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लॉकडाउन में प्रसार भारती ने किसी कर्मचारी को नहीं निकाला: द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस ने फैलाया झूठ

पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत में भी कोरोना वायरस का संक्रमण फैलता जा रहा है। इसको देखते हुए सरकार ने 21 दिनों के लिए पूर्ण लॉकडाउन किया हुआ था। फिर हालात को मद्देनजर रखते हुए इसकी समयसीमा बढ़ाकर 3 मई तक कर दी गई। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यावसायिक घरानों से अपील की थी कि वे किसी भी कर्मचारी को उनकी नौकरी से न निकालें। साथ ही उन्होंने उनसे कर्मचारियों के प्रति संवेदना दिखाते हुए उनकी सैलरी भी कम करने या फिर नहीं काटने का अनुरोध किया था। उनका कहना था कि लॉकडाउन के कारण कई कर्मचारी बिना वेतन के अपनी आश्यकताएँ पूरी नहीं कर सकेंगे।

इन दिनों देश कोरोना वायरस महामारी से निपट रहा है और साथ ही आर्थिक मंदी से भी जूझ रहा है। मगर ऐसे में भी कुछ मीडिया घराने हैं, जो मोदी सरकार को निशाना बनाने में पीछे नहीं रहते और फ़र्जी खबरें फैला कर लोगों में दहशत पैदा करने का काम कर रहे हैं। यह फर्जी खबरें ‘द हिंदू’और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के द्वारा तब प्रकाशित की गई, जब देश महामारी के दौर से गुजर रहा है। इसमें प्रसार भारती को निशाना बनाने के मकसद से लेख लिखा गया। जिसमें यह आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री के अनुसार लॉकडाउन की अवधि को देखते हुए और कर्मचारियों को को जॉब से न निकालने के निर्देश के बावजूद AIR ने कोरोना वायरस के महामारी की बीच अपने कर्मचारियों को दिया है।

इंडियन एक्सप्रेस ने फर्जी खबरें फैलाईं

इंडियन एक्सप्रेस ने ‘दिल्ली कॉन्फिडेंशियल’ नाम के एक सेक्शन में ‘अगेंस्ट अपील’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। 16 अप्रैल, 2020 को प्रकाशित लेख में दावा किया गया था कि प्रधानमंत्री से अपील के बावजूद प्रसार भारती ने अपने कर्मचारियों का वेतन कम कर दिया था।

लेख में कहा गया, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को नियोक्ताओं को अपने कर्मचारियों और लेबर के प्रति संवेदनशील होने को कहा। साथ ही वित्त मंत्रालयों ने उल्लेख किया था कि संविदा और आकस्मिक श्रमिकों को पूर्ण भुगतान भी किया जाना चाहिए और लॉकडाउन के दौरान भी उन्हें ड्यूटी पर माना जाना चाहिए। हालाँकि, ऑल इंडिया रेडियो ने दोनों की सलाह को नज़रअंदाज़ किया। कई कैजुअल कर्मचारी, जो आकाशवाणी के लिए प्रस्तुतकर्ता, निर्माता, पटकथा-लेखक आदि के रूप में काम करते हैं, उन्हें केवल उन दिनों के लिए भुगतान किया जाता है, जब उन्हें मार्च में बुलाया गया था, हालाँकि उनमें से कई लोगों ने और भी शो में आने की इच्छा जताई थी।”

इंडियन एक्सप्रेस के लेख में निम्नलिखित बातों का उल्लेख किया गया है:

1. भारत की सार्वजनिक सेवा प्रसारक स्वयं प्रधानमंत्री की अपील का पालन नहीं कर रही है।

2. प्रसार भारती के “कर्मचारियों” को पूरी तरह से भुगतान नहीं किया जा रहा।

3. प्रसार भारती उन ‘कर्मचारियों’ को ही भुगतान कर रही है, जिसे उसने अपनी आवश्यकता के अनुसार बुलाया था और उन्हें पूरी राशि देने के बजाए सिर्फ उतनी राशियों का ही भुगतान कर रहा है जितने दिन उन्हें बुलाया गया था।

4. कर्मचारी काम करना चाहते हैं और इसके लिए भुगतान भी चाहते हैं, लेकिन प्रसार भारती लॉकडाउन के दौरान लागत में कटौती के प्रयास में उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दे रहा है।

इसमें सबसे बड़ी बात यह थी कि “हो सकता है कि इन्होंने सलाह को अनदेखा किया है।” हालाँकि इस झूठी खबर की पुष्टि करने के लिए इंडियन एक्सप्रेस के पास कोई आधार नहीं था। उसके लेख से स्पष्ट था कि उसने द्वेष और फर्जी खबर फैलाने के लिए इस तरह का लेख लिखा। मगर उनका यह झूठ अधिक समय तक नहीं छिप सका। ऑपइंडिया ने प्रसार भारती द्वारा इंडियन एक्सप्रेस को लिखा गया पत्र ढूँढ़ निकाला। जिसमें उसके झूठ की सारी पोल-पट्टी खुल गई है।

पत्र में प्रसार भारती का कहना है कि यह लेख तथ्यात्मक रूप से गलत है। यह न केवल ऑल इंडिया रेडियो की छवि को खराब कर रहा है, बल्कि इसमें पाठकों को गुमराह करने की भी कोशिश की गई है।

प्रसार भारती ने अपने संस्थान की स्थिति को स्पष्ट करते हुए कुछ बातें बताई हैं।

1. प्रसार भारती द्वारा इंडियन एक्सप्रेस को लिखे गए पत्र में कहा गया है कि इंडियन एक्सप्रेस जिनके बारे में बात कर रहा है, वह प्रसार भारती के “कर्मचारी” नहीं हैं, बल्कि “अंशकालिक फ्रीलांसर हैं जो केवल एक जरूरत के आधार पर लगे हुए हैं और कैजुअल असाइनमेंट के रूप में काम करते हैं। उन्हें उनके द्वारा किए गए असाइनमेंट के लिए भुगतान किया जाता है।”

