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‘मुस्लिमों ने किया फेमस, वरना गोलगप्पे बेचते’: बबीता फोगाट पर भड़का ‘बकलोल’ पत्रकार

मीडिया गिरोह में वैसे तो कई लोग हैं जिन्होंने सोशल मीडिया पर केवल अनर्गल बातें कर अपनी पहचान बनाई है। इनमें भी प्रशांत कनौजिया का अलग लेवल है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर आर्मी चीफ तक पर भ्रामक खबर फैला चर्चा में आया कनौजिया अब कुश्ती चैंपियन बबीता फोगाट के खिलाफ प्रोपेगेंडाबाजी में लगा है।

बबीता की गलती सिर्फ़ इतनी है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर तबलीगी जमात के लोगों को, जो इस समय देश में तेजी से कोरोना संक्रमण फैलने के लिए विशेषत: जिम्मेदार हैं, उन्हें जाहिल कह दिया। बस, इसी बात पर कनौजिया भड़क गया और ऊल जलूल बातें करने लगा।

बबीता फोगाट ने ट्वीट किया, “कोरोना वायरस भारत की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी समस्या है। जाहिल जमाती अभी भी पहले नंबर पर बना हुआ है।” अब देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए हम समझ सकते हैं कि बबीता ने यहाँ ‘जाहिल जमाती’ किन लोगों के लिए प्रयोग किया। उन्होंने उन जमातियों को जाहिल बोला, जो देश की स्थिति को जानते-समझते हुए भी छिपे बैठे हैं। अस्पताल में महिला स्वास्थ्यकर्मियों पर फब्तियाँ कस रहे हैं, उन्हें अश्लील इशारे कर रहे हैं, नंगे घूम रहे हैं। बबीता ने अपने ट्वीट में कहीं पर भी मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। लेकिन प्रशांत कनौजिया ने यहाँ अपनी चालाकी से तुरंत बबीता के एक ट्वीट को हिंदू-मुस्लिम में बदल दिया और बबीता के निजी जीवन पर भी टिप्पणी करने से नहीं बाज आया।

एक पत्रकार जो खुद सोशल मीडिया पर स्टंट कर विवादित पत्रकारों की सूची में शामिल हुआ है, वो बबीता फोगाट यानी एक नेशनल चैंपियन को कहता है कि उन्हें एक मुस्लिम ने फ़िल्म बनाकर फेमस कर दिया। वरना इस देश में क्रिकेट छोड़ अन्य खिलाड़ी कई साल बाद गोलगप्पे बेचते नज़र आए हैं। यहाँ मुस्लिम शब्द प्रशांत ने शायद आमिर खान के लिए इस्तेमाल किया और बबीता को ये जताया कि बिना आमिर खान के उनका जीवन अंधकार में चला जाता। फिर भी वह आज मुस्लिमों के लिए नफरत फैला रही हैं?

अब पहला सवाल तो ये कि बबीता ने मुस्लिमों को लेकर क्या टिप्पणी की? उन्होंने किसी को लेकर क्या नफरत फैलाई? उन्होंने तो केवल उस तबके को लेकर अपना आक्रोश दिखाया, जिसकी बदसलूकियों से इन दिनों हर राज्य की सरकार परेशान है। जो अब भी जान-बूझकर जगह-जगह छिपे बैठे हैं और सरकार की अपील के बाद भी जाँच के लिए बहार नहीं आ रहा।  

दूसरी बात ये कि प्रशांत को जानने की जरूरत है कि फोगाट बहनें आमिर खान के पास अपनी जीवनी लेकर नहीं गईं थी कि वे उनपर फिल्म बनाएँ। बल्कि आमिर खुद आए थे उस परिवार के पास, जिसने वाकई कुँठित समाज में बदलाव की नींव रखी। प्रशांत को जानने की जरूरत है कि बबीता फोगाट और उनकी बहन के ऊपर आमिर ने फिल्म इसलिए बनाई क्योंकि वे खुद समाज में उन्हें प्रेरणा के रूप में देख रहे थे। कनौजिया की तरह गोलगप्पे बेचते नहीं! जानकारी तो ये भी है कि इस फिल्म ने 2200 करोड़ रुपए का कारोबार किया, मगर फोगाट परिवार को सिर्फ़ 80 लाख रुपए मिले। अब बताइए एहसान फोगाट बहनों के ऊपर हुआ या फिर फिल्म बनाने वालों के ऊपर, या फिर उस समाज के ऊपर जहाँ इस फिल्म के आते ही कई लड़कियों में आगे बढ़ने का उत्साह दिखा, उमंग दिखी।

अब मामला इसके बाद यही शांत नहीं हुआ। जाहिर है, इतनी मेहनत के बाद कोई ऐसे सवाल उठाए तो दिल दुखता है, वो भी तब जब आपने कुछ गलत न कहा हो। बबीता फोगाट ने प्रशांत को कहा कि एक फिल्म तुम्हारे जैसों के ऊपर भी बनानी चाहिए। उस फिल्म का नाम रखना चाहिए पत्थरबाजों की गैंग।

इसके बाद कनौजिया ने लिखा, “तुम जो ये शब्द लिख पा रही हो उसके पीछे भी सावित्री-फातिमा है। जब उन दोनों ने पहला महिलाओं का स्कूल खोला था जब आरएसएस-भाजपा के पूर्वज उनपर पत्थर फेंकते थे। बाकी दादरी वालों ने ठीक नहीं किया।” गौरतलब है कि बीते साल हरियाणा में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बबीता भाजपा की तरफ से दादरी से मैदान में उतरीं थी।

अब जिन्होंने दंगल देखी है वे इस बात को समझ पाएँगे कि जिस इलाके से बबीता और गीता आती हैं, वहाँ पर कई नायिकाओं के उदाहरण जीवंत होते हुए भी समाज पिछड़ा हुआ और लड़कियाों के मामले में तो मानो मृत था। नतीजतन उन्हें भी पहले लीक से हटकर चलने पर समाज के ताने सुनने पड़े। लेकिन कुछ दिनों बाद दोनों बहनें खुद एक उदाहरण बनकर उभरीं, जिनके जीवन का संघर्ष बाकी किसी नायिका से कम नहीं थीं। हम मानते हैं कि सावित्री-फातिमा के योगदान के बिना आज स्त्री शिक्षा का कोई आधार नहीं है। मगर, बबीता और उनके परिवार के संघर्षों को खारिज करना, वो भी अपना एजेंडा चलाने के लिए केवल मूढ़ होने का का प्रमाण है।

प्रशांत कनौजिया इसके बाद बबीता के पक्ष में बोलने वालों को भी जवाब देता है। फिर धीरे-धीरे वीर सावरकर की बात बीच में ले आते हैं और पूछते हैं उसने कौन सा तीर मारा था? सवाल है कि उन्होंने अगर देश के लिए कुछ नहीं किया था तो फिर इंदिरा गाँधी ने उनका उल्लेख वीर सपूत कहकर अपने पत्र में क्यों किया था? क्या हर चीज के ज्ञाता सिर्फ प्रशांत कनौजिया हो चले हैं? बाकी किसी की प्रतिक्रिया का कोई महत्व नहीं है? बाकी किसी के योगदान का कोई मोल नहीं है।

कनौजिया, इसके बाद फिर एक जवाब में बबीता की मिल्खा सिंह और पान सिंह तोमर के साथ तुलना करता है और कहता है कि सबने देश का मान बढ़ाया। मगर बबीता समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ बोलकर सिर्फ़ जहर उगलकर पार्टी से मेडल चाहती हैं। खुद सोचिए! बबीता के एक पार्टी मात्र से जुड़ जाने से कनौजिया उनकी प्रतिक्रिया पर कितने हमलावर हो गए? क्या ये प्रतिक्रिया स्वभाविकता के साथ उस समय भी बाहर आती अगर बबीता एक ‘जाहिल हिंदू’ या ‘जाहिल श्रद्धालु’ कहती? शायद नहीं। क्योंकि तब कनौजिया को बबीता अपने करीबियों की तरह महसूस होतीं। और उनका समर्पण, उनकी काबिलियत, उनकी सोच समाज के लिए मानक होती।

