॉय के साथ मारपीट की। खाने की थाली में लात मार दी। वे बिरयानी और नॉनवेज मॉंग रहे हैं।

डॉ. आरती लालचंदानी ने बताया कि मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में 70 लोग भर्ती हैं। इनमें से 60 कोरोना पॉजिटिव हैं। इनमें से अधिकांश जमाती हैं। उनका कहना है कि जब से वार्ड में कुछ नौजवान जमाती भर्ती हुए हैं, तब से ही इन लोगों ने पूरे स्टाफ को परेशान कर रखा है। इन लोगों को समय से खाना मिल रहा। मिनरल वाटर और फल दिया जा रहा। लेकिन, उनकी फरमाइश खत्म नहीं हो रही।

प्रिंसिपल ने बताया कि ये लोग लगातार मेडिकल स्टाफ को तंग कर रहे हैं। उनके साथ बदतमीजी कर रहे हैं। वार्ड में उपद्रव कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हद तो तब हो गई जब सोमवार को खाना देने गए वार्ड बॉय के हाथ में रखी थाली को जमातियों ने लात मार दी और कहा कि हमें खाने में नॉनवेज और बिरयानी चाहिए, जबकि हम पहले ही कह चुके हैं कि ये सब हम उपलब्ध नहीं करा सकते।

इतना ही नहीं जमातियों ने वार्ड बॉय को पकड़कर एक-दो थप्पड़ जड़ दिए। उसे जान बचाकर भागना पड़ा। प्रिंसपिल ने कहा कि मैं बहुत दुखी हूँ। एक तरफ तो हम मौत से जंग लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ ये लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं।

इस अस्पताल में भर्ती जमातियों की करतूत पहले भी सामने आ चुकी है। क्वारंटाइन वार्ड में भर्ती जमातियों ने मेडिकल व पैरामेडिकल स्टॉफ का सहयोग न करते हुए उनके साथ बदसलूकी की थी। वार्ड में थूक-थूककर गंदगी फैलाई थी और सोशल डिस्टेंसिंग का मजाक उड़ाया था। क्वारंटाइन में रहने के बावजूद भी एक ही बेड पर बैठने और जाँच कराने से इनकार भी कर दिया था।

हालॉंकि बाद में ऐसी खबरें आई थी कि जमातियों के व्यवहार में बदलाव आया है। डॉ. आरती लालचंदानी ने कहा था, “अब अस्पताल में भर्ती संक्रमित जमातियों को अपनी भूल का एहसास हो गया है। इससे पहले वे संक्रमण फैलाने के लिए तरह-तरह के तरीके अपना रहे थे, लेकिन पूरे विश्व में बिगड़ते हालात को देख उनके व्यवहार में बदलाव आया है। अब वे आसानी से दवाइयाँ खा रहे हैं, क्योंकि यह उनके भले के लिए ही है।” लेकिन अब वे एक बार फिर से उपद्रव पर उतर आए हैं।

वो तानाशाह जिनकी ‘मौत’ से ज्यादा Memes की है चर्चा: नॉर्थ कोरिया वाले किम जोंग उन नाम है उनका

उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन की असफल हार्ट सर्जरी की खबर मिलते ही सोशल मीडिया पर अफवाहों की बौछार लग गई। सोशल मीडिया यूज़र्स ने उत्तर कोरिया के नए सुप्रीम लीडर के रूप में उनकी बहन किम यो जोंग को बताते हुए उन पर तमाम तरह के चुटकुलें बनाकर इंटरनेट पर बाढ़ ला दी।

कुछ ने उनकी तुलना पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी कर दी।

और जब सभी ने इस बात को अपने-अपने अंदाज में पेश किया, तो घाना पॉलबेयर्रस कैसे पीछे रह सकता है।

ऐसा लग रहा है जैसे लॉकडाउन ने सच में सबके अंदर छुपी हुई भावनाओं को बाहर निकल दिया है।

सोशल मीडिया यूज़र्स ने तो ‘KimJongUndead’ का हैशटेग भी ट्रेंड में ला दिया है।

उत्तर कोरिया की एक न्यूज एंकर हैं, नाम है री चुन-ही। वो समाचार को बेहद नाटकीय तरीके से प्रस्तुत करती हैं। उत्तर कोरिया द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों पर जब वो एंकरिंग कर रही थीं, तो काफी चर्चा में आई थीं।