2. स्पष्ट कर दें कि इन व्यक्तियों और प्रसार भारती के बीच कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं है।

3. इन कैजुअल असाइनी को लॉकडाउन के दौरान भी उनके द्वारा किए गए असाइनमेंट के लिए भुगतान किया जा रहा है। इनका असाइनमेंट के अलावा ऑल इंडिया रेडियो से भुगतान प्राप्त करने का कोई अनुबंध नहीं है। ये जितना असाइनमेंट करते हैं, उन्हें उसके लिए भुगतान किया जाता है।

4. वे अपनी इच्छानुसार किसी अन्य सार्वजनिक या फिर निजी संगठनों में नौकरी करने या फिर बिजनेस के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसे व्यक्ति शिक्षक, मैनेजर, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील या बिजनेसमैन हो सकते हैं। ये अपने खाली समय में कैजुअल असाइनी के रूप में ऑल इंडिया रेडियो में योगदान दे सकते हैं।

दरअसल प्रसार भारती के सूत्र ने ऑपइंडिया को बताया कि कई असाइनी आकाशवाणी सेवाओं जैसे- एफएम रेनबो, विविध भारती, आकाशवाणी जैसे अन्य समाचार के लिए लॉकडाउन के दौरान भी काम कर रहे हैं।

प्रसार भारती की स्पष्टीकरण के बाद यह बात साफ हो गई है कि संस्थान ने किसी भी तरह से प्रधानमंत्री द्वारा की गई अपील को नजरअंदाज नहीं किया है। कैजुअल असाइनमेंट्स के लिए उसी तरह से भुगतान किया जा रहा है, जैसे पहले किया जाता था। इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि प्रसार भारती अपने “कर्मचारियों” को कम भुगतान कर रहे हैं, जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत है और मनगढ़ंत है।

अब हम आपको बताते हैं कि किस तरह से द हिंदू ने कोरोनोवायरस लॉकडाउन के बीच प्रसार भारती से कर्मचारियों को निकालने की फर्जी खबर फैलाई।

फर्जा खबर फैलाने के लिए जाना जाने वाले द हिंदू ने एक बार फिर से ऐसा ही किया है। 16 अप्रैल को प्रकाशित एक लेख में, द हिंदू ने दावा किया कि दिल्ली एफएम गोल्ड के 80 रेडियो जॉकी (RJs) काम से बाहर हैं और सरकार के आदेशों के बावजूद उन्हें भुगतान नहीं किया गया है।

Fake news published by The Hindu

दिलचस्प बात यह है कि लेख में लेखक ने यह स्वीकार किया कि वे कैजुअल वर्कर हैं। कैजुअल वर्कर होने के नाते, उन्हें केवल तभी बुलाया जाता है जब उनकी जरूरत होती है और इसलिए उनके बीच नियोक्ता-कर्मचारी का कोई संबंध नहीं होता है। दिल्ली एफएम गोल्ड ऑल इंडिया रेडियो की पेशकश है और इसलिए यह लेख सरकार को टारगेट करने के लिए लिखा गया लगता है।

यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि जब कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं है, और इन RJ को जरूरत पड़ने पर बुलाया जाता है तो फिर ये किसी के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि वो उन पर दबाव डाले कि उन्हें असाइनमेंट के लिए बुलाया ही जाए। यह संस्थान के ऊपर निर्भर करता है कि वो कब उन्हें असाइनमेंट के लिए बुलाएँगे, कब नहीं। दरअसल इनकी हेडलाइन ही अतार्किक और हास्यास्पद है, क्योंकि कोई भी रेडियो चैनल पेरोल पर 80 रेडियो जॉकी नहीं रखता है।

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने भी द हिंदू की खबर का खंडन किया।

क्या कहा प्रसार भारती के सीईओ ने

प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर ने कहा, “विभिन्न पैनल से निकाले गए कई कैजुअल असाइनी उनकी उपलब्धता और आवश्यकता के आधार पर @AkashvaniAIR के नेटवर्क पर लगे रहते हैं और 6 असाइनमेंट की उचित सीमा के भीतर काम करते हैं।” दिलचस्प बात यह है कि शशि शेखर ने यह भी खुलासा किया कि प्रति व्यक्ति 6 असाइनमेंट की सीमा है जो पहले से ही ऑल इंडिया रेडियो से संबंधित है।

उन्होंने आगे कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मीडिया तथ्यात्मक स्थिति की पुष्टि किए बिना कैजुअल असाइनी की स्थिति के बारे में भ्रामक विवरण प्रकाशित कर रहा था।

झूठ फैलाने का इंडियन एक्सप्रेस का पुराना इतिहास रहा है। बुधवार (अप्रैल 15, 2020) को इंडियन एक्प्रेस में एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें दावा किया गया कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में धर्म व मजहब को देखते हुए मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड बनाए गए हैं। रिपोर्ट में वजन डालने के लिए ये भी कहा गया कि अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट गुणवंत एच राठौड़ ने खुद दावा किया है कि सरकार के फैसले के अनुसार हिंदुओं और मजहब विशेष के लिए अलग-अलग वार्ड तैयार किए गए हैं। गुजरात सरकार ने ऐसे किसी भी वर्गीकरण को ख़ारिज कर दिया। गुजरात के स्वास्थ्य विभाग ने भी इस बिंदु को पूरी तरह से खारिज करते हुए अपनी ओर से बयान जारी किया।

इसमें कहा गया कि स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में किसी भी मरीज के लिए धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं किया गया है। कोरोना मरीजों को उनके लक्षण, उनकी गंभीरता के आधार पर और डॉक्टरों की सिफारिशों आदि पर इलाज किया जा रहा है।

इसके अलावा डॉक्टर राठौर का खुद भी इस संबंध में बयान आया था। उन्होंने कहा था, ”मेरा बयान कुछ खबरों में गलत तरीके से पेश किया जा रहा है कि हमने हिंदू और दूसरे मजहब के लिए अलग-अलग वार्ड बनवाएँ। मेरे नाम पर गढ़ी गई ये रिपोर्ट झूठी और निराधार है। मैं इसकी निंदा करता हूँ।” 