आज बबीता फोगाट पर प्रशांत कनौजिया द्वारा हमलावर होने पर कई मीडिया गिरोह इस खबर को कवर कर रहे हैं। कारंवाँ भी इस क्रम में एक नाम हैं। जो अपनी खबरों से ये नैरे़टिव बना रहा है कि समुदाय विशेष देश के हित के कामों में लगा हुआ है, मगर बबीता फोगाट जैसे लोग उनके ख़िलाफ़ नफरत फैला रहे हैं। पर इस बात को कोई नहीं समझ रहा कि देश आज भी उन मुस्लिमों की कद्र करता है, उनके सेवाभाव को सलाम कर रहा है जो मजहब से उठकर मानवता के प्रति खुद को समर्पित कर चुके हैं। गाली सिर्फ़ उन्हें पड़ रही है, गुस्सा सिर्फ़ उनपर उतारा जा रहा है, जो सब जानते-समझते हुए, समाज के लिए खतरा बने हैं। प्रशांत कनौजिया जैसे लोग इन्हीं का बचाव कर अपने प्रोपेगेंडा की रोटियॉं सेंकते हैं। ज्ञात हो कि बबीता ने अपने ट्वीट में किसी एक समुदाय को नहीं टारगेट किया था उन्होंने वही शब्द इस्तेमाल किया था जिसका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है।

बता दें, 2 अप्रैल को एक अन्य ट्वीट पर भी बबीता को घेरा गया था, तब भी उन्होंने यही जवाब दिया था कि “डॉक्टर, पुलिस, नर्स जो इस संकट के समय देश की ढाल बनकर खड़े हैं उन पर हमला करने वालों को और क्या संज्ञा दूँ। इसमें मेरा किसी धर्म, जाति विशेष के खिलाफ लिखने का कोई मकसद नहीं है। मैंने इस ट्वीट में सिर्फ कोरोना सेनानियों पर हमलावरों के खिलाफ लिखा है और आगे भी लिखती रहूँगी”

COVID-19: भारत की ओर उम्मीदों से देख रही दुनिया, 55 देशों को HCQ सप्लाई

कोरोना वायरस के प्रसार के साथ ही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) की माँग दुनिया भर में बढ़ती जा रही है। इसकी आपूर्ति के लिए दुनिया के अधिकतर देश भारत की तरफ देख रहे हैं। भारत भी अपनी जरूरतों को देखते हुए और इसे पूरा करने के बाद दुनिया के अधिकतर देशों की मदद कर रहा है। भारत ने 55 देशों में मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन भेजने का फैसला किया है। 

भारत की ओर से जिन 55 देशों को मलेरिया की दवा कोरोना संक्रमण के लिए भेजी जा रही है, उनमें प्रमुख रूप से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, अफगानिस्तान, भूटान, बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका, म्यांमार, सेशेल्स, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, डोमिनिकन गणराज्य, युगांडा, मिस्र, आर्मेनिया, सेनेगल, अल्जीरिया, जमैका, उज्‍बेकिस्तान, कजाखस्तान, यूक्रेन, नीदरलैंड, स्लोवेनिया, उरुग्वे, इक्वाडोर समेत अन्‍य देश शामिल हैं।

बताया जा रहा है कि 55 देशों के आवेदनों को तीन चरणों में मँजूरी दी गई है। पहले दो चरणों के लिए जिन देशों का चयन किया गया है, उन्हें इसकी खेप भी पहुँचा दी गई है। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान को छोड़ कर अन्य सभी देशों को HCQ की खेप भेजी जा चुकी है। अभी भारत में इन दवाओं का निर्माण सीमित स्तर पर हो रहा है, इसलिए माँग के मुकाबले आपूर्ति कम की जा रही है। जैसे-जैसे निर्माण तेज होगा, वैसे-वैसे आपूर्ति भी बढ़ाई जाएगी।

इससे पहले भारत ने हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी लेकिन बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील करने के बाद अमेरिका समेत दूसरे देशों को भी भारत ने मानवीय आधार पर HCQ की आपूर्ति शुरू की। अमेरिका को भारत 36,00000 टेबलेट भेज चुका है। इसी के साथ 15 से ज्यादा देशों को ये दवा अब तक भेजी जा चुकी है।

इनमें अमेरिका और ब्रिटेन से लेकर रूस, दक्षिण अफ्रीका समेत यूरोप लैटिन अमेरिका, अरब और अफ्रीकी देश शामिल हैं। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा मलेरिया के अलावा आर्थराइटिस और ल्यूपस जैसी बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होती है। हाल में अमेरिका, चीन व दक्षिण कोरिया समेत कई देशों में इस दवा से ही कोरोना वायरस संक्रमण का इलाज हुआ है। इसके बाद से ही हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन की माँग विदेशों में बढ़ गई है।

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा उत्पादक

भारत दुनिया में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन का सबसे बड़ा उत्पादक है। यही वजह है कि अब विदेशों से ही इस दवा की अचानक माँग बढ़ गई है। हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी साफ कर चुके हैं कि भारत की जरूरत को देखते हुए ही अन्य देशों को इस दवा की सप्लाई की जाएगी।

कोरोना वायरस से निपटने के लिए हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को काफी उपयोगी माना जा रहा है। यही कारण है कि अमेरिका व ब्राजील के राष्‍ट्रपति और इजराइल के पीएम ने पीएम मोदी की प्रशंसा की। ब्राजील के राष्‍ट्रपति ने पीएम मेादी की तुलना हनुमान भगवान से की, जिन्‍होंने कष्‍ट के समय लोगों को संजीवनी उपलब्‍ध कराई।  

गालीबाज एजाज खान के लाइव वीडियो, विवादित ट्वीट को लेकर सक्रिय हुई मुंबई पुलिस, उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी संज्ञान लेने को कहा

बॉलीवुड के कलाकार एजाज खान लगातार हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों पर जहर उगलने के कारण चर्चा में बने रहते हैं। कई बार वो अपने बयानों के चलते जेल भी हो आए हैं। अब एक बार फिर से एजाज चर्चा में आ गए हैं। उनकी एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही है। इसमें गालीबाज एजाज खान ने अर्नब गोस्वामी, रजत शर्मा और सुधीर चौधरी को कोरोना वायरस होने की दुआ माँगी है।

गत बुधवार रात 12:30 बजे एजाज खान ने फेसुबक लाइव किया था। जिसमें उन्होंने समुदाय विशेष को लेकर कई बातें कही। लाइव में उन्होंने कहा कि चींटी मर गई, मुस्लिम जिम्मेदार..हाथी मर गया मुस्लिम जिम्मेदार है। दिल्ली में भूकंप आया सारे मुस्लिम जमीन के नीचे घुसे और हिले तो भूकंप आ गया… यानी हर बात के लिए मुस्लिम को ही जिम्मेदार माना जाता है।

एजाज खान ने ना सिर्फ पीएम मोदी को मुस्लिमों के खिलाफ पूर्वग्रह से ग्रसित होने का आरोपित बताया बल्कि रजत शर्मा, सुधीर चौधरी, अर्नब गोस्वामी जैसे पत्रकारों को गाली देते हुए कहा कि उनको, उनके परिवार को और उनकी पूरी टीम को कोरोना वायरस हो जाए।

निराश और आक्रोशित एजाज ने उनका लाइव वीडियो देख रही जनता से भी प्रश्न पूछते हुए कहा- “लेकिन कभी सोचा है कि आखिर ये कौन है जो ये साजिश कर रहे हैं?” वीडियो में एजाज ने इन सब चीज़ों के लिए एक राजनीतिक पार्टी को जिम्मेदार बताया है।

एजाज खान ने वीडियो में यह भी कहा कि ये एक साजिश है जिससे कोरोना से ध्यान हटाने के लिए सभी लोगो का ध्यान सांप्रदायिकता जैसे गंभीर मुद्दे की ओर जाए। वीडियो के अंत में उन्होंने दुआ माँगते हुए कहा कि ऐसे लोग जो देश में ऐसा कर रहे हैं, उन सबको ही कोरोना हो जाए।

अपने इस वीडियो में एजाज खान ने महाराष्‍ट्र सरकार की जमकर तारीफ की है। उन्‍होंने अपने इस वीडियो में बांद्रा स्‍टेशन पर जमा हुई भीड़ के इकट्ठे होने के पीछे भी राजनीति का हाथ बताते हुए कहा कि मजहब विशेष को ग्रुप पर ये मैसेज भेजे गए कि ट्रेनें चलेंगी। उन्‍होंने कहा कि ऐसा इसलिए किया गया क्‍योंकि उद्धव ठाकरे और आदित्‍य ठाकरे का काम इन लोगों से देखा नहीं जा रहा। एजाज ने कहा कि जो लोग इस देश में हिंदू-मुस्लिम कर रहे हैं कोरोना उन्‍हें ही जगाने के लिए आया है।