उन्होंने किम जोंग उन के पिता किम जोंग द्वितीय की मौत पर भी लगभग रोते हुए खबर प्रसारित किया था।

किम जोंग उन की मौत और अफवाह

एक सर्जरी के असफल होने के बाद किम जोंग उन के मौत की अफवाहों के बारे में खबरें आई हैं। किम जोंग उन हाल ही में 15 अप्रैल को अपने दादा के जन्मदिन का जश्न मनाने से चूक गए थे। इसने उनकी स्वास्थ्य स्थितियों के बारे में अटकलों और अफवाहों को बढ़ा दिया, जैसा कि घटना से केवल तीन दिन पहले, किम जोंग उन ने दिल की सर्जरी करवाई थी। यह नॉर्थ कोरिया में साल का सबसे बड़ा दिन माना जाता है क्योंकि यह उस राष्ट्र के संस्थापक किम जोंग उन के दादा, किम II-सुंग का जन्मदिन है।

ऐसा कभी नहीं हुआ कि किम जोंग उन इस कार्यक्रम में न गए हों, और यही वजह है कि उनके मौत की अफवाहों को इस बात से बढ़ावा मिल गया हो।

उत्तर कोरिया की राज्य मीडिया ने 11 अप्रैल को बताया कि किम ने सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया की पोलित ब्यूरो की बैठक में भाग लिया और अगले दिन रिपोर्ट किया कि किम ने “एक परसूट असॉल्ट वाले विमान समूह का निरीक्षण किया”, हालाँकि प्रशासन ने उस यात्रा की तारीख का खुलासा नहीं किया था ।

बीमारी की पहली रिपोर्ट

एक गुमनाम स्रोत ने सियोल स्थित एक वेबसाइट डेली एनके को बताया कि वह अलग-अलग देशों के अंदर मुखबिरों से जानकारी इकट्ठा करता है। उन्होंने कहा कि वह पिछले अगस्त से हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। हालाँकि, उनका स्वास्थ्य कथित तौर पर “माउंट पाकटु में बार-बार आने के बाद बिगड़ गया”। यह, कथित तौर पर अत्यधिक धूम्रपान, मोटापा और अधिक काम करने के कारण था। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह खबर आई।

बाद में कुछ रिपोर्ट्स सामने आईं कि दक्षिण कोरिया और अमेरिका में खुफिया एजेंसियाँ इस ​​दावे पर नजर रखे हुई थी। इस खबर को पोस्ट करते ही, अफवाहों का दौर शुरू हो गया क्योंकि US मीडिया ने बताया कि किम जोंग उन सर्जरी के बाद “गंभीर रूप से बीमार” थे।

उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग उन

उत्तर कोरिया अपने नेता के आस-पास की किसी भी सूचना को बाहर नहीं जाने देता है। उन्हें वहाँ के देवता के समान माना जाता है और देश से बाहर खुफिया जानकारी जुटाना शायद ही संभव है।

36 वर्षीय किम ने दिसंबर 2011 में अपने पिता की मृत्यु के बाद सत्ता संभाली और वह देश पर शासन करने वाले अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं।

किम को बहुत धूम्रपान करने वाले के रूप में जाना जाता है। हाल के महीनों में सैन्य अभ्यास में दिखाई देने और बएकदू पर्वत पर एक सफेद घोड़े की सवारी करते हुए देखा गया। नॉर्थ कोरिया के प्रचार विभाग का यह मानना है कि किम जोंग उन के दादा ने जापानी औपनिवेशिक कब्जा करने वालों से लड़ने के लिए गुरिल्ला युद्ध शैली का इस्तेमाल किया था।

2014 में, किम जोंग उन सितंबर की शुरुआत में 40 दिनों के लिए गायब हो गए थे। तब भी इस तरह की अटकलें पैदा हो गई थीं, जिसमें उन्हें अन्य राजनीतिक दलालों द्वारा तख्तापलट कर बाहर कर दिया गया था। लेकिन फिर उन्होंने दोबारा वापसी की। उस समय राज्य के मीडिया ने स्वीकार किया था कि वह “असहज शारीरिक स्थिति” से पीड़ित थे, लेकिन अफवाहों को संबोधित नहीं किया कि वह गाउट से पीड़ित थे।