शहजादी को जमातियों की आलोचना पसंद नहीं, यूएई में भारतीय नागरिक से कहा- देश से बाहर फिकवा दूँगी

यूनाइटेड अरब अमीरात की प्रिंसेस हेंड अल कासिमी ने एक व्यक्ति को इसीलिए देश से बाहर निकाल फेंकने की धमकी दी, क्योंकि उसने तबलीगी जमात के उन लोगों का बचाव न करने की सलाह दी थी, जिन्होंने दुनिया भर के कई देशों में कोरोना का संक्रमण फैलाया। भारत में भी दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ मस्जिद में हज़ारों जमाती जुटे थे, जो लॉकडाउन के बावजूद मजहबी कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे थे। इसके बाद वो कई राज्यों में फ़ैल गए, जिससे कोरोना का संक्रमण देश भर में तेज़ गति से फैला।

सौरभ उपाध्याय नामक व्यक्ति ने लिखा था कि मजहब विशेष को तबलीगी जमात वालों को बचाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उन्होंने लिखा कि जो क्षति पहुँचाई गई है, वो हो चुका है और आप कम से कम इसको स्वीकार कर के इसकी निंदा तो कर ही सकते हैं। उन्होंने लोगों को इस्लामी कट्टरपंथियों की तरह व्यवहार न करने की सलाह दी। उन्होंने ये भी याद दिलाया कि कोई भी हिन्दू आसाराम के अपराधों का बचाव नहीं करता। उपाध्याय ने मौलाना साद को आतंकी बताते हुए सलाह दी थी कि उनके तलवे चाटना बंद करें।

एक अन्य ट्वीट में उपाध्याय ने पूछा कि ‘शांतिदूतों’ और थूकने में क्या कनेक्शन है? उन्होंने पूछा था कि क्या ये 2020 में जिहाद के लिए एक नया तरीका गढ़ा गया है? सौरभ ने लिखा कि उन्हें लगता है कि ‘वो’ अभी भी 1400 साल पहले ही अटके हुए हैं और वो विकास को जरा भी पसंद नहीं करते। इसी बात पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए यूएई की प्रिंसेज ने कहा कि ये रेसिज्म और भेदभाव को बढ़ावा देने वाला ट्वीट है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को सज़ा दी जाएगी और उन्हें देश छोड़ने को कहा जाएगा।

दरअसल, खाड़ी देशों में लोगों को इस्लामोफोबिया फैलाने का आरोप लगा कर सज़ा दिलवाने की कोशिश की जाती है। भारतीय कट्टरपंथियों के एक खास वर्ग द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाने का भयावह प्रयास चल रहा है। ये वर्ग खास तौर पर खाड़ी देशों में रहने वाले हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

बंगाल: राज्यपाल ने ममता सरकार पर साधा निशाना, कहा- मुफ्त राशन गरीबों के लिए, तिजोरी भरने के लिए नहीं

पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की कार्यशैली पर लॉकडाउन के बीच राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने सवाल उठाए हैं। राज्यपाल ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि निशुल्क राशन गरीबों के लिए हैं, तिजोरियों में बंद करने के लिए नहीं है। धोखाधड़ी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। दरअसल, बंगाल के कई इलाकों में मुफ्त राशन वितरण में भारी अनियमितताएँ बरते जाने की खबरें सामने आई हैं।

राज्यपाल धनखड़ ने कहा कि कोविद-19 के खिलाफ हमें जमीन पर एकजुट होकर लड़ना होगा न कि मीडिया और लोगों के बीच जाकर। इस पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) में घोटाले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। यह एक बड़ी चिंता का विषय है। पीडीएस का राजनीतिक अपहरण हो रहा है जो कि बड़ा अपराध है। जरूरतमंदों के लिए मुफ्त राशन है न की तिजोरी में रखने के लिए है। इस में गड़बड़ी करने वालों से सख्ती से निपटा जाए। 

आपको बता दें कि इससे पहले धनखड़ ने कहा था कि बंगाल में लॉकडाउन का पालन कराने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर विचार होना चाहिए। उन्होंने लॉकडाउन का पालन कराने में अक्षम पुलिस अधिकारियों को भी प्रदेश सरकार से तुरंत हटाने की माँग की थी।

वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राशन वितरण में गड़बड़ी को लेकर मिली कई शिकायतों के बाद तत्काल प्रभाव से राज्य के खाद्य आपूर्ति विभाग के प्रधान सचिव को हटा दिया है। उसके बाद भी कई जगहों पर अनियमितता के मामले सामने आ रहे हैं। विपक्षी दल खासकर भाजपा और माकपा निशुल्क राशन के राजनीतिक आवंटन का आरोप लगा रहे हैं।

इससे पहले बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ का नाम लिए बिना उनपर निशाना साधते हुए कहा था कि कुछ लोगों के पास राजनीति में शामिल होने के अलावा कोई और काम नहीं है। ममता ने बेहतरीन काम करने के लिए राज्य पुलिस और प्रशासन की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह संकट के समय राजनीति और आलोचना करने वालों को ‘सच्चे इंसान’ नहीं मानतीं।

गालीबाज एजाज खान गिरफ्तार, मुंबई पुलिस ने लिया एक्शन: आखिरी बार लंगड़ाते निकले थे जेल से

फेसबुक लाइव और सोशल मीडिया पर अपशब्दों के लिए बॉलीवुड अभिनेता एजाज खान (Ajaz Khan) को मुम्बई पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने हाल ही में पत्रकारों को गाली देते हुए कहा था कि उन्हें और उनके परिवार को कोरोना हो जाए। एजाज खान पर मानहानि , घृणा फैलाने और बन्द के नियमों के उलंघन का केस दायर किया गया है।