एजाज का जैसे ही यह वीडियो सामने आया, लोगों का गुस्‍सा सोशल मीडिया पर फूटने लगा और अब कई लोग एजाज खान को अरेस्‍ट करने की माँग कर रहे हैं। ट्विटर पर #अरेस्ट एजाज खान नंबर 1 ट्रेंड बना रहा।

एजाज खान के ट्वीट को लेकर भी बवाल

वहीं एजाज खान के लिए उनका किया गया एक और ट्वीट भी अब मुसीबत बन गया है। जिसको लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुंबई पुलिस से मामले पर संज्ञान लेने को कहा है। एजाज खान ने अपने इस ट्वीट में लिखा है – “आज मैंने अपने कुत्ते का नाम भक्त रख दिया, मुझे मालूम है ये मेरे कुत्ते को पता चला तो मुझसे नाराज़ हो जाएगा लेकिन मैं इसे तो समझा सकता हूँ मगर तुम्हें कोई नही समझा सकता क्यूँकि तुम्हें ग़ुलामी और तलवे चाटने की आदत हो गयी है। भक्त छू..”

एजाज के इस ट्वीट पर कई लोगों ने यूपी पुलिस को टैग करते हुए कार्रवाई करने की माँग की जिसके बाद यूपी पुलिस ने एजाज के इस ट्वीट पर संज्ञान लेने का मुंबई पुलिस से अनुरोध किया है।

पश्चिम दिल्ली स्थित चर्च में बिना राशन रह रहे थे नार्थ-ईस्ट के 50 परिवार, RSS के सेवा भारती ने पहुँचाया राशन और मदद

बेसहारा और जरूरतमंद लोगों का ध्यान रखने की जिम्मेदारी लिए आरएसएस की सेवा इकाई सेवा भारती संगठन तत्परता से जुड़ा हुआ है। आज ही सेवा भारती संगठन ने पश्चिम दिल्ली की एक चर्च में 250 भूखे लोगों को राशन उपलब्ध करवाया है।

पश्चिम दिल्ली के हस्तसाल नगर में जोमी चर्च (Zomi Church) से जुड़े 50 परिवारों के लगभग ढाई सौ सदस्य राशन और खाद्य सामग्री से परेशान थे। इस चर्च में ज्यादातर लोग नार्थ-ईस्ट के लोग, खासकर मिजोरम के निवासी हैं और कई वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं। जानकारी मिलने पर सेवा भारती संगठन के कार्यकर्ता इस चर्च के जरूरतमंद लोगों के पास पहुँचे और उन्होंने राशन तथा अन्या चीजें उपलब्ध करवाईं।

उल्लेखनीय है कि सेवा भारती संगठन बंद के दौरान जरूरतमंद लोगों को आर्थिक मदद भी उपलब्ध करवा रही है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े इस संगठन ने कोरोना वॉरियर्स के लिए सहयोग राशि देने का ऐलान किया है।

संगठन ने कहा कि सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी और पत्रकार ऐसी विपरीत परिस्थितियों में अपना दायित्व निभा रहे हैं और समाज की मदद करने के लिए अपनी जान खतरे में डाल रहे हैं। ऐसे में संगठन ने फैसला लिया कि अगर गैर सरकारी सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी (अनुबंधित) या कोई पत्रकार कोविड-19 से प्रभावित हैं तो उनकी मदद की जाएगी।

साथ ही, फैसला लिया गया कि अगर उनका इलाज चल रहा है तो उन्हें 25,000 रुपए की मदद दी जाएगी और अगर दुर्भाग्यवश ऐसे किसी कोरोना वॉरियर की मौत हो जाती है तो उनके परिवार को संगठन की तरफ से एक लाख रुपए की मदद दी जाएगी।

सेवा भारती द्वारा की जा रही मदद से सम्बंधित वीडियो को आप इस लिंक पर देख सकते हैं –

देश भर में 2.1 लाख स्वयंसेवक काम में लगे हुए हैं, जो ‘सेवा भारती’ के बैनर तले कार्यरत हैं। संगठन ने भारत में कुल 1200 संस्थाओं के साथ संपर्क साधा है और उन सभी के साथ मिल-जुलकर काम कर रही है। इन 1200 संस्थाओं के साथ मिल कर ये सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई इलाक़ा छूट न जाए। श्रवण ने बताया कि 26 लाख लोगों तक उनकी सीधी पहुँच है, जिन्हें भोजन कराया जा रहा है। ऐसे कई लोग हैं जिनके भोजन की पूरी जिम्मेदारी संगठन ने ही उठाई है।

राहुल गाँधी ने हीरो बनने के लिए समर्थकों के सामने किए झूठे दावे, स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताई वायनाड की हकीकत

राहुल गाँधी की वाह-वाही कराने के लिए कॉन्ग्रेस का आईटी सेल नित नए प्रयोग करता रहता है। ऐसे में कई बार उसका झूठ पकड़ा जाता है। लेकिन बावजूद इसके वो बाज नहीं आता। अब इसी क्रम में एक बार फिर कोरोना महामारी के बीच उन्होंने ये कारनामा किया है। दरअसल, बुधवार को कॉन्ग्रेस आईटी सेल ने राहुल गाँधी को शुभकामनाएँ देते हुए एक ट्वीट किया और ट्वीट में बताया गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने वायनाड में कोरोना वायरस रोकने के प्रयासों व तरीकों की प्रशंसा की है। 

इसके बाद राहुल गाँधी ने भी इस मौक़े पर अपनी तारीफ अपने मुँह से करने का मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने खुद भी इस खबर को आगे बढ़ाया और लिखा यहाँ 16 दिन से कोई नया मामला नहीं है। इसलिए वे सभी अधिकारियों के कड़े प्रयासों व प्रतिबद्धता को सराहते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें गर्व महसूस हो रहा है कि उनके क्षेत्र की तारीफ स्वास्थ्य मंत्रालय ने की। जिसे पढ़कर राहुल गाँधी के फॉलोवर्स फूले नहीं समाए। उन्होेंने भी इस आधार पर अपने युवा नेता की तारीफों के पुलिंदे बाँधने शुरू कर दिए और कहने लगे कि न नरेंद्र मोदी के वाराणसी में न स्मृति के अमेठी में ऐसा कमाल हुआ है। बल्कि राहुल गाँधी ने अपने नेतृत्व में ये कर दिखाया है।

ट्वीटर पर राहुल गाँधी के समर्थकों द्वारा किए गए ट्वीट्स के भरमार को देखकर यकीन होता है कि राहुल गाँधी के फॉलोवर उन्हीं की तरह हैं। जो बिना तथ्यों की जाँच परख किए समाज में झूठ फैलाने में लग जाते हैं और अपने नेता की छवि निर्माण करने की होड़ में ये भी नहीं जानते हैं कि जिस जानकारी को वो फैला रहे हैं वो सच है या नहीं।

इसलिए, सभी भ्रमों को दूर करते हुए आपको बता दें, कि जिस वायनाड को लेकर राहुल गाँधी व उनके समर्थक इतनी उत्साहित हो रहे हैं। उसकी हकीकत वास्तविकता में बहुत ज्यादा अलग है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वायनाड में कोरोना वायरस को रोकने हेतु प्रयासों की कोई प्रशंसा नहीं की है। बल्कि अतिश्योक्ति देखिए कॉन्ग्रेस पूर्व अध्यक्ष ने जिस मंत्रालय के नाम पर झूठ फैलाया है उसी मंत्रालय ने नई सूची में वायनाड को हॉट्सपॉट चिह्नित किया है।

जी हाँ, स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, वायनाड उन राज्यों में से है जिन्हें कोरोना वायरस के हॉट्सपॉट में क्लस्टर सूची में रखा गया है। जो कि रेड जोन से सिर्फ एक पायदान नीचे की श्रेणी है। अब रही बात इसकी की जब वायनाड के हालत कोरोना मामले में बहुत सुधरे हुए नहीं है तो राहुल गाँधी किन आधारों पर मिया मिठ्ठू बने?