एजाज खान ने फेसबुक लाइव में कोरोना वायरस को भाजपा की साजिश बताते हुए PM मोदी पर समुदाय विशेष के साथ भेदभाव का आरोप लगाया था।

गत बुधवार रात 12:30 बजे एजाज खान ने फेसुबक लाइव किया था। उन्होंने लाइव में मजहब को लेकर कई बातें कही। लाइव में उन्होंने कहा कि हर बात के लिए उनके मजहब वालों को ही जिम्मेदार माना जाता है।

मुम्बई के खार पुलिस स्टेशन में एजाज खान के खिलाफ आईपीसी 153A, 117, 121 धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है।

उन्होंने जनता से भी लाइव में प्रश्न पूछते हुए कहा- “लेकिन कभी सोचा है कि आखिर ये कौन हैं? जो ये साजिश कर रहे हैं।” वीडियो में एजाज ने इन सब चीज़ों के लिए पीएम मोदी और भाजपा को जिम्मेदार बताया था। उन्होंने वीडियो में ये भी कहा कि ये एक साजिश है, जिससे कोरोना से ध्यान हटाने के लिए सभी लोगों का ध्यान सांप्रदायिक जैसे गंभीर मुद्दे की ओर चला जाए। वीडियो के अंत में उन्होंने कहा कि ऐसे लोग जो देश में ऐसा कर रहे हैं, उन सबको ही कोरोना हो जाए।

इसके ठीक अगले दिन एजाज खान ने ट्विटर पर कुत्ते की फोटो डालकर भाजपा समर्थकों पर भद्दे व्यंग्य किए थे, जिसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुम्बई पुलिस को इस पर संज्ञान लेने को कहा था।

ज्ञात हो कि यह पहली बार नहीं है जब एजाज कहना को मुम्बई पुलिस ने सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया हो। आखिरी बार जब उन्हें गिरफ्तार किया गया था, तो वो जेल से वापस लंगड़ाते हुए बाहर आए थे।

₹2000 करोड़ कमाए आमिर ने, गाली सुन रहीं बबीता: जायरा का गुणगान करने वालों को रास नहीं आ रही सच्चाई

भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रसार के लिए तबलीगी जमात के वे हज़ारों लोग जिम्मेदार हैं, जिन्होंने निजामुद्दीन स्थित मरकज़ में जुटान किया और लॉकडाउन के बावजूद मजहबी कार्यक्रम करते रहे। आज जब हज़ारों जमाती संक्रमित हैं और कइयों को उन्होंने संक्रमित किया है, उन्हें दोष देना अपराध माना जाने लगा है। वामपंथी इसे सही नहीं मानते। कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल ने जब जमातियों की हरकतों की निंदा की तो ट्विटर ने उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया। पहलवान बबीता फोगाट ने आवाज़ उठाई तो उनकी ट्रोलिंग की गई। बावजूद इसके वो अपने स्टैंड पर कायम हैं।

बबीता का पूछना है कि क्या जमातियों की हरकतों की निंदा करना और उन्होंने जो किया, उसे लेकर सच बोलना अपराध है? उनके उस वीडियो को आम जनता ने तो हाथों हाथ लिया लेकिन गिरोह विशेष को ये कुछ रास नहीं आया। उन्हें याद दिलाया जाने लगा कि कैसे एक मुस्लिम यानी आमिर ख़ान ने ‘दंगल (2016)’ फिल्म बना कर फोगाट बहनों को ‘लोकप्रिय’ बना दिया। उन्हें एक मुस्लिम का ‘एहसान’ ऐसे याद दिलाया जाने लगा, जैसे ‘दंगल’ की कमाई का पूरा रुपया उन्हें ही मिला। क्या फोगाट बहनों ने आमिर के पाँव पकड़े थे कि वे उनके परिवार पर फ़िल्म बनाएँ? नहीं, आमिर ख़ान उनकी कहानी लेने गए थे।

अगर ‘दंगल’ के वैश्विक कलेक्शन को देखें तो फ़िल्म ने लगभग 2000 करोड़ रुपए का कारोबार किया था। इसमें चीन में हुई बम्पर कमाई भी शामिल है। कमाई के मामले में बाहुबली-2 ही केवल इसके बराबर में खड़ी है। एक और बात जानने लायक ये है कि ‘दंगल’ को ख़ान दम्पति और यूटीवी के मालिक सिद्धार्थ रॉय कपूर ने मिलकर प्रोड्यूस किया था। कमाई हुई आमिर ख़ान की, नाम फोगाट बहनों का, रुपए गए आमिर के पास, फिर बबीता को इस चीज का ‘एहसान’ याद दिला रहे हैं वामपंथी? वो भी ऐसे समय में, जब वो सच बोल रही हैं और कोरोना करियर बने जमातियों का विरोध कर रही हैं।

बबीता फोगाट ने किसी मजहब का नाम तो नहीं लिया। उन्होंने इस्लाम को कुछ नहीं कहा। फिर ‘आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता’ कहने वाले ये कैसे समझ गए कि जमातियों का मजहब इस्लाम होता है और तबलीगी जमात वालों के ख़िलाफ़ बोलना इस्लाम पर आरोप है? ये दोहरा रवैया क्यों? पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों पर मुस्लिम बहुल इलाक़ों में हमले हुए लेकिन उनकी निंदा करना वामपंथियों को रास नहीं आता। क्या एक वर्ग विशेष को ख़ास अधिकार मिला हुआ है कि वो मारकाट करे और फिर ख़ुद को पीड़ित बता कर असली पीड़ितों को बदनाम करे? अरुंधति सरीखों ने इसका बीड़ा उठाया हुआ है।