तो जानकारी दे दें कि केरल में 7 जिले हैं जिनमें से 6 जिले पूरी तरह कोरोना के हॉट्सपॉट हैं यानी रेड जोन जबकि वायनाड अकेला ऐसा जिला है जो हॉस्टपॉट का क्लस्टर है। बाकी सब ऐसे इलाके हैं जहाँ कोरोना तेजी से फैला। शायद इसी उपलब्धि को राहुल गाँधी अपनी तारीफ समझ बैठे और सोशल मीडिया पर आभार व्यक्त करने लगे। लेकिन बता दें, राहुल गाँधी के दावों के उलट मंत्रालय ने अभी भी जिले को रेड जोन में रखा है और उसने व्हॉइट जोन में नहीं डाला। जिले से अब तक कोरोना के तीन मामले आए हैं, जिनमें से 2 ठीक हो चुके हैं। लेकिन फिर भी सुरक्षा के लिहाज से सरकार ने इसे रेड जोन में रखा हैं। इसलिए राहुल गाँधी के दावे बिलकुल गलत हैं।

सबा नकवी! वो 8 चीजें जिनकी उम्मीद हर हिन्दू मुस्लिमों से करता है, 8वीं सबसे आसान है

प्रोपेगैंडा फैलाने के लिए कुख्यात सबा नकवी ने हाल ही में एक वीडियो के जरिए मुस्लिमों के बचाव में हिन्दुओं के खिलाफ जमकर जहर उगला है और हिन्दुओं की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है।

सबा नकवी ने इस वायरल वीडियो के माध्यम से हिन्दुओं पर मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाने का आरोप लगाया है और बेहद चालाकी से मुस्लिमों के करनामों पर पर्दा डालने का प्रयास किया है। यही नहीं उन्होंने सावधानी से विक्टिम कार्ड भी खेला है।

इस वीडियो में सबा नकवी ने तमाम मुस्लिम समुदाय के लोगों के कुकृत्यों को छुपाने के लिए कुछ ‘अच्छे मुस्लिमों’ का जिक्र करते हुए सभी हिन्दुओं को असहिष्णु बताया है। और ऐसा करते हुए उन्होंने हिन्दू धर्म के लोगों का समाज के प्रति योगदान का कहीं भी किसी प्रकार का जिक्र नहीं किया है।

इस वायरल वीडियो में सबा नकवी कहते हुए देखी जा सकती हैं कि ‘हम लोगों से आप और क्या चाहते हैं?’ इसमें ‘हम’ शब्द का प्रयोग मुस्लिमों के लिए किया गया है। हालाँकि, सबा नकवी को हिन्दुओं को बुरा बताने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि इन्हीं विषयों पर हिन्दुओं का पक्ष रख कर तथ्य सामने रखे जाएँ तो सबसे पहले ‘विक्टिम कार्ड’ का रोना वही रोएँगी।

‘क्या हमें चले जाना चाहिए’ यह सवाल सबा नकवी अपने इस वीडियो में पूछती नजर आती हैं, जिसका उत्तर न दिया जाए तो बेहतर है क्योंकि यह फिर से सबा नकवी के लिए असहिष्णुता का प्रश्न पैदा कर सकता है।

कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनकी उम्मीद हिन्दू धर्म के लोग मुस्लिमों से करते हैं और यह इतनी भी ‘आसमानी माँग’ नहीं हैं कि मुस्लिम समुदाय उन्हें पूरा कर पाने में असमर्थ हो।

1 – उनका साथ मत दो, जो डॉक्टर्स पर थूकते हैं या उनका यौन उत्पीड़न करते हैं

निजामुद्दीन मरकज में शामिल लोगों को जब क्वारंटाइन करने के लिए अस्पताल ले जाया गया तो उन्होंने डॉक्टर्स पर थूकने, अश्लील इशारे करने से लेकर तमाम तरह की बदसलूकियाँ कीं। फिर भी मुस्लिम समुदाय के चुनिन्दा ‘अच्छे मुस्लिमों’ ने उन्हें ऐसा करने से नहीं रोका। वो अस्पताल में महिला स्वास्थ्यकर्मियों के सामने नंगे होकर घूमते रहे।

यहाँ तक की अस्पताल के बिस्तर पर एक जमाती ने शौच तक कर डाली। यदि मुस्लिम और उनके साथी ऐसे बदतमीज मुस्लिमों का बचाव करना छोड़ दें तो बड़ी मेहरबानी होती। क्योंकि वह भी उन्हीं के समुदाय से हैं जिनका जिक्र सबा नकवी अपने वीडियो में करती हैं।

2 – टिकटोक पर फेक न्यूज़ फैलाना और कोरोना को अल्लाह की NRC बताना बंद कर दें

सबा नकवी जैसे प्रोपेगैंडा पत्रकारों के संचार और समाचार के प्रमुख स्रोत टिकटोक पर हर प्रकार के मजहबी वीडियो शेयर किए जाते हैं। टिकटोक के जरिए ‘काफिरों’ को तमाम तरह के सन्देश दिए गए जिनमें बताया गया कि नमाजियों का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता या फिर अल्लाह और इस्लाम ही कोरोना का इलाज हैं।

हदें तो तब पार हुईं जब कोरोना वायरस को अल्लाह की NRC बताया गया। ऐसा करने वाले भी सबा नकवी के ही समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। मुस्लिमों को उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहिए।

3 – स्वास्थ्यकर्मियों-डॉक्टर्स से नाजायज माँग करनी बंद करें, उन पर पत्थरबाजी ना करें

क्वारंटाइन में तबलीगी जमात के लोगों ने जो भी उपद्रव मचाया है उनमें सबसे ज्यादा ‘वाहवाही’ उनकी बिरियानी, अंडा-करी और 25-25 रोटियों की माँग ने बटोरी है। यही नहीं, जहाँ कहीं भी डॉक्टर्स की टीम जाँच के लिए गई वहाँ उन पर थूका गया, पत्थर फेंके गए और सैकड़ों मुस्लिमों ने इकट्ठे होकर अल्लाह-हो-अकबर के नारे लगाते हुए उन्हें घेर लिया। यदि मुस्लिम इस तरह की हरकतों पर भी लगाम लगा सकें तो यह देश पर निश्चित ही बड़ा उपकार होगा।

4 – मजहब को देशहित पर हावी न होने दें

कोरोना वायरस के हावी होते ही भारत में भी फ़ौरन लॉकडाउन का ऐलान किया गया। लेकिन सरकार की अपील को सिर्फ मजहबी कारणों से ठुकराते हुए मुसलमान देखे गए। उन्होंने ना सिर्फ सामूहिक नमाज में हिस्सा लिया बल्कि सार्वजनिक उपक्रमों में भी उसी तरह शामिल रहे मानो इसका उपाय सोशल डिस्टेंस ना होकर वाकई में वही हो जैसा कि 15-16 साल के मुस्लिम युवा टिकटोक पर बताते रहे हैं।

5 – इस्लामिक आतंकियों के कारनामों के सामने आने पर विक्टिम कार्ड ना खेलें

जब भी कोई आतंकी घटना सामने आती है या फिदायीन हमला होता है उसमें आश्चर्यजनक रूप से एक ‘विशेष-स्रोत‘ के लोगों का नाम होता है। उस पर सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह होता है कि सबा नकवी जैसे लोग ही तब यह कहकर नकारते हुए देखे जाते हैं कि नहीं, इस आतंकवाद का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है।

यहाँ तक कि इन खबरों पर बात करने वालों को इस्लामोफोबिया से ग्रसित बता दिया जाता है। जबकि मीडिया सिर्फ इस्लामिक आतंकवादियों या अपराधियों द्वारा किए गए कारनामों का ही जिक्र कर रहे होते हैं। अतः यह भी निवेदन है कि मुस्लिमों को ऐसी मासूम शिकायतें नहीं करनी चाहिए।

6 – नरसंहार करने वालों का महिमामंडन करना बंद करें

यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि भारत देश के इतिहास को मुस्लिम आक्रान्ताओं ने ‘बुत परस्तों’ के रक्त से सींचा है। फिर भी हर उस मुस्लिम आक्रान्ता का महिमामंडन अक्सर किया जाता है जिसने चाहे हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया हो, वह चाहे बलपूर्वक हिन्दुओं को मुस्लिम बनाने वाला औरंगजेब हो, जहाँगीर हो, खिलजी हो या फिर टीपू सुल्तान हो, मुस्लिम समुदाय ने हर समय इन आक्रान्ताओं को अपना आदर्श बनाकर पेश किया है।