अकबर को हम नहीं जानते थे क्या? उसे ह्रितिक रोशन ने लोकप्रिय बनाया? मिल्खा सिंह को तो फरहान अख्तर के पाँव छूने चाहिए इस हिसाब से? मेरीकॉम को भी प्रियंका चोपड़ा के ‘एहसान’ तले दबा होना चाहिए। अगर किसी गुमान हस्ती पर फ़िल्म बनाई जाती है तो एक बार, जिसके बारे में हरियाणा से लेकर देश-दुनिया में चर्चा हो रही है, उस पर फ़िल्म बनाने का मतलब उसे लोकप्रिय बनाना नहीं, बल्कि उसके संघर्षों को जनमानस तक ले जाना ध्येय होता है, जिससे कमाई तो होती ही होती है। मिल्खा सिंह ने मात्र एक रुपए में अपनी कहानी दी, जिस फिल्म ने दुनिया भर में 210 करोड़ रुपए की कमाई की।

बबीता फोगाट कॉमनवेल्थ गेम्स और चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। एशियाई और वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्हें मेडल मिले हैं। उनकी बड़ी बहन गीता फोगाट भी विभिन्न वैश्विक टूर्नामेंट्स में पदक जीत चुकी हैं। उनकी बहन विनेश फोगाट को भी एशियाई चैंपियनशिप में मेडल मिले हैं। साथ ही कॉमनवेल्थ में तो मिला ही है। ये सभी बहनें काफ़ी संघर्ष कर के ऊपर आई हैं, जिनमें इनके पिता का संघर्ष भी है जो आप ‘दंगल’ में देख चुके हैं। अगर उन्होंने ये मेडल्स नहीं जीत रखे होते तो क्या बॉलीवुड इन पर फ़िल्म बनाता? किसी अभिनेता-अभिनेत्री ने तो इनकी जगह मेडल जीत कर देश का गौरव नहीं बढ़ाया?

इन वामपंथियों का जायरा वसीम को लेकर रुख नरम रहता है, जिन्होंने अल्लाह और इस्लाम की दुहाई देते हुए सिनेमा जगत से नाता तोड़ने की घोषणा की। जायरा ने ही ‘दंगल’ में बबीता का रोल किया था। जायरा वसीम ने फ्लाइट में एक व्यक्ति द्वारा बदसलूकी किए जाने का आरोप लगाया। उसे 3 साल के लिए जेल हो गई। सहयात्रियों में से एक ने भी उनके आरोपों की पुष्टि नहीं की। सबने कहा कि मोलेस्टेशन जैसी कोई चीज हुई ही नहीं। लेकिन, इस मामले में लोगों को अलग-अलग राय रखने की या चर्चा की ज़रूरत वामपंथियों ने समझी ही नहीं। बबीता को जायरा ने लोकप्रिय बना दिया, जो कि एक मुस्लिम हैं। है न?

यहाँ तक कि बीबीसी जैसे बड़े मीडिया संस्थानों ने भी बबीता फोगाट द्वारा जमातियों की हरकतों की निंदा किए जाने को मुस्लिम-विरोधी बयान बताया। बबीता फोगाट ने कहा भी कि वो जायरा वसीम नहीं हैं कि डर जाएँगी। असल में ये सब कुछ उन्हें डराने के लिए ही हो रहा है, ताकि आगे से कोई भी खिलाड़ी राजनीति में रूचि न ले और भाजपा को अपनी पसंद बनाए तो उसे पता हो कि इसका क्या ‘अंजाम’ होता है। दरअसल, उन्हें डराया जा रहा है कि उनकी ऐसे ही ‘सोशल लिंचिंग’ की जाएगी, अगर उन्होंने भाजपा ज्वाइन की तो। ऐसे ही डर के कारोबारियों को बबीता ने चेताया है कि वो डरने वाली नहीं हैं।

देखिए कैसे बबीता को अपमानित किया गया

कुछ ने तो यहाँ तक लिख दिया कि अगर आमिर खान नहीं होते तो आज बबीता फोगाट ट्वीट ही नहीं कर रही होतीं। एक अन्य व्यक्ति ने दो साँपों की तस्वीर शेयर कर के उन्हें फोगाट बहनें बता दिया। एक ने कहा कि आमिर, फातिमा और जायरा- इन तीनों मुस्लिमों के कारण ही देश में बबीता को आज लोग जानते हैं। एक ने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि आमिर ने ‘दंगल’ फोगाट बहनों को सपोर्ट करने के लिए बनाई थी, कमाई के लिए नहीं। एक ने याद दिलाया कि देश में तुम्हारे जैसे कितने ही खिलाड़ी हैं, उन्हें कोई नहीं जानता। हालाँकि, ऐसा बोल कर वो गर्व क्यों महसूस कर रहे, ये समझ से पड़े है।

कुल मिला कर बात ये है कि बबीता फोगाट भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ चुकी हैं, इसीलिए उनकी सारी योग्यताओं के लिए आमिर ख़ान को श्रेय दिया जा रहा है। देश के लिए जीते गए उनके सारे मेडल्स बेकार हो गए हैं, क्योंकि उन्होंने जमातियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है। उनके संघर्ष की कहानी फीकी पड़ गई, क्योंकि उन्होंने वामपंथियों की हाँ में हाँ नहीं मिलाई है। अगर आज देश में खिलाड़ियों की कदर नहीं है तो क्या ये गर्व करने की बात है? इस पर तो दुख जताया जाना चाहिए। वैसे बबीता ने पहले ही बता दिया है कि वो ‘हरियाणा की छोरी’ है, वो झुकेंगी नहीं। अब देखना है वामपंथी और इस्लामी कट्टरवादी कितना गिरते हैं।

बीवी की करानी थी डिलीवरी: 6 बच्चों और गर्भवती पत्नी को बाइक पर बिठा अरशद निकला हॉस्पिटल

मथुरा के कोसीकलाँ हाइवे से एक ऐसी घटना आई है, जिससे पुलिस वाले भी हैरान हो गए। एक युवक सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाता हुआ बाइक से चला जा रहा था। वो अकेले नहीं था बल्कि उसके साथ उसकी गर्भवती पत्नी भी थी। पत्नी के अलावा वो अपने 6 बच्चों को भी बाइक से लेकर जा रहा था। वो अपनी पत्नी को डिलीवरी के लिए ले जा रहा था। खुर्जा में जब पुलिस ने उसे रोका तो उसने बताया कि उसकी पत्नी के पेट में दर्द है और डिलीवरी के लिए उसे ले जा रहा है।

वो हॉस्पिटल जा रहा था और उसने मेडिकल इमरजेंसी की बात बताई थी, इसीलिए पुलिसकर्मियों ने उसे जाने दिया। ये घटना गुरुवार (अप्रैल 16, 2020) की सुबह 10:30 की है। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि अरशद अपनी बाइक पर अपनी पत्नी मुवीना और 6 बच्चों को बिठा कर हॉस्पिटल जा रहा था। इतने लोगों को एक ही बाइक पर बैठे देख कर उसे पुलिसकर्मियों ने रोका और सवाल पूछे। उसने अपना दुखदुखड़ा सुनाया तो पुलिस ने उसे तुरंत जाने की इजाजत दे दी।

अरशद के परिवार में उसके और उसकी पत्नी के अलावा कोई वयस्क व्यक्ति नहीं था, इसलिए वो पूरे परिवार को ही बाइक पर बिठा कर हॉस्पिटल ले जा रहा था। तस्वीरों में स्पष्ट दिख रहा है कि उसके बच्चों ने मास्क तक नहीं पहना हुआ था। स्वास्थ्य विभाग बार-बार कह रहा है कि घर के बच्चों और बुजुर्गों का कोरोना से बचाव को लेकर ज्यादा ख्याल रखें। अरशद के सभी 6 बच्चे बिना मास्क के थे।

‘हिंदुस्तान’ के मथुरा संस्करण में प्रकाशित ख़बर

बता दें कि ये पहली बार नहीं है जब कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच इस तरह की हरकत की गई हो। निजामुद्दीन के मरकज में हुए मजहबी कार्यक्रम से लेकर पुलिसकर्मियों व सुरक्षाकर्मियों पर हमले तक, इससे बड़ी-बड़ी कई घटनाएँ सामने आई हैं, जिनमें न सिर्फ़ कोरोना को लेकर सरकारी दिशा-निर्देशों, बल्कि क़ानून का भी जम कर उल्लंघन किया गया। यूपी में ऐसे कई मामलों में सख्ती से निपटा गया।

यहाँ PM को आतंकी कह सकते हैं, आतंकियों को कहेंगे तो सस्पेंड होंगे: कंगना ने Twitter को लताड़ा

लोकप्रिय अभिनेत्री कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल का ट्विटर अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया क्योंकि उन्होंने मोरादाबाद में मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा की निंदा की थी और हमलावरों को कड़ी सजा देने की माँग की थी। उनके ट्विटर अकाउंट सस्पेंशन पर अब कंगना ने चुप्पी तोड़ी है। एक वीडियो जारी कर कंगना ने रंगोली का बचाव किया। कंगना ने कहा कि रंगोली ने अपनी ट्वीट में कहा था कि जो लोग डॉक्टरों और पुलिस पर हमले कर रहे हैं, उन्हें गोली से मार देना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि सुजैन की बहन फराह अली खान और ‘प्रतिष्ठित’ निर्देशिका रीमा कागती ने झूठा दावा किया कि रंगोली मुस्लिमों के नरसंहार की बात कर रही है। कंगना ने कि कहा कि अगर किसी भी ट्वीट में ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिमों के लिए बात कही गई हो तो वो और उनकी बहन सार्वजनिक रूप से जनता के सामने आकर माफ़ी माँगेंगीं। कंगना ने कहा कि उनका ये मानना नहीं है कि सारे मुस्लिम डॉक्टरों पर अटैक कर रहे हैं लेकिन विरोध करने वालों के बयानों को देख कर लगता है कि वो समझते हैं कि हर मुस्लिम आतंकी है। कंगना ने कहा:

“मैं सरकार से अपील करना चाहती हूँ कि ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स वे हैं, जो यहाँ के ही करोड़ों-अरबों रुपए खा कर इसी कश्ती में छेद कर रहे हैं। यहाँ प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को आतंकवादी कहा जा सकता है। जनसेवा में लगे आरएसएस को आतंकी कहा जा सकता है। लेकिन, आतंकवादियों को आतंकवादी नहीं कहा जा सकता। मुझे पता है कि देश अन्य समस्याओं से भी जूझ रहा है लेकिन इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का दाना-पानी बंद होना चाहिए। इन प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह ध्वस्त कर हमारे नए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स खुलने चाहिए।”

कंगना ने बबीता फोगाट का भी समर्थन किया और कहा कि उन्हें कई लोगों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद की बात करने वाले लोगों का ऐसे ही शोषण किया जाता है। कंगना ने पूछा कि अगर आज बबीता को कुछ होता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? उन्होंने बबीता फोगाट को सुरक्षा मुहैया कराए जाने की भी माँग की। रंगोली की ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए खत्री ने रंगोली के खिलाफ जातिवाद का जहर उगलते हुए ‘चांडाल’ कहा था। इसी तरह कई लोगों ने उन पर हमले किए। आरजे सायमा ने तो उन पर एफआईआर दर्ज कराने की भी माँग की थी और हमलावरों का बचाव किया था।

मणिपुरी महिला पर थूका: 100 सीसीटीवी फुटेज खँगालने के बाद पुलिस ने मोहम्मद इलियास को दबोचा

मुंबई के सांताक्रूज इलाके में अभी हाल ही में एक मणिपुरी महिला पर थूके जाने का मामला सामने आया था। आरोपित को 6 अप्रैल को मुंबई के कलिना इलाके से गिरफ्तार किया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना तब सामने आई जब पीड़िता के एक दोस्त लिंडा न्यूमी ने सोशल मीडिया पर भयावह घटना के बारे में पोस्ट किया और अपने दोस्त पर एक बाइक से थूके जाने की घटना के बारे में बताया।