और इन आतताइयों के समर्थन के पीछे कारण सिर्फ उनका मुस्लिम होना रहा है, यानी शुद्ध मजहबी कारण। यदि हो सके तो हिन्दुओं के व्यापक नरसंहार के लिए जिम्मेदार इन मुस्लिम आक्रंताओ का गुणगान भी मुस्लिम समुदाय को बंद करना चाहिए। इसमें किसी भी तरह की गंगा-जमुनी तहजीब नहीं छुपी हुई है।

7 – उम्माह को सामाजिक सौहार्द से ऊपर रखना बंद करना होगा

सोशल मीडिया पर मुस्लिम समुदाय के एक बड़े वर्ग ने मध्य पूर्व स्थित इस्लामिक देशों में रहने वाले हिंदुओं के खिलाफ एक नियत अभियान चलाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर हिंदुओं द्वारा तबलीगी जमात और इस्लामी आतंकवादियों के खिलाफ की गई टिप्पणियों के स्क्रीनशॉटों को कैप्चर किया और उन्हें नौकरी या उनके संस्थान से निकालने की सिफारिश के साथ स्थानीय अधिकारियों को भेजा।

ध्यान देने की बात यह है कि इस तरह हिन्दुओं को चुनकर निशाना बनाने की हरकतों से भारत में मुसलमानों का भला नहीं होता है और हमारे देश में सांप्रदायिक संबंधों को भी बहुत नुकसान पहुँचता है। अगर मुसलमान ऐसी हरकतों को रोक सकते हैं, तो यह बहुत अच्छा होगा।

8 – मस्जिदें बनाने के लिए तोड़े गए मंदिरों को हिन्दुओं को लौटा दें

यह एक स्थापित ऐतिहासिक तथ्य है कि मस्जिदों के निर्माण के लिए इस्लामिक आक्रान्ताओं ने असंख्य हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया था। कई जगहों पर तो मंदिरों के निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री का उपयोग मस्जिद के निर्माण में किया गया था। सदियों के प्रयास और दशकों बाद भारतीय न्यायालयों में समय बिताने के बाद हिंदुओं ने राम जन्मभूमि को पुनः प्राप्त किया है।

इस से सीख लेकर मुसलमानों को काशी-मथुरा सहित शेष मंदिरों को अब हिन्दुओं को वापस सौंप देने के बारे में सोचना चाहिए। यह निश्चित तौर पर सामाजिक सद्भावना का ही एक प्रतीक होगा और यह हिंदू-मुस्लिम संबंधों के मिशाल की तौर पर सदियों तक याद भी रखा जाएगा। शायद इससे ज्यादा कहने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती है।

इसी विषय पर, एक हिन्दू अगर सबा नक़वी के तर्कों के हिसाब से चलेगा तो कैसा लगेगा, यह जानने के लिए ये वीडियो देखें:

तबलीगी जमात: आतंकवाद, चरमपंथ और खिलाफत आन्दोलन से जुड़े हैं तार

देश के 30 फीसदी कोरोना संक्रमण मामले तबलीगी जमात को समर्पित हैं जिसके चलते पूरे देश में डेढ़ हज़ार से ज़्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं। यह एक ऐसी संस्था है जिसके बारे में लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं है। लेकिन यह जमात का प्रभाव ही है कि सबसे ज़्यादा कोरोना संक्रमण मामलों का कारण होने के बावजूद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने तबलीगी जमात का नाम नहीं लेने का फैसला किया है।

क्यों, आखिर है क्या इस तबलीगी जमात की असलियत? ऐसा क्या प्रभाव है इसका? क्यों तबलीगी जमातियों द्वारा लगातार गैरकानूनी और गलत हरकत करने के बावजूद क्यों इतने सारे लोग इसके बचाव में उतर आए हैं। जब हमने इसके बारे में पड़ताल की, तथ्यों की खोजबीन की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए- 

  • तबलीगी जमात एक इस्लामिक मिशनरी आन्दोलन है जो विश्व भर के लोगों को कट्टर इस्लाम अपनाने को प्रेरित करता है। इसे 20वीं शताब्दी का सबसे प्रभावी धार्मिक आन्दोलन माना जाता है। प्यू रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व के लगभग 200 देशों में इस जमात के सवा करोड़ से लेकर 8 करोड़ तक समर्थक हैं। 
  • इसे 1926 में भारत के मेवात क्षेत्र में मोहम्मद इलियास अल-कंधलावी ने शुरू किया था। दिल्ली के निज़ामुद्दीन स्थित वो इमारत जहाँ से ढाई हज़ार जमातियों को निकाला गया था, दरअसल तबलीगी जमात का मुख्यालय है। 
  • जमाती छ: सिद्धान्तों पर काम करते हैं – कलीमा, सालाह, इल्मो ज़िक्र, इकारामे मुस्लिम, इकलासे नीयत और दावत-ओ-तब्लीग। 
  • इनमें से छठे सिद्धान्त, दावत-ओ-तब्लीग का अंग्रेजी में मतलब है प्रोसेलिटाइजेशन (proselytization) यानि धर्मान्तरण या धर्म परिवर्तन। जी हाँ, तबलीगी जमात का एक महत्वपूर्ण उसूल है ज़्यादा से ज़्यादा गैर इस्लामिक लोगों को इस्लाम में लाना। 
  • अमेरिका और ब्रिटेन समेत अन्य कई देशों की खुफिया संस्थाएँ और पत्रकारों की जाँच रिपोर्ट्स के अनुसार जमात के लोग बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन में लगे हुए हैं। 
  • जमात के समूह के कई लोगों को आतंकवाद फैलाने के लिए भी सजा मिल चुकी हैं। (9 सितम्बर, 2008 को गार्डियन डॉट कॉम)
  • अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया संस्थाएँ तबलीगी जमात को ‘कट्टरपंथ का द्वार’ कहती हैं। चूँकि इस संगठन का कोई संविधान या कोई औपचारिक पंजीकरण नहीं है, इसके बारे में लोग ज़्यादा नहीं जानते हैं और इसके सदस्यों और उनकी संख्या के बारे में कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। 
  • तबलीगी जमात एक अनौपचारिक संगठनात्मक संरचना का पालन करती है। इसके सदस्य मीडिया से अपनी दूरी बनाए रखते हैं। जमात अपनी गतिविधियों और सदस्यता के बारे में विवरण प्रकाशित करने से बचता है। यही वजह है कि यह लोगों की निगाह में आने से बचा रहता है। 
  • गैर-मुस्लिम क्षेत्रों में तबलीगी जमात आंदोलन की पैठ 1970 के दशक में शुरू हुई और इसी के साथ सऊदी वहाबियों और दक्षिण एशियाई देवबंदियों के बीच संबंधों की की भी शुरूआत हुई। हैरानी की बात यह है कि अन्य सभी तरह के इस्लामिक स्कूलों को खारिज करने वाले बहावी भी तबलीगी जमात की प्रशंसा करते हैं। 
  • हालाँकि तबलीगी जमात की वित्तीय गतिविधियाँ गोपनीय रहती हैं, लेकिन विश्व मुस्लिम लीग जैसे सऊदी संगठनों द्वारा तब्लिगी जमात को लाभ दिए जाने की खबरें हैं। 1978 में विश्व मुस्लिम लीग ने ड्यूसबेरी में तबलीगी मस्जिद के निर्माण पर सब्सिडी दी, जो तब से पूरे यूरोप में तब्लिगी जमात का मुख्यालय बन गया है। 
  • जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के बार्कले केन्द्र द्वारा प्रकाशित एक लेख के अनुसार तबलीगी जमात वैश्विक सुन्नी इस्लामिक मिशनरी संस्था है जिसका उद्देश्य खिलाफत आन्दोलन चलाना है। 
  • जमात ने 1946 में अपनी गतिविधियों का विस्तार करना शुरू किया। दो दशकों के भीतर यह दक्षिण पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका, यूरोप, और उत्तरी अमेरिका तक पहुँच गया।
  • 2007 तक, तबलिगी जमात के सदस्य ब्रिटेन की 1,350 मस्जिदों में से 600 पर काबिज थे। 
  • एक अनुमान के अनुसार अमेरिका में तबलीगी जमात के करीब 50,000 सदस्य सक्रिय हैं।
  • तबलीगी जमात का अमीर, जमात के परामर्श परिषद शूरा और यहां के बुज़ुर्गों द्वारा ताउम्र के लिए नियुक्त किया जाता है। 
  • खूरौज यानि धर्मान्तरण यात्रा जमात के लोगों के लिए अत्यन्त आवश्यक मानी जाती है। जमाती महीने में 120 दिन यानि तीन महीने बाहरी देशों की यात्रा करके अपने धर्म का प्रचार करते हैं।
  • इनका प्रचार का तरीका ज़मीनी स्तर पर लोगों को जोड़ने का है। यह बड़े राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों की बजाय गरीब, पिछड़े, भटके लोगों के बीच इस्लाम का प्रचार करते हैं। हालाँकि इनके लोग वैश्विक स्तर की राजनीतिक संस्थाओं में भी हैं।
  • इनकी ताकत है इनका अराजनैतिक रुख जिसके कारण यह कभी चर्चा औऱ खबरों में नहीं आते। 
  • इसी वजह से यह अयूब खान (1960 के दशक) और इंदिरा गांधी (1975-77) की सरकारों के दौरान बच गए जबकि अन्य सामाजिक राजनीतिक इस्लामी समूहों को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।
  • इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ इस्लाम एंड क्रिश्चियनिटी के निदेशक डॉ पैट्रिक सुखदेव के अनुसार तबलीघी जमात ब्रिटेन में एक गुप्त समाज के रूप में संचालित होती है। इसकी बैठकें बंद दरवाजों के पीछे आयोजित की जाती हैं। कोई नहीं जानता कि उनमें कौन शामिल होता है, इसमें कितना पैसा है। यह लोग खुद के बारे में कोई बात नहीं करते। यहाँ तक हिसाब खिताब के खाते तक नहीं हैं। 
  • पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के पिता भी एक प्रमुख तबलीगी सदस्य और फाइनेंसर थे। इन्होंने तबलिगी सदस्यों को प्रमुख राजनीतिक पद लेने में मदद की। उदाहरण के लिए 1998 में तबलीगी समर्थक मुहम्मद रफीक तरार पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने और 1990 में तब्लीग से ही जुड़े लेफ्टिनेंट जनरल जावेद नासिर आईएसआई के महानिदेशक बने। 
  • तबलीगी जमात को अलकायदा और लश्कर-ए-तैयबा जैसे जेहादी संगठनों के लिए उपजाऊ भर्ती जमीन माना जाता है। अमेरिकी अधिकारी एलेक्स एलेक्सीव के अनुसार, लगभग 80% प्रतिशत इस्लामी चरमपंथी तब्लीग से सम्बन्धित रहे हैं। 
  • फ्रांसीसी खुफिया अधिकारी इसे कट्टरपंथ का द्वार (एंटीचैंबर) कहते हैं। 
  • बहुत से पाकिस्तानी क्रिकेटर्स जैसे शाहिद अफरीदी, सईद अनवर, इंजमाम-उल-हक़, मुश्ताक अहमद समेत पाकिस्तानी आईएसआई के पूर्व प्रमुख और पाकिस्तानी आर्मी जनरल मोहम्मद अहमद भी तबलीगी जमात के सदस्य हैं। 