आरोपित की पहचान आमिर मोहम्मद इलियास रूप मे हुई है। वह कुर्ला का रहने वाला है। मणिपुरी महिला अपने एक मित्र के साथ गीता विहार जंक्शन से सांताक्रूज में कलिना मिलिट्री कैंप की ओर जा रही थी, जहाँ 6 अप्रैल को किराने का और अन्य जरूरी सामान बाँटा जा रहा था। उसी दौरान आमिर मोहम्मद इलियास, जो एक डिलीवरी बॉय है, बाइक से उनके पास आया और अपना मास्क हटाकर कलिना सिग्नल के पास उन पर थूक दिया।

इसकी शिकायत पीड़ित ने वकोला पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई। पीड़िता ने कहा, “बाइक सवार एक शख्स मेरे पास आया और अपना मास्क हटाकर मेरे ऊपर थूक दिया। उसकी इस हरक़त से मुझे कोरोना वायरस संक्रमण हो सकता है। इस घटना से मैं काफी सहम गई, जिसकी वजह से मैं बाइक का रजिस्ट्रेशन नंबर नोट नहीं कर पाई।”

पीड़िता की शिकायत के बाद पुलिस ने आरोपित की तलाश शुरू की। इस बाबत वकोला पुलिस टीम ने लगभग 100 सीसीटीवी फुटेज चेक किया और साथ ही उन्होंने कम से कम 1.5 लाख मोबाइल यूजर्स के डंप डाटा को भी स्कैन किया जो घटना के दिन वहाँ पर थे। जाँच कर रही टीम ने तमाम तरीके से सबूतों को इकट्ठा किया। पुलिस को आरोपित की पहचान सीसीटीवी फुटेज की मदद से मिली, जिसमें बाइक का रजिस्ट्रेशन नंबर धुँधला दिख रहा था। इसके बाद पुलिस ने एक ऐप का इस्तेमाल करते हुए सही रजिस्ट्रेशन नंबर का पता लगाया और फिर उसे धर दबोचा।

जोन 8 के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस मंजूनाथ सिंघे ने मामले की जानकारी देते हुए कहा, “30 वर्षीय आमिर मोहम्मद इलियास को हमने गिरफ्तार कर लिया है। वह कुर्ला इलाके में रहता है।” पुलिस ने कहा कि इलियास ने दावा किया कि उसे पान चबाने की आदत है और उसने यह हरकत जान-बूझकर नहीं किया था। वकोला पुलिस ने अब इलियास के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 270 और 352 के तहत मामला दर्ज किया है।

उल्लेखनीय है कि पिछले हफ्ते इसी तरह की एक घटना, राजस्थान के कोटा शहर से भी आई थी। जहाँ 4-5 महिलाओं के एक समूह को पॉलीथीन की थैलियों में थूककर लोगों के घरों मे फेंकते हुए देखा गया था। इससे पता चलता है कि किस तरह कोरोना वायरस को लेकर लोगों के मन में डर और दहशत पैदा किया जा रहा हैं।

केन्या में राहत पैकेज के साथ शराब बाँट रहे हैं गवर्नर, कहा- यह कोरोना को मारती है

पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। इससे बचने के लिए लोग घरों में कैद रहने को मजबूर हैं। वायरस से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। इस बीच केन्या में राहत सामग्री के साथ लोगों को शराब की छोटी बोतलें भी वितरित की जा रही है।

केन्याई गवर्नर माइक सोनको के मुताबिक शराब कोरोना वायरस को मार रही है और इसे लोगों को सैनेटाइज करने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर गवर्नर के बयान पर लोग तरह-तरह के कमेंट कर रहे है। हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही कह चुका है कि शराब कोरोना महामारी से नहीं बचाता है।

नैरोबी के गवर्नर माइक सोनको जरूरतमंद लोगों के बीच राशन सामग्री वितरित कर रहे हैं। इसमें चौकाने वाली बात यह है कि इन पैकेट के अंदर लोगों को शराब की छोटी-छोटी बोतलें भी दी जा रही हैं। पिछले सप्ताह मीडिया के संबोधन में इस बात की पुष्टि करते हुए गवर्नर सोनको ने कहा था कि लोगों के बीच बाँटे जा रहे राहत पैकेज के अंदर कोगनेक और हैनेसी की छोटी बोतलें दी जा रही हैं।

वहीं ट्विटर पर मौजूद वीडियो में सोनको यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि हम हैनेसी की छोटी बोतलें अपने लोगों को खाद्य सामग्री के साथ दे रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ दूसरे स्वास्थ्य संगठनों द्वारा की गई रिसर्च के मुताबिक यह माना गया है कि शराब कोरोना वायरस के साथ ही कुछ अन्य वायरसों को भी मारने में सहायक है।

इस खबर के सामने आने के बाद WHO की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि शराब कोरोना वायरस से नहीं बचाती है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि शराब का सेवन संचार और गैर-संचारी रोगों और मानसिक स्वास्थ्य विकारों की श्रेणी से जुड़ा हुआ है, जो किसी व्यक्ति को COVID-19 के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।

आपको बता दें कि चीन के वुहान शहर से निकले कोरोना वायरस अब तक विश्व के 200 से अधिक देशों में अपने पैर पसार चुका है। इतना ही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक इससे पूरे विश्व में मरने वालों की संख्या 1,54,401 जबकि इससे संक्रमित लोगों की संख्या 2,259,352 हो गई है।

TheTelegraph का झूठ: दलित का खाना सिराज अहमद ने नहीं खाया था लेकिन खबर RSS को बदनाम करने के लिए लिखी

मीडिया का प्रोपेगेंडा कैसे काम करता है, इसको TheTelegraph के झूठ से समझिए। TheTelegraph का झूठ विचार को लेकर नहीं बल्कि पत्रकारिता के साथ है, खबरों के साथ है। भ्रामक हेडलाइन, गुमराह करने वाली तस्वीरें और बेहद अतार्किक आँकड़े, दक्षिणपंथी सत्ता-विरोधी मीडिया गुटों का यह प्रमुख हथियार हमेशा से ही रहा है। लेकिन यह चिंता का विषय तब बन जाता है, जब द टेलीग्राफ़ (The Telegraph) जैसे प्रोपेगेंडा-प्रमुख, कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बीच भी ऐसे कुत्सित प्रयास करने से बाज नहीं आते।