वैश्विक आतंकवाद और तबलीगी जमात

  • 9/11 के हमले के बाद तबलीगी जमात अमेरिकन एफबीआई और ब्रिटिश इन्टैलीजेन्स की निगाहों में आया। 
  • तबलीगी सदस्यों पर लगातार आंतकवाद का आरोप लगाया जाता रहा है। पेरिस में अमेरिकी दूतावास उड़ाने की साजिश रचने वाला अल कायदा का सदस्य हो या स्पेन में जनवरी 2008 में बमबारी की साजिश में हो, नागरिकों पर हमले हों या 7/7 लंदन बम विस्फोट का मामला हो या फिर ग्लासगो हवाई अड्डे पर हमले की साजिश हो, इनसे जुड़े आतंकवादियों के तार कहीं ना कहीं अप्रत्यक्ष रूप से तबलीगी जमात से जुड़ते रहे हैं। 
  • स्पेन की पुलिस ने 19 जनवरी 2005 को बार्सिलोना में अपार्टमेंट इमारतों, एक मस्जिद और एक प्रार्थना हॉल पर छापों के दौरान बम बनाने की सामग्री जब्त की और 14 लोगों को गिरफ्तार किया था जो शहर में बमबारी करने की योजना बना रहे थे। यह सभी तबलीगी जमात से जुड़े थे। 
  • भारत का कफील अहमद जो कि ग्लासगो एयरपोर्ट पर असफल अटैक के लिए गिरफ्तार किया गया था, वो भी तबलीगी जमात से जुड़ा था। 
  • 7/7 के लंदन बॉम्बर्स में से दो शहजाद तन्वीर और मोहम्मद सिद्दीक खान भी ड्यूसबरी स्थित तबलीगी मस्जिद में जाते थे।
  • साल 2012 में प्रकाशित इस्लाम ऑन दी मूव- नाम की किताब में मलेशिया के पॉलिटिकल साइन्टिस्ट फारिश नूर ने दावा किया है कि लश्कर-ए-तयैबा के एक सदस्य हमीर मोहम्मद ने तबलीगी सदस्य के तौर पर पाकिस्तान का वीज़ा लेने की कोशिश की थी। इसी तरह सोमालिया के मोहम्मद सुलेमान ने भी इसी तरह पाकिस्तान में प्रवेश लेने की कोशिश की थी।   
  • अबू ज़ुबैर अल हैली, जो कि बोस्निया हर्जेगोविना में अल कायदा की मुज़ाहिदीन बटालियन का कमान्डर था, भी एक तबलीगी के रूप में पाकिस्तान आया था। जबकि सऊदी निवासी अब्दुल बुखारी जो कि जिसकी बहुत सारे देशों को तलाश थी, भी खुद को तबलीगी बताते हुए दिल्ली के निज़ामुद्दीन के तबलीगी मरकज़ में शामिल हो गया था। (मिन्ट रिपोर्ट- 2013)
  • पूर्वी लंदन की अधिकतर मस्जिदें तबलीगी जमात के नियंत्रण में हैं। टाइम्स के क्राइम और सिक्योरिटी एडीटर शॉन ओ नील इसे अतिरूढ़िवादी लोगों की जमात कहते हैं। 1989 में लंदन में तबलीगी जमात की क्वीन्स रोड स्थित एक मस्जिद का संचालन उग्रवादी समूह- अल मुहाजिरों के लीडर, उमर बखरी मोहम्मद के हाथ में था जिस पर बाद में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। (द गार्डियन रिपोर्ट- 9 सितम्बर, 2008)

वैश्विक उग्रवाद और जिहादवाद में तबलीगी जमात की भूमिका

  • तब्लीग को चरमपंथी प्रचारक संस्था मानते हुए उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है।
  • अमेरिकी विदेश नीति परिषद की रिपोर्ट के अनुसार यह जिहादी समूहों का एक निष्क्रिय समर्थक है। इनकी पूरे संसार की इस्लामीकरण करने के प्रति अटूट प्रतिबद्धता है। इनका लक्ष्य योजनाबद्ध तरीके से दुनिया पर विजय प्राप्त करना है। 
  • फ्रेन्च अधिकारी भी यह दावा कर चुके हैं कि लगभग 80 फीसदी रेडिकल इस्लामिस्ट्स जिनसे वो मिले कहीं ना कहीं, तबलीगी जमात से जुड़े हुए थे।
  • तबलिगी जमात इस्लामी चरमपंथ की प्रेरक ताकत है और दुनिया भर में आतंकवादी कारणों के लिए एक प्रमुख भर्ती एजेंसी है। अधिकांश युवा चरमपंथियों के लिए, तबलीगी जमात में शामिल होना उग्रवाद की राह पर पहला कदम है । 
  • यही नहीं शिया विरोधी सांप्रदायिक समूहों, कश्मीरी उग्रवादियों और तालिबान से बने कट्टरपंथी देवबंदी गठजोड़ के बीच भी अप्रत्यक्ष संबंध पाए गए हैं। 