द टेलीग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति द्वारा दलित से खाना ना लेने की घटना को बेहद भ्रामक तरह से पेश करने का नया कारनामा किया है। इसमें उसने आरएसएस की छवि खराब करने का एक और असफल प्रयास किया है। लेकिन, अब कम से कम यह तो स्पष्ट है कि दलितों की तुलना कोरोना वायरस से करने वाले द टेलीग्राफ के लिए अस्पृश्यता और छुआ-छूत समाजिक चिंतन से कहीं अधिक उसके अपने निजी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है और इससे अधिक कुछ नहीं।

अस्पृश्यता, क्वारंटाइन में भी – TheTelegraph के झूठ का फैक्ट चेक

द टेलीग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश की एक घटना में 3 तरह की कलाकारी कर के पेश की है, जो निम्नवत हैं –

शीर्षक – खबर का शीर्षक है: “क्वारंटाइन में भी अस्पृश्यता” (Untouchability, even in quarantine)
फीचर फोटो – इस खबर के साथ बेहद अप्रासंगिक तस्वीर लगाई गई है, जिसमें कि आरएसएस की ड्रेस पहने कुछ लोग खाना खिला रहे हैं।
आरोपित का नाम – इस घटना में दलित से खाना ना लेने वाले का नाम सिराज अहमद है, जो कि ना ही खाना परोसने वाला आरएसएस कार्यकर्ताओं में से एक है, ना ही पीड़ित दलित! सिराज वह आदमी है, जिसने दलित प्रधान के हाथों से खाना लेने से इनकार कर दिया था।

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट

दलित महिला प्रधान के हाथ बना भोजन नहीं करने पर सिराज अहमद पर केस दर्ज

वास्तव में, यह घटना गत 10 अप्रैल को घटी है। घटना उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले की है, जहाँ ग्राम प्रधान लीलावती देवी ने भुजौली खुर्द गाँव के स्कूल में बने क्वारंटाइन सेंटर में रसोईया ना होने की वजह से खुद ही क्वारंटाइन में रखे गए पाँच लोगों के लिए खाना बनाया था।

इन पाँच लोगों में से 2 मुस्लिम थे। इनमें से एक सिराज अहमद नाम के व्यक्ति ने दलित के हाथ बना खाना खाने पर बिरादरी से बहिष्कृत हो जाने की बात कहकर भोजन करने से इंकार कर दिया था।

इस घटना के बाद ग्राम प्रधान ने उप जिलाधिकारी देश दीपक सिंह और खंड विकास अधिकारी रमाकांत यादव को इस बारे में सूचना दी और पुलिस से लिखित शिकायत की। उन्होंने बताया कि इस मामले में सिराज अहमद के खिलाफ दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है।

TheTelegraph का झूठ व्यापक स्तर तक

बंगाल से छपने वाले इस दैनिक अंग्रेजी ‘द टेलीग्राफ’ ने इस एक खबर के जरिए कई निशाने साधने की कोशिश की है। सबसे पहला मकसद तो यह कि लोगों का ध्यान खींचने में सफलता। क्योंकि भारत में ‘कॉन्ग्रेस काल’ से वैचारिकता दासता का प्रतीक यह तथाकथित समाचार पत्र निरंतर ही ऐसी हरकतें करता आया है, जिस कारण यह चर्चा का विषय बना रहा।

हाल ही में यही वामपंथी अखबार देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पर अपमानजनक और जातिसूचक व्यंग्य करते हुए उन्हें वायरस तक कह चुका है। अब द टेलीग्राफ़ के दोगले स्तर की पहचान यहीं पर की जा सकती है, कि महज कुछ दिन पहले ही समाज के वंचित समुदाय के किसी व्यक्ति को उसकी निजी गरिमा और पद को नजरअंदाज करते हुए उन्हें ‘वायरस’ तक कह देता है और कुछ ही दिन में अस्पृश्यता जैसे गंभीर विषय पर ज्ञान देते हुए एक हेडलाइन में बेचता नजर आता है।

द टेलीग्राफ के लिए अपनी विषैली मानसिकता के प्रसार के लिए तथ्यों से लेकर नैरेटिव को लेकर झूठ और भ्रम परोसना कोई नई बात नहीं है, वह सावरकर से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पर अपमानजनक व्यंग्य करता हुआ पाया गया है।

एक सबसे बड़ा ध्येय जो टेलीग्राफ का इस खबर के पीछे रहा, वह ये कि आरएसएस की छवि को धूमिल करने का प्रयास! इस रिपोर्ट में द टेलीग्राफ ने सभी बातों से ऊपर फीचर इमेज के लिए चुनी गई तस्वीर को रखा है, जिसमें आरएसएस के लोगों को खाना परोसते हुए दिखाया गया है, ताकि पहली दृष्टि में भ्रामक शीर्षक के साथ यही सन्देश जाए कि सिराज अहमद ने नहीं बल्कि खाना परोसने में आरएसएस लोगों को साथ जातिगत भेदभाव कर रहा है।

वास्तविकता तो यह है कि आरएसएस के कार्यकर्ता देशभर में क्वारंटाइन में भी वंचित, बेसहारा और भूखे लोगों को राशन उपलब्ध कराने से लेकर लोगों को हर प्रकार की मदद उपलब्ध करवा रहा है। लेकिन द टेलीग्राफ यहाँ पर बस यही साबित करता नजर आता है कि वह एक ‘घृणोपजीवी’ है और वह कभी भी विरोधी विचारधारा के कार्यों से संतुष्ट नहीं रहेगा। क्योंकि यदि वह ऐसा समझौता करता है, तो उसका अस्तित्व ही कुछ शेष नहीं रह जाता।