उपरोक्त सभी जानकारियाँ विश्वसनीय वेबसाइट्स की न्यूज़ रिपोर्ट्स आर्काइवस से ली गई हैं। संबन्धित लिंक-

https://web.archive.org/web/20140905014000/http://www.stratfor.com/weekly/tablighi_jamaat_indirect_line_terrorism (23 जनवरी 2008, स्ट्रैटफॉर ग्लोबल इन्टैलीजेन्स, फ्रेड बर्टन और स्कॉट स्टीवर्ट की रिपोर्ट)

https://www.meforum.org/686/tablighi-jamaat-jihads-stealthy-legions

प्रस्तुत आलेख वरिष्ठ पत्रकार यामिनी अग्रवाल ने लिखा है

‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’- मोदी जी द्वारा बोले इन शब्दों का महत्व बहुत व्यापक है

प्रधानमन्त्री मोदी जी ने अपने संबोधन में कहा था- ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ अर्थात् इस राष्ट्र यानी देश के हित में हम सब आलस्य और प्रमाद को छोड़कर सजग बनें। ‘वयं’ शब्द संस्कृत व्याकरण के हिसाब से उत्तम पुरुष के बहुवचन का प्रयोग है, जिसका मतलब होता है ‘हम सब’। वक्ता का अभिप्राय जिस इकाई से है उसके अन्दर आने वाले सभी लोग उस ‘हम सब’ का हिस्सा हैं।

यहाँ ‘वयं’ शब्द की परिधि राष्ट्र से तय होती है, जिसका मतलब हुआ इस देश के अंतर्गत आने वाले सभी लोग- शासक, प्रशासक, नागरिक, सुरक्षाकर्मी, चिकित्सक, रोगी, सफाईकर्मी, सभी व्यवसाय, सभी सम्प्रदाय, भारत संघ के सभी राज्य या आप कह सकते हैं कि जिस प्रसंग में इस वैदिक सूक्ति का प्रयोग किया गया है उससे सम्बंधित हर वो पुर्जा जिसे इस संकट में जागरूक और सावधान रहना है वो ‘वयं’ शब्द का अर्थ है। कुल मिलाकर वयं = We the People of India।

इन सब पुर्जों में से अधिकांश ठीक काम कर रहे हैं। लेकिन एक-दो पुर्जों में काफी समस्या है। उन्होंने इस ‘वयं’ में भी एक और ‘वयं’ का वहम पैदा कर लिया है। इससे पूरे राष्ट्र के एक इकाई के रूप में किए जा रहे प्रयासों पर पानी फिर जाता है। बांद्रा जैसी संकुल जगह पर हजारों लोग इकट्ठे होकर जब राष्ट्र के प्रयासों को गरियाते हैं तो इसे शायद ‘जा गरियाम’ तो कह सकते हैं, मगर ‘जागृयाम’ नहीं। जागृयाम का अर्थ है जागरूक होना।

मुरादाबाद की शर्मनाक घटना इंसानियत के दायरे से बिल्कुल बाहर की चीज़ है और उससे भी अधिक शर्मनाक है ऐसी चीजों पर की जाने वाली राजनीति। ऐसी घटनाएं देश में कई स्थानों पर घट चुकी हैं, जिसकी वजह से अनेक जीवन खतरे में हैं। जीवन शब्द संस्कृत की मूल धातु ‘जीव प्राणने’ से बनता है, इस तरह जीवन का अर्थ हुआ श्वास लेना।

कोरोना व्यक्ति की श्वास को बंद कर देता है, जिसका मतलब है रोगी का जीवन ख़त्म हो जाना। डॉक्टर्स का धर्म यही है कि वो हमारी यानी इंसान की श्वास को ठीक से चलने दें। जब वो अपने इस मानव धर्म का पालन करने आते हैं तो कुछ दानवधर्मा जिनका वास्तविक धर्म जियो और जीने दो की बजाय मरो और मारो है, उन पर पत्थर फेंकने लगते हैं।

हममें से कुछ को ताज्जुब होता है कि इतने पत्थर आते कहां से हैं? दरअसल उनका भण्डारण ऐसी जगह पर किया गया है कि वहां से जितने और जब चाहे पत्थर पैदा कर लो। ये उनके दिमागों में भरे हुए हैं।

बहुत-से लोगों को लगता है कि ये बच्चों की नादानी है, कुछ भटके हुए बच्चे हैं, चलो मान लेते हैं कि ऐसा ही है। लेकिन अगर आपके बच्चे की नादानी नागवार गुजरे तो क्या आप उसे रोकेंगे नहीं? जिन्हें सचमुच ये लगता है कि ये उनके बच्चे हैं उन्हें उनके प्रति अपना अभिभावकत्व तो निभाना ही चाहिए। जो अभिभावक अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से नहीं रोकते उनको अक्सर दूसरों की गालियाँ सुननी पड़ती हैं।

ये दुनिया का रिवाज़ है। जिनके बच्चे उनके वश में नहीं होते उनका किसी को तो इलाज करना ही पडेगा। ऐसे में जब कानून अपना काम करता है या लोग उनकी आलोचना करते हैं तो आपको विरोध का कोई अधिकार नहीं है।

एक और बात, अगर आप कहीं सर्कस देखने जाएँ जहां आप आराम से बैठकर करतबों का मज़ा ले रहे हों वहां अचानक जोकर्स आकर आप पर पत्थर फेंकने लगें, आपकी आँख-नाक से खून बहाने लगे तो आपको कैसा लगेगा? क्या आप उन्हें ये सोचकर माफ़ कर देंगे कि चलो ये तो जोकर हैं, इनका क्या बुरा मानना? हरगिज़ नहीं। अत: हे सलमान भ्रात:! आप इन्हें जोकर कहकर जोकर्स का अपमान न करें। जोकर का काम है लोगों को हँसाना और खुश करना, उन्हें जख्मी करना या जान से मारना नहीं।    

अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से राष्ट्रीय हितों के प्रति जागरूक होने का आह्वान किया था, किन्तु कुछ लोगों की एक और समस्या है। वो राष्ट्र और राष्ट्रवाद शब्द से ही नफ़रत करते हैं। उनकी दृष्टि में राष्ट्रवाद एक विभाजनकारी वस्तु है, जबकि वास्तविकता ये है कि राष्ट्र शब्द चाहे देश का द्योतक हो या राज्यसत्ता का दोनों ही अर्थों में जाति-वर्ग से परे सभी नागरिकों का समावेशी है।

राष्ट्रवाद जिस राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का आग्रही है वो जब सबके लिए और सबके द्वारा है तो फिर विभाजन कैसा? राष्ट्र मतलब एक संप्रभु राज्य। असली समस्या अक्सर चीजों के राजनैतिक दुरूपयोग से पैदा होती है। राजनीतिकरण की स्थिति में राष्ट्रवाद तो छोडिए धर्मनिरपेक्षता जैसी निरापद और संवैधानिक चीज़ भी संकुचित हो जाती है। स्वार्थी मंशा और महत्वाकांक्षा को बाहर निकाल दें तो राष्ट्रवाद एक उत्तम अस्तित्व बोधक चीज़ है।

राष्ट्र शब्द का एक और अर्थ है- कोई राष्ट्रीय या सार्वजनिक संकट। तब ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ का एक और अर्थ होगा- राष्ट्रीय संकट की इस वेला में हम सब जागरूक बनें। कोरोना के इस संकट में सबसे बड़ी जागरूकता यही है कि सामाजिक दूरी बनाए रखें। कुछ राष्ट्र विरोधी और मानवता विरोधी तत्वों के बहकावे में आकर बड़ी संख्या में एकत्रित होने का पागलपन न करें। Isane और इंसान के बीच के फर्क को समझें।

आपने अक्सर कुछ लोगों को चिड़चिड़ा कर कहते सुना होगा कि ये मच्छर हमेशा कान पर आकर ही क्यों बोलते हैं। बोलते तो हर जगह हैं लेकिन सुनाई सिर्फ कानों को देता है। और जब कान को सुनाई दे जाता है तो कान अपने आप को मच्छर से बचा भी लेता है। पाँव को सुनाई नहीं देता तो वो कोई बचाव भी नहीं करता और मच्छर उसे काट लेता है। बस ऐसा ही कोरोना के बारे में है, जो इसके खतरे पर गौर करेंगे वो बच जाएंगे, जो इसकी गंभीरता को नहीं समझेंगे वो बचाव नहीं करेंगे और कोरोना उन्हें काट लेगा।

कोरोना काल में हमारी लापरवाहियाँ राष्ट्र के उन जागरूक सिपाहियों की जिम्मेदारियों को कितना बढ़ा देती हैं जो अपने परिवार और घर से दूर रहकर अस्पतालों में कोरोना का और सड़कों पर हमारी लापरवाहियों और बीमार मानसिकताओं का इलाज कर रहे हैं। गाँवों में एक कहावत है- ‘अंधे की मक्खी राम उड़ावै’।

बस ये वही राम हैं जो कहीं डॉक्टर्स के रूप में तो कहीं सुरक्षाकर्मियों के रूप में खुली आँख वाले अंधों की मक्खियाँ उड़ाने में दिन-रात लगे हुए हैं। ये वास्तव में ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम’ की भावना के सच्चे निदर्शन हैं। इसलिए जब वो आपकी मक्खियाँ उडाएं तो उनके साथ बुरा बर्ताव न करें, उन पर पत्थर न फेंकें बल्कि धन्यवाद करें अन्यथा जो शास्त्र जागरूक बनाने की सलाह देते हैं या जो संविधान कर्तव्यों की प्रेरणा देता है वही उसके उल्लंघन पर कुछ दूसरे उपचार भी सुझाता है।

कहीं ऐसा न हो कि राष्ट्र के नाम अगले संबोधन में मोदी जी किसी ऐसी सूक्ति का पाठ कर दें- ‘दण्ड: शास्ति प्रजा: सर्वा:’ अर्थात् दंड सारी प्रजा को अनुशासित रखता है। इस ‘सर्वा:’ में उन सबका भी ग्रहण हो जाता है जिन्होंने खुद को खुदा समझकर ‘वयं’ से बाहर मान रखा था। अंधे की मक्खी राम उडावै ये तो ठीक है लेकिन जो अंधे होने का नाटक कर रहे हैं उनकी मक्खियाँ तो डंडे से ही उडानी होंगी।

अंतत: यही आशा और ईश्वर से प्रार्थना कि राष्ट्रीय एकता के संकल्पों का नाभिकीय संलयन देश में जागरूकता की अपार ऊर्जा पैदा करे।

रमजान के महीने में मस्जिदों में 5 वक़्त की नमाज पर कर्नाटक सरकार ने लगाया बैन, अजान और लाउडस्पीकर भी रहेंगे प्रतिबंधित

देशव्यापी बन्द के बीच कर्नाटक सरकार ने रमजान के दौरान मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली 5 बार की सामूहिक नमाज पर रोक लगा दी है। नमाज प्रतिबंध पर राज्य अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, वक्फ और हज विभाग ने कहा है कि नमाज अदा करने के लिए मस्जिदों के कर्मचारियों द्वारा किसी भी सार्वजनिक स्थान का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

दरअसल, देशव्यापी बन्द के बीच ही 23 अप्रैल-23 मई तक रमजान (Ramadan) आने वाला है। इसी वजह से कर्नाटक सरकार ने यह बड़ा फैसला लिया है। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा रमजान के दौरान दावत-ए-सहरी और इफ्तार पार्टी पर भी पूरी तरह से सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। इसके अलावा अजान भी कम आवाज में होगी और लाउडस्पीकर पर भी रोक लगाई गई है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने भी 24 अप्रैल से शुरू हो रहे रमजान के महीने के लिए लोगों से अपील की है कि लॉकडाउन के दिशा-निर्देशों एवं सोशल डिस्टेंन्सिंग का पूरी ईमानदारी से पालन करें। साथ ही इस दौरान अपने-अपने घरों पर ही नमाज पढ़ें और नमाज प्रतिबंध आदि का पालन करें।

कर्नाटक सरकार की यह रोक मस्जिद के अलावा दरगाह और इमामबाड़ों में सामूहिक आयोजनों पर भी लागू है। आदेश में कहा गया है कि धीमी आवाज में अजान दी जा सकेगी। मस्जिद परिसर में मोहल्‍लों में वितरण के लिए किसी खाद्य सामग्री को तैयार नहीं किया जाएगा। इसके अलावा मस्जिद और दरगाह के आसपास कोई खाने की दुकान लगाने की भी इजाजत नहीं होगी। ऐसा न करने पर या सरकारी आदेश का उल्‍लंघन करने वाले के खिलाफ वक्‍फ ऐक्‍ट 1995 के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पिछले 12 घंटे के अंदर 34 नए केस आए हैं। अब तक प्रदेश में 313 लोगों के अंदर संक्रमण की पुष्टि हुई है। इसमें से 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 82 लोग डिस्चार्ज हो चुके हैं।

यह भी देखा गया है कि देशभर में लोगों ने सामूहिक नमाज पढ़ने के लिए कई बार लॉकडाउन के नियमों का उलंघन किया है। जिस कारण आने वाला रमजान का महीना चिंता का विषय बन गया है।

कंगना की बहन रंगोली का अकाउंट ट्विटर ने किया सस्पेंड, ‘मुल्लों’ की पत्थरबाजी को लेकर किया था ट्वीट

देश में मजहबी उन्माद फैलाने वाले कट्टरपंथियों और तथाकथित सेकुलरों के कारण बॉलीवुड अदाकारा कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल का ट्विटर अकॉउंट सस्पेंड कर दिया गया है। रंगोली की गलती सिर्फ़ इतनी थी कि उन्होंने कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच डॉक्टरों, नर्सों और पुलिसकर्मियों पर हमला करने वाले कट्टरपंथियों पर अपना आक्रोश व्यक्त किया था।

मुरादाबाद में हुई घटना के बाद कंगना के बहिन रंगोली ने ट्वीट किया, “एक जमाती की कोरोना से मौत हो गई, जब पुलिस और डॉक्टर उसके परिवार को चेक करने गए तो उन्होंने उनपर (पुलिस और डॉक्टर) हमला किया और उन्हें मारा। धर्मनिरपेक्ष मीडिया और इन मुल्लाओं को एक पंक्ति में खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए। इतिहास में वे हमें नाजी कह सकते हैं, किसे चिंता है, जिदंगी फेक इमेज से ज्यादा जरूरी है।”

गौरतलब है कि बीतें दिनों ऐसी कई घटनाएँ हुई जब स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों पर एक खास समुदाय की भीड़ ने मौक़ा मिलते ही हमला किया। इन घटनाओं को देख ऐसा आक्रोश किसी के लिए भी आम बात है। लेकिन सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ लोगों को ये प्रतिक्रिया पसंद नहीं आई। उन्होंने रंगोली के ऊपर नफ़रत और हिंसा को उकसाने का आरोप लगा दिया और इस ट्वीट की शिकायत करते हुए पुलिस को टैग कर दिया। इस बीच रंगोली के ख़िलाफ़ सख्त कार्यवाही की माँग हुई और थोड़ी देर में ट्विटर ने भी उनके अकाउंट को सस्पेंड कर दिया।

अब हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कंगना की बहिन रंगोली ने किस घटना को लेकर यह ट्वीट किया था। लेकिन बीते दिनों की घटनाओं को देखें तो अभी कल ही मुरादाबाद में कोरोना की जाँच करने गए सुरक्षाकर्मियों पर एक मुस्लिम भीड़ ने लाठी-डंडे से हमला कर पथराव किया था। स्थिति ऐसी हो गई थी कि जब पुलिस उन्हें बचाने गई, तो उन पर भी बेरहमी से हमला किया गया। बाद में इस मामले में कार्यवाही करते हुए बुधवार को 13 महिलाओं सहित 25 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया।

बता दें पिछले महीने दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मरकज़ में हजारों जमातियों ने मजहबी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। मरकज़ अब कोरोना वायरस का हॉटस्पॉट बन चुका है। आए दिन मरकज़ में मौजूद रहे लोगों की संक्रमित होने की खबर सामने आ रही है। नर्सों के साथ अश्लील हरकतें करने, डॉक्टरो और पुलिसकर्मियों पर थूकने सहित कई शिकायतें संक्रमित जमातियों के खिलाफ आए हैं। क्‍वारंटाइन सेंटर में शौच करने पर भी इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। जो लोग इनकी करतूतों का समर्थन करते हैं, उन्हें ट्विटर अपने प्लेटफॉर्म पर बने रहने की आजादी देता है। रंगोली जैसे लोग जो इनके ख़िलाफ़ आवाज उठाते हैं उन्हें चुप कराने के लिए अकाउंट सस्पेंड कर दिया जाता है।